भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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८२ भावप्रकाशनिघण्टुः ।

इसका क्षुप १-२ फीट ऊँचा, अनेक शाखा प्रशाखा करके झाड़दार तथा उन पर असंख्य बारीक भूरे रङ्ग के रोवें होते हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे सनाय के पत्तों के आकार वाले किन्तु उससे बड़े होते हैं तथा सूखने पर पीलापन लिये भूरे रङ्ग के हो जाते हैं। पर्णवृन्त छोटा एवं ऐंठा हुआ होता है। पतली पतली शाखाओं के अन्त में नन्हे नन्हे बैंगनी रङ्ग के फूलों की घुण्डियां लगती हैं । गुण और प्रयोग—इसके पत्र सनाय की तरह भेदन हैं तथा सनाय के स्थान पर प्रयोग में आते हैं। (२) Inula racemosa Hook. f. (इनुला रेसिमोसा)। Fam. Compositae (कॉम्पो- झिटी)। फा०-रासन, कुष्ठ-इ-शामी । अ०-जंजबीलशमी । ईरान०-पिल् गुश् शर्ष। कश्मीर- पोष्कर । डा० देसाई अन्य शास्त्रज्ञों के साथ सहमत होते हुए रास्ना के स्थान पर इसी क्षुप के मूल को व्यवहार करने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके गुण रास्ना से मिलते जुलते हैं। कुछ अन्य विद्वान् इनुला को पुष्करमूल मानते हैं । स्थान भेद से इसके क्षुप की ३, ४ जातियां पाई जाती हैं । यह काश्मीर तथा उत्तर-पश्चिम हिमालय में होती हैं। भारत में जहां जहां सुगन्ध कूठ होता है वहां वहां यह उत्पन्न होने से तथा उसके समान दिखलाई देने से कूठ में इसकी मिलावट की जाती है। रासन का क्षुप ५ फीट तक ऊंचा एवं दृढ होता है। पत्र-चर्मवत्, ऊपर से खुरदरे एवं नीचे से घनर्रोमश तथा दन्तुर होते हैं। आधारीय पत्र ८-१८ इञ्च x ५-८ इञ्च बड़े, दीर्घ वृत्ताकार-भालाकार एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । काण्डपत्र अंडाकार-आयताकार, अर्धकाण्डांसक्त एवं प्रायः आधार पर गहराईतक खंडित होते हैं । पुष्प-पीत वर्ण के १.५-२ इञ्च व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे, महीन एवं अग्र पर रकाब रोमयुक्त होते हैं। इसकी ताजी जड़ में ओरिसू एवं कर्पूर जैसी तीव्र गंध होती है जो रखने पर कम हो जाती है । रासायनिक संगठन—रासन में अल्प मात्रा में उड़नशील तैल और इनुलिन् (Inulin) होता है। तैल में एलेन्ट्रोलैक्टोन (Alantolactone, C15 H20 O2) नामक एक कृमिनाशक, कफनिःसारक एवं मूत्रल द्रव्य होता है । गुण और प्रयोग—यह पाचन, वातहर, कफहर, श्वासहर एवं गर्भाशय संकोचक है। इसका क्वाथ आधमान, उदरशूल, कुपचन, अनार्तव, कष्टार्तव, फुफ्फुस विकार जैसे दमा, जीर्ण श्वसनिका शोथ, क्षय, फुफ्फुसावरण शोथ एवं आमवात तथा अन्य वातिक रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर तथा सूजन कम होती है तथा वेदना दूर होती है । कण्डू आदि त्वचा के रोगों में इसके काथ को शरीर पर लगाया जाता है। मूल को गोमूत्र में रगड़ कर खुजली, दाद एवं पामा आदि पर लगाया जाता है। राजयक्ष्मा के जन्तुओं से उत्पन्न त्वचा के व्रणों में इससे लाभ होता है। जन्तुओं के विष को दूर करने के लिये इसका उपयोग करते हैं तथा इससे वेदना कम होती है। प्रतिनिधि-कूठ । (३) Vanda roxburghii R. Br. (वैण्डा रॉक्सबर्गाइ)। Fam. Orchidaceae (ओरचिडेसी)। बांदा, वंगीय रास्ना। बं०-रास्ना । संताल-दरेवंकि । क०-मरबाले । ते०- कनपचेट्टू, बदनिके, नेरदानचेट्टू ।


हरीतक्यादिवर्गः ८३

यह बंगाल, बिहार, गुजरात तथा कोंकण से त्रावनकोर तक प्राप्त होते हैं। इसके पौधे प्रायः आम और मधूक वृक्षों की डालियों पर उगे हुए पाये जाते हैं। काण्ड १-२ फीट लम्बा तथा उसकी ग्रन्थियों से अनेक मोटे और मांसल वातलम्बी (Epiphytic = एपिफाइटिक् ) मूल निकले रहते हैं। पत्तियां-६-८ इञ्च लंबी, मध्य पर्शुका पर गहरी और दो कतारों में निकली हुई रहती हैं। सदण्डिक पुष्पमंजरियां पत्तियों से लम्बी होती हैं। पुष्प व्यास में १/२-२ इञ्च और पंखड़ियां प्रायः मिश्रित वर्ण की होती हैं। वे अधिकतर पीताभ और कभी कभी नीलाभ होती हैं और उनके कुछ भागों में बदामी, बैंगनी तथा सफेद रंग भी होते हैं। फल--३-३/२ इञ्च लम्बा और सन्धियों पर रीढदार होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। बंगाल के अधिकांश कविराज इसी को उपयोग में लाते हैं। वे प्रायः वाटिकाओं में आम के वृक्षों की मोटी टहनियों के ऊपर की खरदरी छाल को पृथक् कर उस पर उक्त रासन को शोरियां युक्त बिठा रस्सी से बांध कुछ मिट्टी का अंश दे पानी से कुछ रोज सींचा करते हैं। गुण और प्रयोग-आमवातादि में इससे कुछ लाभ होता है। ज्वर में सर्वाङ्ग पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। कर्णस्राव में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं। अनेक वात- विकारों तथा आमवातादि में बाह्य प्रयोग के लिये इससे बने तेल का उपयोग किया जाता है। यह फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा वृश्चिक दंश पर लाभदायक है। (४) Saccolabium papillosum Lindl. (सँक्कोलेबिअम् पॅपिल्लोसम्)। Fam Orchi- daceae (ऑरचिडेसी)। क०-मरबाले । म०-कानभेर । इसके बांदे भी आम्रवृक्ष के ऊपर होने वाले बूंदों की तरह दिखलाई देते हैं । गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक है तथा इसका आमवातादि में प्रयोग होता है। केले के पत्तों में इसके पत्ते लपेटकर पुटपाक करके उसके रस को मधु के साथ कर्णपिटिका के लिये कान में डालते हैं जिससे कर्णपीड़ा दूर होती है। (५) Tylophora asthmatica W. & A. (टाइलोफोरा एस्थमेटिका) । Fam. Asclepi- adaceae एस्क्लेपिण्डेसी )। हि०-अंतमूल, जंगली पिकंवन । ब०-अन्तोमूल । म०-पितकारी, खडकी रास्ना । ता०- नायपाले । ते०-वेरिपल । मळ०-वल्लीपाल । क०-किरूमंजी । उडि०-मैंडी । सं०-मूलिनी, मूल- रास्ना, पित्तवल्ली, आन्त्रपाचक । इसकी लता उत्तरी बंगाल, आसाम, कछार, उड़ीसा, कोंकण, दक्षिणी भारत, कनारा, मद्रास प्रान्त एवं पूर्व पाकिस्तान, बर्मा, मलाक्का द्वीप तथा लंका आदि स्थानों पर पायी जाती है। यह रेतीली भूमि पर अधिक होती है ! बंबई के बाजार में रास्ना के नाम से इसके मूल भी बिकते हैं। इसकी बहुवर्षायु लता होती है। पत्र-२ से ५ इञ्च लम्बे, १ से २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, तीक्ष्णाग्र वा लम्बाग्र, आधार पर तांबूलाकार, अखण्ड, सनाल, ऊपरी पृष्ठ चिकना, अधो- पृष्ठ रोमश भूरे रंग का, ताजी अवस्था में स्वाद एवं गंध ह्यल्लासकर एवं सूखने पर गन्धहीन एवं रुचिहीन । पुष्प-बहुत, छोटे, हलके पीले रंग के, अन्दर से बैंगनी एवं गुच्छों में । फल-(Follicle) -२ से ४ इञ्च लंबा अग्र की तरफ नुकीला होता जाता है। मूल-बहुत लम्बे, मांसल, अनेक, बारीक, हलके पीले या मटमैले तन्तुयुक्त, अन्दर से हलके पीले रंग के, आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन, स्वाद प्रारंभ में मीठा लेकिन बाद में कडु । इसकी लता ईश्वरमूल की तरह दिखलाई देती है लेकिन उसके पत्र के दोनों पृष्ठ हरे और चिकने तथा पुष्प बड़े होते हैं। इसके मूल तथा पत्र का व्यवहार किया जाता है जिनमें पत्र अधिक गुणकारी है। ६ भा० नि०

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