भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
२४४ भावप्रकाशनिघण्टुः ४४ थुनेर स्थौणेयक भी एक संदिग्ध औषध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है लेकिन जब ग्रन्थि- पर्ण ही संदिग्ध है तब इसका निर्णय कैसे किया जा सकता है। तालीसपत्र नाम से लिये जाने वाले द्रव्यों में से एक का स्थानिक नाम थुनेर है। इसलिये कुछ लोग इस थुनेर को स्थौणेयक मानते हैं। थुनेर का वर्णन तालीसपत्र के साथ किया गया है। चरक में स्थौणेयक का उपयोग अगुर्वादि तैल में (चि. अ. ३), मृतसञ्जीवन अगद में (चि. अ. २३), बलातैल में (चि. अ. २८) एवं मदनफल उल्कारिकामोदक योग में (क. अ. १) किया गया है। सुश्रुत में एलादिगण (सू. अ. ३८) में इसका पाठ है। कुछ लोगों ने ले०--Clerodendrum infortunatum, Linn.; Fam. Verbenaceae (क्लेरोडेण्ड्रम् इन्फोर्च्यूनेटम् लिन, हर्बिनेसी), हि०--भांट, सं०--कारी, भाण्डीर को स्थौणेयक लिखा है। इसके १२ फीट तक ऊँचे क्षुप प्रायः सभी स्थानों में पाये जाते हैं। प्रत्येक भाग कडु और दुर्गन्धयुक्त होता है। पत्र-विपरीत, ४-९ इञ्च लम्बे, १-६ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, लम्बे नोक एवं लम्बे पत्रनाल से युक्त होते हैं। बाह्यपुट स्थायी, वर्धनशील और लाल होता है। आभ्यन्तर पुट रक्ताभ श्वेत होता है। इसके पत्र एवं मूल का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—भांट तिक्त पौष्टिक, उत्तम आनुलोमिक, पित्तसारक, कृमिघ्न एवं ज्वरघ्न है। तृतीयक तथा चतुर्थक ज्वर में यह लाभदायक है। बच्चों को इसके पत्र का चूर्ण २-५ रत्ती मधु एवं सुगन्ध द्रव्यों के साथ दिया जाता है। केंचुवे में इसके पत्र-रस को पिलाते हैं तथा बस्ति भी देते हैं। उदरशूल एवं अतिसार में इसकी जड़ को मट्ठा में पीस कर देते हैं। त्वचा के रोगों (खुजली) में इसका बाह्याभ्यन्तर प्रयोग करते हैं। अथ ग्रन्थिपर्णस्यैव भेदः । 'भटेडर' इति नेपालदेशे भवति । तस्य नामानि गुणाँश्चाह निशाचरो धनहरः कितवो गणहासकः । चोरकः शङ्कितश्चण्डो दुष्पुत्रः क्षेमको रिपुः । चोरको १ मधुरस्तिक्तः कटुः पाके कटुर्लघुः ॥ ११२ ॥ तीक्ष्णो हृद्यो हिमो हन्ति कुष्ठकण्डूकफानिलान् । रक्षोऽश्रीस्वेदमेदोऽस्रज्वरगन्धविषव्रणान् ॥ 'गठिवन' का ही भेद 'भटेडर' है जो कि नेपाल देश में उत्पन्न होता है, उसके नाम तथा गुण—निशाचर, धनहर, कितव, गणहासक, चोरक, शङ्कित, चण्ड, दुष्पुत्र, क्षेमक और रिपु ये सब संस्कृत नामक 'भटेडर' के हैं। भटेडर-मधुर, तिक्त तथा कटुरसयुक्त, पाक में कटु, लघु, तीक्ष्ण, हृदय के लिये हितकर और शीतवीर्य है। यह—कुष्ठ, खुजली, कफ, वात, रक्षोग्रह, अलक्ष्मी, पसीना, मेदरोग, रक्तविकार, ज्वर, दुर्गन्ध, विष और व्रण इन सबों को दूर करता है ॥११२-११३॥ ४५ भटेडर ( चोरक ) चोरक यह भी संदिग्ध है। इसे ग्रन्थिपर्ण का भेद माना गया है। कुछ लोगों ने स्थौणेयक एवं चोरक को एक ही वनस्पति माना है। चरक में 'संज्ञास्थापन दशेमानि' में इसका उल्लेख है। धूपन द्रव्यों के साथ इसका उल्लेख है और उन्मादोक्त महापैशाचिक घृत में इसका प्रयोग किया १. रोचको इति पाठान्० । कर्पूरादिवर्गः २५५ गया है। अपस्मार, हिक्का, श्वास एवं पीनस, नासारोग आदि में भी चोरक का उल्लेख है। कुछ लोग पान की जड़ का व्यवहार 'चोरक' नाम से करते हैं। पञ्जाब की तरफ चोरा नाम से एक द्रव्य मिलता है। इसका लेटिन नाम Angelica glauca Edgw.; Fam. Umbelliferae (अंजेनिका ग्लॉका, एज., अम्बेलीफेरी) दिया हुआ है। यह पश्चिम हिमालय में काश्मीर से लेकर सिमला तक ८०००-१०००० की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसका क्षुप ४-७ फीट ऊँचा होता है। काण्ड-चिकना, स्वावलम्बी, पोला तथा महीन प्रसी- ताओं से युक्त रहता है। पत्ते-प्रायः बड़े, १-३ पक्षवत् होते हैं। पत्रक-संख्या में ३, अण्डाकार या भालाकार, अनियमित एवं तीक्ष्ण दांतों से युक्त, ऊपरी पृष्ठ गहरे रंग का एवं अधोपृष्ठ श्वेतलिस रहता है। पुष्प-बहुत सफेद या नीलारुण रंग के तथा सवृन्तमुर्धज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल- चिकने, चिपटे आयताकार, १३ मि. मि. लम्बे एवं ६ मि. मि. चौड़े होते हैं। गुण और प्रयोग—यह हृद्य एवं उत्तेजक है और आध्मान एवं कुपचन में भी उपयोगी हैं। अथ तालीसपत्रम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह तालीसमुक्तं पत्राढ्यं धात्रीपत्रञ्च तत्स्मृतम् ॥ ११४ ॥ तालीसं लघु तीक्ष्णोष्णं श्वासकासकफानिलान् । निहन्यरुचिगुल्मामवह्निमान्द्यक्षयामयान् ॥ तालीसपत्र के नाम तथा गुण—तालीस, पत्राढ्य और धात्रीपत्र से संस्कृत नाम 'तालीसपत्र' के हैं। तालीसपत्र-लघु, तीक्ष्ण और उष्णवीर्य होता है एवं यह-श्वास, खांसी, कफ, वात, अरुचि, गुल्म, आम, अग्नि की मन्दता और क्षयरोग इन सबों को दूर करता है ॥ ११४-११५ ॥ ४६ तालीसपत्र तालीसपत्र—यह नाम विभिन्न वर्गों के वृक्षों के पत्तों को भिन्न स्थानों में दिया हुआ दिख- लाई देता है। पहले लोग प्राचीनआमलक-फ्लैकोर्टिआ कॅटाफ्रॅक्टा राक्स (Flacourtia cataphracta Roxb.) के पत्तो को तालीसपत्र कहा करते थे। दक्षिण में कहीं कहीं तमालपत्र-सिर्नेमोमम् तमाल (Cinnamomum tamal ) के पत्रों को तालीसपत्र कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, राज- पूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य टेक्सस् बॅकेटा (Taxus baccata) के पत्तों का व्यवहार तालीस पत्र के नाम से करते हैं। इसे कुछ लोग स्थौणेयक भी मानते हैं। बंगाल के वैद्य एबिस वेब्बियाना (Abies webbiana) के पत्तों का व्यवहार तालीसपत्र के रूप में करते हैं। नेपाल एवं पंजाब के कुछ वैद्य तालीसफार, रोडोडेन्ड्रोन् एन्थोपोमोन (Rhododendron anthopogon) के पत्तों का व्यवहार करते हैं जिसकी २, ३ अन्य उपजातियाँ भी होती हैं। प्राचीनआमलक का वर्णन आगे फलवर्ग में आया है तथा तमाल पत्र का वर्णन पहले (पृष्ठ २२८) किया जा चुका है। यहाँ पर बाकी तीनों का अलग-अलग वर्णन किया गया है। चरक में दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है। सुश्रुत में शिरोविरेचनगण में इसका पाठ है। तालीसपत्र के शास्त्रीय गुण इस प्रकार दिये हुए हैं—यह तिक्त, कडु, मधुर, उष्ण, लघु, तीक्ष्ण, शिरोविरेचन तथा कफ, वात, कास, श्वास, क्षय, वमन, अरुचि, गुल्म, आम, अग्निमांद्य और कृमि का नाश करने वाला है।
२५६ भावप्रकाशनिघण्टुः तालीसपत्र १ हि०-तालीसपत्र, थुनो, बिर्मी । गढ०-थुनेर । काश्मी०-पोस्तित् । वंब०-तालीसपत्र, बर्मी । बं०-बिर्मी । नेपा०-तेहीरे । खास०-दिंगंसहेर । अ०-जर्नब । अं०-Himalayan Yew (हिमालयन् यू ) । Taxus baccata Linn. (टॅक्सस् बॅकॅटा लिन.) । Fam. Taxa- ceae (टॅक्सॅसी) । हिमालय के काश्मीर, पूर्वी पजाब का पहाड़ी प्रदेश, गढवाल, अफगानिस्तान तथा अपर बर्मा आदि स्थानों में ६-१० हजार फीट की ऊँचाई पर इसके मध्यम ऊँचाई के सदाहरित वृक्ष पाये जाते हैं। कहीं कहीं १०० फीट तक ऊँचे झोपड़ाकृतिक वृक्ष होते हैं। इसका स्तंभ छोटा किन्तु उसकी गोलाई १०, १२ फीट होती है। छाल-पतली, किंचित् लाली- युक्त खाकी रंग की होती है। लकड़ी-दृढ, बाहरी भाग सफेद तथा अंदर का भाग रक्ताभ श्वेत होता है। पत्ते-दो कतारों में निकले रहते हैं। ये १-१॥ इञ्च लंबे, दशमांश इञ्च चौड़े, रेखाकार, कड़े, चिपटे, नोकीले, ऊपरी पृष्ठ पर गहरे हरे रंग के और अधःपृष्ठ पर हल्के पीले या सुरमई रंग के होते हैं। शिरा एक और पत्रनाल छोटा होता है। पत्तियों से विशेषतः सूखने पर एक प्रकार की गंध आती है। लालकोष में घिरा हुआ हरिताभ बीज होता है जो शीर्ष पर खुला रहता है। पहाड़ी लोग इसकी छाल से एक प्रकार का चाय सदृश पानक बनाकर पीते हैं और इसके फलों को खाते हैं। यद्यपि युक्तप्रान्त, राजपूताना, महाराष्ट्र एवं गुजरात आदि के वैद्य तालीसपत्र के स्थान पर इसका प्रयोग करते हैं तथापि थुनेर नाम से इसके स्थौणेयक होने की अधिक संभावना है। बिर्मि नाम से उत्तरी भारत में आर्तव प्रवर्तक एवं शामक औषध के रूप में तथा अपस्मार, अपतंत्रक तथा नाड़ीदौर्बल्य आदि में इसके पत्तों का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन- इसके बीज तथा पत्र में एक विषैला द्रव्य है जो बीज के ऊपर के लालकोष में नहीं होता। इसमें टॅक्सीन (Taxine ) नामक एक क्षाराम पाया जाता है। गुण और प्रयोग-तालीसपत्र अवसादक, उद्वेष्टननिरोधि, आर्तवजनन, वातानुलोमक, कफनिःसारक एवं बल्य है। इसकी क्रिया कुछ डिजिटॅलिस के समान होती है। अल्प मात्रा में प्रयोग करने पर नाडी एवं श्वास की गति कम होती है। मध्यम मात्रा में श्वास बढ़ता है तथा हृत्स्पन्द होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होता है। गर्भपात कराने के लिये प्रयुक्त करने पर गर्भपात नहीं होता लेकिन मृत्यु हो सकती है। बड़ी मात्रा से विषैला परिणाम होने से चक्कर, वमन, आक्षेप, नशा, आंखों की पुतलियों का विस्तार, मंदश्वास एवं श्वसनकृच्छ होकर मृत्यु होती है। विषैले परिणाम से आमाशय, आंत तथा वृक्कों में शोथ भी हो जाता है। डिजिटॅलिस के समान इसका संचायी प्रभाव नहीं होता। अपस्मार आदि आक्षेप युक्त व्याधियों में इसका प्रयोग किया जाता है। शुष्क कास, श्वासनलिका के जीर्णशोथ एवं तमक श्वास आदि में देने से खांसी की तकलीफ कम हो जाती है। प्रसूता को इसका फांट दिया जाता है। बस्तिशोथ में भी इससे लाभ होता है। मात्रा-१-२ र०। तालीसपत्र २ हि०, बं०-तालीसपत्र । गढ०-चिलिराध । काश्मी०-बादर, बुदुल । कनवार-स्युन । नेपा०-गोब्रिश सुलह । कुमा०-राय । भूता०-दुमशिंग । अं०-Himalayan Siver Fer कर्पूरादिवर्गः २५७ ( हिमालयन् सिल्वर फर ) । ले०-Abies webbiana Lindl. ( एविस वेबिआना लिंड ) । Fam. Pinaceae (पिर्नेंसी)। इसके ऊँचे सदाहरित वृक्ष हिमालय पर सिक्किम, भूटान के प्रदेश में ९ से १३ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष १५० फीट तक ऊँचे एवं स्तम्भ की गोलाई ३० फीट तक होती है। छाल-खाकी युक्त भूरे रंग की और खुरदरी होती है। नवीन शाखाएं प्रायः सूक्ष्म और भूरे रोमों से ढकी हुई रहती हैं। शाखाएँ प्रायः झुकी हुई रहती हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लंबे, दशमांश इञ्च चौड़े, पतले, रेखाकार और काण्ड से पेचदार क्रम से निकले हुवे परन्तु देखने में केवल दो कतारों में निकले हुए से मालूम होते हैं। इनका ऊपरी पृष्ठ चमकीला तथा गहरे हरे रंग का होता है और अधःपृष्ठ पर मध्यशिरा के दोनों ओर दो दो सफेद धुंधली रेखाएं होती हैं। पत्ते नताग्र होते हैं और अग्र पर प्रायः दो तीक्ष्ण और कठोर नोक निकले रहते हैं। फल-लंब गोल या आयताकार, २-४ इञ्च का और पकने पर गहरे बैंगनी रंग का होता है। बीज-करीब इञ्च का षष्ठमांश लम्बा होता है। इस जाति में मोरिण्डा नामक, ले०-एबिस पिण्ड्रो (Abies pindrow ) वृक्ष भी होता है जो इससे बहुत मिलता जुलता है। इसमें नवीन शाखायें रोमरहित और पत्तियां २-३ इञ्च लम्बी, दो कतारों में निकली हुई और दो दिशाओं में फैली हुई रहती हैं। एविस् वेबिआना में वे ऊपर की ओर हर दिशा में फैली हुई रहती हैं। इसके फल भी दूसरे की अपेक्षा छोटे और मोटे होते हैं। ये जौनसार में प्रायः १० हजार फीट के नीचे (देबुवन, मुंडाली आदि में) पाये जाते हैं। प्रायः पूर्वी भारत में एबिस वेबिआना के ही पत्र तालीशपत्र के नाम से बेचे जाते हैं। बंगाल के वैद्य इसी का व्यवहार करते हैं। रासायनिक संगठन- इसमें एक उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, कफनिःसारक, ग्राही एवं बल्य है। इसका उपयोग जीर्ण श्वास, कास, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, अरुचि एवं बस्तिविकार में किया जाता है। (१) तालीसादि चूर्ण १०-२० र० की मात्रा में श्वास, कास, रक्तपित्त, अग्निमांद्य एवं अति- सार आदि में दिया जाता है। बच्चों के श्वसनी फुफ्फुस पाक में १३ र० चूर्ण तथा कस्तूरी वटी १ र० की ६ मात्रा बना कर हर ४ घण्टे पर देने से लाभ होता है। (२) इसके पत्तों का स्वरस ५-१० बूँद जल या दुग्ध के साथ बच्चों के दंतोद्भेद के समय होने वाले ज्वर एवं कफविकार आदि में दिया जाता है। बंगाल में प्रसूता को बल्य औषध की तरह इसे देते हैं। (३) स्वरभंग, जीर्णश्वसनिका शोथ, राजयक्ष्मा तथा अन्य कफविकारों में इसके क्वाथ या फांट का उपयोग करते हैं। (४) इसके पत्तों का चूर्ण मधु एवं वासा स्वरस के साथ कास, श्वास तथा रक्तष्ठीवन में दिया जाता है। मात्रा-१-२ माशा । तालीसपत्र ३ इसकी कई उपजातियाँ होती हैं जिनमें से २, ३ के पत्तों का प्रयोग तालीसपत्र के स्थान पर 17 नेपाल तथा पंजाब के कुछ वैद्य करते हैं। इनका संक्षेप में वर्णन किया गया है। १७ भा० नि०
२४८ भावप्रकाशनिघण्टुः (क) हि०-तालीसफर, तालीसपर। काश्मी०-तज्जकस्रुम । झेलम०-निचनी, रतनकाट, नेरा। पं०-तालिस्त्री। ले०-Rhododendron anthopogon D. Don. (रोडोडेन्ड्रॉन् एन्थोपोगोन् डी. डोन)। Fam, Ericaceae (एर्रिकेसी)। यह हिमालय में १०-१४ हजार फीट की ऊँचाई पर काश्मीर से भूटान तक उत्पन्न होता है। इसके सदा हरित गन्धयुक्त छोटे छोटे क्षुप १ से १।। फीट ऊँचे होते हैं। शाखाओं पर वल्क पत्र और खुरदरापन होता है। पत्ते-सनाल, १-१।। इञ्च लंबे, अंडाकार या चौड़े आयताकार, ऊपरी पृष्ठ पर चमकदार और अधःपृष्ठ पर भूरे रोमावरण से युक्त होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों का गुच्छा लगता है। फूल-किंचित पीले आते हैं। फल-बहुत छोटे और अंडाकार होते हैं। बीज-बहुत सूक्ष्म तथा दीर्घवृत्ताकार होते हैं। गुण और प्रयोग -इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक माना जाता है। पत्ते-उत्तेजक तथा सुगंधित होते हैं। इसके चूर्ण के नस्य से छीकें आती हैं। ऐसी धारणा है कि हिमालय के पूर्वोभाग में अधिक ऊँचाई पर चढ़ते समय शिरःशूल तथा हृल्लास उत्पन्न करने वाली वनस्पतियों में से एक यह हो । मात्रा-२-८ रत्ती । (ख) गढवाल-सिमारेस। ने०, हि०-चैरैलु । काश्मी०-तग्गर । कुमाऊं-चिमुल । ले०-Rhododendron campanulatum D. Don (रोडोडेन्ड्रॉन् कम्पैनुलैटम् डी. डोन)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है । इसका गुल्म-कुछ बड़ा; पत्ते-३-५ इञ्च लंबे, दीर्घवृत्ताकार, आयताकार तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। नीचे के पृष्ठ पर दालचीनी रंग के सघन रोमों से शिराएं ढकी रहती हैं। पुष्प-बैंगनी या नीलापन किये श्वेत रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते बकरियों के लिये विषैले समझे जाते हैं। अर्धावभेदक तथा प्रतिश्याय में तम्बाकू के साथ इसके पत्तों का नस्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। जीर्ण आम- वात, फिरंग तथा गृध्रसी में इसके पत्तों का आभ्यन्तरिक उपयोग किया जाता है। नेपाल में इसके पंचाग का प्रयोग जीर्ण ज्वर तथा राजयक्ष्मा में किया जाता है। मात्रा-२-८ २०। (ग) गढवाल-सिमरित। भोटिया-तल्लसुमा । यू०, हि०-ताली सफर । ले०-Rhodo- dendron lepidotum Wall. (रोडोडेन्ड्रॉन् लेपिडोटम् वाल.)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका क्षुप छोटा तथा गन्धयुक्त होता है। पत्ते-१/२ इञ्च से १।।। इञ्च लम्बे, प्रायः विनाल, ऊपर से लट्वाकार और कुण्ठिताग्र या भालाकार और कुछ नोकीले और अधःपृष्ठ श्वेत या भुरचई रंग के रोमावरण से ढका हुआ रहता है। फूल-लाल, बैंगनी या पीले, ३-४ के गुच्छों में या अकेले रहते हैं। फल-छोटे, ५ धारीयुक्त होते हैं तथा बीज छोटे-छोटे अण्डाकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण (क) के समान ही हैं। अथ कङ्कोलं सुगन्धिद्रव्यम् 'सीतलचीनी' इति लोके। तस्य नामानि गुणांश्च कङ्कोलं' कोलकं प्रोक्तं तथा कोषफलं स्मृतम् । कङ्कोलं लघु तीक्ष्णोष्णं तिक्तं हृद्यं रुचिप्रदम् । आस्यदौर्गन्ध्यहृद्रोगकफवातामयान्व्यहेत् ॥ १. कक्कोलं इति पाठा० । कर्पूरादिवर्गः २५६ 'कङ्कोल नामक' सुगन्ध द्रव्य जो कि शीतल चीनी नाम से प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- कङ्कोल, कोलक और कोषफल ये सब संस्कृत नाम 'शीतलचीनी' के हैं। शीतलचीनी-लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, तिक्त रस युक्त, हृदय को हितकर तथा रुचिकारक होती है। यह मुख की दुर्गन्धता, हृद्रोग, कफ तथा वातरोग और आन्ध्य (आँखों से न दीखना) इन सबों को दूर करती है ॥ ११६ ॥ ४७ शीतलचीनी हि०-शीतलचीनी, कबाबचीनी, कङ्कोल, शीतलमिर्च । बं०-कबाबचिञि, सुगन्धमरिच । म०-कङ्कोल, कापूरचीनी । गु०-चणकबाब । क०-गन्धमेणसु । ते०-चलवमिरियालु । ता०-वा- टिमलगु । फा०-कबाबह, कबाबचीनी । अ० हब्बुल ऊरूस, कबाबेसीनी । अं०-Cubebs (क्यूबेब्स); Tailed Pepper (टेल्ड पेपर) । ले०-Piper cubeba Linn. f. (पाइपर क्यूबेबा लिन.) । Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी) । शीतलचीनी-यह एक लता जाति की वनस्पति का पूर्ण रूप से विकसित किन्तु अपक्व अवस्था में सुखाया हुआ फल है, जो काली मरिच के समान होता है। यह जावा, सुमात्रा तथा बोर्निओ में होती है। लङ्का में इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में विशेष कर मैसूर में इसकी कुछ उपज की जाती है। इसकी आरोही बहुवर्षायु लता होती है। कांड-चिकना, लचीला एवं जोड़दार होता है। पत्ते-असंग, सकृन्त, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार, नोकीले, गोल या हृदत् पर्णतलवाले, चर्मवत् तथा चिकने होते हैं। शिराएं बहुत होती हैं। पुष्प-अद्विलिंगी तथा अवृन्त-काण्डज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-गोल, अष्ठिफल होते हैं जिनमें आधार की तरफ डंठल लगा रहता है। हरी अवस्था में ही इन्हें तोड़कर धूप में सुखा लिया जाता है। यह अपक्व फल काली मिर्च के समान, गोल, झुर्रीदार गहरे भूरे रंग के एवं करीब ४ मि० मि० व्यास के सूखे हुये होते हैं। इसके शिखर पर त्रिकोणयुक्त कुक्षि लगी रहती है तथा आधार पर ४ मि० मि० लंबा डंठल रहता है। इसके अन्दर एक बीज रहता है। इसको चबाने से मनोरम तीक्ष्ण मसालेदार विशिष्ट गन्ध आती है; स्वाद कडुवा, चरपरा तथा जीभ ठंडी मालूम पड़ती है। औषध में इन्हीं फलों का व्यवहार किया जाता है। कुछ लोग इसके दो भेद मानते हैं। छोटे तथा पतले छिलके वाले फलों को शीतलचीनी एवं बड़े तथा मोटे छिलके वाले फलों को कबाबचीनी कहा जाता है। वास्तव में एक ही लता के यह फल होते हैं। प्राचीन काल से मुखशुद्धि के लिये पान के साथ या स्वतन्त्र रूप में तथा मसालों में इसका प्रयोग किया जाता रहा है। रासायनिक संघटन-कबाबचीनी में उड़नशील तैल ५-२०%, क्यूबैबिन् (Cubebin, C20 H20 O6), राल, तैल, स्टार्च, गोंद, क्यूबैबिक् एसिड (Cubebic acid) करीब ०.९६% तथा कॅल्शियम ऑग्झैलेट, फॉस्फेट एवं मैलेट तथा मैग्नेशियम् मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें के प्रधान गुणकारी तत्व उड़नशील तैल एवं क्यूबैबिक एसिड हैं। पुराने कबाबचीनी द्वारा निकाले तैल में गंधहीन एवं पारदर्शक एक प्रकार का कर्पूर (Camphor of cubeb, C15 H26 O) पाया जाता है। इसमें का उड़नशील तैल स्वच्छ, हल्के पीताभ या नीलाभ हरित रंग का, विशिष्ट गंधयुक्त एवं उष्ण कर्पूरवत् स्वादवाला होता है। इस तैल में प्रधान रूप में टर्पेन्स (Terpenes) एवं सैस्क टर्पेन्स (Sesquiterpenes) पाये जाते हैं। भारतीय कबाबचीनी में भी उपर्युक्त तैल से मिलता
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२६० भावप्रकाशनिघण्टुः घुलता उड़नशील तैल पाया जाता है। तैल को शीत तथा प्रकाशहीन स्थान में बन्द बोतलों में रखना चाहिये । परीक्षा- किसी श्वेत पात्र में कबाबचीनी का चूर्ण रखकर उस पर १ बूंद गंधक का तेजाब रखकर ऊपर से देखने से नीलारुण (Purple) रंग दिखलाई देता है। अच्छी कबाबचीनी में सिकुड़े हुये अविकसित फल १०% से अधिक, कांड ५% से अधिक, इनको छोड़कर अन्य पदार्थ २% से अधिक, राख ८% से अधिक एवं अम्ल में न घुलने वाली राख २% से अधिक न होनी चाहिये। गुण और प्रयोग- कबाबचीनी उष्ण, उत्तेजक, कफघ्न, वातघ्न, प्रतिदूषक (Antiseptic), मूत्रजनक, दीपन, पाचन, रुचिकर, वृष्य, तृष्णा शामक तथा मुख की दुर्गन्ध एवं जड़तानाशक है। इसमें स्थानिक प्रक्षोभक गुणों के कारण यह श्लेष्मकला के लिये उत्तेजक है। प्रचूषण के पश्चात् इसके कार्यकारोसत्व का उत्सर्ग वृक्क एवं श्वसनसंस्थान द्वारा होता है। मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह पाचनक्रिया विकृत कर देती है। त्वचा की उत्तेजना से कभी-कभी खुजली भी उत्पन्न होती है। (१) प्रतिदूषक एवं मूत्रल औषध की तरह इसे पुराने सोजाक में देते हैं। ३०-६० र० चूर्ण दुग्ध के साथ या २३० फिटकिरी के साथ दिन में ३ बार देते हैं। इससे बस्तिशोथ में भी लाभ होता है। (२) श्वसन संस्थान के विकारों में प्रतिदूषक एवं उत्तेजक कफनिःसारक रूप में खदिरादि गुटिका जैसी चूसने की गोली बनाकर उसे चूसने को दिया जाता है। गले की शिथिलता तथा मुखपाक आदि में भी इससे लाभ होता है। गायक गला साफ करने के लिये इसको चूसते हैं। खांसी आदि में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाते हैं। इसका धूम्रपान श्वास में लाभदायक है। (३) नाक के श्लेष्मा को कम करने के लिये इसके नस्य का उपयोग किया जाता है। (४) इसके तैल को मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग, बस्तिशोथ, सोजाक तथा सोजाक की पुरानी अवस्था में शर्करा के साथ या गोंद के साथ एमल्शन बनाकर या कैप्सुल में रख कर प्रयोग करते हैं। जीर्ण श्वसनिका शोथ में इसको उष्ण जल मे डालकर उसकी वाष्प संघी जाती है। मात्रा- चूर्ण १-४ माशा। तैल ५-२० बूंद।
अथ गन्धकोकिला गन्धमालती च । तयोर्गुणानाह स्निग्धोष्णा कफहत्तिक्ता सुगन्धा गन्धकोकिला । गन्धकोकिलया तुल्या विज्ञेया गन्धमालती ॥ 'गन्धकोकिला' तथा 'गन्धमालती' के गुण- गन्धकोकिला-तक्तरसयुक्त, स्निग्ध, सुगन्ध- युक्त, उष्णवीर्य एवं कफनाशक होती है। 'गन्धकोकिला' के समान 'गन्धमालती' के भी गुण समझना चाहिये ॥ ११७ ॥
४८ गन्धकोकिला एवं गन्धमालती ये दोनों ही संदिग्ध गन्ध द्रव्य हैं। बाजार में गन्धकोकिला नाम से एक प्रकार के फल बिकते हैं जो देखने में हपुषा के समान किन्तु कुछ चिपटे होते हैं। गन्धमालती नाम से एक प्रकार की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े मिलते हैं जो रेशेदार किचित् बादामी रंग के होते हैं। आगे पुष्पवर्ग में मालती (जाती, चमेली) एवं स्वर्णजाती का वर्णन आया है। मालती (रतेड) नामक एक अन्य लता होती है जिसे कुछ लोगों ने गंधमालती लिखा है। इसकी एक अन्य उपजाति
कर्पूरादिवर्गः २६१ भी पाई जाती है। निघण्टुकारों ने जो जातीभेद लिखा है वह संभवतः यही रतेड हो या यह यहाँ पर वर्णित गन्धमालती हो। गन्धमालती (रतेड) का लैटिन नाम (Aganosma caryophyl- lata G. Don.) (अँगैनोस्मा कॅरियोफाइलँटा जी० डोन) एवं इसी के भेद का A. calycina A. DC. (अँ० कॅलिसिना ए० डी० सी०) है जिनका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। **लै०-**Aganosma caryophyllata G. Don. (अँगैनोरमा कॅरियोफाइलैटा जी. डोन.)। Fam. Apocynaceae (एपोसइनेसी) । हिं०, बं०- मालती। संथा०- रतेड़। यह बंगाल, मुंगेर, उत्तरी सरकार एवं दक्षिण में होती है। इसकी लता-विस्तार में फैलने वाली तथा आरोही होती हैं। पत्ते लट्वाकार या अण्डाकार ३-५५ × १.५-३ इञ्च बड़े, पर्णशिराएं रक्ताभ, आमने सामने के पत्ते कभी-कभी छोटे बड़े एवं फलक का आधार तिरछा होता है। पुष्प-बड़े, श्वेत, सुगंधि, तथा समस्त काण्डज गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल नीचे पतला किन्तु ऊपर चौड़ा रहता है। फली-दो-दो, अग्र पर जुड़ी हुई एवं ४ से १४ इञ्च लंबी तथा अग्र की ओर क्रमशः संकुचित रहती हैं। गुण और प्रयोग- यह वामक है। इसके पत्तों का पैत्तिक विकारों में प्रयोग करते हैं। पानी से अंगुलियों के बीच जब पक जाता है तब इसकी अग्रय कलिकाओं का स्वरस लगाया जाता है। इसके पुष्पों का नेत्र विकारों में प्रयोग करते हैं।
अथ लामज्जकम् । (उशीरवत् पीतच्छवितृणविशेषः)। तस्य नामगुणानाह लामज्जकं सुनालं स्यादमृणालं लवं$^१$ लघु । इष्टकापथकं सेव्यं नलदञ्चावदातकम् ॥११८॥ लामज्जकं हिमं तिक्तं लघु दोषत्रयास्त्रजित् । स्वदामयस्वेदकृच्छ्रदाहपित्तास्त्ररोगनुत् ॥११९॥ 'लामज्जक' जो कि 'वीरग' घास की भाँति पीत वर्ण का एक विशेष तृण होता है उसके नाम तथा गुण- लामज्जक, सुनाल, अमृणाल, लव, लघु, इष्टकापथक, सेव्य, नलद और अवदातक ये सब संस्कृत नाम 'लामज्जक' के हैं। लामज्जक-तिक्तरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होता है एवं यह त्रिदोष, रक्तविकार, चर्मरोग, पसीना, मूत्रकृच्छ्र, दाह और रक्तपित्त इन सबों को दूर करता है।
४९ लामज्जक लामज्जक भी संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे खस की तरह का पीतवर्ण का तृणविशेष मानते हैं। कुछ ग्रंथकारों का कहना है कि जब तक इसका निर्णय नहीं हो जाता तब तक लामज्जक के स्थान पर खस का व्यवहार करना चाहिये। कुछ नवीन ग्रन्थकारों ने लामज्जक का लै० नाम Cymbopogon jwarankusa (साम्बोपोगोन् ज्वरांकुश) लिखा है। श्रीयुत् यादव जी अपनी द्रव्यगुणविज्ञान पुस्तक में लिखते हैं कि यह (साम्बो-ज्वरांकुश) यूनानी औषध विक्रेताओं के यहाँ इजखिर नाम से बिकता है तथा इजखिर उष्णवीर्य द्रव्य होने से इसे लामज्जक नहीं मान सकते। वे इसे भूतृण मानते हैं। बाजार में एक पीतवर्ण का खस मिलता है। हो सकता है कि उसका लैटिन नाम ज्ञात न हो या वह खस का ही भेद हो लेकिन लामज्जक के स्थान पर उसका प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ निम्न वर्णन साम्बोपोगोन् ज्वरांकुश का किया गया है। हिं०- लखवी, लामज्जक, करनकुश, घाटजारी। **मिर्जापुर-**इन्द्रबगई। **बं०-**कारांकुस । म०- पिवलावाला। **पं०-**बूर, इभरंकुश। **गु०-**पिलो वालो । **ते०-**पासनगड्डि। **ता०-**कामाच्चिपिल्लु। १. लयमिति पाठ० ।
२६२ | भावप्रकाश निघण्टुः क०-करिलावचा। अ०-इजखिर। इरा०-गुर्गियाह। ले०-Andropogon jwarancusa Jones (एन्ड्रोपोगॉन् ज्वरांकुश जोन्स); Cymbopogon jwarankusa Schult. (साम्बोपोगॉन् ज्वरांकुश शुल्ट)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। लामज्जक-यह सुगन्धित घास हिमालय, उत्तरप्रदेश, पञ्जाब, सिन्ध और बंबई में उत्पन्न होती है। यह तृण जाति की वनौषधि ३-६ फुट ऊँची होती है। पत्ते-चिपटे, चिकने, कड़े, २ फीट तक लंबे, ०'२ इञ्च चौड़े और ऊपर की ओर क्रमशः कम चौड़े होकर लंबे पतले नोकवाले होते हैं। पत्रकोश स्थाई, टेढ़े और उनके गुच्छों के बीच में डंडी निकली रहती है। जड़-लंबी, गुच्छेदार, कोमल, स्वाद में कड़वी, तीती एवं अत्यन्त सुगंधित तथा पीले रङ्ग की होती है। इसके पंचाग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके घास में करीब १% सुगंधित तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल रक्तस्तंभक हैं तथा जड़ एवं पत्ते वातानुलोमक, उत्तेजक, आर्तव- जनन, मूत्रजनन, स्वेदजनक एवं अल्प मात्रा में कफघ्न हैं। रक्तस्राव रोकने के लिये इसके फूलों को क्षत पर बाँधते हैं। इसके पंचांग को पीस कर शोथ पर लेप किया जाता है। ज्वर में पंचांग के काथ से स्नान कराते हैं। द्राक्षासव में इसका पंचांग डाल कर गरम करके देने से पेशाब बहुत होता है। आमवात में विरेचन औषध के साथ इसे देते हैं। इसमें अल्प मात्रा में कफघ्न गुण होने के कारण कफ रोगों में दाह कम करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। गर्भाशय का थोड़ा संकोच करने के कारण इसको प्रसूति ज्वर में देते हैं। वातरक्त में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चों के कुपचन के लिए भी यह उत्तम है। मात्रा-३-६ तो०।
अथैलवालुकम् । (कङ्कोलसदृशं कुष्ठगन्धि) । तस्य नामानि गुणांश्चाह एलवालुकमैलैयं सुगन्धि हरिवालुकम् । ऐलवालुकमेलालु कपित्थत्वच१मीरितम् ॥१२०॥ एलालु कटुकं पाके कषायं शीतलं लघु । हन्तिकण्डूव्रणच्छर्दितृट्कासारुचिहृद्रुजः ॥ बलासविषपित्तास्रकुष्ठमूत्रगदकृमीन् ॥ १२१ ॥ एलवालुक जो कि देखने में 'शीतलचीनी' की भांति तथा गंध में 'कूठ' के समान होती है, उसके नाम तथा गुण- एलवालुक, ऐलेय, सुगन्धि, हरिवालुक, ऐलवालुक, एलालु और कपित्यत्वग् ये सब संस्कृत नाम 'एलवालुक' के हैं। एलवालुक-कषाय रस युक्त किन्तु पाक में कड़वरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होती है। यह खुजली, व्रण, वमन, प्यास, खांसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ मूत्ररोग और कृमिरोग इन सबों को दूर करती है ॥ १२०-१२१ ॥ ५० एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेशानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अशोक अमर्यारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजका- रिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। १. कपित्थफल इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः | २६३ उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, अँलोज (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रूनस् सिरैसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डा० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिस- ओइडिस् को एलवालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आधमान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक १ हि०-आलुवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरैसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोजैसी) । इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लंबे, १-१॥ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर ( तीक्ष्णाग्रगोल दांत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्मकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायैनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ र० । एलवालुक २ हि०-बालका सागं । बं०-वालुक। म०-व (वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै । ते०- इसकदन्गिकुर । ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडंसी )। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती हैं। इसके क्षुप छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लंबे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-वाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में बालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं। इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है। गुण और प्रयोग-इसका पंचांग सुगंधि, आनुलोमिक एवं कृमिघ्न है। कृमिरोग में इसके पंचांग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं। हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं।
२६४ | भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कैवर्त्तीमुस्तकम् ( केवटी मोथा ) । तस्य नामलक्षणगुणानाह कुष्ठघ्नं दासपुरं बालेयं परिपेलवम् । प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्त्तीमुस्तकानि च ॥ १२२ ॥ मुस्ताचपेलवपुरं शुकाभं स्याद्वितुन्नकम् ॥ १२३ ॥ वितुन्नकं हिमं तिक्तं कषायं कटु कान्तिदम् । कफपित्तास्रवीसर्पकुष्ठकण्डूविषप्रणुत् ॥ १२४॥ 'केवटीमोथा' के नाम लक्षण तथा गुण-कुष्ठघ्न, दासपुर, बालेय, परिपेलव, प्लव, गोपुर, गोनर्द, कैवर्तीमुस्तक और वितुन्नक ये सब संस्कृत नाम 'केवटी मोथा' के हैं। केवटीमोथा के लक्षण- यह मोथा की भांति, कोमल दलकोश तथा शुक की भांति वर्ण से युक्त होता है। केवटीमोथा-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और कान्तिवर्धक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तविकार, वीसर्प कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करता है ॥ १२२-१२४ ॥ ✿ 'केवटीमोथा' - 'गुडतजी' इति च लोके । इदं तु वितुन्नकनाम्नो वृक्षस्य त्वग् मुस्ताकृतिः ॥ १२२-१२४ ॥ यहां पर यह भी समझना चाहिये कि लोक में 'केवटीमोथा' गुडतजी नाम से भी प्रसिद्ध है तथा यह वितुन्नकनामक वृक्ष का छिल्का है एवं आकार में मोथा की भांति होने से इसे केवटीमोथा कहते हैं ॥ १२२-१२४ ॥ ५१ केवटीमोथा कैवर्त्तमुस्तक का उपर्युक्त वर्णन भ्रमात्मक मालूम पड़ता है। मुस्ता के आकारवाली वितुन्नक नामक वृक्ष की छाल कैवर्त्तमुस्तक है यह उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है। केवटीमोथा नाम से ग्रन्थिसदृश छोटे काले कन्द मिलते हैं जो मोथा वर्ग (Cyperus) के ही होते हैं। इसके गुणों में तथा मोथे के गुणों में विशेष अन्तर नहीं हैं। इसलिये इन्हें कैवर्त्तमुस्तक माना जा सकता है। डा. देसाई ने ले.-Celosia argentea Linn.; Fam. Amaranthaceae (सेलोसिआ आर्जेण्टिआ, लिन. अमैरन्थेसी) का संस्कृत नाम शितिवार, वितुन्नक लिखा है। इसे हि. में सुर्वाली, सफेद मुर्गा कहा जाता है। शाकवर्ग में वर्णित, शितिवार यही मालूम होता है। शिति- वार के पर्यायों में 'सुनिषण्णक' शब्द भी आता है किन्तु ये दो भिन्न द्रव्य मालूम होते हैं। सुनिषण्णक यह चौपतिया साग है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में किया गया है। शितिवार यह सुर्वाली होने की अधिक संभावना है। इसका क्षुप समस्त भारत में होता है। यह ३ फीट ऊँचा, पत्ते- एकान्तर, लम्बे, पतले तथा कम चौड़े; पुष्प-सफेद तथा गुलाबी एवं क्षुप के अन्त में गुच्छों में; फली- दीर्घ वृत्ताकार छोटी; बीज-बहुत, काले से भूरे रंग के होते हैं। पत्ते का शाक खाते हैं तथा बीजों का भी व्यवहार किया जाता है। बीज शीतल, स्नेहन तथा पौष्टिक होते हैं। १ तोला बीज, मिश्री तथा उष्ण दुग्ध के साथ कामोत्तेजना के लिये देते हैं। बीजों का फांट अतिसार में तथा मूत्राघात में मिश्री एवं बीज का उपयोग किया जाता है। मात्रा-३-१ तोला। अथ स्पृक्का ( असवरग ) । सुगन्धिद्रव्यम् ( शाकविशेषः ) । 'लङ्कोइकपुरी' ति लोके च । तस्या नामगुणानाह स्पृक्काऽसृग् ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः । समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोपिकेत्यपि ॥ १२५ ॥ १. पुरमिति पाठ० । २. शुकाममिति पाठ० । कर्पूरादिवर्गः | २६५ स्पृक्का स्वाद्धी हिमा वृष्या तिक्ता निखिलदोषनुत् । कुष्ठकण्डूविषस्वेददाहाश्री ज्वररक्तहृत् ॥ १२६ ॥ स्पृक्का (असवरग) जो कि सुगन्धिद्रव्यों में से एक प्रकार का शाक ही है तथा जिसे लोक में 'लङ्कोइकपुरी' भी कहते हैं, उसके नाम तथा गुण-स्पृक्का, असृग्, ब्राह्मणी, देवी, मरुन्माला, लता, लघु, समुद्रान्ता, वधू, कोटिवर्षा और लङ्कोपिका ये सब संस्कृत नाम 'स्पृक्का' के हैं। स्पृक्का- स्वादिष्ट, शीतवीर्य, वृष्य, तिक्त रसयुक्त तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाली होती है एवं यह कुष्ठ, खुजली, विष, पसीना, दाह, अलक्ष्मी, ज्वर तथा रक्तविकार को नष्ट करती है ॥ १२५-१२६ ॥ ५२ स्पृक्का । स्पृक्का भी एक सन्दिग्ध द्रव्य है। डल्हण ने इसे 'कुटिलपुष्पा सुगन्धिद्रव्यमौत्तरापथिकम्' (सु. सू. ३८) लिखा है। चरक में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों ने इसका ले. नाम मार्सि- लिआ क्वाड्रिफोलिएटा (Marsilia quadrifoliata) तथा कुछ ने ट्राइफोलिअम् ऑफिसिनेलू (Tri- folium officinale) लिखा है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। डा० देसाई ने एनिसोमेलिस् मलबारिका को स्पृक्का लिखा है। वर्णन एवं गुण-धर्म की दृष्टि से यह उचित मालूम होता है अतः इसी का वर्णन किया जा रहा है। गु०-मखमली चोधारी । म०-कपुरीमधुरी, कालोतुंबो, गावजवान, चौधारा। क०-करितुंबे । ते०-मोगबीराकु । ता०-पेथिमसरी । अं०-Malabar catmint (मॅलंबर केटमिण्ट) । ले०-Ani- someles malabarica R. Br. (एनिसोमेलिस् मलबारिका र० ब्र०) | Fam. Labiatae (लेविपटी) । इसका क्षुप अत्यन्त रोमश तथा झाड़ीदार दक्षिण भारत में होता है। यह ४-६ फीट ऊँचा रहता है। पत्ते-मोटे, लंबगोल, कुछ शंक्वाकृति, दन्तुर तथा सवृन्त रहते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के रहते हैं। इसके पत्र सुगन्धि एवं कडवे रहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल तथा एक कडुवा क्षाराम रहता है। गुण और प्रयोग-यह उत्तम स्वेदजनन, शीतप्रशमन तथा उत्तेजक है। यह तीव्र औषध है। उदर शूल, अपचन तथा कुपचन में इसे खिलाते हैं तथा इसका पेट पर लेप भी करते हैं। बच्चों में दंतोद्भेद के समय होने वाले विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। कृमिज्वर तथा अन्य ज्वरों में विशेष कर जीर्ण ज्वर में इससे लाभ होता है। आमवातादि में इसके उड़नशील तैल को लगाया जाता है तथा पत्तों के क्वाथ से सेंका जाता है। तैल का भी आंतरिक प्रयोग पाचन के विकारों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-३ चम्मच । तैल २-५ बूंद । 'पर्पटी' इति प्रसिद्ध 'पद्मावती' इति चोत्तरदेशे, सुगन्धि द्रव्यम् । अथ पर्पटी [ पनडी ] । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पर्पटी रञ्जना कृष्णा जतुका जननी जनी। जतुकृष्णाऽग्निसंस्पर्शा जतुकृच्चक्रवर्त्तिनी ॥ १२७ ॥ पर्पटी सुवरा तिक्ता शिशिरा वर्णकृल्लघुः । विषव्रणहरी कण्डूकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ॥ १२८ ॥ १. दाहास्र इति पाठ० ।
२६६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'पर्पटी' जो कि 'पद्मावती' नाम से उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य है उसके नाम तथा गुण - पर्पटी, रञ्जना, कृष्णा, जनुका, जननी, जनी, जतूकृष्णा, अग्निसंस्पर्शा, जतुकृत् और चक्र- वर्त्तिनी ये सब संस्कृत नाम 'पर्पटी' के हैं। पर्पटी-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, शीतवीर्य, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली और लघु होती है। यह विष, व्रण, खुजली, कफ, पित्तक और कुष्ठ को दूर करने वाली है ॥ १२७-१२८ ॥ ५३ पर्पटी सुगन्धि पानडी के स्वरूप के बारे में भी पर्याप्त मत भिन्नता है। डा. देसाई ने गु०-सुगन्धी पानडी नाम से एक क्षुप का वर्णन किया है जिसका नीचे वर्णन दिया गया है। सं०-पाची। हि०-पाचोली। बं०-पाटचोली, पाचपट । गु०-सुगन्धीपानडी। म०-पाँच। कोंक-मांली। ले०-Pogostemon patchouli Hook. f. (पोगोस्टेमॉन् पाचौली हुक.)। Fam. Labiatae (लेबिएटौ)। इसका स्वावलम्बी, अनेक शाखायुक्त क्षुप कोंकण में प्रसिद्ध है। यह जंगलों में होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। उपज से इसकी आकृति में परिवर्तन हो जाता है। पत्ते-अंडाकृति, दन्तुर तथा लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे तथा तुलसी की तरह गुच्छों में आते हैं। यह क्षुप बहुत सुगन्धित होता है। इसके पत्तों का उपयोग औषध में किया जाता है। रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों में कीड़े न लगें इसलिये उनमें इसके पत्ते रखते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक अत्यन्त सुगन्धि उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तस्तम्भक, मूत्रजनन तथा वातानुलोमक है। रक्तमूत्र में १ माशा भांग के साथ २ तोला पत्तों का रस देते हैं। मात्रा - ½-१ चम्मच । अथ नलिका। उत्तरापथे प्रसिद्धा सुगन्धा प्रवालाकृतिः 'यवारी' इति च क्वचित्प्रसिद्धा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह नलिका विद्रुमलता कपोतचरणा नटी। धमन्यञ्जनकंशी च निर्मन्थ्या¹ सुषिरा नली ॥१२९॥ नलिका शीतला लघ्वी चक्षुष्या कफपित्तहृत्। कृच्छ्राश्मवाततृष्णाऽस्रकुष्ठकण्डूज्वरापहा ॥ 'नलिका' जो कि उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य देखने में मूंगे के समान होती है और जो कि कहीं-कहीं 'यवारी' नाम से भी प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- नलिका, विद्रुमलता, कपोत- चरणा, नटी, धमनी, अञ्जनकंशी, निर्मन्थ्या, सुषिरा और नली ये सब संस्कृत नाम नलिका के हैं। नलिका-शीतवीर्य, लघु तथा नेत्र के लिये हितकर होती है। यह कफ, पित्त, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, तृषा, रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली तथा ज्वर को दूर करती है ॥ १२९-१३० ॥ ५४ नलिका नलिका नामक गन्धद्रव्य भी सन्दिग्ध है। कुछ लोग इसे रतनजोत मानते हैं। रतनजोत भी कुछ हदतक सन्दिग्ध ही है। नालुका नाम से एक सुगन्धित गोल मुड़ी हुई छाल के टुकड़े १. निर्मथ्या इति पाठ० ।
कर्पूरादिवर्गः २६७ या चूर्ण बाजार में बिकता है। यह तज की ही एक जाति है। इसे नलिका कहा जा सकता है कि नहीं, यह कहना कठिन है। नालुका का विशेष उपयोग शोथहर लेप के रूप में बहुत किया जाता है। अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् [पुण्डेरी ] इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्लं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ॥ १३१ ॥ 'पुण्डेरी' इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण- प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम 'पुण्डेरी' के हैं। पुण्डेरी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है ॥ १३१ ॥ ५५ पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है। कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है। पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है। पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क. अ. २) में कन्दविष का उल्लेख है। 'पुण्डरी- केण रक्तवमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे।' प्रपौण्डरीक का एक नाम 'चक्षुष्य' होने से 'चाकसू' नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है। डा. देसाई ने चाकसू को 'वन्यकुलत्थ' लिखा है। वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है। कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है। निम्न वर्णन चाकसू का है। सं०-चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका। हि०-चाक्षुस्, चाकसू। पं०-चक्सू । गु०-चीमेड। काठि०-चमेड। म०-चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०-करुकानम् । ते०-चनुपाल विट्टलु । कं०-क्रीड, निन्द्रताळ । अ०-जश्मीजज, हब्बुरसूदान । फा०-चश्मीजञ्ज, चशुम । ले०-Cassia absus Linn. (कॅसिआ ऍब्सस् लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है। इसके एक वर्षीय क्षुप ८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं। पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है। पत्रक संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लंबे, करीब २ कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं। पुष्प संयुक्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी में रहते हैं। फली-चिपटी, रोमश तथा १-१½ इञ्च लंबी होती है। बीज-संख्या में पांच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लंबाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं। बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कडवी मज्जा निकलती है।
२६८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २३% राख होती है। उसमें मैंगेनीझ का अंश रहता है । गुण और प्रयोग—यह संग्राहक एवं नेत्राभिष्यंदप्रशमन है। पूययुक्त नेत्राभिष्यंद में भुने हुए बीजों की मज्जा का ३ र० चूर्ण पलकों के अन्दर रखते हैं। बीजों को पानी में साने हुए गेहूँ के आटे में रख, गरम राख में गरम कर, छिलका निकाल कर नेत्ररोगों में प्रयोग किया जाता है। चाकसू के २१ बीज तथा सफेद चंदन ५ माशे रात में जल में भिगो कर सुबह उस जल को छानकर पिलाने से रक्त मूत्र ठीक होता है । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तृतीयः कर्पूरादिवर्गः समाप्तः ॥ ३ ॥