भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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२८ भावप्रकाशिनघण्टुः सं०-वन्ययमानी ? । म०-किरमिंजी अजवां । बं०-बनजोवान । ले०-Seseli indicum W. & A. (सिसिली इण्डिकम् ) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी) । यह हिमालय के निचले भागों में देहरादून से लेकर गोरखपुर, बुंदेलखण्ड, आसाम, मध्य बंगाल तथा कारोमण्डल तक होती है। इसके क्षुप-वर्षायु, ४ से १२ इञ्च तक ऊँचे, अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त सघन देखने में आते हैं। पत्ते-विभक्त, कटे किनारे वाले और रोमश होते हैं। फूल-छत्ते से सफेदी युक्त गुलाबी रंग के, फल-बारीक छोटे-छोटे गोल, किञ्चित् लम्बे फीके पीले रंग के होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके फल प्रायः पशुओं के लिये औषधि के काम में अधिक आते हैं। यह उत्तेजकदीपन, पाचन, शूलघ्न, आंतों के लिये हितकारी तथा विशेषरूप से गोल कृमि का नाशक है। इसके सेवन से पेट के आफरे में लाभ होता है और भूख बढ़ती है। मात्रा-१ से ३ माशा । १७ अजवायन जंगली (२) हि०-बन अजवायन । पं०-माशो, रांगस्तूर, मरिज़ह । फा०-हाशा । अं०-Wild Thyme (वाइल्ड थाइम्) । ले०-Thymus serpyllum Linn. (थाइमस् सर्पाइलम्) । Fam. Labiatae (लेबियटी) । यह हिमालय के गरम प्रांतों में काश्मीर से कुमाऊँ तक एवं ईरान में होती है। यह क्षुप जाति की वनौषधि अनेक शाखा प्रशाखाओं से युक्त, सघन, कुछ रोमयुक्त, ६ से १२ इञ्च तक ऊँची और सुगन्धित होती है। पत्ते-अवृन्त, इञ्च के अष्टमांश से चतुर्थांश के घेरे में किञ्चित् आयताकार अण्डाकार होते हैं और उन पर तैलीय धब्बे होते हैं। फूल-बारीक बैंगनी रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-बारीक और चिकने होते हैं। इस औषधि का पञ्चांग व्यवहार में आता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील सुगन्धित तैल ०.६%, टैनिन तथा गोंद पाया जाता है। इसमें थायमॉल (अजवायन का सत्व) बहुत ही थोड़ी मात्रा में होता है। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, सड़न को दूर करने वाली, मूत्रजनन, उत्तेजक, आंखों के लिये हितकर, श्वास एवं कफहर, ग्राही, कृमिघ्न, व्रणशोधक और व्रणरोपक है। सड़न को दूर करने का इसका गुण बहुत स्पष्ट है। (१) इसका स्वरस, सिरका और मधु पुरानी खांसी, श्वास, कुक्कुर खांसी और घटसर्प तथा आंत्रिक व्रणों में दिया जाता है। (२) अजीर्ण और अग्निमांद्य में सैन्धव के साथ इसको दिया जाता है। यह ग्राही है तथा इससे उदरशूल दूर होता है। (३) बस्ति पीडा, बस्ति शोथ, तथा लसिकामेह ( Chyluria) एवं मूत्र स्वच्छ न होने पर इसका क्वाथ मधु और सिरके के साथ दिया जाता है। (४) चर्मरोग जैसे दाद, खुजली आदि में यह बहुत लाभदायी है। (५) अग्निदग्ध व्रण पर इसका स्वरस घी के साथ लगाते हैं। (६) सन्धिशोथ आदि में इसको रेंडी के तेल के साथ पीसकर लगाते हैं तथा इसका क्वाथ पीने को देते हैं।


हरीतक्यादिवर्गः २६ (७) इसकी चटनी दृष्टि के लिये उपयोगी है। (८) इसका धूपनार्थ प्रयोग करने से हवा शुद्ध होती है। मात्रा-चूर्ण-१/४ से ३/४ तोला । तेल-१ से ३ बूंद । अथ पारसीक्यवानीगुणानाह पारसीक्यवानी तु यवानीसदृशी गुणः । विशेषात्पाचनी रुच्या ग्राहिणी मादिनी गुरुः ॥८०॥ खुरासानी अजवाइन के गुण-पारसीक्यवानी अर्थात् खुरासानी अजवाइन का भी गुण अजवाइन के समान ही जानना चाहिये। किन्तु विशेषता यह है कि यह पाचक, रुचिकारक, ग्राही, मादक तथा परिपाक में गुरु होती है ॥ ८० ॥ १८ पारसीक यवानी हि०-खुरासानो अजवायन, खुरासानी अजवाइन, खुरसाना । ब०-खुरासानी अजोज़ान । म०-खुरासानी ओंवा, खुरासान ओंवा । गु०-खुरासाणी अजमो, छुहारी अजमोद । ते०-कुरासानीं वाम । ता०-कुरासानी योमाम । पं०-खुरासानी अजवाइन, बजरूल । मा०-खुरासानी अंजवाण । क०-खुरासानी वोभं । फा०-तुख्म वंजे, बङ्गदिवाना, बज्र, तुख्मबिंग, तुख्मेवंग । अ०-बज़रुल बज, अवीद शिकरान, बजुलवज्र, बज़रुल विनग । यू०-अजवायनी खुरसानी । अं०-Henbane (हेनबैन) । ले०-Hyoscyamus niger, Linn. (हायोसियामस नाइगर लिन) । Fam. Solanaceae (सोलेनेसी) । खुरासानी अजवायन केवल खुरासान देश में ही नहीं बल्कि इसके छोटे छोटे क्षुप योरप और मध्य एशिया के कई प्रान्तों के जङ्गलों तथा कूर्ड़ों के ढेर पर उगे हुए रहते हैं। हमारे देश में पश्चिम हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से गढ़वाल तक पाये जाते हैं और सहारनपुर, पूना, आगरा और अजमेर के आस पास के कितने ही स्थानों में इसकी खेती की जाती है। इसकी अन्य जातियां H. reticulatus (हा. रेटिक्यूलैटस), तथा H. muticus (हा. म्यूटिकस-कोहीभंग) होती हैं। H. muticus (हा. म्यूटिकस) अधिक विषैली होती है तथा यह पश्चिमी पंजाब और सिन्ध के जङ्गलो प्रदेशों तथा नदियों के किनारों पर उत्पन्न होती है एवं हा. रेटिक्युलेटस् बलुचिस्तान में होती है। इसका पौधा-सीधा, रोमश, चिपचिपा, उग्रगंधयुक्त एवं १-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-धतूरे के समान, कुछ कटे किनारेवाले, दन्तुर, नीचे के सवृन्त आयताकार, अंडाकार किन्तु ऊपर के अवृन्त अंडाकार होते हैं। पुष्प-पीले रंग के, पांच पंखडीवाले और आकार में तमाखू के फूलों के समान होते हैं तथा उन पर जामुनी रेखायें होती हैं। फल-अंडाकार, १/२ इंच व्यास के एवं दो खण्डों में विभक्त होते हैं। बीज-भूरे, धूसर, चिपटे, वृक्का- कार, या घोंघा की तरह, १.५-१.७५ x १-१.२ x ०.५-०.७ मि. मि. बड़े, धारीदार, गंधहीन एवं अव्यक्तिक्त होते हैं। हा. म्यूटिकस् के बीज-पीताभ, चिपटे, गोलाई लिये हुवे चौकोर, करोब उतने ही बड़े किन्तु सूक्ष्म गद्देदार, अल्प उग्रगंध युक्त किन्तु स्वादहीन होते हैं। बजार में दोनों मिले हुवे मिलते हैं जिसमें अन्य पदार्थ भी मिले हुवे पाये जाते हैं। आयुर्वेद में बीजों का तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पत्र तथा पुष्पित अग्रभाग के विभिन्न कल्पों का उपयोग किया जाता है।