भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५२ | भावप्रकाशिनघण्टुः (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मधों के निर्माण के लिये युरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण–२-६ माशा। तैल–१ से १ बूंद पाचक, ४-६ बूंद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूंद। फांट–२-३ औंस।
अथ विडङ्गस्य नामानि गुणांश्चाह
पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ॥ विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ॥११२॥ वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुंलिङ्ग तथा नपुंसकालिङ्ग दोनों ही में व्यव- हृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब बायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। बायविडङ्ग—कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्नि- वर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है॥ १११-११२ ॥
३५ वायविडङ्ग
प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं किन्तु आज कल के कति- पय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आज कल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं हैं बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' (हि०-डिकामाली) शास्त्रीय विडङ्ग हैं। उनके मत से शास्त्रीय 'विडङ्ग' की जगह नाड़ीहिङ्गु को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही बायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार बायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं हैं और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः सर्वमान्य निर्णय होने तक इसीका व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हि०—बायविडङ्ग, बायभिडङ्ग, बायभिरङ्ग, भामिरंग, बाबिरंग। ब०—बिरंग। म०—बावड़िङ्ग, गु०—वावडीङ्ग। क०—वायुविडङ्ग, बायबिलंग। ते०—वायुविडंगमु । ता०—वायुविलंगम । पं०— बबरंग, बाबरंग। भा०—बायबिरंग। सिंहली—उम्बेलिया, अम्बेलिया। ने०—हिमलचेरी। अ०—बरंज काबली, विरंज काबुली। फा०—बरंग काबली, बिरंज कावली, विरङ्ग काबुली। अं०—Babreng; Fruits of Embelia ribes (बावरिंग, फ्रूट आफ एम्बेलिया राइब्स।) । ले०—Embelia ribes Burm. (एम्बेलिया राइब्स)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेसी)। यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है। इसकी झाड़ी बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है। छाल-वातरन्ध्रों के कारण खुरदरी होती है। टहनियां-लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं। पत्ते-चर्मवत्,
हरीतक्यादिवर्गः | ५३ २ से ४ इञ्च लंबे दीर्घवृत्ताकार, या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हल्के या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-चौथाई इञ्च तक गोलाकार, पकने पर लाल रंगके किन्तु सूखने पर झुर्रीदार काले रंग के दीख पड़ते हैं। फलों में डण्ठल के साथ पांच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नोकीला रहता है। फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है। चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है। रासायनिक संगठन—इसके फलों में एम्बेलिक् एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, C₁₈ H₂₈ O₄) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है। यह जल से अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है। क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराम तथा तैल, उड़नशील तैल, रंजक द्रव्य, टैनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोभिक तथा रसायन है। रसमन्थियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका उत्सर्ग मूत्रद्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। (१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। मेलफर्न (Male- fern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है। बच्चों को ४ माशा तथा बड़ों को ८ माशा चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात् एरण्ड तैल अथवा कोई विरे- चन देना चाहिये । अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात रातमें इसका चूर्ण मठ्ठे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये। इससे मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर इससे लाभ नहीं होता। इसका कृमिघ्न गुण एम्बेलिक् एसिड के कारण है। इसके लवण अमोनियम् एम्बेलेट (Ammonium embelate) (१॥-३ २०) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये। (२) यह एक अच्छा रसायन है। सुश्रुत में एक 'सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बत- लाया है। नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये । पथ्य में बिना नमक, मूंग का आंवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें। इसके उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है। शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है। इसके हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है। इससे सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता। (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये—वायविडङ्ग, गुग्गुल, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे २ लाभ होता है।