भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
यूनानी चिकित्सकों के मत से खुरासानी अजवायन सफेद, काली और लाल तीन जाति की होती है। इनमें से काली विष के समान हानिकर और घातक मानी जाती है। रासायनिक संगठन—इसकी पत्तियों में हायोसायमिन (Hyoscyamine) नामक क्षाराभ तथा अल्प मात्रा में हायोसीन (Hyoscine) या स्कोपोलामाइन (Scopolamine), अंट्रोपिन (Atropine), हायोसिप्रिन (Hyosciprin), कोलिन (Cholin), तैल, गोंद, ॲल्ब्यूमिन तथा पोटैशियम नाइट्रेट २% आदि पदार्थ रहते हैं। इसकी विभिन्न जातियों में क्षाराभों की मात्रा भिन्न-भिन्न रहती है । सहारनपुर तथा काश्मीर में लगाये पौधों में इनकी मात्रा प्राकृत पौधों की अपेक्षा अधिक (०३%) होती है, तथा ब्रिटिशफारमाकोपिया के प्रतिमान (०५५%) के करीब होती है। इसके बीजों में हायोसायमिन (Hyoscyamine), २५% तैल, तथा राख ४-५% होती है । गुण और प्रयोग—यह अवसादक, वेदनाहर, स्वापजनक, उद्वेष्टन निरोधी, शामक, बल्य, कनीनिका विकासि, दीपन, पाचन तथा कृमिघ्न है। यह बहुत अच्छा वेदनाहर एवं निद्राकर है। इससे अफीम के समान कब्जियत नहीं होती। इसकी क्रिया बेलाडोना की तरह होती है, लेकिन इससे मस्तिष्क कम उत्तेजित होता है और सुषुम्ना एवं आन्त्र पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इससे अनैच्छिक मांस पेशियों के उद्वेष्टन के कारण होने वाले शूल—जैसे नाग (Lead) शूल तथा मूत्रमार्ग प्रक्षोभ से उत्पन्न शूल—दूर होते हैं। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, निद्राभंग, आक्षेप, नाड़ीशूल तथा अनेक मस्तिष्क के विकार एवं मानसिक अस्वस्थता में किया जाता है। सूखी खांसी एवं दमा में श्वसनिकाओं का संकोच दूर होकर लाभ होता है। यह विरेचक औषधियों से उत्पन्न मरोड़ को दूर करती है। पथरी एवं बस्तिशोथ आदि से उत्पन्न प्रक्षोभ में यवक्षार, पाठा तथा गुरुच के साथ यह बहुत गुणकारी है। अल्प मात्रा में देने से यह हृदय के लिये शामक है, और बल्य होने से हृदय की धड़कन में इससे लाभ होता है। पीडितार्तव, अनियमितार्तव में भी इसका अच्छा उपयोग होता है। मध के साथ इसके बीजों को पीसकर स्तनशोथ, अंडशोथ, यकृत पीड़ा एवं संधिशोथ में लगाने से शोथ एवं वेदना कम होती है। दांत के गड्ढे में इसके बीजों को पीस कर रखने से दंतशूल दूर होता है। इसको अंगारों पर जलाकर उसके धुएं को मुख में जाने देने से भी दंतशूल में लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह मादक विष है जिससे प्रलाप, संन्यास आदि होकर शीघ्र मृत्यु होती है। वृद्ध एवं दुर्बल इसकी अधिक मात्रा सहन नहीं कर सकते, लेकिन बच्चे अधिक मात्रा सहन कर सकते हैं। मात्रा—पत्र चूर्ण १॥-३ र., बीज चूर्ण १॥-३ र., तरल एक्स्ट्रैक्ट ३-६ बूंद, शुष्क एक्स्ट्रैक्ट १/२-१॥ र., टिंक्चर २०-६० बूंद। अथ शुक्लजीरककृष्णजीरककालिकानां नामानि गुणांश्च जीरको जरणोऽजाजी कणा स्याद्दीर्घजीरकः ॥ ८१ ॥ कृष्णजीरः सुगन्धश्च तथैवोद्गारशोधनः । कालाजाजी तु सुषवी कालिका चोपकालिका ॥८२॥ पृथ्वीका कारवी पृथ्वी पृथुक्रष्णोपकुञ्चिका । उपकुञ्ची च कुञ्ची च बृहज्जीरक इत्यपि ॥८३॥ जीरक्रतितयं रूक्षं कटूष्णं दीपनं लघु । संग्राहि पित्तलं मेध्यं गर्भाशयविशुद्धिकृत् ॥८४॥ ज्वरघ्नं पाचनं वृष्यं बल्यं रुच्यं कफापहम् । चक्षुष्यं पवनाध्मानगुल्मच्छर्द्यतिसारहृत् ॥८५॥ सफेद जीरा, स्याह जीरा तथा कलौंजी (मंगरेला) के नाम तथा गुण—उसमें से जीरक, जरण, अजाजी, कणा और दीर्घजीरक ये सब 'सफेद जीरा' के नाम हैं। कृष्णजीर, सुगन्ध और उद्गारशोधन ये नाम 'स्याहजीरा' के हैं और कालाजाजी (कोई २ काला तथा अजाजी ऐसा पृथक दो नाम मानते हैं), सुषवी, कालिका, उपकालिका, पृथ्वीका, कारवी, पृथ्वी, पृथु, कृष्णा, उपकुञ्चिका, उपकुञ्ची, कुञ्ची और बृहज्जीरक ये सब नाम कलौंजी (मंगरेला) के हैं। तीनों प्रकार के जीरे—रूक्ष, कटुरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, परिपाक में लघु, संग्राहो, पित्तकारक, मेधा के लिये हितकारी, गर्भाशय को शुद्ध करने वाले, ज्वरनाशक, पाचक, वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, रुचिकारक, कफनाशक, नेत्रों के लिये हितकारी और वायु, आध्मान, गुल्म, वमन और अतिसार को भी दूर करने वाले होते हैं ॥ ८१-८५ ॥ ९९ शुक्लजीरक (जीरा) हि०—जीरा, सादाजीरा, साधारण जीरा, सफेद जीरा। ब०—सादाजीरे, शाहाजीरे, जीरे। म०— जीरें, पांढरे जीरे। गु०—जीरूं, शाकनु जीरूं, सादु जीरूं, धोलु जीरूं। क०—जीरिगे, बिलिय जिरिगे बिलिय जीरगे। ते०—जिलकारा, जील करर, जील कर्र। ता०—शीरगम। यू०—रवामुने। फा०— जीरये सफेद । अ०—कमून अविअज़ । अं०—Cumin seed (क्युमिन सीड) । ले०—Cuminum cyminum Linn. (क्युमिनम् साइमिनम्, लिन.) । Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। जीरा—एक सर्वप्रसिद्ध मसाले की वस्तु है। आसाम और बंगाल के सिवा प्रायः सब प्रान्तों में विशेषकर राजपूताना और उत्तर भारत के कई प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। यह खेतों में प्रति वर्ष बोया जाता है। इस क्षुप जाति की वनस्पति की शाखायें पतली होती हैं। पत्ते—सौंफ के पत्तों के समान पतले-पतले, लम्बे तथा २-३ एक साथ रहते हैं। बारीक सफेद फूलों के छत्ते लगते हैं। फल—सौंफ के समान होता है ॥ १८ ॥ रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि, उड़नशील तथा हलके पीले रङ्ग का तैल २·५-४% पाया जाता है। इस तैल में क्यूमिक ॲल्डिहाइड् (Cumic aldehyde) की मात्रा ५२% तक होती है जिसके अन्दर कई रासायनिक पदार्थ होते हैं। इस तैल को कृत्रिम रूप से थाइमॉल् (Thymol = अजवाइन का सत्व) में परिवर्तित किया जा सकता है जो अच्छा प्रतिदूषक (Antiseptic) और कृमिघ्न पदार्थ है। इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १०% एवं पेन्टोसान (Pentosan) ६·७% होता है। गुण और प्रयोग—यह पाचक, वातानुलोमक, मूत्रविरजनीय, वेदनाहर, उत्तेजक एवं संग्राहो है। इसका उपयोग वमन, अतिसार, कुपचन, आध्मान, ज्वर तथा मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग जैसे सुजाक, पथरी एवं मूत्रावरोध में किया जाता है। बालकों के पाचन के विकारों में यह अधिक उपयोगी है। (१) ज्वर में पाचन सुधरकर भूख बढ़ती है, पेशाब साफ होती है और दाह शांति होती है इसमें गुड़ के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये । (२) अतिसार में दही के साथ इसको दिया जाता है। जीरकाद्यमोदक का उपयोग जीर्ण अतिसार, अपचन एवं अग्निमान्द्यादि रोगों में किया जाता है। गर्भिणी में पित्तजन्य वांति में नींबू के रस के साथ देने से लाभ होता है। (३) सुजाक आदि में निम्न चूर्ण १० रत्ती की मात्रा में देने से लाभ होता है—जीरा ४, खुनखराबा २, कलमीशोरा ५, धनियां ५ तथा गुलाब २ भाग ।
३२ भावप्रकाशनिघण्टुः (४) प्रसूता को देने से दुग्ध वृद्धि होती है। (५) हिचकी में घृत के साथ इसका धूमपान बहुत उपयोगी है। (६) इसको स्वरभंग एवं सर्पविष में भी उपयोगी बतलाया गया है। (७) इसका बाह्यलेप पीडाहर है एवं यह अर्श, स्तन, अण्डकोष तथा उदर की पीड़ा पर लगाया जाता है और घृत, मधु एवं नमक के साथ बिच्छू के काटने पर लगाने से लाभ होता है। इसके क्वाथ से स्नान करने से खुजली दूर होती है तथा इससे सिद्ध तैल का चर्मरोगों में उपयोग होता है। मात्रा—३-२ माशा २० कृष्ण जीरक हि०-काला जीरा, स्या जीरा, स्याह जीरा, कृष्णजीरा। ब०-काल जीरें, कृष्णजीरा। म०- शहाजीरें, शाहाजीरें, कालेजीरे। गु०-स्याजीरुं। क०-करिजीरके, करिजिरीगे । ते०-शिमइसपू। ता०-शिमह शोम्बु । मा०-श्याजीरो। जना०-गूंयूं । फा०-सियाहजीरा, स्याहजीरा, ज़ीरस्याह, जीरयेस्याह । अ०-कमूले किरमानी, कमून अस्वद । आं०-Black Caraway seed (ब्लॅक कॅराबे सीड)। ले०-Carum carvi Linn. (कॅरम् कॅरवई) । Fam. Umbelliferae (अम्बेलीफेरी) । इसका क्षुप उत्तरी हिमालय के पहाड़ी भागों में उत्पन्न होता है। इसकी खेती भारत के मैदानी भागों में एवं काश्मीर, कुमाऊं, गढवाल, चम्बा आदि पहाड़ी स्थानों में की जाती है। यह अफ- गानिस्तान एवं ईरान में भी होता है। यह १-२ फूट ऊँचा, शाखा-कोमल, हरित, एकांतर; पत्र- बहुविभक्त; पुष्प-श्वेत, छत्राकार; फल-कुछ टेढ़ापन लिये लंबे, सुगंधि, भूरापन लिये हुये काले, करीब ७ मि० मि० तक लंबे एवं २ मि० मि० चौड़े एवं दोनों सिरों पर नोकीले होते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल ३*१-७% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक और स्तन्यजनन है। आध्मान, उदर- शूल, अतिसार, अपचन, जीर्णज्वर आदि में इसका उपयोग किया जाता है। प्रसूतिकाल में दूध बढ़ाने के लिए इसको देते हैं। यूरोप में इसको शान्तिदायक, मस्तिष्क के लिए उत्तेजक और अप- तंत्रक में उपयोगी मानते हैं। (१) इसके तैल का उपयोग अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिए एवं उनसे उत्पन्न हृल्लास और मरोड़ को दूर करने के लिए किया जाता है। (२) इसके अर्क का उपयोग बच्चों का पेट फूलना, शूल आदि में अनुपान के रूप में किया जाता है। (३) अर्श में सूजन हो तो इसके क्वाथ से सेकने से लाभ होता एवं गर्भाशय की पीड़ा में स्त्री को इसके क्वाथ में बैठाते हैं। मात्रा—३-२ माशा । नोट-एक अन्य प्रकार के जीरक का वर्णन जिसे संस्कृत में अरण्यजीरक और लैटिन में वर्नोनिया अंन्थेलमिन्टिका; कॉम्पोसिटी (Vernonia anthelmintica Willd; Fam. Compo- sitae ) कहते हैं, परिशिष्ट में देखें । २१ कालाजाजी (कलौंजी) हि०-कलौंजी, कलवंजी, कलौजी, मँगरेला, मंगरैल, मंगरैला। बं०-मोटा कालेजीरे, मोटकालजीर । म०-कलौंजी जीरें, कालेजीरे । गु०-कलौंजी जीरुं । क०-करि जीरिगे । ते०-नल्लुजील कारा। हरीतक्यादिवर्गः ३३ फा०-स्याहदाना । अ०-हब्बतूस्सोदा, शोनीज़ । आं०-Black cumin (ब्लॅक क्युमिन् ), Small fennel (स्मॉल फेनेल), Nigella seed (निगेल्ला सीड)। ले०-Nigella sativa Linn. (निगेला सॅटिवा, लिन.)। Fam. Ranunculaceae रेनन्क्युलेसी ) । कलौंजी हमारे देश का सर्व प्रसिद्ध एक गरम मसाला है। यह प्रायः पूर्व के प्रान्तों में एवं बिहार और पंजाब में अधिक बोई जाती है। दक्षिणी यूरोप तथा सीरिया में भी वह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप छोटा, पत्ते लम्बे तथा कटे हुए, फूल-हल्के नीले रंग के और फलियां ३ इंच लम्बी होती हैं। बीज-त्रिकोणाकार, तिल के समान पर तिल से किञ्चित् मोटे और अत्यन्त काले रङ्ग के होते हैं। इसका गूदा सफेद होता है और इसमें तीव्र गन्ध होती है। रासायनिक संगठन—इसमें पीले रंग का उड़नशील तैल ०'५-१'४%, स्थिर तैल ३७'५%, राल, अेल्ब्युमिन, शर्करा, गोंद, टैनिन, ग्लूकोसाइड, मेलान्थिन, मेलान्येजेनिन (१%) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह सुगन्धित, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, गर्भाशय शुद्धिकर, स्तन्य- वर्धक, स्वेदल एवं कृमिघ्न है। इसका उत्सर्ग त्वचा, वृक्क एवं स्तन द्वारा होता है तथा इनके स्रावों की वृद्धि होती है। अधिक मात्रा में इसके सेवन से शरीर की उष्णता बढ़ती है, नाड़ी की गति बढ़ती है तथा साथ ही साथ गर्भाशय संकोच होकर गर्भपात की भी संभावना रहती है। सूतिका में इसका उपयोग चित्रकमूल के साथ करने से भूख बढ़ती है, पाचन ठीक होता है, गर्भाशय शुद्ध होता है तथा दूध भी बढ़ता है। पीडितार्तव वा नष्टार्तव में यह उपयोगी है। सूतिका ज्वर तथा विषमज्वर में इसका उपयोग किया जाता है। अग्निमांद्य, कुपचन तथा आध्मान आदि में अन्य औषधियों के साथ इसका प्रयोग लाभदायक है। हिचकी में मट्ठे के साथ देने से लाभ होता है। विरेचक औषधियों के साथ इसके उपयोग से मरोड़ नहीं होने पाती। यह मसाले के रूप में भी व्यवहार में आता है। इसका लेप हाथ और पैरों की सूजन पर करने से दर्द दूर होकर सूजन कम होती है। त्वक् रोगों में इससे सिद्ध तैल का व्यवहार करते हैं तथा इसका आंतरिक प्रयोग भी करते हैं। मात्रा ३-१ माशा। हानिकर-गर्भिणी के लिये। अथ धान्यकस्य नामानि गुणांश्चाह धान्यकं धानकं धान्यं धाना धानेयकं तथा । कुनटी धेनुका छत्रा कुस्तुम्बुरु वितुन्नकम् ॥८६॥ धान्यकं तुवरं स्निग्धमवृष्यं मूत्रलं लघु । तिक्तं कटूष्णवीर्यञ्च दीपनं पाचनं स्मृतम् ॥ ८७ ॥ ज्वरघ्नं रोचनं ग्राहि स्वादुपाकि त्रिदोषनुत् । तृष्णा दाहवमिश्र्वासकास कार्श्यक्रिमिप्रणुत् ॥८८॥ आर्द्रन्तु तद्गुणं स्वादु विशेषात्पित्तनाशनम् १ ॥ ८८ ॥ धनियाँ के नाम तथा गुण-धान्यक, धानक, धान्य, धाना, धानेयक, कुनटी, धेनुका, छत्रा, कुस्तुम्बरु और वितुन्नक ये सब 'धनियाँ' के नाम हैं। धनियाँ-कषायरसयुक्त, स्निग्ध, अवृष्य, मूत्रजनक, लघु, तिक्त तथा कटुरस युक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, पाचक, ज्वरनाशक, रोचक, ग्राही, परिपाक में मधुररसयुक्त, त्रिदोष को दूर करने वाली, तृष्णा (प्यास ), दाह, वमन, श्वास, कास, कृशता तथा कृमिरोग का नाश करने वाली है। कच्ची धनियाँ के भी गुण ३ १. 'पित्तनाशि तदिति पाठः । ३ भा० नि०
३४ भावप्रकाश निघण्टुः 'धनियाँ' ही के समान है किन्तु विशेषता यह है कि यह मधुर रस युक्त तथा पित्त की विशेष रूप से नाशक होती है ॥ ८६- ८८ ॥ २२ धनियाँ हि०-धनियाँ । बं०-धने । म०-धने, । कोथिंबीर, धणे । गु०-धाना, धाणा, कोथमीर । क०-कोथुंबुरी, कोथम्बरी, हविज । ते०-कोत्तिमिरि, धनियल्लु । ता०-कोत्मल्लि, कोतमल्ली । सिन्ध०-धातु । फा०-कश्नीज । अ०-कज़बुरा, कजबुरह । अं० -- Coriander fruit ( कोरि- ॲन्डर फ्रूट ) । ले०-Coriandrum sativum Linn. ( कोरिएण्ड्रम् सैटिवम् लिन ) । Fam. Umbelliferae (अंबेलीफेरी) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में एवं विदेशों में भी इसकी उपज की जाती है । इसका पौधा १-२ फुट ऊँचा, शाखायें-चिकनी, पत्ते-विषमपत्ती, जड़ के निकटवाले पत्ते गोलाकार, ३-४ या ५ भागों में विभक्त, प्रत्येक भाग कटे किनारे वाले और कँगूरेदार तथा शाखाओं के पत्ते सोआ, चनसुल आदि के पत्तों के समान होते हैं । फूल-छत्ते से सोया के फूल के समान सफेद या किंचित् गुलाबी रंग के आते हैं। फल-नन्हें नन्हें, अण्डाकार, गुच्छों में छत्राकार लगते हैं । सूखने पर वे दो टुकड़े होकर धनिये के नाम से बिकते हैं । रासायनिक संगठन-इसके फलों में एक उड़नशील तैल ०'५-१% तक पाया जाता है जिसमें ४५-५५% कोरिएण्ड्रॉल ( Coriandrol, C₁₀H₁₈O ) तथा कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं । इसके अतिरिक्त इसमें स्थिर तैल १३%, वसीय पदार्थ १३%, गोंद, टैनिन, मैलिक एसिड तथा राख ५% आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग-धनियां मूत्रल, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, संग्राहक, दाहशामक एवं पिपासाघ्न है । इसका उपयोग नेत्र रोग, ज्वरजन्यदाह, वमन, अतिसार, आमाजीर्ण, आध्मान, शूल आदि में किया जाता है। मसाले के रूप में, अनेक औषधियों को सुगन्धित करने के लिए तथा विरेचक ओषधियां जैसे सनाय रेवाचीनी आदि से मरोड न हो इसलिए इसका व्यवहार किया जाता है। ( १ ) ज्वर में दाह एवं प्यास की शान्ति के लिए इसका शीत कषाय मिश्री तथा मधु मिला- कर पिलाते हैं । ( २ ) नेत्राभिष्यन्द में इसके क्वाथ को छानकर नेत्र बिन्दु के रूप में डालने से लाभ होता है। पहले एरण्ड तैल डालकर फिर इसका प्रयोग करना चाहिये । शीतला में आँख धोने के लिये इसके जल का व्यवहार किया जाता है जिससे उत्तरकालीन नेत्राभिष्यन्द एवं नेत्रव्रण आदि उपद्रवों का प्रतिषेध होता है। ( ३ ) इसके तैल का व्यवहार वातनाडी शूल एवं जोड़ों के दर्द में करते हैं तथा बच्चों के आध्मान जन्य शूल में १-४ बूँद मिश्री के साथ देते हैं । ( ४ ) कच्ची धनियां का लेप सिरदर्द तथा भिलावे से उत्पन्न दाह पर किया जाता है। ( ५ ) पुराने घाव, सूजन तथा विषैले फोड़ों पर यवके आटे के साथ इसकी पुल्टिस उपयोगी है । ( ६ ) इसके क्वाथ में मिश्री मिलाकर रक्तार्श में देने से लाभ होता है। ( ७ ) क्षोभशामक होने के कारण धनियां के शीत कषाय का उपयोग अनुपान या सहपान के रूप में स्वप्नमेह एवं श्वेतप्रदर में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः । ३५ ( ८ ) जीर्ण प्रतिश्याय में धनियां का फाण्ट या बीजों का चूर्ण मिश्री के साथ प्रयुक्त होता है । मात्रा- ३ - ४ माशा । अधिक मात्रा में सेवन से कामशक्ति का ह्रास तथा स्त्रियों में मासिक धर्म रुक जाता है । दर्पनाशक - मधु, दालचीनो और अण्डा । अथ शतपुष्पामिश्रेयोर्नामानि गुणांश्चाह शतपुष्पा शताह्वा च मधुरा कारवी मिसिः । अतिलम्बी सितच्छत्रा संहितच्छत्रिकाऽपि १ च ॥ छत्रा शालेयशालीनी मिश्रेया मधुरा मिसिः । शतपुष्पा लघुस्तीक्ष्णा पित्तकृद्दीवनी कटुः ॥ उष्णा ज्वरानिलश्लेष्मव्रणशूलाक्षिरोगहत् । मिश्रेया तद्गुणा प्रोक्ता विशेषाद्यो निशूलनुत् ॥ अग्निमन्द्यहरी हृद्या वद्धविट्कृमिशुक्रहृत् । रूक्षोष्णा पाचनी कासवमिरुलेष्मानिलाहरेत् ॥ सोया और सौंफ के नाम तथा गुण- शतपुष्पा, शताह्वा, मधुरा, कारवी, मिसि, अतिलम्बी, सितच्छत्रा तथा संहितच्छत्रिका ये नाम सोये के हैं और छत्रा, शालेय, शालीन, मिश्रेया, मधुरा और मिसि ये सब नाम सौंफ के हैं। सोयां-परिपाक में लघु, तीक्ष्ण, पित्तकारक, अग्निदीपक, कड़वरसयुक्त, उष्णवीर्य तथा ज्वर, वातश्लेष्म, व्रण, शूल और नेत्रसम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली है और सौंफ के भी सोये के समान ही गुण हैं किन्तु विशेष करके यह योनिसम्बन्धी शूल को दूर करने वाली, अग्नि की मन्दता को नाश करने वाली, हृदय के लिये हितकारक, मल की विबद्धता को दूर करने वाली, कृमि तथा शुक्र का नाश करने वाली, रूक्ष, उष्णवीर्य पाचक एवं कास, वमन, कफ तथा वायु को दूर करने वाली होती है ॥ ८९-९२ ॥ २३ सोआ हि०-सोआ, सोया, सोवा, बनसौंफ । बं०-शुलफा, शुल्का । पं०-सोया । म०-बालंत शोप, शेप । क०-सब्बसिगे । गु०-सुवा । सै०-पुरातकुषिविट् डुलू, सोम्पा । मा०-सोवा, सुवा । ता०-शतकुप्पी विरइ । अं०-Indian dill fruit ( इण्डियन डिल फ्रूट ) । ले०-Anethum sowa Kurz ( अनेथम् सोवा ) । Peucedanum graveolens Linn. (प्यूसिडैनम् ग्रॅवियोलेन्स लिन) Fam. Umbelliferae ( अंबेलीफेरी ) । युरोपीय जाति प्यूसिडैनम् ॲवियोलेन्स ( Peucedanum graveolens ) से भारतीय जाति में कुछ अन्तर होने के कारण भारतीय जाति को अनेथम सोवा ( Anethum sowa ) कहते हैं । इस देश के सब प्रान्तों में विशेषकर गरम और शीत गरम प्रान्तों में इसकी खेती शीत ऋतु में की जाती है। यह क्षुप जाति की वनस्पति १-३ फुट तक ऊँची होती है । पत्ते-कई भागों में विभक्त, बारीक और अत्यन्त कोमल होते हैं । फूल-छत्राकार किञ्चित् पीले रंग के होते हैं । फल-अंडाकार, चिपटे, उन्नतोदर, किनारे पर सपक्ष एवं प्रायः दोनों अर्धखण्ड मिले हुये तथा आधार पर पतला डण्ठल लगा रहता है। ये विदेशी बीजों से कम चौड़े तथा अधिक उन्नतोदर और इनके पृष्ठ भाग की धारियां हलके रंग की होती हैं । १. 'संहिते'ति पाठा० ।
३६ भावप्रकाश निघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके फलों में ३-३.५% एक उड़न शील तैल पाया जाता है । इस तैल में डिल एपिओल (Dill-apiole, C₁₂H₁₄O₄) नामक एक तैलीय पदार्थ रहता है जो पारस्ले एपिओल (Parsley apiole, C₁₂H₁₄O₄) के सदृश होते हुये भी गुणों में उससे पृथक् (Isomeric = आइसॉमेरिक्) रहता है । इसके अतिरिक्त इसमें एक तरल हाइड्रोकार्बन ॲनीथेन् (Hydrocarbon-anethene, C₁₀H₁₆) और कारवोन (Carvone) सदृश पदार्थ रहता है । विदेशी और भारतीय तैल में थोड़ा अन्तर होता है । गुण और प्रयोग—सोआ दीपन, पाचन, वातानुलोमक, सुगन्धि, उत्तेजक, वातहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं दुग्धवर्धक है। बालकों के पचन विकारों में, विशेषकर आध्मान एवं शूल में चूने के जल के साथ इसके अर्क का बहुत व्यवहार किया जाता है। प्रसूता में भी वमन, अजीर्ण, हिक्का, आध्मान, शूल तथा दुग्ध वृद्धि आदि के लिये इसके क्वाथ का प्रयोग किया जाता है । अनार्तव में भी इसका प्रयोग करते हैं । केल और म्हसकर के मतानुसार अंकुश कृमि (Hookworm) में यह उपयोगी है । (१) अतिसार में मेथी और सोआ घी में भूनकर देते हैं । (२) इसके पत्तों को तेल लगा कर गरम करके फोड़े फुन्सियों पर बांधने से वे जल्दी पक जाते हैं । (३) इसके पत्ते तथा मूल को पीसकर जोड़ों की सूजन पर बांधने से लाभ होता है । (४) विरेचक औषधियों के साथ इसके तैल या अर्क के व्यवहार से मरोड नहीं होती । (५) चरक की राजयक्ष्मा की चिकित्सा में पार्श्वशूलहर लेप में इसका उल्लेख है । मात्रा—फल चूर्ण - १-४ माशा, तैल-१-३ बूंद, अर्क-३-१ औंस । संकेन्द्रित जल (अंका कन्सैन्ट्रैट = Aqua Concentrata) - ५-१५ बूंद । २४ सौंफ हि०-सौंफ, बड़ी सौंफ, सवँफ । ब०-मौरी, पान मौरी । म०-बड़ी शेगले गु०-वरीआली, वलीय़ारी । क०-बड़ी सोपु, सब्बसिंगे । मा०-सौंफ । प०-सौंफ । ते -सोपु, पेद्दजिलकुरा । ता०-सौदिकिरे, शोम्बु । फा०-राजयानज्, राजयाना, बादियां, बादियान, राजियानह् । अ०- एजियानज़, असुलुल एजियानज़, राज़ियाज़ । अं०-Fennel Fruit (फेन्नेल फ्रूट)। ले०-Foe- niculum vulgare Mill. (फिनिक्यूलम् वलगेरि); Syr.-Anethum foeniculum (एनेथम् फिनिक्यूलम् ।। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह बोई जाती है । इसका क्षुप लम्बा, पत्ते-कई भागों में विभक्त सोये के पत्तों के समान, फूल-छत्राकार किञ्चित पीले रंग के और फल-६ से ७ मि. मि. लम्बे, ४ मि. मि. चौड़े, आयताकार, प्रायः अखण्डित एवं डंठल युक्त होते हैं । नये बीज हरे रंग के और पुराने होने पर पीलापन युक्त हो जाते हैं। जिन फलों का तेल निकाल लिया जाता है उनमें तैल की मात्रा कम हो जाती है और उनकी गन्ध भी कम होती है तथा वे अधिक गहरे रंग के हो जाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल १-२.९% और स्थिर तैल ८.८-१५.८% रहता है । इस उड़नशील तैल में एनीथॉल् (Anethol) ६०% तथा फेनकोन् (Fenchone)
हरीतक्यादिवर्गः ३७ आदि कुछ अन्य पदार्थ रहते हैं । विदेशी सौंफ की अपेक्षा भारतीय सौंफ में इस तैल की मात्रा कम रहती है । गुण और प्रयोग-यह सुगन्धि, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, दाहप्रशमन एवं मूत्रविर- जनीय है । इसका उपयोग विशेषरूप से मसाले के रूप में एवं मादक पेयों में सुगन्धि के लिये किया जाता है। इसका अर्क बच्चों के पाचन के विकार जैसे आध्मान, शूल आदि में दिया जाता है और अन्य औषधियों के अनुपान के रूप में भी व्यवहार करते हैं। इसका व्यवहार आमातिसार, अजीर्ण, आध्मान, ज्वर, खांसी, श्वास, वृक्कयोग, प्लीहा वृद्धि, अनार्तव तथा दृष्टिमांद्य आदि रोगों में किया जाता है । (१) इसको पीसकर पीने से पेशाब की जलन दूर होकर पेशाब साफ होती है । (२) सूखी खांसी और मुख के विकारों में इसे मुख में रखने से लाभ होता है । (३) इसके पत्र सुगन्धि, मूत्रल और स्वेदजनक होते हैं । (४) इसका मूल विरेचक होता है । (५) इसके फलों को पीसकर लेप करने से गरमी के दिनों में होने वाला चक्कर तथा शिरःशूल दूर होता है । (६) आध्मान में इसके क्वाथ से बस्ति देने से लाभ होता है । मात्रा-४ रत्ती से २ माशा तक । नोट-एक अन्य प्रकार की सौंफ जिसे 'बादियाण' (Pimpinella anisum Linn. पिंपिनेल्ला एनिसम्) कहते हैं उसका वर्णन परिशिष्ट में देखें । अथ मेथीवनमेथीनामगुणानाह 'मेथिका मेधिनी मेथी दीपनी बहुपत्रिका । बोधिनी बहुबीजा च ज्योतिर्गन्धफला^२ तथा । वल्लरी चन्द्रिका मन्था मिश्रपुष्पा च केरवी । कुञ्चिका बहुपर्णी च पीतबीजा^३ मुनिच्छदा ॥ मेथिका वातशमनी श्लेष्मघ्नी ज्वरनाशिनी । ततः स्वल्पगुणा वन्या^४ वाजिनां सा तु पूजिता ॥ मेथी तथा वनमेथी के नाम तथा गुण-मेथिका, मेथिनी, मेथी, दीपनी, बहुपत्रिका, बोधिनी, बहुबीजा, ज्योतिः, गन्धफला, वल्लरी, चन्द्रिका, मन्था, मिश्रपुष्पा, केरवी, कुञ्चिका, बहुपर्णी, पीतबीजा और मुनिच्छदा ये सब नाम मेथी के हैं। मेथी-वायु को शमन करने वाली, कफ को दूर करने वाली तथा ज्वर को नष्ट करने वाली है और वनमेथी-मेथी की अपेक्षा कम गुण वाली होती है, किन्तु वह घोड़ों के लिये अत्यन्त उत्तम (हितकर) होती है ॥ ९३-९५ ॥ २५ मेथी हि०-मेथी । पं०-बं०-म०-गु०-मेथी । ते०-मेंडुलु, मैंतुलु, मेंति । ता०-वेण्डयम्, वेंडयम, वेन्दयम । क०-मेंत्रे । मल-उल्लव । फा०-तुख्माशमलीत । अ०-बजरुल हुल्वा, वजरुलहुल्वह्, हुलबह् । १. 'मिथिनौ'ति पाठा० । २. 'जाती'ति पाठा० । ३. 'पित्तजिद्वायुनुद्विधे'ति पाठा० । ४. 'वल्वे'ति पाठा० ।
३८ भावप्रकाशनिघण्टुः अं०-Fenugreek (फेनुग्रीक) । ले०-Trigonella foenumgraecum Linn. (ट्राइगोनेल्ला फोएनम् ग्रेडकम्) । Papilionaceae (पैपिलिओनेसी) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पञ्जाब और काश्मीर में यह आपही आप जङ्गल में उत्पन्न होती है। इसका क्षुप ६ इञ्च से १६-१७ इञ्च तक ऊँचा होता है। पत्ते संयुक्त एवं प्रत्येक सींक पर तीन तीन पत्रक रहते हैं और वे आधे से एक इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं। फूल-नन्हें नन्हें हलके पीत रङ्ग के आते हैं। फलियाँ-गोल २-३ इञ्च लम्बी कुछ टेढ़ी सी नोकदार रहती हैं। प्रत्येक से १०-२० पीले रङ्ग के दाने निकलते हैं। इन्हीं का चिकित्सा में अधिक उपयोग करते हैं। रासायनिक सङ्गठन-इसके सूखे पञ्चाङ्ग में प्रोटीन (Protein) की मात्रा १६% रहती है जिसमें से इसके ग्लोब्यूलिन (Globulin) में हिस्टिडीन् (Histadine) की काफी मात्रा रहती है। इसके अलब्यूमिन् (Albumin) भाग में फॉस्फोरस् (Phosphorus) तथा गन्धक रहता है। इसके बीजों में ट्रिगोनेल्लिन (Trigonelline, C_7 H_7 O_2 N), कोलीन (Choline) आदि क्षाराम, एक पीत रञ्जक पदार्थ, स्थिरतैल ६%, प्रोटीन २२% तथा गोंद २८% रहता है। बीजों को जलाने से इसमें ७% राख निकलती है जिसमें से ३ फॉस्फोरिक् एसिड (Phosphoric acid) रहता है। इसके बीजों में फॉस्फेट्स (Phosphates), लेसिथिन् (Lecithin) और न्यूक्लिओ अलब्यूमिन् (Nucleo-albumin) रहने के कारण ये कॉडलिवर ऑइल (Cod-liver oil) के समान पोषक तथा बलकारक होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज स्निग्ध, सुगन्धि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, आध्मानहर, बल्य, वृष्य, वातहर, गर्भाशय सङ्कोचक, दुग्ध वृद्धिकर एवं शोथघ्न होते हैं। इसके पत्र शीतल, दाहशामक, शोथहर एवं मृदु विरेचक होते हैं। (१) इसके बीजों से बनाये लड्डू का व्यवहार प्रसूता में किया जाता है जिससे भूख बढ़ती है, मल शुद्धि और आर्तवशुद्धि होती है। अजीर्ण, अग्निमांद्य, आमवात, एवं कामशक्ति की कमजोरी में भी ये उपयोगी हैं। (२) रक्तातिसार एवं मसूरिका में इसके बीज भूनकर और फिर उसका फांट बनाकर देते हैं। (३) शरीर की पीड़ा में इसके बीजों को ३-१ तोला की मात्रा में खिलाने से लाभ होता है। (४) दुग्ध वृद्धि के लिये इसकी लप्सो बनाकर प्रसूता को दी जाती है। (५) घी में भुने हुये मेथी के बीज, बादियाण और नमक का व्यवहार अतिसार रोकने के लिये करते हैं। (६) इसके बीजों को कॉडलिवर आइल के स्थान पर दे सकते हैं और इसका व्यवहार गण्डमाला, फक्करोग, पाण्डु, वातरक्त, मधुमेह और औपसर्गिक रोगजन्य दौर्बल्य में किया जाता है। (७) मिश्र में ज्वर रोकने के लिये इसको अङ्कुरित करके खिलाते हैं। मधुमेह में भी इससे लाभ होता है। (८) चर्मको मुलायम और स्वच्छ रखने के लिये इसके बीजों का उपयोग किया जाता है। बालों के झड़ने पर तथा सूजन पर इसका लेप उपयोगी है। श्वेतप्रदर में इसकी पेसरी को धारण कराया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः ३६ (९) इसके पत्तों का भी लेप सूजन एवं दाह में किया जाता है। लू लगने में इसके पत्तों को पीसकर शरीर पर मलते हैं तथा आन्तरिक व्यवहार भी करते हैं जिससे दाह की शान्ति होती है। अल्पमूल्य में बल्य एवं पोषक होने के कारण पशुओं को भी खिलायी जाती है। मात्रा-चूर्ण ३-३ तोला । २६ बनमेथी हि०-बनमेथी, जङ्गली मेथी । पं०-सिंजी । सिन्ध-जिर । अ०-अकूलिल्-उल्-मल्लिका । अं०-Sweet-cloves (स्वीट् क्लोव्हस्) । ले०-Melilotus parviflora Desf. मेलिलोटस् पार्विफ्लोरा); Syn.-Trifolium indicum Linn. (ट्रिफोलिअम् इण्डिकम्) । Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी) । पश्चिम प्रायद्वीप, बंगाल और उत्तरप्रदेश आदि स्थानों में यह आप ही आप उत्पन्न होती है। इसका क्षुप-३० से ४५ मि० मि० ऊँचा तथा वर्षायु होता है। पत्र-संयुक्त तथा त्रिपत्रक होते हैं। पत्रक-१२ से १६ × ८ से १० मि० मि०, दन्तुर, अर्धभालाकार या अर्ध अंडाकार होते हैं। पुष्प-सूक्ष्म, पीतवर्ण की मंजरियों में आते हैं। फली-दीर्घवृत्ताकार, दबी हुई, दोनों छोर पर पतली एवं २.५ मि० मि० लंबे एक बीज युक्त होती है। गुण और प्रयोग-इसके बीज ग्राही होते हैं तथा उदरशूल, अतिसार और आंत्र के विकारों में लाभदायक हैं। इसका व्यवहार कष्टार्तव, आमवात, गण्डमाला आदि में तथा रक्त शुद्धि के लिये किया जाता है। बच्चों के अतिसार में इसकी लप्सी का व्यवहार करते हैं। अथ चन्द्रशूरस्य नामानि गुणांश्चाह चन्द्रिका चर्महन्त्री च पशुमेहनकारिका । नन्दिनी कारवी भद्रा वासपुष्पा सुवासरा ॥५६॥ चन्द्रशूरं हितं हिक्कावातश्लेष्मातिसारिणाम् । असृग्वातगदद्वेषि बलपुष्टिविवर्द्धनम् ॥५७॥ चनसूर के नाम तथा गुण-चन्द्रिका, चर्महन्त्री, पशुमेहनकारिका, नन्दिनी, कारवी, भद्रा, वासपुष्पा और सुवासरा ये नाम चनसूर के हैं। चनसूर-हिक्को, वात-श्लेष्मा और अतिसार ग्रस्त रोगी तथा रक्तवातग्रस्त रोगियों के लिए हितकर है और बल तथा पुष्टिवर्धक भी है ॥५६-५७॥ २७ चन्द्रिका (हालों) हि०-हालों, हालिम, चनसुर, चन्दसुर, चन्द्रशूर । बं०-हालिम, हालिमा, हालो, चान्दसूर, अलेवेरी । म०-आलीव, हलिम, अहालीव । गु०-अशेलीओ, अशेरिया, आंशाल बीज । यू०- तरम राह के बीज । फा०-तुख्म तरह तेजक । अ०-बाजरुज्जरजीर । कुमा०-हालिम । ता०-अलिविरह । ते०-अदित यलु । प०-तेजक । सि०-अहेरो । क०-अह्लिबीज । अं०- Common Cress (कॉमनक्रेस) । ले०-Lepidium sativum Linn. (लेपिडियम् सेटि- वम्) Fam. Cruciferae (क्रूसीफेरी)। यह सब प्रान्तों में बोया जाता है। इसका क्षुप-१ से ३ फीट ऊँचा, मसृण या कुछ रोएंदार होता है। पत्ते-विभक्त होते हैं। पुष्प-सफेद तथा छोटे होते हैं। फल-०.२ इञ्च, चिपटे, १. 'चन्द्रिकाया' इति पाठा० । २. 'वामपुष्पे'ति पाठा० ।
४० | भावप्रकाश निघण्टुः अण्डाकार परन्तु अग्र पर भीतर की तरफ दबे हुये रहते हैं। बीज—छोटे, लाल तथा जल में डालने पर लुआबदार होते हैं। अधिकतर इसके बीजों का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक सुगन्धि उड़नशील तथा स्थिर तैल पाया जाता है। इसमें आयोडीन (Iodine), लोह, फॉस्फेटस् (Phosphates), पोटैश (Potash), कुछ लवण, एक तिक्त सत्व एवं जल आदि पदार्थ रहते हैं तथा गन्धक अधिक मात्रा में रहता है। इसके ग्लूको- साइड (Glucoside) को ग्लूकोट्रोपोइओलिन (Glucotro-poeolin) कहते हैं। गुण और प्रयोग—चनसुर रसायन, बल्य, वाजीकर, उत्तेजक, आनुलोमिक, दुग्धवर्धक एवं शूलहर है। इसका उपयोग प्रसूतावस्था, रक्तदोष, त्वचा के रोग, नेत्र रोग, यकृत और प्लीहा की जीर्ण वृद्धि, ग्रन्थिरोग, रक्तांश, श्वास, कास एवं अतिसार आदि में किया जाता है। (१) इसके फांट का व्यवहार आमाशय के प्रक्षोभ से उत्पन्न हिक्का में किया जाता है। इसको बार-बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाना चाहिये। इसी प्रकार प्रक्षोभजन्य अतिसार एवं ग्रहणी में भी इससे लाभ होता है। (२) गरी के साथ इसकी बर्फी या दूध में लप्सी बनाकर प्रसूता को दिया जाता है। यह रसायन, पौष्टिक तथा दुग्धवर्धक है। इससे कटिशूल एवं श्वेतप्रदर में भी लाभ होता है। दूध में उबाल कर गर्भपात कराने के लिए प्रयोग में लाते हैं। पुरुषों के लिए भी यह रसायन तथा वाजी- कर है एवं इसका व्यवहार शरीर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए करते हैं। (३) मिश्री के साथ इसका चूर्ण कुपचन, अतिसार एवं ग्रहणी आदि में देते हैं। (४) नींबू के रस में पीसकर इसका लेप कटिशूल, आन्त्रिक शोथ, आमवात तथा सन्धिशूल आदि में करते हैं। (५) इसके पत्र मूत्रल तथा उत्तेजक होते हैं एवं इनका सलाद प्रशीताद (Scurvy = स्कर्वी) नामक रोग में व्यवहार में लाया जाता है। (६) इसकी जड़ का व्यवहार फिरङ्ग तथा निस्तानिका (Tenesmus = टेनेस्मस्) में किया जाता है। मात्रा—$\frac{१}{४}$-१ तो०।
अथ चतुर्बीजगुणानाह
मेथिका चन्द्रशूरश्च कालाऽजाजी यवानिका । एतच्चतुष्टयं युक्तं चतुर्बीजमिति स्मृतम् ॥९८॥ तच्चूर्णं भक्षितं नित्यं निहन्ति पवनामयम् । अजीर्ण शूलमाध्मानं पार्श्वशूलं कटिष्यथाम् ॥ 'चतुर्बीज' (चारदाना) के गुण—मेथी, चनसुर, मंगरैला और अजवाइन इन चारों के बीजों के योग को 'चतुर्बीज' (चारदाना) कहते हैं और इस चतुर्बीज का चूर्ण बनाकर नित्य खाने से वात सम्बन्धी रोग, अजीर्ण, शूल, आध्मान, पार्श्वशूल और कमर का दर्द दूर होता है॥९८-९९॥
अथ हिङ्गुनामगुणानाह
सहस्रवेधि जतुकं बाह्लीकं हिङ्गु रामठम् ॥ १०० ॥ हिङ्गूष्णं पाचनं रुच्यं तीक्ष्णं वातबलासत्नुत् १। शूलगुल्मोदरानाहकृमिघ्नं पित्तवर्धनम् ॥ १. 'हृदि'ति पा० ।
हरीतक्यादिवर्गः | ४१ हींग के नाम तथा गुण—सहस्रवेधि, जतुक, बाह्लीक, हिङ्गु और रामठ ये सब नाम हींग के हैं। हींग उष्णवीर्य, पाचक, रुचिकारक, तीक्ष्ण, वात-श्लेष्म को दूर करने वाला, शूल, गुल्म, उदर सम्बन्धी रोग, आनाह (अफरा) और कृमियों को नष्ट करनेवाला एवम् पित्त को बढ़ाने वाला होता है ॥ १००-१०१॥
२८ हींग
हि०—हींग। ब०—हिंगु। पं०—हिंगे, हीग। म०—हिंग। मा०—हींग। गु०—हिंगड़ो, बधारणी, हिंग बघारणी। ते०—इङ्गुव, इंगुव, इंगुरा। ता०—पेरुंगियम्, पेरुंग्यम्। क०—हिंगु। फा०—अंगूजह, अंगुजा, अंगुजहे-ईल्ती। अ०—हिल तीत, हिल्तीस। अ०—Asafoetida (असेफीटिडा)। लै०—Ferula narthex, Boiss. (फेरुला नार्थेक्स, बॉ़यस.); F. alliacea Boiss. (फे. एलिएसिआ); Ferula foetida Regel (फेरुला फीटिडा)। Fam. Umbelliferae (अंबेलिफेरी)। हींग सर्व प्रसिद्ध वस्तु एक विदेशीय वृक्ष का निर्यास है। इसकी उपर्युक्त कई जातियां विभिन्न स्थानोंपर होती हैं जिनसे कुछ कुछ भिन्न प्रकार का निर्यास प्राप्त किया जाता है। अधिकांश मिला- वटी हींग बिकती है। इनमें चोखी हींग, हीरा हींग, तलाव हींग इत्यादि अच्छी समझी जाती हैं। जो हींग रूमी मस्तगी के समान वर्ण वाली, गरम घी में डालने से लावा के समान खिल जाने वाली तथा लालिमा लिये भूरे या बादामी रंग की हो वह अच्छी मानी जाती है। उत्तम हींग की डली को तोड़ने से वह भाग बादामी रंग का दिखाई पड़ता है। इसका स्वाद कड़वा और लहसुन के समान खराशदार तथा इसकी गन्ध लहसुन के समान तीव्र होती है। पानी में घोलने से सफेद रंग की दिखाई पड़ती है। हींग के वृक्ष काबुल, हिरात, खुरासान, फारस एवं अफगानिस्तान आदि प्रदेशों में उत्पन्न होते हैं तथा इस देश के पंजाब और काश्मीर में कहीं कहीं देखने में आते हैं। विभिन्न जातियों में थोड़ा बहुत स्वरूप में अंतर होता है। इसका वृक्ष झाड़ के समान छोटा, ५ से ८-९ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते अनेक भागों में विभक्त, अजमोदे के पत्तों के समान कटे किनारे वाले एवं १-२ फुट लम्बे होते हैं तथा टहनियों के अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फल-तिहाई से तीन चौथाई इञ्च के घेरे में अण्डाकार होते हैं। चार वर्ष का वृक्ष होने पर इसको काटते हैं और भूमि के पास वाली जड़ को तिरछे तराशने से जो रस निकल कर सूख जाता है उसको दो दिन के बाद खुरच कर संग्रह कर लेते हैं। फिर दो दिन के बाद जड़ को उसी प्रकार ऊपर से तराश कर छोड़ देते हैं और सूखने पर खुरच कर इकट्ठा कर लेते हैं। यही सूखा हुआ पदार्थ हींग है। प्रत्येक वृक्ष से २-३ छटांक से ५-६ छटांक तक हींग मिल सकती है। देशी हींग की अपेक्षा काबुली हींग अच्छी होती है। साधारण परीक्षा—(१) जल के साथ घोटने से इसका पीताभ दूधिया घोल बनता है जो क्षार मिलाने पर हरिताभ पीत हो जाता है। (२) थोड़ेसे हींग को गन्धक के तेजाब के साथ गरम करने पर लाल से भूरे रंग का घोल बनता है। इस घोल को अधिक जल से विरल बनाकर (Dilute), छानकर (filtering) उसको क्षारीय करने से एक गाढ़े नीले रंग की चमक उत्पन्न होती है (Purplish-blue fluorescence)।
४२ भावप्रकाश निघण्टुः
**मिलावटें—**हींग में कंकड़, बालू, मिट्टी, मूल के टुकड़े, गोदन्ती तथा गोंद आदि मिलाये रहते हैं ।
**रासायनिक संगठन—**यह गन्धक का सेन्द्रिय योग है । इसमें लहसुन में पाये जाने वाला एक उड़नशील तैल ३-१७% रहता है । इस तैल में टरपेन्स ( Terpenes ), डाइसल्फाइड्स ( Disulphides, $C_7H_{14}S_2$ and $C_{11}H_{20}S_2$ ) और एक नीले रंग का तरल पदार्थ $(C_{10}H_{16}O)n$ रहता है । इसमें राल ४०-६५% रहती है जिसमें असारेसिनोटेनॉल ( Asaresinotannol ), असा-रेसिनोल फेरूलिक एसिड इस्टर ( Asaresinol ferulic acid ester ) तथा फ्री फेरूलिक एसिड ( Free ferulic acid-1.3% ) रहता है । इसके अतिरिक्त इसमें गोंद की मात्रा २५% रहती है । शुद्ध हींग में ६५-७५% मद्यसार में घुलने वाले पदार्थ रहते हैं तथा राख ३-५% रहती है । इसकी राल का उर्ध्व पातन ( Dry distillation ) करने से अंबेलिफेरोन् ( Umbelliferone ) प्राप्त होता है लेकिन भारतीय जाति से यह प्राप्त नहीं होता ।
**गुण और प्रयोग—**हींग दीपन, पाचन, वातानुलोमक, उद्वेष्टन निरोधि, उत्तेजक, कफदुर्गन्धि हर, कफनिःसारक, वातनाड़ियों के लिये बल्य, गर्भाशयसंकोचक एवं कृमिघ्न है । इसका उत्सर्ग फुफ्फुस, त्वचा, मूत्र तथा पसीने के द्वारा होता है ।
इसका उपयोग आध्मान, शूल, अपस्मार, अपतन्त्रक, वातविकार, श्वास, कास, कुकास एवं हृच्छूल आदि में किया जाता है । हींग को घृत में भूनकर व्यवहार में लाया जाता है जिससे वमन नहीं होने पाता ।
(१) फुफ्फुस के रोगों में हींग का अच्छा उपयोग होता है। जीर्ण श्वास नलिका शोथ, दमा, कुकास, बच्चों के फुफ्फुसपाक एवं शुष्क कास आदि में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके लिये जल के साथ हींग के घोल का व्यवहार करना चाहिये ।
(२) आध्मान, शूल, विबन्ध एवं आमाशय तथा आन्त्र की शिथिलता में अजवाइन अथवा एलुवा और साबुन के साथ गोली बनाकर दिया जाता है । ऐसे विकारों में हिंग्वाष्टक चूर्ण अथवा हिंगुकर्पूरवटी का बहुत व्यवहार किया जाता है ।
(३) विषमज्वर में प्रतिबन्धन की दृष्टि से अन्न के साथ हींग का व्यवहार किया जाता है ।
(४) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं तज्जन्य अन्य विकारों में इसका बहुत अच्छा उपयोग होता है ।
(५) प्रसव के बाद इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। बार बार होने वाले गर्भपात को रोकने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं । गर्भ रहते ही ६ माशे हींग की ६० गोलियां बनाकर प्रारम्भ में १ गोली दिन में दो बार देते हैं । बाद में धीरे धीरे इसकी मात्रा बढ़ाते हुये १० गोली प्रतिदिन देते हैं और फिर प्रसवतक धीरे धीरे इसकी मात्रा कम करते हैं ।
(६) आध्मान, शूल एवं आक्षेप आदि में २-३ माशा हींग जल के साथ घोटकर उसकी बस्ति दी जाती है । इससे सूत्र कृमि में भी लाभ होता है ।
(७) सीलोन में नारियल के दूध में हींग को उबालकर सर्पदंश के स्थान पर लगाते हैं तथा पानी में इसको घोलकर नाक में भी टपकाते हैं। बिच्छू के काटने पर भी इसको लगाने से लाभ होता है।
(८) बच्चों के पेट फूलने पर इसका लेप पेट पर लगाते हैं तथा कुकास में छाती पर लेप करने से लाभ होता है। नारू तथा दाद पर इसको लगाने से लाभ होता है।
हरीतक्यादिवर्गः ४३
(९) हींग तथा अफीम की गोली दांत के दर्द में दांत के गड्ढे में रखने से लाभ होता है।
(१०) हींग, लहसुन तथा सैंधव आदि पदार्थों से सिद्ध तैल कर्णरोगों में बहुत उपयोगी है। इसको $\frac{३}{२}-१$ चम्मच दूध के साथ दिन में ३, ४ बार या सुबह ४ चम्मच एक साथ ही दूध और मिश्री के साथ पिलाते हैं एवं इसको गर्म करके कान में ३, ४ बूँद डालते हैं। यह तैल बहुत अच्छा प्रतिदूषक ( Antiseptic ) है एवं इसका अन्तर्वाह्य प्रयोग उपयोगी है।
**मात्रा—**२-८ रत्ती ।
अथ वचाया नामानि गुणाँश्चाह
वचोग्रगन्धा षड्ग्रन्था गोलोमी शतपर्विका । क्षुद्रपत्री च मङ्गल्या जटिलाोग्रा च लोमशा ॥ वचोग्रगन्धा कटुका तिक्तोष्णा वान्तिवह्निकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ अपस्मारकोन्मादभूतजन्तवनिळान्हरेत् ॥ १०३ ॥
**वच के नाम तथा गुण—**वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी, शतपर्विका, क्षुद्रपत्री, मङ्गल्या, जटिला, उग्रा और लोमशा ये सब नाम वच के हैं । **वच—**उग्रगन्ध युक्त, तिक्त तथा कटुरस वाली, उष्णवीर्य, वमनकारक, अग्निजनक, विबन्ध, आध्मान और शूलको नष्ट करने वाली एवं मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है। एवम् मिर्गी, कफ, उन्माद, भूतबाधा, कृमि तथा वायु को भी दूर करने वाली होती है ॥ १०२-१०३ ॥
२९ वच
**हि०—**वच, घोरवच, घोड़वच। **ब०—**वच । **म०—**वेखण्ड । **ते०—**वासा, वस । **ग०—**वज, घोड़ावज । **क०—**बजे । **ता०—**वशाम्बु । **मला०—**व्ययम्पु । **गोमा०—**वेखण्ड । **पं०—**बरि बोज । **फा०—**सोज़न जर्व, अगारि तुर्की । **अ०—**उद्दल बुज, अकरून, बज, विज । **यू०—**अकुरुन् । **अं०—**Sweet Flag (स्वीट फ्लैग) । **ले०—**Acorus calamus, Linn. (एकोरस् कॅलॅमस्, लिन.) । Fam. Araceae (एरेंसी) ।
एशिया खण्ड का मध्य भाग तथा पूर्वी यूरोप वच का उत्पत्ति स्थान माना जाता है। मणीपुर, नागा पहाड़, काश्मीर, सिरमूर और युक्त प्रान्त के कितने ही देशों के दलदल और सजल स्थान, में यह उत्पन्न होती है ।
यह गुल्म जाति की बनौषधि ३-४ हाथ ऊँची होती है। इसकी जड़ अन्य पौधों की जड़ की तरह सीधी नहीं रहती बल्कि बहुत सी जटा के सदृश जड़ की शाखायें चारों ओर फैली हुई रहती हैं और इसकी मुटाई मध्यमा उँगली के समान होती है। प्रत्येक गांठ के चारो ओर सघन रोवें से होते हैं। इसके पत्ते लम्बे, पतले और तलवार के समान रहते हैं। मंजरियां सघन, विदाण्डक, २-४ इञ्च लम्बी, लम्ब गोल और ६-१८ इञ्च लम्बे पत्रकोशों से ढकी रहती हैं । वच के पौधों के सर्वाङ्ग में गन्ध आती है और इसकी जड़ में यह अत्यधिक होती है। मूलस्तम्भ तथा राइजोम ( Rhizome ) को टुकड़े टुकड़े कर बाजार में बेचते हैं । ये भूरे रङ्ग के और सुगन्धित होते हैं जिनके निचले हिस्से पर मूल के निशान रहते हैं तथा ऊपर के भाग में लम्बी गठेदार धारियां होती हैं ।
४४ भावप्रकाशनिघण्टुः बाजार में बच के नाम से प्रायः कुलिंजन ( Alpinia galanga ) की जड़ बेची जाती है । इसी लिये जहां बचा ( Acorus calamus ) की आवश्यकता हो वहां घोरबच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये । बच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि उडनशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन ( Acorin ) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लाइकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin ) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene ) नामक रवेदार क्षाराम तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कैल्शियम ऑक्सेलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में ॲसारिल् ॲल्डिहाइड (Asaryl-aldehyde ), ॲल्फापिनिन (a-pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—वच वामक, कफनिःसारक, हृल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धि है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है । ( १ ) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये । ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये । इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को ½ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरण शक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खांसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये । इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है । सरदी, गले की सूजन, खांसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है । सूखी खांसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टैनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिये। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है । दन्तोद्भेद के समय इसको चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है । (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये । (६) अर्श में आंग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है । (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, सन्धिपीडा, आध्मान, शूल तथा खांसी और श्वास में उपयोगी है। हरीतक्यादिवर्गः ४५ (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है । मात्रा—वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए-२-४ र०। अधिक मात्रा से शिरःशूल होता है। वर्णनाशक-सौंफ । अथ पारसीक ( खुरासानी ) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा । हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ॥१०४॥ खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लबचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच-शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करनेवाली होती है ॥ १०४ ॥ ३० पारसीक वचा ( खुरासानी वच ) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालवच भी कहते हैं । कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालवच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोर बच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । बालवच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गांठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है । इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधबच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी मोटी गांठें जैसी होती हैं। डा० देसाई के मत से मजार पोश (कश्मी०) ले०-Iris germanica Linn. (आइसिर जर्मेनिका) यह बाल वच है । यह कश्मीर में कम पर लगाई हुई मिलती है । बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालवच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी हृद्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिकारक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है ॥ १०५ ॥ ३१ कुलिंजन हिं०-कुलंजन, कुलिङ्कन, बड़ा कुलजन । ब०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलजम । म०- कुलिंजन्, कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन । गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन । सिन्ध०-कुंजर, कंजर, कांठी । ता०-पेररत्तै । ते०-पेद्डड्डुम्पराराष्ट्रकम् । मला०-पेरारट्टा । क०-धूम रास्मी। ब्रझी०-पदगोजी । फा०-खिरदारु, खरदारु, खुसरवे दारु एक़लान् । अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलंजाने कस्बी, खुलंजान्-ए-कबीर । अं०-Greater Galangal (ग्रेटर
४६ भावप्रकाशनिघण्टुः । गैलंगाल ); Java Galangal ( जावा गैलंगाल । ले०—Alpinia galanga Willd. (अल्पिनिया गैलंगा) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप आमा हल्दी के आकार का ६-७ फीट ऊंचा होता है। पत्ते—९ से १८ इंच लम्बे, १।। से ४।। इंच चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे छोटे आते हैं। फल—तिहाई इञ्च गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़—कन्दवत् और सुगन्ध युक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेंचते हैं। ये टुकड़े १ इञ्च से २।। इञ्च तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रङ्ग के और अन्दर से हलके नारङ्गी बादामी रङ्ग के होते हैं। रासायनिक संघटन—इसमें एक सुगन्धित हलके पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजेनॉल (Eugenol २५%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडे- नेन्स (Cadenens), बंसोरिन् (Bassorin) एवं गैलँगिन् (Galangin) रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कॅफेराइड (Kaempferide, $C_{16}H_{12}O$, $H_{2}O$), गलँगॉल (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलँगिन् (Mono-methyl ether of galan- gin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फ्लोबैफेन (Phlobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या काथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहसंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होता है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bron- chioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन-संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धि उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी, जुकाम, आमवात, खांसी, श्वास, स्वर भंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खांसी, कुकास एवं सरदी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्टननिरोधि गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धि, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः। ४७ (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका काथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्धि दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोग मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दांतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपयुक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२ से ४ र., टिं. ई-१ द्रा.। नोट—इसी की एक अन्य जाति जिसे अल्पीनिया आफिसिनेरम (Alpinia officinarum Hance) और अं. में लेसर गॅलेंगल (Lesser galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीनश्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है।
अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ॥ १०६ ॥ महाभरी बच के गुण—जो मोटी गांठवाली तथा सुगन्धयुक्त (महाभरी) बच होती है वह पूर्वोक्त बच की अपेक्षा हीन गुण वाली होती है ॥ १०६ ॥
३२ महाभरीबच हि०—महाभरा बच, महाभरी बच, कुलञ्जन भेद। ब०—महाभरी बच, नरकचूर। पं०—कचूर, नरकचूर। मला०—कटुइंशीकुआ । ले०—Zingiber zerumbet Rosc. ex Smith (जिंजीबर् जिरम्बैट्) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेसी)। इस देश के कई प्रान्तों में यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप गन्ने के समान ३ से ५ फीट ऊँचा और आध इञ्च गोल होता है। पत्ते—८-१२ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, नरसल के पत्तों के समान किञ्चित् आयताकार-भालाकार एवं नोकदार होते हैं। १२ से १८ इञ्च तक लम्बी डण्डियों पर फूल आते हैं। फूल—फीके पीले रङ्ग के होते हैं। फल—एक इञ्च लम्बा दीर्घवृत्ताकार होता है। बीज—छोटे छोटे आयताकार काले रङ्ग के होते हैं। मूलस्तम्भ—कड़ा, द्विवर्षीय, भीतर से पीत, एवं स्वाद में कुछ आर्द्रक जैसा ही किन्तु कुछ कड़वाहट लिये हुए होता है। इसका व्यवहार खांसी, श्वास, कृमि, कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों में किया जाता है एवं इसके अन्य गुण सोंठ की ही तरह हैं।
अथ चोपचीनीति लोके या प्रसिद्धा तस्या नाम गुणाँश्चाह द्वीपान्तरवचा किञ्चित्तिक्तोष्णा वह्निदीप्तिकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ वातव्याधीनपस्मारमुन्मादं तनुवेदनाम् । व्यपोहति विशेषेण फिरङ्गामयनाशिनी ॥१०८॥
४८ भावप्रकाशनिघण्टुः चोबचीनी के नाम तथा गुण-'दीपान्तरवचा' यह संस्कृत नाम चोबचीनी का है। चोबचीनी- कुछ तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, विबन्ध, आध्मान तथा शूल को नष्ट करने वाली, मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है एवं वातव्याधि, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद (पागलपन) और शरीर के दर्द को दूर करती है और विशेष करके यह फिरङ्गरोग के दूर करने में उत्तम होती है ॥ १०७-१०८ ॥ ३३ चोपचीनी हि०-चोपचीनी, तोपचीनी, चोबचीनी। ब०-तोपचीनी, कुमारिका, शुकचिन । म०, गु०- चोपचीनी । ते०-पिरङ्गीचेका । ता०-परङ्गिचेकई । मला०-चाइना पैवू या पैरू। ने०-चोपचीनी । यू०-खसिलियर आशसिनी । फा०-चोबचीनी । अ०-कशवचीनी, खुशंबुस्सीनी । अं०- China root (चाइनारूट) । ले०-Smilax china Linn. (स्माइलैक्स चाइना)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । वच की अनेक जातियों में चोपचीनी भी एक मानी गई है। यह चीन देश में अधिक उत्पन्न होती है और वहीं से इस देश में आती है। इस कारण इसका नाम दीपान्तरवचा रखा गया है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलनेवाली होती है। इस लता की जड़ को ही चोबचीनी कहते हैं। चोबचीनी ८-१० अङ्गुल लम्बी, आध से एक इञ्च तक मोटी, गांठदार, बेरेशा, खुरदरी तथा दृढ़ काष्ठवत् जड़ है। इसका स्वरूप सफेदी मायल पीत, गुलाबी एवं किंचित् कालापन युक्त होता है। अधिक पुरानी होने पर चोपचीनी में प्रायः घुन लग जाते हैं, जिससे वह छिद्र युक्त दिखाई देती है। घुनी हुई तथा गांठविहीन चोपचीनी को उपयोग में नहीं लाना चाहिये। रासायनिक सङ्घटन-इसमें वसा, शर्करा, ग्लूकोसाइड, रञ्जक पदार्थ, सॅपोनिन्, गोंद तथा स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-सम्राट् चार्ल्स पंचम के वातरक्त (Gout) में इस औषधि को बहुत सफलता सिद्ध होने से इसका यूरोप में बहुत प्रचार हुआ था। १७ वीं शताब्दी में सार्सोंपरिला के समान इसका व्यवहार किया जाता रहा। यह स्वेदल, स्नेहन, उत्तेजक, रसायन, रक्तशोधक, बल्य, वाजीकर, फिरंगहर तथा धातुओं को गलाने वाली (Resolvent = रीसॉल्भेन्ड) है। (१) इसको दूध में उबाल कर इसमें मस्तगी, इलायची तथा दालचीनी मिलाकर इसका व्यवहार आमवात, वातरक्त, अपस्मार, जीर्ण वातविकार, काश्यं, धातुक्षीणता, ग्रन्थिविकार तथा फिरंग की तृतीयावस्था में किया जाता है। (२) अनन्तमूल के साथ इसको पुराने सिरदर्द में देने से लाभ होता है तथा आमवात एवं फिरङ्ग में भी इसका व्यवहार करते हैं। (३) डा० देसाई के मतानुसार यह श्रेष्ठ रसायन है। इसकी क्रिया त्वचा, सन्धियों के बन्धन तथा रसग्रन्थियों पर होती है। सोजाक से उत्पन्न सन्थिशोथ आदि विकारों में तथा फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा तृतीयावस्था में इससे बहुत लाभ होता है। पोटेशियम् आयोदाइड् की अपेक्षा यह शीघ्र लाभकर निर्दुष्ट औषध है। फिरङ्गादि से उत्पन्न ग्रन्थिवृद्धि में इसके उपयोग से प्रथम वेदना कम होकर बाद में सूजन कम होती है। चोबचीनी जितना चूर्ण रूप में काम करती है उतना फाण्ट या क्वाथरूप में नहीं करती। हरीतक्यादिवर्गः ४९ मात्रा-चूर्ण-३-६ तो०, सोंठ के साथ दूध में। इस जाति की जिन अन्य औषधियों का व्यवहार किया जाता है प्रसंगतः उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है। (क) जङ्गली उशवा हि०-जङ्गली उशुवा, चोबचीनी । ब०-कुमारिका । मल०-कुरिबिल्पिण्ड । म०-घोटवेल । गु०-गुटी । ता०-मलैतामर ले०-Smilax macrophylla Roxb. (स्माइलैक्स मॅक्रो- फाइला राक्स) । यह एक बड़ी लता होती है जो समस्त भारत में उत्पन्न होती है। पत्ते-लम्बे, बड़े, अखण्ड और नुकीले रहते हैं जिन पर ५, ७ मोटी सिराएं होती हैं। कांटे दूर-दूर या प्रायः अनुपस्थित होते हैं। पुष्प-गुच्छों में आते हैं। फल-चने के समान गोल, हरित एवं पकने पर रक्तवर्ण के हो जाते हैं। मूल-बहुत तथा सार्सोंपरिला के समान लाल रंग की होती है। इसकी जड़ों का व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ें ताजी काम में लानी चाहिये। गुण और प्रयोग-यह स्वेदल, मूत्रल, पौष्टिक, कामोदीपक और रसायन है। फिरङ्ग की द्वितीयावस्था, जीर्ण आमवात तथा सन्धिशोथ में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। फिरङ्ग से उत्पन्न होने वाले फोड़े-फुन्सियां, सन्धिवान, अस्थिशोध, अस्थिवात और शूल तथा ग्रन्थियों की वृद्धि में उपयोगी है। पुराने चर्मरोग तथा गण्डमाला में इससे लाभ होता है। नेपाल में ३ माशा चूर्ण सोजाक तथा अन्य श्लैष्मिककला के स्रावों के लिए दिया जाता है। मात्रा-१-२ तो० चूर्ण का क्वाथ दिन में एक बार । (ख) बड़ी चोबचीनी हि०-बड़ी चोबचीनी । ब०-हरिनाशुक्चिन । म०-गोटी शुकचिन । पहा०-हङ्गिन । ले०-Smilax glabra Roxb. (स्माइलैक्स ग्लैब्रा राक्स) । यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें कांटे नहीं होते। पत्र-नुकीले, पतले, अधोभाग हलके रङ्ग का; पुष्प-सफेद विदाण्डक; मूल-चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग-इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हरिन शुकचिन । ब०-गुचिया शुकचिन । ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया) । यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं बर्मा में होती है। पत्र-पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएं रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ का रस निकाल कर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बांधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हि०-उशबामग्रबी, सार्सोंपरिला । अं०-Sarsaparilla (सार्सोंपरिला) । ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा) । ४ भा० नि०
५० | भावप्रकाशनिघण्टुः यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कडु होती है। रासायनिक संगठन- इसमें मुख्यतया संपोनिन् (Sapouin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्म विकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचुषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग अनेक बल्य पेयों में किया जाता है। भारतीय सार्सापरिला के नाम से अनन्तमूल का उपयोग किया जाता है। मात्रा- १ से ३ माशा ।
अथ हपुषाद्वयम्
तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्धं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम् , तयोर्नामानि गुणांश्चाह हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता । मत्स्यगन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांचनाशिनी ॥ हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः । पित्तोदरसमीरार्शो ग्रहणीगुल्मशूलहृत् ॥ पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ॥ ११० ॥ दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्ध- वाला होता है, उन दोनों के नाम तथा गुण— हपुषा, हबुषा और विस्रा ये तीन नाम प्रथम हाऊबेर के हैं और दूसरे के नाम-अश्वत्थफला, मत्स्यगन्धा, प्लीहहन्त्री, विषघ्नी और ध्वाङ्क्षनाशिनी (इसके खाने से कौवे मर जाते हैं) ये हैं। प्रथम हाऊबेर -अग्निदीपक, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मृदु, उष्णवीर्य, पाक में गुरु, पित्त, उदर और बात सम्बन्धी रोग, बवासीर, ग्रहणी, गुल्म तथा शूल को दूर करता है और दूसरा हाऊबेर भी इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है अन्तर केवल आकार तथा गन्ध मात्र में ही है।
३४ हपुषा ( हाऊबेर )
हिं०-हाऊबेर, हाऊबैर, आरार। ब०-हबुषा। म०-होश। मा०-हाऊबोर। पं०-हाऊबेर, पेल्यरी, अबडुल। कुमा०-चिचिया। काश्मी०-वेंथा, पेथरा। फा०-तुरुमदुलह, ओरस। अ०- अरअर, अबहाल, हब्बउलअरअर। अं०-Juniper berry (ज्युनिपेर बेरी)। ले०-Juniperus communis Linn. (ज्युनिपेरस कम्युनिस, लिन ) । Fam. Cupressaceae (क्यूप्रेसेंसी)। हाऊबेर दो प्रकार का होता है। एक का संस्कृत नाम 'हपुषा' और दूसरे का 'अश्वत्थफला' है। हपुषा और अश्वत्थफला वास्तव में दोनों फल और गन्धभेद से दो द्रव्य हैं, परन्तु दोनों के गुण समान हैं और दोनों ही के वृक्ष भी समान ही होते हैं। हपुषा-मछली के समान आकृति का एवं आम गन्ध युक्त और अश्वत्थफल-मछली के समान गन्ध और पीपर (अश्वत्थ) वृक्ष के फलों के समान फलवाला होता है।
हरीतक्यादिवर्गः | ५१ हपुषा के वृक्ष हिमालय के पश्चिमोत्तर भाग में कुमाऊँ से पश्चिम की ओर १२,५०० से १४,००० फीट की ऊंचाई तक देखने में आते हैं। इसका वृक्ष बड़ा नहीं होता बल्कि इसका झाड़ होता है जो सघन, फैला हुआ, तथा बारहो मास हरा भरा रहता है। पत्ते-रेखाकार, नोकीले, ५ से १३ मि. मी. लंबे, एक साथ तीन-तीन एवं काण्ड से समकोण बनाते हुए होते हैं। फूल-पीत वर्ण के गुच्छों में आते हैं। फल-३/८-३/२ इन्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार और पकने पर नीलापन युक्त काले या कुछ बैंगनी रङ्ग के दिखाई पड़ते हैं। इनके ऊपर रजावरण रहता है। अग्र भाग पर शल्कपत्र के त्रिविभक्त निशान रहते हैं और आधार पर भी शल्क पत्र के दो चक्र रहते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज रहते हैं जिनके पृष्ठ पर तैलग्रन्थियां पाई जाती हैं। फलों से तेल निकाला जाता है। कुछ लोग ले०-टॅमेरिक्स गॅलिका (Tamarix gallica Linn.), हि०-झाऊ तथा फ्लूजिया ल्यूकोपाइरस (Flueggea leucopyrus Willd) का ग्रहण करते हैं जो उचित नहीं है। रासायनिक संगठन- इसमें एक उड़नशील तैल ०.२५%, राल १०%, मधुशर्करा ३३%, एक तिक्त पदार्थ ज्यूनिपेरिन (Juniperin), ऑक्सैलिक एसिड तथा कुछ आर्गेनिक अम्ल (Organic acid) आदि पदार्थ रहते हैं। इसी की एक अन्य जाति ज्यू. मॅक्रोपोडा (J. macropoda Boiss) के फल कुछ लम्बे रहते हैं तथा उसमें तैल की मात्रा ३.२४% पाई गई है। गुण और प्रयोग- हाऊबेर सुगन्धित, मूत्रजननक, वातानुलोमक, आध्मानहर, पाचक, उत्तेजक, वृष्य, रक्तरुकन्दक, आर्तवजनक एवं उपसर्गनाशक है। इसका उपयोग उदर रोग, यकृत् प्लीहा के विकार, आमवात, संधिशोथ, श्वास, जीर्ण श्वस- निकाशोथ, मुखपाक, अर्धावभेदक, नया तथा पुराना सोज़ाक, श्वेतप्रदर, कष्टार्त्तव, अनार्तव, मधुमेह तथा चर्मरोग में किया जाता है। ( १ ) यह एक उत्तेजक मूत्रजनक है। इसकी क्रिया प्रत्यक्ष वृक्क के ऊपर होकर मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका उपयोग हृदय, यकृत अथवा जीर्ण वृक्कशोथ के कारण उत्पन्न जलोदर में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। तीव्र वृक्क शोथ में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बच्चों के वृक्कजन्य जलोदर में इससे लाभ होता है। ( २ ) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। ( ३ ) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्त्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ( ४ ) इसका काष्ठ स्वेदक है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। ( ५ ) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी० कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यो के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pesti- lence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है।
५२ | भावप्रकाशिनघण्टुः (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मधों के निर्माण के लिये युरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण–२-६ माशा। तैल–१ से १ बूंद पाचक, ४-६ बूंद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूंद। फांट–२-३ औंस।
अथ विडङ्गस्य नामानि गुणांश्चाह
पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ॥ विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ॥११२॥ वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुंलिङ्ग तथा नपुंसकालिङ्ग दोनों ही में व्यव- हृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब बायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। बायविडङ्ग—कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्नि- वर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है॥ १११-११२ ॥
३५ वायविडङ्ग
प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं किन्तु आज कल के कति- पय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आज कल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं हैं बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' (हि०-डिकामाली) शास्त्रीय विडङ्ग हैं। उनके मत से शास्त्रीय 'विडङ्ग' की जगह नाड़ीहिङ्गु को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही बायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार बायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं हैं और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः सर्वमान्य निर्णय होने तक इसीका व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हि०—बायविडङ्ग, बायभिडङ्ग, बायभिरङ्ग, भामिरंग, बाबिरंग। ब०—बिरंग। म०—बावड़िङ्ग, गु०—वावडीङ्ग। क०—वायुविडङ्ग, बायबिलंग। ते०—वायुविडंगमु । ता०—वायुविलंगम । पं०— बबरंग, बाबरंग। भा०—बायबिरंग। सिंहली—उम्बेलिया, अम्बेलिया। ने०—हिमलचेरी। अ०—बरंज काबली, विरंज काबुली। फा०—बरंग काबली, बिरंज कावली, विरङ्ग काबुली। अं०—Babreng; Fruits of Embelia ribes (बावरिंग, फ्रूट आफ एम्बेलिया राइब्स।) । ले०—Embelia ribes Burm. (एम्बेलिया राइब्स)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेसी)। यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है। इसकी झाड़ी बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है। छाल-वातरन्ध्रों के कारण खुरदरी होती है। टहनियां-लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं। पत्ते-चर्मवत्,
हरीतक्यादिवर्गः | ५३ २ से ४ इञ्च लंबे दीर्घवृत्ताकार, या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हल्के या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-चौथाई इञ्च तक गोलाकार, पकने पर लाल रंगके किन्तु सूखने पर झुर्रीदार काले रंग के दीख पड़ते हैं। फलों में डण्ठल के साथ पांच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नोकीला रहता है। फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है। चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है। रासायनिक संगठन—इसके फलों में एम्बेलिक् एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, C₁₈ H₂₈ O₄) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है। यह जल से अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है। क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराम तथा तैल, उड़नशील तैल, रंजक द्रव्य, टैनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोभिक तथा रसायन है। रसमन्थियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका उत्सर्ग मूत्रद्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। (१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। मेलफर्न (Male- fern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है। बच्चों को ४ माशा तथा बड़ों को ८ माशा चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात् एरण्ड तैल अथवा कोई विरे- चन देना चाहिये । अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात रातमें इसका चूर्ण मठ्ठे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये। इससे मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर इससे लाभ नहीं होता। इसका कृमिघ्न गुण एम्बेलिक् एसिड के कारण है। इसके लवण अमोनियम् एम्बेलेट (Ammonium embelate) (१॥-३ २०) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये। (२) यह एक अच्छा रसायन है। सुश्रुत में एक 'सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बत- लाया है। नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये । पथ्य में बिना नमक, मूंग का आंवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें। इसके उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है। शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है। इसके हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है। इससे सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता। (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये—वायविडङ्ग, गुग्गुल, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे २ लाभ होता है।
५४ भावप्रकाशनिघण्टुः (५) चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है। (६) मज्जातन्तु के रोग जैसे अर्धांगघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबाल कर देना चाहिये । (७) पीनस, शिरःशूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये । (८) बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है । (९) इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है । मात्रा—चूर्ण ४ से १६ माशा । ३६ विडङ्ग भेद सं०-विडङ्गभेद । हि०-वायविडङ्ग भेद, बायबिरङ्ग । अवध०-बेवरङ्ग । देहरादून-वाय- विरङ्ग, गैया । गोंड-कोपवल्ली । कुरकु०-भारङ्गेली । मु०-आमटी, गोंदली, वाबंटी । ने०-कलय बोगोटी । अं०-Basal (बासल) । लै०-E. tsjeriam-cottam, A. DC. (ए० त्स्जेरियम्-कोट्टम, ए० डीसी०) ! Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेंसी) । यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है। इसके वृक्ष छोटे और बहुत शाखदार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती हैं। फूल-हरियाली लिये सफेद रङ्ग या हरापन युक्त फीके पीले रङ्ग के बहुत छोटे छोटे आते हैं। फल-छोटे छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग-यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाज़ार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं। (१) यह भी विडङ्ग के समान स्फीतकृमि नाशक होता है। (२) गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गांठों पर लेप करते हैं। (३) दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दांत के गढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है। (४) इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है। (५) न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की मांड के साथ इसकी छाल को उबाल कर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं। इसके फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुफ्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं ।
हरीतक्यादिवर्गः । ५५ ३७ नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) नाडीहिङ्गु पलाशरूपा जन्तुका रामठी च सा। वंशपत्री च पिण्डाङ्गा सुवीर्य्या हिङ्गुनाडिका ॥ रा. नि. सं०-नाडीहिङ्गु, पलाशरूपा, जन्तुका, रामठी, वंशपत्री, पिण्डाङ्गा, सुवीर्य्या, हिङ्गुनाडिका । हि०-नाडीहिङ्गु, नारीहींग, कलपतोहींग, डिकामाली, डिकेमाली, कमरी । ब०-हिंगुविशेष । म०- डिकेमाली । गु०-डीकामारी । काठी०-मांलण, मालड़ी । क०-डिकामल्हि । ता०-कुंदै । ते०- गेरिविकि, करिगा, तेल्लामंगा । अं०-Gummy Gardena ( गम्मी गार्डेनीया ); Cambi resin (कॅम्बी रेसिन) । लै०-Gardenia gummifera Linn. (गार्डेनिया गम्मी- फेरा) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । इसके वृक्ष अधिकतया दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-छोटा-तथा शाखदार होता है। पत्ते-विनाल, ४"५-७ x २-२'५ से० मी० बड़े, दीर्घवृत्ताभ आयताकार, स्वरूप में कुछ अमरूद के पत्तों के समान तथा चिकने, चमकीले होते हैं। फूल-सुगन्धहीन, प्रारंभ में श्वेत किन्तु बाद में पीतवर्ण के १ से ३ साथ साथ रहते हैं। फल-२'५-३.८ से० मी०, आयताकार या दीर्घ वृत्ताभ, चिकना, लंबाई में धारीदार एवं नोकदार होता है। इन पौधों की कोमल शाखाओं के बीच तथा कलियों में से जाड़े के दिनों में हरियाली लिए हुए किञ्चित पीले रंग का गोंद निकलता है । उसी को 'डीकामाली' कहते हैं। इसकी छाल से गोंद नहीं निकलता । जंगली गोंड लोग ठीकरों में इकट्ठा कर सुखा करके बाजार में बेचते हैं। इस गोंद में छोटी छोटी लकड़ियां, फूस घास आदि मिली रहती है अत एव इसे गरम जल में घोल, छान एवं सुखा करके औषधि के काम में लेना चाहिये । शुद्ध डिकामाली में बिलार के मूत्र जैसी गन्ध आती है तथा वह कुछ आर्द्र एवं चमकीला रहता है और उसके चूर्ण बनाने में कठिनाई होती है। गुण नाडीहिङ्गु कटूष्णं च कफवातात्तिशान्तिकृत् । विष्ठाविबन्धदोषघ्नमानाहामयहारी च (रा० नि०) नाडीहिङ्गु-कटु, गरम, कफ और वात की पीड़ा को शमन करने वाली तथा विष्ठा, विबन्ध और आनाह रोग को नष्ट करने वाली है। नाडीहिङ्गुस्तु कटुकस्तीक्ष्णोष्णश्च दीपकः । कफवातमलस्तम्भमनोमोहामनाशनः ॥ (निघण्टुरत्नाकरः) नाडीहिङ्गु-कटु, तीक्ष्ण, गरम, अग्निप्रदीपक तथा कफ, वात, मलबन्ध, मन का मोह और आम का नाश करनेवाली है। रासायनिक संघटन-इसमें दो प्रकार के राल के सदृश पदार्थ रहते हैं जिसमें से गार्डेनिन् (Gardenin) रवेदार सुनहले पीले रंग का तथा दूसरा डिकेनाली (Dikenali) कुछ मुलायम तथा हरे रंग का होता है। गुण और प्रयोग-यह उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरहर, स्वेदजनन, श्लेष्मनिःसारक, त्वक दोषहर एवं प्रतिदूषक है । गुणों में बायविडङ्ग और डिकामाली बहुत समानता रखती है। किन्तु शास्त्रों में विडङ्ग को कृमिघ्न लिखा है और डिकायोली के विषय में उसकी कृमिघ्नता के गुण का स्पष्टीकरण नहीं किया
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है। आधुनिक शोध द्वारा सिद्ध हुआ है कि डिकामली भी विशेष कृमिघ्न है। नाड़ीहिङ्गु के प्रयोग से कोष्ठान्तर्गत वर्तुलाकार कृमि नष्ट या निर्जीव हो जाते हैं। बायविडङ्ग—पक्वाशय के लम्बे चिपटे कृमियों का विनाशक है। डिकामली—इन कृमियों का नाश नहीं कर सकती। इससे गोल ( Round ) या कुछ लम्बे नन्हें नन्हें कृमियों का नाश होता है। डिकेमाली का फांट नियत कालिक ज्वर में देने से कम्पन कम होता है। आन्त्र की विकृतियां जैसे आध्मान, कुपचन एवं शूल आदि में इससे लाभ होता है। बच्चों को दन्तोद्भव के समय जो पाखाना एवं कय आदि विकार होते हैं उसमें इससे अच्छा लाभ होता है। आध्मान में एलुवा के साथ पेट पर इसका लेप करते हैं तथा डिकेमाली खिलाते हैं। इसके फल विरेचक तथा कृमिघ्न होते हैं। मोटापा तथा प्लीहावृद्धि में इसका गोंद व्यवहार किया जाता है। बाहरी प्रयोग से दूषित व्रण साफ किये जाते हैं। इससे कीड़े नहीं पड़ने पाते तथा पड़े हुए कीड़े निकल जाते हैं और मक्खियां नहीं बैठने पातीं। इससे दन्तशूल में लाभ होता है। नारू में इसे ५ र० की मात्रा में देते हैं। अतएव नाड़ीहिङ्गु शास्त्रीय 'विडङ्ग' कदापि नहीं हो सकती। मात्रा—चूर्ण ३–२ र०।
अथ तुम्बुरुफलस्य नामानि गुणांश्चाह
तुम्बुरुः सौरभः सौरो वनजः सानुजोऽन्धकः ॥ ११३ ॥ तुम्बुरु प्रथितं तिक्तं कटुपाकेऽपि तत्कटु । रूक्षोष्णं दीपनं तीक्ष्णं रुच्यं लघु विदाहि च ॥११४॥ वातरश्लेष्माक्षिकर्णाष्ठशिरोरुग्गुरुताकृमीन् । कुष्ठशूलारुचिश्वासप्लीहकृच्छ्राणि नाशयेत् ॥११५॥
'तुम्बुरु' फल के नाम तथा गुण—तुम्बुरु, सौरभ, सौर, वनज, सानुज और अन्धक ये नाम 'तुम्बुरु फल' के हैं। तुम्बुरु फल—तिक्त तथा कटरस युक्त है और विपाक में भी कटरस युक्त है। यह रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, रुचिजनक, पाक में लघु और विदाही होता है। यह बात- श्लेष्म, नेत्र, कर्ण, ओष्ठ तथा शिर के रोगों को एवं गुरुता (शरीर का भारीपन), कृमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, श्वास, प्लीहा और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को भी दूर करता है ॥ ११३-११५ ॥
३८ तुम्बुरु
**हिं०—**तुम्बर, तुम्बुल, तेजफल । **बं०—**तम्बुल, तुम्बुरु फल, नेपाली धने, नेपाली धनिया । **म०—**नेपाली धनियां । **मा०—**तूगूरू । **क०—**तुम्बुरु । **ते०—**तुम्बुरलु । **पं०—**तुम्बर । गु०— तुम्बुरुफल । **लिपचा०—**तंगु कंग । **ले०—**Zanthoxylum alatum Roxb. ( झैंथोक्साइलम् अलैटम् ); Zanthoxylum acanthopodium DC. ( झैंथोक्साइलम् एकैन्थोपोडियम ) दूसरी जाति । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह हिमालय की गरम तराइयों में जम्मू से भूटान तक, खासिया पहाड़, टेहरी, गढ़वाल, नाग पहाड़, विजिगापट्टम और गंजाम के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसका **वृक्ष—**झाड़ीदार या कचित् छोटे वृक्षवत रहता है। **कांटे—**सीधे, १-२ से. मी. लंबे एवं अंडाकार आधार के ऊपर रहते हैं। **पत्ते—**संयुक्त लंबे पत्र दण्ड वाले, एवं आधार की तरफ सपंख तथा गुलाबी एवं सीधे कांटों से युक्त होते हैं। **पत्रक—**५ से ११, भालाकार, न्यूनाधिक दन्तुर, ऊपर से चमकीले एवं नीचे से हलके रंग के होते हैं। छोटे छोटे पीले रङ्ग के फूलों के गुच्छे लगते हैं । **फल—**काली मरिच के समान झुमकों में रहते हैं, किन्तु उनके मुख फटे होते हैं। फलों में सुगन्धि आती है। इन फलों के ऊपर तेलिया राल की गाँठे
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होती हैं तथा इनके अन्दर कागज के समान पड़दा रहता है। फल प्रायः खाली रहते हैं किन्तु कभी कभी उनके अन्दर गोल, काले चमकीले बीज रहते हैं। उत्तर हिन्दुस्तान में इसका व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में इसके स्थान पर ले०-झैं. र्हेटसा ( Z. rhetsa DC. ), हिं०- चिरफल, तिरफल, के फल का व्यवहार किया जाता है जो तुम्बुरु के फल से बड़े होते हैं। उन पर तैलिया राल की गांठें तथा अन्दर कागज के समान पडदा नहीं रहता । उनका स्वाद चटपटा अकरकरहा के समान एवं गन्ध संतरे के छिलके के समान होती है।
**रासायनिक सङ्गठन—**इसकी छाल में एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील तैल और राल रहती है। यह कडुवा पदार्थ दारुहरिद्रा में पाये जाने वाले बर्बेरीन ( Berberine ) के सदृश होता है। इसके फलों में एक उड़नशील तैल, राल, एक अम्ल पदार्थ और एक रवेदार पदार्थ झैन्- थोक्थाइलिन् ( Xanthoxylin ) पाया जाता है। यह तैल यूकलिप्टस् ( Eucalyptus ) तैल के सदृश गन्ध एवं गुणवाला होता है।
**गुण और प्रयोग—**यह सुगन्धि, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही और उत्तेजक है। इसकी क्रिया गन्धाबिरोजा तथा यूकेलिप्टस् तेल के समान होती है। इसके छाल की क्रिया दारुहरिद्रा के समान होती है। ( १ ) ज्वर, कुपचन, अतिसार, हैजा एवं मंदाग्नि आदि में इसके मूलत्वक् और फल का फांट उत्तेजक तथा बल्य औषध के रूप में दिया जाता है। ( २ ) दमें में इसका गुड़ाखू बना कर धूम्रपान उपयोगी है। ( ३ ) गले की सूजन में इसके ताजे पत्तों को पीस कर चावल के आटे के साथ गरम करके बांधने से लाभ होता है। ( ४ ) यह एक अच्छा प्रतिदूषक ( Antiseptic ) होने के कारण व्रणों के लिये इसके फलों का आन्तरिक तथा बाह्य प्रयोग किया जाता है। इसके मूलत्वक् काथ से व्रण प्रक्षालन से लाभ होता है। ( ५ ) इसके फलों. का व्यवहार दन्तशूल में किया जाता है। इसकी दातुन दाँतों के लिये अच्छी समझी जाती है एवं छाल तथा फल का दन्तमञ्जनों में प्रयोग किया जाता है। ( ६ ) इसका तैल प्रतिदूषक, कीटाणुनाशक तथा दुर्गन्धिहर है। **मात्रा—**फल—२-५ र., छाल—१-२ तो. फांट बना कर।
३९ तिरफल
**सं०—**तुंबरु । **म०—**चिरफल, तिसल । ते०— इरत्तचै। **ता०—**राचामम् । **क०—**जिमुमी मारा । ले०—Zanthoxylum rhetsa DC (झैंथोक्साइलम् ह्रेटसा) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह मध्यम ऊंचाई का कटीला वृक्ष दक्षिण में विशेषकर कोंकणमें होता है। इसके **पत्ते—**सदलपर्ण एवं मोटी टहनियों के अग्र पर समुद्भवद होकर रहते हैं। **पत्रक—**प्रायः १९-२५, तून के सदृश, आयताकार या प्रासवत् , अखण्ड या गोल दन्तुर धार वाले होते हैं। **पुष्प—**छोटे, पीले, गुच्छों के रूप में। **फल—**गुच्छों के रूप में, कच्ची अवस्था में हरे तथा बाद में काले से हो जाते हैं। अन्य वर्णन ऊपर तुम्बुरु के साथ दिया गया है। इसके फल तथा जड़ की छाल का प्रयोग किया जाता है। **रासायनिक सङ्गठन—**तुम्बुरु के समान तैल, राल आदि ।
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गुण और प्रयोग—इसके गुण तुम्बुरु के समान हैं। इसके मूलत्वक् की क्रिया दारुहरिद्रा, मञ्जेरियून, चोबेहयात या पीतचम्पक के छाल की तरह होती है। इसकी जड़ सुगन्धि, कड़वी, मूत्रल तथा पौष्टिक है। ( १ ) इसके फल उत्तेजक, ग्राही, दीपन एवं पाचन होते हैं और इनका व्यवहार, आध्मान, कुपचन, अजीर्ण एवं अतिसार आदि में किया जाता है। सड़ी हुई मछलियों के खाने से उत्पन्न अजीर्ण, वमन एवं अतिसार में इसका व्यवहार करते हैं। मछली खाने वालों के लिये यह पाचक है। तिरफल तथा अजवायन का अर्क हैजे में दिया जाता है। आमवात में मधु के साथ इसे खिलाते हैं। ( २ ) मूलत्वक्—शिथिलताजन्य कुपचन में प्रयोग में लाई जाती है। यह मूत्रल होती है। दन्तशूल में तथा लकवा से जिह्वा का कार्य ठीक न होता हो तो इसे चबाने को देते हैं। जीर्ण आमवात में भी इससे लाभ होता है। यह वृष्य, कड़वी और सुगन्धि होती है और फल की तरह भी इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—बीज निकाले फल का चूर्ण—१-२ र. मधु के साथ; मूलत्वक् १-२ तो. फांट बना कर नित्य एक बार।
अथ वंशलोचनस्य नामानि गुणांश्चाह
स्याद्वंशरोचना वांशी तुगाक्षीरी तुगाशुभा। त्वक्क्षीरी वंशजा शुभ्रा वंशक्षीरी च वैणवी ॥ वंशजा बृंहणी वृष्या बल्या स्वाद्दी च शीतला। तृष्णाकासास्रज्वरश्वासक्षयपित्तास्रकामलाः ॥ हरेत्कुष्ठं व्रणं पाण्डुं कषाया वातकृच्छ्रजित् ॥ ११७ ॥
वंशलोचन के नाम तथा गुण—वंशरोचना, वांशी, तुगाक्षीरी, तुगा, शुभा, त्वक्क्षीरी, वंशजा, शुभ्रा, वंशक्षीरी और वैणवी ये नाम वंशलोचन के हैं। वंशलोचन—बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, स्वादु, कषाय रसयुक्त और शीतल होता है और यह तृष्णा, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, व्रण, पाण्डु, वात तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करता है।
४० वंशलोचन
हि०—वंशलोचन, वंशलोचन। ब०—बांस काबर। म०—वंसलोचन। गु०—वंशकपूर। बांसकपूर। क०—वंशलोचना, वंशरोचना, वंशरीचना। ते०—तवक्षीरी, तवक्षीरी, वंशलोचनमु। ता०—वंशलोचनम्। फा०—तवासीर, तवासीर। अ०—तबाशीर। अं०—Bamboo Manna (बाम्बूमन्ना)। ले०—Bambusa arundinacea Willd (बांबुजा अरुण्डिनेसिया)। Fam—Gramineae (ग्रैमिनी)।
बांस के वृक्ष भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होते हैं, विशेषकर बङ्गाल की तरफ इसकी खेती होती है।
मोटे और दृढ बांस के भीतर एवं बड़े मोटे पोली जाती के पहाड़ी बांसों के भीतर जिसे नजला बांस कहते हैं जब सफेद रस सूखकर कंकर के समान बन जाता है, तब इस सफेद कंकरी को वंशलोचन कहते हैं। यह केवल मादी जाति के ही बांसों में जमता है। बांसों को
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काट कर जब फाड़ते हैं तब किसी-किसी बांस के भीतर से यह निकलता है। कहते हैं कि स्वाती नक्षत्र का जल बांस के भीतर पड़ने से उसमें वंशलोचन उत्पन्न होता है। असली वंशलोचन नीलापन युक्त सफेद रङ्ग का होता है, लकड़ी पर घिसने पर रेशा नहीं उभरती तथा जल में डालने पर पारदर्शक हो जाता है लेकिन मिट्टी के तेल में डालने पर पारदर्शकता कम हो जाती है। स्वाद में यह फीका होता है। लेकिन आजकल बाजार में प्रायः नकली वंशलोचन ही बिकता है जो देखने में बहुत सुन्दर नीली आभा युक्त बड़े-बड़े कंकड़ों के रूप में होता है। पहले असली वंशलोचन जावा, सिङ्गापुर आदि से आता था। अब तो शायद किसी रासायनिक विधि से यह तैयार करके असली के नाम पर बिका करता हैं जिसका स्वाद कुछ तीक्ष्ण रहता है। वंशलोचन के अतिरिक्त बांस के कोमल प्रांकुर, पत्र, गांठ, बीज तथा मूल का व्यवहार किया जाता है।
रासायनिक संगठन—वंशलोचन में सिलिका (Silica) ९०% या सिलिसिक् एसिड के हाइड्रेट के रूप में सिलिकम् (Silicum as hydrate of silicic acid), मंडूर (Peroxide of iron), पोटाश (Potash), चूना, ॲल्युमिनिया (Aluminia) तथा कुछ वानस्पतिक पदार्थ जैसे कोलिन (Colin), बिटेन (Betain), न्यूक्लियस (Nuclease), यूरिएस (Urease), प्रभूजिन एवं कार्बोज के पाचक किण्व तथा स्नेहविलेयक किण्व (Proteolytic, diastatic and emulsifying enzymes) तथा सायनोंजेनेटिक ग्लूकोसाइड (Cyanogenetic glucoside) आदि पदार्थ पाये जाते हैं।
बांस की राख में सिलिका २८, चूना ४, मॅग्नेशिया ६, पोटैशियम ३४, सोडियम् १२, क्लोरीन २, गंधक १० भाग और कुछ जल रहता है। कुछ लोग इसके क्षार को तथा असली वंशलोचन को गरम करके जल में डालते हैं और सूखने पर वंशलोचन के स्थान पर बेचते हैं।
गुण और प्रयोग—( १ ) वंशलोचन उत्तेजक, ज्वरहर, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, प्यास-शमन करने वाला, उद्वेष्टननिरोधि एवं ग्राही होता है। इससे श्वसनसंस्थान की श्लेष्मलकला को पुष्टि मिलती है तथा कफ की मात्रा कम होती है। इससे बने हुए सितोपलादि चूर्ण का व्यवहार जीर्णज्वर, श्वास, कास, क्षय, मन्दाग्नि, कमजोरी, कफ में खून जाना, दाह, प्रमेह, मूत्रदाह तथा वातविकार एवं सर्पदंश में किया जाता है। ग्राही औषधियों के साथ जीर्ण संग्रहणी तथा आन्तरिक रक्तस्रावों में इसका उपयोग करते हैं।
( २ ) इसकी कोमल गांठ तथा पत्तों का काथ गर्भाशय संकोचक होता है। इसका उपयोग प्रसूता में आर्तवशुद्धि के लिए एवं अन्य आर्तव विकारों में किया जाता है।
( ३ ) इसके कोमलपत्र का उपयोग कफ से खून जाना, कुष्ठ, ज्वर तथा बच्चों के सूत्रकृमि में किया जाता है।
( ४ ) इसके प्रांकुर (Shoots) का रस निकाल कर कृमियुक्त घावों पर डाला जाता है तथा बाद में उसका पोल्टिस उन पर बांध दिया जाता है। जिन लोगों का पाचन ठीक नहीं होता उनको इसके कोमल प्रांकुरों से बने सिरके का उपयोग मांस मछली के साथ उपयोगी होता है। इससे भूख बढ़ती है तथा पाचन भी ठीक होता है।
( ५ ) इसकी गांठों को पीसकर जोड़ों के दर्द पर उसका बन्धन उपयोगी है।
( ६ ) इसके बीज को गरीब लोग चावल के रूप में खाते हैं।
( ७ ) इसका मूल विस्फोटिक व्याधियों (Eruptive affections) में बहुत उपयोगी है तथा दाद पर लाभदायक है।
६० भावप्रकाशनिघण्टुः (८) इसके पुष्परस का उपयोग कर्णबिन्दु के रूप में कर्णशूल एवं बाधिर्य आदि में किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १/४-२ माशा। अथ समुद्रफेनस्य नामानि गुणांश्चाह समुद्रफेनः फेनश्च डिण्डीरोऽब्धिकफस्तथा ॥ ११८ ॥ समुद्रफेनश्चक्षुष्यो लेखनः शीतलश्च सः । कषायो विषपित्तघ्नः कर्णरुक्कफहृत्सरः ॥११९॥ समुद्रफेन के नाम तथा गुण-समुद्रफेन, फेन, डिण्डीर और अब्धिकफ ये सब नाम 'समुद्र- फेन' के हैं। समुद्रफेन-नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, शीतल, कषाय रस युक्त, विष और पित्त का नाशक, कर्णरोग तथा कफ का भी नाशक और यह सारक भी होता है ॥ ११८-११९ ॥ ४१ समुद्रफेन हि०-समुद्रफेन, समुन्दरफेन, दर्या का कफ । ब०-समुद्रर फेना, समुद्रफेला । म०-समुद्रफेण । मा०-समन्दरझाग । पं०-समुन्द्रझाग, समुद्रझाग । गु०-समुद्रफिण । क०-समुद्रनालिगे । मळ०, ता०-कडुल नोरे । ते०-सोरुपेनक, समुद्रपुनुरुपु । फा०-कफदरिया । अ०-जुब्दुल्बहरे, जब्दुल बहेर । अं०-Cuttle Fish Bone (कटिल फिश बोन); Os Sepiae (ऑस् सेपी) । ले०- Sepia officinalis (सेपिया ऑफिसिनेलिस्) । जाति (Family)-Cephalopoda (सिफै- लोपोडा) । वर्ग (Class) - Mollusca (मोल्यूस्का) । समुद्रफेन यह समुद्र का झाग नहीं है वरन् यह एक समुद्री जीव (मछली) का अस्थिपञ्जर (या कवच) है जो कुछ समय बाद विशेष आकृति का हो जाता है और समुद्र के पानी पर तैरता रहता है। इसके टुकड़े १-३ इञ्च चौड़े और ५-१० इञ्च लम्बे होते हैं। ये लम्बे, चिपटे, आयताकार अथवा अण्डाकार, सफेदी लिये हुये, कठोर तथा भंगुर होते हैं। इसकी बाह्य सतह कई परतों से बनी दिखलाई देती है तथा सुचूर्ण्य होती है। भीतरी सतह कठोर, सुषिर एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसका स्वाद फीका, तीक्ष्ण तथा क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इसमें कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) ८०-८५% तथा फास्फेट, सल्फेट और सिलिका (Silica) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम होता है। यह खड़िया के समान अम्लत्व दूर करने वाला तथा ग्राही एवं स्थानिक उपशामक है। (१) इसका सूक्ष्म चूर्ण कर्णस्राव तथा कर्णपीड़ा के लिए कानों में डालते हैं। मुख तथा दांतों के विकारों में यह दन्तमञ्जन की तरह उपयोग में आता है तथा झांई, मुहासे, व्यंग तथा चर्म के अन्य विकारों में इसका सूक्ष्मचूर्ण या नींबू के रस के साथ इसका लेप लगाया जाता है। अम्हौरी में गुलाब जल के साथ शरीर पर इसे लगाते हैं। (२) इसका नेत्र रोगों में विशिष्ट स्थान है। लेखन गुण के कारण नेत्रशुक्ल, जाला, धुंध आदि में सुरमा के समक्ष या सुरमा में मिलाकर इसे काम में लाते हैं। वर्मदाह में इसे गुलाब जल और सैन्धव के साथ महीन पीसकर आंख में लगाते हैं ।
हरीतक्यादिवर्गः ६१ (३) कर्णस्राव में इसे तैल में सिद्ध करके उसका उपयोग करते हैं। (४) यद्यपि आयुर्वेद में इसका आंतरिक प्रयोग नहीं दिखाई देता तथापि यह चूने का अच्छा सेन्द्रिय योग है जिसका आन्तरिक उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा-२ से ८ रत्ती। अथाष्टवर्गस्य लक्षणगुणानाह जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ॥ १२० ॥ अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥ १२१ ॥ अष्टवर्गो हिमः स्वादुर्बृंहणः शुक्लो गुरुः । भग्नसन्धानकृत्कामबलासबलवर्द्धनः ॥ वातपित्तास्रतृड्दाहज्वरमेहक्षयप्रणुत् ॥ १२२ ॥ अष्टवर्ग के लक्षण तथा गुण-जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली,१ क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन सब आठ द्रव्यों को चरकादि मुनिगण 'अष्टवर्ग' नाम से व्यवहार करते हैं। अष्टवर्ग- शीतवीर्य, स्वादिष्ट, बृंहण (धातुवर्धक), शुक्रजनक, विपाक में गुरु, भग्नसन्धानकारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला), काम, कफ तथा बल को बढ़ाने वाला, वात, पित्त, रक्त, तृष्णा, दाह, ज्वर, प्रमेह और क्षय रोग को दूर करने वाला होता है ॥ १२०-१२२ ॥ तत्रादौ जीवकर्षभकयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ । रसोनकन्दवत्कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥१२३॥ जीवकः कूर्चकाकार ऋषभौ वृषशृङ्गवत् । जीवको मधुरः शृङ्गो ह्रस्वाङ्गः कूर्चशीर्षकः ॥१२४॥ ऋषभो वृषभो धीरो विषाणी द्राक्ष इत्यपि । जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ॥ मधुरौ पित्तदाहास्रकार्श्यवातक्षयापहौ ॥ १२५ ॥ अष्टवर्गान्तर्गत जीवक तथा ऋषभक के उत्पत्ति स्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-जीवक और ऋषभक ये दोनों औषधियां हिमालय पर्वत के शिखर के ऊपर उत्पन्न होती हैं। इन दोनों के कन्द ठीक लहसुन के कन्द के समान होते हैं और ये निःसार होते हैं तथा पत्ते सूक्ष्म होते हैं। उसमें जीवक का आकार कूंची के समान होता है और ऋषभक बैल के सींग की भांति होता है। जीवक, मधुर, शृङ्ग, ह्रस्वाङ्ग और कूर्चशीर्षक ये नाम जीवक के हैं। तथा ऋषभ, वृषभ, धीर, विषाणी और द्राक्ष ये नाम ऋषभक के हैं। ये दोनों बलकारक, शीतवीर्य, शुक्र तथा कफ के वर्धक, मधुर रसयुक्त, पित्त, दाह, रक्तदोष, कृशता, वात तथा क्षयरोग के दूर करने वाले होते हैं ॥ १२३-१२५ ॥ अथ मेदामहामेदयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह महामेदाऽभिधः कन्दो मोरङ्गादौ प्रजायते ॥ १२६ ॥ महामेदा वनीमेदा स्यादित्युक्तं मुनीश्वरैः ॥ १२७ ॥ शुक्लाऽर्कनिभः कन्दो लताजातः सुपाण्डुरः । महामेदाभिधो ज्ञेयो मेदालक्षणमुच्यते ॥ शुक्ल कन्दो नखच्छेद्यो मेदोधातुमिव स्रवेत्। यः स मेदेति विज्ञेयो जिज्ञासातातपरैर्जनैः ॥ शल्यपर्णी¹ मणिश्च्छिद्रा मेदा मेदाभवाध्वरा। महामेदा वसुच्छिद्रा त्रिदन्ती देवतामणिः ॥ मेदायुगं गुरु स्वादु वृष्यं स्तन्यकफावहम् । बृंहणं शीतलं पित्तरक्तवातज्वरप्रणुत् ॥१३१॥ १. 'स्वल्पपर्णी'ति पाठा०।
६२ भावप्रकाश निघण्टुः मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—उसमें महामेदा नामक कन्द मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिणपूर्वभाग) आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। महामेदा, बनीमेदा है ऐसा मुनीश्वरों ने कहा है। महामेदा लता से उत्पन्न होती है तथा इसका कन्द पाण्डुवर्ण का, सफेद अदरक के समान होता है। ये महामेदा के लक्षण हुये, अब मेदा के भी लक्षण कहते हैं— जिसके कन्द सफेद हों तथा जिसमें नख से काटने पर मेदधातु के समान एक प्रकार का रस निकलता हो उसे मेदा समझना चाहिये। शल्यपर्णी, मणिच्छिद्रा, मेदा, मेदोभवा और अध्वरा ये नाम मेदा के हैं। महामेदा, वसुच्छिद्रा, त्रिदन्ती और देवतमणि ये नाम महामेदा के हैं। उक्त दोनों प्रकार का मेदा—वे दोनों परिपाक में गुरु, स्वादिष्ट, वीर्यवर्धक, दुग्ध तथा कफ को बढ़ाने वाले, धातुवर्धक, शीतल, पित्त, रक्तसम्बन्धी दोष, वायु तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं ॥ १२६-१३१ ॥ अथ काकोलीक्षीरकाकोल्योत्पत्तिलक्षणनामगुणान्याह जायते क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले ॥ १३२ ॥ यत्र स्यात्क्षीरकाकोली काकोली तत्र जायते । पीवरीसदृशः कन्दः सक्षीरः¹ प्रियगन्धवान् ॥ १३३ ॥ सा प्रोक्ता क्षीरकाकोली काकोलीलिङ्गमुच्यते । यथास्यात्क्षीरकाकोली काकोल्यपि तथा भवेत् ॥ एषा किञ्चिद्भवेत्कृष्णा मेदोऽयुग्मभयोरपि । काकोली वायसोली च वीरा कायस्थिका तथा ॥ सा शुक्ला क्षीरकाकोली वयस्था क्षीरशुक्लिका ॥ कथिता क्षीरिणी धीरा² क्षीरशुक्ला पयस्विनी ॥ १३६ ॥ काकोलीयुगलं शीतं शुक्लं मधुरं गुरु । बृंहणं वातदाहास्रपित्तशोषज्वरापहम् ॥ १३७ ॥ काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—महामेदा के उत्पन्न होने का जहां स्थान है, वहीं पर क्षीरकाकोली भी उत्पन्न होती है। और जहां पर क्षीरकाकोली उत्पन्न होती है, वहां पर काकोली भी होती है। क्षीरकाकोली का कन्द पीवरी (शतावर) के समान होता है और काटने पर उसमें से दूध निकलता है तथा यह प्रिय गन्ध से युक्त होता है। अब काकोली के लक्षण कहते हैं—जिस प्रकार की क्षीरकाकोली होती है उसी प्रकार की काकोली भी होती है। किन्तु दोनों में भेद यह है कि काकोली, क्षीरकाकोली की अपेक्षा कुछ कृष्णवर्ण की होती है। काकोली, वायसोली, वीरा और कायस्थिका ये नाम काकोली के हैं और शुक्ला, क्षीरकाकोली, वयस्था, क्षीरशुक्लिका, क्षीरिणी, धीरा, क्षीरशुक्ला और पयस्विनी ये नाम क्षीरकाकोली के हैं। उक्त दोनों प्रकार की काकोली-शीतल, शुक्रवर्धक, मधुर, गुरु, बृंहण (धातुवर्धक), वात, दाह, रक्तपित्त (या रक्तदोष तथा पित्त), शोष और ज्वर की नाशक होती है ॥ १३२-१३७ ॥ अथ ऋद्धिवृद्धयोत्पत्तिलक्षणनामगुणान्याह ऋद्धिवृद्धिश्च कन्दौ द्वौ भवतः कोशलेऽचले³ । श्वेतलोमान्वितः कन्दो लताजातः सरन्ध्रकः ॥ स एव ऋद्धिर्वृद्धिश्च भेदमप्येतयोर्भुवे । तुलग्रन्थिसमा ऋद्धिर्वामावर्त्तफला चसा ॥ १३९॥ वृद्धिस्तु दक्षिणावर्त्तफला प्रोक्ता महर्षिभिः । ऋद्धियोंग्या⁴ सिद्धिर्लक्ष्म्यौ वृद्धेरप्याह्वया इमे ॥ १४० ॥
¹. 'क्षीरं स्रवति गन्धवानि'ति पाठा० । ². 'धीरे'ति पाठा० । ³. 'कोशयामले' इति पाठान्तरम् । ⁴. 'ऋद्धियुग्ममि'ति पाठा० ।
हरीतक्यादिवर्गः ६३ ऋद्धिर्बल्या त्रिदोषघ्नी शुक्ला मधुरा गुरुः । प्राणैश्वर्यकरी मूर्च्छारक्तपित्तविनाशिनी ॥ १४१ ॥ वृद्धिर्गर्भप्रदा शीता बृंहणी मधुरा स्मृता । वृष्या पित्तास्रशमनी क्षतकासक्षयापहा ॥ १४२ ॥ ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—ऋद्धि और वृद्धि ये दोनों कन्द कोशल पर्वत में उत्पन्न होते हैं। ऋद्धि का कन्द सफेद रोयें से युक्त, लता से उत्पन्न होने वाला तथा छिद्रों से युक्त होता है। और वृद्धि भी इसी प्रकार की होती है, किन्तु इन दोनों का जो परस्पर भेद है उसे अब कहता हूँ—ऋद्धि कपास की गांठ के समान आकार वाली तथा बायें तरफ से आवर्त्तशील फल वाली होती है। और वृद्धि—दहिने तरफ से आवर्त्तशील फलवाली होती है ऐसा महर्षि लोग कहते हैं। उक्त दोनों प्रकार की ऋद्धि (ऋद्धि-वृद्धि) के योग्य, सिद्धि और लक्ष्मी ये तीन नाम हैं। ऋद्धि-बलकारक, त्रिदोष को दूर करने वाली, शुक्रवर्धक, मधुर रस युक्त, पाक में गुरु और प्राणप्रद, ऐश्वर्यजनक, एवं मूर्च्छा और रक्त पित्त को नाश करने वाली होती है। वृद्धि-गर्भजनक, शीतल, बृंहण (धातुवर्धक), मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रक्तपित्त को शमन करने वाली, क्षत (उरःक्षतादिक), कास तथा क्षय को दूर करने वाली होती है ॥ १३८-१४२ ॥ राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः । तस्मादस्य प्रतिनिधिं गृह्णीयात्तद्गुणं भिषक् ॥ १४३ ॥ साधारण लोगों को कौन कहे अष्टवर्ग की उक्त औषधियां राजाओं को भी दुर्लभ हैं। अतः वैद्य को चाहिये कि वे इसके समान गुण वाली प्रतिनिधि औषधियों को काम में लावें ॥ १४३ ॥ ✤ मुख्यसदृशः = प्रतिनिधिः ॥ १४३ ॥ यहां पर 'प्रतिनिधि' पद का 'मुख्य के सदृश' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ १४३ ॥ अथाष्टवर्गस्य प्रतिनिधिमाह मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेष्वपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहीश्चक्रमात् क्षिपेत् ॥ १४४ ॥ अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियां—दोनों प्रकार की मेदा, दोनों प्रकार के जीवक, दोनों प्रकार की काकोली तथा दोनों प्रकार की ऋद्धि के स्थान में क्रम से शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द इन औषधियों को डालना चाहिये ॥ १४४ ॥ ✤ मेदामहामेदास्थाने शतावरीमूलम् । जीवकर्षभकस्थाने विदारीमूलम् । काकोली- क्षीरकाकोलीस्थाने अश्वगन्धामूलम् । ऋद्धिवृद्धिस्थाने वाराहीकन्दं गुणैस्तत्तुल्यं क्षिपेत् ॥ १४४ ॥ यहां पर 'मेदा और महामेदा के स्थान में सतावर का मूल, जीवक तथा ऋषभक के स्थान में विदारीकन्द का मूल, काकोली तथा क्षीरकाकोली के स्थान में असगन्ध का मूल, एवं ऋद्धि तथा वृद्धि के स्थान में वाराही कन्द को गुणों में पूर्वोक्त औषधियों के समान समझकर डालें' ऐसा समझना चाहिये ॥ १४२ ॥
४२ अष्टवर्ग
Here is the complete and exact transcription of the text from both pages:
[पृष्ठ ६४]
६४ | भावप्रकाशनिघण्टुः ४२ अष्टवर्ग
| नाम | उत्पत्तिस्थान | सामान्यरूप | परस्पर पार्थक्य | शा० प्रतिनिधि |
|---|---|---|---|---|
| १ जीवक | हिमालय पर्वत शिखर | कन्द-रसोन के समान पत्र-सूक्ष्म सारहीन | कूं ची के समान | विदारीकन्द |
| २ ऋषभक | ” ” | ” | बैल के सींग के समान | ” |
| ३ मेदा | मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिण-पूर्व भाग | कन्द-मेद के सदृश स्राव नख से छेद्य | शुक्लवर्ण | शतावरी मूल |
| ४ महामेदा | ” | कन्द-शुक्ल आर्द्रक के समान, लताजात | पाण्डुरवर्ण | ” |
| ५ काकोली | ” | कन्द-शतावरी सदृश सक्षीर सुगन्धयुक्त | अधिक कृष्णवर्ण | अश्वगंधा का मूल |
| ६ क्षीरकाकोली | ” | ” | कम कृष्णवर्ण | ” |
| ७ ऋद्धि | कोशल्पर्वत | कन्द-श्वेतलोमयुक्त लताजात छिद्रयुक्त | कपास की गांठ के समान वामावर्तफल | वाराहीकन्द |
| ८ वृद्धि | ” | ” | दक्षिणावर्तफल | ” |
इस समय अष्टवर्ग की कोई भी औषधि सच्ची नहीं मिलती है। यों तो अष्टवर्ग के बेचनेवाले कितने फर्में हो गये हैं, इनमें 'अष्टवर्ग कार्यालय देहरादून' प्रसिद्ध है परन्तु अष्टवर्ग के देखने और शास्त्रों से मिलान करने से कोई भी असली नहीं सिद्ध होती। अष्टवर्ग के अभाव में मेदा-महामेदा की जगह शतावर, जीवक-ऋषभक की जगह विदारीकन्द, काकोली-क्षीरकाकोली की जगह असगन्ध और ऋद्धि-वृद्धि की जगह वाराहीकन्द डालने को कहा गया है। परन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्य शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द को अष्टवर्ग का प्रतिनिधि नहीं मानते। क्योंकि इनमें अष्टवर्ग का अत्यन्त न्यून गुण पाया जाता है। इसलिए अष्टवर्ग की जगह निम्नाङ्कित औषधियां देना उत्तम बतलाते हैं।
| जीवक | अभाव में | बहमन सफेद या गुडूची |
| ऋषभक | ” | बहमन लाल या लाखा सालब या वंशलोचन |
| मेदा | ” | तालमिश्री |
| महामेदा | ” | शकाकुल मिश्री या प्रसारिणी |
| काकोली | ” | काली मूसली |
| क्षीरकाकोली | ” | श्वेत मूसली |
| ऋद्धि | ” | चिड़िया कन्द या बला या ऊटकण के बीज |
| वृद्धि | ” | सालब पंजा या महाबला या बीजवंद |
[पृष्ठ ६५]
हरीतक्यादिवर्गः । | ६५
अथ यष्टीमधुनामगुणानाह यष्टीमधु तथा यष्टीमधुकं क्लीतकं तथा । अन्यत्स्थलीतनक्तं तत्तु भवेत्तोये मधूलिका ॥ १४५ ॥ यष्टी हिमा गुरुः स्वादुश्चक्षुष्या बलवर्णकृत् । सुस्निग्धा शुक्ला केश्या स्वर्या पित्तानिलास्त्रजित् । व्रणशोथविषच्छर्दि तृष्णाग्लानिक्षयापहा ॥ १४६ ॥
मुलहठी के नाम तथा गुण - यष्टीमधु, यष्टीमधुक और क्लीतनक ये सब मुलहठी के नाम हैं। और अन्य प्रकार की भी एक मुलहठी होती है जो कि जल में उत्पन्न होती है जिसका नाम 'मधूलिका' है। मुलहठी—शीतवीर्य, गुरु, मधुररसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुन्दर करने वाली, सुस्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिये हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात तथा रक्त के प्रकोप को शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वमन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है ॥ १४५-१४६ ॥
४३ यष्टीमधु हि०- मुलहठी, मुलेटी, मुलेठी, मीठी लकड़ी, जेठीमध। ब०- यष्टिमधु । म०- जेष्ठिमध । गु०- जेठीमध । क०- जेष्ठमधु । ते०- यष्टिमधुकम । पं०- मुलेटी । मा०- मरुहठी । ता०- अतिमधुरं । फा०- आसरेहमहक, विखेमहक । अ०- असलुसूस । अं०- Liquorice Root (लिकोरिस् रूट) । ले०- Glycyrrhiza glabra, Linn. (ग्लिसृहाइझा ग्लैब्रा, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी ) ।
इसका क्षुप अरब, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान एवं साइबेरिया आदि स्थानों में उत्पन्न होता है। इसकी उपज पंजाब तथा चेनाब से लेकर पेशावर आदि हिमालय के निचले हिस्से में तथा अंडमान द्वीप एवं बर्मा में होती है। बलूचिस्तान तथा चित्राल में भी यह उत्पन्न होता है। काश्मीर में बरमूला घाटी में इसको उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है।
इसका क्षुप २-४ फूट ऊँचा होता है। पत्रक- छोटे, ४ से ७ जोड़े, आयताकार से चौड़ाई लिये हुये भालाकार; अपरिमित सदण्डिक पुष्प व्यूह; पुष्प- बैंगनीवर्ण के, लगभग ३ इञ्च लम्बे; फली- छोटी, बारीक, ३-१ इञ्च लम्बी, चिपटी; बीज- बहुत या २-३ होते हैं। इसकी जड़ तथा भौमिक तने को सुखा कर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेठी के नाम से बेचा जाता है। ये लम्बे टुकड़े, पीताभ बादामी रंग के झुर्रीदार होते हैं तथा छाल निकाले हुये हल्के पीले रंग के रेशेदार होते हैं। इनमें एक प्रकार की हल्की गन्ध तथा स्वाद मीठा होता है।
स्थान भेद से इसकी अन्य जातियां होती हैं जिनके स्वाद में अन्तर रहता है। यूनानी मत से ३ प्रकार की मुलेठी मानी गई है जिसमें से मिश्र की उत्तम, अरब की मध्यम तथा तुरुष्क वा फारस की अधम होती है जो उत्तरोत्तर कम मीठी होती हैं।
रासायनिक संगठन— इसमें एक सफेद, मीठा, रवेदार पदार्थ गिलसहाइझिन् (Glycyrrhi- zin) ५-१०% पाया जाता है जिसमें गिलसहाइझिक एसिड (Glycyrrhizic acid) से बने चूना तथा पोटेशियम् (Potassium) के लवण होते हैं। यह एसिड भी शुभ्र रवेदार होता है तथा इसका द्रवणांक २५° श० होता है। यह चीनी से ५० गुना अधिक मीठा होता है। गरम जल में गिलसहाइझिन् का बना घोल ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मुलेठी में ५-१०% शर्करा, ३०% स्टार्च, प्रभुजिन, स्नेह, राल एवं अंसपेराजिन् (Asparagin) करीब १% होता है।
५ भाव नि०
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६४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग—मुलेठी मधुर, शीतल, स्नेहन, बल्य, वृष्य, रसायन, कफशामक, स्वर्य, नेत्र्य, मूत्रजनन, स्तन्यवर्धक, शोथहर एवं व्रणरोपक गुणों से युक्त होती है । (१) इसमें स्नेहन तथा सौम्य कफ निःसारक गुण होने के कारण इसका मुख्य उपयोग स्वर- भंग, कास, श्वसनिका शोथ एवं गलशोथ आदि में किया जाता है। इसके लिये इसके टुकड़े को मुख में रख कर चूसने को दिया जाता है तथा तीसी के साथ इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। (२) मीठी होने के कारण काथों को मधुर बनाने के लिये तथा अनेक औषधियां जैसे सनाय, एलुवा आदि को सुस्वादु बनाने के लिये तथा खांसी के लिये चूसने की गोलियों में इसका उपयोग करते हैं। इसके चूर्ण का उपयोग गोली बनाने में सहायक द्रव्य के रूप में व्यवहार में आता है । (३) मूत्र मार्ग के प्रक्षोभ में यह बहुत उपयोगी है। इससे पेशाब की जलन दूर होती है। (४) अम्लपित्त में इसके उपयोग से आमाशयिक अम्ल कम होकर शूल दूर होता है। (५) चीन में इसका व्यवहार रसायन औषधि की दृष्टि से बहुत किया जाता रहा तथा अपने यहां भी इसे रसायन, बल्य तथा शुक्रल मानते हैं। (६) इसका सत्व रुब्बेसूस, जो काले रंग का तथा मीठा होता है, का व्यवहार खांसी एवं गले की तकलीफ आदि में चूसने के लिए किया जाता है । (७) सुश्रुत में 'सर्वापघातशमनीय' योग में इसका अन्तर्भाव किया गया है। इस प्रकार सभी प्रकार के अभिघातों से उत्पन्न लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना गया है। (८) इसका उपयोग क्षतक्षीण, रक्तवमन, हृद्रोग एवं अपस्मार आदि में भी किया जाता है। दूध अथवा घृत और मधु के साथ इसको देना चाहिये । (९) घृत के साथ इसके कल्क का प्रयोग घावों पर लगाने के लिये उपयोगी है। भिलावे से यदि त्वक्शोथ हो गया हो तो मुलेठी और तिल को दूध में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा—चूर्ण—१-४ माशा ।
अथ काम्पिल्लस्य नामगुणानाह काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रोचनोऽपि च ॥ काम्पिल्लः कफपित्तास्रकृमिगुल्मोदरव्रणान् । हन्ति रेची कटूष्णश्च मेहानाहविषाश्मनुत् ॥ कबीला के नाम तथा गुण—काम्पिल्ल, कर्कश, चन्द्र, रक्ताङ्ग और रोचन ये नाम कबीला के हैं। कबीला-कफ, रक्तपित्त, कृमि, गुल्म, उदररोग एवं व्रण (घाव) को दूर करता है। तथा यह रेचक (दस्तावर), कटु रस युक्त और उष्णवीर्य है। एवं प्रमेह, आनाह, विष तथा पथरी को नष्ट करने वाला होता है ।। १४७ ॥
४४ काम्पिल्ल ( कबीला ) हि०—कबीला, कमीला, काम्बीला । ब०—कमिला, कमलागुरी । म०—शेन्द्रि कपिला । गु०—कपीलो । क०—चसारे, चन्द्रहिदृदु । पं०—कमल । ते०—कुम्कुर । ता०—कपिला रंग, कपिला पोडि । मला०—पोनागम । फा०—कम्बिलाय, कमीलह, कम्बिला । अ०—कम्बील, किम्बील, वार्सा । आं०—Kamala (कमल) । ले०—Mallotus philippinensis, Muell-
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हरीतक्यादिवर्गः ६७ Arg. (मॅलोटस् फिलिपाइनेन्सिस, म्यूएल-आर्ग.) । Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी) । यह प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय पहाड़ के नीचे से पूरव की ओर सिन्ध से दक्षिण, बंगाल, ब्रह्मा, सिंगापूर, सिलोन एवं मलाया द्वीप समूह आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका सदा हरित वृक्ष-मध्यमाकार का २५-३० फीट तक ऊंचा होता है। छाल—चौथाई इंच मोटी, खाकी रंग की फटी सी और भीतर से लाल दिखाई पड़ती है। पत्ते—गूलर के पत्तों के समान ३ से ९ इंच तक लम्बे, अंडाकार, नोकदार, विषमवर्ती और निम्न पृष्ठ रोमश रक्ताभ होते हैं। कार्तिक से पूस तक फूल फल आते हैं और उष्णकाल में फल पकते हैं। फूल—छोटे छोटे भूरा- पन युक्त लाल रंग के आते हैं। फल—त्रिदल आकार में झरबेर के समान और पकने पर लाल रवेदार रज से ढका रहता है। इसी लाल रज को कबीला कहते हैं। बीज—चिकने, गोल और काले होते हैं। 'कबीला वायविडङ्ग की रज का नाम है' यह कहना भ्रमात्मक है। कबीला के बीजों को कहीं कहीं वायविडङ्ग की जगह व्यवहार में लाते हैं जो अनुचित है। वास्तव में वायविडङ्ग और कबीले के वृक्ष एक नहीं, दो भिन्न-भिन्न हैं। इस वृक्ष के फलों के ऊपर के पराग (ग्रन्थि तथा रोम) को कबीला कहते हैं। फल पक जाने पर उनको कपड़े में डालकर अथवा हाथ से रगड़ कर इसे अलग करते हैं। इस लाल बादामी रंग की बुकनी में न तो स्वाद होता है न गन्ध । इसमें से जो रोम, ग्रन्थि युक्त होते हैं उनका डण्ठलं एक कोशा का (प्रायः नहीं रहता) तथा ऊपर का भाग गोल ४०-१०० म्यू व्यास का एवं २०-५० अण्डाकार या व्यस्तलठ्वाकार कोषाओं से युक्त होता है। ये कोषाएं एक आधारीय कोशा के ऊपर चक्राकाररूप में एक रालीय निर्यास में डूबी हुई रहती हैं। बिना ग्रन्थि के रोम बहुत कम होते हैं जिनके अन्तिम भाग नुकीले तथा मुड़े हुये होते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें फलके छिलके एवं बालू के कण आदि पदार्थ मिले रहते हैं। परीक्षा—इसमें यदि निशास्ता या कुसुम्भ की मिलावट हो तो अणुवीक्षण यन्त्र से पहचान सकते हैं। लाल मिट्टी, बालू वा मण्डूर की मिलावट हो तो इसे जल में डालने पर मिट्टी आदि नीचे बैठ जाती है। ऊपर जो बुकनी तैरती है उसे सुखाकर काम में लाना चाहिये। जल से भींगी हुई उंगली से शुद्ध कबीले को उठाकर सफेद कागज पर जोर से लकीर खींचने या रगड़ने से पीले रंग का निशान होता है। शुद्ध कबीले में राख ९% से अधिक नहीं होनी चाहिये तथा अम्ल में न घुलनेवाली राख ६% से अधिक नहीं होनी चाहिये। ईथर में घुलने वाले सत्व जो उड़न- शील नहीं होते, उनकी शुष्क अवस्था में मात्रा ६६% से कम न होनी चाहिये। यह शीत जल में अघुलनशील, उष्णजल में अल्प घुलनशील एवं क्षार, मद्यसार और ईथर में घुलनशील होता है, जिससे लाल रंग का घोल बनता है। रासायनिक संगठन—इसमें रोटलेरिन् (Rottlerin, C31 H30 O8) नामक एक रवेदार पदार्थ से युक्त एक बदामी लाल रंग की राल होती है। यह ईथर में घुलनशील तथा जल में अघुलन शील होती है। इसके अतिरिक्त इसो-रोटलेरिन् (iso-Rottlerin) नामक पदार्थ रहता है जो शायद रोटलेरिन् का अशुद्ध स्वरूप है। इनके अतिरिक्त इसमें पीले रवेदार पदार्थ, पीली और लाल राल एवं मोम आदि रहते हैं। अल्प मात्रा में उड़नशील तैल, स्टार्च, शर्करा, टैनिन् एवं ऑक्सेलिक तथा साइट्रिक एसिड भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—कबीला कृमिघ्न, विरेचक, त्वग्दोषहर एवं व्रण रोपक है। स्फीत कृमि के लिये यह अच्छी औषधि है। अधिक मात्रा से हल्लास तथा बेहोशी आती है। चेष्टावह नाडी तथा
६८ भावप्रकाश निघण्टुः पेशियों पर इसकी अवसादक क्रिया होती है तथा अन्नवह प्रणाली के ऊपर इसका प्रक्षोभक प्रभाव पड़ता है। (१) कुछ लेखकों ने इसे सभी प्रकार के आंत्रस्थ कृमियों के लिये उपयोगी बतलाया है लेकिन इसका विशेष प्रभाव स्फीत कृमि (Tape worms) पर पड़ता है। मेलफर्न की अपेक्षा यह कम प्रभावशाली है लेकिन इससे वमन आदि नहीं होता और दुर्बल एवं बच्चों के लिये यह उसकी अपेक्षा अच्छी औषधि है। इसके लिये अतिरिक्त विरेचन की आवश्यकता नहीं होती न कोई पूर्व विरेचन की। २ से ८ माशा चूर्ण दूध, दही, मधु या सुगन्धित पेय के साथ खिला देते हैं । तीसरे या चौथे दस्त में कृमि निकल जाते हैं । यदि ४ घण्टे के बाद भी शौच न हो तो एरण्ड तैल देना चाहिये । इसका कृमिघ्न गुण संभवतः इसके अवसादक प्रभाव के कारण है। (२) इसका बाह्य प्रयोग तैल में मिलाकर दाद, खुजली, चकत्ते, व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में बहुत लाभदायी है। सिर के खालित्य में शतधौत घृत के साथ लगाने से लाभ होता है । (३) इस वृक्ष के पत्ते एवं मूल आदि का चर्म रोगों में अनेक प्रकार से प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-८ माशा। बच्चों को ५ २० मधु से, इससे अधिक एक साथ न दें, यदि गुण न हो तो दूसरे दिन पुनः दें। अथारग्वधस्य (धानवहेरा, अमलतास ) नामगुणानाह आरग्वधो राजवृक्षः शम्पाकश्चतुरङ्गुलः । आरेवतो व्याधिघातः कृतमालः सुवर्णकः ॥ १४८ ॥ कर्णिकारो दीर्घफलः स्वर्णार्ङ्गः स्वर्णभूषणः । आरग्वधोगुरुः स्वादुः शीतलः स्रंसनोत्तमः १ ॥ ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्त्तशूलनुत् । तत्फलं सं सरनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् ॥ ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ॥ १५० ॥ अमलतास (धनवहेरा) के नाम तथा गुण-आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, आरेवत, व्याधिघात, कृतमाल, सुवर्णक, कर्णिकार, दीर्घफल, स्वर्णाङ्ग और स्वर्णफल ये नाम अमलतास के हैं। अमलतास-गुरु, मधुर, शीतल और उत्तम रेचक है। यह ज्वर, हृद्रोग, रक्तपित्त, वायु, उदावर्त्त और शूल को दूर करता है। अमलतास का फल-मृदु रेचक, रुचिकारक, कुष्ठ, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। यह ज्वर में सदा हितकर होता है एवं कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध करने वाला होता है ॥ १४८-१५० ॥ ४५ आरग्वध ( अमलतास ) हि०-अमलतास, सोनहाली । ब०-सोन्दाली, सोनालु, बन्दर लाठी । म०-बाहवा । क०- कक्केमर । ते०-रेलचेट्टु । गु०-गरमालो । पं०-अमलतास, करङ्गल, कनियार । ता०-कोन्नेमरं, शरकोन्ने, कोरैकाय । फा०-ख्यारेचम्बर । अ०-ख्यारे शम्बर, ख्यारशम्बर । अं०-Pudding Pipe Tree (पुडिंग पाइप ट्री ) या Indian Laburnum (इण्डियन लैबर्नम् ), या Purging Cassia ( पर्जिंग केशियां ) । ले०-Cassia fistula, Linn. (केशिया फिस्टुला, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी ) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है । १. 'मृदु'रिति पा० । हरीतक्यादिवर्गः | ६६ इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है, किन्तु कहीं कहीं बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं। लकड़ी बहुत मजबूत होती है। १२ से १८ इञ्च तक की लम्बी लम्बी सींकों पर ४ से ८ जोड़े पत्ते लगते हैं जो १॥ से ३॥ इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार होते हैं । १०-२० इञ्च तक की लम्बी टहनियों पर सुनहले चमकीले पीले पीले रङ्ग के पांच पांच दल वाले फूलों के घनहरे लगते हैं, जो चैत के अन्त से ज्येष्ठ तक वृक्षों को सुशोभित करते हैं। जेठ में पतली पतली सलाई के समान हरी हरी फलियां निकल कर वर्षा के अन्त तक १-२ फीट लम्बी १ इञ्च तक मोटी हरी हरी फलियां लटकती दिखाई पड़ती हैं । फिर हेमन्त के अन्त से काला रूप धारण करके वसन्त में पक जाती हैं । फलियों के भीतर पुरानी चवन्नी बराबर गोल गोल पतले पतले काले रस से लिपटे हुए परत रहते हैं और परतों के बीच सिरस के बीज के समान बीज होते हैं। रासायनिक संगठन-अमलतास के गूदे में गोंद, पेक्टिन (Pectin), रंजक पदार्थ, शर्करा, अल्प मात्रा में एक मधुगंधि उड़नशील तैल तथा हाइड्रोक्सिमेथिल्-अन्थ्राँक्विनोन् ( Hydroxy- methyl-anthraquinones ) आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग- ( १ ) अमलतास की गूदी आनुलोमिक, दाहशामक एवं वेदना स्थापक है। यह मृदु विरेचनों में सर्वश्रेष्ठ है। इसका प्रयोग ज्वरावस्था में तथा सुकुमार, बाल, गर्भिणी एवं कोमल प्रकृति की नारियों में किया जाता है। मृदु विरेचन के लिये इसके स्वतंत्र प्रयोग की अपेक्षा सनाय के साथ बनाया हुआ अवलेह (Confectio senna) अधिक अच्छा है जिससे मरोड़, हल्लास, शूल, आध्मान आदि नहीं होते जो स्वतन्त्र प्रयोग में अधिक मात्रा में लेने से होते हैं। इससे बनी गुलकन्द का भी व्यवहार किया जाता है। रक्त की उष्णता बढ़ने पर अथवा मल संचय होकर वातरक्त एवं आमवात आदि रोग उत्पन्न होने पर विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। जिन्हें कब्जियत की शिकायत हमेशा रहती है उन्हें अल्प मात्रा में इसे वरावर सेवन कराया जाता है। अधिक दिन प्रयोग से मूत्र का रंग गहरे बादामी रंग का हो जाता है। ज्वर में अथवा मधुमेह में विरेचन की आवश्यकता हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं। कॉफी के सत्व में इसकी मिलावट की जाती है। इसका लेप आमवात, वातरक्त एवं प्रणशोथ आदि पर किया जाता है। ( २ ) इसके बीज वामक होते हैं तथा ५-७ बीजों का चूर्ण वमन के लिये दिया जाता है । ( ३ ) इसकी छाल के क्वाथ से कवल करने से गले की गांठों की सूजन कम होती है । ( ४ ) इसके पत्तों का रस अर्दित में पिलाया जाता है तथा जिस अंग का घात हुआ हो वहां इससे मला जाता है। दाद तथा भिलावें की सूजन पर इसके लगाने से लाभ होता है । ( ५ ) इसकी मूल तीव्र विरेचक एवं ज्वरहर होती है । मात्रा-गुदी ४-८ माशा । अथ कटुकाया नामगुणानाह कट्वी तु कटुका तिक्ता कृष्णभेदा कटम्भरा १ ॥ अशोका मत्स्यशकला चक्राङ्गी शकुलादनी ॥ मत्स्यपित्ता काण्डरुहा रोहिणी कटुरोहिणी ॥ १५१ ॥ १. 'कटुम्भरे'ति पा० ।