भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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२० भावप्रकाशनिघण्टुः प्रयोग करने से यह सिद्ध हुआ है कि चतुरूषण ५ से ३० र० की मात्रा में दिन में दो बार न केवल खांसी, प्रतिश्याय, स्वरभंग में उपयोगी है बल्कि उदरशूल, आध्मान आदि में भी बहुत उपयोगी है। अथ चव्यनामगुणानाह भवेच्चव्यं तु चविका कथिता सा तथोषणा । कणामूलगुणं चव्यं विशेषाद् गुदजापहम् ॥६७॥ चव्य के नाम तथा गुण-चव्य, चविका और ऊषण ये तीन संस्कृत नाम 'चव्य' के हैं। जो २ गुण 'पिपरामूल' के कह आये हैं वे ही सब 'चव्य' के भी होते हैं। केवल विशेषता यह है कि-यह अर्श (बवासीर) का नाशक होता है ॥ ६७ ॥ ९ चव्य हि०-चव्य, चाव, चाभ, चब। ब०-चेअर, चई, चोई। म०-चवक, कंकल, चावेचीनी। गु०-चवक, ते०-सेवासु, चैकाणी, चव्यमु। ता०-चव्यं। ले०-Piper chaba Hunter (पाइपर् चबा हण्टर); Piper officinarum Cas D. C. (पाइपर् ऑफिसिनेरम्)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। चव्य के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। भावप्रकाशकार आगे गजपिप्पली के वर्णन में लिखते हैं कि विद्वानों ने चव्य के फल को गजपिप्पली कहा है। अर्वाचीन विद्वानों ने गजपिप्पली एवं चव्य ये दो अलग वनस्पतियां मानी हैं। और यही कारण है कि ये दोनों द्रव्य संदिग्ध की श्रेणी में आ गये हैं। अधिकांश विद्वानों ने जिन दो द्रव्यों को माना है उन्हीं का यहां वर्णन किया जा रहा है। पाइपर चवा को चव्य कहा गया है। भारत के अनेक प्रान्तों में यह लगाई हुई मिलती है। यह वनस्पति जावा, सुमात्रा, मलाया आदि देशों में विशेषरूप से उत्पन्न होती है। इसके फल तथा कांड का उपयोग किया जाता है। संभवतः यह फल सिंगापुर के रास्ते कलकत्ते में आकर बड़ी पीपर के नाम से बिकता है। यह लताजाति की वनस्पति बहुत दृढ़ होती है। इस पर किसी प्रकार के रोम इत्यादि नहीं होते। इसकी शाखायें-वृक्षों की डालियों से खूब लिपटती हुई बढ़ती हैं और सूखने पर पीलापन युक्त सफेद रङ्ग की हो जाती हैं। पत्ते-५-७ इञ्च लम्बे तथा २-२॥ से ३॥ इञ्च तक चौड़े, आयताकार, अण्डाकार, और किञ्चित् नुकीले होते हैं, सूखने पर फीके या पीलापन युक्त सफेद रंग के हो जाते हैं। उनके ऊपर का भाग चमकदार होता है। इन पर रक्तवर्ण के फूल और फलों के गुच्छे लगते हैं। ये गुच्छे १-३ इञ्च लम्बे और ३/८ इञ्च मोटे, अग्र की तरफ कुछ पतले एवं डण्ठल की तरफ मोटे गोल और भूरे रंग के होते हैं। फल-बहुत छोटे छोटे इञ्च के दसवें हिस्से के घेरे में अण्डाकृति आते हैं। ये फल सुगन्धित एवं स्वाद में कटु होते हैं। गुण और प्रयोग-चाभ का उपयोग पीपर के समान ही किया जाता है। यह उत्तेजक एवं पाचक है तथा शूल, आध्मान, वृकरोग तथा विशेष कर खांसी, जुकाम आदि गले के रोगों में उपयोग में आता है। यूनानी मतानुसार उसके फल का नस्य अपस्मार में उपयोगी है। मात्रा-चाभ चूर्ण-१ से २ माशे, चाभ फल चूर्ण-२-४ र०। अथ गजपिप्पल्या नामानि गुणाँश्चाह चविकायाः फलं प्राज्ञैः कथिता गजपिप्पली । कपिवल्ली कोलवल्ली श्रेयसीवशिरश्च सा ॥६८॥ गजकृष्णा कटुर्वातश्लेष्महद्वह्निवर्धिनी । उष्णा निहन्त्यतीसारं श्वासकण्ठामयक्रिमीन् ॥६९॥ हरीतक्यादिवर्गः \२१ 'गजपीपल' के नाम तथा गुण-'चव्य' के फल का ही नाम 'गजपीपल' है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं। कपिवल्ली, कोलवल्ली, श्रेयसी और वशिर ये सब संस्कृत नाम 'गजपीपल' के हैं। गज पीपल-कटुरसयुक्त, वात कफ नाशक, अग्निवर्धक और उष्ण वीर्य होती है तथा अतिसार, श्वास, कण्ठसम्बन्धी रोग और कृमि का भी नाश करती है ॥ ६८-६९ ॥ गजपिप्पली के सम्बन्ध में भी विद्वानों में मतभेद है। कुछ चव्य के फल को गजपिप्पली मानते हैं तो कुछ सिंडेप्सस् आफिसिनेलिस् के फल को मानते हैं। अधिकांश विद्वान सिं. आफिसिनेलिस् को गजपिप्पली मानते हैं जो ठीक भी मालूम होता है। कुछ बाजारों में ताड़वृक्ष के बाल (पुं-पुष्प व्यूह) को काटकर गजपिप्पली के नाम से बेचते हैं। १० गजपीपल हि०-गजपीपर, गजपीपल। ब०-गजपीपल। म०-गजपिंपली, थोर पिंपली। क०-अड्डुकेबीलुबळ्ळि। गु०-मोटो पीपर। ते०-एनुगा पिप्पल। ता०-अनं' तिप्पली। पं०-गजपीपल। सन्ताल०-दरे झपक । मल०-अतितिपली, अनैतिप्पली। ले०-Scindapsus officinalis, Schott (सिन्डे- प्सस् ऑफिसिनेलिस् स्काट); Syn: Pothos officinalis Schott Melet (पोथोस् ऑर्कि- सिनेलिस्)। Fam. Araceae (अॅरासी)। इसकी लता आर्द्रसपाट मैदानों में हिमालय के प्रान्तों में सिक्कम से पूर्व की ओर बंगाल, चटगांव, ब्रह्मा तथा सिवालिक के जंगलों में शाल वृक्षों पर चढ़ी हुई पाई जाती है। इसका डंठल-गूदेदार एक इञ्च या इससे भी अधिक मोटा एवं गोल होता है। पत्ते-बड़े बड़े, जैसे-५ से १० इञ्च तक लम्बे और २॥ से ६ इञ्च तक चौड़े, अंडाकार, गाढ़े हरे होते हैं और शाखाओं पर विपरीत रहते हैं। पत्र वृन्त ३ से ६ इञ्च तक लम्बा और अन्त का हिस्सा हाथ की कोहनी के समान होता है एवं तलवार की म्यान के समान दिखाई पड़ता है। इसके भीतर का हिस्सा पीले रङ्ग का होता है। फल-रसयुक्त, गूदेदार, लगभग ६ इञ्च लम्बा, १।-१॥ इञ्च व्यास में और नीचे की ओर लटका हुआ रहता है। इसका आगे का हिस्सा नोकदार होता है। इसके फल के आड़े कटे हुये सूखे टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये १ इञ्च व्यास के, ३/८ इञ्च मोटे और भूरे रङ्ग के होते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती तथा उन्हें जल में भिगोकर रखने से ये फूल कर नरम हो जाते हैं। इनके बीच में बीज होते हैं और उनके चारों ओर चूने के सूई के समान दाने होते हैं। बीज-वृक्का- कार, चिकने, गांजे के बीज से बड़े और भूरे रङ्ग के होते हैं। इसके पत्ते का शाक बनाकर खाते हैं। गुण और प्रयोग-सूखा हुआ फल-तीक्ष्ण, पसीना लाने वाला, सुगन्धिकारक, वातहर, कृमिनाशक, उत्तेजक, पाचक, एवं बल्य है। आमातिसार, श्वास और खांसी में जब कफ की अधिकता रहती है तब इसका उपयोग किया जाता है। इसके फांट को देने से कफ ढीला होकर निकलता है। संताल लोग इसको आमवात, संधिवात आदि रोगों में स्थानीय लेप के रूप में लगाते हैं। इसका उपयोग सुगंधित द्रव्य के रूप में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। इसमें १४३/८% राख, गोंद तथा एक क्षाराम रहता है। मात्रा-फांट (१ में १०) २-६ ड्राम । अथ चित्रकस्य नामानि गुणाँश्चाह चित्रकोऽनलनामा च पाठी व्यालस्तथोषगः । चित्रकः कटुकः पाके वह्निकृत्पाचनो लघुः ॥ रूक्षोष्णो ग्रहणीकुष्ठशोथार्शः कृमिकासनुत् । वातश्लेष्महरो ग्राही वातघ्नः१ श्लेष्मपित्तहृत् ॥ १. 'वातांशी' इति पाठान्० ।