भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the complete text transcribed from the image:
२६० भावप्रकाशनिघण्टुः घुलता उड़नशील तैल पाया जाता है। तैल को शीत तथा प्रकाशहीन स्थान में बन्द बोतलों में रखना चाहिये । परीक्षा- किसी श्वेत पात्र में कबाबचीनी का चूर्ण रखकर उस पर १ बूंद गंधक का तेजाब रखकर ऊपर से देखने से नीलारुण (Purple) रंग दिखलाई देता है। अच्छी कबाबचीनी में सिकुड़े हुये अविकसित फल १०% से अधिक, कांड ५% से अधिक, इनको छोड़कर अन्य पदार्थ २% से अधिक, राख ८% से अधिक एवं अम्ल में न घुलने वाली राख २% से अधिक न होनी चाहिये। गुण और प्रयोग- कबाबचीनी उष्ण, उत्तेजक, कफघ्न, वातघ्न, प्रतिदूषक (Antiseptic), मूत्रजनक, दीपन, पाचन, रुचिकर, वृष्य, तृष्णा शामक तथा मुख की दुर्गन्ध एवं जड़तानाशक है। इसमें स्थानिक प्रक्षोभक गुणों के कारण यह श्लेष्मकला के लिये उत्तेजक है। प्रचूषण के पश्चात् इसके कार्यकारोसत्व का उत्सर्ग वृक्क एवं श्वसनसंस्थान द्वारा होता है। मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह पाचनक्रिया विकृत कर देती है। त्वचा की उत्तेजना से कभी-कभी खुजली भी उत्पन्न होती है। (१) प्रतिदूषक एवं मूत्रल औषध की तरह इसे पुराने सोजाक में देते हैं। ३०-६० र० चूर्ण दुग्ध के साथ या २३० फिटकिरी के साथ दिन में ३ बार देते हैं। इससे बस्तिशोथ में भी लाभ होता है। (२) श्वसन संस्थान के विकारों में प्रतिदूषक एवं उत्तेजक कफनिःसारक रूप में खदिरादि गुटिका जैसी चूसने की गोली बनाकर उसे चूसने को दिया जाता है। गले की शिथिलता तथा मुखपाक आदि में भी इससे लाभ होता है। गायक गला साफ करने के लिये इसको चूसते हैं। खांसी आदि में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाते हैं। इसका धूम्रपान श्वास में लाभदायक है। (३) नाक के श्लेष्मा को कम करने के लिये इसके नस्य का उपयोग किया जाता है। (४) इसके तैल को मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग, बस्तिशोथ, सोजाक तथा सोजाक की पुरानी अवस्था में शर्करा के साथ या गोंद के साथ एमल्शन बनाकर या कैप्सुल में रख कर प्रयोग करते हैं। जीर्ण श्वसनिका शोथ में इसको उष्ण जल मे डालकर उसकी वाष्प संघी जाती है। मात्रा- चूर्ण १-४ माशा। तैल ५-२० बूंद।
अथ गन्धकोकिला गन्धमालती च । तयोर्गुणानाह स्निग्धोष्णा कफहत्तिक्ता सुगन्धा गन्धकोकिला । गन्धकोकिलया तुल्या विज्ञेया गन्धमालती ॥ 'गन्धकोकिला' तथा 'गन्धमालती' के गुण- गन्धकोकिला-तक्तरसयुक्त, स्निग्ध, सुगन्ध- युक्त, उष्णवीर्य एवं कफनाशक होती है। 'गन्धकोकिला' के समान 'गन्धमालती' के भी गुण समझना चाहिये ॥ ११७ ॥
४८ गन्धकोकिला एवं गन्धमालती ये दोनों ही संदिग्ध गन्ध द्रव्य हैं। बाजार में गन्धकोकिला नाम से एक प्रकार के फल बिकते हैं जो देखने में हपुषा के समान किन्तु कुछ चिपटे होते हैं। गन्धमालती नाम से एक प्रकार की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े मिलते हैं जो रेशेदार किचित् बादामी रंग के होते हैं। आगे पुष्पवर्ग में मालती (जाती, चमेली) एवं स्वर्णजाती का वर्णन आया है। मालती (रतेड) नामक एक अन्य लता होती है जिसे कुछ लोगों ने गंधमालती लिखा है। इसकी एक अन्य उपजाति
कर्पूरादिवर्गः २६१ भी पाई जाती है। निघण्टुकारों ने जो जातीभेद लिखा है वह संभवतः यही रतेड हो या यह यहाँ पर वर्णित गन्धमालती हो। गन्धमालती (रतेड) का लैटिन नाम (Aganosma caryophyl- lata G. Don.) (अँगैनोस्मा कॅरियोफाइलँटा जी० डोन) एवं इसी के भेद का A. calycina A. DC. (अँ० कॅलिसिना ए० डी० सी०) है जिनका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। **लै०-**Aganosma caryophyllata G. Don. (अँगैनोरमा कॅरियोफाइलैटा जी. डोन.)। Fam. Apocynaceae (एपोसइनेसी) । हिं०, बं०- मालती। संथा०- रतेड़। यह बंगाल, मुंगेर, उत्तरी सरकार एवं दक्षिण में होती है। इसकी लता-विस्तार में फैलने वाली तथा आरोही होती हैं। पत्ते लट्वाकार या अण्डाकार ३-५५ × १.५-३ इञ्च बड़े, पर्णशिराएं रक्ताभ, आमने सामने के पत्ते कभी-कभी छोटे बड़े एवं फलक का आधार तिरछा होता है। पुष्प-बड़े, श्वेत, सुगंधि, तथा समस्त काण्डज गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल नीचे पतला किन्तु ऊपर चौड़ा रहता है। फली-दो-दो, अग्र पर जुड़ी हुई एवं ४ से १४ इञ्च लंबी तथा अग्र की ओर क्रमशः संकुचित रहती हैं। गुण और प्रयोग- यह वामक है। इसके पत्तों का पैत्तिक विकारों में प्रयोग करते हैं। पानी से अंगुलियों के बीच जब पक जाता है तब इसकी अग्रय कलिकाओं का स्वरस लगाया जाता है। इसके पुष्पों का नेत्र विकारों में प्रयोग करते हैं।
अथ लामज्जकम् । (उशीरवत् पीतच्छवितृणविशेषः)। तस्य नामगुणानाह लामज्जकं सुनालं स्यादमृणालं लवं$^१$ लघु । इष्टकापथकं सेव्यं नलदञ्चावदातकम् ॥११८॥ लामज्जकं हिमं तिक्तं लघु दोषत्रयास्त्रजित् । स्वदामयस्वेदकृच्छ्रदाहपित्तास्त्ररोगनुत् ॥११९॥ 'लामज्जक' जो कि 'वीरग' घास की भाँति पीत वर्ण का एक विशेष तृण होता है उसके नाम तथा गुण- लामज्जक, सुनाल, अमृणाल, लव, लघु, इष्टकापथक, सेव्य, नलद और अवदातक ये सब संस्कृत नाम 'लामज्जक' के हैं। लामज्जक-तिक्तरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होता है एवं यह त्रिदोष, रक्तविकार, चर्मरोग, पसीना, मूत्रकृच्छ्र, दाह और रक्तपित्त इन सबों को दूर करता है।
४९ लामज्जक लामज्जक भी संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे खस की तरह का पीतवर्ण का तृणविशेष मानते हैं। कुछ ग्रंथकारों का कहना है कि जब तक इसका निर्णय नहीं हो जाता तब तक लामज्जक के स्थान पर खस का व्यवहार करना चाहिये। कुछ नवीन ग्रन्थकारों ने लामज्जक का लै० नाम Cymbopogon jwarankusa (साम्बोपोगोन् ज्वरांकुश) लिखा है। श्रीयुत् यादव जी अपनी द्रव्यगुणविज्ञान पुस्तक में लिखते हैं कि यह (साम्बो-ज्वरांकुश) यूनानी औषध विक्रेताओं के यहाँ इजखिर नाम से बिकता है तथा इजखिर उष्णवीर्य द्रव्य होने से इसे लामज्जक नहीं मान सकते। वे इसे भूतृण मानते हैं। बाजार में एक पीतवर्ण का खस मिलता है। हो सकता है कि उसका लैटिन नाम ज्ञात न हो या वह खस का ही भेद हो लेकिन लामज्जक के स्थान पर उसका प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ निम्न वर्णन साम्बोपोगोन् ज्वरांकुश का किया गया है। हिं०- लखवी, लामज्जक, करनकुश, घाटजारी। **मिर्जापुर-**इन्द्रबगई। **बं०-**कारांकुस । म०- पिवलावाला। **पं०-**बूर, इभरंकुश। **गु०-**पिलो वालो । **ते०-**पासनगड्डि। **ता०-**कामाच्चिपिल्लु। १. लयमिति पाठ० ।