भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ | भावप्रकाश निघण्टुः क०-करिलावचा। अ०-इजखिर। इरा०-गुर्गियाह। ले०-Andropogon jwarancusa Jones (एन्ड्रोपोगॉन् ज्वरांकुश जोन्स); Cymbopogon jwarankusa Schult. (साम्बोपोगॉन् ज्वरांकुश शुल्ट)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। लामज्जक-यह सुगन्धित घास हिमालय, उत्तरप्रदेश, पञ्जाब, सिन्ध और बंबई में उत्पन्न होती है। यह तृण जाति की वनौषधि ३-६ फुट ऊँची होती है। पत्ते-चिपटे, चिकने, कड़े, २ फीट तक लंबे, ०'२ इञ्च चौड़े और ऊपर की ओर क्रमशः कम चौड़े होकर लंबे पतले नोकवाले होते हैं। पत्रकोश स्थाई, टेढ़े और उनके गुच्छों के बीच में डंडी निकली रहती है। जड़-लंबी, गुच्छेदार, कोमल, स्वाद में कड़वी, तीती एवं अत्यन्त सुगंधित तथा पीले रङ्ग की होती है। इसके पंचाग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके घास में करीब १% सुगंधित तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल रक्तस्तंभक हैं तथा जड़ एवं पत्ते वातानुलोमक, उत्तेजक, आर्तव- जनन, मूत्रजनन, स्वेदजनक एवं अल्प मात्रा में कफघ्न हैं। रक्तस्राव रोकने के लिये इसके फूलों को क्षत पर बाँधते हैं। इसके पंचांग को पीस कर शोथ पर लेप किया जाता है। ज्वर में पंचांग के काथ से स्नान कराते हैं। द्राक्षासव में इसका पंचांग डाल कर गरम करके देने से पेशाब बहुत होता है। आमवात में विरेचन औषध के साथ इसे देते हैं। इसमें अल्प मात्रा में कफघ्न गुण होने के कारण कफ रोगों में दाह कम करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। गर्भाशय का थोड़ा संकोच करने के कारण इसको प्रसूति ज्वर में देते हैं। वातरक्त में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चों के कुपचन के लिए भी यह उत्तम है। मात्रा-३-६ तो०।
अथैलवालुकम् । (कङ्कोलसदृशं कुष्ठगन्धि) । तस्य नामानि गुणांश्चाह एलवालुकमैलैयं सुगन्धि हरिवालुकम् । ऐलवालुकमेलालु कपित्थत्वच१मीरितम् ॥१२०॥ एलालु कटुकं पाके कषायं शीतलं लघु । हन्तिकण्डूव्रणच्छर्दितृट्कासारुचिहृद्रुजः ॥ बलासविषपित्तास्रकुष्ठमूत्रगदकृमीन् ॥ १२१ ॥ एलवालुक जो कि देखने में 'शीतलचीनी' की भांति तथा गंध में 'कूठ' के समान होती है, उसके नाम तथा गुण- एलवालुक, ऐलेय, सुगन्धि, हरिवालुक, ऐलवालुक, एलालु और कपित्यत्वग् ये सब संस्कृत नाम 'एलवालुक' के हैं। एलवालुक-कषाय रस युक्त किन्तु पाक में कड़वरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होती है। यह खुजली, व्रण, वमन, प्यास, खांसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ मूत्ररोग और कृमिरोग इन सबों को दूर करती है ॥ १२०-१२१ ॥ ५० एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेशानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अशोक अमर्यारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजका- रिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। १. कपित्थफल इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः | २६३ उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, अँलोज (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रूनस् सिरैसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डा० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिस- ओइडिस् को एलवालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आधमान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक १ हि०-आलुवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरैसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोजैसी) । इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लंबे, १-१॥ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर ( तीक्ष्णाग्रगोल दांत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्मकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायैनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ र० । एलवालुक २ हि०-बालका सागं । बं०-वालुक। म०-व (वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै । ते०- इसकदन्गिकुर । ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडंसी )। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती हैं। इसके क्षुप छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लंबे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-वाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में बालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं। इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है। गुण और प्रयोग-इसका पंचांग सुगंधि, आनुलोमिक एवं कृमिघ्न है। कृमिरोग में इसके पंचांग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं। हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं।