भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
४४ भावप्रकाशनिघण्टुः बाजार में बच के नाम से प्रायः कुलिंजन ( Alpinia galanga ) की जड़ बेची जाती है । इसी लिये जहां बचा ( Acorus calamus ) की आवश्यकता हो वहां घोरबच नाम से ही औषधि खरीदनी चाहिये । बच के स्थान पर आंतरिक प्रयोग में बालवच का प्रयोग भी शास्त्रोक्त नहीं है न उचित ही है । रासायनिक संगठन—इसमें एक सुगन्धि उडनशील पीले रङ्ग का तैल १.५-३.५%, एकोरिन ( Acorin ) नामक मधु के समान पतला तिक्त सुगन्धि ग्लाइकोसाइड, एकोरेटिन (Acoretin ) नामक राल सदृश पदार्थ, कैलामेन (Calamene ) नामक रवेदार क्षाराम तथा स्टार्च, गोंद, टैनिन् एवं कैल्शियम ऑक्सेलेट (Calcium oxalate) आदि पदार्थ रहते हैं। इसके उड़नशील तैल में ॲसारिल् ॲल्डिहाइड (Asaryl-aldehyde ), ॲल्फापिनिन (a-pinene) एवं कैफीन् (Camphene) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—वच वामक, कफनिःसारक, हृल्लासकर, उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, दीपन, पाचन, मेध्य, वृष्य, कृमिघ्न एवं सुगन्धि है। अधिक मात्रा में देने से यह वामक है। इसका उपयोग उन्माद, अपस्मार, अपतन्त्रक, श्वास, कास, कण्ठरोग, जीर्ण अतिसार, संग्रहणी, आध्मान, शूल, मन्दज्वर, विषमज्वर, कर्णमूल ग्रन्थिशोथ एवं अश्मरी आदि रोगों में किया जाता है । ( १ ) अपस्मार, अपतन्त्रक एवं अंगघात आदि रोगों के लिये यह बहुत अच्छी औषधि है। इसके सेवन से धारणाशक्ति (मेधा) बढ़ती है। इसके लिये वच को मधु अथवा दूध के साथ अधिक दिन तक सेवन करना चाहिये । ब्राह्मी, शंखपुष्पी तथा वच तीनों समान मात्रा में लेकर इसके चूर्ण को ब्राह्मी के रस की ३ भावनाएं देनी चाहिये । इसको अथवा सारस्वत चूर्ण को ½ से १ माशा मधु एवं घृत के साथ कुछ दिन लेने से उन्माद, स्मरण शक्ति का ह्रास एवं वाणी की जड़ता आदि दूर होकर बुद्धि का विकास होता है। बेहोशी दूर करने के लिये अन्य औषधियों के साथ इसका अच्छा उपयोग होता है। (२) यह अधिक मात्रा (१ से २ माशा) में वामक है तथा खांसी और श्वास में वमन कराने के लिये इसको नमक और गरम जल से पिलाना चाहिये । इससे बिना किसी कष्ट के कफ निकल जाता है। यह इपिकाक की अपेक्षा अधिक अच्छी औषधि है । सरदी, गले की सूजन, खांसी तथा बच्चों के सूक्ष्म श्वसनिका शोथ में इसका क्वाथ बहुत उपयोगी होता है । सूखी खांसी में इसका टुकड़ा मुख में रखने से लाभ होता है। (३) इसमें रहने वाले टैनिन के कारण इसका उपयोग जीर्ण अतिसार एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। इसके सेवन से आध्मान एवं शूल दूर होता है तथा पाचन सुधर कर भूख बढ़ती है। बच्चों के लिए इसको भूनकर देना चाहिये। यह कृमि तथा पथरी में भी लाभदायक है । दन्तोद्भेद के समय इसको चबाने को बच्चों को देते हैं। (४) मलेरिया आदि विषमज्वरों में अन्य औषधियों के साथ इसके उपयोग से अधिक लाभ होता है । (५) जयपाल के विष को दूर करने के लिए इसको भूनकर जल के साथ पिलाना चाहिये । (६) अर्श में आंग और अजवाइन के साथ इसकी धूनी देने से दर्द दूर होता है । (७) इसका बाह्य प्रयोग अंगघात, आमवात, सन्धिपीडा, आध्मान, शूल तथा खांसी और श्वास में उपयोगी है। हरीतक्यादिवर्गः ४५ (८) मक्खी एवं दीमक आदि कीटों का नाश करने के लिए इसका उपयोग होता है । मात्रा—वामक-१ से २ माशा; अन्य गुणों के लिए-२-४ र०। अधिक मात्रा से शिरःशूल होता है। वर्णनाशक-सौंफ । अथ पारसीक ( खुरासानी ) वचाया नामानि गुणाँश्चाह पारसीकवचा शुक्ला प्रोक्ता हैमवतीति सा । हैमवत्युदिता तद्वद्वातं हन्ति विशेषतः ॥१०४॥ खुरासानी वच के नाम तथा गुण—पारसीकवचा, शुक्लबचा और हैमवती ये नाम खुरासानी वच के हैं। खुरासानी वच-शुक्लवर्ण की (सफेद) होती है तथा गुणों में पूर्वोक्त वच के समान ही होती है किन्तु विशेष करके यह वायु को दूर करनेवाली होती है ॥ १०४ ॥ ३० पारसीक वचा ( खुरासानी वच ) पारसीक वचा (हैमवती) के संबंध में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग इसी को बालवच भी कहते हैं । कुछ परम्परा ऐसी है कि आंतरिक प्रयोग में जब 'वचा' लेनी हो तो बालवच नाम से मिलने वाला द्रव्य लिया जाय एवं बाह्य प्रयोग में 'वचा' के नाम से घोरबच लिया जाय। यद्यपि इसके लिए कोई शास्त्रीय आधार नहीं मिलता और प्रत्यक्षतः वचा के स्थान पर बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में घोर बच का उपयोग अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है । बालवच के नाम से भी बाजार में भिन्न-भिन्न मूल की गांठें बिकती हैं जिनमें से एक का विनिश्चय श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने किया है । इसका वैज्ञानिक नाम Paris polyphylla (पैरिस पॉलिफाइला) है तथा इसे हिन्दी में दुधबच एवं नेपाली में इसे सतुआ कहते हैं। इसकी मोटी मोटी गांठें जैसी होती हैं। डा० देसाई के मत से मजार पोश (कश्मी०) ले०-Iris germanica Linn. (आइसिर जर्मेनिका) यह बाल वच है । यह कश्मीर में कम पर लगाई हुई मिलती है । बाजार में एक बहुत छोटे अन्य प्रकार के मूल भी बालवच के नाम से मिलते हैं। अथ महाभरीवचा यस्या लोके कुलिञ्जन इति नामान्तरं तस्या गुणानाह सुगन्धाऽप्युग्रगन्धा च विशेषात्कफकासनुत् । सुस्वरत्वकरी हृद्या हृत्कण्ठमुखशोधिनी ॥ महाभरी (कुलिञ्जन) के गुण—महाभरी वच (कुलिंजन) सुगन्ध तथा उग्रगन्ध युक्त होती है। विशेष करके यह कफ तथा खाँसी दूर करने वाली, स्वर को उत्तम करने वाली, रुचिकारक, हृदय, कण्ठ तथा मुख को शुद्ध करने वाली होती है ॥ १०५ ॥ ३१ कुलिंजन हिं०-कुलंजन, कुलिङ्कन, बड़ा कुलजन । ब०-कुरची वच, महाभरी वच, कुलजम । म०- कुलिंजन्, कोष्ट कोलञ्जन, मोठे कोलञ्जन । गु०-कुलिंजन जानु, कोलिंजन । सिन्ध०-कुंजर, कंजर, कांठी । ता०-पेररत्तै । ते०-पेद्डड्डुम्पराराष्ट्रकम् । मला०-पेरारट्टा । क०-धूम रास्मी। ब्रझी०-पदगोजी । फा०-खिरदारु, खरदारु, खुसरवे दारु एक़लान् । अ०-इर्क खोलिजान, खुलंजान, खुलंजाने कस्बी, खुलंजान्-ए-कबीर । अं०-Greater Galangal (ग्रेटर
४६ भावप्रकाशनिघण्टुः । गैलंगाल ); Java Galangal ( जावा गैलंगाल । ले०—Alpinia galanga Willd. (अल्पिनिया गैलंगा) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेसी)। पहले यह जावा और सुमात्रा से आया करता था किन्तु अब बंगाल के पूर्व भाग, दक्षिण भारत, मालावार और गोमान्तक के जंगलों में यह अधिकता से उत्पन्न होता है। इसका क्षुप आमा हल्दी के आकार का ६-७ फीट ऊंचा होता है। पत्ते—९ से १८ इंच लम्बे, १।। से ४।। इंच चौड़े, चिकने, आयताकार-भालाकार होते हैं। फूल—हरे से सफेद छोटे छोटे आते हैं। फल—तिहाई इञ्च गोल नारङ्गी रङ्ग के होते हैं। बहुवर्षायु क्षुप होने के कारण काण्ड के सूख जाने पर भी इसकी जड़ जीवित रहती है। जड़—कन्दवत् और सुगन्ध युक्त होती है। इसको टुकड़े-टुकड़े कर सुखा करके बेंचते हैं। ये टुकड़े १ इञ्च से २।। इञ्च तक मोटे, बाहर से लाल या मोर्चा के समान बादामी रङ्ग के और अन्दर से हलके नारङ्गी बादामी रङ्ग के होते हैं। रासायनिक संघटन—इसमें एक सुगन्धित हलके पीले रंग का तेल १.५-४.८% पाया जाता है जिसमें यूजेनॉल (Eugenol २५%), सिनेओल-डी-पिनेन् (Cineole-d-pinene, कॅडे- नेन्स (Cadenens), बंसोरिन् (Bassorin) एवं गैलँगिन् (Galangin) रहते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें ३ पीले रवेदार पदार्थ कॅफेराइड (Kaempferide, $C_{16}H_{12}O$, $H_{2}O$), गलँगॉल (Galangol), मॉनोमेथिल् ईथर ऑफ गॅलँगिन् (Mono-methyl ether of galan- gin) और स्टार्च २३%, राल, टैनिन, फ्लोबैफेन (Phlobaphane), वसा और मोम आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग—प्राणियों में सिरा द्वारा इसके टिंक्चर या काथ के प्रयोग से निम्न प्रभाव दिखलाई देते हैं। रक्त का दबाव पहले कम होकर बाद में ठीक हो जाता है। यह शायद औदरिक रक्तवाहिनियों के विस्फार के कारण होता है। रक्तवहसंस्थान तथा हृदय के ऊपर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया उत्तेजित तथा अधिक मात्रा से श्वसन केन्द्र का घात होकर अवसादित होता है। इसकी अल्प मात्रा से भी श्वसनिकाओं (Bron- chioles) का विस्फार होता है। यह पाइलोकारपीन द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न श्वसनिकाओं के संकोच को भी दूर करता है। रक्त के दबाव के कम होने के कारण ही प्रारंभ में मूत्र की मात्रा कम होती है जो बाद में प्रकृत हो जाती है। पृथक्कृत (Isolated) गर्भाशय इसके प्रयोग से शिथिल होता है तथा उसके संकोच नियमित होने लगते हैं। पाचन-संस्थान के ऊपर इसकी क्रिया अन्य सुगन्धि उड़नशील तैलों की तरह होती है। कुलंजन उत्तेजक, कफनिःसारक, दीपक, पाचक, वातानुलोमक, बल्य तथा वृष्य है। इसका व्यवहार सरदी, जुकाम, आमवात, खांसी, श्वास, स्वर भंग एवं मधुमेह आदि में किया जाता है। (१) श्वास, खांसी, कुकास एवं सरदी के लिये यह बहुत अच्छी औषध है। बच्चों एवं वृद्धों के श्वसनसंस्थान के विकारों में इसको मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इससे श्वासकृच्छ्र दूर होकर ज्वर भी कम होता है। दमे में इसके उद्वेष्टननिरोधि गुण के कारण लाभ होता है। गले के प्रदाह में इसको चूसने से लाभ होता है। (२) इसके सुगन्धि, पाचक तथा दीपक गुणों के कारण पाचन के विकारों में यह उपयोगी है तथा अन्य औषधियों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है।
हरीतक्यादिवर्गः। ४७ (३) मधुमेह तथा अपने आप होने वाले मूत्रत्याग (Incontinence) में इसका काथ लाभदायी है। (४) मुख की दुर्गन्धि दूर करने के लिये तथा वाजीकरण के लिये इसको चबाते हैं। (५) इससे सिद्ध तैल का उपयोग मुखदूषिका तथा कर्णपिटिका आदि चर्म रोगों में किया जाता है। (६) दन्तशूल में इसके चूर्ण को दांतों पर रगड़ते हैं। (७) अधिक पसीना आता हो तो इसके चूर्ण को शरीर पर रगड़ते हैं। (८) इसके बीज का भी उपयुक्त गुणों के लिये व्यवहार होता है। मात्रा—२ से ४ र., टिं. ई-१ द्रा.। नोट—इसी की एक अन्य जाति जिसे अल्पीनिया आफिसिनेरम (Alpinia officinarum Hance) और अं. में लेसर गॅलेंगल (Lesser galangal) कहते हैं, उसका भी व्यवहार कुलंजन के स्थान पर किया जाता है तथा हीनश्रेणी की सोंठ अथवा घोरबच की मिलावट भी इसमें रहती है।
अथ अपरा सुगन्धा स्थूलग्रन्थिः यस्या लोके महाभरी इति नाम तस्या गुणानाह स्थूलग्रन्थिः सुगन्धा स्यात्ततो हीनगुणा स्मृता ॥ १०६ ॥ महाभरी बच के गुण—जो मोटी गांठवाली तथा सुगन्धयुक्त (महाभरी) बच होती है वह पूर्वोक्त बच की अपेक्षा हीन गुण वाली होती है ॥ १०६ ॥
३२ महाभरीबच हि०—महाभरा बच, महाभरी बच, कुलञ्जन भेद। ब०—महाभरी बच, नरकचूर। पं०—कचूर, नरकचूर। मला०—कटुइंशीकुआ । ले०—Zingiber zerumbet Rosc. ex Smith (जिंजीबर् जिरम्बैट्) । Fam. Zingiberaceae (झिंजिबॅरेसी)। इस देश के कई प्रान्तों में यह उत्पन्न होती है। इसका क्षुप गन्ने के समान ३ से ५ फीट ऊँचा और आध इञ्च गोल होता है। पत्ते—८-१२ इञ्च लम्बे, २-३ इञ्च चौड़े, नरसल के पत्तों के समान किञ्चित् आयताकार-भालाकार एवं नोकदार होते हैं। १२ से १८ इञ्च तक लम्बी डण्डियों पर फूल आते हैं। फूल—फीके पीले रङ्ग के होते हैं। फल—एक इञ्च लम्बा दीर्घवृत्ताकार होता है। बीज—छोटे छोटे आयताकार काले रङ्ग के होते हैं। मूलस्तम्भ—कड़ा, द्विवर्षीय, भीतर से पीत, एवं स्वाद में कुछ आर्द्रक जैसा ही किन्तु कुछ कड़वाहट लिये हुए होता है। इसका व्यवहार खांसी, श्वास, कृमि, कुष्ठ तथा अन्य चर्मरोगों में किया जाता है एवं इसके अन्य गुण सोंठ की ही तरह हैं।
अथ चोपचीनीति लोके या प्रसिद्धा तस्या नाम गुणाँश्चाह द्वीपान्तरवचा किञ्चित्तिक्तोष्णा वह्निदीप्तिकृत् । विबन्धाध्मानशूलघ्नी शकृन्मूत्रविशोधिनी ॥ वातव्याधीनपस्मारमुन्मादं तनुवेदनाम् । व्यपोहति विशेषेण फिरङ्गामयनाशिनी ॥१०८॥
४८ भावप्रकाशनिघण्टुः चोबचीनी के नाम तथा गुण-'दीपान्तरवचा' यह संस्कृत नाम चोबचीनी का है। चोबचीनी- कुछ तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, विबन्ध, आध्मान तथा शूल को नष्ट करने वाली, मल तथा मूत्र का शोधन करने वाली होती है एवं वातव्याधि, अपस्मार (मिर्गी), उन्माद (पागलपन) और शरीर के दर्द को दूर करती है और विशेष करके यह फिरङ्गरोग के दूर करने में उत्तम होती है ॥ १०७-१०८ ॥ ३३ चोपचीनी हि०-चोपचीनी, तोपचीनी, चोबचीनी। ब०-तोपचीनी, कुमारिका, शुकचिन । म०, गु०- चोपचीनी । ते०-पिरङ्गीचेका । ता०-परङ्गिचेकई । मला०-चाइना पैवू या पैरू। ने०-चोपचीनी । यू०-खसिलियर आशसिनी । फा०-चोबचीनी । अ०-कशवचीनी, खुशंबुस्सीनी । अं०- China root (चाइनारूट) । ले०-Smilax china Linn. (स्माइलैक्स चाइना)। Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । वच की अनेक जातियों में चोपचीनी भी एक मानी गई है। यह चीन देश में अधिक उत्पन्न होती है और वहीं से इस देश में आती है। इस कारण इसका नाम दीपान्तरवचा रखा गया है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में फैलनेवाली होती है। इस लता की जड़ को ही चोबचीनी कहते हैं। चोबचीनी ८-१० अङ्गुल लम्बी, आध से एक इञ्च तक मोटी, गांठदार, बेरेशा, खुरदरी तथा दृढ़ काष्ठवत् जड़ है। इसका स्वरूप सफेदी मायल पीत, गुलाबी एवं किंचित् कालापन युक्त होता है। अधिक पुरानी होने पर चोपचीनी में प्रायः घुन लग जाते हैं, जिससे वह छिद्र युक्त दिखाई देती है। घुनी हुई तथा गांठविहीन चोपचीनी को उपयोग में नहीं लाना चाहिये। रासायनिक सङ्घटन-इसमें वसा, शर्करा, ग्लूकोसाइड, रञ्जक पदार्थ, सॅपोनिन्, गोंद तथा स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-सम्राट् चार्ल्स पंचम के वातरक्त (Gout) में इस औषधि को बहुत सफलता सिद्ध होने से इसका यूरोप में बहुत प्रचार हुआ था। १७ वीं शताब्दी में सार्सोंपरिला के समान इसका व्यवहार किया जाता रहा। यह स्वेदल, स्नेहन, उत्तेजक, रसायन, रक्तशोधक, बल्य, वाजीकर, फिरंगहर तथा धातुओं को गलाने वाली (Resolvent = रीसॉल्भेन्ड) है। (१) इसको दूध में उबाल कर इसमें मस्तगी, इलायची तथा दालचीनी मिलाकर इसका व्यवहार आमवात, वातरक्त, अपस्मार, जीर्ण वातविकार, काश्यं, धातुक्षीणता, ग्रन्थिविकार तथा फिरंग की तृतीयावस्था में किया जाता है। (२) अनन्तमूल के साथ इसको पुराने सिरदर्द में देने से लाभ होता है तथा आमवात एवं फिरङ्ग में भी इसका व्यवहार करते हैं। (३) डा० देसाई के मतानुसार यह श्रेष्ठ रसायन है। इसकी क्रिया त्वचा, सन्धियों के बन्धन तथा रसग्रन्थियों पर होती है। सोजाक से उत्पन्न सन्थिशोथ आदि विकारों में तथा फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा तृतीयावस्था में इससे बहुत लाभ होता है। पोटेशियम् आयोदाइड् की अपेक्षा यह शीघ्र लाभकर निर्दुष्ट औषध है। फिरङ्गादि से उत्पन्न ग्रन्थिवृद्धि में इसके उपयोग से प्रथम वेदना कम होकर बाद में सूजन कम होती है। चोबचीनी जितना चूर्ण रूप में काम करती है उतना फाण्ट या क्वाथरूप में नहीं करती। हरीतक्यादिवर्गः ४९ मात्रा-चूर्ण-३-६ तो०, सोंठ के साथ दूध में। इस जाति की जिन अन्य औषधियों का व्यवहार किया जाता है प्रसंगतः उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है। (क) जङ्गली उशवा हि०-जङ्गली उशुवा, चोबचीनी । ब०-कुमारिका । मल०-कुरिबिल्पिण्ड । म०-घोटवेल । गु०-गुटी । ता०-मलैतामर ले०-Smilax macrophylla Roxb. (स्माइलैक्स मॅक्रो- फाइला राक्स) । यह एक बड़ी लता होती है जो समस्त भारत में उत्पन्न होती है। पत्ते-लम्बे, बड़े, अखण्ड और नुकीले रहते हैं जिन पर ५, ७ मोटी सिराएं होती हैं। कांटे दूर-दूर या प्रायः अनुपस्थित होते हैं। पुष्प-गुच्छों में आते हैं। फल-चने के समान गोल, हरित एवं पकने पर रक्तवर्ण के हो जाते हैं। मूल-बहुत तथा सार्सोंपरिला के समान लाल रंग की होती है। इसकी जड़ों का व्यवहार किया जाता है। इसकी जड़ें ताजी काम में लानी चाहिये। गुण और प्रयोग-यह स्वेदल, मूत्रल, पौष्टिक, कामोदीपक और रसायन है। फिरङ्ग की द्वितीयावस्था, जीर्ण आमवात तथा सन्धिशोथ में इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। फिरङ्ग से उत्पन्न होने वाले फोड़े-फुन्सियां, सन्धिवान, अस्थिशोध, अस्थिवात और शूल तथा ग्रन्थियों की वृद्धि में उपयोगी है। पुराने चर्मरोग तथा गण्डमाला में इससे लाभ होता है। नेपाल में ३ माशा चूर्ण सोजाक तथा अन्य श्लैष्मिककला के स्रावों के लिए दिया जाता है। मात्रा-१-२ तो० चूर्ण का क्वाथ दिन में एक बार । (ख) बड़ी चोबचीनी हि०-बड़ी चोबचीनी । ब०-हरिनाशुक्चिन । म०-गोटी शुकचिन । पहा०-हङ्गिन । ले०-Smilax glabra Roxb. (स्माइलैक्स ग्लैब्रा राक्स) । यह लता आसाम, सिलहट, खासिया की निम्न श्रेणियों एवं तेनासेरिम आदि स्थानों में उत्पन्न होती है। इसमें कांटे नहीं होते। पत्र-नुकीले, पतले, अधोभाग हलके रङ्ग का; पुष्प-सफेद विदाण्डक; मूल-चोबचीनी की तरह। गुण और प्रयोग-इसके ताजे मूल का क्वाथ त्वक् रोग तथा फिरंग आदि रतिजन्य उपसर्गों से उत्पन्न फोड़े फुन्सी आदि में दिया जाता है। (ग) हरिया शुकचिन पहा०-हरिन शुकचिन । ब०-गुचिया शुकचिन । ले०-Smilax lanceaefolia Roxb. (स्माइलैक्स लॅन्सिफोलिया) । यह भी लता सिक्किम, हिमालय, आसाम एवं बर्मा में होती है। पत्र-पतले तथा उन पर ३ बड़ी शिराएं रहती हैं। इसकी जड़ चोबचीनी के समान होती हैं जिसका व्यवहार किया जाता है। गुण और प्रयोग-इसकी जड़ का रस निकाल कर आमवात में पिलाते हैं तथा इसके कल्क को वेदनास्थान पर बांधते हैं। (घ) उशबा, सार्सापरिला हि०-उशबामग्रबी, सार्सोंपरिला । अं०-Sarsaparilla (सार्सोंपरिला) । ले०-Smilax ornata Hook. (स्माइलैक्स ओर्नेटा) । ४ भा० नि०
५० | भावप्रकाशनिघण्टुः यह स्माइलैक्स की उपर्युक्त विदेशी जाति तथा अन्य विदेशी जातियों के सुखाये हुए मूल हैं। कभी-कभी भौमिक काण्ड (राइजोम) के टुकड़े इसके साथ मिले रहते हैं। यह बहुत लंबे, धारीदार एवं कुछ लालिमा लिये हुए होते हैं। स्थान भेद से तथा वर्ण, धारी एवं भौमिक या वायवीय भाग की अधिकता इत्यादि के कारण इसके स्वरूप में भिन्नता रहती है। यह प्रायः गंधहीन एवं कुछ मीठापन लिये हुए कडु होती है। रासायनिक संगठन- इसमें मुख्यतया संपोनिन् (Sapouin) पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- फिरंग, आमवात, जीर्ण चर्म विकार एवं रक्तदोष के लिए यह बहुत प्रसिद्ध औषध रही है। यह कैसे कार्य करती है यह स्पष्ट नहीं है। संभवतः शारीरिक क्षमता को बढ़ाकर या अन्य औषध के प्रचुषण में सहायता का कार्य करती है। विदेशों में इसका उपयोग अनेक बल्य पेयों में किया जाता है। भारतीय सार्सापरिला के नाम से अनन्तमूल का उपयोग किया जाता है। मात्रा- १ से ३ माशा ।
अथ हपुषाद्वयम्
तन्मध्ये प्रथमं फलं मत्स्यसदृशं विस्रगन्धं द्वितीयमश्वत्थफलसदृशं मत्स्यगन्धम् , तयोर्नामानि गुणांश्चाह हपुषा हबुषा विस्रा पराऽश्वत्थफला मता । मत्स्यगन्धाप्लीहहन्त्री विषघ्नी ध्वांचनाशिनी ॥ हपुषा दीपनी तिक्ता मृदूष्णा तुवरा गुरुः । पित्तोदरसमीरार्शो ग्रहणीगुल्मशूलहृत् ॥ पराऽप्येतद्गुणा प्रोक्ता रूपभेदो द्वयोरपि ॥ ११० ॥ दो प्रकार का 'हाऊबेर' होता है। उसमें पहला जो आकार में मछली के समान तथा आम गन्धवाला होता है और दूसरा जो आकार में पीपल के फल के समान तथा मछली के समान गन्ध- वाला होता है, उन दोनों के नाम तथा गुण— हपुषा, हबुषा और विस्रा ये तीन नाम प्रथम हाऊबेर के हैं और दूसरे के नाम-अश्वत्थफला, मत्स्यगन्धा, प्लीहहन्त्री, विषघ्नी और ध्वाङ्क्षनाशिनी (इसके खाने से कौवे मर जाते हैं) ये हैं। प्रथम हाऊबेर -अग्निदीपक, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, मृदु, उष्णवीर्य, पाक में गुरु, पित्त, उदर और बात सम्बन्धी रोग, बवासीर, ग्रहणी, गुल्म तथा शूल को दूर करता है और दूसरा हाऊबेर भी इन्हीं पूर्वोक्त गुणों से युक्त होता है अन्तर केवल आकार तथा गन्ध मात्र में ही है।
३४ हपुषा ( हाऊबेर )
हिं०-हाऊबेर, हाऊबैर, आरार। ब०-हबुषा। म०-होश। मा०-हाऊबोर। पं०-हाऊबेर, पेल्यरी, अबडुल। कुमा०-चिचिया। काश्मी०-वेंथा, पेथरा। फा०-तुरुमदुलह, ओरस। अ०- अरअर, अबहाल, हब्बउलअरअर। अं०-Juniper berry (ज्युनिपेर बेरी)। ले०-Juniperus communis Linn. (ज्युनिपेरस कम्युनिस, लिन ) । Fam. Cupressaceae (क्यूप्रेसेंसी)। हाऊबेर दो प्रकार का होता है। एक का संस्कृत नाम 'हपुषा' और दूसरे का 'अश्वत्थफला' है। हपुषा और अश्वत्थफला वास्तव में दोनों फल और गन्धभेद से दो द्रव्य हैं, परन्तु दोनों के गुण समान हैं और दोनों ही के वृक्ष भी समान ही होते हैं। हपुषा-मछली के समान आकृति का एवं आम गन्ध युक्त और अश्वत्थफल-मछली के समान गन्ध और पीपर (अश्वत्थ) वृक्ष के फलों के समान फलवाला होता है।
हरीतक्यादिवर्गः | ५१ हपुषा के वृक्ष हिमालय के पश्चिमोत्तर भाग में कुमाऊँ से पश्चिम की ओर १२,५०० से १४,००० फीट की ऊंचाई तक देखने में आते हैं। इसका वृक्ष बड़ा नहीं होता बल्कि इसका झाड़ होता है जो सघन, फैला हुआ, तथा बारहो मास हरा भरा रहता है। पत्ते-रेखाकार, नोकीले, ५ से १३ मि. मी. लंबे, एक साथ तीन-तीन एवं काण्ड से समकोण बनाते हुए होते हैं। फूल-पीत वर्ण के गुच्छों में आते हैं। फल-३/८-३/२ इन्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार और पकने पर नीलापन युक्त काले या कुछ बैंगनी रङ्ग के दिखाई पड़ते हैं। इनके ऊपर रजावरण रहता है। अग्र भाग पर शल्कपत्र के त्रिविभक्त निशान रहते हैं और आधार पर भी शल्क पत्र के दो चक्र रहते हैं। प्रत्येक फल में तीन-तीन बीज रहते हैं जिनके पृष्ठ पर तैलग्रन्थियां पाई जाती हैं। फलों से तेल निकाला जाता है। कुछ लोग ले०-टॅमेरिक्स गॅलिका (Tamarix gallica Linn.), हि०-झाऊ तथा फ्लूजिया ल्यूकोपाइरस (Flueggea leucopyrus Willd) का ग्रहण करते हैं जो उचित नहीं है। रासायनिक संगठन- इसमें एक उड़नशील तैल ०.२५%, राल १०%, मधुशर्करा ३३%, एक तिक्त पदार्थ ज्यूनिपेरिन (Juniperin), ऑक्सैलिक एसिड तथा कुछ आर्गेनिक अम्ल (Organic acid) आदि पदार्थ रहते हैं। इसी की एक अन्य जाति ज्यू. मॅक्रोपोडा (J. macropoda Boiss) के फल कुछ लम्बे रहते हैं तथा उसमें तैल की मात्रा ३.२४% पाई गई है। गुण और प्रयोग- हाऊबेर सुगन्धित, मूत्रजननक, वातानुलोमक, आध्मानहर, पाचक, उत्तेजक, वृष्य, रक्तरुकन्दक, आर्तवजनक एवं उपसर्गनाशक है। इसका उपयोग उदर रोग, यकृत् प्लीहा के विकार, आमवात, संधिशोथ, श्वास, जीर्ण श्वस- निकाशोथ, मुखपाक, अर्धावभेदक, नया तथा पुराना सोज़ाक, श्वेतप्रदर, कष्टार्त्तव, अनार्तव, मधुमेह तथा चर्मरोग में किया जाता है। ( १ ) यह एक उत्तेजक मूत्रजनक है। इसकी क्रिया प्रत्यक्ष वृक्क के ऊपर होकर मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका उपयोग हृदय, यकृत अथवा जीर्ण वृक्कशोथ के कारण उत्पन्न जलोदर में अन्य औषधियों के साथ किया जाता है। तीव्र वृक्क शोथ में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। बच्चों के वृक्कजन्य जलोदर में इससे लाभ होता है। ( २ ) आध्मान, शूल तथा पाचन के विकारों में इसको मद्यसार के साथ देते हैं। ( ३ ) इसका तैल उत्तेजक, मूत्रल तथा वातानुलोमक है एवं इसका उपयोग कटिशूल, आध्मान तथा शूल में किया जाता है। उत्सर्ग के समय प्रत्याक्षेप क्रिया द्वारा यह गर्भाशय का संकोच करता है इसलिए आर्तवस्त्राव वृद्धि के लिए इसका उपयोग किया जाता है। इसके बाह्य प्रयोग से चर्म में प्रक्षोभ उत्पन्न होता है। वृक्क रोग में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। ( ४ ) इसका काष्ठ स्वेदक है तथा ग्वायकम और सासाफ्रास के बदले में प्रयुक्त होता है। ( ५ ) हाऊबेर का रस एक अच्छा उपसर्ग नाशक है। स्थूलांत्र दण्डाणु (बी० कोलाइ) जैसे जीवाणुओं का भी यह नाश करता है। इसके धूम्र का व्यवहार किया जाता है तथा यह मांस तथा मद्यो के संरक्षण के लिये भी प्रयोग में आता है। जानपदिक संक्रामक रोगों के मरक (Pesti- lence) को रोकने की दृष्टि से यह उपयोगी समझा जाता है। मरक के समय इसके चूर्ण का दैनिक सेवन करने से व्याधि का प्रतिषेध होता है।
५२ | भावप्रकाशिनघण्टुः (६) बच्चों के राजयक्ष्मा में इसको पकाकर देने से भूख बढ़ती है, वजन बढ़ता है और लाभ होता है। (७) इसके चूर्ण को आमवातादि में संधियों तथा सूजन पर मलते हैं। (८) यह 'जिन' आदि आपानक मधों के निर्माण के लिये युरोप में व्यवहार में आता है। मात्रा—चूर्ण–२-६ माशा। तैल–१ से १ बूंद पाचक, ४-६ बूंद मूत्रल। स्पिरिट (२० में १) २०-६० बूंद। फांट–२-३ औंस।
अथ विडङ्गस्य नामानि गुणांश्चाह
पुंसि क्लीबे विडङ्गः स्यात्कृमिघ्नो जन्तुनाशनः । तण्डुलश्च तथा वेल्लममोघा चित्रतण्डुलः ॥ विडङ्गं कटु तीक्ष्णोष्णं रूक्षं वह्निकरं लघु । शूलाध्मानोदरश्लेष्मकृमिवातविबन्धनुत् ॥११२॥ वायविडङ्ग के नाम तथा गुण—'विडङ्ग' (यह शब्द पुंलिङ्ग तथा नपुंसकालिङ्ग दोनों ही में व्यव- हृत होता है), कृमिघ्न, जन्तुनाशन, तण्डुल, वेल्ल, अमोघा और चित्रतण्डुल ये सब बायविडङ्ग के पर्यायवाची शब्द हैं। बायविडङ्ग—कटुरसयुक्त, तीक्ष्ण और उष्ण वीर्य होता है तथा रूक्ष, अग्नि- वर्धक एवं पाक में लघु होता है और यह शूल, आध्मान, उदर, कफ, कृमि तथा वात रोग एवं विबद्धता को दूर करता है॥ १११-११२ ॥
३५ वायविडङ्ग
प्रायः सभी पंसारी धनिये के समान गोल-गोल किञ्चित लाली युक्त बीज को वायविडङ्ग के नाम से बेचते हैं और अधिकांश वैद्य इसी को लेकर व्यवहार में लाते हैं किन्तु आज कल के कति- पय विद्वान् वैद्यों की सम्मति है कि शास्त्रीय 'विडङ्ग' वास्तव में आज कल व्यवहार में आने वाले फल वायविडङ्ग नहीं हैं बल्कि 'नाड़ीहिङ्गु' (हि०-डिकामाली) शास्त्रीय विडङ्ग हैं। उनके मत से शास्त्रीय 'विडङ्ग' की जगह नाड़ीहिङ्गु को उपयोग में लेना चाहिये। कुछ विद्वान् काम्पिल्ल के फल को ही बायविडङ्ग मानते हैं। इस प्रकार बायविडङ्ग एक भ्रमात्मक औषधि मानी जाने लगी है। किन्तु मेरी समझ में विडङ्ग और नाड़ीहिङ्गु एक वस्तु नहीं हैं और न वायविडङ्ग काम्पिल्ल का फल ही है। प्रचलित विडङ्ग में शास्त्रोक्त कृमिघ्न अग्निदीपक आदि गुण पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं, अतः सर्वमान्य निर्णय होने तक इसीका व्यवहार औषधि-कार्यों में करना चाहिए। हि०—बायविडङ्ग, बायभिडङ्ग, बायभिरङ्ग, भामिरंग, बाबिरंग। ब०—बिरंग। म०—बावड़िङ्ग, गु०—वावडीङ्ग। क०—वायुविडङ्ग, बायबिलंग। ते०—वायुविडंगमु । ता०—वायुविलंगम । पं०— बबरंग, बाबरंग। भा०—बायबिरंग। सिंहली—उम्बेलिया, अम्बेलिया। ने०—हिमलचेरी। अ०—बरंज काबली, विरंज काबुली। फा०—बरंग काबली, बिरंज कावली, विरङ्ग काबुली। अं०—Babreng; Fruits of Embelia ribes (बावरिंग, फ्रूट आफ एम्बेलिया राइब्स।) । ले०—Embelia ribes Burm. (एम्बेलिया राइब्स)। Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेसी)। यह मध्य हिमालय से भारतवर्ष के पहाड़ी भागों में तथा सिलोन से सिंगापुर तक बहुत पाया जाता है। इसकी झाड़ी बहुत विस्तार में बढ़ने वाली होती है। छाल-वातरन्ध्रों के कारण खुरदरी होती है। टहनियां-लंबी, पतली, लचीली, गोल एवं लंबे पर्व युक्त होती हैं। पत्ते-चर्मवत्,
हरीतक्यादिवर्गः | ५३ २ से ४ इञ्च लंबे दीर्घवृत्ताकार, या कुछ भालाकार, तीक्ष्णाग्र, ऊपर से चमकीले एवं अधोतल पर हल्के या कुछ रजताभ एवं सूक्ष्म रक्ताभ ग्रन्थियों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या किञ्चित् हरियाली लिये फीके पीले रंग के गुच्छों में आते हैं। फल-चौथाई इञ्च तक गोलाकार, पकने पर लाल रंगके किन्तु सूखने पर झुर्रीदार काले रंग के दीख पड़ते हैं। फलों में डण्ठल के साथ पांच पट्टों का पुष्प पात्र लगा रहता है और अग्र की तरफ नोकीला रहता है। फल तोड़ने पर चितकबरे लाल रंग के पतले आवरण से युक्त एक-एक बीज निकलता है, जो स्वाद में चरपरा और गरम मसाले के समान सुगन्धित होता है। चित्रतण्डुलः यह पर्याय इसी चितकबरे वर्ण का द्योतक है। रासायनिक संगठन—इसके फलों में एम्बेलिक् एसिड (Embelic acid) या एम्बेलिन (Embelin, C₁₈ H₂₈ O₄) नामक एक सुनहरे पीले रंग का रवेदार पदार्थ २.५% पाया जाता है। यह जल से अघुलनशील तथा मद्यसार, ईथर, क्लोरोफार्म और बेंझीन में घुलनशील होता है। क्षारीय घोल में यह घुलकर घोल लाल रंग का हो जाता है। इसके अतिरिक्त अल्प मात्रा में क्रिस्टेम्बिन (Christembine) नामक एक क्षाराम तथा तैल, उड़नशील तैल, रंजक द्रव्य, टैनिन एवं राल सदृश पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह उत्तम कृमिघ्न, वातानुलोमक, वातहर, दीपन, पाचन, वातनाडी संस्थान के लिये बल्य, रक्त शोधक, आनुलोभिक तथा रसायन है। रसमन्थियों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका उत्सर्ग मूत्रद्वारा होता है जिससे मूत्र लाल रंग का हो जाता है। (१) स्फीतकृमि (Tape-worm) के लिये यह अत्युत्तम औषधि है। मेलफर्न (Male- fern) के समान इससे मरोड़ नहीं होती और अधिक लाभ होता है। बच्चों को ४ माशा तथा बड़ों को ८ माशा चूर्ण मधु या दही के साथ सुबह खिलाकर ४ घंटे पश्चात् एरण्ड तैल अथवा कोई विरे- चन देना चाहिये । अथवा कोष्ठ शुद्धि के पश्चात रातमें इसका चूर्ण मठ्ठे के साथ देकर दूसरे दिन सुबह विरेचन देना चाहिये। इससे मरे हुए कृमि निकल जाते हैं। अन्य कृमियों पर इससे लाभ नहीं होता। इसका कृमिघ्न गुण एम्बेलिक् एसिड के कारण है। इसके लवण अमोनियम् एम्बेलेट (Ammonium embelate) (१॥-३ २०) का भी उपयोग मधु के साथ अच्छा होता है। इसके पूर्व तथा पश्चात् एरण्ड तैल से विरेचन कराना चाहिये। (२) यह एक अच्छा रसायन है। सुश्रुत में एक 'सर्वोपघातशमनीय' नामक प्रयोग बत- लाया है। नित्य एक महीने तक विडंग के मगज का चूर्ण तथा मुलेठी खाकर ऊपर से ठण्डा जल पीना चाहिये । पथ्य में बिना नमक, मूंग का आंवले के साथ सिद्ध किया यूष तथा घी और भात औषध पचने पर लें। इसके उपयोग से सब प्रकार के अर्श अच्छे होते हैं। ग्रहण शक्ति तथा धारणा शक्ति बढ़ती है। शरीर के सभी प्रकार के कृमि नष्ट होकर शरीर स्वस्थ होता है। इसके हर साल प्रयोग से मनुष्य निरोग तथा शतायु होता है। इससे सब प्रकार के पुराने रोग जैसे अर्श, संग्रहणी, प्रमेह, कुष्ठ, क्षय, श्वास, उपदंश एवं व्रण आदि अच्छे होते हैं तथा हैजा, प्लेग आदि उपसर्गों का भय नहीं रहता। (३) बालकों के सभी रोगों की यह अच्छी औषधि है। सुखण्डी, आध्मान, शूल, कुपचन एवं अग्निमांद्य आदि में दूध में इसको डालकर उबालते हैं और वही दूध पिलाते हैं। इससे बच्चे तन्दुरुस्त रहते हैं। यदि इसके साथ अनन्तमूल भी दिया जाय तो अधिक लाभ होता है। (४) गण्डमाला के लिये—वायविडङ्ग, गुग्गुल, मनःशिला तथा शृङ्गभस्म, मधु और घृत के साथ देने से धीरे २ लाभ होता है।
५४ भावप्रकाशनिघण्टुः (५) चर्म रोगों में इसका आन्तरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। दाद में इसके लेप से लाभ होता है। (६) मज्जातन्तु के रोग जैसे अर्धांगघात, आक्षेप एवं अपस्मार आदि में लहसुन के साथ दूध में उबाल कर देना चाहिये । (७) पीनस, शिरःशूल तथा अर्धावभेदक में इससे सिद्ध तैल के नस्य से लाभ होता है। शिरःशूल में कपाल पर इसकी मालिश करनी चाहिये । (८) बिच्छू के काटने तथा सर्प दंश पर इसका उपयोग लिखा गया है । (९) इसका ताजा रस शीतल, मूत्रल तथा आनुलोमिक होता है । मात्रा—चूर्ण ४ से १६ माशा । ३६ विडङ्ग भेद सं०-विडङ्गभेद । हि०-वायविडङ्ग भेद, बायबिरङ्ग । अवध०-बेवरङ्ग । देहरादून-वाय- विरङ्ग, गैया । गोंड-कोपवल्ली । कुरकु०-भारङ्गेली । मु०-आमटी, गोंदली, वाबंटी । ने०-कलय बोगोटी । अं०-Basal (बासल) । लै०-E. tsjeriam-cottam, A. DC. (ए० त्स्जेरियम्-कोट्टम, ए० डीसी०) ! Fam. Myrsinaceae (मिरसिनेंसी) । यह हिमालय पहाड़ के पूर्व की ओर बङ्गाल तथा दक्षिण की ओर सिलोन तक कहीं न कहीं पाया जाता है। इसके वृक्ष छोटे और बहुत शाखदार होते हैं। पत्ते कुछ अधिक बड़े होते हैं तथा शिराएँ कुछ मुरचई रोमावरण से युक्त होती हैं। फूल-हरियाली लिये सफेद रङ्ग या हरापन युक्त फीके पीले रङ्ग के बहुत छोटे छोटे आते हैं। फल-छोटे छोटे गोल होते हैं और लंबाई में महीन धारीदार होते हैं। गुण और प्रयोग-यह वातानुलोमक, कृमिघ्न, अर्शोघ्न, शोथप्रतीकारक और रसायन है। इसका उपयोग विडङ्ग के समान किया जाता है। बाज़ार में दोनों ही जाति के फल मिले हुये रहते हैं। (१) यह भी विडङ्ग के समान स्फीतकृमि नाशक होता है। (२) गण्डमाला में अनन्तमूल के साथ इसका क्वाथ पिलाते हैं तथा ठण्डे जल में पीसकर गांठों पर लेप करते हैं। (३) दन्तशूल में इसका चूर्ण हींग के साथ दांत के गढे में रखने से लाभ होता है तथा इसका मञ्जन में व्यवहार करते हैं। इसके मूल की छाल का भी इसमें उपयोग होता है। (४) इसके कोमल पत्तों का सोंठ के साथ क्वाथ बनाकर गले की सूजन, मुख के छाले एवं व्रण में कवल कराने से लाभ होता है। (५) न्यूमोनिया तथा अन्य छाती के विकारों में चावल की मांड के साथ इसकी छाल को उबाल कर पिलाते हैं तथा छाल पीसकर छाती पर लेप करते हैं। इसके फलों को पीसकर मक्खन के साथ छाती पर लगाने से फुफ्फुसावरण शोथ में लाभ होता है तथा शिरःशूल में भी इसी प्रकार कपाल में इसका लेप करते हैं ।
हरीतक्यादिवर्गः । ५५ ३७ नाड़ी हिङ्गु (डिकामाली) नाडीहिङ्गु पलाशरूपा जन्तुका रामठी च सा। वंशपत्री च पिण्डाङ्गा सुवीर्य्या हिङ्गुनाडिका ॥ रा. नि. सं०-नाडीहिङ्गु, पलाशरूपा, जन्तुका, रामठी, वंशपत्री, पिण्डाङ्गा, सुवीर्य्या, हिङ्गुनाडिका । हि०-नाडीहिङ्गु, नारीहींग, कलपतोहींग, डिकामाली, डिकेमाली, कमरी । ब०-हिंगुविशेष । म०- डिकेमाली । गु०-डीकामारी । काठी०-मांलण, मालड़ी । क०-डिकामल्हि । ता०-कुंदै । ते०- गेरिविकि, करिगा, तेल्लामंगा । अं०-Gummy Gardena ( गम्मी गार्डेनीया ); Cambi resin (कॅम्बी रेसिन) । लै०-Gardenia gummifera Linn. (गार्डेनिया गम्मी- फेरा) । Fam. Rubiaceae (रूबिएसी) । इसके वृक्ष अधिकतया दक्षिण भारत में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष-छोटा-तथा शाखदार होता है। पत्ते-विनाल, ४"५-७ x २-२'५ से० मी० बड़े, दीर्घवृत्ताभ आयताकार, स्वरूप में कुछ अमरूद के पत्तों के समान तथा चिकने, चमकीले होते हैं। फूल-सुगन्धहीन, प्रारंभ में श्वेत किन्तु बाद में पीतवर्ण के १ से ३ साथ साथ रहते हैं। फल-२'५-३.८ से० मी०, आयताकार या दीर्घ वृत्ताभ, चिकना, लंबाई में धारीदार एवं नोकदार होता है। इन पौधों की कोमल शाखाओं के बीच तथा कलियों में से जाड़े के दिनों में हरियाली लिए हुए किञ्चित पीले रंग का गोंद निकलता है । उसी को 'डीकामाली' कहते हैं। इसकी छाल से गोंद नहीं निकलता । जंगली गोंड लोग ठीकरों में इकट्ठा कर सुखा करके बाजार में बेचते हैं। इस गोंद में छोटी छोटी लकड़ियां, फूस घास आदि मिली रहती है अत एव इसे गरम जल में घोल, छान एवं सुखा करके औषधि के काम में लेना चाहिये । शुद्ध डिकामाली में बिलार के मूत्र जैसी गन्ध आती है तथा वह कुछ आर्द्र एवं चमकीला रहता है और उसके चूर्ण बनाने में कठिनाई होती है। गुण नाडीहिङ्गु कटूष्णं च कफवातात्तिशान्तिकृत् । विष्ठाविबन्धदोषघ्नमानाहामयहारी च (रा० नि०) नाडीहिङ्गु-कटु, गरम, कफ और वात की पीड़ा को शमन करने वाली तथा विष्ठा, विबन्ध और आनाह रोग को नष्ट करने वाली है। नाडीहिङ्गुस्तु कटुकस्तीक्ष्णोष्णश्च दीपकः । कफवातमलस्तम्भमनोमोहामनाशनः ॥ (निघण्टुरत्नाकरः) नाडीहिङ्गु-कटु, तीक्ष्ण, गरम, अग्निप्रदीपक तथा कफ, वात, मलबन्ध, मन का मोह और आम का नाश करनेवाली है। रासायनिक संघटन-इसमें दो प्रकार के राल के सदृश पदार्थ रहते हैं जिसमें से गार्डेनिन् (Gardenin) रवेदार सुनहले पीले रंग का तथा दूसरा डिकेनाली (Dikenali) कुछ मुलायम तथा हरे रंग का होता है। गुण और प्रयोग-यह उद्वेष्टन निरोधि, वातानुलोमक, अग्निदीपक, विरेचक, कृमिघ्न, ज्वरहर, स्वेदजनन, श्लेष्मनिःसारक, त्वक दोषहर एवं प्रतिदूषक है । गुणों में बायविडङ्ग और डिकामाली बहुत समानता रखती है। किन्तु शास्त्रों में विडङ्ग को कृमिघ्न लिखा है और डिकायोली के विषय में उसकी कृमिघ्नता के गुण का स्पष्टीकरण नहीं किया
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है। आधुनिक शोध द्वारा सिद्ध हुआ है कि डिकामली भी विशेष कृमिघ्न है। नाड़ीहिङ्गु के प्रयोग से कोष्ठान्तर्गत वर्तुलाकार कृमि नष्ट या निर्जीव हो जाते हैं। बायविडङ्ग—पक्वाशय के लम्बे चिपटे कृमियों का विनाशक है। डिकामली—इन कृमियों का नाश नहीं कर सकती। इससे गोल ( Round ) या कुछ लम्बे नन्हें नन्हें कृमियों का नाश होता है। डिकेमाली का फांट नियत कालिक ज्वर में देने से कम्पन कम होता है। आन्त्र की विकृतियां जैसे आध्मान, कुपचन एवं शूल आदि में इससे लाभ होता है। बच्चों को दन्तोद्भव के समय जो पाखाना एवं कय आदि विकार होते हैं उसमें इससे अच्छा लाभ होता है। आध्मान में एलुवा के साथ पेट पर इसका लेप करते हैं तथा डिकेमाली खिलाते हैं। इसके फल विरेचक तथा कृमिघ्न होते हैं। मोटापा तथा प्लीहावृद्धि में इसका गोंद व्यवहार किया जाता है। बाहरी प्रयोग से दूषित व्रण साफ किये जाते हैं। इससे कीड़े नहीं पड़ने पाते तथा पड़े हुए कीड़े निकल जाते हैं और मक्खियां नहीं बैठने पातीं। इससे दन्तशूल में लाभ होता है। नारू में इसे ५ र० की मात्रा में देते हैं। अतएव नाड़ीहिङ्गु शास्त्रीय 'विडङ्ग' कदापि नहीं हो सकती। मात्रा—चूर्ण ३–२ र०।
अथ तुम्बुरुफलस्य नामानि गुणांश्चाह
तुम्बुरुः सौरभः सौरो वनजः सानुजोऽन्धकः ॥ ११३ ॥ तुम्बुरु प्रथितं तिक्तं कटुपाकेऽपि तत्कटु । रूक्षोष्णं दीपनं तीक्ष्णं रुच्यं लघु विदाहि च ॥११४॥ वातरश्लेष्माक्षिकर्णाष्ठशिरोरुग्गुरुताकृमीन् । कुष्ठशूलारुचिश्वासप्लीहकृच्छ्राणि नाशयेत् ॥११५॥
'तुम्बुरु' फल के नाम तथा गुण—तुम्बुरु, सौरभ, सौर, वनज, सानुज और अन्धक ये नाम 'तुम्बुरु फल' के हैं। तुम्बुरु फल—तिक्त तथा कटरस युक्त है और विपाक में भी कटरस युक्त है। यह रूक्ष, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, तीक्ष्ण, रुचिजनक, पाक में लघु और विदाही होता है। यह बात- श्लेष्म, नेत्र, कर्ण, ओष्ठ तथा शिर के रोगों को एवं गुरुता (शरीर का भारीपन), कृमि, कुष्ठ, शूल, अरुचि, श्वास, प्लीहा और मूत्रकृच्छ्र इन सब रोगों को भी दूर करता है ॥ ११३-११५ ॥
३८ तुम्बुरु
**हिं०—**तुम्बर, तुम्बुल, तेजफल । **बं०—**तम्बुल, तुम्बुरु फल, नेपाली धने, नेपाली धनिया । **म०—**नेपाली धनियां । **मा०—**तूगूरू । **क०—**तुम्बुरु । **ते०—**तुम्बुरलु । **पं०—**तुम्बर । गु०— तुम्बुरुफल । **लिपचा०—**तंगु कंग । **ले०—**Zanthoxylum alatum Roxb. ( झैंथोक्साइलम् अलैटम् ); Zanthoxylum acanthopodium DC. ( झैंथोक्साइलम् एकैन्थोपोडियम ) दूसरी जाति । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह हिमालय की गरम तराइयों में जम्मू से भूटान तक, खासिया पहाड़, टेहरी, गढ़वाल, नाग पहाड़, विजिगापट्टम और गंजाम के पहाड़ों पर पाया जाता है। इसका **वृक्ष—**झाड़ीदार या कचित् छोटे वृक्षवत रहता है। **कांटे—**सीधे, १-२ से. मी. लंबे एवं अंडाकार आधार के ऊपर रहते हैं। **पत्ते—**संयुक्त लंबे पत्र दण्ड वाले, एवं आधार की तरफ सपंख तथा गुलाबी एवं सीधे कांटों से युक्त होते हैं। **पत्रक—**५ से ११, भालाकार, न्यूनाधिक दन्तुर, ऊपर से चमकीले एवं नीचे से हलके रंग के होते हैं। छोटे छोटे पीले रङ्ग के फूलों के गुच्छे लगते हैं । **फल—**काली मरिच के समान झुमकों में रहते हैं, किन्तु उनके मुख फटे होते हैं। फलों में सुगन्धि आती है। इन फलों के ऊपर तेलिया राल की गाँठे
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होती हैं तथा इनके अन्दर कागज के समान पड़दा रहता है। फल प्रायः खाली रहते हैं किन्तु कभी कभी उनके अन्दर गोल, काले चमकीले बीज रहते हैं। उत्तर हिन्दुस्तान में इसका व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में इसके स्थान पर ले०-झैं. र्हेटसा ( Z. rhetsa DC. ), हिं०- चिरफल, तिरफल, के फल का व्यवहार किया जाता है जो तुम्बुरु के फल से बड़े होते हैं। उन पर तैलिया राल की गांठें तथा अन्दर कागज के समान पडदा नहीं रहता । उनका स्वाद चटपटा अकरकरहा के समान एवं गन्ध संतरे के छिलके के समान होती है।
**रासायनिक सङ्गठन—**इसकी छाल में एक कडुवा पदार्थ, उड़नशील तैल और राल रहती है। यह कडुवा पदार्थ दारुहरिद्रा में पाये जाने वाले बर्बेरीन ( Berberine ) के सदृश होता है। इसके फलों में एक उड़नशील तैल, राल, एक अम्ल पदार्थ और एक रवेदार पदार्थ झैन्- थोक्थाइलिन् ( Xanthoxylin ) पाया जाता है। यह तैल यूकलिप्टस् ( Eucalyptus ) तैल के सदृश गन्ध एवं गुणवाला होता है।
**गुण और प्रयोग—**यह सुगन्धि, उष्ण, दीपन, पाचन, वातानुलोमक, ग्राही और उत्तेजक है। इसकी क्रिया गन्धाबिरोजा तथा यूकेलिप्टस् तेल के समान होती है। इसके छाल की क्रिया दारुहरिद्रा के समान होती है। ( १ ) ज्वर, कुपचन, अतिसार, हैजा एवं मंदाग्नि आदि में इसके मूलत्वक् और फल का फांट उत्तेजक तथा बल्य औषध के रूप में दिया जाता है। ( २ ) दमें में इसका गुड़ाखू बना कर धूम्रपान उपयोगी है। ( ३ ) गले की सूजन में इसके ताजे पत्तों को पीस कर चावल के आटे के साथ गरम करके बांधने से लाभ होता है। ( ४ ) यह एक अच्छा प्रतिदूषक ( Antiseptic ) होने के कारण व्रणों के लिये इसके फलों का आन्तरिक तथा बाह्य प्रयोग किया जाता है। इसके मूलत्वक् काथ से व्रण प्रक्षालन से लाभ होता है। ( ५ ) इसके फलों. का व्यवहार दन्तशूल में किया जाता है। इसकी दातुन दाँतों के लिये अच्छी समझी जाती है एवं छाल तथा फल का दन्तमञ्जनों में प्रयोग किया जाता है। ( ६ ) इसका तैल प्रतिदूषक, कीटाणुनाशक तथा दुर्गन्धिहर है। **मात्रा—**फल—२-५ र., छाल—१-२ तो. फांट बना कर।
३९ तिरफल
**सं०—**तुंबरु । **म०—**चिरफल, तिसल । ते०— इरत्तचै। **ता०—**राचामम् । **क०—**जिमुमी मारा । ले०—Zanthoxylum rhetsa DC (झैंथोक्साइलम् ह्रेटसा) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) ।
यह मध्यम ऊंचाई का कटीला वृक्ष दक्षिण में विशेषकर कोंकणमें होता है। इसके **पत्ते—**सदलपर्ण एवं मोटी टहनियों के अग्र पर समुद्भवद होकर रहते हैं। **पत्रक—**प्रायः १९-२५, तून के सदृश, आयताकार या प्रासवत् , अखण्ड या गोल दन्तुर धार वाले होते हैं। **पुष्प—**छोटे, पीले, गुच्छों के रूप में। **फल—**गुच्छों के रूप में, कच्ची अवस्था में हरे तथा बाद में काले से हो जाते हैं। अन्य वर्णन ऊपर तुम्बुरु के साथ दिया गया है। इसके फल तथा जड़ की छाल का प्रयोग किया जाता है। **रासायनिक सङ्गठन—**तुम्बुरु के समान तैल, राल आदि ।
यहाँ दोनों पृष्ठों का मूल रूप में सटीक लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:
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गुण और प्रयोग—इसके गुण तुम्बुरु के समान हैं। इसके मूलत्वक् की क्रिया दारुहरिद्रा, मञ्जेरियून, चोबेहयात या पीतचम्पक के छाल की तरह होती है। इसकी जड़ सुगन्धि, कड़वी, मूत्रल तथा पौष्टिक है। ( १ ) इसके फल उत्तेजक, ग्राही, दीपन एवं पाचन होते हैं और इनका व्यवहार, आध्मान, कुपचन, अजीर्ण एवं अतिसार आदि में किया जाता है। सड़ी हुई मछलियों के खाने से उत्पन्न अजीर्ण, वमन एवं अतिसार में इसका व्यवहार करते हैं। मछली खाने वालों के लिये यह पाचक है। तिरफल तथा अजवायन का अर्क हैजे में दिया जाता है। आमवात में मधु के साथ इसे खिलाते हैं। ( २ ) मूलत्वक्—शिथिलताजन्य कुपचन में प्रयोग में लाई जाती है। यह मूत्रल होती है। दन्तशूल में तथा लकवा से जिह्वा का कार्य ठीक न होता हो तो इसे चबाने को देते हैं। जीर्ण आमवात में भी इससे लाभ होता है। यह वृष्य, कड़वी और सुगन्धि होती है और फल की तरह भी इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—बीज निकाले फल का चूर्ण—१-२ र. मधु के साथ; मूलत्वक् १-२ तो. फांट बना कर नित्य एक बार।
अथ वंशलोचनस्य नामानि गुणांश्चाह
स्याद्वंशरोचना वांशी तुगाक्षीरी तुगाशुभा। त्वक्क्षीरी वंशजा शुभ्रा वंशक्षीरी च वैणवी ॥ वंशजा बृंहणी वृष्या बल्या स्वाद्दी च शीतला। तृष्णाकासास्रज्वरश्वासक्षयपित्तास्रकामलाः ॥ हरेत्कुष्ठं व्रणं पाण्डुं कषाया वातकृच्छ्रजित् ॥ ११७ ॥
वंशलोचन के नाम तथा गुण—वंशरोचना, वांशी, तुगाक्षीरी, तुगा, शुभा, त्वक्क्षीरी, वंशजा, शुभ्रा, वंशक्षीरी और वैणवी ये नाम वंशलोचन के हैं। वंशलोचन—बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), बलकारक, स्वादु, कषाय रसयुक्त और शीतल होता है और यह तृष्णा, कास, ज्वर, श्वास, क्षय, रक्तपित्त, कामला, कुष्ठ, व्रण, पाण्डु, वात तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करता है।
४० वंशलोचन
हि०—वंशलोचन, वंशलोचन। ब०—बांस काबर। म०—वंसलोचन। गु०—वंशकपूर। बांसकपूर। क०—वंशलोचना, वंशरोचना, वंशरीचना। ते०—तवक्षीरी, तवक्षीरी, वंशलोचनमु। ता०—वंशलोचनम्। फा०—तवासीर, तवासीर। अ०—तबाशीर। अं०—Bamboo Manna (बाम्बूमन्ना)। ले०—Bambusa arundinacea Willd (बांबुजा अरुण्डिनेसिया)। Fam—Gramineae (ग्रैमिनी)।
बांस के वृक्ष भारतवर्ष के प्रायः सभी प्रान्तों में उत्पन्न होते हैं, विशेषकर बङ्गाल की तरफ इसकी खेती होती है।
मोटे और दृढ बांस के भीतर एवं बड़े मोटे पोली जाती के पहाड़ी बांसों के भीतर जिसे नजला बांस कहते हैं जब सफेद रस सूखकर कंकर के समान बन जाता है, तब इस सफेद कंकरी को वंशलोचन कहते हैं। यह केवल मादी जाति के ही बांसों में जमता है। बांसों को
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काट कर जब फाड़ते हैं तब किसी-किसी बांस के भीतर से यह निकलता है। कहते हैं कि स्वाती नक्षत्र का जल बांस के भीतर पड़ने से उसमें वंशलोचन उत्पन्न होता है। असली वंशलोचन नीलापन युक्त सफेद रङ्ग का होता है, लकड़ी पर घिसने पर रेशा नहीं उभरती तथा जल में डालने पर पारदर्शक हो जाता है लेकिन मिट्टी के तेल में डालने पर पारदर्शकता कम हो जाती है। स्वाद में यह फीका होता है। लेकिन आजकल बाजार में प्रायः नकली वंशलोचन ही बिकता है जो देखने में बहुत सुन्दर नीली आभा युक्त बड़े-बड़े कंकड़ों के रूप में होता है। पहले असली वंशलोचन जावा, सिङ्गापुर आदि से आता था। अब तो शायद किसी रासायनिक विधि से यह तैयार करके असली के नाम पर बिका करता हैं जिसका स्वाद कुछ तीक्ष्ण रहता है। वंशलोचन के अतिरिक्त बांस के कोमल प्रांकुर, पत्र, गांठ, बीज तथा मूल का व्यवहार किया जाता है।
रासायनिक संगठन—वंशलोचन में सिलिका (Silica) ९०% या सिलिसिक् एसिड के हाइड्रेट के रूप में सिलिकम् (Silicum as hydrate of silicic acid), मंडूर (Peroxide of iron), पोटाश (Potash), चूना, ॲल्युमिनिया (Aluminia) तथा कुछ वानस्पतिक पदार्थ जैसे कोलिन (Colin), बिटेन (Betain), न्यूक्लियस (Nuclease), यूरिएस (Urease), प्रभूजिन एवं कार्बोज के पाचक किण्व तथा स्नेहविलेयक किण्व (Proteolytic, diastatic and emulsifying enzymes) तथा सायनोंजेनेटिक ग्लूकोसाइड (Cyanogenetic glucoside) आदि पदार्थ पाये जाते हैं।
बांस की राख में सिलिका २८, चूना ४, मॅग्नेशिया ६, पोटैशियम ३४, सोडियम् १२, क्लोरीन २, गंधक १० भाग और कुछ जल रहता है। कुछ लोग इसके क्षार को तथा असली वंशलोचन को गरम करके जल में डालते हैं और सूखने पर वंशलोचन के स्थान पर बेचते हैं।
गुण और प्रयोग—( १ ) वंशलोचन उत्तेजक, ज्वरहर, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, प्यास-शमन करने वाला, उद्वेष्टननिरोधि एवं ग्राही होता है। इससे श्वसनसंस्थान की श्लेष्मलकला को पुष्टि मिलती है तथा कफ की मात्रा कम होती है। इससे बने हुए सितोपलादि चूर्ण का व्यवहार जीर्णज्वर, श्वास, कास, क्षय, मन्दाग्नि, कमजोरी, कफ में खून जाना, दाह, प्रमेह, मूत्रदाह तथा वातविकार एवं सर्पदंश में किया जाता है। ग्राही औषधियों के साथ जीर्ण संग्रहणी तथा आन्तरिक रक्तस्रावों में इसका उपयोग करते हैं।
( २ ) इसकी कोमल गांठ तथा पत्तों का काथ गर्भाशय संकोचक होता है। इसका उपयोग प्रसूता में आर्तवशुद्धि के लिए एवं अन्य आर्तव विकारों में किया जाता है।
( ३ ) इसके कोमलपत्र का उपयोग कफ से खून जाना, कुष्ठ, ज्वर तथा बच्चों के सूत्रकृमि में किया जाता है।
( ४ ) इसके प्रांकुर (Shoots) का रस निकाल कर कृमियुक्त घावों पर डाला जाता है तथा बाद में उसका पोल्टिस उन पर बांध दिया जाता है। जिन लोगों का पाचन ठीक नहीं होता उनको इसके कोमल प्रांकुरों से बने सिरके का उपयोग मांस मछली के साथ उपयोगी होता है। इससे भूख बढ़ती है तथा पाचन भी ठीक होता है।
( ५ ) इसकी गांठों को पीसकर जोड़ों के दर्द पर उसका बन्धन उपयोगी है।
( ६ ) इसके बीज को गरीब लोग चावल के रूप में खाते हैं।
( ७ ) इसका मूल विस्फोटिक व्याधियों (Eruptive affections) में बहुत उपयोगी है तथा दाद पर लाभदायक है।
६० भावप्रकाशनिघण्टुः (८) इसके पुष्परस का उपयोग कर्णबिन्दु के रूप में कर्णशूल एवं बाधिर्य आदि में किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १/४-२ माशा। अथ समुद्रफेनस्य नामानि गुणांश्चाह समुद्रफेनः फेनश्च डिण्डीरोऽब्धिकफस्तथा ॥ ११८ ॥ समुद्रफेनश्चक्षुष्यो लेखनः शीतलश्च सः । कषायो विषपित्तघ्नः कर्णरुक्कफहृत्सरः ॥११९॥ समुद्रफेन के नाम तथा गुण-समुद्रफेन, फेन, डिण्डीर और अब्धिकफ ये सब नाम 'समुद्र- फेन' के हैं। समुद्रफेन-नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, शीतल, कषाय रस युक्त, विष और पित्त का नाशक, कर्णरोग तथा कफ का भी नाशक और यह सारक भी होता है ॥ ११८-११९ ॥ ४१ समुद्रफेन हि०-समुद्रफेन, समुन्दरफेन, दर्या का कफ । ब०-समुद्रर फेना, समुद्रफेला । म०-समुद्रफेण । मा०-समन्दरझाग । पं०-समुन्द्रझाग, समुद्रझाग । गु०-समुद्रफिण । क०-समुद्रनालिगे । मळ०, ता०-कडुल नोरे । ते०-सोरुपेनक, समुद्रपुनुरुपु । फा०-कफदरिया । अ०-जुब्दुल्बहरे, जब्दुल बहेर । अं०-Cuttle Fish Bone (कटिल फिश बोन); Os Sepiae (ऑस् सेपी) । ले०- Sepia officinalis (सेपिया ऑफिसिनेलिस्) । जाति (Family)-Cephalopoda (सिफै- लोपोडा) । वर्ग (Class) - Mollusca (मोल्यूस्का) । समुद्रफेन यह समुद्र का झाग नहीं है वरन् यह एक समुद्री जीव (मछली) का अस्थिपञ्जर (या कवच) है जो कुछ समय बाद विशेष आकृति का हो जाता है और समुद्र के पानी पर तैरता रहता है। इसके टुकड़े १-३ इञ्च चौड़े और ५-१० इञ्च लम्बे होते हैं। ये लम्बे, चिपटे, आयताकार अथवा अण्डाकार, सफेदी लिये हुये, कठोर तथा भंगुर होते हैं। इसकी बाह्य सतह कई परतों से बनी दिखलाई देती है तथा सुचूर्ण्य होती है। भीतरी सतह कठोर, सुषिर एवं आसानी से टूटने वाली होती है। इसका स्वाद फीका, तीक्ष्ण तथा क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इसमें कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) ८०-८५% तथा फास्फेट, सल्फेट और सिलिका (Silica) आदि पदार्थ रहते हैं। गुण और प्रयोग-इसका आन्तरिक प्रयोग बहुत कम होता है। यह खड़िया के समान अम्लत्व दूर करने वाला तथा ग्राही एवं स्थानिक उपशामक है। (१) इसका सूक्ष्म चूर्ण कर्णस्राव तथा कर्णपीड़ा के लिए कानों में डालते हैं। मुख तथा दांतों के विकारों में यह दन्तमञ्जन की तरह उपयोग में आता है तथा झांई, मुहासे, व्यंग तथा चर्म के अन्य विकारों में इसका सूक्ष्मचूर्ण या नींबू के रस के साथ इसका लेप लगाया जाता है। अम्हौरी में गुलाब जल के साथ शरीर पर इसे लगाते हैं। (२) इसका नेत्र रोगों में विशिष्ट स्थान है। लेखन गुण के कारण नेत्रशुक्ल, जाला, धुंध आदि में सुरमा के समक्ष या सुरमा में मिलाकर इसे काम में लाते हैं। वर्मदाह में इसे गुलाब जल और सैन्धव के साथ महीन पीसकर आंख में लगाते हैं ।
हरीतक्यादिवर्गः ६१ (३) कर्णस्राव में इसे तैल में सिद्ध करके उसका उपयोग करते हैं। (४) यद्यपि आयुर्वेद में इसका आंतरिक प्रयोग नहीं दिखाई देता तथापि यह चूने का अच्छा सेन्द्रिय योग है जिसका आन्तरिक उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा-२ से ८ रत्ती। अथाष्टवर्गस्य लक्षणगुणानाह जीवकर्षभकौ मेदे काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके ॥ १२० ॥ अष्टवर्गोऽष्टभिर्द्रव्यैः कथितश्चरकादिभिः ॥ १२१ ॥ अष्टवर्गो हिमः स्वादुर्बृंहणः शुक्लो गुरुः । भग्नसन्धानकृत्कामबलासबलवर्द्धनः ॥ वातपित्तास्रतृड्दाहज्वरमेहक्षयप्रणुत् ॥ १२२ ॥ अष्टवर्ग के लक्षण तथा गुण-जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली,१ क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन सब आठ द्रव्यों को चरकादि मुनिगण 'अष्टवर्ग' नाम से व्यवहार करते हैं। अष्टवर्ग- शीतवीर्य, स्वादिष्ट, बृंहण (धातुवर्धक), शुक्रजनक, विपाक में गुरु, भग्नसन्धानकारक (टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला), काम, कफ तथा बल को बढ़ाने वाला, वात, पित्त, रक्त, तृष्णा, दाह, ज्वर, प्रमेह और क्षय रोग को दूर करने वाला होता है ॥ १२०-१२२ ॥ तत्रादौ जीवकर्षभकयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह जीवकर्षभकौ ज्ञेयौ हिमाद्रिशिखरोद्भवौ । रसोनकन्दवत्कन्दौ निःसारौ सूक्ष्मपत्रकौ ॥१२३॥ जीवकः कूर्चकाकार ऋषभौ वृषशृङ्गवत् । जीवको मधुरः शृङ्गो ह्रस्वाङ्गः कूर्चशीर्षकः ॥१२४॥ ऋषभो वृषभो धीरो विषाणी द्राक्ष इत्यपि । जीवकर्षभकौ बल्यौ शीतौ शुक्रकफप्रदौ ॥ मधुरौ पित्तदाहास्रकार्श्यवातक्षयापहौ ॥ १२५ ॥ अष्टवर्गान्तर्गत जीवक तथा ऋषभक के उत्पत्ति स्थान, लक्षण, नाम तथा गुण-जीवक और ऋषभक ये दोनों औषधियां हिमालय पर्वत के शिखर के ऊपर उत्पन्न होती हैं। इन दोनों के कन्द ठीक लहसुन के कन्द के समान होते हैं और ये निःसार होते हैं तथा पत्ते सूक्ष्म होते हैं। उसमें जीवक का आकार कूंची के समान होता है और ऋषभक बैल के सींग की भांति होता है। जीवक, मधुर, शृङ्ग, ह्रस्वाङ्ग और कूर्चशीर्षक ये नाम जीवक के हैं। तथा ऋषभ, वृषभ, धीर, विषाणी और द्राक्ष ये नाम ऋषभक के हैं। ये दोनों बलकारक, शीतवीर्य, शुक्र तथा कफ के वर्धक, मधुर रसयुक्त, पित्त, दाह, रक्तदोष, कृशता, वात तथा क्षयरोग के दूर करने वाले होते हैं ॥ १२३-१२५ ॥ अथ मेदामहामेदयोरुत्पत्तिलक्षणनामगुणानाह महामेदाऽभिधः कन्दो मोरङ्गादौ प्रजायते ॥ १२६ ॥ महामेदा वनीमेदा स्यादित्युक्तं मुनीश्वरैः ॥ १२७ ॥ शुक्लाऽर्कनिभः कन्दो लताजातः सुपाण्डुरः । महामेदाभिधो ज्ञेयो मेदालक्षणमुच्यते ॥ शुक्ल कन्दो नखच्छेद्यो मेदोधातुमिव स्रवेत्। यः स मेदेति विज्ञेयो जिज्ञासातातपरैर्जनैः ॥ शल्यपर्णी¹ मणिश्च्छिद्रा मेदा मेदाभवाध्वरा। महामेदा वसुच्छिद्रा त्रिदन्ती देवतामणिः ॥ मेदायुगं गुरु स्वादु वृष्यं स्तन्यकफावहम् । बृंहणं शीतलं पित्तरक्तवातज्वरप्रणुत् ॥१३१॥ १. 'स्वल्पपर्णी'ति पाठा०।
६२ भावप्रकाश निघण्टुः मेदा और महामेदा के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—उसमें महामेदा नामक कन्द मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिणपूर्वभाग) आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। महामेदा, बनीमेदा है ऐसा मुनीश्वरों ने कहा है। महामेदा लता से उत्पन्न होती है तथा इसका कन्द पाण्डुवर्ण का, सफेद अदरक के समान होता है। ये महामेदा के लक्षण हुये, अब मेदा के भी लक्षण कहते हैं— जिसके कन्द सफेद हों तथा जिसमें नख से काटने पर मेदधातु के समान एक प्रकार का रस निकलता हो उसे मेदा समझना चाहिये। शल्यपर्णी, मणिच्छिद्रा, मेदा, मेदोभवा और अध्वरा ये नाम मेदा के हैं। महामेदा, वसुच्छिद्रा, त्रिदन्ती और देवतमणि ये नाम महामेदा के हैं। उक्त दोनों प्रकार का मेदा—वे दोनों परिपाक में गुरु, स्वादिष्ट, वीर्यवर्धक, दुग्ध तथा कफ को बढ़ाने वाले, धातुवर्धक, शीतल, पित्त, रक्तसम्बन्धी दोष, वायु तथा ज्वर को दूर करने वाले होते हैं ॥ १२६-१३१ ॥ अथ काकोलीक्षीरकाकोल्योत्पत्तिलक्षणनामगुणान्याह जायते क्षीरकाकोली महामेदोद्भवस्थले ॥ १३२ ॥ यत्र स्यात्क्षीरकाकोली काकोली तत्र जायते । पीवरीसदृशः कन्दः सक्षीरः¹ प्रियगन्धवान् ॥ १३३ ॥ सा प्रोक्ता क्षीरकाकोली काकोलीलिङ्गमुच्यते । यथास्यात्क्षीरकाकोली काकोल्यपि तथा भवेत् ॥ एषा किञ्चिद्भवेत्कृष्णा मेदोऽयुग्मभयोरपि । काकोली वायसोली च वीरा कायस्थिका तथा ॥ सा शुक्ला क्षीरकाकोली वयस्था क्षीरशुक्लिका ॥ कथिता क्षीरिणी धीरा² क्षीरशुक्ला पयस्विनी ॥ १३६ ॥ काकोलीयुगलं शीतं शुक्लं मधुरं गुरु । बृंहणं वातदाहास्रपित्तशोषज्वरापहम् ॥ १३७ ॥ काकोली तथा क्षीरकाकोली के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—महामेदा के उत्पन्न होने का जहां स्थान है, वहीं पर क्षीरकाकोली भी उत्पन्न होती है। और जहां पर क्षीरकाकोली उत्पन्न होती है, वहां पर काकोली भी होती है। क्षीरकाकोली का कन्द पीवरी (शतावर) के समान होता है और काटने पर उसमें से दूध निकलता है तथा यह प्रिय गन्ध से युक्त होता है। अब काकोली के लक्षण कहते हैं—जिस प्रकार की क्षीरकाकोली होती है उसी प्रकार की काकोली भी होती है। किन्तु दोनों में भेद यह है कि काकोली, क्षीरकाकोली की अपेक्षा कुछ कृष्णवर्ण की होती है। काकोली, वायसोली, वीरा और कायस्थिका ये नाम काकोली के हैं और शुक्ला, क्षीरकाकोली, वयस्था, क्षीरशुक्लिका, क्षीरिणी, धीरा, क्षीरशुक्ला और पयस्विनी ये नाम क्षीरकाकोली के हैं। उक्त दोनों प्रकार की काकोली-शीतल, शुक्रवर्धक, मधुर, गुरु, बृंहण (धातुवर्धक), वात, दाह, रक्तपित्त (या रक्तदोष तथा पित्त), शोष और ज्वर की नाशक होती है ॥ १३२-१३७ ॥ अथ ऋद्धिवृद्धयोत्पत्तिलक्षणनामगुणान्याह ऋद्धिवृद्धिश्च कन्दौ द्वौ भवतः कोशलेऽचले³ । श्वेतलोमान्वितः कन्दो लताजातः सरन्ध्रकः ॥ स एव ऋद्धिर्वृद्धिश्च भेदमप्येतयोर्भुवे । तुलग्रन्थिसमा ऋद्धिर्वामावर्त्तफला चसा ॥ १३९॥ वृद्धिस्तु दक्षिणावर्त्तफला प्रोक्ता महर्षिभिः । ऋद्धियोंग्या⁴ सिद्धिर्लक्ष्म्यौ वृद्धेरप्याह्वया इमे ॥ १४० ॥
¹. 'क्षीरं स्रवति गन्धवानि'ति पाठा० । ². 'धीरे'ति पाठा० । ³. 'कोशयामले' इति पाठान्तरम् । ⁴. 'ऋद्धियुग्ममि'ति पाठा० ।
हरीतक्यादिवर्गः ६३ ऋद्धिर्बल्या त्रिदोषघ्नी शुक्ला मधुरा गुरुः । प्राणैश्वर्यकरी मूर्च्छारक्तपित्तविनाशिनी ॥ १४१ ॥ वृद्धिर्गर्भप्रदा शीता बृंहणी मधुरा स्मृता । वृष्या पित्तास्रशमनी क्षतकासक्षयापहा ॥ १४२ ॥ ऋद्धि तथा वृद्धि के उत्पत्तिस्थान, लक्षण, नाम तथा गुण—ऋद्धि और वृद्धि ये दोनों कन्द कोशल पर्वत में उत्पन्न होते हैं। ऋद्धि का कन्द सफेद रोयें से युक्त, लता से उत्पन्न होने वाला तथा छिद्रों से युक्त होता है। और वृद्धि भी इसी प्रकार की होती है, किन्तु इन दोनों का जो परस्पर भेद है उसे अब कहता हूँ—ऋद्धि कपास की गांठ के समान आकार वाली तथा बायें तरफ से आवर्त्तशील फल वाली होती है। और वृद्धि—दहिने तरफ से आवर्त्तशील फलवाली होती है ऐसा महर्षि लोग कहते हैं। उक्त दोनों प्रकार की ऋद्धि (ऋद्धि-वृद्धि) के योग्य, सिद्धि और लक्ष्मी ये तीन नाम हैं। ऋद्धि-बलकारक, त्रिदोष को दूर करने वाली, शुक्रवर्धक, मधुर रस युक्त, पाक में गुरु और प्राणप्रद, ऐश्वर्यजनक, एवं मूर्च्छा और रक्त पित्त को नाश करने वाली होती है। वृद्धि-गर्भजनक, शीतल, बृंहण (धातुवर्धक), मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), रक्तपित्त को शमन करने वाली, क्षत (उरःक्षतादिक), कास तथा क्षय को दूर करने वाली होती है ॥ १३८-१४२ ॥ राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः । तस्मादस्य प्रतिनिधिं गृह्णीयात्तद्गुणं भिषक् ॥ १४३ ॥ साधारण लोगों को कौन कहे अष्टवर्ग की उक्त औषधियां राजाओं को भी दुर्लभ हैं। अतः वैद्य को चाहिये कि वे इसके समान गुण वाली प्रतिनिधि औषधियों को काम में लावें ॥ १४३ ॥ ✤ मुख्यसदृशः = प्रतिनिधिः ॥ १४३ ॥ यहां पर 'प्रतिनिधि' पद का 'मुख्य के सदृश' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ १४३ ॥ अथाष्टवर्गस्य प्रतिनिधिमाह मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेष्वपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धावाराहीश्चक्रमात् क्षिपेत् ॥ १४४ ॥ अष्टवर्ग की प्रतिनिधि औषधियां—दोनों प्रकार की मेदा, दोनों प्रकार के जीवक, दोनों प्रकार की काकोली तथा दोनों प्रकार की ऋद्धि के स्थान में क्रम से शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द इन औषधियों को डालना चाहिये ॥ १४४ ॥ ✤ मेदामहामेदास्थाने शतावरीमूलम् । जीवकर्षभकस्थाने विदारीमूलम् । काकोली- क्षीरकाकोलीस्थाने अश्वगन्धामूलम् । ऋद्धिवृद्धिस्थाने वाराहीकन्दं गुणैस्तत्तुल्यं क्षिपेत् ॥ १४४ ॥ यहां पर 'मेदा और महामेदा के स्थान में सतावर का मूल, जीवक तथा ऋषभक के स्थान में विदारीकन्द का मूल, काकोली तथा क्षीरकाकोली के स्थान में असगन्ध का मूल, एवं ऋद्धि तथा वृद्धि के स्थान में वाराही कन्द को गुणों में पूर्वोक्त औषधियों के समान समझकर डालें' ऐसा समझना चाहिये ॥ १४२ ॥
४२ अष्टवर्ग
Here is the complete and exact transcription of the text from both pages:
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६४ | भावप्रकाशनिघण्टुः ४२ अष्टवर्ग
| नाम | उत्पत्तिस्थान | सामान्यरूप | परस्पर पार्थक्य | शा० प्रतिनिधि |
|---|---|---|---|---|
| १ जीवक | हिमालय पर्वत शिखर | कन्द-रसोन के समान पत्र-सूक्ष्म सारहीन | कूं ची के समान | विदारीकन्द |
| २ ऋषभक | ” ” | ” | बैल के सींग के समान | ” |
| ३ मेदा | मोरङ्ग (नेपाल का दक्षिण-पूर्व भाग | कन्द-मेद के सदृश स्राव नख से छेद्य | शुक्लवर्ण | शतावरी मूल |
| ४ महामेदा | ” | कन्द-शुक्ल आर्द्रक के समान, लताजात | पाण्डुरवर्ण | ” |
| ५ काकोली | ” | कन्द-शतावरी सदृश सक्षीर सुगन्धयुक्त | अधिक कृष्णवर्ण | अश्वगंधा का मूल |
| ६ क्षीरकाकोली | ” | ” | कम कृष्णवर्ण | ” |
| ७ ऋद्धि | कोशल्पर्वत | कन्द-श्वेतलोमयुक्त लताजात छिद्रयुक्त | कपास की गांठ के समान वामावर्तफल | वाराहीकन्द |
| ८ वृद्धि | ” | ” | दक्षिणावर्तफल | ” |
इस समय अष्टवर्ग की कोई भी औषधि सच्ची नहीं मिलती है। यों तो अष्टवर्ग के बेचनेवाले कितने फर्में हो गये हैं, इनमें 'अष्टवर्ग कार्यालय देहरादून' प्रसिद्ध है परन्तु अष्टवर्ग के देखने और शास्त्रों से मिलान करने से कोई भी असली नहीं सिद्ध होती। अष्टवर्ग के अभाव में मेदा-महामेदा की जगह शतावर, जीवक-ऋषभक की जगह विदारीकन्द, काकोली-क्षीरकाकोली की जगह असगन्ध और ऋद्धि-वृद्धि की जगह वाराहीकन्द डालने को कहा गया है। परन्तु आजकल के कतिपय विद्वान् वैद्य शतावर, विदारीकन्द, असगन्ध और वाराहीकन्द को अष्टवर्ग का प्रतिनिधि नहीं मानते। क्योंकि इनमें अष्टवर्ग का अत्यन्त न्यून गुण पाया जाता है। इसलिए अष्टवर्ग की जगह निम्नाङ्कित औषधियां देना उत्तम बतलाते हैं।
| जीवक | अभाव में | बहमन सफेद या गुडूची |
| ऋषभक | ” | बहमन लाल या लाखा सालब या वंशलोचन |
| मेदा | ” | तालमिश्री |
| महामेदा | ” | शकाकुल मिश्री या प्रसारिणी |
| काकोली | ” | काली मूसली |
| क्षीरकाकोली | ” | श्वेत मूसली |
| ऋद्धि | ” | चिड़िया कन्द या बला या ऊटकण के बीज |
| वृद्धि | ” | सालब पंजा या महाबला या बीजवंद |
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हरीतक्यादिवर्गः । | ६५
अथ यष्टीमधुनामगुणानाह यष्टीमधु तथा यष्टीमधुकं क्लीतकं तथा । अन्यत्स्थलीतनक्तं तत्तु भवेत्तोये मधूलिका ॥ १४५ ॥ यष्टी हिमा गुरुः स्वादुश्चक्षुष्या बलवर्णकृत् । सुस्निग्धा शुक्ला केश्या स्वर्या पित्तानिलास्त्रजित् । व्रणशोथविषच्छर्दि तृष्णाग्लानिक्षयापहा ॥ १४६ ॥
मुलहठी के नाम तथा गुण - यष्टीमधु, यष्टीमधुक और क्लीतनक ये सब मुलहठी के नाम हैं। और अन्य प्रकार की भी एक मुलहठी होती है जो कि जल में उत्पन्न होती है जिसका नाम 'मधूलिका' है। मुलहठी—शीतवीर्य, गुरु, मधुररसयुक्त, नेत्रों के लिये हितकर, बलकारक तथा वर्ण को सुन्दर करने वाली, सुस्निग्ध, वीर्यजनक, केशों के लिये हितकर, स्वर को सुधारने वाली, पित्त, वात तथा रक्त के प्रकोप को शमन करने वाली, व्रण, शोथ, विष, वमन, प्यास, ग्लानि तथा क्षय रोग को दूर करने वाली होती है ॥ १४५-१४६ ॥
४३ यष्टीमधु हि०- मुलहठी, मुलेटी, मुलेठी, मीठी लकड़ी, जेठीमध। ब०- यष्टिमधु । म०- जेष्ठिमध । गु०- जेठीमध । क०- जेष्ठमधु । ते०- यष्टिमधुकम । पं०- मुलेटी । मा०- मरुहठी । ता०- अतिमधुरं । फा०- आसरेहमहक, विखेमहक । अ०- असलुसूस । अं०- Liquorice Root (लिकोरिस् रूट) । ले०- Glycyrrhiza glabra, Linn. (ग्लिसृहाइझा ग्लैब्रा, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी ) ।
इसका क्षुप अरब, फारस की खाड़ी, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान एवं साइबेरिया आदि स्थानों में उत्पन्न होता है। इसकी उपज पंजाब तथा चेनाब से लेकर पेशावर आदि हिमालय के निचले हिस्से में तथा अंडमान द्वीप एवं बर्मा में होती है। बलूचिस्तान तथा चित्राल में भी यह उत्पन्न होता है। काश्मीर में बरमूला घाटी में इसको उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त हुई है।
इसका क्षुप २-४ फूट ऊँचा होता है। पत्रक- छोटे, ४ से ७ जोड़े, आयताकार से चौड़ाई लिये हुये भालाकार; अपरिमित सदण्डिक पुष्प व्यूह; पुष्प- बैंगनीवर्ण के, लगभग ३ इञ्च लम्बे; फली- छोटी, बारीक, ३-१ इञ्च लम्बी, चिपटी; बीज- बहुत या २-३ होते हैं। इसकी जड़ तथा भौमिक तने को सुखा कर छाल सहित अथवा छाल निकालकर बाजार में मुलेठी के नाम से बेचा जाता है। ये लम्बे टुकड़े, पीताभ बादामी रंग के झुर्रीदार होते हैं तथा छाल निकाले हुये हल्के पीले रंग के रेशेदार होते हैं। इनमें एक प्रकार की हल्की गन्ध तथा स्वाद मीठा होता है।
स्थान भेद से इसकी अन्य जातियां होती हैं जिनके स्वाद में अन्तर रहता है। यूनानी मत से ३ प्रकार की मुलेठी मानी गई है जिसमें से मिश्र की उत्तम, अरब की मध्यम तथा तुरुष्क वा फारस की अधम होती है जो उत्तरोत्तर कम मीठी होती हैं।
रासायनिक संगठन— इसमें एक सफेद, मीठा, रवेदार पदार्थ गिलसहाइझिन् (Glycyrrhi- zin) ५-१०% पाया जाता है जिसमें गिलसहाइझिक एसिड (Glycyrrhizic acid) से बने चूना तथा पोटेशियम् (Potassium) के लवण होते हैं। यह एसिड भी शुभ्र रवेदार होता है तथा इसका द्रवणांक २५° श० होता है। यह चीनी से ५० गुना अधिक मीठा होता है। गरम जल में गिलसहाइझिन् का बना घोल ठंडा होने पर गाढ़ा हो जाता है। इसके अतिरिक्त मुलेठी में ५-१०% शर्करा, ३०% स्टार्च, प्रभुजिन, स्नेह, राल एवं अंसपेराजिन् (Asparagin) करीब १% होता है।
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६४ भावप्रकाशनिघण्टुः गुण और प्रयोग—मुलेठी मधुर, शीतल, स्नेहन, बल्य, वृष्य, रसायन, कफशामक, स्वर्य, नेत्र्य, मूत्रजनन, स्तन्यवर्धक, शोथहर एवं व्रणरोपक गुणों से युक्त होती है । (१) इसमें स्नेहन तथा सौम्य कफ निःसारक गुण होने के कारण इसका मुख्य उपयोग स्वर- भंग, कास, श्वसनिका शोथ एवं गलशोथ आदि में किया जाता है। इसके लिये इसके टुकड़े को मुख में रख कर चूसने को दिया जाता है तथा तीसी के साथ इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। (२) मीठी होने के कारण काथों को मधुर बनाने के लिये तथा अनेक औषधियां जैसे सनाय, एलुवा आदि को सुस्वादु बनाने के लिये तथा खांसी के लिये चूसने की गोलियों में इसका उपयोग करते हैं। इसके चूर्ण का उपयोग गोली बनाने में सहायक द्रव्य के रूप में व्यवहार में आता है । (३) मूत्र मार्ग के प्रक्षोभ में यह बहुत उपयोगी है। इससे पेशाब की जलन दूर होती है। (४) अम्लपित्त में इसके उपयोग से आमाशयिक अम्ल कम होकर शूल दूर होता है। (५) चीन में इसका व्यवहार रसायन औषधि की दृष्टि से बहुत किया जाता रहा तथा अपने यहां भी इसे रसायन, बल्य तथा शुक्रल मानते हैं। (६) इसका सत्व रुब्बेसूस, जो काले रंग का तथा मीठा होता है, का व्यवहार खांसी एवं गले की तकलीफ आदि में चूसने के लिए किया जाता है । (७) सुश्रुत में 'सर्वापघातशमनीय' योग में इसका अन्तर्भाव किया गया है। इस प्रकार सभी प्रकार के अभिघातों से उत्पन्न लक्षणों में इसका प्रयोग उत्तम माना गया है। (८) इसका उपयोग क्षतक्षीण, रक्तवमन, हृद्रोग एवं अपस्मार आदि में भी किया जाता है। दूध अथवा घृत और मधु के साथ इसको देना चाहिये । (९) घृत के साथ इसके कल्क का प्रयोग घावों पर लगाने के लिये उपयोगी है। भिलावे से यदि त्वक्शोथ हो गया हो तो मुलेठी और तिल को दूध में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। मात्रा—चूर्ण—१-४ माशा ।
अथ काम्पिल्लस्य नामगुणानाह काम्पिल्लः कर्कशश्चन्द्रो रक्ताङ्गो रोचनोऽपि च ॥ काम्पिल्लः कफपित्तास्रकृमिगुल्मोदरव्रणान् । हन्ति रेची कटूष्णश्च मेहानाहविषाश्मनुत् ॥ कबीला के नाम तथा गुण—काम्पिल्ल, कर्कश, चन्द्र, रक्ताङ्ग और रोचन ये नाम कबीला के हैं। कबीला-कफ, रक्तपित्त, कृमि, गुल्म, उदररोग एवं व्रण (घाव) को दूर करता है। तथा यह रेचक (दस्तावर), कटु रस युक्त और उष्णवीर्य है। एवं प्रमेह, आनाह, विष तथा पथरी को नष्ट करने वाला होता है ।। १४७ ॥
४४ काम्पिल्ल ( कबीला ) हि०—कबीला, कमीला, काम्बीला । ब०—कमिला, कमलागुरी । म०—शेन्द्रि कपिला । गु०—कपीलो । क०—चसारे, चन्द्रहिदृदु । पं०—कमल । ते०—कुम्कुर । ता०—कपिला रंग, कपिला पोडि । मला०—पोनागम । फा०—कम्बिलाय, कमीलह, कम्बिला । अ०—कम्बील, किम्बील, वार्सा । आं०—Kamala (कमल) । ले०—Mallotus philippinensis, Muell-
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हरीतक्यादिवर्गः ६७ Arg. (मॅलोटस् फिलिपाइनेन्सिस, म्यूएल-आर्ग.) । Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी) । यह प्रायः सब गरम प्रान्तों में हिमालय पहाड़ के नीचे से पूरव की ओर सिन्ध से दक्षिण, बंगाल, ब्रह्मा, सिंगापूर, सिलोन एवं मलाया द्वीप समूह आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका सदा हरित वृक्ष-मध्यमाकार का २५-३० फीट तक ऊंचा होता है। छाल—चौथाई इंच मोटी, खाकी रंग की फटी सी और भीतर से लाल दिखाई पड़ती है। पत्ते—गूलर के पत्तों के समान ३ से ९ इंच तक लम्बे, अंडाकार, नोकदार, विषमवर्ती और निम्न पृष्ठ रोमश रक्ताभ होते हैं। कार्तिक से पूस तक फूल फल आते हैं और उष्णकाल में फल पकते हैं। फूल—छोटे छोटे भूरा- पन युक्त लाल रंग के आते हैं। फल—त्रिदल आकार में झरबेर के समान और पकने पर लाल रवेदार रज से ढका रहता है। इसी लाल रज को कबीला कहते हैं। बीज—चिकने, गोल और काले होते हैं। 'कबीला वायविडङ्ग की रज का नाम है' यह कहना भ्रमात्मक है। कबीला के बीजों को कहीं कहीं वायविडङ्ग की जगह व्यवहार में लाते हैं जो अनुचित है। वास्तव में वायविडङ्ग और कबीले के वृक्ष एक नहीं, दो भिन्न-भिन्न हैं। इस वृक्ष के फलों के ऊपर के पराग (ग्रन्थि तथा रोम) को कबीला कहते हैं। फल पक जाने पर उनको कपड़े में डालकर अथवा हाथ से रगड़ कर इसे अलग करते हैं। इस लाल बादामी रंग की बुकनी में न तो स्वाद होता है न गन्ध । इसमें से जो रोम, ग्रन्थि युक्त होते हैं उनका डण्ठलं एक कोशा का (प्रायः नहीं रहता) तथा ऊपर का भाग गोल ४०-१०० म्यू व्यास का एवं २०-५० अण्डाकार या व्यस्तलठ्वाकार कोषाओं से युक्त होता है। ये कोषाएं एक आधारीय कोशा के ऊपर चक्राकाररूप में एक रालीय निर्यास में डूबी हुई रहती हैं। बिना ग्रन्थि के रोम बहुत कम होते हैं जिनके अन्तिम भाग नुकीले तथा मुड़े हुये होते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें फलके छिलके एवं बालू के कण आदि पदार्थ मिले रहते हैं। परीक्षा—इसमें यदि निशास्ता या कुसुम्भ की मिलावट हो तो अणुवीक्षण यन्त्र से पहचान सकते हैं। लाल मिट्टी, बालू वा मण्डूर की मिलावट हो तो इसे जल में डालने पर मिट्टी आदि नीचे बैठ जाती है। ऊपर जो बुकनी तैरती है उसे सुखाकर काम में लाना चाहिये। जल से भींगी हुई उंगली से शुद्ध कबीले को उठाकर सफेद कागज पर जोर से लकीर खींचने या रगड़ने से पीले रंग का निशान होता है। शुद्ध कबीले में राख ९% से अधिक नहीं होनी चाहिये तथा अम्ल में न घुलनेवाली राख ६% से अधिक नहीं होनी चाहिये। ईथर में घुलने वाले सत्व जो उड़न- शील नहीं होते, उनकी शुष्क अवस्था में मात्रा ६६% से कम न होनी चाहिये। यह शीत जल में अघुलनशील, उष्णजल में अल्प घुलनशील एवं क्षार, मद्यसार और ईथर में घुलनशील होता है, जिससे लाल रंग का घोल बनता है। रासायनिक संगठन—इसमें रोटलेरिन् (Rottlerin, C31 H30 O8) नामक एक रवेदार पदार्थ से युक्त एक बदामी लाल रंग की राल होती है। यह ईथर में घुलनशील तथा जल में अघुलन शील होती है। इसके अतिरिक्त इसो-रोटलेरिन् (iso-Rottlerin) नामक पदार्थ रहता है जो शायद रोटलेरिन् का अशुद्ध स्वरूप है। इनके अतिरिक्त इसमें पीले रवेदार पदार्थ, पीली और लाल राल एवं मोम आदि रहते हैं। अल्प मात्रा में उड़नशील तैल, स्टार्च, शर्करा, टैनिन् एवं ऑक्सेलिक तथा साइट्रिक एसिड भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—कबीला कृमिघ्न, विरेचक, त्वग्दोषहर एवं व्रण रोपक है। स्फीत कृमि के लिये यह अच्छी औषधि है। अधिक मात्रा से हल्लास तथा बेहोशी आती है। चेष्टावह नाडी तथा
६८ भावप्रकाश निघण्टुः पेशियों पर इसकी अवसादक क्रिया होती है तथा अन्नवह प्रणाली के ऊपर इसका प्रक्षोभक प्रभाव पड़ता है। (१) कुछ लेखकों ने इसे सभी प्रकार के आंत्रस्थ कृमियों के लिये उपयोगी बतलाया है लेकिन इसका विशेष प्रभाव स्फीत कृमि (Tape worms) पर पड़ता है। मेलफर्न की अपेक्षा यह कम प्रभावशाली है लेकिन इससे वमन आदि नहीं होता और दुर्बल एवं बच्चों के लिये यह उसकी अपेक्षा अच्छी औषधि है। इसके लिये अतिरिक्त विरेचन की आवश्यकता नहीं होती न कोई पूर्व विरेचन की। २ से ८ माशा चूर्ण दूध, दही, मधु या सुगन्धित पेय के साथ खिला देते हैं । तीसरे या चौथे दस्त में कृमि निकल जाते हैं । यदि ४ घण्टे के बाद भी शौच न हो तो एरण्ड तैल देना चाहिये । इसका कृमिघ्न गुण संभवतः इसके अवसादक प्रभाव के कारण है। (२) इसका बाह्य प्रयोग तैल में मिलाकर दाद, खुजली, चकत्ते, व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में बहुत लाभदायी है। सिर के खालित्य में शतधौत घृत के साथ लगाने से लाभ होता है । (३) इस वृक्ष के पत्ते एवं मूल आदि का चर्म रोगों में अनेक प्रकार से प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-८ माशा। बच्चों को ५ २० मधु से, इससे अधिक एक साथ न दें, यदि गुण न हो तो दूसरे दिन पुनः दें। अथारग्वधस्य (धानवहेरा, अमलतास ) नामगुणानाह आरग्वधो राजवृक्षः शम्पाकश्चतुरङ्गुलः । आरेवतो व्याधिघातः कृतमालः सुवर्णकः ॥ १४८ ॥ कर्णिकारो दीर्घफलः स्वर्णार्ङ्गः स्वर्णभूषणः । आरग्वधोगुरुः स्वादुः शीतलः स्रंसनोत्तमः १ ॥ ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्त्तशूलनुत् । तत्फलं सं सरनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् ॥ ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ॥ १५० ॥ अमलतास (धनवहेरा) के नाम तथा गुण-आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, आरेवत, व्याधिघात, कृतमाल, सुवर्णक, कर्णिकार, दीर्घफल, स्वर्णाङ्ग और स्वर्णफल ये नाम अमलतास के हैं। अमलतास-गुरु, मधुर, शीतल और उत्तम रेचक है। यह ज्वर, हृद्रोग, रक्तपित्त, वायु, उदावर्त्त और शूल को दूर करता है। अमलतास का फल-मृदु रेचक, रुचिकारक, कुष्ठ, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। यह ज्वर में सदा हितकर होता है एवं कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध करने वाला होता है ॥ १४८-१५० ॥ ४५ आरग्वध ( अमलतास ) हि०-अमलतास, सोनहाली । ब०-सोन्दाली, सोनालु, बन्दर लाठी । म०-बाहवा । क०- कक्केमर । ते०-रेलचेट्टु । गु०-गरमालो । पं०-अमलतास, करङ्गल, कनियार । ता०-कोन्नेमरं, शरकोन्ने, कोरैकाय । फा०-ख्यारेचम्बर । अ०-ख्यारे शम्बर, ख्यारशम्बर । अं०-Pudding Pipe Tree (पुडिंग पाइप ट्री ) या Indian Laburnum (इण्डियन लैबर्नम् ), या Purging Cassia ( पर्जिंग केशियां ) । ले०-Cassia fistula, Linn. (केशिया फिस्टुला, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी ) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है । १. 'मृदु'रिति पा० । हरीतक्यादिवर्गः | ६६ इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है, किन्तु कहीं कहीं बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं। लकड़ी बहुत मजबूत होती है। १२ से १८ इञ्च तक की लम्बी लम्बी सींकों पर ४ से ८ जोड़े पत्ते लगते हैं जो १॥ से ३॥ इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार होते हैं । १०-२० इञ्च तक की लम्बी टहनियों पर सुनहले चमकीले पीले पीले रङ्ग के पांच पांच दल वाले फूलों के घनहरे लगते हैं, जो चैत के अन्त से ज्येष्ठ तक वृक्षों को सुशोभित करते हैं। जेठ में पतली पतली सलाई के समान हरी हरी फलियां निकल कर वर्षा के अन्त तक १-२ फीट लम्बी १ इञ्च तक मोटी हरी हरी फलियां लटकती दिखाई पड़ती हैं । फिर हेमन्त के अन्त से काला रूप धारण करके वसन्त में पक जाती हैं । फलियों के भीतर पुरानी चवन्नी बराबर गोल गोल पतले पतले काले रस से लिपटे हुए परत रहते हैं और परतों के बीच सिरस के बीज के समान बीज होते हैं। रासायनिक संगठन-अमलतास के गूदे में गोंद, पेक्टिन (Pectin), रंजक पदार्थ, शर्करा, अल्प मात्रा में एक मधुगंधि उड़नशील तैल तथा हाइड्रोक्सिमेथिल्-अन्थ्राँक्विनोन् ( Hydroxy- methyl-anthraquinones ) आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग- ( १ ) अमलतास की गूदी आनुलोमिक, दाहशामक एवं वेदना स्थापक है। यह मृदु विरेचनों में सर्वश्रेष्ठ है। इसका प्रयोग ज्वरावस्था में तथा सुकुमार, बाल, गर्भिणी एवं कोमल प्रकृति की नारियों में किया जाता है। मृदु विरेचन के लिये इसके स्वतंत्र प्रयोग की अपेक्षा सनाय के साथ बनाया हुआ अवलेह (Confectio senna) अधिक अच्छा है जिससे मरोड़, हल्लास, शूल, आध्मान आदि नहीं होते जो स्वतन्त्र प्रयोग में अधिक मात्रा में लेने से होते हैं। इससे बनी गुलकन्द का भी व्यवहार किया जाता है। रक्त की उष्णता बढ़ने पर अथवा मल संचय होकर वातरक्त एवं आमवात आदि रोग उत्पन्न होने पर विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। जिन्हें कब्जियत की शिकायत हमेशा रहती है उन्हें अल्प मात्रा में इसे वरावर सेवन कराया जाता है। अधिक दिन प्रयोग से मूत्र का रंग गहरे बादामी रंग का हो जाता है। ज्वर में अथवा मधुमेह में विरेचन की आवश्यकता हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं। कॉफी के सत्व में इसकी मिलावट की जाती है। इसका लेप आमवात, वातरक्त एवं प्रणशोथ आदि पर किया जाता है। ( २ ) इसके बीज वामक होते हैं तथा ५-७ बीजों का चूर्ण वमन के लिये दिया जाता है । ( ३ ) इसकी छाल के क्वाथ से कवल करने से गले की गांठों की सूजन कम होती है । ( ४ ) इसके पत्तों का रस अर्दित में पिलाया जाता है तथा जिस अंग का घात हुआ हो वहां इससे मला जाता है। दाद तथा भिलावें की सूजन पर इसके लगाने से लाभ होता है । ( ५ ) इसकी मूल तीव्र विरेचक एवं ज्वरहर होती है । मात्रा-गुदी ४-८ माशा । अथ कटुकाया नामगुणानाह कट्वी तु कटुका तिक्ता कृष्णभेदा कटम्भरा १ ॥ अशोका मत्स्यशकला चक्राङ्गी शकुलादनी ॥ मत्स्यपित्ता काण्डरुहा रोहिणी कटुरोहिणी ॥ १५१ ॥ १. 'कटुम्भरे'ति पा० ।
भावप्रकाश निघण्टुः कट्वी तु कटुका पाके तिक्ता रूक्षा हिमा लघुः । भेदिनी दीपनी हृद्या कफपित्तज्वरापहा । प्रमेहश्वासकासास्रदाहकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ॥ १५२ ॥ कुटकी के नाम तथा गुण-कट्वी, कटुका, तिक्ता, कृष्णभेदा, कटम्भरा, अशोका, मत्स्य- शकला, चक्राङ्गी, शकुलादनी, मत्स्यपित्ता, काण्डरुहा, रोहिणी और कङ्कटरोहिणी ये सब कुटकी के नाम हैं। कुटकी-तिक्त रसयुक्त, परिपाक में कडु रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, मलको भेदन करने वाली, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, कफ, पित्तज्वर, प्रमेह, श्वास, कास, रक्त दोष, दाह, कुष्ठ तथा कृमि का नाश करने वाली होती है ॥ १५१-१५२ ॥ ४६ कुटकी हि०-कुटकी, कडुकी, कटुका । ब०-कटकी । म०-केदारकडू, काली कुटकी । गु०-बालकडू कडू । ते०-कडुकरोणी । क०-कडुक रोहिणी, कडुकरोहिणी । सा०-कडुक्कु रोगणी । फा०-खर्वके- हिन्दी । अ०-सर्वके अस्वद, खानेखस्वेल्ल । अं०-Picrorhiza (पिक्रोहाइझा) । ले०-Picro- rhiza kurroa Royle ex Benth. (पिक्रोहाइझा कुर्रों) । Fam. Scrophulariaceae (स्क्रोपफुलरियासी) । यह हिमालय पहाड़ की ९०००-१५००० फीट ऊँची चोटियों पर काश्मीर से सिक्कम तक बहुत उत्पन्न होती है। इसका क्षुप रोमश होता है। इसका भौमिक तना बहुवर्षाणु, छोटी उँगली के समान मोटा एवं ६ से १०-१२ इञ्च तक लम्बा होता है। पत्ते २-४ इञ्च लम्बे, सुवाकार, जड़ की ओर संकुचित, आगे की ओर चौड़े, किञ्चित चिकने और कटे हुए झालरदार किनारे वाले होते हैं। क्षुप के बीच से एक डण्डी निकलती है जिसके अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फूल-नीले या सफेद रङ्ग के आते हैं। फली-चौथाई इञ्च की होती है। कुटकी इस क्षुप के मूल (भौमिकतने-Rhizome) को कहते हैं। यह १ से २ इञ्च लम्बे, कषिश लोहबान की तरह रंग वाले, खुरदरें एवं मुड़े हुए टुकड़े होते हैं। इन पर छोटी छोटी चक्रा- कार गांठें तथा गिरे हुए पत्तों एवं मूल के निशान रहते हैं। यह एक तरफ मोटी तथा दूसरी तरफ पतली होती है तथा इसमें एक प्रकार की हलकी गन्ध होती है। इसका स्वाद अत्यन्त कडुवा होता है। रासायनिक संगठन-इसमें पिक्र्र्रोहाइझिन् (Picrorhizin) नामक एक कडुवा रवेदार मधुमेय (Glycoside) २६.६% पाया जाता है, जिसका उदांशन (Hydrolysis) होने पर पिक्रोहीझेष्टिन् (Picrorhizetin) एवं एक प्रकार की मधु शर्करा (Dextrose) प्राप्त होती है। यह मधुमेय जल, मद्यसार, एसिटोन (Acetone) और एथिल अॅसिटेट (Ethyl acetate) में घुलनशील एवं क्लोरोफॉर्म (Chloroform), बेंझिन (Benzene) और ईथर (Ether) में अघुलनशील होता है। यह अत्यन्त जलग्राही (Hygroscopic) होता है। इसके अतिरिक्त इसमें मधुशर्करा, मोम एवं कॅथार्टिक् अॅसिड् (Cathartic acid) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। • गुण और प्रयोग-यह एक उत्तम कटुपौष्टिक, दीपक, पाचक, पित्तविरेचक और नियतकालिक ज्वरहर है। इसकी क्रिया आंत्र एवं यकृत पर होती है। यह अल्प मात्रा में संस्रन तथा अधिक मात्रा में विरेचक होती है। जेन्शियन की तरह तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका गुण इन्द्रायण के सदृश होता है। इसका उपयोग नियतकालिकज्वर, शीतज्वर, कामला, पांडु, यकृत् विकार, श्वास, कुपचन, हृद्रोग, संग्रहणी, आन्त्र की शिथिलता तथा बच्चों के कृमि विकारों में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः ७१ (१) पुनरावर्तित ज्वरों में इससे अच्छा लाभ होता है लेकिन इसको अधिक मात्रा में (३-४ माशा) देना पड़ता है। अविशिष्ट स्वरूप के सभी पुराण मन्द ज्वरों में, विशेषकर विबन्धयुक्त ज्वर में, इससे अच्छा लाभ होता है। इससे ज्वर जनित दाह की शान्ति होती है। (२) हृदय के ऊपर इसकी क्रिया डिजिटेलिस की तरह होती है। हृदय की अकार्य क्षमता जनित यकृत वृद्धि एवं उदरशोथ में इसको अधिक मात्रा में क्वाथ के रूप में देने से पतले दस्त होकर लाभ होता है तथा हृदय को बल प्राप्त होता है। (३) आरोग्यवर्धिनी गुटिका में इसकी आधी मात्रा रहती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० रत्ती । जीर्णज्वर में-३-४ माशा । प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-(क) कुटकी के ही नाम से जेन्शियाना कुर्रों (Gentiana kurroo, Royle; Fam. Gentianaceae) के मूल जिन्हें 'करु' कहा जाता है, बेचे जाते हैं। ये बाह्य स्वरूप में कुटकी के ही समान दिखलाई देते हैं, लेकिन दोनों की सूक्ष्म रचना में भेद होता है। इनके अनुप्रस्थ विच्छेद (Transverse section) में अन्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। जें० कुर्रों में रसारोहण नलिका (Vessel) के कोषावरणों की वृद्धि से उत्पन्न मोटाई, चक्राकार (Annular) या सीढ़ी के डण्डों की तरह मोटी रेखाकार (Scalariform) होती है, लेकिन कुटकी (P. kurroa) में यह मोटाई बिन्दुमयं (Pitted) होती है। कुटकी (P. kurroa) में मूल के मध्य भाग में रहने वाले कोष्ठ जिन्हें पिथकोष्ठ (Pith cells) कहा जाता है, वे बिन्दुमयं आवरण (Pitted walled) वाले होते हैं लेकिन ये कोष्ठ जे० कुर्रों में अनुपस्थित रहते हैं। गुण धर्म की दृष्टि से भारतीय जे० कुर्रों विदेशी जेन्शियाना का अच्छा प्रतिनिधि समझा जाता है। (ख) जे० कुर्रों के अतिरिक्त इसमें एक तीक्ष्ण औषधि ले०-Helleborus niger Linn. (हेलीबोरस् नाइगर) मिली हुई रहती है, जिसको पहचानना आवश्यक है। इसके टुकड़े १ से ३ इञ्च लंबे और ३ इञ्च से कम मोटे होते हैं। बाह्य पृष्ठ चिकना, टूटे हुये मूल के निशानों से युक्त एवं हल्के रंग का होता है। यह टुकड़े बहुत हल्के तथा दो अंगुलियों के बीच नख से दबाने पर दब जाने वाले होते हैं। ४६ (क) करु सं०-त्रायमाण ? हि०, बं०-करू, कुटकी । पं०-कमल फूल, नीलकंठ । बंबइ०-पाषाणभेद, जितीयाण । अं०-Indian Gentian (इण्डियन् जेन्शियन्) । ले०-Gentiana kurroo Royle (जेन्शियाना कुर्रों) । Fam. Gentianaceae (जेन्शियानेसी) । इसका क्षुप काश्मीर तथा हिमालय के उत्तरी पश्चिमी शिखरों पर ५०००-११००० फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। पत्र-मूलीय; कोषमय आधार वाले, ३-५ इञ्च लम्बे, रेखाकार (Linear); पुष्प-नीले सफेद दागों से युक्त; मूल-हलका, पीला, चौपहल; फली-लम्बी । चिकित्सा में इसके भौमिक तने तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। कुटकी तथा विदेशी 'जेन्शियन्' के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी अन्य जातियों का भी इसी प्रकार व्यवहार किया जाता है। इसके टुकड़े १ इञ्च लम्बे एवं इन पर चक्राकार धारियां होती हैं तथा ये ऐंठे हुए से प्रतीत होते हैं। अन्य पार्थक्य ऊपर लिखा गया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कडुवा पदार्थ तथा एक पारदर्शक राल के समान पीले रंग- का बिना स्वाद का पदार्थ २०% पाया जाता है जो क्षारीय घोल में नहीं घुलता । इसमें जेन्शिय
७२ भावप्रकाश निघण्टुः पिक्रिन (Gentiopicrin) नहीं होता जिसे विदेशी जेन्शियन् (G. lutea) का प्रभावकारी द्रव्य समझा जाता है। शायद यह इसके ताजे मूल से प्राप्त हो सकता है। गुण और प्रयोग— यह कडुवा तथा बल्य है। इससे आमाशयिक रसों की अभिवृद्धि होकर भूख बढ़ती है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह विरेचन कराती है। इसका स्वाद एवं गन्ध अच्छी होने के कारण अनेक बल्य एवं पाचक औषधियों के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें टैनिन न होने के कारण यह ग्राही भी नहीं होता है। ज्वर में इससे लाभ होता है। मात्रा— चूर्ण ५-१५ र०।
४६ (ख) खुरासानी कुटकी हि०— खुरासानी कुटकी। गु०— कडू। म०— कडू। अ०— लेरतिक। इरान— खेरवेकसीआ। अं०— Black hellebore (ब्लैक हेलीबोर), Christmas rose (क्रिस्टमस रोज)। लै०— Helle- borus niger Linn. (हेलीबोरस नाइगर)। Fam. Ranunculaceae) (रैनन्कुलेसी)। इस वनस्पति के मूल नेपाल, हिमालय और अरब से आते हैं। कुटकी में इसकी मिलावट रहती है। विशेष वर्णन कुटकी के साथ दिया गया है। रासायनिक संगठन— इसमें हेल्लेबोरिन् (Helleborin) तथा हेल्लेबोरेइन् (Hellebore- in) नामक पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— यह हृद्य, ज्वरहर, वेदनाहर, विरेचक, आर्तववृद्धिकर एवं कृमिघ्न है। अधिक मात्रा में यह विषैली औषधि है। इससे हृदयातिपात होकर मृत्यु हो सकती है। अधिक मात्रा से प्रथम वमन और विरेचन प्रारम्भ होता है, फिर नाडी की गति कम होते होते मृत्यु हो सकती है। (१) हृदय की अकार्यक्षमता के कारण उत्पन्न जलोदर में पुनर्नवा, अपामार्ग, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका काथ बहुत लाभकर होता है। हृदय पर इसकी क्रिया डिजिटैलिस के समान होती है। इससे हृदय को बल मिलता है एवं नाडी की गति मंद होकर नाडी बलवान् होती है और जलोदर दूर होता है। (२) वेदनायुक्त ज्वर जैसे फुफ्फुस पाक, तीव्र सन्धि शोथ एवं प्रसूतिज्वर आदि में इसके प्रयोग से लाभ होता है। इन रोगों में इसकी क्रिया वत्सनाभ के समान होती है। (३) इसके काथ से व्रण प्रक्षालन करने से व्रणपीडा दूर होती है। यह स्थानिक वेदना- हर भी है। मात्रा— चूर्ण ४-८ र०।
अथ किरातस्य (चिरायता) नामगुणानाह किराततिक्तः कैरातः कटुतिक्तः किरातकः ॥ १५३ ॥ काण्डतिक्तोऽनार्यतिक्तो भूनिम्बो रामसेनकः ॥ किरातकोऽन्यो नेपालः सोऽर्द्धतिक्तो ज्वरान्तकः ॥ १५४ ॥ किरातः सारको रूक्षः शीतलस्तिक्तको लघुः । सन्निपातज्वरश्वासकफपित्तास्रदाहन्नुत् । कासशोथतृषाकुष्ठज्वरव्रणकृमिप्रणुत् ॥ १५५ ॥
हरीतक्यादिवर्गः ७३ चिरायता के नाम तथा गुण— किराततिक्त, कैरात, कटुतिक्त, किरातक, काण्डतिक्त, अनार्यतिक्त भूनिम्ब और रामसेनक ये सब चिरायता के नाम हैं। नेपाल देश में एक प्रकार की चिरायता उत्पन्न होती है जो कि इसकी अपेक्षा आधा तिक्तरसयुक्त होती है। अत एव उसे 'अर्धतिक्त' कहते हैं। वह ज्वरनाशक होती है। चिरायता—सारक (दस्तावर), रूक्ष, शीतल, तिक्तरसयुक्त एवं लघु होती है एवं सन्निपातज्वर, श्वास, कफ, पित्त, रक्तदोष, दाह, कास, शोथ, प्यास, कुष्ठ, ज्वर, व्रण और कृमि इन सबों को दूर करती है ॥ १५३-१५५ ॥
४७ किरात (चिरायता) हि०— चिरायता, चिरेता, चिरैता, चिराइता । ब०— चिराता, चिरेता । म०— काडेचिराईत, चिराइता । गु०— करियातुं । क०— नेलबेवु । ते०— नीलवेमु । ता०— निलस्वेम्बु । फा०— नोनिहाद, मोनिहादन्दी । अ०— कसबुज्जैरीरा, कश्बुक्षझारिरा, कसबुलू रायरह । अं०— Chireta । चिरैटा )। लै०— Swertia Chirata ( Buch-Ham ) । (स्वशिया चिरांटा) Fam. Gentiana eae (जेन्शियानेसी)। चिरायता हिमालय पहाड़ के गरम प्रान्तों में काश्मीर से भूटान तक और खासिया के पहाड़ पर उत्पन्न होता है। प्रायः पृथ्वी के सब देशों में १८० प्रकार का चिरायता पाया जाता है, इनमें हमारे देश में ३७ प्रकार का होने का अनुभव किया गया है। जिस चिरायते को हम लोग व्यवहार में लाते हैं और जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है, वह हिमालय पहाड़ के लगभग ४ हजार से १० हजार फीट ऊँची चोटियों पर तथा खासिया के पहाड़ पर ४ हजार से ५ हजार फीट की ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसका वर्षायु क्षुप-दो फीट से ५ फीट तक ऊँचा होता है। कांड—नारंगी कालासा या जामुनी, मूल की तरफ गोल, मोटा, ऊपर बहुशाखा युक्त तथा चौपहल; पत्र—चौड़े भालाकार, ४ x १.५ इञ्च, चिकने, नोकदार, ३ से ७ शिराओं से युक्त, विपरीत; दलपत्र—हरित पीत, परंतु बैगनी रंग की छाया भी हो सकती है। प्रत्येक विच्छेद पर दो दो हरिताभ और रोमश ग्रन्थियाँ होती हैं। फूलने पर इसमें डोंडी लगती है जिनमें बहुत बारीक बीज निकलते हैं। पुष्पित होने पर सम्पूर्ण क्षुप को उखाड़ कर सुखाकर बेचते हैं जिसका औषधि में व्यवहार होता है। यह अत्यन्त कडवा होता है। रासायनिक संगठन— इसमें चिरातिन् (Chiratin, $C_{52} H_{96} O_{30}$) और ओफेलिक् एसिड ( Ophelic acid, $C_{26} H_{40} O_{20}$ ) नामक दो कडुवे द्रव्य १.४२-१.५२% रहते हैं। इनमें पहला हलके पीले रंग का पदार्थ है एवं दूसरा भी हल्के पीले बादामी रंग का, आर्द्र, चासनी की तरह पदार्थ होता है जो जल तथा मद्यसार में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें यवक्षार, चूना, राल एवं ओलिक् (Oleic), पामिटिक् (Palmitic) और स्टियरिक् अम्ल (Stearic acids) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— चिरायता दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ज्वरहर, दाहप्रशमन, पित्तविरेचक एवं कृमिघ्न है। जेन्शियन की तरह ही यह लाभदायक है। इसके प्रयोग से भूख बढ़ती है, पाखाना साफ होता है तथा पुराने ज्वर में लाभ होता है। इसका उपयोग स्वतन्त्र की अपेक्षा अन्य औष- धियों के साथ अधिक किया जाता है।
७४ भावप्रकाश निघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, विषमज्वर, दाह, अग्निमान्द्य, शैथिल्यप्रधान कुपचन, आध्मान, अम्लपित्त, यकृत विकार, कामला, पांडु, श्वास, शोथ, गण्डमाला तथा कृमिरोग एवं व्रण में किया जाता है। (१) पुराने ज्वर में जब अग्निमांद्य तथा शरीर में दाह रहता है तब इसके फांट या चूर्ण से लाभ होता है। सुदर्शन चूर्ण, जिसमें इसकी आधी मात्रा रहती है, बहुत व्यवहार में आता है। (२) रोग संनिवृत्तावस्था में पाचन सुधारने के लिए तथा अग्निवृद्धि के लिए बल्य औषधि के रूप में इसके फाण्ट का व्यवहार लौंग दालचीनी आदि सुगन्धि औषधियों के साथ किया जाता है। (३) हिचकी, गर्भिणीवमन एवं मद्यपान करने वालों में यदि वमन हो तो इसके चूर्ण या क्वाथ का प्रयोग मधु या शर्करा मिलाकर करते हैं। (४) वातरक्त में बल्य औषधि की तरह इसका प्रयोग किया जाता है। (५) उष्ण कटिबन्धज यकृत् विकारों में धनियां तथा चिरायते का क्वाथ मधु के साथ देने से लाभ होता है। (६) भूनिम्बादि चूर्ण जिसमें चिरायता, कुटकी, त्रिकटु, मुस्तक, इन्द्रयव, कुरैया की छाल एवं चित्रक आदि पदार्थ रहते हैं, उसका व्यवहार कुपचन, संग्रहणी, ज्वर तथा कृमिरोग में किया जाता है। (७) सुदर्शन चूर्ण तथा टङ्कण क्षार का दो तीन बार बाह्य प्रयोग करने से 'अजगल्लिका' (Impetigo contagiosa) नामक फुन्सियों में पारद मलहम की अपेक्षा अधिक लाभ होता है। (८) जीर्णज्वर में पांडु तथा कृशता होने पर किरातादि तैल से अभ्यङ्ग कराया जाता है। मात्रा-चूर्ण ४-१५ रत्ती। प्रतिनिधि-ये सभी जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं। (१) S. purpurascens Wall. (स्व० परव्यूरासेन्स्) - यह पश्चिमोत्तर हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से कुमाऊँ तक प्राप्त होता है। कांड छोटे; शाखायें फैली हुई; पत्र आयताकार वा भालाकार, १/२ x ७ इञ्च; दलपत्र हल्के सुखों लिये बैंगनी रंग के और उनके आधार पर एक कालाचक्र, विच्छेद बाहर की ओर मुड़े हुये और एक एक ग्रन्थि से युक्त होते हैं। (२) S. decussata Nimmo ex Grah. (स्व० डिकैसेटा) - म०-सिलाजित, महा- बलेश्वर-कडू, द०-कवि। इसका छोटा क्षुप दक्षिण के पश्चिमी भागों में होता है। कांड चौपहल; पुष्प श्वेत। इसके टुकड़े २ इञ्च लम्बे एवं हंस के पंख के इतने मोटे होते हैं। ये महाबलेश्वर में बिकते हैं। स्वाद अत्यन्त कडुवा। गुण करू (जै. कुर्रों) की तरह। (३) S. chinensis Franchet (स्व० चाइनेन्सिस) - जापानी चिरायता का क्षुप छोटा एवं ४-१४ इञ्च ऊँचा होता है। कांड बहुत बारीक। यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा अधिक कडुवा होता है। (४) S. paniculata Wall. (स्व० पॅनिक्युलॅटा) बं०-कड़वी। (५) S. perennis Linn. (स्व० पेरेन्निस) (६) S. corymbosa Wight (स्व० कोरिम्बोसा) (७) S. affinis Clarke (स्व० अफिनिस्) (८) Exacum bicolor Roxb. (एक्सकिक्म बाइकलर) - हि० बड़ा चिरायता।
हरीतक्यादिवर्गः ७५ इसका क्षुप दक्षिण में कोंकण में बरसात के दिनों में उत्पन्न होता है। पुष्प श्वेत और सुन्दर । दलपत्रों के अन्तिम हिस्से जरा नीले से रहते हैं। गुण-पौष्टिक, अग्निवर्धक एवं करू की तरह । (९) E. tetragonum Roxb. (ए. टेट्रागोनम्) - हि०-तितखन, म०- ऊदकिराईत । इसका वर्षांयु क्षुप उत्तर हिन्दुस्तान के पहाड़ी प्रदेश एवं हिमालय पर उत्पन्न होता है। यह एक हाथ ऊँचा, कांड चौपहल; पत्र-विपरीत, विनाल, शल्याकृति लेकिन कुछ चौड़े, एक अङ्गुल लम्बे और ५ शिरायुक्त; पुष्प नीले। गुण-दीपन एवं कडुवापौष्टिक । इसका प्रयोग जीर्णज्वर तथा कुपचन में किया जाता है। (१०) Erythraea roxburghii G. Don (एरित्रिआ रॉक्सबर्गाय) । ब०-गिर्मि । म०-लन्तक । इसका छोटा सा क्षुप कोंकण में बरसात के बाद उत्पन्न होता है। पुष्प सुन्दर, गुलाबी एवं सितारों के समान । स्वाद कडुवा । गुण-इसको कडुनाई भी कहते हैं तथा पौष्टिक कडुवी औषधि की तरह बङ्गाल में व्यवहार में आती है। कुपचन तथा ज्वर में इसका प्रयोग किया जाता है। (११) Enicostemma littorale Blume (एनिकोस्टेमा लिटोरेल) - हि०, म०-छोटा चिरायता, गु०-मामिज्वा; ते०-नेलगाल्लि । इसका छोटा क्षुप सभी जगह किन्तु समुद्र के किनारे तथा तर जमीन में अधिक होता है। यह बंगाल में नहीं होता। गुजरात तथा उत्तरी कोंकण में बहुत होता है। इसका क्षुप एक बित्ता ऊँचा एवं बहुत शाखायुक्त होता है। कांड सीधा, चौपहल एवं मूल से ऊपर तक पत्र युक्त। पत्र विपरीत, विनाल, शल्याकृति, सनाय वा इमली की तरह एवं ३ शिरायुक्त । पुष्प श्वेत, छोटे, विनाल, प्रत्येक कोण में २, ३ । फल गोल फली । स्वाद अत्यन्त कडुवा। इसके पञ्चांग का व्यवहार गुजरात तथा मद्रास में अधिक किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, आनुलोमिक एवं तिक्त पौष्टिक है। इसको रत्ती दो रत्ती मात्रा में कुपचन में देते हैं। व्यामिश्रण-इनमें से प्रथम दो जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं। (१) S. angustifolia Buch.-Ham. (स्व० ॲगस्टिफोलिया) - इसका कांड चौपहल एवं पंखयुक्त होता है। यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा कम कड़ु होता है एवं इसमें पिथ कोष (Pith cells) बहुत ही अल्प रहते हैं। (२) S. alata Royle ex D. Don (स्व० अॅलाट) - यह बिलकुल कडुवा नहीं होता। इसमें पिथ (Pith) पूर्ण संवर्धित रहता है। चिरायता इससे अधिक गहरे रंग का, स्वाद में अत्यन्त कडुवा और इसका पिथ (Pith) संतत (Continuous) रहता है। (३) Rubia cordifolia Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया) (Fam. - Rubiaceae-रूबि- एसी) - इसकी पहचान इसके बैंगनी (Purple) रंग से हो जाती है। (४) Andrographis paniculata Nees (Fam. Acanthaceae-अॅकेंथेन्सी) (अंड्रो- ग्राफिस् पॅनिक्युलेँटा) - हि० कालमेघ। इसके कांड हरे, अनेक सीधी, पतली विपरीत शाखाएं एवं पत्र भालाकार और हरे होते हैं जिससे इसका भेद किया जा सकता है। देशी चिरायता के नाम से यह बजार में बिकता है।
७६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथेन्द्रयवस्य नामगुणानाह उक्तं कुटजबीजं तु यवमिन्द्रयवं तथा । कलिङ्गं चापि कालिङ्गं तथा भद्रयवा अपि ॥ १५६ ॥ इन्द्रयव के नाम तथा गुण—कुटज (कुडा या कुरैया) के बीज को इन्द्रयव कहते हैं उसके नाम—कुटजबीज, यव, इन्द्रयव, कलिङ्ग, लिङ्गका और भद्रयव ये सब हैं ॥ १५६ ॥ ॐइति क्लीबेऽमरोप्याह ॥ १५६ ॥ 'अमरसिंहने 'अमरकोश' में इन्द्रयव को नपुंसकलिङ्ग कहा है ॥ १५६ ॥ क्वचिदिन्द्रस्य नामैव भवेत्तदभिधायकम् । फलानीन्द्रयवास्तस्य तथा भद्रयवा अपि ॥१५७॥ कहीं पर इन्द्र के जो नाम हैं वे ही इन्द्रयव के भी समझे जाते हैं और कुरैया के फल का इन्द्रयव तथा भद्रयव नाम है ॥ १५७ ॥ ॐइति धन्वन्तरिः प्राह ॥ १५७ ॥ यहां पर यह और समझना चाहिये कि यह वचन 'धन्वन्तरि' भगवान् का है, इससे इन्द्रयव का पुंल्लिङ्ग में भी प्रयोग होता है ॥ १५७ ॥ इन्द्रयवं त्रिदोषघ्नं संग्राहि कटु शीतलम् ॥ १५८ ॥ ज्वरातीसाररक्ताशविमवीसर्पकुष्ठनुत् । दीपनं गुदकीलाऽस्रवातास्रश्लेष्मशूलजित् ॥ १५९ ॥ इन्द्रजव त्रिदोषनाशक, संग्राही, कटु रस युक्त और शीतल है। यह ज्वर, अतीसार, खूनी बवासीर, वमन, वीसर्प एवं कुष्ठ को दूर करने वाला, अग्निदीपक एवं गुदकील, रक्तदोष, वातरक्त, कफ तथा शूल को दूर करता है ॥ १५८-१५९ ॥ ४८ इन्द्रयव हि०-इन्द्रजव, कड़वा इन्द्रजव । गु०-इन्दर जब, इन्द्र जब । म०-कुट्याचे बी । ले०- Holarrhena antidysenterica Wall. (हॉलेहीना एन्टिडिसेन्टेरिका) । Fam. Apocy- naceae (एपोसइनेसी) । कुड़ा वृक्ष की फलियों के बीज को 'इन्द्रजव' कहते हैं। यह देखने में जई के आकार का होता है। इन्द्रजव कड़वा और इन्द्रजव मीठा इन भेदों से यह दो प्रकार का होता है। मीठा या कम कड़वा इन्द्रजव, कुटज भेद, राइटिया टिन्क्टोरिया (Wrightia tinctoria R. Br.) के बीज को कहते हैं जो कम गुण वाला होता है। इनका शेष परिचय कुटज वृक्ष के प्रकरण में दिया जायगा। गुण और प्रयोग—यह कडुवा, दीपन, संग्राही, ज्वरहर, कृमिघ्न, वातानुलोमक, वृष्य, बल्य एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, ज्वरातिसार, शीतज्वर, रक्तार्श, संग्रहणी, प्रवाहिका, पथरी तथा श्वास एवं पुराने फुफ्फुस विकारों में किया जाता है। इसको भूनकर फांट, क्वाथ या चूर्ण के रूप में दिया जाता है। (१) बच्चों के रक्तातिसार में कड़वा इन्द्रजव एवं नागरमोथा के क्वाथ में मधु मिलाकर दिया जाता है। (२) रक्तार्श में सोंठ के साथ इसके क्वाथ को देने से लाभ होता है। इसको दूध के साथ क्वाथ करके देने से इसमें बहुत लाभ होता है।
हरीतक्यादिवर्गः । ७७ (३) कुपचन, उदरशूल एवं अग्निमान्द्य आदि के लिये इसके चूर्ण को अल्प मात्रा में नित्य लेने से लाभ होता है। वमन में इसको भूनकर या फांट या क्वाथ बनाकर देना चाहिये। (४) पुराने फुफ्फुस के विकार तथा दमा में इसका व्यवहार किया जाता है। (५) पाथयििकज्वर तथा शीतज्वर में इसको गुडूच के साथ क्वाथ बनाकर देना चाहिये। नित्य इन्द्रजव का चूर्ण खाते रहने से शीतज्वर नहीं आता। (६) पूयदन्त (Pyorrhoea) में मसूढ़ों पर इसके चूर्ण को मलने से रक्तस्त्राव कम होता है तथा पूय एवं दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—चूर्ण १-४ माशा भूनकर या ३-३ तो० क्वाथ बनाकर। मीठा इन्द्रयव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ मदनस्य ( मैनफल ) नामगुणानाह मदनश्छर्द्दनः पिण्डो नटः¹ पिण्डीतकस्तथा । करहाटो मरुबकः शल्यको विषपुष्पकः ॥ १६०॥ मदनो मधुरस्तिक्तो वीर्योष्णो लेखन्यो लघुः । वान्तिहृद्विद्रधिहरः प्रतिश्यायव्रणान्तकः ॥ रूक्षः कुष्ठकफानाहशोथगुल्मव्रणापहः ॥ १६१ ॥ मैनफल के नाम तथा गुण—मदन, छर्दन, पिण्ड, नट, पिण्डीतक, करहाट, मरुवक, शल्यक तथा विषपुष्पक ये सब मैनफल के नाम हैं। मैनफल—मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, लेखन, लघु, वमनकारक, विद्रधिरोग को दूर करने वाला, प्रतिश्याय (जुकाम) और व्रणका नाशक, रूक्ष एवं कुष्ठ, कफ, आनाह, शोथ, गुल्म तथा क्षत को दूर करने वाला होता है ॥ १६०-१६१ ॥ ४९ मदन (मैनफल ) हि०-मैनफल, मयनफल । ब०-मैनफल, मयना कांटार गाछ । म०-गेल, गेलफल । गु०- मींडोल, मींढळ । क०-मंगरर्कि । ते०-बसन्त कड़िमि चेट्टु, मण्डचेट्टु, मंगचेट्टु । सा०-मर- कलम्, पुगारै, । ने०-मैदल । फा०-झुझ-उल्-कुच् । अ०-जौजुल कौसल । अं०-Emetic Nut (एमेटिक नट्), Bushy Gardenia (बुशी गार्डैनिया) । ले०-Randia dumetorum Lam. (रैंडिया डयुमेटोरम् ) । Fam. Rubiaceae (रुबियेसी) । यह हिमालय के साधारण प्रदेश में जम्मू से पूरब की ओर सिक्कम तथा दक्षिण की ओर चट्टगांव, खासिया पहाड़, सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष—१-२॥ इञ्च लम्बे लम्बे मजबूत पत्र कोणीय कांटों से भरा हुआ छोटे कद का होता है। छाल-भूरे रङ्ग की, लकड़ी-सफेद या भूरे रङ्ग की होती है। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे ऊपर से लट्त्वाकार और नीचे की ओर क्रमशः पतले होकर पंखयुक्त पत्रनाल में परिवर्तित होते हैं और प्रायः दलबद्ध होकर रहते हैं। फूल-पांच पंखड़ों वाले किञ्चित् हरिताभ, सफेद और सुगन्धयुक्त होते हैं। फल-जङ्गली अञ्जीर, सुपारी या अखरोट के आकार के होते हैं और पकने पर पीले पड़ जाते हैं। बीज-दीहीदाने के समान होते हैं। इन्हीं फलों को मैनफल कहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में संपोनिन् (Saponin) तथा व्हॅलेरियानिक एसिड (Valerianic acid), मोम, राल एवं रंजक पदार्थ आदि पाये जाते हैं। १. 'राठः' इति पाठा० ।
७८ भावप्रकाशनिघण्टुः । गुण और प्रयोग— मैनफल बहुत अच्छा वमन द्रव्य माना गया है। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसके बीजों को एक विशेष प्रकार से संग्रह कर व्यवहार करने को लिखा है। नये ग्रन्थकार इसके बीज वा फल की छाल को वामक नहीं मानते लेकिन इसके गूदे (Pulp) को वामक मानते हैं। डा० देसाई प्राचीन मत से सहमत हैं। कुछ भी हो सम्पूर्ण फल वामक अवश्य है। कुछ विद्वान् इसको इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि बतलाते हैं। इसका उपयोग गर्भपात कराने के लिये किया जाता है तथा यह मछलियों के लिये विषैला है। (१) एक फल कूट कर २५ तो० जल में १ घंटा भिगोकर रखना चाहिये। फिर पत्थर के खरल में घोंटकर, कपड़े से छान कर, उसमें थोड़ा मधु तथा पीपर मिलाकर खाली पेट पिलाने से १ घण्टे बाद १-२ साफ वमन हो जाता हैं और कभी कभी बाद में विरेचन भी होता है। इस वामक प्रयोग को हृष्ट-पुष्ट मनुष्य में व्यवहार में लाना चाहिये। (२) इसके २-३ फलों के गूदे को कूट कर ½ पाव जल में १०-१५ मिनट मसल कर छानकर प्रयोग किया जाय तो प्रायः १० मिनट में हल्लास और वमन शुरू हो जाता है। इसको देने के बाद उष्ण जल पिलाने से और भी वमन होता है। या केवल १ फल का गूदा भी पर्याप्त हो सकता है। (३) इसके गूदे को सुखाकर रख सकते हैं तथा १ से ४ माशे तक वामक औषधि के रूप में या २-३-५ र० कफनिःसारक एवं स्वेदल औषधि के रूप में व्यवहार में ला सकते हैं। (४) मुलेठी मन्दार एवं मैनफल का चूर्ण २-७ र० देने से श्वास तथा खाँसी में लाभ होता हैं एवं अधिक मात्रा में (१०-३० र०) अजीर्ण, शूल, शिरःशूल और अण्डकोष शोथ में वमन कराने के लिये देते हैं। (५) अन्य सुगन्धि औषधियों के साथ रक्तातिसार, पर्यायिक ज्वर एवं शिरःशूल में इसके गूदे को देते हैं। अतिसार में १ से २ माशा गूदा दिया जाता है। यह इपीकाक का अच्छा प्रति- निधि है। (६) इसके गूदे का टिंक्चर १५-६० बूंद कुकास एवं पागलपन में तथा उद्वेष्टन निरोधि एवं शामक औषधि के रूप में व्यवहार में लाया जाता है। (७) इसका फलत्वक् एवं बीज विरेचक एवं कृमिघ्न हैं एवं बच्चों में पित्तमयता तथा कृमि दूर करने के लिये व्यवहार में आता है। (८) इसके वृक्ष की छाल का बाह्य लेप शोथहर एवं वेदनाहर है एवं आमवात, फोड़े तथा चोट एवं हड्डियों की पीड़ा पर लगाया जाता है। अतिसार, संग्रहणी, ज्वर तथा आमवात में इस वृक्ष की छाल का आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। कांजी के साथ इसके फल को पीस कर नाभि के चारों तरफ लगाने से उदरशूल दूर होता है। मुखदूषिका (acne) एवं फोड़े आदि में इसके फल के लेप से लाभ होता है। (९) बच्चों में दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर इसके गूदे के चूर्ण को तालू तथा मसूड़ों पर रगड़ते हैं। (१०) वन्ध्यत्व दूर करने के लिये ६ माशा इसके बीज के चूर्ण को दूध, शक्कर वा केशर के साथ खिलाना चाहिये तथा ८, १० रत्ती चूर्ण की गुड़ के साथ बत्ती बनाकर योनि में धारण करानी चाहिये। इस प्रयोग से गर्भाशय शोथ आदि विकार दूर होकर कष्टार्तव एवं अनियमितात्तंव आदि में भी लाभ होता है।
हरीतक्यादिवर्गः । ७९ (११) सर्पविष में यह औषधि लाभदायक है। इसके मूल को बैल के मूत्र में पीसकर अंजन कराया जाता हैं तथा शुष्क मज्जा का आन्तरिक प्रयोग (५-१५ र०) करते हैं। मात्रा— वामक-१ फल का हिम। गूदे का चूर्ण १-४ माशा। अन्य गुणों के लिये २-४ रत्ती।
अथ रास्नाया नामगुणानाह
रास्ना युक्तरसा रस्र्या सुवहा रसना रसा। एलापर्णी च सुरसा सुगन्धा श्रेयसी तथा ॥१६२॥ रास्नाऽऽमपाचिनी तिक्ता गुरुष्णा कफवातजित् ॥ १६३ ॥ शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा। कासज्वरविषाशीतिवातिकामयसिद्धहृत् ॥ १६४ ॥ रास्ना के नाम तथा गुण— रास्ना, युक्तरसा, रस्र्या सुवहा, रसना, रसा, एलापर्णी, सुरसा, सुगन्धा तथा श्रेयसी ये सब रास्ना के नाम हैं। रास्ना— आम को पचाने वाली, तिक्तरस युक्त, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वात नाशक है तथा शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, ज्वर, विष, अस्सी (८०) प्रकार के वात रोग तथा सिध्म इन सब को दूर करती है ॥१६३-१६४॥
५० रास्ना
आज कल वैद्य समाज में रास्ना एक अप्राप्तव्य औषधि मानी जा रही है। वात विकारों के लिये आयुर्वेद में इसका प्रयोग रास्नादि, महारास्नादि क्वाथ के रूप में बहुत किया जाता है। भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न औषधि रास्ना नाम से ली जाती है। प्राचीन ग्रन्थों में इसके परिचय में निम्न श्लोक प्राप्त होते हैं। रास्ना तु त्रिविधा प्रोक्ता मूले पत्रं तृणं तथा। द्वयो मूलदलौ श्रेष्ठौ तृणरास्ना तु मध्यमा ॥ (रा. नि.) अथ रास्ना भृङ्गपत्रा पाषाणादौ प्रजायते। गिरौ च लघु-रास्ना स्यात् ततो हीनगुणा स्मृता ॥ सुगन्धमूला, एलापर्णी ॥ (शिवदत्तः) नीचे रास्ना नाम से ली जाने वाली विभिन्न वनस्पतियों का वर्णन अलग २ किया गया है। (१) Pluchea lanceolata Oliver & Hiern (प्लूचिया लैन्सिओलेटा)। Fam-Compo- sitae (काम्पोज़िटी)। हि०- रायसन, रोशना, वायसुरई। पं०- रासनं। सिन्ध०- कौरसन। रा० पु०- छोटा कलिया। अलीगढ़- वनतेरई, वनसोरई, वायसुरई। आगरा- छोटी कलिया। कानपुर- सुरई, सोरहि। बिहार- रोशना, रचना, रोचना। यह अपर बंगाल, बिहार, अवध, कानपुर और पश्चिम की ओर पञ्जाब तथा सिन्ध तक पाई जाती है। पत्तों का आकार रास्ता अर्थात् जिह्वा के सदृश होने से इस का नाम रास्ना रखा गया है। इसी के आधार पर उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश आदि जगहों के अधिकांश वैद्य वाय- सुरई को ही 'रास्ना' मानते हैं। बिहार के ग्रामीण इसको 'रचना' और 'रोचना' के नाम से पुकारते हैं। मालूम होता है कि—रचना शब्द रसना का अपभ्रंश है। बिहार के अधिकांश वैद्य भी इसको उपयोग में लाते हैं। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी इसी को उपयोग में लाने की सलाह देते हैं।
८२ भावप्रकाशनिघण्टुः ।
इसका क्षुप १-२ फीट ऊँचा, अनेक शाखा प्रशाखा करके झाड़दार तथा उन पर असंख्य बारीक भूरे रङ्ग के रोवें होते हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे सनाय के पत्तों के आकार वाले किन्तु उससे बड़े होते हैं तथा सूखने पर पीलापन लिये भूरे रङ्ग के हो जाते हैं। पर्णवृन्त छोटा एवं ऐंठा हुआ होता है। पतली पतली शाखाओं के अन्त में नन्हे नन्हे बैंगनी रङ्ग के फूलों की घुण्डियां लगती हैं । गुण और प्रयोग—इसके पत्र सनाय की तरह भेदन हैं तथा सनाय के स्थान पर प्रयोग में आते हैं। (२) Inula racemosa Hook. f. (इनुला रेसिमोसा)। Fam. Compositae (कॉम्पो- झिटी)। फा०-रासन, कुष्ठ-इ-शामी । अ०-जंजबीलशमी । ईरान०-पिल् गुश् शर्ष। कश्मीर- पोष्कर । डा० देसाई अन्य शास्त्रज्ञों के साथ सहमत होते हुए रास्ना के स्थान पर इसी क्षुप के मूल को व्यवहार करने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके गुण रास्ना से मिलते जुलते हैं। कुछ अन्य विद्वान् इनुला को पुष्करमूल मानते हैं । स्थान भेद से इसके क्षुप की ३, ४ जातियां पाई जाती हैं । यह काश्मीर तथा उत्तर-पश्चिम हिमालय में होती हैं। भारत में जहां जहां सुगन्ध कूठ होता है वहां वहां यह उत्पन्न होने से तथा उसके समान दिखलाई देने से कूठ में इसकी मिलावट की जाती है। रासन का क्षुप ५ फीट तक ऊंचा एवं दृढ होता है। पत्र-चर्मवत्, ऊपर से खुरदरे एवं नीचे से घनर्रोमश तथा दन्तुर होते हैं। आधारीय पत्र ८-१८ इञ्च x ५-८ इञ्च बड़े, दीर्घ वृत्ताकार-भालाकार एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । काण्डपत्र अंडाकार-आयताकार, अर्धकाण्डांसक्त एवं प्रायः आधार पर गहराईतक खंडित होते हैं । पुष्प-पीत वर्ण के १.५-२ इञ्च व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे, महीन एवं अग्र पर रकाब रोमयुक्त होते हैं। इसकी ताजी जड़ में ओरिसू एवं कर्पूर जैसी तीव्र गंध होती है जो रखने पर कम हो जाती है । रासायनिक संगठन—रासन में अल्प मात्रा में उड़नशील तैल और इनुलिन् (Inulin) होता है। तैल में एलेन्ट्रोलैक्टोन (Alantolactone, C15 H20 O2) नामक एक कृमिनाशक, कफनिःसारक एवं मूत्रल द्रव्य होता है । गुण और प्रयोग—यह पाचन, वातहर, कफहर, श्वासहर एवं गर्भाशय संकोचक है। इसका क्वाथ आधमान, उदरशूल, कुपचन, अनार्तव, कष्टार्तव, फुफ्फुस विकार जैसे दमा, जीर्ण श्वसनिका शोथ, क्षय, फुफ्फुसावरण शोथ एवं आमवात तथा अन्य वातिक रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर तथा सूजन कम होती है तथा वेदना दूर होती है । कण्डू आदि त्वचा के रोगों में इसके काथ को शरीर पर लगाया जाता है। मूल को गोमूत्र में रगड़ कर खुजली, दाद एवं पामा आदि पर लगाया जाता है। राजयक्ष्मा के जन्तुओं से उत्पन्न त्वचा के व्रणों में इससे लाभ होता है। जन्तुओं के विष को दूर करने के लिये इसका उपयोग करते हैं तथा इससे वेदना कम होती है। प्रतिनिधि-कूठ । (३) Vanda roxburghii R. Br. (वैण्डा रॉक्सबर्गाइ)। Fam. Orchidaceae (ओरचिडेसी)। बांदा, वंगीय रास्ना। बं०-रास्ना । संताल-दरेवंकि । क०-मरबाले । ते०- कनपचेट्टू, बदनिके, नेरदानचेट्टू ।
हरीतक्यादिवर्गः ८३
यह बंगाल, बिहार, गुजरात तथा कोंकण से त्रावनकोर तक प्राप्त होते हैं। इसके पौधे प्रायः आम और मधूक वृक्षों की डालियों पर उगे हुए पाये जाते हैं। काण्ड १-२ फीट लम्बा तथा उसकी ग्रन्थियों से अनेक मोटे और मांसल वातलम्बी (Epiphytic = एपिफाइटिक् ) मूल निकले रहते हैं। पत्तियां-६-८ इञ्च लंबी, मध्य पर्शुका पर गहरी और दो कतारों में निकली हुई रहती हैं। सदण्डिक पुष्पमंजरियां पत्तियों से लम्बी होती हैं। पुष्प व्यास में १/२-२ इञ्च और पंखड़ियां प्रायः मिश्रित वर्ण की होती हैं। वे अधिकतर पीताभ और कभी कभी नीलाभ होती हैं और उनके कुछ भागों में बदामी, बैंगनी तथा सफेद रंग भी होते हैं। फल--३-३/२ इञ्च लम्बा और सन्धियों पर रीढदार होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। बंगाल के अधिकांश कविराज इसी को उपयोग में लाते हैं। वे प्रायः वाटिकाओं में आम के वृक्षों की मोटी टहनियों के ऊपर की खरदरी छाल को पृथक् कर उस पर उक्त रासन को शोरियां युक्त बिठा रस्सी से बांध कुछ मिट्टी का अंश दे पानी से कुछ रोज सींचा करते हैं। गुण और प्रयोग-आमवातादि में इससे कुछ लाभ होता है। ज्वर में सर्वाङ्ग पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। कर्णस्राव में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं। अनेक वात- विकारों तथा आमवातादि में बाह्य प्रयोग के लिये इससे बने तेल का उपयोग किया जाता है। यह फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा वृश्चिक दंश पर लाभदायक है। (४) Saccolabium papillosum Lindl. (सँक्कोलेबिअम् पॅपिल्लोसम्)। Fam Orchi- daceae (ऑरचिडेसी)। क०-मरबाले । म०-कानभेर । इसके बांदे भी आम्रवृक्ष के ऊपर होने वाले बूंदों की तरह दिखलाई देते हैं । गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक है तथा इसका आमवातादि में प्रयोग होता है। केले के पत्तों में इसके पत्ते लपेटकर पुटपाक करके उसके रस को मधु के साथ कर्णपिटिका के लिये कान में डालते हैं जिससे कर्णपीड़ा दूर होती है। (५) Tylophora asthmatica W. & A. (टाइलोफोरा एस्थमेटिका) । Fam. Asclepi- adaceae एस्क्लेपिण्डेसी )। हि०-अंतमूल, जंगली पिकंवन । ब०-अन्तोमूल । म०-पितकारी, खडकी रास्ना । ता०- नायपाले । ते०-वेरिपल । मळ०-वल्लीपाल । क०-किरूमंजी । उडि०-मैंडी । सं०-मूलिनी, मूल- रास्ना, पित्तवल्ली, आन्त्रपाचक । इसकी लता उत्तरी बंगाल, आसाम, कछार, उड़ीसा, कोंकण, दक्षिणी भारत, कनारा, मद्रास प्रान्त एवं पूर्व पाकिस्तान, बर्मा, मलाक्का द्वीप तथा लंका आदि स्थानों पर पायी जाती है। यह रेतीली भूमि पर अधिक होती है ! बंबई के बाजार में रास्ना के नाम से इसके मूल भी बिकते हैं। इसकी बहुवर्षायु लता होती है। पत्र-२ से ५ इञ्च लम्बे, १ से २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, तीक्ष्णाग्र वा लम्बाग्र, आधार पर तांबूलाकार, अखण्ड, सनाल, ऊपरी पृष्ठ चिकना, अधो- पृष्ठ रोमश भूरे रंग का, ताजी अवस्था में स्वाद एवं गंध ह्यल्लासकर एवं सूखने पर गन्धहीन एवं रुचिहीन । पुष्प-बहुत, छोटे, हलके पीले रंग के, अन्दर से बैंगनी एवं गुच्छों में । फल-(Follicle) -२ से ४ इञ्च लंबा अग्र की तरफ नुकीला होता जाता है। मूल-बहुत लम्बे, मांसल, अनेक, बारीक, हलके पीले या मटमैले तन्तुयुक्त, अन्दर से हलके पीले रंग के, आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन, स्वाद प्रारंभ में मीठा लेकिन बाद में कडु । इसकी लता ईश्वरमूल की तरह दिखलाई देती है लेकिन उसके पत्र के दोनों पृष्ठ हरे और चिकने तथा पुष्प बड़े होते हैं। इसके मूल तथा पत्र का व्यवहार किया जाता है जिनमें पत्र अधिक गुणकारी है। ६ भा० नि०
रासायनिक संगठन--इसमें टाइलोफोराइन (Tylophorine, C24 H27 O4 N), टाइलो- फोरिनाइन् (Tylophorinine, C23 H27 O4 N, 0.5 H2 O), ये दो रवेदार क्षाराम, एक उडनशील तैल ०.२६%, एक रंगहीन रवेदार अन्य पदार्थ ०.१८%, खनिज (Mineral matter) १५% तथा एक वामक द्रव्य आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग--इसके मूल तथा पत्र अच्छे वामक, कफनिःसारक, स्वेदल, रक्तशोधक, आनुलोमिक एवं आमपाचक हैं। यह एपीकैक के अच्छे प्रतिनिधि हैं। अल्प मात्रा में इससे खांसी दमा, बच्चों की कुक्कुर खांसी, अतिसार एवं संग्रहणी आदि में बहुत लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह वामक तथा अधिक बार प्रयोग से वमन के साथ विरेचन भी होता है। (१) यह १ मा० की मात्रा में चूर्ण के रूप में अतिसार, रक्तातिसार एवं संग्रहणी आदि में देने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ सोंठ, गोंद या अल्प मात्रा में अफ़ीम मिलाई जा सकती है। (२) कफ विकारों में इसके चूर्ण को घोडवच एवं मुलेठी आदि के साथ देने से लाभ होता है। (३) प्रसूति के बाद स्रावशुद्धि के लिए इसका उपयोग करते हैं। (४) अजीर्ण आदि में वमन कराने के लिये ४ इञ्च लंबी ताजी जड़ की छाल जल में घिस कर देने से वमन होता है या १-२ माशा पत्र चूर्ण जल के साथ दिया जाता है। (५) इसको रसायन तथा रक्तशोधक मानते हैं एवं आमवात, फिरंगज आमवाताभ विकृति, सन्निपात, शरीरपीड़ा एवं सर्पदंश आदि में इसका उपयोग करते हैं। (६) वातरक्त में इसके मूल का बाह्यलेप किया जाता है। मात्रा-३-१० र०; वामक १-२ मा०। इन उपर्युक्त वनस्पतियों के अतिरिक्त मद्रास की तरफ कुलिञ्जन का व्यवहार रास्ना के नाम से कुछ लोग करते हैं तथा धवलबरुआ और सर्पाक्षी-ले० ओफिओराइज्झा मुन्गोस् (Ophiorr- hiza mungos Linn.) एवं अन्य अनेक औषधियां भी रास्ना नाम से ली जाती हैं। इनमें से प्रथम ३ औषधियां अधिक प्रचलित हैं। नोटः-सर्पाक्षी का वर्णन गुडूच्यादि वर्ग तथा धवलबरुआ का वर्णन नाकुली में किया गया है।
अथ (रास्नाभेदः) नाकुली नामगुणानाह नाकुली सुरसा नागसुगन्धा गन्धनाकुली । नकुलेष्टा भुजङ्गाक्षी सर्पाक्षी विषनाशिनी ॥ नाकुली तुवरा तिक्ता कटूकोष्णा विनाशयेत् । भोगिलूतावृश्चिकाखुविषज्वरकृमिव्रणान् ॥ नाकुलीकन्द के नाम तथा गुण-नाकुली, सुरसा, नागसुगन्धा, गन्धनाकुली, नकुलेष्टा, भुजङ्गाक्षी, सर्पाक्षी तथा विषनाशिनी ये सब नाम 'नाकुलीकन्द' के हैं। नाकुलीकन्द-कषाय, तिक्त एवं कटरसयुक्त तथा उष्णवीर्य होता है। और सर्प, मकड़ी, बिच्छू तथा मूसा इन सबों के विषको दूर करने वाला एवं ज्वर, कृमि तथा व्रण को भी नष्ट करने वाला होता है ॥ १६५-१६६ ॥
५१ नाकुली (धवलबरुआ, सर्पगन्धा) हि०-नकुलकन्द, नाकुलीकन्द, नाई, हरकाई चन्द्रा, रास्नाभेद, छोटाचांद । उड़ीसा, बिहार- धनेंदना, धनबरुआ, धवलबरुआ, सनोचांडो । बं०-नाकुली, गन्धरास्ना, चन्द्र । म०-अडकई, चन्द्र । ०-नोलवेल, अमेलपोदी । क०-सूत्रनाभि । ते०-पातालभगंधि । मा०-हरकय । मलयां०-चुवन्ना अविलपोरी । फा०-छोटाचान्दा । ले०-Rauwolfia serpentina Benth. ex Kurz- (रॉवोल्फिया सर्पेन्टाइना) । Fam. Apocynaceae (एपोसइनेसी) । वैद्य समाज में नकुलकन्द भी एक सन्दिग्ध वनौषधि है। कुछ लोगों ने नाकुली को ले०-एरिस्टोलोकिया इण्डिका (Aristolochia indica Linn.), ईश्वरमूल लिखा है तथा श्री ठा० बलवन्त सिंह जी भी उनसे सहमत होते हुए सर्पगन्धा नाम भी उसी के (नाकुली) लिये तथा धवलबरुआ के लिए राजनिघण्टु का जम्बू नाम उचित समझते हैं जिसको श्री भगीरथ स्वामी ने माना है। प्राचीन ग्रंथों में केवल सुश्रुत के अमानुषोपसर्गाध्याय में मानसरोगहर अपराजितगण में सर्पगन्धा नाम का उल्लेख मिलता है। यहां पर पहले वर्णन 'रावोल्फिया' का दिया जा रहा है जिसके बाद ईश्वरमूल का स्वतंत्र वर्णन दिया जावेगा । धवलबरुआ के क्षुप हिमालय के निचले प्रदेशों में सरहिन्द से लेकर पूर्व में आसाम तक विशेष कर देहरादून, सिवालिक पहाड़ी भाग तथा रोहिलखण्ड, उत्तरी अवध और गोरखपुर के हिमालय के निचले भाग में ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं कोंकण, उत्तरी कनारा, दक्षिणी महाराष्ट्र प्रान्त, मद्रास के पूर्वी तथा पश्चिमी घाट में ३००० फीट तक और बिहार के अनेक भाग में जैसे पटना, भागलपुर तथा उत्तरी एवं मध्य बंगाल, बर्मा, श्याम और जावा आदि स्थानों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप छोटा, आकर्षक, १ से २ फीट ऊँचा क्वचित् ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्र-हरे, चमकीले, ३-७ इंच लम्बे, १॥-२॥ इंच चौड़े, भालाकार या व्यस्तभालाकार, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र, आधार की ओर पतले होकर ३ क्षुद्र पत्रनाल से युक्त एवं टहनी के प्रत्येक गांठ पर ३-४ के चक्री में (Whorled)। पुष्प-श्वेत या साधारण गुलाबी गुच्छों में, २-४ इञ्च लम्बे पुष्प दण्डों पर । फल-छोटे, मांसल एक या दो दो जुड़े हुये पकने पर बैगनी काले । मूल-सर्प की तरह टेढ़ा मेढ़ा, करीब १५ इञ्च तक लम्बा, ।।३ इ० मोटा, खुरदरा, कुछ कुछ झुर्रियों से युक्त, शाखाओं से युक्त और उस पर लम्बाई में धारियां रहती हैं। इसे तोड़ने पर भग्न छोटा एवं अनियमित । मूल की छाल धूसरित पीत (Greyish yellow) तथा अन्दर का काष्ठ श्वेत। स्वाद में अत्यन्त कडवा तथा गन्धहीन । इसके मूल को तोड़कर कटे भाग पर २ भाग शोरे का तेजाब (Nitric acid) और १ भाग जल मिले घोल के २ बूंद डालने से मेड्युलरी रेज् (Medullary rays) विशेष कर अन्तःचर्म (Cortex) के पास वाले भाग रंगीन हो जाते हैं। इस क्षुप के ३, ४ साल पुराने पौधे के मूल को शरदकाल में संग्रह कर छाल सहित सुखाकर व्यवहार में लाया जाता है। रासायनिक संगठन-बिहार में उत्पन्न मूल में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा ०-८-१-३% रहती है जिसमें अजमेलाइन (Ajmaline, C20H26O2N2, 3 H2O), अजर्मेलीनाइन् (Ajmaline, C20H26O3N2, 1.5 H2O), अजर्मेलीसाइन (Ajmalicine) तथा पीत वर्ण के क्षाराम सर्पेन्टाइन् (Serpentine, C20H20O3N2, 1.5 H2O), सर्पेन्टिनाइन् (Serpentinine, C20H20O2N2, 1.5 H2O) तथा बिना रवेदार (Amorphous) क्षार (Bases) रहते हैं। देहरादून से प्राप्त जड़ में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा १-१-३% तक रहती है लेकिन उसमें पीत वर्ण के क्षाराम नहीं रहते तथा इसमें अजर्मेलाइन् और अजर्मेलीनाइन् के समसंगठन (Isomeric) वाले दो क्षार द्रव्य रहते हैं। इनके अतिरिक्त उभयविध प्रतिक्रिया (Amphoteric character) वाले कुछ दूसरे भी क्षाराम होते हैं। इन क्षारामों के अतिरिक्त इसके मूल में एक तैलीय राल (Oleoresin) और सरपोस्टेरॉल (Serposterol, C30 H48O2) रहता है।