भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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२४ भावप्रकाशनिघण्टुः चित्तुरमोल, कोडिमूली । उ०-रक्तचिता, रक्तचिता । मला०-चेक्कीक्कोडिवेरी । अं०-Rose coloured Leadwort ( रोज कलर्ड लेडवोर्ट) । ले०-Plumbago rosea Linn. (प्लम्बैगो रोझिया) । यह सिक्कम और खसिया की तराइयों में पाया जाता है। इसको वाटिकाओं में भी लगाते हैं परन्तु थोड़ी असावधानी से नष्ट हो जाता है। इसका क्षुप २-४ फुट ऊंचा, सदा हरा भरा रहता है। गर्मी के दिनों में कुछ पुराने पत्ते सूखकर गिर जाते हैं। पत्ते-उक्त चित्रक के समान होते हैं। फूल-लाल और फल सफेद चीते के समान लसीले होते हैं। लाल चित्रक गुणों में सफेद चित्रक की अपेक्षा अधिक प्रभाव शाली और तीव्र गुण सम्पन्न है, विशेष कर रुचिकारी, रसायन, शरीर को नवीन और स्थूल करने वाला, पारे को बांधने- वाला, लोहे को बेधने वाला तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला है। इसकी थोड़ी मात्रा उत्तेजक तथा अधिक मात्रा तीव्र मदकारी विष के समान हानिकारक होती है ॥ १२ ॥ १३ नीला चित्रक ले०-Plumbago capensis Thumb (प्लम्बैगो केपेनसिस थम्ब) काले चित्रक का क्षुप-उक्त चित्रक के समान किन्तु पत्र चक्रिक क्रम में आते हैं। पुष्प सफेदी युक्त नीले रंग के होते हैं। यद्यपि यह दक्षिण अफ्रीका का आदिवासी है तथापि बागों में लगाया हुआ मिलता है। लोग यह भी कहते हैं कि नीले चित्रक के सेवन करने से बाल काले हो जाते हैं और यदि गौ इसके क्षुप को केवल सूंघ ले अथवा इसकी जड़ दूध में डाली जावे तो दूध का रंग काला हो जाता है। परन्तु इसमें कहां तक सत्यता है परीक्षा करने से ही मालूम हो सकती है। अथ पञ्चकोलस्य लक्षणगुणानाह पिप्पली पिप्पलीमूलं चव्यचित्रकनागरैः । पञ्चभिः कोलमात्रं यत्तत्पञ्चकोलं तदुच्यते ॥७२॥ पञ्चकोलं रसे पाके कटुकं रुचिकृन्मतम् । तीक्ष्णोष्णं पाचनं श्रेष्ठं दीपनं कफवातनुत् ॥ गुल्मप्लीहोदरानाहशूलघ्नं पित्तकोपनम् ॥ ७३ ॥ 'पञ्चकोल' के लक्षण तथा गुण-पीपल, पिपरामूल, चव्य, चीता तथा सोंठ ये सब पांच द्रव्य यदि कोलमात्र अर्थात् आधा २ तोला की मात्रा में एकत्र किये जांय तो उसी को 'पञ्चकोल' कहते हैं। पञ्चकोल-स्वाद तथा पाक में कटुरस युक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य होता है। तथा पाचक अत्यन्त अग्निदीपक, कफ-वात नाशक, गुल्म, प्लीहा, उदरसम्बन्धी रोग, आनाह और शूल का नाश करने वाला तथा पित्त को कुपित करने वाला होता है ॥ ७२-७३ ॥ मात्रा-५-१५ र० दिन में दो बार । अथ षडूषणस्य लक्षणगुणानाह पञ्चकोलं समरिचं षडूषणमुदाहृतम् । पञ्चकोलगुणं तत्तू रूक्षमुष्णं विषापहम् ॥ ७४ ॥ 'षडूषण' के लक्षण तथा गुण-ऊपर कहे हुये 'पञ्चकोल' के पीपल आदि पांचों द्रव्यों के साथ यदि छठां द्रव्य 'मरिच' भी सम भाग में मिला दिया जाय तो उसे 'षडूषण' कहते हैं। पञ्चकोल के हरीतक्यादिवर्गः २५ जो गुण कह आये हैं वे ही सब 'षडूषण' के समझने चाहिये, अन्तर केवल इतना ही है कि यह रूक्ष, उष्ण तथा विषनाशक भी होता है ॥ ७४ ॥ अथ यवान्या नामानि गुणाँश्चाह यवानिकोपगन्धा च ब्रह्मदर्भाऽजमोदिका ॥ ७५ ॥ सैवोग्रा दीप्यका दीप्या तथा स्याद्यवसाह्वया । यवानी पाचनी रुच्या तीक्ष्णोष्णा कटुका लघुः ७६ ॥ दीपनी च तथा तिक्ता पित्तला शुक्रशूलहृत् । वातश्लेष्मोदरानाहगुल्मप्लीहकृमिप्रणुत् ॥७७॥ 'अजवायन' के नाम तथा गुण-यवानिका, उग्रगन्धा, ब्रह्मदर्भा, अजमोदिका, दीप्यका, दीप्या और यवसाह्वया ये सब नाम 'अजवाइन' के हैं। अजवाइन-पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, कटुरसयुक्त, परिपाक में लघु, अग्निदीपक, तिक्तरसयुक्त, पित्तवर्धक एवम् शुक्र तथा शूल की नाशक है। और यह वात, श्लेष्मा, उदरसम्बन्धी रोग, आनाह, गुल्म, प्लीहा तथा कृमि की भी नाशक है ॥ ७५-७७ ॥ १४ अजवायन ( यवानी ) हि०-अजवायन, अजवाइन, अजमायन, जवाइन, जबायन, अजवां, अजोवां । बं०-यमानी, यउयान, योयान्, जोवान् । सं०-ओंवा, उंबा । गु०-अजमा, यवान, जवाइन, अजमो । क०- बोम, ओमु । ते०-वामु, ओममी, ओममु, ओमा । ता०-अमन, ओमम्, ओमन । मा०-अजवान । कच्छ०-वोह्ररा । काश्मी०-जविन्द । फा०-नानुखा, शिनियानस नानूखाह, जीनानू । अ०-कमूने- 'मुलुकी, अमूला, तोलिबउल खुब्जा । अं०-The Bishop's weed (दी बिशॉप्स वीड); Ajova seeds (अजोवां सीड्स), Lovage (लोहाज) । ले०-Carum copticum Benth & Hook (करम् कोप्टिकम्); Syn: Trachyspermum ammi Linn. (ट्रॅकीस्परमॅम् अम्मी लिन ); Syn: Ptychotis ajowan DC (प्टिकोटिस् अजौवां)। Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । भारतवर्ष के प्रायः सब प्रान्तों में हरसाल खेतों में यह बोई जाती है विशेषकर इन्दौर तथा हैदराबाद राज्य में यह अधिकता से होती है। यह अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, पर्शिया, मिश्र और यूरोप आदि देशों में भी उत्पन्न होती है। इसका क्षुप १ से ३-फुट तक ऊँचा, पत्ते-धनिये के पत्ते के समान कटीले, अनेक भागों में विभक्त, डालियों पर दूर-दूर आते हैं। फूल-छत्ते से, सफेद रंग के बारीक आते हैं। फल- नन्हें-नन्हें रहते हैं। छत्ते पकने पर फल निकाल लिए जाते हैं। इन्हीं फलों को अजवायन कहते हैं। ये फल बहुत छोटे, दबे हुए, गोल अंडाकार, २ मि० मि० लम्बे, भूरे रंग के होते हैं। इनकी ऊपरी सतह पर छोटी गांठें एवं प्रत्येक अर्ध खण्ड पर पांच धारियां होती हैं। इसमें अज- वायन की विशिष्ट गंध होती है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल जिसे अजवाइन का तेल कहते हैं, २ से ३% पाया जाता है जिसमें से ४०-५०% थाइमॉल रहता है। इसमें पाये जाने वाला रवेदार पदार्थ स्टिअरोप्टिन, जिसे अजवाइन का फूल या अजवायन का सत्व कहते हैं डाक्टरी के थाइमॉल के समान होता है। इसके अतिरिक्त इसमें साइमोन, टरपेन आदि पदार्थ रहते हैं।