भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग-अजवायन अग्निदीपक, पाचक, उष्ण, उद्वेष्टन निरोधी, उत्तेजक, बल्य, कृमिघ्न, संक्रमण निरोधी, दुर्गन्धिनाशक एवं सड़न को दूर करने वाली है। इसका उपयोग अति- सार, कुपचन, अजीर्ण, उदरशूल, आध्मान, विसूचिका आदि रोगों में किया जाता है। इसमें सरसों और मिर्चों का तीतापन, चिरायते का कड़ुआपन, एवं हींग का उद्वेष्टन निरोधी गुण तीनों एक साथ हैं। इसका उपयोग अनेक औषधियों विशेषतया एरंड तेल की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए किया जाता है। पुरानी खाँसी में जब कफ बहुत कम रहता है तब इसके प्रयोग से कफ ढीला होकर निकल जाता है। श्वास में गरम पानी के साथ इसका चूर्ण दिया जाता है या इसको चिलम में रखकर पीते हैं। अजवायन का चूर्ण और सेंधानमक अजीर्ण से उत्पन्न विकारों की घरेलू दवा है। (१) उदरशूल, आध्मान आदि विकारों में अजवायन, सेंधानमक, साँचरनमक, यवक्षार, हींग और आंवला इनके चूर्ण को $\frac{३}{४}$ से १ माशा की मात्रा में मधु के साथ दिया जाता है। (२) शराबियों को मद्य की आदत छुड़ाने के लिये शराब पीने की इच्छा होने पर इसे चबाने को दिया जाता है। (३) बच्चों के रोगों में तथा हैजे में इसका अर्क बहुत उपयोगी है। (४) अजवायन का सत्-बहुत अच्छा कृमिघ्न, सड़न को दूर करने वाला, प्रतिदूषक पदार्थ है। इसका उपयोग घोल के रूप में व्रण प्रक्षालन के लिये किया जाता है। अजवायन का सत्, पेपरमिंट का सत् और कपूर तीनों मिलाने से एक तरल पदार्थ बनता है जिसका विसूचिका के प्रारम्भ में ३, ४ बूँद बतासे के साथ व्यवहार किया जाता है। इससे कै, दस्त कम होकर लाभ होता है। अमृतधारा जैसे प्रचलित पेटेण्ट योगों में ये ही औषधियाँ मूलतः रहती हैं। यह आंत्रिक कृमियों पर विशेषकर अंकुश कृमि में बहुत उपयोगी है। संधिशूल आदि में इसको लगाने से लाभ होता है। अजवायन का सत् दंतशूल में उपयोगी है। (५) इसकी पुल्टिस बनाकर उदरशूल, आमवात, सन्धिशूल आदि में सेंका जाता है। विसू- चिका में हाथ, पैरों को तथा श्वास और खाँसी में छाती को इससे सेंकने से लाभ होता है। (६) इसके पत्तों का रस कृमियों को मारने के लिये काम में आता है एवं पत्तों को पीसकर कीड़ों के काटे हुए स्थानों पर लगाया जाता है। पत्तों के अन्य गुण शाकवर्ग में देखें। मात्रा-चूर्ण-३ से ६ माशा, अर्क-१ से २ औंस, सत्-$\frac{१}{२}$ से १ र० ।
अथ अजमोदाया नामानि गुणांश्च
अजमोदा खराश्वा च मयूरो दीप्यकस्तथा । तथा ब्रह्मकुशा प्रोक्ता कारवीलो$^१$ चमस्तका ! अजमोदा कटुस्तीक्ष्णा दीपनी कफवातनुत् । उष्णा विदाहिनी हृद्या वृष्या बलकरी लघुः । नेत्रामय$^३$ कृमिवमिहिक्कावस्तिरुजो हरेत् ॥ ७९ ॥ 'अजमोदा' (बड़ीअजवाइन) के नाम तथा गुण-अजमोदा, खराश्वा, मायूरो, दीप्यक, ब्रह्मकुशा, कारवी और लोचमस्तका ये सब नाम 'अजमोदा' के हैं। अजमोदा-कटरसयुक्त, तीक्ष्णवीर्य, अग्निदीपक, कफवातनाशक, उष्णवीर्य, विदाही, हृद्य (हृदय के लिये हितकर), वृष्य,
१. 'मयूर' इति पाठा० । २. 'च समस्तक'ति पाठा० । ३. 'कफे' पाठा० । हरीतक्यादिवर्गः २७ बलकारक और परिपाक में लघु होती है। और यह नेत्ररोग, कृमि, वमन, हिक्का (हिचकी) एवं बस्तिसम्बन्धी रोगों को नाश करने वाली होती है ॥ ७८-७९ ॥
१५ अजमोदा
हि०-अजमोद, अजमोदा, अजमूदा, अजमोत । ब०-वनयमानी, रान्धुनी, अजमूद, चनु । गु०-बोडी अजमोद, अजमोद, बोडी अजमो । ते०-आजामोदा, वोमा, अशमदागां, वोमां, अंजोदा- वोमरू । मध्य प्र०-रान्धुनी । पं०-भूतजटा । ता०-अशम, तागम, तागम, अशमता ओमान् । म०- अजमोदा वोवा, कोरंजा । क०-अजमोदा वोमा । फा०-करप्स । अ०-बजरूल करप्स । अं०- Celery fruit (सेलेरी फ्रूट); Apii fructus (अप्याई फ्रक्टस्) । ले०-Apium graveo- lens, Linn. (एपियम् ग्रेविओलेन्स् लिन) । Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । यूरोप, अमेरिका तथा भारतवर्ष में इसकी खेती की जाती है। पंजाब तथा उत्तर प्रदेश में इसकी विशेष खेती होती है। यह उत्तर पश्चिमी हिमालय तथा पंजाब के पहाड़ी प्रान्तों में भी उत्पन्न होता है। इसका क्षुप २ से ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-अनेक भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-सफेद और छोटे छत्ते से होते हैं। फल-पीताभ, भूरा, गोलाभ अंडाकार, १ से १.५ मि. मि. लंबा, १.५ मि. मि. चौड़ा, ०.५ मि. मि. मोटा एवं प्रत्येक अर्धखण्ड पर ५ गहरी धारियों से युक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक हल्के पीले रङ्ग का उड़नशील तैल १.५-३% पाया जाता है जिसमें एक विशेष प्रकार की इसकी गन्ध होती है। इसके अतिरिक्त इसमें गन्धक, अपो- इल Apoil) नामक एक विषैला पदार्थ, एक ग्लूकोसाइड ओपीईन (Glucoside-Apiin), अल्ब्यू मिन्, गोंद और क्षार आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, पाचक, वातानुलोमक, उत्तेजक, वातशामक, बल्य, मूत्रल, गर्भाशय संकोचक एवं हृद्य है। घरेलू औषधि के रूप में इसका उपयोग आमवात, उदरशूल, आध्मान, वमन, हिक्का, कुपचन आदि रोगों में किया जाता है। इसको वातरक्त, कृमि, मूत्राशय के रोग और नपुंसत्व में काम में लाते हैं। इसके उद्वेष्टन निरोधी गुण के कारण श्वसनिका शोथ, श्वास एवं उदरशूल आदि विकारों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसका पथरी के रोग में भी व्यवहार होता है। यकृत और प्लीहा के रोगों में भी यह कुछ लाभदायी है। मसाले के रूप में भी इसका व्यवहार किया जाता है। (१) इसका तैल उद्वेष्टन निरोधी, वातनाड़ियों के लिये बल्य एवं आमवाताभ संधिशोथ में लाभदायी है। (२) इसका मूल रसायन एवं मूत्रल माना गया है और इसका उपयोग सर्वांग शोफ और शूल में किया जाता है। (३) इसके मूल से बनी कॉफी मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों के लिये बलदायक मानी गई है। (४) यह अपस्मार एवं गर्भिणी के लिये हानिकारक माना गया है। मात्रा-फल चूर्ण-१ से ४ माशा ।
१६ अजवायन जंगली (१)
यह दो प्रकार की होती है जिनका अलग-अलग वर्णन नीचे संक्षेप में दिया गया है।