भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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४४ भावप्रकाशनिघण्टुः बाजार में बच के नाम से प्रायः कुलिंजन ( Alpinia galanga ) की जड़ बेची जाती है । इसी लिये जहां बचा ( Acorus calamus ) की आवश्यकता हो वहां घोरबच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये । बच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि उडनशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन ( Acorin ) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लाइकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin ) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene ) नामक रवेदार क्षाराम तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कैल्शियम ऑक्सेलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में ॲसारिल् ॲल्डिहाइड (Asaryl-aldehyde ), ॲल्फापिनिन (a-pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—वच वामक, कफनिःसारक, हृल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धि है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है । ( १ ) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये । ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये । इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को ½ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरण शक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खांसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये । इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है । सरदी, गले की सूजन, खांसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है । सूखी खांसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टैनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिये। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है । दन्तोद्भेद के समय इसको चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है । (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये । (६) अर्श में आंग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है । (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, सन्धिपीडा, आध्मान, शूल तथा खांसी और श्वास में उपयोगी है। हरीतक्यादिवर्गः ४५ (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है । मात्रा—वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए-२-४ र०। अधिक मात्रा से शिरःशूल होता है। वर्णनाशक-सौंफ । अथ पारसीक ( खुरासानी ) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा । हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ॥१०४॥ खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लबचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच-शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करनेवाली होती है ॥ १०४ ॥ ३० पारसीक वचा ( खुरासानी वच ) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालवच भी कहते हैं । कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालवच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोर बच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । बालवच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गांठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है । इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधबच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी मोटी गांठें जैसी होती हैं। डा० देसाई के मत से मजार पोश (कश्मी०) ले०-Iris germanica Linn. (आइसिर जर्मेनिका) यह बाल वच है । यह कश्मीर में कम पर लगाई हुई मिलती है । बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालवच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी हृद्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिकारक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है ॥ १०५ ॥ ३१ कुलिंजन हिं०-कुलंजन, कुलिङ्कन, बड़ा कुलजन । ब०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलजम । म०- कुलिंजन्, कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन । गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन । सिन्ध०-कुंजर, कंजर, कांठी । ता०-पेररत्तै । ते०-पेद्डड्डुम्पराराष्ट्रकम् । मला०-पेरारट्टा । क०-धूम रास्मी। ब्रझी०-पदगोजी । फा०-खिरदारु, खरदारु, खुसरवे दारु एक़लान् । अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलंजाने कस्बी, खुलंजान्-ए-कबीर । अं०-Greater Galangal (ग्रेटर