भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

१८८ भावप्रकाशनिघण्टुः तैल जैसी सुगंध नहीं होती । वेस्ट इन्डियन सैंडलवुड् ऑइल (West Indian sandalwood oil) यह चंदन के वृक्ष से नहीं निकालते वरन् फ्यूसैनस् ॲक्यूमिनेटस् (Fusanus acuminatus) से निकालते हैं तथा ईस्ट अफ्रिकन् सैंडलवुड् ऑइल (East African sandalwood oil) ऑसिरिस् टेनूइफोलिया (Osyris tenuifolia) से निकालते हैं । वेस्ट ऑस्ट्रेलियन् सैंडलवुड् ऑइल (West Australian sandalwood oil) यह फ्यूसैनस् स्पाइकैटस् (Fusanus spicatus) से निकालते हैं जो कुछ परिवर्तन करने के पश्चात् भारतीय तैल जैसा बन जाता है एवं व्यापार में भारतीय तैल की प्रतिद्वन्द्विता कर सकता है । चन्दन के भेद— प्राचीन निघण्टुकारों ने चन्दन के कई भेद लिखे हैं । ध. नि. में चन्दन (श्वेतचन्दन), रक्त चन्दन कुचन्दन, कालीयक और बर्बरीक ये पांच प्रकार के चन्दन के भेद लिखे हैं। रा. नि. में बेट्ट और सुक्कडि नामक (श्वेत) चन्दन के दो भेद एवं रक्त चन्दन, पतंग (कुचन्दन), कालीयक, बर्बरक तथा हरिचन्दन ये सब मिलाकर ७ प्रकार लिखे हैं । भावप्रकाश में चन्दन, रक्तचन्दन, कालीयक (पीतचन्दन) एवं कुचन्दन (पतंग) ये ४ भेद लिखे हैं। ध. नि. ने हरिचन्दन का स्वतन्त्र उल्लेख न करके रक्तचन्दन के पर्याय में हरिचन्दन लिखा है तथा भावप्रकाशकार ने कालीयक (पीतचन्दन) के पर्याय में हरिचन्दन को लिखा है । श्वेतचन्दन- रा. नि. ने श्वेतचन्दन के दो भेद किये हैं। आर्द्र अवस्था में वृक्ष को काटने पर प्राप्त चन्दन को बेट्ट संज्ञा दी है। अपने आप वृक्ष के सूख जाने पर काटे हुये चन्दन को सुक्कडि कहा है। कुछ लोगों का मत है कि मलय पर्वत के पास के बेट्ट नामक पर्वत से प्राप्त चन्दन 'बेट्टचन्दन' है । इसी प्रकार 'बर्बर' नामक चन्दन का जो भेद लिखा है वह भी श्वेत ही होता है तथा वह बर्बर नामक पहाड़ पर उत्पन्न होता है। ध. नि. इसे निर्गन्ध एवं रा. नि. सुगन्धि युक्त मानते हैं। श्वेतचन्दन के जो अन्य पर्याय भद्रश्री, तैलपर्ण एवं गोशीर्ष आदि दिये गये हैं वे मलय पर्वत, तिलपर्ण तथा गोशीर्ष पर्वत पर पाये जाने वाले चन्दनों के नाम हैं, ऐसा मानते हैं । चन्दन के प्रयोग के संबन्ध में लिखा है-'उक्ते चन्दनशब्दे तु गृह्यते रक्तचन्दनम् । चूर्णस्नेहासवा लेहाः साध्याः धवलचन्दनैः ॥ कषायलेपयोः प्रायो युज्यते रक्तचन्दनम् ॥' योग में सामान्य चन्दन शब्द से रक्तचन्दन का ग्रहण करना चाहिये । चूर्ण, तैल, घृतादि, आसव-अरिष्टादि एवं लेह में चन्दन से श्वेत चन्दन का ग्रहण करना चाहिये तथा कषाय स्वरस आदि एवं लेप के लिये रक्तचन्दन का ग्रहण करना चाहिये । चरक के कई गणों में चन्दन का उल्लेख एवं सुश्रुत के कई गणों में चन्दन तथा कुचन्दन का प्रयोग आया है। सालसारादि गण में कालीयक का भी उल्लेख है। डल्हण ने सालसारादिगण एवं पटोलादिगण में कुचन्दन का अर्थ रक्त चन्दन किया है। जब कुचन्दन से रक्त चन्दन एवं चन्दन से भी रक्त चन्दन लिया जावेगा तो दो अलग लिखने का क्या अभिप्राय है ? सु० सू० अ० ३८ में प्रियंग्वादिगण में कुचन्दन का अर्थ रक्त चन्दन न करके मलयादि चन्दन किया है तथा चन्दन का अर्थ रक्त चन्दन किया है। गुडूच्यादिगण में चन्दन से रक्तचन्दन लिया है। इस प्रकार 'चन्दने रक्तचन्दनम्' यह उचित नहीं मालूम पड़ता तथा चूर्णादि में श्वेत एवं कषायादि में रक्तचन्दन का प्रयोग भो ऋषि सम्मत नहीं मालूम पड़ता। जिस प्रकार का प्रयोग हो वैसा अर्थ लेना चाहिये। सुगन्धि आदि के लिये श्वेत चन्दन एवं रक्तपित्तादि में रक्त चन्दन का प्रयोग उचित है। रासायनिक संगठन - इसके काष्ठसार में २.५-६% तक एक उड़नशील तैल, राल एवं टैनिक ॲसिड आदि पदार्थ पाये जाते हैं ।


कर्पूरादिवर्गः १८६ चन्दन का तैल हलके पीले रंग का, गाढ़ा, चिपचिपा, स्वाद में कड़वा एवं किंचित् तीता तथा तीव्र विशिष्ट गन्धवाला होता है। यह २०° से. उष्णता पर ५ भाग मद्यसार (७०%) में घुल जाता है। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.९७३-०.९८५ होता है। इस तैल में ९०% तक अॅल्फा-सॅण्टेलॉल एवं बीटा-सॅण्टेलॉल (a-santalol and B-santalol, C15H24O) नामक दो समाजिक (Isomeric-आइसोमेरिक्) सेस्किटर्पेन् ॲल्कोहोल्स् (Sesquiterpene alcohols) पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इस तैल में ॲल्डिहाइड्स (Aldehydes) एवं कीटोन (Ketone) द्रव्य पाये जाते हैं। इस तैल में देवदार का तैल (Cidarwood oil) १० % तक एवं रेंडी का तैल आदि अन्य तैलों की मिलावट की जाती है जिनकी पहचान इसके भौतिक परिवर्तन से की जा सकती है। गुण और प्रयोग - श्वेत चन्दन कड़वा, शीतल, रूक्ष, दाहशामक, पिपासाहर, ग्राही, हृदय- संरक्षक, विषघ्न, वर्ण्य, कण्डूघ्न, वृष्य, आह्लादकारक, रक्तप्रसादक, मूत्रल, दुर्गन्धहर एवं अंगमर्द-शामक है। इसका उपयोग ज्वर, रक्तपित्त, पैत्तिक विकार, तृषा, दाह, वमन, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, रक्तमेह, श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर, उष्णवात (सोजाक), रक्तातिसार तथा अनेक चर्मरोगों में किया जाता है। (१) पित्तज्वर, तीव्रज्वर एवं जीर्णज्वर में चंदन के प्रयोग से दाह एवं तृषा की शांति होती है तथा स्वेद उत्पन्न होकर ज्वर भी कम होता है। ज्वर के कारण हृदय पर जो विषैला परिणाम होता है वह भी इसके देने से नहीं होता। (२) नारियल के जल में चन्दन घिसकर २ तो० की मात्रा में पिलाने से प्यास कम होती है। (३) चन्दन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री एवं मधु मिलाकर पिलाने से रक्ता- तिसार, दाह, तृष्णा एवं प्रमेह आदि में लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्रदाह, मूत्राघात, रक्तमेह एवं सोजाक में चन्दन को चावल की धोवन में घिस कर मिश्री मिलाकर पिलाते हैं । (४) आंवले के रस के साथ चन्दन देने से वमन बंद होता है। (५) दुर्गंध युक्त श्वेतप्रदर, रक्तप्रदर एवं प्रमेह आदि में चन्दन का क्वाथ उपयोगी है। (६) ग्रीष्मऋतु में शीतल, आह्लाददायक पेय के रूप में चन्दन पानक (शरबत) का उपयोग किया जाता है। इससे आमाशयगत उष्णता कम होती है। हृदय, यकृत तथा आमाशय को बल प्राप्त होता है एवं दाह, तृष्णा शांत होती है। (७) त्वक् शोथ, विसर्प, फोड़े-फुन्सी, कण्डू, अत्यधिक स्वेद एवं घमौरी आदि में चंदन एवं कपूर, गुलाब जल में घिसकर लगाते हैं। ज्वर में शरीर में पीडा हो तब इसको लगाने से लाभ होता है। शिरःशूल में लगाने से शिरःशूल दूर होता है। चन्दन का तैल - यह उत्तम मूत्रजनन, मूत्रमार्ग के लिये प्रतिदूषक, वृक्कोत्तेजक, कफदोषहर, कृमिघ्न, कफनिःसारक एवं स्नेहन है। इससे वृक्क को कोई नुकसान नहीं होता । इसका उत्सर्ग मूत्रजननेंद्रिय संस्थान तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है और उत्सर्ग के समय इनके स्रावों की वृद्धि होती है तथा जीवाणुनाशन भी होता है। सेवन के पश्चात् गले में खुश्की एवं प्यास तथा अधिक मात्रा में शूलवत वेदना एवं कटिप्रदेश में भारीपन मालूम होता है। इसका प्रयोग सोजाक, बस्तिशोथ, गवीनीमुखशोथ, जीर्णकास, विषम ज्वर एवं खुजली (पामा) में तथा सुगन्धि के लिये किया जाता है। (१) नये अथवा पुराने सोजाक में इसको १५-२० बूंद दिन में ३ बार देने से बहुत लाभ होता है। यदि जलन अधिक हो तो ५-१० बूँद हर घंटे पर दें। कोपाइबा (Copaiba) की तरह

१६० भावप्रकाशनिघण्टुः इससे मूत्रादि में दुर्गन्ध नहीं आती। इसे पूयस्राव बंद होने के २ हफ्ते बाद तक देना चाहिये जिससे फिर से न हो। इसमें इलायची एवं वंशलोचन के साथ या सोंठ या अजवायन के फांट के साथ भी इसका प्रयोग किया जाता है। (२) जीर्ण बस्तिशोथ (Cystitis), गवीनीमुख शोथ (Pyelitis-पाइलाइटिस्), बस्ति के राजयक्ष्मा उपसर्ग से यदि बार बार पेशाब होती हो एवं मूत्रकृच्छ्र में इसको बताशे में डालकर दूध के साथ देते हैं। यह क्षारीय मूत्र में ही प्रतिदूषक का कार्य करता है इसलिये साथ में क्षारीय औषधों का प्रयोग आवश्यक है। (३) दुर्गन्धित कफयुक्त कास में २-३ बूँद बताशे पर डालकर देते हैं। (४) खुजली (पामा-Scabies) में इसको लगाने से लाभ होता है। कर्णशूल, दंतशूल एवं शोथ आदि पर तथा अनेक चर्मरोगों में इसका स्थानिक उपयोग किया जाता है। नाक पर की फुन्सियों पर दुगुने सरसों के तेल में मिलाकर इसे लगाते हैं। चन्दन के बीज-पेसरी के रूप में गर्भपात के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-४ मा०, तैल ५-१५ बूँद । अथ पीतचन्दनम् । (कलम्बक इति लोके) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कालीयकं' तु कालीयं पीताभं हरिचन्दनम् ॥ १४ ॥ हरिप्रियं कालसारं तथा कालानुसार्यकम् । कालीयकं रक्तगुणं विशेषाद् व्यङ्गनाशनम्॥१५॥ पीत चन्दन अर्थात् जिसे लोक में 'कलम्बक' कहते हैं उसके नाम तथा गुण-कालीयक, कालीय, पीताभ, हरिचन्दन, हरिप्रिय, कालसार तथा कालानुसार्यक ये सात पीले चन्दन के संस्कृत नाम हैं। पीलाचन्दन-गुणों में रक्तचन्दन के समान ही होता है किन्तु विशेषता यह है कि यह विशेष रूप से व्यङ्ग (मुख की झाँई) को भी दूर करने वाला होता है ॥ १४-१५ ॥ ७ पीतचन्दन हि०-पीतचन्दन, पीला चन्दन, कलंबक । बं-कलंबा । म०-पिंवळे चन्दन । फा०-संदल अबियज । नवीन औद्भिदी विदों के अनुसार पीत चन्दन का स्वतन्त्र कोई वृक्ष नहीं पाया जाता। ध० नि० एवं भावप्रकाश में उत्तम श्वेत चन्दन के विषय में लिखा है कि 'कषे पीतम्', अर्थात् घिसने पर जो पीतवर्ण का हो वह उत्तम श्वेत चन्दन होता है। इसी प्रकार ध० नि० में 'मलयोत्थम् पीतकाष्ठम् चतुर्थं हरिचन्दनम्', लिखा है जिससे ज्ञात होता है कि पीतचन्दन मलयपर्वत पर ही होता है। श्वेत चन्दन का उत्पत्ति स्थान भी मलय पर्वत दिया हुआ है। इस प्रकार उत्पत्ति स्थान एवं घिसने पर पीतवर्ण दोनों चन्दनों के एक ही हैं केवल ऊपर से देखने में पोत चन्दन कुछ अधिक पीला तथा श्वेत चन्दन पीताभ श्वेत होता है। इसलिये यदि उत्तम पीतवर्ण के काष्ठसार को पीतचन्दन एवं कुछ श्वेत वर्ण के काष्ठसार को श्वेत चन्दन मान लिया जाय तो पीत चन्दन की संगति लग सकती है। १. कलम्बकं इति पाठा० ।

कर्पूरादिवर्गः १६१ दूसरा द्रव्य जिसके तरफ ध्यान जाता है वह है कलंबा (Calumba) । यह अफ्रीका में होनेवाली एक लता जेटिओहाइझा पामेटा (Jateorhiza palmata Miers; Fam. Menisperma- ceae) के पीतवर्ण के मूल के टुकड़े हैं जिनका आधुनिक चिकित्सा में तिक्त पौष्टिक एवं दीपन द्रव्य के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह भारत में भी लगाई हुई मिलती है एवं इसका भारतीय प्रतिनिधि है 'झाड़ की हलदी' (पृष्ठ १२२) जिसको दक्षिण में दारुहरिद्रा के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस भारतीय द्रव्य को सीलोन कलंबा या नकली कलंबा भी कहा जाता है। दारूहरिद्रा के पर्यायों में भी 'कालीयक' आता है। इन बातों से ऐसा आभास होता है कि संभवतः 'झाड़ की हलदी' (नकली कलंबा) या कलंबा पीतचन्दन हो । अथ रक्तचन्दनम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह रक्तचन्दनमाख्यातं रक्ताङ्गं क्षुद्रचन्दनम् । तिलपर्णं रक्तसारं तत्प्रवालफलं स्मृतम् ॥ १६ ॥ रक्तं शीतं गुरु स्वादुच्छर्दितृष्णाऽस्रपित्तहृत् । तिक्तं नेत्रहितं वृष्यं ज्वरव्रणविषापहम् ॥ १७ ॥ लाल चन्दन के नाम तथा गुण-रक्तचन्दन, रक्ताङ्ग, क्षुद्रचन्दन, तिलपर्ण, रक्तसार और प्रवालफल ये सब लाल चंदन के संस्कृत नाम हैं। लाल चन्दन-शीतवीर्य, गुरु, स्वादु तथा तिक्त रस युक्त तथा वमन, प्यास और रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। यह नेत्रों के लिये हितकर, वृष्य और ज्वर, व्रण तथा विष को दूर करने वाला होता है ॥ १६-१७ ॥ ८ लालचन्दन हि०-लाल चंदन, रक्तचंदन । बं, म०-रक्तचंदन । गु०-रतांजली । ते०-रक्तचंदनम् । ता०- शेन् चंदनम् । पं, मा०-लाल चंदन । मला०-रक्तचंदैनम् । फा०-संदले सुर्ख । अ०-संदले अहमर । अं०-Red Sanders Wood (रेड सॅण्डर्स वुड ); Red Sandal Wood (रेड सॅण्डल वुड) । ले०-Pterocarpus santalinus, Linn. f. (प्टेरोकार्पस् सॅन्टैलिनस्, लिन.) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । यह दक्षिण भारत में विशेष कर कुडापा, उत्तर आरकोट, कर्नूल के दक्षिण भाग एवं चिंगलपुट में १५०० फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। यह दक्षिण भारत तथा फिली पाइन द्वीपों में नैसर्गि- क रूप में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-२५ फुट तक ऊँचा होता है। छाल-कालापन युक्त भूरे रङ्ग की, लकड़ी-दृढ़ तथा काष्ठसार-अत्यंत कठिन एवं कालापन युक्त लाल रंग का होता है। पत्ते-संयुक्त, प्रायः पत्रक तीन, १½ -२ इञ्च लम्बे, गोलाई युक्त अंडाकार एवं कुण्ठिताग्र होते हैं। पत्तों के अधोपृष्ठ हल्के वर्ण के एवं मृदु रोमश होते हैं। फूल-अल्प, पीताभ श्वेत एवं सवृंतकाण्डज गुच्छों में आते हैं। फलियाँ- करीब १½ इञ्च व्यासकी, टेढ़ी, आधार की तरफ कम चौड़ी एवं छोटे से डंठल से युक्त होती हैं। इसके काष्ठसार का औषध में व्यवहार किया जाता है। यह गहरे काळे से लाल रंग का, अत्यंत कठोर, वजन में भारी एवं रेशेदार होता है। यह लम्बाई में आसानी से टूट जाता है। इसके सफाई से कटे हुये अनुप्रस्थ विच्छेद में (Transverse section) में वार्षिक चक्र (Annual rings) नहीं होते किन्तु गहरे रंग की घन काष्ठतंतुओं (Wood fibres) की स्पर्श समतलीय (Tangential) पट्टियाँ (Bands) होती हैं जो कम चौड़ी, हल्के रंग की काष्ठ तंतुभित्तिक (Wood parenchyma) की करीब करीब संतत पट्टियों से एकांतरित रहती हैं। इन

१६२ भावप्रकाशनिघण्टुः पट्टियों के अन्दर के किनारों पर महावाहिनियों (Vessels) दूर-दूर पर विन्यस्त रहती हैं। इन पट्टियों को समकोण में काटती हुई अत्यंत महीन, हल्के रंग की मज्जक किरणें (Medullary rays) होती हैं जो १० गुना बड़ा करके ही देखी जा सकती हैं। इसका बुरादा बाजार में मिलता है। इससे मद्यसार का रंग गहरा लाल हो जाता है लेकिन जल में बहुत कम इसका भाग घुलता है। इसमें गन्ध नहीं होती तथा स्वाद कुछ कसैला होता है। नोट-यद्यपि इसे रक्तचंदन कहा गया है तथापि इसमें चंदन के समान सुगंध नहीं होती। रा. नि. में एक सुगंधि युक्त लालचंदन का उल्लेख 'हरिचंदन' नाम से किया है लेकिन यह भी लिखा है कि यह दिव्य होता है एवं दुर्लभ होता है। कुछ लोगों ने रक्तचंदन से पतंग का ग्रहण किया है क्योंकि वह भी रक्तचंदन से मिलता-जुलता होता है लेकिन वह इस वृक्ष से अलग वृक्ष है जिसका आगे वर्णन दिया गया है। 'निघण्डुआदर्श' में कुचंदन का ले० नाम अॅडेनेन्थेरा पॅहोनिना लिन. (Adenanthera pavonina Linn.) बं०-रक्तकंबल; बम्ब०-थोरलीगुञ्ज, वाल; हि०- बड़ी गुमची, रक्तचंदन लिखकर 'वनौषधि दर्पण' से उद्धृत उसकी टीका में लिखा है कि 'कुचंदन यह रा. नि. का पतंग है जिसका रक्तचंदन के स्थान पर प्रयोग किया जाता है।' लेकिन पतंग का वृक्ष अलग होता है जिसे सिझल्पिनिआ सप्पन कहते हैं। बड़ी गुमची को रक्तचंदन अथवा पतंग मानना उचित नहीं। इस प्रकार रक्तचंदन एवं पतंग के अलग अलग वृक्ष पाये जाते हैं। केवल रा. नि. का सुगंध युक्त लालचंदन (हरिचंदन) अभी तक नहीं प्राप्त हो सका है। संभव है वनस्पतियों का व्यापक अनुसंधान होने पर इस विषय का अंतिम निर्णय किया जा सके। रासायनिक संगठन-इसमें संन्टॅलिन् (सॅन्टॅलिक एसिड) [Santalin (santalic acid)] नामक एक रंजक द्रव्य तथा डेसुऑक्सि संन्टेलिन् नामक एक अन्य पदार्थ पाया जाता है। सॅन्टॅलिन् से मद्यसार में रक्त के समान लाल रंग, ईथर में पीला, अमोनिया एवं दाहक क्षार में नीललोहित रंग आता है। यह जल में नहीं घुलता। इसके अतिरिक्त लालचन्दन में प्टेरोकार्पिन (Ptero- carpin), होमो-प्टेरोकार्पिन (Homo-pterocarpin) एवं सॅन्टालू ये तीन रंगहीन रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें मद्यसार में घुलनशील पदार्थ २% से कम एवं राख २% से अधिक न होनी चाहिये। इसके मद्यसारीय घोल से इसके रंग को खनिज अम्लों (Mineral acids) के द्वारा निस्सादित (Precipitated) किया जा सकता है। गुण और प्रयोग-रक्तचन्दन शीतल, बल्प, सौम्य एवं ग्राही है। इसका बाह्य लेप शीतल, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। इसका प्रयोग पैत्तिक विकार, रक्तदोष, रक्ताशं, रक्तपित्त, अतिसार, संग्रहणी एवं शिरःशूल, शोथ तथा त्वचा के रोगों में किया जाता है। रंजक द्रव्य के रूप में इसका अधिक उपयोग किया जाता है। (१) शोथ, फोड़े, व्रण, अन्हौरी तथा शिरःशूल में इसको शीतल प्रलेप के रूप में जल में घिसकर लगाते हैं। पलकों की सूजन पर इसे लगाने से सूजन दूर होती है। (२) ग्राही होने के कारण अन्य औषधों के साथ इसका काथ अतिसार एवं संग्रहणी आदि में प्रयोग किया जाता है। (३) रक्ताशं में इसे दूध में पीसकर पिलाते हैं एवं जल में घिसकर लेप भी करते हैं। (४) इसके मद्यसारीय घोल से खनिज अम्लों के द्वारा इसके रंजक द्रव्य को निस्सादित कर लिया जाता है जिसका उपयोग रंजन के लिये करते हैं। कंपाउण्ड टिंक्चर आफ् लह्वेण्डर में इसी का रंग होता है। मात्रा-४२०-८२०।


कर्पूरादिवर्गः १६३ बड़ी गुमची Adenanthera pavonina Linn; Fam. Leguminosae (अँडेनेन्थेरा पॅहोनिना लिन, लेग्यूमिनोसी)-यह पूर्वी हिमालय तथा पश्चिमो पेनिन्सुला में पाया जाता है। इसके बीजों का प्रयोग फोड़े तथा सूजन आदि पर किया जाता है तथा छाल का उपयोग आमवात एवं रक्तष्ठीवन में किया जाता है। अथ पतङ्गम् (बकम्) । तस्य नामानि गुणांश्चाह पतङ्गं रक्तसारञ्च सुरङ्गं रञ्जनं तथा । पट्टराङ्कम मख्यातं पट्टरञ्च कुचन्दनम् ॥ १८ ॥ पतङ्गं मधुरं शीतं पित्तश्लेष्मव्रणास्रनुत् । हरिचन्दनवज्ज्ञेयं विशेषाद्दाहनाशनम् ॥ १९ ॥ पतङ्ग के नाम तथा गुण-पतङ्ग, रक्तसार, सुरङ्ग, रञ्जन, पट्टराङ्ग, पट्टर और कुचन्दन ये सब पतङ्ग के संस्कृत नाम हैं। पतङ्ग-मधुररस युक्त, शीतवीर्य एवम् पित्त-कफ, व्रण और रक्तदोष को दूर करने वाला होता है। यद्यपि पतङ्ग का गुण पीले चन्दन के समान ही होता है तथापि इसे विशेष करके दाहनाशक समझना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ ९ पतङ्ग हि०-पतङ्ग, बक, बकम काठ, आल। बं०-बकम काष्ठ, बोकोम । म०, गु०-पतङ्ग । ते०-बुक- पुचेट्टु। ता०-वरत्तंगि, शप्पङ्गु। मला०-चप्पनम् । फा०, अ०-बकम । अं०-Sappan Wood (सॅप्पन वुड)। ले०-Caesalpinia sappan Linn. (सिझल्पिनिया सँप्पन) । Fam. Caesalpiniaceae (सिझल्पिनिएसी) । यह पूर्व और पश्चिम प्रायद्वीप एवं मद्रास प्रान्त में अधिक पाया जाता है। बंगाल और बिहार के किसी किसी स्थान में देखने में आता है। इसका वृक्ष छोटा एवं कांटेदार होता है। लकड़ी दृढ़, सारभाग-नारङ्गी या चमकीले लाल रङ्ग का होता है। पत्ते-संयुक्त, उपपक्ष ८ से १२ जोड़े; पत्रक-१० से १८ जोड़े, ३/४ इन्च तक लंबे, आयताकार, न्यूनाधिक विनाल, गोलाश्म एवं मध्य शिरा के दोनों तरफ के भाग असमान होते हैं। फूल-किंचित पीताभ रंग के आते हैं। फलियां-चपटी, ३-४ इन्च x १ ३/४-२ इन्च बड़ी होती हैं। प्रत्येक में ३-४ बीज होते हैं। इसके काष्ठसार का उपयोग किया जाता है। यह लाल- चन्दन जैसी, फीके लाल रंग की, कड़ी एवं निर्गन्ध होती है। बाजार में सिंगापुरी, धुनसरी और सिलीनी इन तीन नामों से इसकी लकड़ी मिलती है। रासायनिक संगठन-इसमें सॅप्पन रेड (Sappan red) नामक एक लाल रंग, मैलिक एवं टॅनिक एसिड तथा उड़नशील तैल आदि पाये जाते हैं। इसमें का रंग होर्मैटोक्साइलिन (Haema- toxylin) से मिलता-जुलता होता है तथा ईथर, मद्यसार एवं जल में घुल जाता है। पतंग का कायकारी सत्व हीमॅटीन (Haematin) से मिलता-जुलता तथा ब्रॅसिलिन (Brasilin) के समान होता है। इसकी राख में एक रवेदार पदार्थ पाया जाता है जो यदि आसुत करके पोटाँश के साथ गलाया जाए तो रीसॉसिन (Resorcin) प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही, रक्तसंग्राहक, गर्भाशय के लिये उत्तेजक एवं संकोचक, श्लेष्मघ्न एवं व्रणरोपक है। (१) फुफ्फुस, गर्भाशय एवं आन्त्र आदि स्थानों से रक्तस्राव होने पर इसका काथ पिलाने से 13 लाभ होता है। १३ भा० नि०

१६४ भावप्रकाश निघण्टुः ( २ ) पुराने व्रणों पर इसके महीन चूर्ण का अवचूर्णन करने से व्रण जल्दी अच्छे होते हैं तथा स्थानिक रक्तस्राव भी बन्द होता है। इसके काथ की पट्टी रखने से स्थानिक रक्तस्राव रुक जाता है। श्वेत प्रदर में इसके काथ की बस्ति दी जाती है। पतंग एवं बनफ़्शा के काथ से मांसांकुरों का प्रक्षालन करने से पीडा एवं दुर्गन्धि कम हो जाती है। लिचेन (Lichen) नामक त्वग्रोग में इसे पीस कर इसका लेप करते हैं। मात्रा—१-२ माशा ।

अथ सर्वेषां चन्दनानां मध्ये मलयजस्य श्रेष्ठतामाह चन्दनानि तु सर्वाणि सदृशानि रसादिभिः । गन्धेन तु विशेषोऽस्ति पूर्वंः श्रेष्ठतमो गुणैः ॥ सभी प्रकार के चन्दनों में मलयागिरी चन्दन की उत्तमता-यद्यपि रसादिकों में प्रायः सभी प्रकार के चन्दन समान ही होते हैं, उनमें विशेषता केवल गन्ध की ही रहती है। तथापि उनमें सर्वप्रथम जो मलयागिरी चंदन है, वही गुणों में सर्वश्रेष्ठ होता है ॥ २० ॥

अथागुरु कृष्णागुरु च ( अगर, काला अगर ) तयोर्नामानि गुणाँश्चाह अगुरु प्रवरं लोहं राजाहं योगजं तथा । वंशिकं कृमिजं वाऽपि कृमिजग्धमनार्यकम् ॥ २१ ॥ अगुरुष्णं कटु स्वच्यं तिक्तं तीक्ष्णञ्च पित्तलम् । लघु कर्णाक्षिरोगघ्नं शीतवातकफप्रणुत् ॥२२॥ कृष्णं गुणाधिकं तत्त लोहवद्वारि मज्जति । अगुरुप्रभवः स्नेहः कृष्णागुरुसमः स्मृतः ॥ २३ ॥ अगर तथा काले अगर के नाम और गुण एवं अगर के तेल के गुण-अगुरु, प्रवर, लोह, राजाई, योगज, वंशिक, कृमिज, कृमिजग्ध और अनार्यक ये सब अगर के संस्कृत नाम हैं। अगर- उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, त्वचा के लिये हितकारी, तीक्ष्ण, पित्तजनक, लघु एवम् कान व नेत्र संबंधी रोगों को दूर करने वाला तथा शीत, वात व कफ को नष्ट करने वाला होता है। काला अगर-यह अगर की अपेक्षा अधिक गुणकारी होता है तथा पानी में डालने से लोहे की भांति डूब जाने वाला होता है। अगर का तेल-अगर से निकाला हुआ तेल गुणों में काले अगर के समान ही समझा जाता है ॥ २१-२३ ॥ १० अगर हि०-अगर, काला अगर । वं०-अगर काष्ठ, अगरु चन्दन । म०, गु०-अेगर । पं०-ऊद, ऊदफारसी । क०, ता०, ते०-कृष्णाअगरु । अ०-ऊद खाम । अं०-Eagle-wood ( ईगल वुड ) । ले०-Aquilaria agallocha Roxb. ( एक्विलेरिया ऍगोलोचा राक्स.) Fam. Thymelaea- ceae ( थाइमेलिएसी )। यह पूर्व हिमालय, आसाम, भूटान, खासिया पहाड़ एवं सिलहृट आदि प्रान्तों में पाया जाता है ।

कर्पूरादिवर्गः १६५ इसका वृक्ष-बड़ा, ६०-७० फीट ऊँचा, ५-८ फीट व्यास का धारीदार एवं सदाइरित रहता है। काष्ठ-लकड़ी मुलायम, हल्की, लचीली, श्वेत या हलकी पीताभ श्वेत, एवं इसमें कोई विशेष गंध नहीं होती । इसमें वार्षिक वृद्धि के वलय नहीं होते तथा मध्यम या छोटे आकार की ३ से ४ अरीय ( Radial ) वाहिकाओं ( Vessels ) की कतारें एवं इनके बीच तन्तुगुच्छों का फ्लोएम (Phloem) रहता है। काष्ठसार अलग नहीं दिखलाई देता । पत्ते-विपरीत, २-४ ५/८-२ इन्च बड़े, आयताकार मालाकार, या कुछ दीर्घवृत्ताकार, चिकने, तथा बहुत छोटे नाल से युक्त होते हैं । पुष्प-श्वेत रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-१५-२ इन्ध लम्बे, अभि- अंडाकार एवं मृदु रोमावृत होते हैं। अगर-यह सुगन्धित द्रव्य पुराने वृक्षों के काष्ठ में कहीं कहीं पाया जाता है। यह एक विशेष प्रकार के फफूंद ( Fungi Imperfecti) के द्वारा निर्मित विकृतिजन्य परिणाम है। प्राचीनों ने संभवतः इसीलिये इसे 'कृमिज' कहा है। विकृत भाग कालासा तेलिया हो जाता है। जिस वृक्ष में इस प्रकार परिवर्तन हुआ रहता है उन्हें दूर से देखने से ही पता लग जाता है। जहां शाखायें विभक्त होती हैं वहां यह अधिक होता है। सिलहृट का अगर अच्छा होता है। इसमें के तैलीय अंश के अनुसार इसका रंग हलका या गहरा काला होता है। इसके कोमल काष्ठ के छिद्रों में राल जैसा पदार्थ जमा रहता है। यद्यपि अन्य निघंटुकारों ने इसके कई भेद लिखे हैं तथापि जो अगर देखने में काले रङ्ग का, वजन में भारी, चबाने पर चिपचिपाहट युक्त और पानी में डालने से डूब जाय तथा दिया- सलाई जला कर लगा देने से जलने लगे वह अगर उत्तम है। इसका स्वाद कडुवा, कसैला तथा तेलिया मालूम होता है। इसमें हलकी मधुर गन्ध होती है जो इसे जलाने पर चारों तरफ फैलती है। सिलहूट की तरफ अगर का इत्र बहुत निकाला जाता है। यह निम्न श्रेणी के मुलायम तथा पीताभ श्वेत अगर से निकालते हैं जो करीब ०.७५ से २.५% निकलता है। नोट-भारतवर्ष में प्राचीन कालने अगर का उपयोग सुगन्धि, धूप तथा शीतहर प्रलेप१ के रूप में किया जा रहा है। अगर तिक्त होते हुए भी उष्ण होता है। २ सुश्रुत इसके तैल को 'दुष्टव्रणशोधन, कृमिकफकुष्ठानिलहर एवं तिक्त, कटु, कषाय मानते हैं (सू. अ. ४५)। सुश्रुत के अनुसार जिसके व्रण में अगरु की गन्ध आती हो उस मनुष्य को मुमूर्षु समझाना चाहिये (सू. अ. २८) । वाग्भट इसे रसायन मानते हैं । धूप तथा अगरबत्ती बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इसकी छाल से आसाम में कागज भी बनाया करते थे । रासायनिक संगठन-इसमें ईथर में घुलने वाला एक उड़नशील तैल ( ६न ) होता है तथा मद्यसार में घुलने वाली एक राल होती है जो ईथर में नहीं घुलती । मद्यसार में ४८% घुलनशील भाग होता है। गुण और प्रयोग- अगर उष्ण, सुगन्धि, उत्तेजक, वातनाड़ी संस्थान के लिये उत्तेजक, वाजीकर, श्वास एवं कफ हर, वातानुलोमक, शीत प्रशमन, रसायन एवं त्वक् रोगों में लाभ- दायक है। (१) वातरक्त तथा आमवात में इसको देते हैं तथा सन्थिशोथ पर लेप भी करते हैं। (२) ज्वर में इसका फांट पिलाने से प्यास कम होती है एवं रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। १. रास्नागुरुणी शीतापनयनप्रलेपनानाम् । (च. सू. अ. २५) २. अकींगुरुगुहूचीनां तिक्तानामुष्णमुच्यते । (च. सू. अ. २६)

१६६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( ३ ) चक्कर आना, अंगघात तथा अन्य वातविकारों में इसको खिलाते हैं एवं बाह्य लेप भी करते हैं । ( ४ ) हिचकी में मधु के साथ इसके चूर्ण को खिलाया जाता है । ( ५ ) अग्निमान्द्य, अरुचि, वमन, अतिसार तथा आंव आदि में इसका चूर्ण खिलाया जाता है । ( ६ ) अगर एवं ईश्वरमूल को पीस कर शिरःशूल में एवं बच्चों की खांसी में छाती पर उसका लेप किया जाता है। इससे खुजली एवं दाह कम होने के कारण रक्त त्वचा ( Erythema ), त्वक् शोथ, विचर्चिका, गजचर्म एवं फोड़े आदि में इसको जल में घिस कर लगाते हैं । वातिक पीडा में भी इससे लाभ होता है। इससे जूं आदि में भी लाभ होता है। ( ७ ) अगर का इत्र-१-२ बूंद श्वेत पान पर लगा कर खिलाने से तमकश्वास में आराम मिलता है। वाजीकरण के लिये इसके पुराने इत्र को पान के साथ खिलाते हैं । मात्रा - चूर्ण ५-१५ र०; इत्र १-२ बूंद !

अथ देवदारु । तस्य नामानि गुणांश्चाह देवदारु स्मृतं दारुभद्रं दार्विन्द्रदारु च । मस्तदारु द्रुकिलिमं किलिमं सुरभूरुहः ॥ २४ ॥ देवदारु लघु स्निग्धं तिक्तोष्णं कटुपाकि च । विबन्धाध्मानशोथामतन्द्राहिक्काज्वरास्रजित् । प्रमेहपीनसरुजेष्मकण्डूसमीरनुत् ॥ २५ ॥ देवदारु के नाम तथा गुण-देवदारु, दारुमद्र, दारु, इन्द्रदारु, मस्तदारु, द्रुकिलिम, किलिम और सुरभूरुह ये सब देवदारु के संस्कृत नाम हैं। देवदारु-लघु, स्निग्ध, तिक्त रसयुक्त, उष्णवीर्य, विपाक में कटुरसयुक्त, एवम् विबन्ध, आध्मान, शोथ, आम, तन्द्रा, हिचकी, ज्वर, रक्तदोष, प्रमेह, पीनस, कफ, खांसी, खुजली तथा वायु को नष्ट करने वाला होता है ॥ २४-२५ ॥

११ देवदारु हि०, म०, गु०-देवदार । बं०-देवदारु । पहाड़ी-केलोन । ते०-देवदारि चेट्टु । पं०-केल्लु । ता०-देवदारु चेडि । फा०-देवदार । अं०-Himalayan cedar ( हिमालय सिडार ); Pinus deodar ( पाइनस् देवदार । ले०-Cedrus deodara ( Roxb. ) Loud. ( सेड्रस् देवदार )। Fam. Pinaceae (पिनेसी) । पश्चिमोत्तर हिमालय में कुमाऊँ से पूर्व की ओर यह पाया जाता है। जौनसार और गढवाल में ७ से ८॥ हजार फीट के बीच का भाग देवदारु वृक्षमाला का प्रधान उत्पत्ति स्थान है। इसका वृक्ष-बहुत विशाल, चिरायु, सुन्दर, १६० से १८० फीट तक ऊँचा तथा कहीं कहीं इससे अधिक ऊँचा होता है। शाखाएं-दिगन्तसम फैली हुई परन्तु शाखाम कुछ नीचे की ओर झुके हुये रहते हैं । पत्ते-त्रिकोण युक्त, सूच्याकार, १-१॥ इञ्च लम्बे, लम्बी टहनियों पर एकाकी और पेचदार क्रम से निकले हुये और छोटी टहनियों पर गुच्छों में निकले हुये रहते हैं। फल- शाखाग्रों पर, एकाकी, ४-५ इञ्च लम्बे और ३-४ इञ्च मोटे होते हैं । बीज-३/८ इञ्च तक लम्बे, त्रिकोणाकार या अर्धचन्द्राकार और पक्ष युक्त होते हैं। बीजपत्र लगभग १० होते हैं

कर्पूरादिवर्गः १६७ देवदार की सुगन्ध युक्त लकड़ी (काष्ठसार ) पीताभ बादामी रंग की तथा तैल से भरी होती है । लकड़ी को जलाकर एक तैल निकालते हैं जिसे केलोन का तेल कहा जाता है। यह तैल बहुत पतला होता है। औषध में काष्ठसार, तैल, पत्र एवं कोमल शाखाओं का व्यवहार किया जाता है। दक्षिण तथा गुजरात की तरफ देवदार नाम से सरल ( चीड़ की ) की लकड़ी बिकती है। नोट-चरक एवं सुश्रुत में इसका अनेक रोगों में उपयोग किया गया है। रासायनिक संगठन- इसमें केलोन का तैल नामक एक तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग - देवदार स्वेदजनन, मूत्रजनन, वातानुलोमक, वात-कफहर एवं त्वग्दोषहर है। इसका तैल टर्पेण्टाइन के समान गुण वाला होता है लेकिन उससे यह कुछ न्यून गुण वाला है। देवदार का प्रयोग ज्वर, जीर्ण आमवात, शिरःशूल, श्लीपद, जलोदर, कास, श्वास, अतिसार, वातिक विकार, शोथ, अश्मरी तथा व्रण में किया जाता है। इसके तैल का प्रयोग कुष्ठ, कफ, कास एवं त्वचा के रोगों में किया जाता है। ( १ ) ज्वर में इसको देने से काफी पसीना निकलता है तथा मूत्र की मात्रा भी बढ़ती है। ज्वर चाहे शोथ से हो या कफजन्य हो इसके प्रयोग से शोथ कम होता है तथा कफ की दुर्गन्ध दूर होकर कफ कम होता है। ( २ ) जलोदर में देवदार, मङ्गेजन की छाल तथा अपामार्ग प्रत्येक ३ तो० गोमूत्र में पीसकर देने से मूत्र द्वारा जल निकल जाता है तथा रोगी को स्फूर्ति मालूम पड़ती है। ( ३ ) सोजाक, फिरंग, वातरक्त एवं आमवात में देवदार्व्यादि काथ का रसायन के रूप में प्रयोग करते हैं। ( ४ ) श्लीपद में इसको सरसों के तैल के साथ खिलाते हैं तथा चित्रक के साथ गोमूत्र में पीस कर लगाते हैं । ( ५ ) वातिक हृद्रोग में देवदार एवं सोंठ को पीसकर पिलाने से हृदय की धड़कन तथा शूल आदि दूर होते हैं। ( ६ ) हिक्का तथा श्वास में इसका क्वाथ पीने से लाभ होता है। ( ७ ) शिरःशूल में इसे जल में घिस कर कपाल पर लगाते हैं। पुराने शोथ पर हल्दी एवं गुग्गुलु के साथ इसका लेप किया जाता है । ( ८ ) इसका तैल-कुष्ठ में बहुत लाभदायक माना जाता है। इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसको खिलाते हैं तथा बाह्य लगाते भी हैं। इससे पुराने तथा दुर्गन्ध युक्त व्रण अच्छे हो जाते हैं। कर्णशूल में इसका तैल डालने से आराम मिलता है। कफज कास में त्रिकटु एवं यवक्षार के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा--चूर्ण ३-६ माशा; तैल १०-४० बूंद !

अथ सरलः ( धूप ) । तस्य नामानि गुणांश्चाह सरलः पीतवृक्षः स्यात्तथा सुरभिदारुकः । सरलो मधुरस्तिक्तो कटुपाकरसो लघुः ॥ २६ ॥ स्निग्धोष्णः कर्णकण्ठाक्षिशिरोगदहरः स्मृतः । कफानिलस्वेददाहकासमुच्छाव्रणापहः ॥ २७ ॥

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सरल (धूप) अर्थात् चीड़के नाम तथा गुण-सरल, पीतवृक्ष और सुरभिदारुक ये सब संस्कृत नाम चीड़के हैं। चीड़-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, लघु, स्निग्ध तथा उष्ण वीर्य होता है एवम् कर्ण, कण्ठ तथा नेत्र सम्बन्धी रोग, रक्षोघ्न, कफ, वायु, स्वेद (पसीना), दाह, खाँसी, मूर्च्छा तथा व्रण को दूर करने वाला होता है ॥ २६-२७॥ १२ धूप सरल । हि०-धूप सरल, चिर, चीड़, चील। बं०-सरलगाछ, तार्पीन तैलेर गाछ। म०-सरल । गु०- सरल देवदार, तेलियो देवदार । ता०-शिरसाल । नेपा०-धूप सल्सी। अ०-शजसुल बक, सनोबर हिन्दी । फा०-दरख्ते वसक । अं०-Long-leaved Pine (लाँग लीहड पाइन); Chir Pine (चीर पाइन)। ले०-Pinus longifolia Roxb. (पाइनस् लाँगिफोलिया रॉक्स.) । Fam. Pinaceae (पिनेंसी)। इसके वृक्ष हिमालय में अफगानिस्तान से लेकर काश्मीर, पञ्जाब, उत्तर प्रदेश, भूटान तथा आसाम एवं बर्मा में २०००-६००० फीट की ऊंचाई तक प्रायः समृद्धवृद्ध होकर उगे हुए पाये जाते हैं। इसकी ४, ५ जातियां भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से पा. एक्सेल्सा वाल. (P. ex- celsa Wall. ) तथा पा. खासया रायली (P. khasya Royle ) मुख्य हैं। चीड़ के प्रकाशप्रिय विशाल वृक्ष बहुत सीधे (सरल) तथा १००-१५० फीट ऊंचे होते हैं। स्तम्भ-सीधा, गोल एवं घेरा ५-७ फीट या १२ फीट तक होता है। छाल-खुरदरी, ऊंची नीची, गद्देदार एवं १-२ इञ्च मोटी होती है। काष्ठ-स्निग्ध तथा तीक्ष्णगन्धी होता है। पत्ते-छोटी छोटी टहनियों के अन्त में ९ १२ इञ्च लम्बे, पतले, कुछ कुछ त्रिकोणयुक्त, हल्के हरे रंग के एवं तीन तीन के समूह में पाये जाते हैं। माघ से चैत्र तक फूलों के गुच्छे लगते हैं। एक वर्ष के उपरान्त में इसके फल या डोडे पकते हैं। नरमञ्जरी प्रायः ½ इञ्च लम्बी और सामूहिक शंखाकार फल (Cone) एकाकी अथवा ३-५ तक एक साथ रहते हैं जिनमें प्रत्येक ४-८ इञ्च लम्बा और ३-५ इञ्च मोटा लट्वाकार होता है। बीजवाहक पत्रों का अग्र मुड़ा हुआ, मोटा, प्रायः एक तीक्ष्ण काले नोक और पृष्ठ पर ४-५ कोणों से युक्त होता है। चैत्र वैशाख में फल फट जाते हैं जिनमें से बीज निकलते हैं तथा फल वृक्ष पर ही लगे रहते हैं। बीज ⅓ इञ्च से कुछ कम लम्बा, चिपटा, पंखयुक्त (पंख बीज से बड़ा और पतला) और ऊपर से मालाकार होता है। पा० एक्सेल्सा (चौल या कैल) नामक इसकी उपजाति ६-१० हजार फीट के बीच उत्तरप्रदेश एवं पञ्जाब में पाई जाती है। इसके पत्ते नीलहरित और ५-६ तक प्रतिगुच्छे में होते हैं। सामूहिक फल लम्बगोल होते हैं और बीजवाहक पत्रों के अग्र बहुत मोटे नहीं होते। रासायनिक संगठन-इसके बहिःकाष्ठ (Sapwood) से सहज अथवा क्षत करने से एक प्रकार का तेलिया निर्यास निकल कर जम जाता है जिसे गन्धाबिरोजा कहते हैं। पहले यह सफेद कुछ पतला और गाढ़ा होता है। इसके बाद उत्तरोत्तर अधिक गाढ़ा एवं पीला फिर गहरा पीला हो जाता है। यह चिपचिपा, मुलायम तथा उग्रगन्धयुक्त होता है। पा० एक्सेल्सा में निर्यास कम निकलता है पर अधिक अच्छा होता है। गन्धाबिरोजा को बिना जल के ऊर्ध्वनलिका यन्त्र में गरम करके एक गाढ़ा तथा लाल रंग का तैल निकालते हैं जिसे खम्नुतेल या (पं०) सतबिरोजा कहते हैं। इसमें गन्धाबिरोजा की गन्ध रहती है।


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बिरोजे का आभ्यन्तरिक प्रयोग करने के लिये निम्नलिखित विधि से शुद्ध किये हुये बिरोजे का व्यवहार करना चाहिये । समभाग दूध और जल भरे हुये पात्र पर कपड़ा बांध, उस पर गन्धा- बिरोजा डाल कर नीचे आंच देते हैं, जिससे बिरोजा कपड़े से टपक कर नीचे के पात्र में जम जाता जाता है। इसको निकाल कर सुखा कर रख लें। गन्धाबिरोजा को वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र द्वारा गरम करने से एक रंगहीन तैल प्राप्त होता है जिसे तारपीन का तेल (Turpentine oil) कहते हैं। ५६ पौंड गन्धाबिरोजा से ८ पौंड तैल निकलता है । तैल निकालने के बाद जो अवशेष रह जाता है उसे डाक्टरी में रेजिन या कोलोफोनि (Resin, Colophony ) कहा जाता है। इसे छान कर उबलते हुये जल के साथ कड़ाई में डाल कर घोटते हैं। जिससे एक काला सा मधु के समान गाढ़ा पदार्थ तैयार होता है जिसे गन्धाबिरोजा का डामर कहते हैं। यह यूरोपीय बरगंडी पिच के समान होता है। यहां पर सरल (चीड़) वृक्ष के गुण और प्रयोग दिये जा रहे हैं। आगे 'सरलनिर्यास' के अन्तर्गत गन्धाबिरोजा तथा तारपीन के तैल आदि के गुण और प्रयोग दिये गये हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दुर्गन्पहर, उत्तेजक, दीपन, वातानुलोमक, स्वेदल, मूत्रल, प्रतिदूषक एवं कफहर है। इसका आन्तरिक उपयोग अन्य औषधों के साथ क्वाथ के रूप में दाह, कास, मूर्च्छा, आध्मान, अङ्गघात आदि वातिक व्याधियां, अश्मरी, कफज्वर, कृमि, श्लेष्मातिसार एवं वातज हिक्का में किया जाता है। इसका लेप व्रण, शोथ, कंठमाला, जन्तुओं के दंश, त्वचा के अनेक विकार एवं वातव्याधियों में किया जाता है । व्रण में इसकी छाल का धूआं दिया जाता है। इसकी लकड़ी को कपड़ा लपेट कर तथा घृत में डुबोकर जलाते हैं तथा जो तेल टपकता है उसे कान में डालने से कर्णशूल दूर होता है। व्रणरोपण तेलों में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा-३ माशा ।

अथ तगरं पिण्डतगरं च तयोर्नामानि गुणांश्चाह

कालानुसार्यं तगरं कुटिलं नहुषं नतम् । अपरं पिण्डतगरं दण्डहस्ती च बर्हिणम् ॥ २८ ॥ तगरद्वयमुष्णं स्यात्स्वादु स्निग्धं लघु स्मृतम् । विपाकेऽम्लंशूलाक्षिरोगदोषत्रयापहम् ॥२९॥ अब तगर तथा तगर भेद एवम् दोनों के नाम और गुण-तगर दो प्रकार का होता है उसमें प्रथम प्रकार के तगर के-कालानुसार्य, तगर, कुटिल, नहुष और नत ये सब संस्कृत नाम हैं। दूसरे प्रकार के तगर के-पिण्डतगर, दण्डहस्ती और बर्हिण ये सब संस्कृत नाम हैं। दोनों प्रकार के तगर-उष्णवीर्य, स्वादिष्ट, स्निग्ध तथा लघु होते हैं। यह विष, अपस्मार (मिरगीरोग), शूल, नेत्ररोग तथा त्रिदोष को दूर करने वाले होते हैं ॥ २८-२९ ॥ १३ तगर । हि०-तगर, सुगन्ध बाला, मुस्क़ बाला। बं०-तगर पादुका, शुमियो, असारून । म०-तगर गण्ठोडा, तगरमूल । गु०-तगर गण्ठोडा । फा०-असारून । उर्दू-रिशेवाल । पं०-दालमुश्क, मुस्केवली । अं-Indian Valerian Rhizome (इन्डियन वेलेरियन राइजोम) ।

२०० भावप्रकाशनिघण्टुः ले०-Valeriana wallichii DC. (वेलेरिआना वालिशिआइ) । Fam. Valerianaceae (वैलेरिअॅनेसी) । तगर क्या है इसके सम्बन्ध में पहले मतभेद था। कुछ लोग श्वेत पुष्पवाले एक छोटे वृक्ष टेबर्नी मोन्टॅना कोरोनेरिया (Tabernae montana coronaria R. Br.), हि०- चांदनी के मूल को तगर मानते थे। कहीं कहीं श्यामवर्ण की चंदन जैसी वजनदार लकड़ी बिकती है। बंगाल में कोई जल में उत्पन्न होने वाली घास तथा पंजाब में कोई पीले काष्ठ आदि का व्यवहार किया जाता रहा। लेकिन अब निर्विवाद रूप से यह सिद्ध हो गया है कि ऊपर लिखे हुवे वेलेरि- आना वालिशिआइ का मूलस्तम्भ (मूल) ही तगर है। बाजार में यह 'सुगन्ध बाला' के नाम से बिकता है तथा इसे वैद्य 'बालकम् या हीवेर' के स्थान पर प्रयोग करते रहे हैं। वास्तव में यह सुगन्धबाला नहीं है। बालक या हीबेर (सुगन्धबाला) का स्वतन्त्र वर्णन आगे दिया हुआ है। बाजार में 'तगर' नाम से जो द्रव्य बिकता है वह कोई निर्गन्ध काष्ठ है और किसी सुगन्धित द्रव्य के साथ रख कर गन्धयुक्त बना दिया जाता है। भारतीय तगर-पाश्चात्य चिकित्सा में व्यवहार में लाये जाने वाले विदेशी वॅलेरियन, वॅलेरि- आना ऑफिसिनॅलिस् Linn. (Valeriana officinalis Linn.) के स्थान में उत्तम प्रतिनिधि माना जाता है। यद्यपि भारतीय तगर अपने यहां पर्याप्त होता है तथापि व्यापारी तगर अधि- कतर अफगानिस्तान से निर्यात किया हुआ रहता है। भारत में विदेशी तगर (वे० ऑफिसिने- लिस्) बहुत थोड़ी मात्रा में काश्मीर के उत्तर में सोनमर्ग स्थान पर ८ से ९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसकी अन्य उपजाति वे० हार्डविक़ाई वाल. (V. hardwickii Wall.) भी वे० वालिशिआइ के साथ पाई जाती है। बाजार में इस तगर को सुगन्धबाला एवं असारून नाम से लोग बेचते हैं। श्री डा० दलजीतसिंहजी द्वारा लिखित यूनानी द्रव्यगुण विज्ञान में असारून का ले० नाम असारूम युरोपियम लिन., परिस्टोलोकीएसी (Asarum europae- um Linn.; Fam. Aristolochiaceae) लिखा हुआ है। स्वरूपादि का वर्णन भी उसी का (अ० युरोपियम्) मालूम पड़ता है लेकिन गुण धर्म जो लिखे हैं वे तगर (वेलेरियन) से मिलते लिखे हैं। इन्होंने इसका एक प्रतिनिधि भारतीय भेद माना है जिसको 'तुग्गुर' नाम दिया है। डा० देसाई ने तगर (वेलेरिआना वालिशिआइ) एवं असारून (अ० युरोपियम्) का अलग अलग वर्णन किया है तथा दोनों के गुण धर्म भी अलग लिखे हैं। डा० देसाई ने असारून को वामक, शिरोविरेचक, स्वेदजनन, कफघ्न, संसन एवं शोधन लिखा है जो तगर से भिन्न हैं। इसके परिचय में लिखा है कि असारून की जड़ में मिरिच जैसी गन्ध तथा स्वाद कटु (तीता) होता है तथा इसके पंचाग के चूर्ण को सूंघने से छींक आती है। तगर का स्वाद कड़वा एवं गन्ध अलग प्रकार की होती है। डा० चोश्रा भी डा० देसाई के मत से सहमत हैं। डा० देसाई ने यह स्पष्ट लिखा है कि असारून के समान ही दिखलाई देने वाली लेकिन गुणों में भिन्न एक दूसरी वनस्पति है जिसको तुग्गुर कहते हैं तथा उसका लोग असारून के स्थान पर व्यवहार करते हैं। इस दृष्टि से बाजार में सुगन्धबाला के नाम से बिकने वाला द्रव्य असली तगर (वेलेरिअन) है एवं इसे असारून नाम देना या असारून के स्थान पर प्रयोग करना उचित नहीं है। असारून अलग द्रव्य है। इसी प्रकार सुगन्धबाला भी अलग द्रव्य है। बाजार में तगर नाम से बिकने वाले कृष्ण वर्ग के काष्ठ चूर्ण आदि को भी तगर नहीं मानना चाहिये । इसके क्षुप हिमालय पहाड़ के साधारण भाग में काश्मीर से भूटान तक ४ से १२ हजार फीट की ऊंचाई पर तथा खासिया के पहाड़ों पर ४ से ६ हजार फीट की ऊंचाई पर बहुत पाये जाते हैं।


कर्पूरादिवर्गः २०१ इसका क्षुप (Herb) -किंचित् रोमश एवं बहुवर्षायु होता है। मूलस्तम्भ-मोटा, अधोगामी मोटे तन्तुओसे युक्त एवं जमीन में दिगन्तसम फैला रहता है। काण्ड-१५-४५ से. मी. ऊंचे एवं प्रायः गुच्छेदार होते हैं। पत्ते-आधारीय पत्र प्रायः २॥-७॥ से. मी. व्यास में, लम्बे नाल से युक्त, लट्वाकार, आधार पर गहरे ताम्बूलाकार, तीक्ष्णाग्र तथा धारयुक्त दन्तुर या लहरदार होते हैं। काण्डपत्र संख्या में थोड़े, बहुत छोटे एवं अखंड या खंडित होते हैं। फूल-श्वेत रंग के या कुछ कुछ गुलाबी होते हैं और समशिख क्रम से शाखाओं पर पाये जाते हैं। ये प्रायः एकलिंगी होते हैं तथा पुंपुष्प एवं स्त्रीपुष्प अलग-अलग क्षुपों पर होते हैं। वृन्तपत्रक (Bracteoles)-फल के इतने लम्बे, आयताकार रेखाकार होते हैं। बाह्यकोश-पुष्पित होते समय बाह्यदल के खंड क्वचित् व्यक्त लेकिन बाद में करीब १२, रेखाकार, रोमयुक्त खण्डों में दिखलाई देते हैं। आभ्यन्तर कोश- यह कुप्पी के आकार का, पांच खण्डों से युक्त तथा फैला हुआ होता है। पुंकेशर-संख्या में ३ होते हैं। स्त्रीकेशरी-कुक्षिक्वृन्त पतला, अविभाजित तथा कुक्षि अग्र में स्थित रहती हैं। अंडा- शय-३ गहरों वाला होता है। फल-रोमश या करीब करीब रोमहीन होते हैं। इसके मूल तथा मूलस्तम्भ का व्यवहार औषध में किया जाता है। मूलस्तम्भ के अत्यन्त गांठदार, टेढ़े मेढ़े, खुरदरे, हल्के पीताभ बादामी (Dull yellowish-brown) रंग के, ४-८ से. मी लम्बे तथा ५-१० मि. मी. मोटे टुकड़े होते हैं। यह कुछ चिपटे से होते हैं। इनके उपरी पृष्ठ पर अनेक टूटे हुवे पत्तों के निशान तथा अधोपृष्ठ पर टूटे हुवे मूल के निशान रहते हैं तथा अधोपृष्ठ से कुछ मोटे मूल निकले हुवे रहते हैं। इसका भग्न-छोटा तथा कंटकित होता है। इसका स्पष्ट अनुप्रस्थ (Trausverse) विच्छेद करके देखने से गहरे रंग का बाह्यक (Cortex), मज्जक (Pith), एधा (Cambium) की स्पष्ट रेखा एवं चौड़े मज्जक किरणों (Medullary rays) से पृथक किये हुवे १२ १५ छोटे हलके रंग के दारुपूलों (Xylem bundles) का वर्तुल आदि भाग दिखलाई देते हैं। इसके मूल बहुत से, ६-७ मि. मी. लम्बे एवं १-२ मि. मी. मोटे या कभी-कभी नहीं भी रहते। इसके अन्दर का भाग हलके वर्ण का काष्ठमय एवं छाल गहरे रंग की होती है। तगर में एक विशिष्ट उग्र गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कड़वा होता है। रासायनिक संगठन-भारतीय वेलेरियन (तगर) में एक उड़नशील तैल ०.५-२.१२% पाया जाता है। वसन्त ऋतु में संग्रहीत ताजे मूल में इसकी अधिकतम मात्रा होती है। इस तैल में प्रधानतया सेस्क्वटरपैन् (Sesquiterpenes), वेलेरिक् एसिड (Valeric acid) एवं टर्पेन अल्कोहोल (Terpene alcohols) स्वतन्त्र या ऐस्टर के रूप में संयुक्त अवस्था में पाये जाते हैं। इस तैल के अतिरिक्त इसमें अराचिडिक एसिड (Arachidic acid), हेन्ट्रियाकोन्टेन (Hentria- contane) तथा स्नेहीय अम्लों के मिश्रण रहते हैं। ताजे मूल में जल में घुलनशील कार्यकारी पदार्थ अल्प मात्रा में पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- यह वातहर, उद्वेष्टननिरोधी, रक्ताभिसरण एवं वातनाड़ी तन्तुओं के लिये उत्तेजक, चेतनाकारक, स्वापजनक, वातानुलोमक, केन्द्रीय वातनाड़ीसंस्थान के लिये अवसा- दक एवं स्थानिक वेदनास्थापक तथा व्रणरोपक है। अल्प मात्रा में देने से अन्य सुगन्धित तैलों की तरह इससे आमाशयोर्ध्वप्रदेश में उष्णता मालूम होती है, नाडी की गति बढ़ती है तथा कुछ मानसिक उत्तेजना होती है। इससे सांवेदनिक नाड़ियों के अग्र में बधिरता उत्पन्न होती है। अधिक मात्रा में इसको देने से चक्कर आने लगते हैं, हिचकी आती है, वमन होता है, एवं हृद- यावसाद होता है।

यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:


[बायाँ पृष्ठ - पृष्ठ २०२]

२०२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) अपतन्त्रक, अतत्वाभिनिवेश (Hypochondriasis—हाइपोकॉण्ड्रियासिस् ), अशान्ति तथा इसी प्रकार की मानसिक व्यथाओं में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इसके साथ यशद- भस्म का उपयोग भी किया जाता है। इसका यह प्रभाव संभवतः इसके अरुचिकारक स्वाद एवं उग्र गन्ध के कारण होता है। कंपवात में भी कभी-कभी इसका उपयोग किया जाता है। (२) जीर्ण ज्वर के कारण जब हृदय तथा सम्पूर्ण शरीर में शिथिलता आई रहती है तथा त्रिदोष की तीव्रता रहती है तब इसके देने से हृदय को बल मिलता है एवं प्रलाप, अस्वस्थता आदि दूर होकर रोगी को चेतना आती है। बेहोशी एवं हृदय की धड़कन में इसका तैल २-५ बूंद की मात्रा में गोंद के साथ मिलाकर दालचीनी के फांट के साथ देते हैं। (३) यह वातानुलोमक होने के कारण आध्मान आदि में इससे लाभ होता है। (४) कुकास, तमकश्वास, जीर्णविबन्ध, पीड़ायुक्त व्रण, घाव, अस्थिभग्न एवं तीव्र आमवात में शोथयुक्त संधिशूल कम करने के लिये इसके फांट का उपयोग करते हैं। (५) वातनाड़ी संस्थान के रोगों के कारण उत्पन्न मधुमेह तथा बहुमूत्र में इसके साथ सूक्ष्म मात्रा में अफीम का प्रयोग किया जाता है। (६) विषम ज्वर में मनःशिला, यशदभस्म, तगर, भांग या अफ़ीम को पान के रस के साथ गोली बनाकर देते हैं जिससे ज्वर के कारण उत्पन्न मानसिक तथा शारीरिक थकावट कम होती है। शीत ज्वर में पारी न आकर केवल शिरःशूल या उदरशूल हो तो तगर एवं यशदभस्म को देते हैं। मात्रा—चूर्ण २-८ र० । अथ पद्मकम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पद्मकं पद्मगन्धि स्यात्तथा पद्माह्वयं स्मृतम् । पद्मकं तुवरं तिक्तं शीतलं वातलं लघु ॥ ३० ॥ वीसर्पदाहविस्फोटकुष्ठश्लेष्मास्रपित्तनुत् । गर्भसंस्थापनं रुच्यं वमिव्रणतृषाप्रणुत् ॥ ३१ ॥ पद्माख के नाम तथा गुण—पद्मक, पद्मगन्धि तथा पद्माह्वय (कमल के पर्याय वाचक समस्त शब्द) ये सब पद्माख के संस्कृत नाम हैं। पद्माख—कषाय तथा तिक्तरस युक्त, शीतवीर्य, वात- जनक तथा लघु होता है एवं विसर्प, दाह, विस्फोट, कुष्ठ, कफ और रक्तपित्त को दूर करता है। यह गर्भ का स्थापन करने वाला, रुचिकारक एवं वमन, व्रण तथा तृषा को दूर करने वाला होता है ॥ ३०-३१ ॥ १४ पद्माख हि०-पद्माक, पद्माख, पदुम काठ, फाजा । बं०-पद्म काष्ठ । म०-पद्म काष्ठ, पद्माक । गु०- पद्मकनुं लांकडुं, पद्माकष्ठ । कं०-पद्मक । पं०-चभिअरी । लिपचा०-कौंगकी । अं०-Mild Hima- laya Cherry (माइल्ड हिमालय चेरी)। ले०-Prunus puddum Roxb. ex Wall. (प्रूनस् पड्डुम्, राक्सबू ) । Fam. Rosaceae (रोजेंसी) । यह गरम हिमालय में शिमला, गढ़वाल से सिक्किम और भूटान तक एवं दक्षिण में कुडाई- कनाल और उटकमंड में पाया जाता है।

१. 'हृष्यमिति पाठो० ।


[दायाँ पृष्ठ - पृष्ठ २०३]

कर्पूरादिवर्गः २०३ इसका वृक्ष मध्यमाकार का अचिरस्थायी होता है। छाल—फीके भूरे रङ्ग की या कालापन युक्त भूरे रङ्ग की और चमकीली होती है। इससे पतली चमकीली पपड़ियां छूटती रहती हैं। काष्ठसार रक्ताभ तथा सुगन्ध युक्त होता है। पत्ते—३-५ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, भालाकार लट्वाकार, लम्बे नोकवाले, चिकने और दोहरे दांतों वाले होते हैं। फूल—सफेद गुलाबी या लाल रङ्ग के आते हैं और पतझड़ के बाद नवीन पत्ते निकलने के पहले ही खिल जाते हैं। फल—छोटे छोटे गोलाकार या अंडाकार होते हैं और वे पीले या गुलाबी रङ्ग के दिखाई पड़ते हैं। इन फलों को लोग खाते हैं तथा इनसे एक प्रकार का मद्य बनाते हैं। बाजार में पद्माकाष्ठ के कांड के टुकड़े बिकते हैं। ये वजन में भारी तथा इनके छाल का वर्ण कृष्ण-रक्त रहता है। छाल पर आड़ी खांचे रहती हैं। इसे हाथ से रगड़ने से आह्लादकारक तथा मृदु सुगन्ध आती है। इनके भीतर का भाग रक्तपीताभ श्वेतवर्ण का होता है। पद्माकाष्ठ हमेशा नया काम में लाना चाहिये क्योंकि कालान्तर से उसका औषधधर्म नष्ट हो जाता है। पद्माख का क्वाथ बनाकर प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि इसे उबालने से इसका सत्व उड़ जाता है। इसका हमेशा गुनगुने जल में फांट बनाकर प्रयोग करना चाहिये। रासायनिक संगठन—इसकी छाल में एक अत्यन्त विषैला द्रव्य हाइड्रोसायनिक एसिड् ( Hydrocyanic acid ) तथा अॅमिग्डॅलिन् (Amygdalin ) इत्यादि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग—पद्माख शीतल, रक्तस्तम्भक, तिक्तपौष्टिक, छर्दिनिग्रहण, स्तम्भन, वेदना- स्थापक, वर्ण्य, गर्भस्थैर्यकर एवं ज्वरहर है। इसका वेदनाहर गुण इसके विषैले सत्व में है तथा स्तम्भन एवं तिक्तपौष्टिक गुण काष्ठ में है। इसके विषैले सत्व की क्रिया सम्पूर्ण शरीर पर एवं विशेषकर जीवनीय केन्द्र स्थान पर शामक रूप में होती है। (१) अपचन के कारण आमाशय की श्लेष्मल त्वचा में शोथ होकर वमन एवं अतिसार होने पर तथा आमाशय के व्रण में इसको दिया जाता है। इससे व्रण की वेदना कम होती है तथा स्तम्भन गुण के कारण अतिसार तथा वमन में लाभ होता है। इसके फांट से भी वमन तथा हृल्लास में लाभ होता है। (२) श्वसनकेन्द्र के ऊपर इसके शामक प्रभाव के कारण शुष्क कास एवं क्षयज प्रस्वेद कम हो जाता है। हिक्का एवं श्वास में इसको मधु के साथ चटाते हैं। (३) हृदय के केन्द्रस्थान के शमन के कारण हृदय की धड़कन तथा हृदय के वामपटल रोग से रक्त का पीछे बहना ( Mitral regurgitation ) एवं हृदय पर मेद संचित होकर एक प्रकार की जो खांसी होती है उसमें यह गुणकारक है। (४) रक्तपित्त में चन्दन, शर्करा एवं तंडुल जल के साथ इसको देते हैं। (५) गर्भपात रोकने के लिये इसे जल में घिस कर पिलाते हैं। चरक एवं सुश्रुत ने इसे गर्भस्थैर्यकर नहीं माना है। (६) जननेन्द्रिय की शुष्क कण्डू में इसे शीतल जल में घिसकर लगाते हैं। शुष्क कण्डू युक्त त्वचा के रोगों में इसके लेप से त्वचा शुद्ध होकर कान्ति बढ़ती है। मात्रा—५-१५ र०। इसमें तीव्र विषैला द्रव्य होने के कारण भली प्रकार विचार करके इसका प्रयोग करें।

२०४ भावप्रकाश निघण्टुः अथ गुग्गुलुः । तस्य नामान्याह गुग्गुलुर्देवधूपश्च जटायुः कौशिकः पुरः । कुम्भोदूखलकं क्लीवे महिषाक्षः पलङ्कषः ॥ ३२ ॥ गूगल के नाम-गुग्गुलु, देवधूप, जटायु, कौशिक, पुर, कुम्भोदूखलक (नपुंसकलिङ्ग), महिषाक्ष और पलङ्कष ये सब गूगल के संस्कृत नाम हैं ॥ ३२ ॥ गुग्गुलुभेदानाह महिषाक्षो महानीलः कुमुदः पद्म इत्यपि । हिरण्यः पञ्चमो ज्ञेयो गुग्गुलोः पञ्च जातयः ॥३३॥ गूगल के भेद-१ महिषाक्ष, २ महानील, ३ कुमुद, ४ पद्म, ५ हिरण्य इस प्रकार से गूगल के ५ पांच भेद जानना चाहिये ॥ ३३ ॥ तेषां लक्षणानि गुणांश्चाह भृङ्गाञ्जनसवर्णस्तु महिषाक्ष इति स्मृतः । महानीलस्तु विज्ञेयः स्वनामसमलक्षणः ॥ ३४ ॥ कुमुदः कुमुदाभः स्यात्पद्मो माणिक्यसन्निभः । हिरण्याख्यस्तु¹ हेमाभः पञ्चानां लिङ्गमोरितम् ॥ महिषाक्षो महानीलो गजेन्द्राणां हितावुभौ । हयानां कुमुदः पद्मः स्वस्त्यारोग्यकरौ परौ ॥ विशेषेण मनुष्याणां कनकः परिकीर्त्तितः । कदाचिन्महिषाक्षश्च मतः कैश्चिद्गुणामपि ॥ ३७ ॥ क्रम से उन्हीं ५ प्रकार के गूगलों के लक्षण एवं गुण-१ जो गूगल भौंरा या स्रोतोंजन के समान काले रङ्ग का होता है वह 'महिषाक्ष' कहलाता है । २ महानील नामक गूगल का लक्षण अपने नाम के अनुरूप ही है अर्थात् वह अत्यन्त नीलवर्ण का होता है । ३ कुमुद नामक गूगल-कुमुद (कुई) पुष्प के समान वर्ण वाला होता है । ४ पद्म नामक गूगल-माणिक के समान वर्ण वाला होता है । ५ हिरण्याख्य गूगल-सोने के समान वर्ण वाला होता है। इनमें से महिषाक्ष तथा महानील ये दोनों गूगल हाथियों के लिये हितकारी होते हैं । कुमुद तथा पद्म ये दोनों गूगल घोड़ों के लिये अत्यन्त कल्याणकारक तथा आरोग्यदायक होते हैं। कनक अर्थात् हिरण्यनामक गूगल तो विशेष करके मनुष्यों के लिये हितकर होता है । कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि मनुष्य के लिये कहीं-कहीं महिषाक्ष गूगल भी हितकारी होता है ॥ ३४-३७ ॥ सामान्यतो गुग्गुलुगुणानाह गुग्गुलुर्विशदस्तिक्तो वीर्य्योष्णः पित्तलः सरः । कषायः कटुकः पाके कटु रूक्षो लघुः परः ॥ ३८ ॥ भग्नसन्धानकृद् वृष्यः सूक्ष्मः स्वर्यो रसायनः । दीपनः पिच्छिलो बल्यः कफवातव्रणापचीः ॥ ३९ ॥ मेदोमेहाश्मवातांश्च क्लेदकुष्ठाममारुतान् । पिडकाप्रन्थिशोफार्शोगण्डमालाकृमीञ्जयेत्॥४०॥ माधुर्य्याच्छमयेद्वातं कषायाच्चैव पित्तहा । तिक्तत्वाद् कफजित्तेन गुग्गुलुः सर्वदोषहा ॥४१॥ सामान्यरूप से गूगल के गुण- गूगल-विशद गुण युक्त, तिक्त-कषाय तथा कटरसयुक्त, उष्णवीर्य, पित्तजनक, सारक (दस्तावर), विपाक में कटरस युक्त, रूक्ष एवं अत्यन्त लघु होता है। यह टूटे हुये हड्डियों को जोड़ने वाला, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी), स्वर को उत्तम करने वाला, रसायन, अग्निदीपक, पिच्छिलगुणयुक्त तथा बलकारक होता है एवम्-कफ-वात, व्रण, अपची, मेदरोग, प्रमेह, पथरी, वातरोग, क्लेद, कुष्ठ, आमवात, पिड़का, ग्रन्थिरोग, शोथ, बवासीर, १. 'हिरण्याह्वस्तु' इति पाठ० । कर्पूरादिवर्गः २०५ गण्डमाला तथा कृमिरोग का नाशक होता है। गूगल-मधुर रस युक्त होने से वात को, कषाय रसयुक्त होने से पित्त को और तिक्त रस युक्त होने से कफ को नष्ट करने वाला होता है, अतः यह सम्पूर्ण दोषों का नाशक कहा हुआ है ॥ ३८-४१ ॥ नवीनस्य प्राचीनस्य च गुग्गुलोर्लक्षणं गुणांश्चाह स नवो बृंहणो वृष्यः पुराणस्त्वतिलेखनः ॥ ४२ ॥ स्निग्धः काञ्चनसंकाशः पक्वजम्बूफलोपमः । नूतनो गुग्गुलुः प्रोक्त सुगन्धिर्यस्तु पिच्छिलः ॥ ४३ ॥ शुष्को दुर्गन्धकश्चैव त्यक्तप्रकृतिवर्णकः । पुराणः स तु विज्ञेयो गुग्गुलुवर्यिवर्जितः ॥ ४४ ॥ नवीन और पुराने गूगल के गुण तथा लक्षण-नवीन गूगल-बृंहण (धातुवर्धक ) तथा वृष्य (वीर्यजनक ) होता है और पुराना गूगल-अतिलेखन (शरीर के धातु तथा मलों को सुखा कर खुरचने वाला ) होता है। नवीन गूगल वह कहलाता है जो स्निग्ध, सोने के समान वर्ण वाला, पके हुये जामुन के समान स्वरूप वाला, सुगन्ध युक्त तथा पिच्छिल गुण युक्त होता है। पुराना गूगल-वह कहलाता है कि जो शुष्क, दुर्गन्धयुक्त, स्वाभाविक वर्ण हीन तथा वीर्य्य रहित होता है ॥ ४२-४४ ॥ गुग्गुलुसेविनां त्याज्यान्याह अम्लं तीक्ष्णमजीर्णञ्च व्यवायं श्रममातपम् । मद्यं रोषं त्यजेत्सम्यग् गुणार्थी पुरसेवकः ॥४५॥ गूगल सेवन करने वालों के लिये अहितकर अत एव त्याज्य विषय- गूगल का सेवन करने वाला पुरुष यदि गूगल का भली भांति गुण प्राप्त करना चाहे तो वह अम्ल रस युक्त, तीक्ष्ण तथा अजीर्णकारक द्रव्य, मैथुन, परिश्रम, धूप में फिरना, शराब पीना तथा क्रोध करना छोड़ दे ॥ १५ गूगल हि०-गूगल, गुग्गुल । बं-गुग्गुल, मुकुल । म०-गुग्गुल । गु०-गुगल । क०-गुग्गुल । ते०-गुक्कुलु चेट्टु । ता०-मैशाक्षी, गुक्कल । सिंध-गुगरू । फ०-बूएजहूदोन । अ०-मुक्कु-अर्जक, अफलात(तु)न । अ०-Indian Bdellium (इण्डियन डेलिअम्) । लै०-Balsamodendron mukul Hook. ex Stocks (बाल्सेमोडेन्ड्रोन् मुकुल, हुक एक्स स्टॉक्स) । Fam. Burseraceae (बर्सेरेसी) । गूगल के वृक्ष-सिन्ध, राजपूताना, खानदेश, बरार, मैसूर, काठियावाड एवं बेलरी आदि स्थानों में अधिक पाये जाते हैं । इसका वृक्ष- छोटा, ४ से ८ फीट ऊँचा एवं झाड़ीदार होता है जिसकी मोटी फैली हुई शाखाओं के अग्र भाग कंटकित होते हैं। छाल-हरापन युक्त पीली होती है। इससे कागज के समान लम्बे, पतले, चमकीले परत निकलते रहते हैं। लकड़ी-सफेद और कोमल होती है। पत्ते-पत्रक १ से ३ तक, ऊपर से लट्वाकार, अग्र की तरफ दन्त मय धार वाले, चिकने, चमकीले तथा विशेष कर छोटी मोटी प्रशाखाओं के अन्त में रहते हैं। फूल-४-५ दल वाले, छोटे-छोटे तथा भूरापन लिये लाल रंग के आते हैं। फल-छोटे छोटे, मांसल, लंगोल तथा पकने पर लाल हो जाते हैं। उक्त वृक्ष की त्वचा में जाड़े के दिनों में घाव करने से एक प्रकार का तैलीय रालदार गोंद (Oleo gum-resin) निकलता है जिसे गूगल कहते हैं ।

२०६ भावप्रकाशनिघण्टुः गूगल के प्रकार—आकृति, रंग एवं स्थान भेद से गूगल कई प्रकार का होता है। ऊपर मूल में पांच प्रकार के भेद लिखे हुए हैं। यूनानी वाले भी इसके पांच भेद मानते हैं। (१) मुकले सकलाबी—यह भूरा होता है। (२) मुकले अरबी—यह यमन में पैदा होता है और ललाई लिये भूरा या बैगनी होता है। (३) मुकले अर्वक—यह ललाई लिये होता है। (४) मुकले यहूद—यह पिलाई लिये होता है। (५) मुकले हिंदी—यह भारतवर्ष में होता है। बाजार में तीन तरह का गूगल बिकता है जिसमें से प्रथम दो तो गूगल हैं और तीसरा सलई का गोंद है। केवल गूगल कहने से कभी-कभी सलई का गोंद (कुंदुरू) भी व्यापारी दे देते हैं। (१) कण गूगल—यह मारवाड़ से आता है तथा ललाई लिये पीले रंग का होता है। यह भैंसागूगल से नरम होता है। यह अच्छा माना जाता है। (२) भैंसागूगल—यह सिंध तथा कच्छ से आता है। यह हलका हरापन लिये पीले रंग का, टेढ़े मेढ़े, छोटे-बड़े गठों में होता है। इस पर मैल, बाल एवं छाल के टुकड़े आदि चिपके रहते हैं। यह मोम जैसा नरम लेकिन दबाने से सुरमुरा, कड़वा एवं देवदार के समान गंध वाला होता है। इसे जलाने पर गुब्बारे जैसे निकल कर फूटते हैं। इसे जल में घिसने से हरापन लिये सफेद मिश्रण बनता है। यह हल्की जात का होता है। (३) सलई का गोंद—इसका वर्णन आगे किया गया है। यह लाल रंग का होता है तथा जलाने पर अच्छी तरह जलता है। उत्तम गूगल—चमकीला, चिपचिपा, मधुर गंध वाला, कुछ पीला (ताजा), पुराना होने पर कालासा, स्वाद में कडवा तथा आसानी से टूटता है। तोड़ने पर अन्दर से हरी एवं लाल चमक वाला होता है। इसे उष्ण जल में घिसने पर हरी चमक युक्त सफेद रंग का मिश्रण बनता है। इसे जलाने पर यह अच्छी तरह जलता नहीं तथा फूलकर महीन पपड़ी निकलती है। व्यापारी लोग जली हुई लकड़ी आदि में अनेक प्रकार के चिपचिपे गोंद लगाकर गोले बनाकर बेचते हैं इसलिये अच्छी तरह परीक्षा कर खरीदना चाहिये। हमेशा नये गूगल का ही व्यवहार करना चाहिये क्योंकि रखने से यह खराब हो जाता है। गूगल शोधन—गूगल के बराबर त्रिफला एवं गुडूच लेकर उसे मोटा कूटकर अष्टगुण जल में अर्धांश शेष काथ करें। फिर काथ को छानकर उसमें गूगल को कपड़े में बांध उसकी पोटली लटकावें तथा मंद आंच पर स्वेदन करें। बार-बार उस काथ को करछुल से पोटली पर डालते जाँय। जब सब गूगल छनकर काथ में आ जावे तब कपड़े में का मैला फेंक दें तथा काथ को ऊपर-ऊपर से निकाल लें। नीचे जमे हुये गाढ़े भाग को अलग कर दें। गूगल मिश्रित काथ को मंद आंच पर गाढ़ा करें। जब गाढ़ा होने लगे तो उसमें थोड़ा घी डाल दें जिससे जलने न पावे। बाद में उसे खूब अच्छी तरह कूटकर ऊपर घी लगाकर रखें। यद्यपि इस विधि से शोधन करने की परिपाटी है तथापि संभवतः इस विधि से गूगल कुछ हीनवीर्य हो जाता होगा क्योंकि आधुनिक विद्वानों का मत है कि गूगल के गुण विशेष कर उसमें के सुगन्धि तत्त्वों पर निर्भर होते हैं। इसलिये गूगल को केवल खूब अच्छी तरह बीनकर उसमें घी डालकर बहुत कूटकर व्यवहार करें तो ज्यादा उपयुक्त हो सकता है। कुछ लोग त्रिफला काथ के स्थान पर दुग्ध अथवा दशमूल काथ का व्यवहार भी करते हैं। रासायनिक संघटन—इसमें एक उड़नशील तेल, रालदार गोंद (Gum resin) एवं एक कडवा सत्व पाया जाता है। गुण और प्रयोग—गूगल रसायन, त्रिदोषघ्न, वृष्य, बल्य, स्नेहन, संसन, वातानुलोमक, आमाशयोत्तेजक, दीपन, वातहर, वातनाड़ी संस्थान के लिये पुष्टिकारक, उत्तेजक कफनिःसारक तथा

कर्पूरादिर्वर्गः २०७ श्लेष्मल त्वचा के लिये उत्तेजक, संकोचक एवं प्रतिदूषक, श्वेतकायाणुवर्धक, मल्लकायाणुकार्यवृद्धिकर, त्वग्दोषहर, व्रणशोधन, व्रणरोपण, शोथघ्न, रक्तवर्धक एवं आर्तवजनन है। नया गूगल बृंहण एवं वृष्य होता है तथा पुराना कर्षण (लेखन) होता है। इसकी क्रिया बोल (Myrrha-मिरह) जैसी होती है। इसके सेवन के पश्चात् आमाशय में उष्णता मालूम होती है। इसका प्रच्यूषण बहुत जल्दी होता है। इसके गुण संभवतः इसमें के सुगन्धि तत्त्वों के ऊपर निर्भर रहते हैं। इसका उत्सर्ग चर्म, श्लेष्मलत्वचा एवं वृक्कों से होता है तथा उत्सर्ग के समय यह उन-उन अंगों को उत्तेजित करता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य करता है। बिना किसी दुष्परिणाम के इसका बहुत दिन तक प्रयोग किया जा सकता है। कभी-कभी इससे कोपैबा (Copaiba) की तरह त्वचा पर लाल चकत्ते और क्वचित वृक्क प्रक्षोभ के लक्षण दिखलाई देते हैं जो औषध बन्द करने से ठीक हो जाते हैं। इसका उपयोग जीर्ण कफरोग, वातरोग, नाड्यव्रणसन्ता, गृध्रसी, अर्दित, अग्निमांद्य, अपचन, अतिसार, प्रवाहिका, कंठमाला, ग्रंथि, विद्रधि, कुष्ठ, फिरंग, सोजाक, विभिन्न अवयवों के शोथयुक्त विकार, शोफ, उदर, चर्मरोग, व्रण, भगंदर, कृमि, पांडु, अर्श, प्रमेह, गर्भाशय विकार एवं मेदोवृद्धि में उन उन अवयवों पर कार्य करने वाली प्रयोजक औषधों के साथ किया जाता है। (१) पुराने कफ विकारों में इसको छोटी पीपल, अडूसा, मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके प्रयोग से कफ की मात्रा कम होती है तथा जीवाणुनाशन भी होता है। जिन रोगों में कफ अत्यधिक एवं चिपचिपा होता है उसमें इससे विशेष लाभ होता है। दुर्बल, पांडुयुक्त एवं मध्यम आयु के लोगों में यह विशेष लाभदायक होता है। इसके साथ लोहभस्म का प्रयोग किया जा सकता है। श्वास में इसको घृत के साथ खिलाते हैं। (२) आमाशय शिथिलता एवं अतिस्तीर्णता में इसके प्रयोग से क्षुधावृद्धि होती है तथा पाचन सुधरता है। अतिसार, प्रवाहिका, आंत्रप्रदाह एवं क्षयज अतिसार आदि में आंत्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) के रूप में सुगंधि द्रव्य, इन्द्रजव, एलुवा और गुड़ आदि के साथ यह दिया जाता है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में इसका अधिक प्रभाव पड़ता है। (३) यह रक्तशोधक, प्रतिदूषक, संपूर्ण शरीर को उत्तेजक एवं बलदायक होने के कारण अनेक शोथयुक्त अवस्थाओं जैसे स्वरयंत्रशोथ, श्वसनीशोथ, कुकास, उरःस्तोय, क्षयज उदरा- वरणशोथजन्य जलोदर, कंठमाला एवं मूत्रसंस्थान के गवीनीमुखशोथ, बस्तिशोथ तथा जीर्ण गर्भाशयशोथ एवं फिरंग आदि में लाभकर होता है। इनमें हर ४ या ६ घंटे के अन्तर पर इसको देते हैं। कंठमाला में पारद, सोमल्ल एवं बायविडंग के साथ गूगल देते हैं। फिरंगादि में अनंतमूल के साथ एवं जीर्ण आमवात या सोजाक से संधिशोथ होने पर गूगल एवं शिलाजतु का प्रयोग किया जाता है। संधिशोथ पर इसका लेप भी करते हैं। सोजाक तथा बस्तिशोथ में गुडूच के साथ इसको देते हैं। उरःस्तोय एवं जलोदर आदि में इससे स्रवित जल का शोषण हो जाता है। (४) गूगल की गर्भाशय के ऊपर बहुत अच्छी क्रिया होती है। तरुणस्त्रियों के अनार्तव में गूगल, एलुवा तथा कसीस की गोलियां खिलाई जाती हैं। श्वेत प्रदर में तथा उसके कारण वन्ध्यत्व हो तो रसौंत के साथ इसे अधिक मात्रा में देते हैं। (५) अंगघात, अर्दित, ऊरुस्तंभ, गृध्रसी एवं वातनाड़ी शूल में कैशोर गुग्गुलु से बहुत लाभ होता है। ऊरुस्तंभ में गोमूत्र के साथ एवं गृध्रसी में रास्ना एवं घृत के साथ इसको देते हैं।

२०८ \ भावप्रकाशनिघण्टुः (६) आमवात, कटिशूल एवं संधिपीड़ा में इसका बाह्याभ्यंतर प्रयोग किया जाता है। रास्नादि क्वाथ के साथ योगराज या त्रयोदशांग गुग्गुलु का उपयोग अच्छा होता है। (७) कुष्ठ में इससे साधारण स्वास्थ्य अच्छा होता है तथा इसके प्रयोग से दुर्बलता तथा नाड़ीशूल आदि ठीक होता है। सभी प्रकार के चर्मरोगों में गूगुल लाभदायक माना जाता है। इससे कंडू कम होती है तथा त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है। (८) व्रणशोधक, व्रणरोपक एवं प्रतिदूषक होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। १० ड्राम जल में १ ड्राम इसका टिंक्चर (९०% मद्यसार में २०%) मिलाकर मसूड़ों की सूजन, पायरिया, दांतों में गढ़े हो जाना, गले के व्रण, जीर्ण ग्रससिकाशोथ एवं गल- तुण्डिकाशोथ में गंडूष कराया जाता है। पुराने व्रणों के प्रक्षालन के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। फोड़ों की प्रारंभिक अवस्था में इसके गरम लेप से फोड़े बैठ जाते हैं। घी में इसका मलहम बनाकर पुराने व्रणों में प्रयोग किया जाता है। कंठमाला में गूगुल को उष्ण जल में घिस- कर दिन में तीन चार बार मोटा लेप करने से गांठें बैठ जाती हैं। अर्श में इसका लेप एवं धूआं दिया जाता है। आमाशयोर्ध्वप्रदेश में इसे लगाने से हिचकी तुरंत रुकती है। प्राच्यव्रण (Delhi boil) नामक दिल्ली की तरफ होने वाले व्रण में गूगुल, गंधक, सोहागा तथा कत्था इसका मलहम लगाया जाता है। मुखरोगों में गूगुल को मुख में रखकर चूसने से लाभ होता है। मात्रा—२-८ रत्ती । अथ सरलनिर्यासगुग्गुलुः । तस्या नामानि गुणाँश्चाह श्रीवासः सरलस्रावः श्रीवेष्टो वृक्षधूपकः । श्रीवासो मधुरस्तिक्तः स्निग्धोष्णस्तुवरः सरः ॥ पित्तलो वातमूर्द्धाक्षित्वग्रोगकफापहः । रक्षोघ्नः स्वेददौर्गन्ध्ययुकाकण्डूव्रणप्रणुत् ॥ ४७ ॥ सरलनिर्यास अर्थात् चीड़ के गोंद (गन्धाबिरोजा) के नाम तथा गुण—श्रीवास, सरलस्राव, श्रीवेष्ट और वृक्षधूपक ये सब गन्धाबिरोजा के संस्कृत नाम हैं। गन्धाबिरोजा—मधुर तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्निग्ध, उष्णवीर्य, दस्तावर, पित्तजनक एवं वायु, मस्तक, नेत्र तथा स्वरसम्बन्धी रोग, कफ, रक्षोग्रहबाधा, स्वेद, दुर्गन्ध, जूंयें, खुजली और घाव को दूर करता है॥ १६ सरल निर्यास हि०-गन्धाबिरोजा, बिहरोजा, बिरोजा, सरल का गोंद, चीड का गोंद । म०-सरलडीक । गु०-बेरजो । क०-श्रीवेष्टक । ता०-पिनेमारू । लिपचा०-गिन्स्ट । मो०-टोडाँग । नेपा०-धूप । पहाड़ी-विरजेलासा, लीसा । फा०-झारजद, बरजद । अ०-किन्न । अं०-Oleo-resin of Pine (ओलिओ रेजिन् ऑफ् पाइन् ) । ले०-Oleo-resina of Pinus longifolia and other species (ओलिओ रेजिना ऑफ़ पाइनस लांगिफोलिया अण्ड अदर स्पिसीज ) । Fam. Pina- ceae (पिनेंसी ) । धूपसरल वृक्ष (चीड़) के निर्यास को गन्धाबिरोजा कहा जाता है। इसके वृक्ष तथा स्वरूपादि का वर्णन पहले सरल वृक्ष (पृष्ठ १९८) के अन्तर्गत किया जा चुका है। रासायनिक संगठन—इसमें करीब २०% तारपीन का तेल (Tarpeatine oil) होता है जो ऊर्ध्वपातन यंत्र द्वारा निकाला जाता है। लगभग ८०% भाग अवशेष रहता है। इसे डॉक्टरी में रेझिन (रजन) या कोलोफोनि (Resin, colophony) कहते हैं। रेझिन (रजन) पारभासक कर्पूरादिवर्गः २०६ हलके अम्बर के वर्ण का, चमकीला एवं आसानी से टूटने वाला घन पदार्थ होता है। यह तोड़ने पर अन्दर से चमकीला दिखाई देता है। इसम तारपीन सदृश स्वाद एवं गन्ध होती है। यह जलमें अविलेय किन्तु मद्यसार तथा ईथर आदि में आसानी से घुल जाता है। तारपीन का तेल—यह सरल वृक्ष के निर्यास (गन्धाबिरोजा) से वाष्प के साथ ऊर्ध्व नलिका यन्त्र से निकाला हुआ तैल है। औषध की अपेक्षा अन्य उद्योगों में इसकी बहुत खपत होती है। सुगन्धि द्रव्य, कृत्रिम कर्पूर, तैलीय रंग एवं वार्निश बनाने में इसका उपयोग किया जाता है। इस तेल की संसार भर की आवश्यकता का ६७% भाग अमेरिका एवं २२% भाग फ्रांस पूर्ति करता है इतने अधिक वहां इसके वृक्ष पाये जाते हैं। भारतवर्ष में भी यद्यपि इसके वृक्ष बहुत पाये जाते हैं तथापि जंगली प्रदेशों में यातायात की कठिनाइयों के कारण अभी बहुत कम वृक्षों के निर्यास से तैल निकाला जाता है। भवाली, जालो तथा बरेली के पास चित्तरबकगंज आदि स्थानों में इसके निकालने के कारखाने हैं। यह तैल रंगहीन एवं स्वच्छ होता है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार की गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु एवं कुछ तिक्त होता है। कुछ दिन के बाद तथा इसे खुला रखने पर इसके स्वाद तथा गन्ध दोनों बढ़ जाते हैं जो अधिक अप्रिय हो जाते हैं। इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.८६०-०.८७० है। यह सातगुने मद्यसार (९०%) में तथा ईथर, क्लोरोफॉर्म, कार्बन डाइसल्फाइड, विजलीकृत (Dehydrated) मद्यसार एवं ग्लेशियल ॲसिटिक् एसिङ् में चाहे जिस मात्रा में घुल जाता है। भारतीय व्यापारी तैल में ३७.५% अॅल्फा-कॅरेन् (a-carene) एवं ॲल्फा-डी-टर्पेन्स् (a-d- terpenes), १०% अॅल्फा-एल्-टर्पेन् (a-l-terpene), २४.८% एल्-पिनेन् (l-pinene), ९.७% नोपिनेन् (Nopinene), या बीटा-पिनेन् (B-pinene), २०.३% लॉगिफोलीन् (Longifoline) एवं अल्प मात्रा में सिल्वेस्ट्रीन (Sylvestrene) एवं डाइबेंप्टीन (Dipe- ntene) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अमेरिका और फ्रांस के तैल में प्रधानतया पिनेन् अधिक होते हैं। भारतीय तारपीन के तैल में उपयुक्त पिनेन् की अपर्याप्त मात्रा होने के कारण कृत्रिम कर्पूर निर्माण के यह अयोग्य होता है। भारतीय तैल आसानी से जारित (Oxidized) होने के कारण तथा सूखने पर अधिक राल निकलने के कारण विदेशी तैल की अपेक्षा हीन श्रेणी का समझा जाता है लेकिन अन्य उद्योगों में इसका उपयोग किया जा सकता है। इस तैल को प्रकाशहीन, ठंडी जगह में बंद बोतलों में रखना चाहिये। गुण और प्रयोग—गन्धाबिरोजा एवं तारपीन के तेल के गुण लगभग समान ही होने के कारण दोनों का एक साथ ही वर्णन किया गया है। यह वातानुलोमक, श्लेष्मनिःसारक, कफघ्न, स्वेदजनन, मूत्रजनन, रक्तस्तम्भक, उत्तेजक, कृमिघ्न, शोथघ्न, वातहर, व्रणरोपक, दुर्गन्धिनाशक एवं अल्प प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसको चर्म पर मर्दन करने से प्रारम्भ में त्वचा लाल हो जाती है तथा प्रक्षोभ उत्पन्न होता है, पश्चात् नाड्यंगों के अवसाद से शून्यता उत्पन्न होती है। इससे सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच होकर बाह्य (स्थानिक) रक्तस्राव रुक जाता है। अधिक मर्दन से त्वचा में स्फोट आदि भी उत्पन्न होते हैं। इसका प्रश्वषण महास्रोत, श्वसनसंस्थान एवं त्वचा द्वारा होता है तथा उत्सर्ग मूत्र एवं श्वसनसंस्थान से होता है। उत्सर्ग के समय श्वास में इसकी गन्ध तृण मूत्र में बनफ्शाह् (Vio let-हायोलेट) की गन्ध आती है। 14 १४ भा० नि०

अल्प मात्रा में बार-बार देने से प्रथम वृक्कों की उत्तेजना से मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन अधिक काल तक प्रयोग करते रहने से मूत्र में जलन, प्रक्षोभ एवं कभी-कभी तीव्र मूत्रकृच्छ्र होता है। वृक्कों में शोथ उत्पन्न होने से मूत्र की मात्रा कम होती है एवं मूत्र में अल्ब्यूमिन एवं कभी-कभी रक्त भी जाने लगता है। अधिक मात्रा में महास्रोत में प्रक्षोभ से तीव्र विरेचन एवं रक्तातिसार तथा तन्द्रा, सारे शरीर में शिथिलता, अवसाद, सांवेदनिक नाड़ियों का घात, प्रत्याक्षेप क्रिया का घात एवं संन्यास आदि लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। उपर्युक्त परिणाम अधिक मात्रा में तैल को सूंघने से भी हो सकते हैं। (१) यह उत्तम वातानुलोमक होने के कारण आध्मानजन्य शूल के लिये बहुत उपयोगी है। तारपीन के तैल को गोंद के साथ घोंट कर थोड़ी चीनी एवं जल मिलाकर रोगी को दिया जाता है। इससे स्फीतकृमियों का भी नाश होता है। आमाशयिक व्रण से अथवा अन्य कारणों से आंत्र से रक्तस्राव होता हो तो इसको देने से सूक्ष्म रक्तवाहिनियों का संकोच हो कर रक्तस्राव रुक जाता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में न केवल वातानुलोमक प्रभाव के कारण आध्मान (Tympanitis) में लाभ होता है वरन् इसकी उपस्थिति में इस रोगोत्पादक दण्डाणु की वृद्धि रुक जाने से प्रत्यक्ष इस रोग में भी लाभ होता है। इसमें १५-३० बूंद हर घण्टे पर कई बार दिया जाता है। (२) जीर्ण श्वसनीशोथ (Bronchitis) में इसको देने से कफ निकलने लगता है तथा जीवाणुओं का नाश होने से दुर्गन्ध भी दूर होतो है। रोगी के कमरे में तैल को छिड़कने से अपने आप यह श्वास में आकर अपना कार्य करता है। कफक्षय एवं रक्तष्ठीवन में भी इसको खिलाया जाता है तथा सूंघने को भी दिया जाता है । फुफ्फुसों के कोथ में इससे विशेष लाभ होता है। तारपीन का तैल २।। तो०, मुलेठी २।। तो० एवं मधु २ तो० एक साथ घोंट कर ३०-६० र० की मात्रा में इन विकारों में दिया जाता है। (३) पुराने सोज़ाक (Gleet) एवं बस्तिशोथ में खन्नू का तैल १-३ बूंद या शुद्ध गन्धा- बिरोजा १ से २ ड्रा० खिलाते हैं। इन अवस्थाओं में 'पूय मेहारि वटी' को दिन भर में २-४ गोलियां दारुहरिद्रा कषाय के अनुपान से खिलाई जाती हैं। इसको बनाने के लिये शुद्ध गन्धा- बिरोजा १ तो०, शुद्ध राल २।। तो०, गूगल ५ तो०, रूमीमस्तगी २।। तो० एवं चन्दन का तैल १।। तो० इन सब को घोंट कर १॥ माशे की गोलियां बनाई जाती हैं। (४) जीर्ण कोष्ठबद्धता, आध्मान एवं सूत्रकृमि में ६०-१२० बूंद ताड़पीन का तैल एवं ४ पाइण्ट साबुन युक्त जल की बस्ति बहुत ही लाभदायक होती है। (५) इसमें रेंडी का तैल मिलाकर आमवात, कटिशूल, सन्धिपीडा एवं वातनाड़ी शूल में लगाया जाता है। आन्तरिक शोथ विशेष कर उदरगत शोथ एवं आध्मान में इससे स्वेदन किया जाता है। फलालेन जैसे कपड़े को उष्ण जल में निचोड़ कर उस पर थोड़ा सा तैल छिड़क कर उससे सेंका जाता है। पुराने कफविकारों में इसको रूमाल पर डालकर सूंघने को दिया जाता है तथा छाती पर इसको लगाते हैं। (६) गजचर्म, व्रण, क्षत तथा अन्य चर्मविकारों में गन्धाबिरोजा का मलहम उपयोग में आता है। क्षत में तैल से स्थानिक रक्तस्राव भी रुक जाती है। मुख के शल्य कर्म में साधारण रक्त- स्राव को रोकने के लिये तैल का प्रयोग किया जाता है। गन्धाबिरोजा का उपयोग अनेक प्रकार के मलहमों तथा धूप आदि में किया जाता है। कण्ठमाला में इसके लेप से लाभ होता है


गन्धाबिरोजा का डामर जीर्ण कास एवं राजयक्ष्मा आदि में दिया जाता है। इसके रजन (रेझिन, कोलोफोनि) का व्यवहार मलहम बनाने में विशेष रूप से होता है। यह अल्प प्रतिदूषक तथा पुराने व्रणों के लिये लाभदायक होता है। मात्रा - तैल ३-१० बूंद; कृमिघ्न १२०-२४० बूंद; शुद्ध गन्धाबिरोजा १-२ मा०।

अथ रालः । तस्य नामानि गुणांश्चाह रालस्तु शालनिर्यासस्तथा सर्जरसः स्मृतः । देवधूपो यक्षधूपस्तथा सर्वरसश्च सः ॥ ४८ ॥ रालो हिमो गुरुस्तिक्तः कषायो ग्राहको हरेत् । दोषास्रस्वेदवीसर्पज्वरव्रणविपादिकाः ॥ भग्नभ्रमाग्निदग्धांश्च शूलातीसारनाशनः ॥ ४९ ॥ राल के नाम तथा गुण - राल, शालनिर्यास, सर्जरस, देवधूप, यक्षधूप तथा सर्वरस ये राल के संस्कृत नाम हैं। राल - शीतवीर्य, गुरु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं ग्राही होती है। यह दोष (वातादिक), रक्तविकार, स्वेद, विसर्प, ज्वर, व्रण, विपादिका, ग्रहबाधा को दूर करती है तथा भग्न अर्थात् हड्डी के टूट जाने पर फायदा करती है और अग्नि से जल जाने पर भी लाभ करती हैं एवं शूल तथा अतीसार को नष्ट करती है ॥ ४८-४९ ॥ १७ राल हि०-राल, रार, धूना, शाल (साखू) का निर्यास । बं०-धुना, राल, डम्मर । म०-राल पिंवली । गु०-राल । क०-सर्जंरस । तै०-सर्जंरसरुमु, सर्जं । पं०-राल, अलूँ। फा०-राल मगरबी, रातियानः । अ०-रातीनाज, कैकहर । अं०-Resin of Sal Tree (रेझिन् ऑफ़ साल ट्री)। ले०-Resina of Shorea robusta Gaertn. f. (रेझिना ऑफ़ शोरिआ रोबस्टा गार्ट.)। Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी )। शालवृक्ष के गोंद को राल कहते हैं। यह सफेदी लिये पीली किञ्चित् कालापन मिश्रित होती है। नयी अवस्था में यह रंगहीन एवं पारदर्शक होती है। इसमें तारपीन की राल के सदृश गन्ध नहीं होती तथा इसमें स्वाद भी नहीं होता। यह तैल में मिल जाती है तथा आसानी से जलती है। नोट - राल के लिये चरक सुश्रुत में सर्जरस शब्द प्रयुक्त हुआ है। शालनिर्यास शब्द चरक सुश्रुत में देखने में नहीं आता । वैद्य लोग राल से शाल की राल का व्यवहार करते हैं जो अधिकतर सिंगापुर से आती है। डाक्टरी में व्यवहार में लाई जाने वाली राल जिसे रजन (रेझिन) कहते हैं वह गन्धाबिरोजा से तारपीन के तैल निकालने के पश्चात् बचा हुआ अवशेष है। शाल (साखू) के वृक्ष का वर्णन आगे वटादिवर्ग में आया है। सर्ज वृक्ष (शाल भेद) तथा उससे प्राप्त होने वाली राल जिसे चन्द्रस कहते हैं उसका भी वर्णन वटादि वर्ग में है। गुण और प्रयोग - राल उत्तम व्रणशोधन, व्रणरोपण, रक्तस्तम्भन, ग्राही एवं जीवाणु- नाशक होती है। यह रेझिन (रजन) का अच्छा प्रतिनिधि मानी जाती है। (१) राल के मलहम का बहुत व्यवहार किया जाता है। इसके लगाने से स्थानिक रक्त- प्रवाह बढ़ता है तथा जीवाणुनाशन का भी कार्य होता है। फोड़े आदि पर लगाने से बिना पीड़ा के वे फूट कर जल्दी अच्छे हो जाते हैं। नवीन शोथ हो तो बिना फूटे ही बैठ भी जाते हैं। इसके मलहम का उपयोग खुजली, पामा, विवाई (विपादिका), पुराने व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में

२१२ \ भावप्रकाशनिघण्टुः किया जाता है। मलहम बनाने के लिये राल ४, मोम ४, तिल का तैल ४ एवं घृत ३ इन सबको जरा गरम करके एक में घोंट कर मिला दें। (२) आमवातिक पीडा एवं कटिशूल में ब्राण्डी के साथ या अंडे की सफेदी के साथ लगाने से लाभ होता है। (३) खांसी, श्वास, अतिसार, कुपचन एवं सोजाक में राल खिलाई जाती है। बच्चों के रक्त- युक्त आंव में तथा रक्ताशं में चीनी के साथ इसका अधिक अच्छा उपयोग होता है। (४) वाजीकरण के लिए १०-२० राल ई सेर दूध के साथ नित्य प्रातः सेवन की जाती है। मात्रा-४-८ रत्ती। अथ कुन्दरुः (सुगन्धद्रव्यं शल्लकीनिर्यासः ।) तस्य नामानि गुणांश्चाह कुन्दुरुस्तु मुकुन्दः स्यात्सुगन्धः कुन्द इत्यपि ॥ ५० ॥ कुन्दुरुर्मधुरस्तिक्तस्तीक्ष्णस्त्वच्यः कटुर्हरेत् । ज्वरस्वेदग्रहालक्ष्मीमुखरोगकफानिलान् ॥५१॥ कुन्दुरु (सुगन्ध द्रव्य) जो कि शल्लकी का गोंद है उसके नाम तथा गुण—कुन्दुरु, मुकुन्द, सुगन्ध तथा कुन्द ये सब कुन्दरु के संस्कृत नाम हैं। कुन्दुरु-मधुर, तिक्त तथा कटु रसयुक्त, तीक्ष्ण एवं त्वचा के लिये हितकारी होता है। यह ज्वर, स्वेद, ग्रहबाधा, अलक्ष्मी, मुखरोग, कफ और वायु को दूर करता है ॥ ५०-५१ ॥ नोट—प्राचीनों ने शल्लकी (सलई) के निर्यास को ही कुन्दुरु माना है लेकिन बाजार में मिलने वाला कुन्दुरु सलई का निर्यास न होते हुए भी उसी जाति के विदेशी वृक्ष का निर्यास है जो अफ्रीका एवं अरब से आता है। इसका व्यापार मुख्यतया बंबई में होता है। गुणों की दृष्टि से भारतीय सलई के गोंद एवं कुन्दुरु में विशेष अन्तर नहीं है। पार्थक्य के लिये भारतीय निर्यास को 'सलई गूगल' एवं विदेशी निर्यास को 'कुन्दुरु' लिखा गया है तथा दोनों का अलग २ वर्णन किया गया है। बाजार में गूगल नाम से सलई का गूगल एवं कणगूगल (गुग्गुलु) दोनों ही बिकते हैं इसलिये खरीदते समय शल्लकी निर्यास की आवश्यकता होने पर 'सलई गूगल' मांगना चाहिये एवं गुग्गुलु की आवश्यकता होने पर कणगूगल नाम से खरीदना चाहिये। सलई वृक्ष का वर्णन वटादिवर्ग में किया गया है। यद्यपि कुन्दरु का अरबी नाम लबान है तथापि लोबान या कोहबान यह अन्य द्रव्य है, उसका भी प्रसंगतः संक्षेप में वर्णन किया गया है। कुन्दुरु शाक का वर्णन आगे शाकवर्ग में किया हुआ है। १८ शल्लकी निर्यास (सलई गूगल) हि०-सलई गूगल, गूगल, लबान। बं०-सलेधूप। गु०-धूपडो। म०-सालईचा डींक। अजमेर-गंधबिरोजा। अं०-Indian olibanum or Frankincense (इण्डियन् ओलिबैनम् या फ्रैंकिन्सेन्स) । ले०-Gum resin of Boswellia serrata Roxb. (गमरेशिन ऑफ बॉस्वेलिया सेरेटा रॉक्स ) । Fam. Burseraceae (बर्सरेसी) । यह शल्लकी (सलई) वृक्ष का गोंद है। यह कुछ आर्द्र, चिपचिपा, रक्ताभ पीतवर्ण का एवं सुगंधयुक्त होता है। यह जलाने पर कणगूगल की अपेक्षा जल्दी जलता है। जल में डालने पर यह सफेद दिखलाई देता है तथा मद्यसार या जल के साथ घोटने पर सफेद घोक बनता है। नवंबर से जुलाई तक के समय इसके वृक्षों को नीचे छीलते हैं तथा जो स्राव निकलता है उसे कर्पूरादिवर्गः \ २१३ संग्रह करते हैं। ताजी अवस्था में यह कनाडा बाल्सम की तरह दिखलाई देता है। प्राचीनों ने कुन्दुरु इसे ही माना है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद, उड़नशील तैल एवं राल के समान एक अन्य द्रव्य रहता है। गुण और प्रयोग —यह स्नेहन, संसन, रक्तशोधक, कफनिःसारक, उत्तेजक, मूत्रल, आर्तव- जनन एवं त्वच्य है। इसके गुण मिष्ट तथा गूगल के समान हैं। इसका उपयोग ज्वर, स्वेद, जीर्ण कफविकार, रक्तविकार, प्रदर, रक्तातिसार, मुखरोग, कास, श्वास, मूत्रविकार, आर्तवविकार, वातनाडीसंस्थान के रोग, श्लेष्मल त्वचा के कफयुक्त विकार, पाण्डु एवं अनेक प्रकार के ग्रंथि, फोड़े एवं व्रण आदि में किया जाता है। इसका प्रयोग अन्य उपयुक्त औषधों के साथ गोली या चूर्णरूप में किया जाता है। (१) पुराने एवं गद्देदार व्रणों में टंकण, गन्धक, खैर एवं सलई गूगल का मलहम बहुत लाभदायक होता है। दुर्गंधित व्रणों में गरी का तेल या नीबू के रस में इसे मिलाकर लगाने से लाभ होता है। (२) इसको गरम जल में घिसकर गण्डमाला, ग्रन्थि, बद, संधिवात एवं अस्थिशोथ आदि में लगाया जाता है एवं खिलाते भी हैं। (३) पुराने सोजाक एवं फिरङ्ग में स्नेहन औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। (४) दुर्गन्धयुक्त श्वास में बबूल के गोंद के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। मात्रा—५-१० र०। १८ (अ) कुन्दुरु हि०-कुन्दुरु, लभान, कुन्दुर, थुस। बं०-कुन्दुरुछोटी। म०-६ (वि) सेस। सं०-कुंदरो। फा०- कुन्दुर। अ०-कुन्दुरे जकर, लबान, बस्तज। अं०-Olibanum (ऑलिबैनम् ), Frankincense (फ्रैंकिन्सेस) । ले०-Gum resin of Boswellia carterii Birdw. & other sp. (गम रेजिन ऑफ बॉस्वेलिया कार्टेराइ बर्ड, एण्ड अदर स्पीशीज) Fam. Burseraceae (बर्सरेसी) । यह शल्लकी (सलई) की ही जाति के विदेशी वृक्ष का गोंद है जो अरब तथा अफ्रीका के एबीसीनिया नामक स्थान से आता है। बाजार में कुन्दुरु के नाम से यही बिकता है एवं बम्बई में इसका आयात होता है। इसके छोटे, बड़े एवं अण्डाकार ५-२५ मि. मी. बड़े टुकड़े होते हैं जो कभी-कभी आपस में चिपके रहते हैं। इसका बाह्य स्तर मटमैला एवं पीताभ, नीलाभ या हरी आभा युक्त होता है। यह आसानी से टूट जाता है। भीतरी सतह चिकनी तथा अर्धपारदर्शक होती है। यह जलाने में जल्दी जलता है। यह सुगन्धित तथा स्वाद में कुछ कड़वा होता है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद तथा एक राल सदृश अन्य पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धि, उत्तेजक, कफनिःसारक, ग्राही तथा शोथहर है। इसके गुण सलई के गूगल के समान हैं। इसकी क्रिया श्लेष्मल त्वचा पर होती है। श्वसनसंस्थान की श्लेष्मल त्वचा पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। पाश्चात्य चिकित्सा के बाल्सम् पेरू तथा बाल्सम् टोलू के समान यह कार्य करता है किन्तु इससे आमाशय में कम प्रक्षोभ होता है। (१) इसका उत्सर्ग श्वसनसंस्थान के द्वारा होने के कारण जीर्ण कफ विकार तथा अत्यन्त कसदार कफ गिरना आदि अवस्थाओं में इसे बादाम, खर्करा तथा जल के साथ खिलाते हैं। इससे

२१४ भावप्रकाशनिघण्टुः कफ की दुर्गन्ध दूर होती है तथा कफ कम होकर खांसी कम होती है। इसका धूम्रपान भी कराते हैं। (२) सोजाक में इसको ५ २० की मात्रा में बदाम आदि के साथ या गोली के रूप में खिलाते हैं। (३) कुन्दुरू, खसखस का तेल एवं सफेद मोम इनको मन्द आंच पर पिघला कर कपड़े से छान कर इस मलहम का प्रयोग ग्रन्थि, शोथ तथा व्रणों पर किया जाता है। बच्चों के फोड़े फुन्सी जल्दी फूट कर अच्छे हो जाते हैं। पाषाणगर्भम पर लगाने से सूजन दूर हो जाती है। कार्वंकल पर इसका मलहम विशेष उपयोगी है। (४) इसको बाष्प पर जल के साथ गरम करने से एक चिकट गोंद बनाता है। इसमें अफीम, धतूरा, खुरासानी अजवायन या बेलाडोना आदि मिलाकर, मोटे कपड़े पर लगाकर इसकी पट्टी को पीड़ायुक्त अङ्गों पर लगाने से वहां की रक्तवाहिनियों का संकोच होने से तथा उस अंग की गति कम होने से पीड़ा शान्त होती है। मात्रा-१०-३० रत्ती। १८ (ब) लोहबान हिं०-लोहवान, लोवान। म०-ऊद। गु०-लोवान। अं०-Benzoin (बेन्झोइन)। ले०- Benzoinum (बेन्झोइनम्)। वृक्षनाम - Styrax benzoin Dryand (स्टाइरैक्स बेंझोइन ड्रायेंड)। यह एक प्रकार का रालयुक्त गोंद है जिसके वृक्ष भारत में नहीं पाये जाते। इसके दो प्रकार मिलते हैं। उपर्युक्त नाम के वृक्ष से प्राप्त द्रव्य सुमात्रा बेंझोइन कहलाता है एवं दूसरे वृक्ष Styrax tonkinensis (Pierre) Craib ex Hartwich (स्टाइरैक्स टॉन्किनेन्सिस) से प्राप्त द्रव्य को स्याम बेंझोइन कहते हैं। इनके अतिरिक्त इसी जाति के अन्य वृक्षों से भी यह द्रव्य प्राप्त होता है। इसमें पर्याप्त मिलावट भी की जाती है। सुमात्रा बेंझोइन में कुछ अपारदर्शक, श्वेताभ या रक्ताभ बादाम या कौड़ी के आकार के टुकड़े, रालदार रक्ताभ भूरे या धूसर भूरे द्रव्य के साथ मिले हुए रहते हैं। इसका स्वाद कुछ तीता तथा गंध हलकी किन्तु अप्रिय नहीं होती। स्याम बेंझोइन के टुकड़े विभिन्न नाप के या चौपहल तथा कुछ चिपटे होते हैं। यह बाहर से पीताभ भूरे या रक्ताभ भूरे किन्तु अन्दर से दुधिया श्वेत और अपारदर्शक होते हैं। चौपहल टुकड़ों में चमकीले रक्ताभ भूरे रंग के लंब गोल टुकड़े राल के साथ मिले हुये रहते हैं। इसमें वैनिला की तरह गंध तथा बाल्सम् का विशिष्ट स्वाद होता है। लोहबान को हलके हलके गरम करने से श्वेत वर्ण का धूँआ निकलता है जो ठंडी जगह पर रवेदार पदार्थ के रूप में जम जाता है। पोटैशियम परमननेट के घोल के साथ इसके चूर्ण को गरम करने से सुमात्रा बेंझोइन हो तो बेन्झेल्डिहाइड की हलकी गंध आती है। ५ सी. सी. लोबान का ईथरीय सत्व लेकर उसमें २, ३ बूंद गंधक का तेजाब मिलावे तो सुमात्रा बेंझोइन होने पर रक्ताभ भूरा एवं स्याम बेंझोइन में गहरा गुलाबी लाल रंग हो जाता है। ९० प्र० श० मद्यसार में पहले प्रकार का ७५% एवं दूसरे प्रकार का ९०% घुल जाता है। गुण और प्रयोग-लोबान कफ निःसारक एवं प्रतिदूषक है। पुरानी खांसी में बदाम तथा गोंद के साथ इसको देने से कफ बाहर निकलने में मदद होती है। बस्तिशोथ आदि में भी इसको देते हैं। विभिन्न प्रकार के चर्म रोग तथा व्रण आदि में इसका बाह्य प्रयोग लाभदायक है। कर्पूरादिवर्गः २१५ अथ शिलारसः । तस्य नामानि गुणांश्चाह सिह्लकस्तु तुरुष्कः स्यात्ततो यवनदेशजः । कपितैलश्च संख्यातस्तथा च कपि नामकः ॥५२॥ सिह्लकःकटुकःस्वादुःस्निग्धोष्णः शुक्रकान्तिकृत् । वृष्यःकण्ठयःस्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापहः ॥५३॥ शिलारस के नाम तथा गुण-यवनों (मुसलमानों) के देश में उत्पन्न होने से शिलारस को संस्कृत में तुरुष्क कहते हैं। सिह्लक, कपितैल, कपिनाम्रक (अर्थात् कपि के पर्यायवाची सभी शब्द शिलारस के नामान्तर हैं) ये सब शिलारस के संस्कृत नाम हैं। शिलारस-कट्टररस युक्त, स्वादु, स्निग्ध, उष्णवीर्य, शुक्रजनकं, कान्तिकारक, वृष्य तथा कण्ठ के लिये हितकारी होता है। यह स्वेद, कुष्ठ, ज्वर, दाह तथा ग्रहबाधा को दूर करने वाला होता है॥ १९ शिलारस हिं०, म०, बं०, क०-शिलारस । सिलारस । गु०-शेलारस । ता०-नेरिशरिशिप्पाल । मल०-रसमाल । ते०-शिलारसम् । मा०-शिलारस । फा०-अम्बर माइश, अस्ले लवनी । अ०-मीअः साइला, लग्नी, वृक्षनाम-जिर्व, उस्तुरक । अं०-Liquid Storax (लिक्विड स्टोरॅक्स)। ले०-(वृक्ष नाम) Liquidamber orientalis Miller (लिक्विडम्बर ओरीयण्टे- लिस् मिलर) । Fam. Hamamelidaceae (हैमॅमेलिडेसी) । शिलारस अरब देश से आता है। यह गोंद के समान एक सुगन्ध द्रव्य है। इसके वृक्ष एशिया माइनर में होते हैं। इसी वर्ग का अन्य वृक्ष ले. अल्टिञ्जिया एक्सेलसा नोरोन्हा (Alti- ngia excelsa Noronha) आसाम, भूटान, बर्मा, पूर्वी बंगाल, पेगू, चीन, मलाया और जावा आदि देशों में होता है जिससे निकले हुए शिलारस को विदेशी शिलारस का अच्छा प्रतिनिधि मानते हैं। इसका वृक्ष मध्यमाकार का अनेक शाखायुक्त; पत्ते-करतलाकार ५ खण्डयुक्त; पुष्प-पीत वर्ण के गोल गुच्छों में आते हैं। ३ या ४ वर्ष पुराने वृक्ष की छाल को चोट पहुँचाने से भीतरी छाल में स्राव जमा होता है। फिर बाहरी छाल को हटाकर भीतरी छाल को जल में उबालने से उसके साथ लगा हुआ शिलारस जल पर तैरने लगता है जिसे अलग कर लेते हैं। शिलारस का आयात प्रधानतः फ्रांस से होता है। यह मधु के समान गाढा, वजन में जल से भारी, पिलाई लिए लाल या भूरे रंग का, मुलायम, चिपचिपा तथा तैलीय राल सदृश पदार्थ है। नये शिलारस में मिट्टी के तेल जैसी गन्ध होती है लेकिन पुराना होने पर अच्छी गन्ध आने लगती है। इसका स्वाद तीता होता है। इसकी अन्य जाति के वृक्षों से भी यह प्राप्त किया जाता है। शोधन-पाश्चात्य चिकित्सा में इसको शुद्ध करके व्यवहार करते हैं। मद्यसार में इसे घोल एवं छान कर उस द्रव को उड़ जाने देते हैं तथा जो बचा रहता है उसे व्यवहार करते हैं। यह पीताभ भूरा, चिपचिपा, कुछ पारदर्शक एवं विशिष्ट सुगंध एवं स्वादयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक तैलीय द्रव के साथ मिली हुई एक राल रहती है। राल में सिनेमिक एसिड (Cinnamic acid) के साथ संयुक्त स्टोरैसिनॉल् (Storesinol) नामक द्रव्य रहता है। तैलीय द्रव पदार्थ में स्टाइरॉल् (Styrol), एथिल सिनॅमेट (Ethyl cinnamate) एवं स्टाइरॅसिन (Styracin) ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-शिलारस कफघ्न, मूत्रल, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, कण्डूघ्न, व्रणरोपक एवं व्रण- शोधक है। इसका कफघ्न धर्म सौम्य है। इसकी क्रिया लोहबान, बाल्सम् पेरू तथा बाल्सम् टोलू

२१६ भावप्रकाशनिघण्टुः सदृश होती है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुफ्फुस द्वारा होता है। कभी-कभी इससे वृक्क शोथ भी हो सकता है। औषधि तेलों को सुगन्धित करने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। चरक में वात व्याधि के वशा तैल के पाठ में 'तुरुष्क' का प्रयोग किया हुआ है। (१) जीर्ण कास आदि कफविकारों में तथा राजयक्ष्मा में इसको अण्डे की सफेदी के साथ घोंटकर शहद मिलाकर चटाते हैं। इससे फुफ्फुसों को बल मिलता है। (२) पुराना सोजाक एवं बस्तिशोथ आदि में मुलेठी के साथ इसको खिलाते हैं। (३) त्वचा के रोगों में शिंकारस का बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे जूं तथा खुजली उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं का नाश होता है। इसे चौगुने तिल के तेल में मिलाकर पामा (Scabies), सिध्म तथा जीर्ण दाहयुक्त अपरस में लगाते हैं, इससे खुजली बहुत जल्दी कम हो जाती है। क्षतज व्रणों पर अकेले इसे लगाते हैं। इससे स्थानिक रक्ताभिसरण की वृद्धि होती है तथा क्षतज दण्डाणुओं का नाश होता है। वृषण शोथ में इसको लगाकर ऊपर से तम्बाखू या धतूरे का पत्ता बाँधने से लाभ होता है। मात्रा-५-१० रत्ती।

अथ जातीफलम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलं जातिकोशं मालतीफलमित्यपि। जातीफलं रसे तिक्तं तीक्ष्णोष्णं रोचनं लघु ॥ कटुकं दीपनं ग्राहि स्वर्यं श्लेष्मानिलापहम् ॥ ५४ ॥ निहन्ति मुखवैरस्यं मलदौर्गन्ध्यकृष्णताः । कृमिकासवमिश्रासशोषपीनसहृद्रुजः ॥५५॥ जायफल के नाम तथा गुण-जातीफल, जातिकोश और मालतीफल ये सब 'जायफल' के संस्कृत नाम हैं। जायफल-रस में तिक्त होता है एवं तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, रोचक, लघु और कटुरस युक्त भी होता है तथा अग्निदीपक, ग्राही एवं बिगड़े हुए गले के स्वर को ठीक करनेवाला होता है, तथा कफ, वात, मुख की विरसता, मलकी दुर्गन्ध एवं कालापन तथा कृमि, खांसी, वमन, श्वास, शोष, पीनस और हृद्रोग इन सबों को दूर करने वाला होता है ॥ ५४-५५ ॥ २० जायफल हि०-जायफल, जायफर । बं०, गु०-जायफल । म०-जायफल, बांडा जायफल । पं०-जबंफल । तै०-जाजिकाय । क०-जाजिकै । ता०-जाडिक्कै। ब्रह्मी०-झाडि·फू । सिलो०-जडिका । मळाया-दुशपल । फा०-जौज बुया । अ०-जौजु बब्बा, जोजुत्तीय । अं०-Nutmeg (नटमेग) । लै०-Myristica fragrans, Houtt (मायरिस्टिका फ्रैग्रेन्स, हाउत) । Fam. Myristicaceae (मायरिस्टिकेसी) । जायफल-सुमात्रा, जावा, सिंगापुर, मोलूक्का, पिनांग एवं लंका तथा वेस्ट इण्डीज में अधि- कता से उत्पन्न होता है। इस देश में इसके वृक्ष से फल पाना कष्ट साध्य है। नीलगिरी पर्वत के पूर्वीय भाग में कन्दूर की घाटी में बर्डियार के सरकारी बगीचों में तथा और दक्षिण में कोर्टलम् की पहाड़ियों पर इसके पेड़ लगाये गये हैं। इसका वृक्ष-सेव के वृक्ष के समान होता है और देखने में बहुत सुहावना हरे रङ्ग का मालूम पड़ता है। पत्ते-२ से ५ इञ्च तक लम्बे, १॥ इञ्च तक चौड़े, चर्मवत्, लंबे पर्णवृन्त से युक्त, अंडाकार या आयताकार भालकार तथा हरुके पीले-भूरे से रंग के होते हैं। फूल-छोटे-छोटे सफेद रङ्ग के

कर्पूरादिवर्गः २१७ गोलाकार आते हैं। फल-गोल, अण्डाकार १॥ से २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ या पीताभ तथा पकने पर दो फांकों में फट जाते हैं। इनके फटने पर कड़े आवरण से युक्त जायफल (सूखे हुए बीज) को घेरे हुये जावित्री का लाल वर्ण का वेष्टन दिखाई देता है। जावित्री के अन्दर जायफल रहता है जिसका औषध में व्यवहार किया जाता है। जायफल अंडाकार, गोल तथा एक इञ्च के घेरे में होता है। बाहर से यह खाकीपन लिये हुए भूरा तथा सिकुड़ा हुआ दिखलाई पड़ता है और भीतर का रङ्ग मैला गुलाबी जिसमें लालिमा लिये हुए भूरे रंग के तंतुओं का जाल होता है। इसकी गन्ध एक स्वतन्त्र प्रकार की तेज और स्वाद सुगन्ध युक्त कड़वा होता है। औषध के अतिरिक्त जायफल तथा इसके तैल का उपयोग मसाले, साबुन तथा सुगंधि आदि में किया जाता है। रासायनिक संगठन-जायफल में ५-१५% एक पतला हल्के पीले रंग का उड़नशील तैल पाया जाता है जो इसमें का कार्यकारी तत्त्व है। इसमें २४-४०% एक स्थिर तैल भी होता है जिससे साबुन की तरह गाढ़ा एक स्नेहिक पदार्थ प्राप्त होता है। इसे बांडा साबुन या नटमेग- बटर (Nutmeg-butter) कहते हैं। इसकी पीले रंग की साबुन की तरह बट्टियां बिकती हैं। इसके स्नैहिक अम्लों में प्रधानतया (करीब ६१%) मायरिस्टिक एसिड (Myristic acid) रहता है। इनके अतिरिक्त जायफल में सुगन्धि बाल्सम्, स्टार्च तथा रेशेदार पदार्थ पाये जाते हैं। इसके उड़नशील तैल में मुख्यतया यूजीनॉल (Eugenol) तथा आइसो यूजीनॉल (Iso-eugenol) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-जायफल तथा इसका तैलं सुगन्धि, ग्राही, दीपन, वातानुलोमक, उत्तेजक, मादक, पौष्टिक, वाजीकर, स्तंभन, मुख दौर्गन्ध्यहर तथा वेदना स्थापन है। इसके सेवन के पश्चात् आमाशयिक पाचक रसों की वृद्धि होने से भूख बढ़ती है तथा पाचन सुधरता है एवं वायु का अनु- लोमन भी होता है। अधिक मात्रा में इसका मस्तिष्क पर प्रभाव कपूर के विषैले परिणाम के सदृश होता है। गतिनियंत्रक केन्द्र की उत्तेजना से अपस्मार सदृश आक्षेप आते हैं। यह तीव्र संज्ञाहर (Nar- cotic) है तथा इससे चक्कर तथा संन्यास आदि उत्पन्न हो जाता है। इसका प्रयोग कुपचन, अग्निमांद्य, आध्मान, अतिसार, हल्लास, वमन, गले के रोग, कफ तथा वातविकार, हृद् दौर्बल्य, क्लीबत्व, शीघ्रपतन एवं अनिद्रा आदि में किया जाता है। विरेचक औषधों के ऐंठन, मरोड़ आदि दुष्परिणामों को दूर करने के लिये तथा अन्य उत्तेजक एवं वातानु- लोमक औषधों के निर्माण में इसके तेल का पाश्चात्य चिकित्सा में बहुत उपयोग किया जाता है। (१) उदरशूल, अतिसार एवं बच्चों के आमातिसार आदि में इसे भूनकर नशा आने की मात्रा में देते हैं। वातानुलोमक तथा उत्तेजक गुणों के लिये इसके तेल को मिश्री के साथ खिलाते हैं। अजीर्ण में प्यास बहुत लगे तथा वमन होता हो तो इसका हिम लाभदायक होता है। (२) अफीम के साथ अनेक स्तंभक योगों में इसका उपयोग किया जाता है। (३) शिरःशूल, नाड़ीशूल, प्रसव कालीन कटिशूल, अंगघात तथा विपादिका में इसको जल में घिसकर लगाने से लाभ होता है। व्यंग तथा नीलिमा में इसको जल में घिसकर लगाया जाता है। मुखदुर्गन्धि दूर करने के लिये इसे चवाते हैं।- (४) इसके तैल में ओलिभ ऑयल मिलाकर जीर्ण आमवात में मालिश की जाती है। तैल से दंतशूल में काम होता है। इसका गाढा तैल वेदनाहर होता है तथा जीर्ण संधिशोध, मोच

२१८ भावप्रकाशनिघण्टुः एवं मरोड़ में मालिश किया जाता है। विसूचिका में हाथ एवं पैरों की ऐठन में भी इसके मलने से लाभ होता है। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—बंबई जायफल, रामफल या जंगली जायफल नाम से मायूरि- स्टिका मलबारिका लॅम (Myristica malabarica Lam.) के फलों को लोग इसके स्थान पर व्यवहार करते हैं इसके वृक्ष कोंकण, कर्नाटक तथा उत्तर मलबार प्रान्तों में पाये जाते हैं। इससे जो पत्री निकलती है उसे रामपत्री या बंबई की जायपत्री कहते हैं। ये जंगली जायफल अधिक लंबे, कम चौड़े, किंचित् मुलायम एवं करीब २ गंधहीन होते हैं। ये जायफल की अपेक्षा हीन गुण वाले होते हैं। कभी २ खराब जायफल तथा मिट्टी आदि मिलाकर सांचे के द्वारा बने हुवे नकली जायफल भी बाजार में बिकते हैं। मात्रा—चूर्ण २-८ र०; तैल १-५ बूंद ।

अथ जातीपत्री । तस्य नामानि गुणाँश्चाह जातीफलस्य त्वक् प्रोक्ता जातीपत्री भिषग्वरैः ॥ ५६ ॥ जातीपत्री लघुः स्वादुः कटूष्णा रुचिवर्णकृत् । कफकासवमिश्रासतृष्णाकृमिविषापहा ॥५७॥ जावित्री के नाम तथा गुण—वैद्यों में जो श्रेष्ठ हैं वे लोग 'जायफल' के छिल्के को ही 'जावित्री' कहते हैं। जातीपत्री या जातिपत्री और जातिकोष आदि संस्कृत नाम 'जावित्री' के हैं। जावित्री-लघु, स्वादिष्ट, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, रुचिकारक तथा वर्णकारक होती है एवम् यह कफ, खांसी, वमन, श्वास, तृष्णा, कृमि और विषविकार इन सबों को दूर करने वाली भी होती है ॥ २१ जावित्री हि०-जावित्री, जायपत्री। बं०-जायित्री, जैत्री । म०-जायपत्री । गु०-जावंतरी । क०-जाय- पत्री । ते०-जातिपत्री । फा०-बजब़ाज । अ०-बस्वास (सः)। अं०-Mace (मेस)। ले०- Myristica fragrans Houtt (मायूरिस्टिका फ्रॅग्रेन्स आउट)। Fam. Myristicaceae (मायूरिस्टिकेसी)। जिस वृक्ष से जायफल उत्पन्न होता है उसी से जावित्री भी उत्पन्न होती है। इस वृक्ष के वास्तविक फल के भीतर के बीज (जायफल) से लिपटा हुआ झालरङ्ग का जालीदार जो वेष्टन दिखाई देता है वही जावित्री है। अन्य वानस्पतिक वर्णन जायफल के साथ पहले किया जा चुका है। रासायनिक संगठन—इसमें जायफल की तरह ही एक उड़नशील तैल ८-१७% पाया जाता है। इसके अतिरिक्त स्थिर तैल, राल, वसा, शर्करा, डेक्स्ट्रीन एवं गोंद आदि पदार्थ इसमें होते हैं। गुण और प्रयोग—इसके गुण जायफल के समान होते हैं। यह दीपन, पाचन, वातानु- लोमक, कफहर, रुचिकर, वर्ण्य एवं वृष्य है। इसका उपयोग कास, कफयुक्त श्वास, क्षयरोग, मन्दज्वर, वमन, आंतों के जीर्ण विकार, विसूचिका एवं कृमि आदि में किया जाता है। मात्रा—२-८ र० ।

कर्पूरादिवर्गः २१६ अथ लवङ्गम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह लवङ्गं देवकुसुमं श्रीसंज्ञं श्रीप्रसूनकम् । लवङ्गं कटुकं तिक्तं लघु नेत्रहितं हिमम् ॥ ५८ ॥ दीपनं पाचनं रुच्यं कफपित्तास्रनाशनम् । तृष्णां छर्दि तथाऽऽध्मानं शूलमाशु विनाशयेत् । कासं श्वासञ्च हिक्काञ्च क्षयं क्षपयति ध्रुवम् ॥ ५९ ॥ लौंग के नाम तथा गुण—लवङ्ग, देवकुसुम, श्रीसंज्ञ (लक्ष्मीवाचक सम्पूर्ण शब्द लवङ्गवाचक हैं) और श्रीप्रसूनक ये सब 'लौंग' के संस्कृत नाम हैं। लौंग—कटु तथा तिक्त रस युक्त, लघु, नेत्र के लिये हितकर, शीतवीर्य, अग्नि को दीप्त करने वाली, पाचक एवम् रुचिकारक होती है तथा कफ, पित्त, रक्तविकार, तृषा, वमन, आध्मान, शूल, कास, श्वास, हिचकी एवम् क्षय इन सब रोगों को प्रायः शीघ्र तथा निश्चय दूर करती है ॥ ५८-५९ ॥ लौंग हि०-लौंग, लौंग, लवंग । बं०, म०-लवंग । गु०-लवींग । क०-लवंग कलिका, लंग । ते०-करवप्पू, लवंगमु । ता०-किरांडु । मा०-लौंग । फा०-मेखक । अ०-करन्फुल, करन्फूल । अं०-Cloves (क्लोव्स्) । ले०-Caryophyllus aromaticus Linn. (कॅरियोफालस् एरोमॅटिकस् लिन.); Eugenia aromatica Kuntze (यूजेनिया एरोमॅटिका कुंझे); Syzy- gium aromaticum (Linn.) Merr. & L. M. Perry (सिझिगियन् एरोमॅटिकम् (लिन.) मेर. पेरी) । Fam. Myrtaceae (मिर्टेसी)। इसका वृक्ष मोलक्का द्वीप में नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होता है। झंजिबार तथा पेम्बा में इसकी बहुत खेती की जाती है तथा करीब ९०% लौंग की पूर्ति वहीं से होती है। पेनांग, मेडागास्कर, मॉरिशस् एवं सीलोन आदि स्थानों में भी इसकी खेती की जाती है। भारतवर्ष में दक्षिण भारत में अल्प मात्रा में इसकी खेती का प्रयत्न किया गया है। इसके वृक्ष-प्रायः १२-१३ हाथ ऊँचे और सतेज होते हैं तथा देखने में बहुत सुहावने लगते हैं। काण्ड-इसकी लकड़ी कठोर होती है तथा इस पर धूसर वर्ण की चिकनी छाल होती है। पत्ते-अभिमुख, सवृन्त, ४ इञ्च लम्बे, २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार-आयताकार; फलकमूल एवं अग्र दोनों पतले एवं लम्बे; पत्रतट अखण्ड किन्तु लहरदार एवं मध्य नाड़ी के दोनों तरफ अनेक समानान्तर नाडियाँ होती हैं। पत्ते चमकीले हरे रंग के होते हैं तथा मसलने से इनमें सुगन्ध आती है। पुष्प-हलके नीलारुण (Purple) रंग के, ६ मि० मि० लम्बे तथा अत्यन्त तीव्र आह्लादकारक सुगन्ध वाले होते हैं। इस वृक्ष की सुखी हुई पुष्प कलिकाओं को लौंग कहा जाता है। ये पहले हरी होती हैं। बाद में जब इनका रंग किरमिजी हो जाता है तब इन्हें वृक्षों से तोड़ कर सुखा लिया जाता है। इसी समय इनमें तैल की मात्रा अधिकतम रहती है। लौंग १०-१७′५ मि० मि० लम्बी तथा रक्ताभ बादामी रंग की होती है। इसके नीचे का भाग जो हायपैन्थियम् (Hypanthium) से बना होता है वह चौकोर तथा कुछ चपटा होता है तथा नख से दबाने पर उसमें से तैल निकलता है एवं इसके अग्र भाग में दो कोष रहते हैं जिनके अन्दर अक्षलग्न जरायु से लगे हुए अनेक बीजभव (Ovule) होते हैं। लौंग के ऊपर के भाग में मोटे, नुकीले तथा फैले हुए ४ बाह्यदल होते हैं जिनके बीच में गुम्बजाकृति हल्के रंग के, न फैले हुए, पतले तथा अनियतारूढ़ (Imbricate) ४ अन्तर्दल होते हैं। अन्तर्दलों के अन्दर अनेक अन्दर की तरफ मुड़े हुए पुंकेशर होते हैं तथा एक स्त्री केशर होता है जिसका कुक्षिवृन्त सीधा तथा कड़ा होता है। लौंग में अत्यन्त तीव्र मसालेदार गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कटु होता है।

२२० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसमें १५-२०% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें ८५-९२% युजेनॉल (Eugenol, $C_{10} H_{12} O_2$) रहता है। इसके अतिरिक्त लौंग में टैनिन् (गैलोटैनिक ॲसिड् १३%) एवं फाइटोस्टेरॉल सदृश एक कैरियोफाइलीन् (Caryophyllene) नामक गन्धहीन, स्वादहित, रंगहीन रवेदार पदार्थ पाया जाता है। लौंग के तैल में फेनॉल के समान युजेनॉल नामक एक महत्त्व का पदार्थ रहता है। इसके अतिरिक्त तैल में ॲसिटिल् युजेनॉल (Acetyl eugenol १०%), मेथिल् सॅलिसिलेट् (Methyl salicylate), मेथिल ॲमिलकीटोन् (Methylamylketone, $C_5 H_{11} COCH_3$); हॅनिलिन् (Vanillin), कॅरियोफाइलीन् (Caryophyllene) तथा फफ्यू'रॉल् (Furfurole, $C_5 H_4 O_2$) ये पदार्थ पाये जाते हैं। यह तैल ताजी अवस्था में रंगहीन या हलके पीले रंग का होता है लेकिन वह पुराना होने पर या खुला रखने पर गहरे रक्ताभ बादामी रंग का हो जाता है। गुण और प्रयोग—लौंग सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, अग्निदीपक, उद्वेष्टनविरोधि, कफघ्न, मूत्रजनन, रुचिकर, दुर्गन्धनाशक, श्वेतकणवर्धक, वृष्य एवं कृमिघ्न है। यह स्थानिक वेदनाहर, व्रणरोपक एवं व्रणशोधक है। इसका उपयोग उदरशूल, आध्मान, अजीर्ण, कास, तृष्णा, वमन, विसूचिका, क्षय तथा सुगन्धि पदार्थ के रूप में मसाले आदि में किया जाता है। (१) लौंग के फांट (४० में १) को १ से २ तोला की मात्रा में विसूचिका में प्यास की शान्ति के लिये देते हैं। इससे जी मिचलाना भी कम होता है तथा वमन कम हो जाता है। गर्भिणी- वमन में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाया जाता है। (२) अजीर्ण, आध्मान एवं उदरशूल आदि में इसका फांट या चूर्ण खिलाया जाता है। (३) गले की सूजन, कुकास, कास, मुख एवं श्वास की दुर्गन्ध तथा जीमिचलाना आदि में लौंग दिये पर भून कर या उसी तरह मुख में रख कर चूसते हैं। इससे मसूड़े मजबूत होते हैं। (४) प्रतिश्याय एवं मस्तकश्लूल में लौंग को गरम जल में घिस कर ललाट पर लगाते हैं। लौंग का तैल—इसके गुण भी लौंग के समान ही होते हैं। इसका उत्सर्ग वृक्क, चर्म, श्वसनसंस्थान, आंत्र तथा यकृत् आदि से होता है। चरक-सुश्रुत में इसका उल्लेख नहीं मिलता। सिगरेट के लिये प्रयुक्त तम्बाकू को सुगन्धित करने के लिये जावा, सुमात्रा तथा जापान आदि स्थानों में इसका उपयोग किया जाता है। अनेक ओषधों को सुगन्धित करने के लिये तथा विरेचक ओषधों के साथ मरोड़ आदि न हो इसलिये इसका उपयोग करते हैं। मच्छर भगाने के लिये सोते समय इसे थोड़ा सा खुले अङ्गों पर लगा देने से मच्छर नहीं काटते। तैलों को सुगन्धित करने के लिये तथा पदार्थ संरक्षण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। इसका बाह्य प्रभाव कपूर के सदृश होता है। यह स्थानिक उत्तेजक, त्वग्दागकारक, प्रतिशोथक, अल्पवेदनाहर, कृमिघ्न, सड़न को रोकने वाला एवं प्रतिदूषक है। (१) मिश्री पर ढाल कर या गोंद के साथ मिश्रण के रूप में इसको आन्त्रिकशूल तथा आध्मान में खिलाते हैं (२) क्षयजकास में कफ कम करने के लिये इसको खिलाते हैं। (३) दन्तशूल में दांत के गड्ढे में इसका फाहा रखने से बहुत लाभ होता है। सन्धिपीडा, गुंमसी, कटिशूल एवं वातनाडीशूल आदि में इसको लगाया जाता है। तिलाओं में इसका प्रयोग किया जाता है। कर्पूरादिवर्गः २२१ प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—बाजार में तैल निकाली हुई लौंग भी बिकती है। इसे नख से दबाने पर तैल नहीं निकलता तथा उबले जल में डालने पर यह तैरती है एवं इसका रंग भी कुछ हलका रहता है। लौंग के चूर्ण में डंठल के टुकड़े का चूर्ण मिला दिया जाता है। लौंग के पक फल भी मदरक्लोह्वस (Mother cloves) नाम से बिकते हैं लेकिन उनमें तैल बहुत कम रहता है तथा उनके बीज में रहने वाले बड़े स्टार्च के कण से इनकी पहचान की जा सकती है। टूटे हुए पुंकेसर, अन्तर्दल एवं विकसित फूल जिनके पुंकेसर एवं अन्तर्दल निकाल लिये गये हों इनका मिश्रण लौंग के चूर्ण में व्यापारी कर देते हैं। लौंग में १५% से कम तैल नहीं होना चाहिये। मात्रा—चूर्ण १-२॥ रत्ती; तैल १-३ बूंद। अथ स्थूलैला (बड़ी इलायची) तस्या नामानि गुणांश्चाह एला स्थूला च बहुला पृथ्वोका त्रिपुटाऽपि च ॥६०॥ भद्रैला बृहदेला च चन्द्रबाला च निष्कुटिः । स्थूलैला कटुका पाके रसे चानलकूल्लघुः १ ॥ रूक्षोष्णा श्लेष्मपित्तास्त्रकण्डूश्वासतृषाऽपहा । हृल्लासविषवस्त्यामयरशिरोरुग्वमिकासनुत् ॥६२॥ बड़ी इलायची के नाम तथा गुण—एला, स्थूला, बहुला, पृथ्वीका, त्रिपुटा, भद्रैला, बृहदेला, चन्द्रबाला, निष्कुटि तथा स्थूलैला ये सब संस्कृत नाम 'बड़ी इलायची' के हैं। बड़ी इलायची- पाक तथा रस (स्वाद) में कड़ु होती है एवं अग्निजनक, लघु, रूक्ष और उष्णवीर्य होती है। यह कफ, पित्त, रक्तविकार, कण्डू (खुजली), श्वास, तृषा, हृल्लास (वमन मालूम पड़ना अर्थात् जीमिचलाना), विष एवं बस्ति, मुख तथा शिर सम्बन्धी रोग, वमन तथा खांसी को दूर करने वाली होती है ॥६०-६२॥ २३ बड़ी इलायची हि०—बड़ी इलायची, पूर्वी इलायची, लाल इलायची। बं०—बड़ा इलाची। म०—मोठी एलची, मोठे वेलदोड़े। गु०—एलचा, मोटी एलची। तै०—पेद्दायेलकी। ता०—पेरेलम, पेरिय एलक्के। क०—डोड्डा एलाक्की। फा०—हीलकलों। अ०—काकुले कुबार, काकुले जंगी। अं०—Nepal or Greater Cardamom (नेपाल या ग्रेटर कार्डैमोग्); Amomum (अॅमोमम् )। ले०—Amomum subulatum Roxb. (एमोमम् सबुलॅटम् राक्स)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबरेसी)। इसकी खेती नेपाल, बंगाल, सिक्किम तथा आसाम के पहाड़ी मार्गों के पास में गीली भूमि में की जाती है। इसका क्षुप-आमा हल्दी के समान होता है और उसकी जड़ के नीचे कन्द रहता है। पत्रदण्ड-३-४ फुट ऊँचा होता है। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३-४ इञ्च चौड़े, आयताकार-भालाकार, हरे एवं चिकने होते हैं। फूल-अवृन्तकान्डज ब्यूहों (Spike) में नलिकाकार सफेद रङ्ग के आते हैं। फल-किञ्चित लम्बाई लिये गोल, १ इञ्च तक लम्बे तथा लाल भूरे रङ्ग के होते हैं। बीज-शर्करायुक्त गाढ़े गूदे के कारण आपस में चिपके हुए अनेक बीज प्रत्येक कोष में होते हैं। १. 'चानिलकुल्लघुः' इति पाठो० अशुद्धम् ।

२२२ भावप्रकाशनिघण्टुः बड़ी इलायची की बहुत-सी उपजातियाँ भारतवर्ष में पाई जाती हैं जिनमें से (ले०) अमोमम् ॲरोमॅटिकम् राक्स (Amomum aromaticum Roxb. ); हिं०, बं०-मोरंग इलायची पूर्वी बंगाल तथा आसाम के आस-पास बहुत उत्पन्न होती है। यह बंगाल कार्डेमोम् (Bengal Cardamom) नाम से भी कही जाती है। हिमालय की तराई में आसाम तथा बंगाल के आर्द्र प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसके क्षुप-के-२-३ फीट लम्बे काण्ड, राइजोम से एक साथ गुच्छों में निकलते हैं। पुष्प-हलके पीले रंग के अवृन्तकाण्डज व्यूहों में निकलते हैं। फल-अभि- अण्डाकार या लट्वाकार करीब बड़े जायफल के इतने बड़े कुछ खुरदरे तथा ३ हिस्सों में विभक्त होते हैं। बीज-प्रत्येक कोष में अनेक तथा करीब ३ मि० मि० लम्बे होते हैं। रासायनिक संगठन- बड़ी इलायची में एक हलके पीले रंग का उडनशील तैल पाया जाता है। इस तैल में सिनिओलू (Cineol) नामक पदार्थ बहुत रहता है। गुण और प्रयोग-यह किंचित् उष्ण, पाचक, सुगन्धि, उत्तेजक एवं वातानुलोमक है। इसके गुण छोटी इलायची के सदृश हैं तथा उसके प्रतिनिधि रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीन ग्रन्थों में बड़ी एला का बहुत कम प्रयोग किया गया है। इलायची के स्थान में हमेशा छोटी इलायची का ही प्रयोग करना चाहिये जबतक कि विशेष रूप से बड़ी इलायची के लेने का निर्देश न हो। अनेक कड़वी, उत्तेजक तथा विरेचक औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके तैल का उपयोग सुगन्ध के लिये करते हैं। मन्दाग्नि, आध्मान, शूल, अतिसार, यकृच्छोथ तथा मूत्रकृच्छ्र में इसका उपयोग किया जाता है। (१) दाँत तथा मसूड़ों के विकारों में इसके क्वाथ से कुल्ला कराया जाता है। (२) पाचन संस्थान के कुछ विकारों में जिनमें आन्त्रिक स्राव गाढ़े तथा कम हो जाते हैं इसको ५२० की मात्रा में खिलाते हैं। इससे पित्त का स्राव ठीक होकर यकृत्शोथ कम होता है। (३) मूत्रक औषध के रूप में अश्मरी में इसको खरबूजे के बीज के साथ खिलाते हैं। (४) नाड़ीशूल में २ माशे की मात्रा में इसको क्विनीन के साथ देने से लाभ होता है। मात्रा-५-१५ र० । अथैला (गुजराती इलायची) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह सूक्ष्मोपकुञ्चिका तुत्था कोरङ्गी द्राविडी त्रुटिः । एला सूक्ष्मा कफश्वासकासार्शोमूत्रकृच्छ्रहृत् । रसे तु कटुका शीता लघ्वी वातहरी मता ॥ ६३ ॥ छोटी इलायची (गुजराती इलायची) के नाम तथा गुण - सूक्ष्मा, उपकुञ्चिका, तुत्था, कोरङ्गी, द्राविडी, त्रुटि तथा सूक्ष्मका ये सब 'छोटी इलायची' के संस्कृत नाम हैं। छोटी इलायची-कफ, श्वास, कास, अर्श (बवासीर) और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है तथा कटु रसयुक्त, शीतवीर्य, लघु एवं वातनाशक होती है ॥ ६३ ॥ २४ छोटी इलायची हि०-छोटी इलायची, गुजराती इलायची, चौहरा इलायची, सफेद इलायची । बं०-छोट इलायच । गु०-एलची कागदी, एलची, मलबारी एलची । म०-बारीक वेलदोडे, एलची। ते०-


कर्पूरादिवर्गः २२३ एलाकि । ता०-एलाक्के, चिन्न एलं । मा०-छोटी इलायची । क०-एलाक्कि । फा०-हीलववा, हील, खैरबवा, इलायची खुर्द, हीलउन्सा । अ०-काकुलह सिगार, शूशमीर । आं०-Cardamom Fruit (कार्डेमोम् फ्रूट ); Lesser Cardamom (लेसर कार्डेमोम् ) । ले०-Elettaria carda- momum Maton (इलेट्टेरिआ कार्डेमोमम् मेटन )। Fam. Zingiberaceae झिंज़ीबरेसी ) । यह पश्चिम तथा दक्षिण भारत में, कनारा, मैसूर, कुर्ग, वैनाड, ट्रावंकोर तथा कोचीन में आर्द्र पहाड़ी जंगलों में उत्पन्न होती है। सीलोन तथा दक्षिणी प्रायःद्वीप के चाय, कॉफी एवं रबर के बगानों में इसकी खेती की जाती है। बर्मा के जंगलों में भी यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-अदरख के क्षुप के समान तथा बहुवर्षायु होता है और इसकी जड़ के नीचे मोटा, मांसल तथा अनुप्रस्थ फैला हुआ राइजोम (मौमिक काण्ड ) रहता है। राइजोम से ८-२० की संख्या में सीधे, चिकने, हरे रंग के चमकीले तथा ६-९ फीट ऊँचे काण्ड निकलते रहते हैं जिन पर एकान्तरित पत्र लगे होते हैं। पत्ते-१-२ फुट लम्बे, ३ इञ्च तक चौड़े, आयताकार-भालाकार तथा कोषाकार होते हैं। पुष्पद्ण्ड-कांड के आधार भाग से १-२ फीट लम्बा पुष्पद्ण्ड निकला रहता है जो जमीन पर फैला रहता है। पुष्प-पुष्पव्यूहों में तथा किंचित् नील लोहिताभ वर्णयुक्त छोटे-छोटे होते हैं। पंखड़ियों के ओष्ठ श्वेत होते हैं। फल-हलके पीले या हरिताभ पीत रङ्ग के, १-२ से० मि० लम्बे, अण्डाकार, बड़े फल कुछ तिकोने, ३ कोषवाले, अनेक महीन खड़ी धारियों से युक्त सामान्य स्फोटी फल (Capsule) होते हैं जिनका स्फुटन पाश्विक सन्धियों (Loculici- dal) पर होता है। बीज-फलों के अन्दर अनेक छोटेबीज होते हैं जो प्रत्येक कोष में दो-दो कतारों में एवं अक्षलक्ष्य जरायु से लगे हुए एक साथ रहते हैं। यह हलके या गहरे रक्ताभ भूरे रङ्ग के, ४ मि० मि० लम्बे, ३ मि० मि० चौड़े, अनियमित कोण युक्त, कड़े एवं ६-८ आड़ी झुर्रियों (Rug- ae-रूगी) से युक्त होते हैं। प्रत्येक बीज महीन वर्णहीन आवरण (Aril-ॲरिल्) से युक्त रहता है। इसका स्वाद कुछ कटु तथा शीतल एवं गन्ध मनोहर होती है। इलायची के प्रयोग के समय ही उसके बीजों को निकालना चाहिये। निकाल कर रखे हुए बीज खराब हो जाते हैं। भेद-(१) मैसूरी इलायची ही अधिकतर बिकती है। यह अण्डाकार, १०-२० मि० मि० लम्बी, हलके क्रीम के रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा मजबूत रहती है। यह मलाबारी इला- यची की अपेक्षा अधिक टिकाऊ रहती है। (२) मलबारी इलायची कुछ छोटी, कम चौड़ी, मरी हुई एवं लम्बाई में झुर्रीदार रहती है। (३) मंगलोरी इलायची, मलबारी इलायची की ही तरह होती है किन्तु यह गोल, बड़ी तथा इसकी सतह खुरदरी होती है। (४) अलेप्पी इलायची, मलबारी इलायची की ही सदृश किन्तु हरी या हरिताभ पीत रङ्ग की रहती है। रासायनिक संगठन-छोटी इलायची के बीजों में ३-८% एक उड़नशील तैल पाया जाता है जिसमें प्रधान रूप में टर्पीनीन (Terpinene ) एवं टर्पिनिओल (Terpineol ) रहते हैं। इसमें टर्पिनिल अॅसिटेट (Terpinyl acetate ) एवं अल्प मात्रा में सीनिओल् (Cineol ) भी पाये जाते जाते हैं। उड़नशील तैल के अतिरिक्त बीजों में ३-४% स्टार्च, नाइट्रोजन युक्त गोंद एवं पीत रंजक द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-छोटी इलायची दीपन, पाचन, रोचन, मूत्रल, वातानुलोमक, उत्तेजक एवं सुगन्धि है। अन्य सुगन्धि पदार्थों के साथ वातानुलोमक औषधों में तथा विरेचक औषधों के साथ मरोड़ न हो इसलिये इसका उपयोग किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा में जोरा, दारुचीनी,

२२४ भावप्रकाशनिघण्टुः कोचीनेल (इन्द्रगोप) एवं ग्लीसरीन के साथ छोटी इलायची का बना हुआ मद्यसारीय टिंक्चर औषधों को सुगन्धित एवं रंजित करने के लिये बहुत व्यवहार में लाया जाता है। छोटी इलायची का उपयोग श्वास, कास, क्षय, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण, अतिसार, आध्मान एवं उदर शूल में किया जाता है। (१) पचन नलिका के शिथिलता प्रधान रोगों में तथा दाहयुक्त रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आंत्रिक रस की उत्पत्ति कम होती हो तथा पित्त का उचित रूप से स्राव न होता हो ऐसी अवस्थाओं के लिये यह अमूल्य औषध है। वमन तथा हृल्लास में इसका फांट पिलाते हैं। उदर शूल, आध्मान एवं मरोड आदि में इलायची २ ड्राम, धनियां २ ड्राम, दालचीनी ४ ड्राम, मुनक्का १ औंस, रक्त चन्दन २ ड्राम एवं मद्यसार (४५%) १ पांइट इसका टिंक्चर २-८ बूंद देने से बहुत लाभ होता है। केले के अजीर्ण में इलायची का उपयोग किया जाता है। आंव तथा प्रवाहिका में मक्खन के साथ इसका चूर्ण खिलाया जाता है। यकृत शोथ में ५ र० की मात्रा में इससे बहुत लाभ होता है। (२) वृक्क के पीडायुक्त विकारों में खरबूजे के बीज के साथ इसे खिलाते हैं। इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है। सोजाक में तथा वाजीकरण के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। मूत्रकृच्छ्र में आंवले के रस के साथ या दही के पानी के साथ इसका चूर्ण लाभदायक होता है। (३) नेत्र रोगों में इसके सूक्ष्म चूर्ण को बकरी के मूत्र की भावना देकर अञ्जन कराया जाता है। (४) हृदय की धड़कन में पिप्पलीमूल के साथ इसको घी में मिला कर खिलाते हैं। गुल्म में भी इससे लाभ होता है। (५) नाडीशूल में १५ र० की मात्रा में छोटी इलायची का चूर्ण थोड़ी सी क्विनीन के साथ मिला कर देने से बहुत लाभ होता है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ियों की थकावट में यह लाभदायक होती है। (६) चक्कर आते हों तो छिलके सहित इसका क्वाथ गुड़ मिला कर पिलाया जाता है। प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण- लंका से आने वाली एक जंगली छोटी इलायची होती है जो कुछ लम्बी, सिकुड़ी हुई एवं गहरे धूसरित भूरे रंग की होती है। इसके बीजों में करीब ४ झुर्रियां होती हैं। एक अन्य अमोमम् केपुलेगा रंग्गे, बर्कि (Amomum kepulaga Sprague & Bur- kill) नामक क्षुप से प्राप्त इलायची के बीजों में कपूर की तरह स्वाद रहता है तथा उसमें करीब १४ खण्डित झुर्रियां रहती हैं। इसमें बूरा लगी हुई, अपक्व, कीड़ों द्वारा खाई हुई एवं फटी हुई इलायची का व्यामिश्रण रहता है। मात्रा— चूर्ण ५-१५ रत्ती ।

अथ त्वक्पत्रम् (तज)। तस्य नामानि गुणांश्चाह

त्वक्पत्रञ्च वराङ्गं स्याद् भृङ्गं चोचं तथोत्कटम् । त्वचं लघूष्णं कटुकं स्वादु तिक्तञ्च रूक्षकम् ॥ पित्तलं कफवातघ्नं कण्डूवाम्यहृचिनाशनम् । हृद्वस्तिरोगवातार्शः कृमीपोनसशुक्रहृत् ॥ ६५ ॥ तज के नाम तथा गुण— त्वक्पत्र, वराङ्ग, भृङ्ग, चोच, उत्कट और त्वच ये सब 'तज' के संस्कृत नाम हैं। तज-लघु, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त रस युक्त, स्वादिष्ट और रूक्ष होती है एवं


कर्पूरादिवर्गः २२५ यह पित्त उत्पन्न करने वाली, कफ तथा वात को दूर करने वाली, खुजली, आम, अरुचि, हृद्रोग, बस्तिसम्बन्धी रोग, वात, अर्श, कृमि, पीनस तथा शुक्र का भी नाश करने वाली होती है ॥६४-६५॥ तज— दालचीनी का ही एक भेद है। दालचीनी के अनेक जातियों के वृक्ष पाये जाते हैं। लंका से आने वाली दालचीनी पतली छाल वाली होती है जो सबसे अच्छी होती है। इसके वृक्ष को (लॅ.) सिनेमोमम झैलैनिकम् कहते हैं। उसका वर्णन आगे स्वतंत्र किया गया है। एक दालचीनी चीन देश से आती है जिसके वृक्ष को (लै.) सिनेमोमम् कॅशिया कहा जाता है। इसी के जाति का एक वृक्ष भारतवर्ष में पाया जाता है जिसे (लै.) सिनेमोमम् तमाल कहते हैं। इसी की छाल को कुछ लोग तज कहते हैं तथा इसके पत्तों को तमालपत्र (तेजपत्र) कहते हैं। इसको कहीं-कहीं दालचीनी नाम से ही या असली सिंगापुरी दालचीनी में मिलावट करके बेचते हैं क्योंकि सिंगापुरी दालचीनी बहुत मंहगी होने के कारण बजार में कम आती है। इसके अनेक जाति के वृक्ष होने के कारण भिन्न-भिन्न लेखकों ने दालचीनी, तज तथा तमालपत्र इनके लैटिन नाम अलग-अलग दिये हैं। प्रायः मोटी छाल को तज एवं पतली छाल को दालचीनी कहा जाता है। तेजपत्र और तज एक ही वृक्ष के छाल और पत्र हैं। कुछ इन्हें अलग-अलग वृक्षों के मानते हैं। यहां पर वर्णन चीनी दालचीनी का किया जा रहा है। तेजपत्र तथा असली दालचीनी का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। कुछ लोग मोटी जाति की तज को नालुका नाम से भी बेचते हैं जिसका लेपादि में बहुत व्यवहार किया जाता है।

२५ तज

हि०, गु०, उर्दू- तज । वं०- दालचीनी । म०, उड़िया- दालचीनी । पं०- लुरुण्ड । तां०, मलं०- लवंगपत्ते । अं०- Cassia cinnamon (कॅशिया सिनॅमोन्), Chinese cassia (चाइनीज कॅशिया)। लै०- Cinnamomum cassia, Blume (सिनॅमोमम् कॅशिया, ब्लूम)। Fam. Lauraceae (लॉरेसी) । चीन एवं बर्मा में अवा नामक स्थान में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष चिकना तथा सदाइरित होता है। पत्ते- आयताकार-भालाकार या भालाकार, पतले ६-८ मि. मि. लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, तीन नाडियों से युक्त, फलक मूल की तरफ कुछ संकु- चित होते हुये, ३-४ इञ्च लम्बे, सम्बाध युक्त, चर्मवत् एवं अस्पष्ट नाड़ीजाल से युक्त होते हैं। पुष्प- छोटे तथा परिपुष्प (Perianth) के बराबर या कुछ अधिक लम्बे तथा पतले पुष्पवृन्त (Pedicle) से युक्त, बहुव्यर्यक्ष सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में, पत्र के अक्ष में या छोटी शाखाओं के अन्त में रहते हैं। परिपुष्प करीब ३ मि. मि. लम्बे तथा कुछ सिल्क के समान रहते हैं जिनके दल (पंखुड़ियां) आयताकार भालाकार होते हैं। फल- मटर के बराबर, चिकने, अण्डाकार एवं रसदार अष्ठिफल (Drupes) होते हैं। परिपुष्पासन बहुत बड़ा हुआ नहीं होता तथा वह ६ खण्डों में विभक्त रहता है जिनके अग्र कटे हुये मालूम पड़ते हैं या प्रायः खण्ड पूर्ण रूप में स्थायी रहते हैं। इसके काण्ड की सूखी हुई छाल को चीनी दालचीनी कहते हैं। यह २-४० से. मि. लम्बी तथा मुडी होती है। बाहर से यह हल्के धूसर भूरे रंग की, करीब-करीब चिकनी तथा कुछ आड़ी झुर्रियों से युक्त रहती है। अन्दर से यह रक्ताभ भूरे रंग की एवं रेशेदार होती है। इसे तोड़ने से मद्य छोटा तथा असम होता है। इसकी गन्ध मनोहर एवं स्वाद उष्ण, मधुर तथा सुगन्धि रहता है। रासायनिक संगठन- इसमें ०'८% उड़नशील तैल, ४% राल, १४.६% गोंद युक्त निस्सार (टैनिन सहित), ६४.३% लिगनिन (Lignin) तथा बैस्सोरिन (Bassorin), १६.३% जल 15 एवं रंजक द्रव्य ये पदार्थ पाये जाते हैं। १५ भा० नि०

२२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग- चीनी दालचीनी बहुत ही आह्लादकारक एवं फलप्रद सुगन्धि द्रव्यों में से है। यह उष्ण, आमाशय के लिये उत्तेजक, वातानुलोमक एवं ग्राही है। यह सार्वदैहिक उत्तेजक की अपेक्षा स्थानिक उत्तेजक है। यद्यपि इसका स्वतंत्र प्रयोग कम किया जाता है तथापि इसके फांट या चूर्ण से हृल्लास दूर होता है तथा आध्मान में लाभ होता है। अतिसार में अन्य ग्राही औषधों के साथ तथा अन्य अनेक मिश्रणों में सहायक द्रव्य के रूप में इसका व्यवहार किया जाता है। मात्रा-२३-१० २०। अथ दारुसिता (दालचीनी)। तस्या नामानि गुणांश्चाह त्वक्स्वाद्दी तु तनुत्वक्त्स्यात्तथा दारुसिता मता ॥ ६६ ॥ उक्ता दारुसिता स्वाद्दी तिक्ताचानिलपित्तहृत् । सुरभिः शुक्रलाबल्या मुखशोषतृषापहा ॥ ६७ ॥ दालचीनी के नाम तथा गुण- त्वक्, स्वाद्दी, किंवा त्वक्स्वाद्दी, तनुत्वक् तथा दारुसिता ये सब 'दालचीनी' के संस्कृत नाम हैं। दालचीनी-स्वादिष्ट, तिक्तरसयुक्त, वातपित्तनाशक, सुगन्धयुक्त, शुक्रजनक, बलकारक, ('वण्या' पाठान्तर में-शरीर के रङ्ग को सुन्दर करने वाली), मुखशोष तथा तृषा को दूर करने वाली होती है ॥ ६६-६७ ॥ २६ दालचीनी हि०-दालचीनी, दारचीनो । बं०-दारुचीनी । म०-दालचीनो । गु०-तज। ते०, मळ०-लवंग पत्ते । ता०-कद्रलवंग पत्ते । अ०-दारसीनी, किर्फा । फा०-दारचीनी । अं०-Cinnamon Bark (सिनेमोन् बार्क)। ले०-Cinnamomum Zeylanicum Blume (सिन्नेमोमम् झेलैनिकम्, ब्लूम) । Fam, Lauraceae (लॉरेसी)। इसके वृक्ष लंका तथा दक्षिणी भारत में पाये जाते हैं। लंका, दक्षिण भारत, मार्टिनिक्यू, कैने, जमेका, ब्राझील तथा सेचिलीस में इसकी खेती की जाती है। इसका वृक्ष-साधारण ऊंचाई का एवं सदा हरित होता है। छाल-कुछ मोटी, चिकनी तथा हल्के रंग की होती है। छोटी शाखाएं कुछ दबी हुई एवं नये भाग चिकने रहते हैं किन्तु कलिकाएं महीन सिल्क की तरह रहती हैं। पत्ते-प्रायः विपरीत, कड़े तथा चर्मवत, ३-८ इञ्च लम्बे, १॥-३ इञ्च चौड़े, अण्डाकार या लट्वाकार-भालाकार, नुकीले अग्रयुक्त, चिकने, ऊपर से चमकीले किन्तु नीचे से कुछ हल्के एवं फलकमूल की तरफ तीक्ष्ण या गोलाई लिये हुए होते हैं। नाड़ियां-३-५ प्रधान नाड़ियां रहती हैं जिनके बीच महीन जालीदार नाड़ियां रहती हैं। पर्णवृन्त- ३-१ इञ्च लंबा तथा ऊपर से चपटा रहता है। पुष्प-बहुत एवं प्रायः पत्तों से लंबे सवृन्तकाण्डज पुष्पव्यूहों में जो सिल्क की तरह मृदुरोमश होते हैं। पुष्पदंड (Peduncle) लंबे, प्रायः एक साथ गुच्छों में, चिकने या मृदुरोमश एवं पुष्पवृन्त (Pedicle) लम्बे होते हैं। परिपुष्प ५-६ मि० मि० लंबे; नलिका १ इञ्च लम्बी एवं दल मृदुरोमश, आयताकार या कुछ अभि-लट्‌वाकार, एवं प्रायः कुण्ठिताग्र रहते हैं। फल-१२.३-१७ से० मि० लंबे, आयताकार या लट्वाकार- आयताकार, शुष्क या किंचित मांसल, गहरे बैगनी रंग के एवं ८ मि० मि० व्यास के संवृद्ध घंटिकाकार परिपुष्प से घिरे हुये रहते हैं। १. वण्यां इति पाठः । कर्पूरादिवर्गः २२७ इस वृक्ष के झाड़ियों को काटने के बाद उत्पन्न नवीन प्ररोहों की सूखी हुई अन्दर की छाल को औषध के लिये लिया जाता है। इसे सीलोनी दालचीनी कहा जाता है। यह सर्वोत्तम दालचीनी होती है। इसकी एक साथ बंधी हुई लंबी जुड़ियां आती हैं। बाह्य सतह हल्के पीताभ भूरे रंग की एवं लंबाई में लहरदार रेखाओं से युक्त तथा प्रायः छोटे दागों या छिद्रों से युक्त होती है। अन्दर से यह गहरे रंग की एवं लम्बाई में हल्की धारियों से युक्त होती है। यह बहुत ही पतली, ०.५ मि० मि० मोटी एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसमें मनोहर गन्ध रहती है तथा इसका स्वाद उष्ण, मधुर एवं सुगन्धि रहता है। रासायनिक संगठन- सिलोनी दालचीनी में ०.५-१% उड़नशील तैल, टैनिन तथा गोंद ये पदार्थ पाये जाते हैं। दालचीनी का तैल नया रहने पर हल्के पीले रंग का रहता है जो पुराना होने पर रक्ताभ भूरे रंग का हो जाता है। इसमें दालचीनी जैसी ही गन्ध एवं स्वाद रहता है। इस तैल में ६०-७५% सिनेमैल्डिहाइड (Cinnamaldehyde), करीब १०% यूजेनॉल (Eugenol) एवं अल्प मात्रा में मेथिल्-एन्-अँमिल् कीटोन (Methyl-n-amyl ketone ), पी-साइमीन (p-cymene ), एल्-फेलैन्ड्रीन (l-phellandrene), एल्-अंल्फा-पिनीन (l-a-pinene), एल्-लिनैलूल (l-linalool), क्यूमिक अॅल्डिहाइड (Cumic aldehyde ), नोनिल् अॅल्डिहाइड (Nonyl aldehyde ), कँर्योफाइलीन (Caryophylline) एवं ब्यूट्रिक अॅसिड के ईस्टर (Esters of butyric acid ) ये पदार्थ पाये जाते हैं । दालचीनी के पत्तों में भी किञ्चित गहरे रंग का एक उड़नशील तैल पाया जाता है। लेकिन यह तैल दालचीनी के तैल से बिलकुल भिन्न है। इसमें कुछ लौंग जैसी तीव्र गन्ध आती है तथा आमवातादि में इसकी मालिश की जाती है। इसमें ७०-९५% यूजेनॉल रहने के कारण लौंग के तैल सदृश इसका उपयोग किया जा सकता है। दालचीनी के तैल में पत्तों के तैल की मिलावट की जाती है जिसकी पहचान उसमें की बढ़ी हुई यूजेनॉल की मात्रा एवं घटी हुई सिनेमिक् अॅल्डिहाइड की मात्रा से की जा सकती है। इसमें रासायनिक विधि द्वारा निर्मित सिनेमिक् अॅल्डिहाइड की मिलावट करते हैं जिसकी पहचान उसमें के क्लोरीन की उपस्थिति, बढ़े हुये विशिष्ट गुरुत्व, भुजायन देशना (Refractive index) एवं अॅल्डिहाइड से की जा सकती है। गुण और प्रयोग- दालचीनी उष्ण, सुगन्धि, वातानुलोमक, साधारण ग्राही, दीपन, पाचन, उत्तेजक, गर्भाशय उत्तेजक, स्तम्भन, शोणितस्थापक, श्वेतकणवर्धक, आक्षेपहर एवं कृमिघ्न है। दालचीनी का तैल वातानुलोमक, प्रतिदूषक, उत्तेजक, आर्त्तवप्रवर्त्तक, वातहर, वेदनाहर, व्रणशोधक एवं व्रणरोपक है। (१) यह उत्तम दीपन होने के कारण इससे आमाशय रस की वृद्धि होकर अन्न का पाचन ठीक होता है तथा वायु का अनुलोमन होता है। आमाशय के रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। आध्मान, मरोड़, आमाशयिक शूल एवं वमन में इसके तैल को मिश्री के साथ खिलाते हैं। हृल्लास एवं वमन में इसकी चूसने से या इसके क्वाथ से लाभ होता है। अतिसार, पुरानी आंव एवं ग्रहणी आदि में इसके क्वाथ से शौच कम होता है, वायु नहीं होता एवं पचननलिका को बल मिलता है। आन्त्रिक ज्वर (Typhoid) में आन्त्रिक प्रतिदूषक औषध के रूप में अन्य औषधों के साथ इसके तैल को देते हैं। इससे आध्मान नहीं होता । (२) राजयक्ष्मा दण्डाणु के उपसर्ग में तैल का व्यवहार किया जाता है। सिनेमिक् एसिड का परिणाम इन जन्तुओं पर होता है। क्षयजव्रण पर इसको लगाते हैं।