भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
२६२ | भावप्रकाश निघण्टुः क०-करिलावचा। अ०-इजखिर। इरा०-गुर्गियाह। ले०-Andropogon jwarancusa Jones (एन्ड्रोपोगॉन् ज्वरांकुश जोन्स); Cymbopogon jwarankusa Schult. (साम्बोपोगॉन् ज्वरांकुश शुल्ट)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। लामज्जक-यह सुगन्धित घास हिमालय, उत्तरप्रदेश, पञ्जाब, सिन्ध और बंबई में उत्पन्न होती है। यह तृण जाति की वनौषधि ३-६ फुट ऊँची होती है। पत्ते-चिपटे, चिकने, कड़े, २ फीट तक लंबे, ०'२ इञ्च चौड़े और ऊपर की ओर क्रमशः कम चौड़े होकर लंबे पतले नोकवाले होते हैं। पत्रकोश स्थाई, टेढ़े और उनके गुच्छों के बीच में डंडी निकली रहती है। जड़-लंबी, गुच्छेदार, कोमल, स्वाद में कड़वी, तीती एवं अत्यन्त सुगंधित तथा पीले रङ्ग की होती है। इसके पंचाग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके घास में करीब १% सुगंधित तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल रक्तस्तंभक हैं तथा जड़ एवं पत्ते वातानुलोमक, उत्तेजक, आर्तव- जनन, मूत्रजनन, स्वेदजनक एवं अल्प मात्रा में कफघ्न हैं। रक्तस्राव रोकने के लिये इसके फूलों को क्षत पर बाँधते हैं। इसके पंचांग को पीस कर शोथ पर लेप किया जाता है। ज्वर में पंचांग के काथ से स्नान कराते हैं। द्राक्षासव में इसका पंचांग डाल कर गरम करके देने से पेशाब बहुत होता है। आमवात में विरेचन औषध के साथ इसे देते हैं। इसमें अल्प मात्रा में कफघ्न गुण होने के कारण कफ रोगों में दाह कम करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। गर्भाशय का थोड़ा संकोच करने के कारण इसको प्रसूति ज्वर में देते हैं। वातरक्त में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चों के कुपचन के लिए भी यह उत्तम है। मात्रा-३-६ तो०।
अथैलवालुकम् । (कङ्कोलसदृशं कुष्ठगन्धि) । तस्य नामानि गुणांश्चाह एलवालुकमैलैयं सुगन्धि हरिवालुकम् । ऐलवालुकमेलालु कपित्थत्वच१मीरितम् ॥१२०॥ एलालु कटुकं पाके कषायं शीतलं लघु । हन्तिकण्डूव्रणच्छर्दितृट्कासारुचिहृद्रुजः ॥ बलासविषपित्तास्रकुष्ठमूत्रगदकृमीन् ॥ १२१ ॥ एलवालुक जो कि देखने में 'शीतलचीनी' की भांति तथा गंध में 'कूठ' के समान होती है, उसके नाम तथा गुण- एलवालुक, ऐलेय, सुगन्धि, हरिवालुक, ऐलवालुक, एलालु और कपित्यत्वग् ये सब संस्कृत नाम 'एलवालुक' के हैं। एलवालुक-कषाय रस युक्त किन्तु पाक में कड़वरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होती है। यह खुजली, व्रण, वमन, प्यास, खांसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ मूत्ररोग और कृमिरोग इन सबों को दूर करती है ॥ १२०-१२१ ॥ ५० एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेशानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अशोक अमर्यारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजका- रिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। १. कपित्थफल इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः | २६३ उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, अँलोज (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रूनस् सिरैसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डा० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिस- ओइडिस् को एलवालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आधमान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक १ हि०-आलुवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरैसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोजैसी) । इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लंबे, १-१॥ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर ( तीक्ष्णाग्रगोल दांत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्मकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायैनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ र० । एलवालुक २ हि०-बालका सागं । बं०-वालुक। म०-व (वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै । ते०- इसकदन्गिकुर । ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडंसी )। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती हैं। इसके क्षुप छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लंबे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-वाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में बालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं। इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है। गुण और प्रयोग-इसका पंचांग सुगंधि, आनुलोमिक एवं कृमिघ्न है। कृमिरोग में इसके पंचांग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं। हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं।
२६४ | भावप्रकाशनिघण्टुः अथ कैवर्त्तीमुस्तकम् ( केवटी मोथा ) । तस्य नामलक्षणगुणानाह कुष्ठघ्नं दासपुरं बालेयं परिपेलवम् । प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्त्तीमुस्तकानि च ॥ १२२ ॥ मुस्ताचपेलवपुरं शुकाभं स्याद्वितुन्नकम् ॥ १२३ ॥ वितुन्नकं हिमं तिक्तं कषायं कटु कान्तिदम् । कफपित्तास्रवीसर्पकुष्ठकण्डूविषप्रणुत् ॥ १२४॥ 'केवटीमोथा' के नाम लक्षण तथा गुण-कुष्ठघ्न, दासपुर, बालेय, परिपेलव, प्लव, गोपुर, गोनर्द, कैवर्तीमुस्तक और वितुन्नक ये सब संस्कृत नाम 'केवटी मोथा' के हैं। केवटीमोथा के लक्षण- यह मोथा की भांति, कोमल दलकोश तथा शुक की भांति वर्ण से युक्त होता है। केवटीमोथा-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और कान्तिवर्धक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तविकार, वीसर्प कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करता है ॥ १२२-१२४ ॥ ✿ 'केवटीमोथा' - 'गुडतजी' इति च लोके । इदं तु वितुन्नकनाम्नो वृक्षस्य त्वग् मुस्ताकृतिः ॥ १२२-१२४ ॥ यहां पर यह भी समझना चाहिये कि लोक में 'केवटीमोथा' गुडतजी नाम से भी प्रसिद्ध है तथा यह वितुन्नकनामक वृक्ष का छिल्का है एवं आकार में मोथा की भांति होने से इसे केवटीमोथा कहते हैं ॥ १२२-१२४ ॥ ५१ केवटीमोथा कैवर्त्तमुस्तक का उपर्युक्त वर्णन भ्रमात्मक मालूम पड़ता है। मुस्ता के आकारवाली वितुन्नक नामक वृक्ष की छाल कैवर्त्तमुस्तक है यह उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है। केवटीमोथा नाम से ग्रन्थिसदृश छोटे काले कन्द मिलते हैं जो मोथा वर्ग (Cyperus) के ही होते हैं। इसके गुणों में तथा मोथे के गुणों में विशेष अन्तर नहीं हैं। इसलिये इन्हें कैवर्त्तमुस्तक माना जा सकता है। डा. देसाई ने ले.-Celosia argentea Linn.; Fam. Amaranthaceae (सेलोसिआ आर्जेण्टिआ, लिन. अमैरन्थेसी) का संस्कृत नाम शितिवार, वितुन्नक लिखा है। इसे हि. में सुर्वाली, सफेद मुर्गा कहा जाता है। शाकवर्ग में वर्णित, शितिवार यही मालूम होता है। शिति- वार के पर्यायों में 'सुनिषण्णक' शब्द भी आता है किन्तु ये दो भिन्न द्रव्य मालूम होते हैं। सुनिषण्णक यह चौपतिया साग है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में किया गया है। शितिवार यह सुर्वाली होने की अधिक संभावना है। इसका क्षुप समस्त भारत में होता है। यह ३ फीट ऊँचा, पत्ते- एकान्तर, लम्बे, पतले तथा कम चौड़े; पुष्प-सफेद तथा गुलाबी एवं क्षुप के अन्त में गुच्छों में; फली- दीर्घ वृत्ताकार छोटी; बीज-बहुत, काले से भूरे रंग के होते हैं। पत्ते का शाक खाते हैं तथा बीजों का भी व्यवहार किया जाता है। बीज शीतल, स्नेहन तथा पौष्टिक होते हैं। १ तोला बीज, मिश्री तथा उष्ण दुग्ध के साथ कामोत्तेजना के लिये देते हैं। बीजों का फांट अतिसार में तथा मूत्राघात में मिश्री एवं बीज का उपयोग किया जाता है। मात्रा-३-१ तोला। अथ स्पृक्का ( असवरग ) । सुगन्धिद्रव्यम् ( शाकविशेषः ) । 'लङ्कोइकपुरी' ति लोके च । तस्या नामगुणानाह स्पृक्काऽसृग् ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः । समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोपिकेत्यपि ॥ १२५ ॥ १. पुरमिति पाठ० । २. शुकाममिति पाठ० । कर्पूरादिवर्गः | २६५ स्पृक्का स्वाद्धी हिमा वृष्या तिक्ता निखिलदोषनुत् । कुष्ठकण्डूविषस्वेददाहाश्री ज्वररक्तहृत् ॥ १२६ ॥ स्पृक्का (असवरग) जो कि सुगन्धिद्रव्यों में से एक प्रकार का शाक ही है तथा जिसे लोक में 'लङ्कोइकपुरी' भी कहते हैं, उसके नाम तथा गुण-स्पृक्का, असृग्, ब्राह्मणी, देवी, मरुन्माला, लता, लघु, समुद्रान्ता, वधू, कोटिवर्षा और लङ्कोपिका ये सब संस्कृत नाम 'स्पृक्का' के हैं। स्पृक्का- स्वादिष्ट, शीतवीर्य, वृष्य, तिक्त रसयुक्त तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाली होती है एवं यह कुष्ठ, खुजली, विष, पसीना, दाह, अलक्ष्मी, ज्वर तथा रक्तविकार को नष्ट करती है ॥ १२५-१२६ ॥ ५२ स्पृक्का । स्पृक्का भी एक सन्दिग्ध द्रव्य है। डल्हण ने इसे 'कुटिलपुष्पा सुगन्धिद्रव्यमौत्तरापथिकम्' (सु. सू. ३८) लिखा है। चरक में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों ने इसका ले. नाम मार्सि- लिआ क्वाड्रिफोलिएटा (Marsilia quadrifoliata) तथा कुछ ने ट्राइफोलिअम् ऑफिसिनेलू (Tri- folium officinale) लिखा है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। डा० देसाई ने एनिसोमेलिस् मलबारिका को स्पृक्का लिखा है। वर्णन एवं गुण-धर्म की दृष्टि से यह उचित मालूम होता है अतः इसी का वर्णन किया जा रहा है। गु०-मखमली चोधारी । म०-कपुरीमधुरी, कालोतुंबो, गावजवान, चौधारा। क०-करितुंबे । ते०-मोगबीराकु । ता०-पेथिमसरी । अं०-Malabar catmint (मॅलंबर केटमिण्ट) । ले०-Ani- someles malabarica R. Br. (एनिसोमेलिस् मलबारिका र० ब्र०) | Fam. Labiatae (लेविपटी) । इसका क्षुप अत्यन्त रोमश तथा झाड़ीदार दक्षिण भारत में होता है। यह ४-६ फीट ऊँचा रहता है। पत्ते-मोटे, लंबगोल, कुछ शंक्वाकृति, दन्तुर तथा सवृन्त रहते हैं। पुष्प-हलके जामुनी रंग के रहते हैं। इसके पत्र सुगन्धि एवं कडवे रहते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें उड़नशील तैल तथा एक कडुवा क्षाराम रहता है। गुण और प्रयोग-यह उत्तम स्वेदजनन, शीतप्रशमन तथा उत्तेजक है। यह तीव्र औषध है। उदर शूल, अपचन तथा कुपचन में इसे खिलाते हैं तथा इसका पेट पर लेप भी करते हैं। बच्चों में दंतोद्भेद के समय होने वाले विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। कृमिज्वर तथा अन्य ज्वरों में विशेष कर जीर्ण ज्वर में इससे लाभ होता है। आमवातादि में इसके उड़नशील तैल को लगाया जाता है तथा पत्तों के क्वाथ से सेंका जाता है। तैल का भी आंतरिक प्रयोग पाचन के विकारों में किया जाता है। मात्रा-स्वरस १/२-३ चम्मच । तैल २-५ बूंद । 'पर्पटी' इति प्रसिद्ध 'पद्मावती' इति चोत्तरदेशे, सुगन्धि द्रव्यम् । अथ पर्पटी [ पनडी ] । तस्या नामानि गुणाँश्चाह पर्पटी रञ्जना कृष्णा जतुका जननी जनी। जतुकृष्णाऽग्निसंस्पर्शा जतुकृच्चक्रवर्त्तिनी ॥ १२७ ॥ पर्पटी सुवरा तिक्ता शिशिरा वर्णकृल्लघुः । विषव्रणहरी कण्डूकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ॥ १२८ ॥ १. दाहास्र इति पाठ० ।
२६६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'पर्पटी' जो कि 'पद्मावती' नाम से उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य है उसके नाम तथा गुण - पर्पटी, रञ्जना, कृष्णा, जनुका, जननी, जनी, जतूकृष्णा, अग्निसंस्पर्शा, जतुकृत् और चक्र- वर्त्तिनी ये सब संस्कृत नाम 'पर्पटी' के हैं। पर्पटी-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, शीतवीर्य, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली और लघु होती है। यह विष, व्रण, खुजली, कफ, पित्तक और कुष्ठ को दूर करने वाली है ॥ १२७-१२८ ॥ ५३ पर्पटी सुगन्धि पानडी के स्वरूप के बारे में भी पर्याप्त मत भिन्नता है। डा. देसाई ने गु०-सुगन्धी पानडी नाम से एक क्षुप का वर्णन किया है जिसका नीचे वर्णन दिया गया है। सं०-पाची। हि०-पाचोली। बं०-पाटचोली, पाचपट । गु०-सुगन्धीपानडी। म०-पाँच। कोंक-मांली। ले०-Pogostemon patchouli Hook. f. (पोगोस्टेमॉन् पाचौली हुक.)। Fam. Labiatae (लेबिएटौ)। इसका स्वावलम्बी, अनेक शाखायुक्त क्षुप कोंकण में प्रसिद्ध है। यह जंगलों में होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। उपज से इसकी आकृति में परिवर्तन हो जाता है। पत्ते-अंडाकृति, दन्तुर तथा लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे तथा तुलसी की तरह गुच्छों में आते हैं। यह क्षुप बहुत सुगन्धित होता है। इसके पत्तों का उपयोग औषध में किया जाता है। रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों में कीड़े न लगें इसलिये उनमें इसके पत्ते रखते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक अत्यन्त सुगन्धि उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तस्तम्भक, मूत्रजनन तथा वातानुलोमक है। रक्तमूत्र में १ माशा भांग के साथ २ तोला पत्तों का रस देते हैं। मात्रा - ½-१ चम्मच । अथ नलिका। उत्तरापथे प्रसिद्धा सुगन्धा प्रवालाकृतिः 'यवारी' इति च क्वचित्प्रसिद्धा। तस्या नामानि गुणाँश्चाह नलिका विद्रुमलता कपोतचरणा नटी। धमन्यञ्जनकंशी च निर्मन्थ्या¹ सुषिरा नली ॥१२९॥ नलिका शीतला लघ्वी चक्षुष्या कफपित्तहृत्। कृच्छ्राश्मवाततृष्णाऽस्रकुष्ठकण्डूज्वरापहा ॥ 'नलिका' जो कि उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य देखने में मूंगे के समान होती है और जो कि कहीं-कहीं 'यवारी' नाम से भी प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- नलिका, विद्रुमलता, कपोत- चरणा, नटी, धमनी, अञ्जनकंशी, निर्मन्थ्या, सुषिरा और नली ये सब संस्कृत नाम नलिका के हैं। नलिका-शीतवीर्य, लघु तथा नेत्र के लिये हितकर होती है। यह कफ, पित्त, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, तृषा, रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली तथा ज्वर को दूर करती है ॥ १२९-१३० ॥ ५४ नलिका नलिका नामक गन्धद्रव्य भी सन्दिग्ध है। कुछ लोग इसे रतनजोत मानते हैं। रतनजोत भी कुछ हदतक सन्दिग्ध ही है। नालुका नाम से एक सुगन्धित गोल मुड़ी हुई छाल के टुकड़े १. निर्मथ्या इति पाठ० ।
कर्पूरादिवर्गः २६७ या चूर्ण बाजार में बिकता है। यह तज की ही एक जाति है। इसे नलिका कहा जा सकता है कि नहीं, यह कहना कठिन है। नालुका का विशेष उपयोग शोथहर लेप के रूप में बहुत किया जाता है। अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् [पुण्डेरी ] इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्लं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ॥ १३१ ॥ 'पुण्डेरी' इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण- प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम 'पुण्डेरी' के हैं। पुण्डेरी-मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है ॥ १३१ ॥ ५५ पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है। कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है। पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है। पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क. अ. २) में कन्दविष का उल्लेख है। 'पुण्डरी- केण रक्तवमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे।' प्रपौण्डरीक का एक नाम 'चक्षुष्य' होने से 'चाकसू' नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है। डा. देसाई ने चाकसू को 'वन्यकुलत्थ' लिखा है। वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है। कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है। निम्न वर्णन चाकसू का है। सं०-चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका। हि०-चाक्षुस्, चाकसू। पं०-चक्सू । गु०-चीमेड। काठि०-चमेड। म०-चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०-करुकानम् । ते०-चनुपाल विट्टलु । कं०-क्रीड, निन्द्रताळ । अ०-जश्मीजज, हब्बुरसूदान । फा०-चश्मीजञ्ज, चशुम । ले०-Cassia absus Linn. (कॅसिआ ऍब्सस् लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है। इसके एक वर्षीय क्षुप ८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं। पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है। पत्रक संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लंबे, करीब २ कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं। पुष्प संयुक्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी में रहते हैं। फली-चिपटी, रोमश तथा १-१½ इञ्च लंबी होती है। बीज-संख्या में पांच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लंबाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं। बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कडवी मज्जा निकलती है।
२६८ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २३% राख होती है। उसमें मैंगेनीझ का अंश रहता है । गुण और प्रयोग—यह संग्राहक एवं नेत्राभिष्यंदप्रशमन है। पूययुक्त नेत्राभिष्यंद में भुने हुए बीजों की मज्जा का ३ र० चूर्ण पलकों के अन्दर रखते हैं। बीजों को पानी में साने हुए गेहूँ के आटे में रख, गरम राख में गरम कर, छिलका निकाल कर नेत्ररोगों में प्रयोग किया जाता है। चाकसू के २१ बीज तथा सफेद चंदन ५ माशे रात में जल में भिगो कर सुबह उस जल को छानकर पिलाने से रक्त मूत्र ठीक होता है । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे तृतीयः कर्पूरादिवर्गः समाप्तः ॥ ३ ॥