भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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४६ भावप्रकाशनिघण्टुः । गैलंगाल ); Java Galangal ( जावा गैलंगाल । ले०—Alpinia galanga Willd. (अल्पिनिया गैलंगा) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप आमा हल्दी के आकार का ६-७ फीट ऊंचा होता है। पत्ते—९ से १८ इंच लम्बे, १।। से ४।। इंच चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे छोटे आते हैं। फल—तिहाई इञ्च गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़—कन्दवत् और सुगन्ध युक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेंचते हैं। ये टुकड़े १ इञ्च से २।। इञ्च तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रङ्ग के और अन्दर से हलके नारङ्गी बादामी रङ्ग के होते हैं। रासायनिक संघटन—इसमें एक सुगन्धित हलके पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजेनॉल (Eugenol २५%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडे- नेन्स (Cadenens), बंसोरिन् (Bassorin) एवं गैलँगिन् (Galangin) रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कॅफेराइड (Kaempferide, $C_{16}H_{12}O$, $H_{2}O$), गलँगॉल (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलँगिन् (Mono-methyl ether of galan- gin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फ्लोबैफेन (Phlobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या काथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहसंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होता है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bron- chioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन-संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धि उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी, जुकाम, आमवात, खांसी, श्वास, स्वर भंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खांसी, कुकास एवं सरदी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्टननिरोधि गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धि, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है।


हरीतक्यादिवर्गः। ४७ (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका काथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्धि दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोग मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दांतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपयुक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२ से ४ र., टिं. ई-१ द्रा.। नोट—इसी की एक अन्य जाति जिसे अल्पीनिया आफिसिनेरम (Alpinia officinarum Hance) और अं. में लेसर गॅलेंगल (Lesser galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीनश्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है।

अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ॥ १०६ ॥ महाभरी बच के गुण—जो मोटी गांठवाली तथा सुगन्धयुक्त (महाभरी) बच होती है वह पूर्वोक्त बच की अपेक्षा हीन गुण वाली होती है ॥ १०६ ॥

३२ महाभरीबच हि०—महाभरा बच, महाभरी बच, कुलञ्जन भेद। ब०—महाभरी बच, नरकचूर। पं०—कचूर, नरकचूर। मला०—कटुइंशीकुआ । ले०—Zingiber zerumbet Rosc. ex Smith (जिंजीबर् जिरम्बैट्) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेसी)। इस देश के कई प्रान्तों में यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप गन्ने के समान ३ से ५ फीट ऊँचा और आध इञ्च गोल होता है। पत्ते—८-१२ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, नरसल के पत्तों के समान किञ्चित् आयताकार-भालाकार एवं नोकदार होते हैं। १२ से १८ इञ्च तक लम्बी डण्डियों पर फूल आते हैं। फूल—फीके पीले रङ्ग के होते हैं। फल—एक इञ्च लम्बा दीर्घवृत्ताकार होता है। बीज—छोटे छोटे आयताकार काले रङ्ग के होते हैं। मूलस्तम्भ—कड़ा, द्विवर्षीय, भीतर से पीत, एवं स्वाद में कुछ आर्द्रक जैसा ही किन्तु कुछ कड़वाहट लिये हुए होता है। इसका व्यवहार खांसी, श्वास, कृमि, कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों में किया जाता है एवं इसके अन्य गुण सोंठ की ही तरह हैं।

अथ चोपचीनीति लोके या प्रसिद्धा तस्या नाम गुणाँश्चाह द्वीपान्तरवचा किञ्चित्तिक्तोष्णा वह्निदीप्तिकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ वातव्याधीनपस्मारमुन्मादं तनुवेदनाम् । व्यपोहति विशेषेण फिरङ्गामयनाशिनी ॥१०८॥