भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें५० | भावप्रकाशनिघण्टुः यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कडु होती है। रासायनिक संगठन- इसमें मुख्यतया संपोनिन् (Sapouin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्म विकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचुषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग अनेक बल्य पेयों में किया जाता है। भारतीय सार्सापरिला के नाम से अनन्तमूल का उपयोग किया जाता है। मात्रा- १ से ३ माशा ।
अथ हपुषाद्वयम्
तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्धं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम् , तयोर्नामानि गुणांश्चाह हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता । मत्स्यगन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांचनाशिनी ॥ हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः । पित्तोदरसमीरार्शो ग्रहणीगुल्मशूलहृत् ॥ पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ॥ ११० ॥ दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्ध- वाला होता है, उन दोनों के नाम तथा गुण— हपुषा, हबुषा और विस्रा ये तीन नाम प्रथम हाऊबेर के हैं और दूसरे के नाम-अश्वत्थफला, मत्स्यगन्धा, प्लीहहन्त्री, विषघ्नी और ध्वाङ्क्षनाशिनी (इसके खाने से कौवे मर जाते हैं) ये हैं। प्रथम हाऊबेर -अग्निदीपक, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मृदु, उष्णवीर्य, पाक में गुरु, पित्त, उदर और बात सम्बन्धी रोग, बवासीर, ग्रहणी, गुल्म तथा शूल को दूर करता है और दूसरा हाऊबेर भी इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है अन्तर केवल आकार तथा गन्ध मात्र में ही है।
३४ हपुषा ( हाऊबेर )
हिं०-हाऊबेर, हाऊबैर, आरार। ब०-हबुषा। म०-होश। मा०-हाऊबोर। पं०-हाऊबेर, पेल्यरी, अबडुल। कुमा०-चिचिया। काश्मी०-वेंथा, पेथरा। फा०-तुरुमदुलह, ओरस। अ०- अरअर, अबहाल, हब्बउलअरअर। अं०-Juniper berry (ज्युनिपेर बेरी)। ले०-Juniperus communis Linn. (ज्युनिपेरस कम्युनिस, लिन ) । Fam. Cupressaceae (क्यूप्रेसेंसी)। हाऊबेर दो प्रकार का होता है। एक का संस्कृत नाम 'हपुषा' और दूसरे का 'अश्वत्थफला' है। हपुषा और अश्वत्थफला वास्तव में दोनों फल और गन्धभेद से दो द्रव्य हैं, परन्तु दोनों के गुण समान हैं और दोनों ही के वृक्ष भी समान ही होते हैं। हपुषा-मछली के समान आकृति का एवं आम गन्ध युक्त और अश्वत्थफल-मछली के समान गन्ध और पीपर (अश्वत्थ) वृक्ष के फलों के समान फलवाला होता है।
हरीतक्यादिवर्गः | ५१ हपुषा के वृक्ष हिमालय के पश्चिमोत्तर भाग में कुमाऊँ से पश्चिम की ओर १२,५०० से १४,००० फीट की ऊंचाई तक देखने में आते हैं। इसका वृक्ष बड़ा नहीं होता बल्कि इसका झाड़ होता है जो सघन, फैला हुआ, तथा बारहो मास हरा भरा रहता है। पत्ते-रेखाकार, नोकीले, ५ से १३ मि. मी. लंबे, एक साथ तीन-तीन एवं काण्ड से समकोण बनाते हुए होते हैं। फूल-पीत वर्ण के गुच्छों में आते हैं। फल-३/८-३/२ इन्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार और पकने पर नीलापन युक्त काले या कुछ बैंगनी रङ्ग के दिखाई पड़ते हैं। इनके ऊपर रजावरण रहता है। अग्र भाग पर शल्कपत्र के त्रिविभक्त निशान रहते हैं और आधार पर भी शल्क पत्र के दो चक्र रहते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज रहते हैं जिनके पृष्ठ पर तैलग्रन्थियां पाई जाती हैं। फलों से तेल निकाला जाता है। कुछ लोग ले०-टॅमेरिक्स गॅलिका (Tamarix gallica Linn.), हि०-झाऊ तथा फ्लूजिया ल्यूकोपाइरस (Flueggea leucopyrus Willd) का ग्रहण करते हैं जो उचित नहीं है। रासायनिक संगठन- इसमें एक उड़नशील तैल ०.२५%, राल १०%, मधुशर्करा ३३%, एक तिक्त पदार्थ ज्यूनिपेरिन (Juniperin), ऑक्सैलिक एसिड तथा कुछ आर्गेनिक अम्ल (Organic acid) आदि पदार्थ रहते हैं। इसी की एक अन्य जाति ज्यू. मॅक्रोपोडा (J. macropoda Boiss) के फल कुछ लम्बे रहते हैं तथा उसमें तैल की मात्रा ३.२४% पाई गई है। गुण और प्रयोग- हाऊबेर सुगन्धित, मूत्रजननक, वातानुलोमक, आध्मानहर, पाचक, उत्तेजक, वृष्य, रक्तरुकन्दक, आर्तवजनक एवं उपसर्गनाशक है। इसका उपयोग उदर रोग, यकृत् प्लीहा के विकार, आमवात, संधिशोथ, श्वास, जीर्ण श्वस- निकाशोथ, मुखपाक, अर्धावभेदक, नया तथा पुराना सोज़ाक, श्वेतप्रदर, कष्टार्त्तव, अनार्तव, मधुमेह तथा चर्मरोग में किया जाता है। ( १ ) यह एक उत्तेजक मूत्रजनक है। इसकी क्रिया प्रत्यक्ष वृक्क के ऊपर होकर मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका उपयोग हृदय, यकृत अथवा जीर्ण वृक्कशोथ के कारण उत्पन्न जलोदर में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। तीव्र वृक्क शोथ में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बच्चों के वृक्कजन्य जलोदर में इससे लाभ होता है। ( २ ) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। ( ३ ) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्त्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ( ४ ) इसका काष्ठ स्वेदक है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। ( ५ ) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी० कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यो के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pesti- lence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है।