भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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यूनानी चिकित्सकों के मत से खुरासानी अजवायन सफेद, काली और लाल तीन जाति की होती है। इनमें से काली विष के समान हानिकर और घातक मानी जाती है। रासायनिक संगठन—इसकी पत्तियों में हायोसायमिन (Hyoscyamine) नामक क्षाराभ तथा अल्प मात्रा में हायोसीन (Hyoscine) या स्कोपोलामाइन (Scopolamine), अंट्रोपिन (Atropine), हायोसिप्रिन (Hyosciprin), कोलिन (Cholin), तैल, गोंद, ॲल्ब्यूमिन तथा पोटैशियम नाइट्रेट २% आदि पदार्थ रहते हैं। इसकी विभिन्न जातियों में क्षाराभों की मात्रा भिन्न-भिन्न रहती है । सहारनपुर तथा काश्मीर में लगाये पौधों में इनकी मात्रा प्राकृत पौधों की अपेक्षा अधिक (०३%) होती है, तथा ब्रिटिशफारमाकोपिया के प्रतिमान (०५५%) के करीब होती है। इसके बीजों में हायोसायमिन (Hyoscyamine), २५% तैल, तथा राख ४-५% होती है । गुण और प्रयोग—यह अवसादक, वेदनाहर, स्वापजनक, उद्वेष्टन निरोधी, शामक, बल्य, कनीनिका विकासि, दीपन, पाचन तथा कृमिघ्न है। यह बहुत अच्छा वेदनाहर एवं निद्राकर है। इससे अफीम के समान कब्जियत नहीं होती। इसकी क्रिया बेलाडोना की तरह होती है, लेकिन इससे मस्तिष्क कम उत्तेजित होता है और सुषुम्ना एवं आन्त्र पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इससे अनैच्छिक मांस पेशियों के उद्वेष्टन के कारण होने वाले शूल—जैसे नाग (Lead) शूल तथा मूत्रमार्ग प्रक्षोभ से उत्पन्न शूल—दूर होते हैं। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, निद्राभंग, आक्षेप, नाड़ीशूल तथा अनेक मस्तिष्क के विकार एवं मानसिक अस्वस्थता में किया जाता है। सूखी खांसी एवं दमा में श्वसनिकाओं का संकोच दूर होकर लाभ होता है। यह विरेचक औषधियों से उत्पन्न मरोड़ को दूर करती है। पथरी एवं बस्तिशोथ आदि से उत्पन्न प्रक्षोभ में यवक्षार, पाठा तथा गुरुच के साथ यह बहुत गुणकारी है। अल्प मात्रा में देने से यह हृदय के लिये शामक है, और बल्य होने से हृदय की धड़कन में इससे लाभ होता है। पीडितार्तव, अनियमितार्तव में भी इसका अच्छा उपयोग होता है। मध के साथ इसके बीजों को पीसकर स्तनशोथ, अंडशोथ, यकृत पीड़ा एवं संधिशोथ में लगाने से शोथ एवं वेदना कम होती है। दांत के गड्ढे में इसके बीजों को पीस कर रखने से दंतशूल दूर होता है। इसको अंगारों पर जलाकर उसके धुएं को मुख में जाने देने से भी दंतशूल में लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह मादक विष है जिससे प्रलाप, संन्यास आदि होकर शीघ्र मृत्यु होती है। वृद्ध एवं दुर्बल इसकी अधिक मात्रा सहन नहीं कर सकते, लेकिन बच्चे अधिक मात्रा सहन कर सकते हैं। मात्रा—पत्र चूर्ण १॥-३ र., बीज चूर्ण १॥-३ र., तरल एक्स्ट्रैक्ट ३-६ बूंद, शुष्क एक्स्ट्रैक्ट १/२-१॥ र., टिंक्चर २०-६० बूंद। अथ शुक्लजीरककृष्णजीरककालिकानां नामानि गुणांश्च जीरको जरणोऽजाजी कणा स्याद्दीर्घजीरकः ॥ ८१ ॥ कृष्णजीरः सुगन्धश्च तथैवोद्गारशोधनः । कालाजाजी तु सुषवी कालिका चोपकालिका ॥८२॥ पृथ्वीका कारवी पृथ्वी पृथुक्रष्णोपकुञ्चिका । उपकुञ्ची च कुञ्ची च बृहज्जीरक इत्यपि ॥८३॥ जीरक्रतितयं रूक्षं कटूष्णं दीपनं लघु । संग्राहि पित्तलं मेध्यं गर्भाशयविशुद्धिकृत् ॥८४॥ ज्वरघ्नं पाचनं वृष्यं बल्यं रुच्यं कफापहम् । चक्षुष्यं पवनाध्मानगुल्मच्छर्द्यतिसारहृत् ॥८५॥ सफेद जीरा, स्याह जीरा तथा कलौंजी (मंगरेला) के नाम तथा गुण—उसमें से जीरक, जरण, अजाजी, कणा और दीर्घजीरक ये सब 'सफेद जीरा' के नाम हैं। कृष्णजीर, सुगन्ध और उद्गारशोधन ये नाम 'स्याहजीरा' के हैं और कालाजाजी (कोई २ काला तथा अजाजी ऐसा पृथक दो नाम मानते हैं), सुषवी, कालिका, उपकालिका, पृथ्वीका, कारवी, पृथ्वी, पृथु, कृष्णा, उपकुञ्चिका, उपकुञ्ची, कुञ्ची और बृहज्जीरक ये सब नाम कलौंजी (मंगरेला) के हैं। तीनों प्रकार के जीरे—रूक्ष, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, परिपाक में लघु, संग्राहो, पित्तकारक, मेधा के लिये हितकारी, गर्भाशय को शुद्ध करने वाले, ज्वरनाशक, पाचक, वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, रुचिकारक, कफनाशक, नेत्रों के लिये हितकारी और वायु, आध्मान, गुल्म, वमन और अतिसार को भी दूर करने वाले होते हैं ॥ ८१-८५ ॥ ९९ शुक्लजीरक (जीरा) हि०—जीरा, सादाजीरा, साधारण जीरा, सफेद जीरा। ब०—सादाजीरे, शाहाजीरे, जीरे। म०— जीरें, पांढरे जीरे। गु०—जीरूं, शाकनु जीरूं, सादु जीरूं, धोलु जीरूं। क०—जीरिगे, बिलिय जिरिगे बिलिय जीरगे। ते०—जिलकारा, जील करर, जील कर्र। ता०—शीरगम। यू०—रवामुने। फा०— जीरये सफेद । अ०—कमून अविअज़ । अं०—Cumin seed (क्युमिन सीड) । ले०—Cuminum cyminum Linn. (क्युमिनम् साइमिनम्, लिन.) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। जीरा—एक सर्वप्रसिद्ध मसाले की वस्तु है। आसाम और बंगाल के सिवा प्रायः सब प्रान्तों में विशेषकर राजपूताना और उत्तर भारत के कई प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। यह खेतों में प्रति वर्ष बोया जाता है। इस क्षुप जाति की वनस्पति की शाखायें पतली होती हैं। पत्ते—सौंफ के पत्तों के समान पतले-पतले, लम्बे तथा २-३ एक साथ रहते हैं। बारीक सफेद फूलों के छत्ते लगते हैं। फल—सौंफ के समान होता है ॥ १८ ॥ रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि, उड़नशील तथा हलके पीले रङ्ग का तैल २·५-४% पाया जाता है। इस तैल में क्यूमिक ॲल्डिहाइड् (Cumic aldehyde) की मात्रा ५२% तक होती है जिसके अन्दर कई रासायनिक पदार्थ होते हैं। इस तैल को कृत्रिम रूप से थाइमॉल् (Thymol = अजवाइन का सत्व) में परिवर्तित किया जा सकता है जो अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) और कृमिघ्न पदार्थ है। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १०% एवं पेन्टोसान (Pentosan) ६·७% होता है। गुण और प्रयोग—यह पाचक, वातानुलोमक, मूत्रविरजनीय, वेदनाहर, उत्तेजक एवं संग्राहो है। इसका उपयोग वमन, अतिसार, कुपचन, आध्मान, ज्वर तथा मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग जैसे सुजाक, पथरी एवं मूत्रावरोध में किया जाता है। बालकों के पाचन के विकारों में यह अधिक उपयोगी है। (१) ज्वर में पाचन सुधरकर भूख बढ़ती है, पेशाब साफ होती है और दाह शांति होती है इसमें गुड़ के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये । (२) अतिसार में दही के साथ इसको दिया जाता है। जीरकाद्यमोदक का उपयोग जीर्ण अतिसार, अपचन एवं अग्निमान्द्यादि रोगों में किया जाता है। गर्भिणी में पित्तजन्य वांति में नींबू के रस के साथ देने से लाभ होता है। (३) सुजाक आदि में निम्न चूर्ण १० रत्ती की मात्रा में देने से लाभ होता है—जीरा ४, खुनखराबा २, कलमीशोरा ५, धनियां ५ तथा गुलाब २ भाग ।