भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४८ भावप्रकाशनिघण्टुः (क) हि०-तालीसफर, तालीसपर। काश्मी०-तज्जकस्रुम । झेलम०-निचनी, रतनकाट, नेरा। पं०-तालिस्त्री। ले०-Rhododendron anthopogon D. Don. (रोडोडेन्ड्रॉन् एन्थोपोगोन् डी. डोन)। Fam, Ericaceae (एर्रिकेसी)। यह हिमालय में १०-१४ हजार फीट की ऊँचाई पर काश्मीर से भूटान तक उत्पन्न होता है। इसके सदा हरित गन्धयुक्त छोटे छोटे क्षुप १ से १।। फीट ऊँचे होते हैं। शाखाओं पर वल्क पत्र और खुरदरापन होता है। पत्ते-सनाल, १-१।। इञ्च लंबे, अंडाकार या चौड़े आयताकार, ऊपरी पृष्ठ पर चमकदार और अधःपृष्ठ पर भूरे रोमावरण से युक्त होते हैं। शाखाओं के अन्त में फूलों का गुच्छा लगता है। फूल-किंचित पीले आते हैं। फल-बहुत छोटे और अंडाकार होते हैं। बीज-बहुत सूक्ष्म तथा दीर्घवृत्ताकार होते हैं। गुण और प्रयोग -इसके पत्तों का धूम्रपान लाभदायक माना जाता है। पत्ते-उत्तेजक तथा सुगंधित होते हैं। इसके चूर्ण के नस्य से छीकें आती हैं। ऐसी धारणा है कि हिमालय के पूर्वोभाग में अधिक ऊँचाई पर चढ़ते समय शिरःशूल तथा हृल्लास उत्पन्न करने वाली वनस्पतियों में से एक यह हो । मात्रा-२-८ रत्ती । (ख) गढवाल-सिमारेस। ने०, हि०-चैरैलु । काश्मी०-तग्गर । कुमाऊं-चिमुल । ले०-Rhododendron campanulatum D. Don (रोडोडेन्ड्रॉन् कम्पैनुलैटम् डी. डोन)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है । इसका गुल्म-कुछ बड़ा; पत्ते-३-५ इञ्च लंबे, दीर्घवृत्ताकार, आयताकार तथा दोनों सिरों पर गोल होते हैं। नीचे के पृष्ठ पर दालचीनी रंग के सघन रोमों से शिराएं ढकी रहती हैं। पुष्प-बैंगनी या नीलापन किये श्वेत रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग-इसके पत्ते बकरियों के लिये विषैले समझे जाते हैं। अर्धावभेदक तथा प्रतिश्याय में तम्बाकू के साथ इसके पत्तों का नस्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। जीर्ण आम- वात, फिरंग तथा गृध्रसी में इसके पत्तों का आभ्यन्तरिक उपयोग किया जाता है। नेपाल में इसके पंचाग का प्रयोग जीर्ण ज्वर तथा राजयक्ष्मा में किया जाता है। मात्रा-२-८ २०। (ग) गढवाल-सिमरित। भोटिया-तल्लसुमा । यू०, हि०-ताली सफर । ले०-Rhodo- dendron lepidotum Wall. (रोडोडेन्ड्रॉन् लेपिडोटम् वाल.)। यह भी हिमालय में काश्मीर से भूटान तक पाया जाता है। इसका क्षुप छोटा तथा गन्धयुक्त होता है। पत्ते-१/२ इञ्च से १।।। इञ्च लम्बे, प्रायः विनाल, ऊपर से लट्वाकार और कुण्ठिताग्र या भालाकार और कुछ नोकीले और अधःपृष्ठ श्वेत या भुरचई रंग के रोमावरण से ढका हुआ रहता है। फूल-लाल, बैंगनी या पीले, ३-४ के गुच्छों में या अकेले रहते हैं। फल-छोटे, ५ धारीयुक्त होते हैं तथा बीज छोटे-छोटे अण्डाकार होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके गुण (क) के समान ही हैं। अथ कङ्कोलं सुगन्धिद्रव्यम् 'सीतलचीनी' इति लोके। तस्य नामानि गुणांश्च कङ्कोलं' कोलकं प्रोक्तं तथा कोषफलं स्मृतम् । कङ्कोलं लघु तीक्ष्णोष्णं तिक्तं हृद्यं रुचिप्रदम् । आस्यदौर्गन्ध्यहृद्रोगकफवातामयान्व्यहेत् ॥ १. कक्कोलं इति पाठा० । कर्पूरादिवर्गः २५६ 'कङ्कोल नामक' सुगन्ध द्रव्य जो कि शीतल चीनी नाम से प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण- कङ्कोल, कोलक और कोषफल ये सब संस्कृत नाम 'शीतलचीनी' के हैं। शीतलचीनी-लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, तिक्त रस युक्त, हृदय को हितकर तथा रुचिकारक होती है। यह मुख की दुर्गन्धता, हृद्रोग, कफ तथा वातरोग और आन्ध्य (आँखों से न दीखना) इन सबों को दूर करती है ॥ ११६ ॥ ४७ शीतलचीनी हि०-शीतलचीनी, कबाबचीनी, कङ्कोल, शीतलमिर्च । बं०-कबाबचिञि, सुगन्धमरिच । म०-कङ्कोल, कापूरचीनी । गु०-चणकबाब । क०-गन्धमेणसु । ते०-चलवमिरियालु । ता०-वा- टिमलगु । फा०-कबाबह, कबाबचीनी । अ० हब्बुल ऊरूस, कबाबेसीनी । अं०-Cubebs (क्यूबेब्स); Tailed Pepper (टेल्ड पेपर) । ले०-Piper cubeba Linn. f. (पाइपर क्यूबेबा लिन.) । Fam. Piperaceae (पाइपेरेसी) । शीतलचीनी-यह एक लता जाति की वनस्पति का पूर्ण रूप से विकसित किन्तु अपक्व अवस्था में सुखाया हुआ फल है, जो काली मरिच के समान होता है। यह जावा, सुमात्रा तथा बोर्निओ में होती है। लङ्का में इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में विशेष कर मैसूर में इसकी कुछ उपज की जाती है। इसकी आरोही बहुवर्षायु लता होती है। कांड-चिकना, लचीला एवं जोड़दार होता है। पत्ते-असंग, सकृन्त, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार, नोकीले, गोल या हृदत् पर्णतलवाले, चर्मवत् तथा चिकने होते हैं। शिराएं बहुत होती हैं। पुष्प-अद्विलिंगी तथा अवृन्त-काण्डज पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-गोल, अष्ठिफल होते हैं जिनमें आधार की तरफ डंठल लगा रहता है। हरी अवस्था में ही इन्हें तोड़कर धूप में सुखा लिया जाता है। यह अपक्व फल काली मिर्च के समान, गोल, झुर्रीदार गहरे भूरे रंग के एवं करीब ४ मि० मि० व्यास के सूखे हुये होते हैं। इसके शिखर पर त्रिकोणयुक्त कुक्षि लगी रहती है तथा आधार पर ४ मि० मि० लंबा डंठल रहता है। इसके अन्दर एक बीज रहता है। इसको चबाने से मनोरम तीक्ष्ण मसालेदार विशिष्ट गन्ध आती है; स्वाद कडुवा, चरपरा तथा जीभ ठंडी मालूम पड़ती है। औषध में इन्हीं फलों का व्यवहार किया जाता है। कुछ लोग इसके दो भेद मानते हैं। छोटे तथा पतले छिलके वाले फलों को शीतलचीनी एवं बड़े तथा मोटे छिलके वाले फलों को कबाबचीनी कहा जाता है। वास्तव में एक ही लता के यह फल होते हैं। प्राचीन काल से मुखशुद्धि के लिये पान के साथ या स्वतन्त्र रूप में तथा मसालों में इसका प्रयोग किया जाता रहा है। रासायनिक संघटन-कबाबचीनी में उड़नशील तैल ५-२०%, क्यूबैबिन् (Cubebin, C20 H20 O6), राल, तैल, स्टार्च, गोंद, क्यूबैबिक् एसिड (Cubebic acid) करीब ०.९६% तथा कॅल्शियम ऑग्झैलेट, फॉस्फेट एवं मैलेट तथा मैग्नेशियम् मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें के प्रधान गुणकारी तत्व उड़नशील तैल एवं क्यूबैबिक एसिड हैं। पुराने कबाबचीनी द्वारा निकाले तैल में गंधहीन एवं पारदर्शक एक प्रकार का कर्पूर (Camphor of cubeb, C15 H26 O) पाया जाता है। इसमें का उड़नशील तैल स्वच्छ, हल्के पीताभ या नीलाभ हरित रंग का, विशिष्ट गंधयुक्त एवं उष्ण कर्पूरवत् स्वादवाला होता है। इस तैल में प्रधान रूप में टर्पेन्स (Terpenes) एवं सैस्क टर्पेन्स (Sesquiterpenes) पाये जाते हैं। भारतीय कबाबचीनी में भी उपर्युक्त तैल से मिलता