भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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४८ भावप्रकाशनिघण्टुः चोबचीनी के नाम तथा गुण-'दीपान्तरवचा' यह संस्कृत नाम चोबचीनी का है। चोबचीनी- कुछ तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, विबन्ध, आध्मान तथा शूल को नष्ट करने वाली, मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है एवं वातव्याधि, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद (पागलपन) और शरीर के दर्द को दूर करती है और विशेष करके यह फिरङ्गरोग के दूर करने में उत्तम होती है ॥ १०७-१०८ ॥ ३३ चोपचीनी हि०-चोपचीनी, तोपचीनी, चोबचीनी। ब०-तोपचीनी, कुमारिका, शुकचिन । म०, गु०- चोपचीनी । ते०-पिरङ्गीचेका । ता०-परङ्गिचेकई । मला०-चाइना पैवू या पैरू। ने०-चोपचीनी । यू०-खसिलियर आशसिनी । फा०-चोबचीनी । अ०-कशवचीनी, खुशंबुस्सीनी । अं०- China root (चाइनारूट) । ले०-Smilax china Linn. (स्माइलैक्स चाइना)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । वच की अनेक जातियों में चोपचीनी भी एक मानी गई है। यह चीन देश में अधिक उत्पन्न होती है और वहीं से इस देश में आती है। इस कारण इसका नाम दीपान्तरवचा रखा गया है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलनेवाली होती है। इस लता की जड़ को ही चोबचीनी कहते हैं। चोबचीनी ८-१० अङ्गुल लम्बी, आध से एक इञ्च तक मोटी, गांठदार, बेरेशा, खुरदरी तथा दृढ़ काष्ठवत् जड़ है। इसका स्वरूप सफेदी मायल पीत, गुलाबी एवं किंचित् कालापन युक्त होता है। अधिक पुरानी होने पर चोपचीनी में प्रायः घुन लग जाते हैं, जिससे वह छिद्र युक्त दिखाई देती है। घुनी हुई तथा गांठविहीन चोपचीनी को उपयोग में नहीं लाना चाहिये। रासायनिक सङ्घटन-इसमें वसा, शर्करा, ग्लूकोसाइड, रञ्जक पदार्थ, सॅपोनिन्, गोंद तथा स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-सम्राट् चार्ल्स पंचम के वातरक्त (Gout) में इस औषधि को बहुत सफलता सिद्ध होने से इसका यूरोप में बहुत प्रचार हुआ था। १७ वीं शताब्दी में सार्सोंपरिला के समान इसका व्यवहार किया जाता रहा। यह स्वेदल, स्नेहन, उत्तेजक, रसायन, रक्तशोधक, बल्य, वाजीकर, फिरंगहर तथा धातुओं को गलाने वाली (Resolvent = रीसॉल्भेन्ड) है। (१) इसको दूध में उबाल कर इसमें मस्तगी, इलायची तथा दालचीनी मिलाकर इसका व्यवहार आमवात, वातरक्त, अपस्मार, जीर्ण वातविकार, काश्यं, धातुक्षीणता, ग्रन्थिविकार तथा फिरंग की तृतीयावस्था में किया जाता है। (२) अनन्तमूल के साथ इसको पुराने सिरदर्द में देने से लाभ होता है तथा आमवात एवं फिरङ्ग में भी इसका व्यवहार करते हैं। (३) डा० देसाई के मतानुसार यह श्रेष्ठ रसायन है। इसकी क्रिया त्वचा, सन्धियों के बन्धन तथा रसग्रन्थियों पर होती है। सोजाक से उत्पन्न सन्थिशोथ आदि विकारों में तथा फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा तृतीयावस्था में इससे बहुत लाभ होता है। पोटेशियम् आयोदाइड् की अपेक्षा यह शीघ्र लाभकर निर्दुष्ट औषध है। फिरङ्गादि से उत्पन्न ग्रन्थिवृद्धि में इसके उपयोग से प्रथम वेदना कम होकर बाद में सूजन कम होती है। चोबचीनी जितना चूर्ण रूप में काम करती है उतना फाण्ट या क्वाथरूप में नहीं करती। हरीतक्यादिवर्गः ४९ मात्रा-चूर्ण-३-६ तो०, सोंठ के साथ दूध में। इस जाति की जिन अन्य औषधियों का व्यवहार किया जाता है प्रसंगतः उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है। (क) जङ्गली उशवा हि०-जङ्गली उशुवा, चोबचीनी । ब०-कुमारिका । मल०-कुरिबिल्पिण्ड । म०-घोटवेल । गु०-गुटी । ता०-मलैतामर ले०-Smilax macrophylla Roxb. (स्माइलैक्स मॅक्रो- फाइला राक्स) । यह एक बड़ी लता होती है जो समस्त भारत में उत्पन्न होती है। पत्ते-लम्बे, बड़े, अखण्ड और नुकीले रहते हैं जिन पर ५, ७ मोटी सिराएं होती हैं। कांटे दूर-दूर या प्रायः अनुपस्थित होते हैं। पुष्प-गुच्छों में आते हैं। फल-चने के समान गोल, हरित एवं पकने पर रक्तवर्ण के हो जाते हैं। मूल-बहुत तथा सार्सोंपरिला के समान लाल रंग की होती है। इसकी जड़ों का व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ें ताजी काम में लानी चाहिये। गुण और प्रयोग-यह स्वेदल, मूत्रल, पौष्टिक, कामोदीपक और रसायन है। फिरङ्ग की द्वितीयावस्था, जीर्ण आमवात तथा सन्धिशोथ में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। फिरङ्ग से उत्पन्न होने वाले फोड़े-फुन्सियां, सन्धिवान, अस्थिशोध, अस्थिवात और शूल तथा ग्रन्थियों की वृद्धि में उपयोगी है। पुराने चर्मरोग तथा गण्डमाला में इससे लाभ होता है। नेपाल में ३ माशा चूर्ण सोजाक तथा अन्य श्लैष्मिककला के स्रावों के लिए दिया जाता है। मात्रा-१-२ तो० चूर्ण का क्वाथ दिन में एक बार । (ख) बड़ी चोबचीनी हि०-बड़ी चोबचीनी । ब०-हरिनाशुक्चिन । म०-गोटी शुकचिन । पहा०-हङ्गिन । ले०-Smilax glabra Roxb. (स्माइलैक्स ग्लैब्रा राक्स) । यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें कांटे नहीं होते। पत्र-नुकीले, पतले, अधोभाग हलके रङ्ग का; पुष्प-सफेद विदाण्डक; मूल-चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग-इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हरिन शुकचिन । ब०-गुचिया शुकचिन । ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया) । यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं बर्मा में होती है। पत्र-पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएं रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ का रस निकाल कर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बांधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हि०-उशबामग्रबी, सार्सोंपरिला । अं०-Sarsaparilla (सार्सोंपरिला) । ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा) । ४ भा० नि०

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