भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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२२] भावप्रकाशनिघण्टुः 'चीता' के नाम तथा गुण-चित्रक, अनलनामा (अग्नि के जितने नाम हैं वे सब 'चीता' के भी होते हैं), पाठी, व्याल तथा ऊषण ये सब संस्कृत नाम चीता के हैं। चीता-पाक में कटुरस युक्त, अग्निवर्धक, पाचक, लघु (शीघ्र पचने वाला), रूक्ष और उष्ण वीर्य वाला है और यह ग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, अर्श, कृमि तथा कास का नाशक होता है। तथा वात और श्लेष्मा को दूर करने वाला, ग्राही, वात और श्लेष्म एवं पित्त का नाशक होता है ॥ ७०-७१ ॥ ११ चित्रक हि०-चीत, चीता, चित्रा, चित्रक, चित्ता, चितरक, चितउर । बं०-चिता, चितु । म०-चित्रक । क०-पैल्लीचित्रमूल, चित्रकमूल । पं०-चित्रा । ते०-अग्निमत, चित्रमूलं, तेलाचित्रा । ता०-पेंचीत्तर, कोदिवेल । उ०-ध्रुवचिता । गु०-चित्रो, चित्रा, पितरो । मला०-वेल्लाकोडुवेरि, कोडुवेलि । फा०-बेख बरंदा, बेख बरंदह, शीतरह, शीतरूह, शीतरक, बेखबुरिंदा । अ०-शितरज, शितरञ्ज, शीतरज हिन्दी, शैतराज । अं०-Ceylon Leadwort, White Leadwort (सीलोन लेडवोर्ट, हाइट लेडवोर्ट) । ले०-Plumbago zeylanica Linn. (प्लम्बैगो झेलैनिका) । Fam. Plumbaginaceae (प्लम्बैजिनासी) । सफेद, लाल और नीले फूलों के भेद से चित्रक तीन प्रकार का होता है। कोई कोई पीले फूल का भी चित्रक बतलाते हैं किन्तु इसका उल्लेख किसी पुस्तक में देखा नहीं जाता। सफेद फूल का चित्रक बहुत मिलता है और लाल फूल का कहीं कहीं नमूने की तरह देखने में आता है और मिलता भी बहुत कम है। नीले फूल का चित्रक भी कम मिलता है जिससे नमूने की तरह भी बहुत कम ही वैद्य लोग देख पाये होंगे । सफेद चित्रक इस देश के प्रायः सब प्रान्तों की जङ्गली झाड़ियों में देखा जाता है विशेष कर संयुक्त प्रान्त, बिहार, बङ्गाल, दक्षिण भारत, सीलोन और कुमाऊँ के पहाड़ों बहुत मिलता है। यह आप ही आप जङ्गली उत्पन्न होता है और कहीं कहीं वाटिकाओं में भी है। इसका क्षुप २ से ५ फूट तक ऊँचा होता है और बारहों मास मिलता है। गर्मी के दिनों में पत्ते प्रायः कम दिखाई पड़ते हैं किन्तु बरसात में हरे भरे हो जाते हैं। कांड पर लम्बाई में धारियां होती हैं। पत्ते-विपरीत, १।। से ३।। इञ्च तक लम्बे, १ से १।। इञ्च चौड़े, अण्डाकार, नोकदार, चिकने, कोमल और मोगरा के समान होते हैं। फूल-जाड़े के दिनों में चमेली के फूल के समान अत्यन्त सफेद फूल आते हैं । फल-यव के आकार वाले लम्बे, कच्ची अवस्था में हरे, पकने पर धूसर रङ्ग के, सूक्ष्म तथा चिपचिपे रोवों से भरे रहते हैं जो तोड़ने से आपस में सट जाते हैं और स्पर्श से लसीले जान पड़ते हैं। इसकी छाल-कालापन लिये भूरे रंग की, खड़े बल में कटी हुई और उस पर थोड़ी सी छोटी गांठें होती हैं। सूखी हुई जड़ तोड़ने से तुरत टूट जाती है। इसका स्वाद तीता, कड़ुआ और जिह्वा को सुई चुभोने के समान मालूम होता है। इसकी जड़ औषधि के काम आती है। यह हमेशा ताजी प्रयोग करनी चाहिये क्योंकि बहुत पुरानी होने पर यह गुणहीन हो जाती है। रासायनिक संगठन-इसके मूल में प्लम्बैजिन (Plumbagin) नामक एक रवेदार पदार्थ होता है। यह पीले रंग का, सुइयों के सदृश, दाहक एवं कटु पदार्थ है। यह मद्यसार एवं ईथर में अच्छी तरह घुल जाता है लेकिन उबलते हुये जल में बहुत थोड़ा घुलता है और गरम करने पर कुछ अंश में उड़नशील है। इसका द्रवणांक ७२° श० है। भारतवर्ष में प्राप्त होने वाली हरीतक्यादिवर्गः [२३ इसकी सभी जातियों में इसकी अधिक से अधिक मात्रा ०.९१% रहती है। सूखी जमीन में उत्पन्न होने वाले पुराने क्षुप में यह अधिक मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-चित्रक में रहने वाला प्लम्बैजिन अल्प मात्रा में केन्द्रीय वातनाड़ा संस्थान को उत्तेजित करता है लेकिन अधिक मात्रा में वह दाहजनक एवं सम्मोहक विष है जिससे श्वसन- क्रिया बन्द होकर मृत्यु हो जाती है। चित्रकमूल-अग्निदीपक, गर्भाशय संकोचक, स्वेदजनक, कुष्ठहर, अर्शहर, रसायन, वात एवं कफहर है। इसका उपयोग मन्दाग्नि, अपचन, आध्मान, ज्वर, आमवात, आमातिसार, संग्रहणी, कुष्ठ, शोथ, पाण्डु एवं अर्श आदि रोगों में किया जाता है। अल्प मात्रा में यह पाचक संस्थान की श्लैष्मिक कला को उत्तेजित करके पाचक स्रावों की वृद्धि करता है जिससे भूख अच्छी लगती है। खाया हुआ जल्दी पचता है। अर्श में इसके प्रयोग से गुदवली की शिथिलता दूर होकर लाभ होता है। गर्भाशय के ऊपर इसकी बहुत तीव्र संकोचक क्रिया होती है जिससे गर्भिणी में इसको किसी भी समय प्रयोग करने से एक दो प्रहर में गर्भपात हो जाता है लेकिन गर्भ हमेशा मृत ही होता है। गर्भपात के लिये आंतरिक प्रयोग के साथ २ इसको गर्भाशयमुख में प्रविष्ट करते हैं या इसका लेप करते हैं। इसके प्रयोग में यदि विशेष सावधानी न रक्खी जाय तो इससे रक्तस्राव, धातुनाश एवं कोथ आदि गंभीर उपद्रव उत्पन्न हो सकते हैं। अतः इसका प्रयोग गर्भिणी में कभी भी न करना चाहिये। विषम ज्वर में यकृत् प्लीहा वृद्धि होकर पाण्डु हो गया हो तो इसका सेवन करना चाहिये। सूतिका ज्वर में निर्गुण्डी के साथ इसके उपयोग से ज्वर कम होता है तथा दूषित आर्तव निकलकर मकलशूल भी दूर होता है। (१) अग्निमांद्य, अरोचक, अजीर्ण, अतीसार आदि में चित्रक, वायविडङ्ग एवं मुस्ता का प्रयोग करना चाहिये । (२) अर्श में इसे दही के साथ सेवन करना चाहिये। (३) यकृत् एवं प्लीहा वृद्धि में इसका क्षार मट्ठे के साथ उपयोगी है। (४) इसका उपयोग कुष्ठ, फिरङ्ग की द्वितीयावस्था आदि में लाभकारी है। चित्रक मूल बाह्य प्रयोग में तीव्र कृमिघ्न, दाहजनक, एवं स्फोटोत्पादक है। आमवात, संधिशूल अङ्गवात आदि में इससे सिद्ध तैल की मालिश करने से लाभ होता है। प्लेग की गांठों पर गांठों को फोड़ने के लिये इसको काम में लाते हैं। श्वित्र एवं खालित्य में इसका लेप उपयोगी है। आमवातादि में स्फोटोत्पादन के लिये इसका लेप १५,२० मिनट से अधिक न रखना चाहिये। इससे उत्पन्न स्फोटों में पीड़ा बहुत होती है इसलिये जहां तक हो उसका प्रयोग न किया जाय। हानिकारक-फुफ्फुस, यकृत् और गर्भ । दर्पनाशक-फुफ्फुस के लिये मस्तगी एवं बबूल का गोंद तथा यकृत् के लिये गुलाब के फूल एवं चन्दन । मात्रा-३ से २ माशा । १२ लाल चीता हि०-लाल चीत, लाल चीता, लालचित्रक, लाल चितउर इत्यादि । बं०-लालचिता, रक्तो- चितो । म०-लालचित्रक । क०-केम्पू, चित्रमूल । ते०-येर्राचित्रमूलम् । ता०-शिवप्पु चित्रमूलम् ;