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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 143 में से

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पृष्ठ 48

७८ भावप्रकाशनिघण्टुः । गुण और प्रयोग— मैनफल बहुत अच्छा वमन द्रव्य माना गया है। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसके बीजों को एक विशेष प्रकार से संग्रह कर व्यवहार करने को लिखा है। नये ग्रन्थकार इसके बीज वा फल की छाल को वामक नहीं मानते लेकिन इसके गूदे (Pulp) को वामक मानते हैं। डा० देसाई प्राचीन मत से सहमत हैं। कुछ भी हो सम्पूर्ण फल वामक अवश्य है। कुछ विद्वान् इसको इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि बतलाते हैं। इसका उपयोग गर्भपात कराने के लिये किया जाता है तथा यह मछलियों के लिये विषैला है। (१) एक फल कूट कर २५ तो० जल में १ घंटा भिगोकर रखना चाहिये। फिर पत्थर के खरल में घोंटकर, कपड़े से छान कर, उसमें थोड़ा मधु तथा पीपर मिलाकर खाली पेट पिलाने से १ घण्टे बाद १-२ साफ वमन हो जाता हैं और कभी कभी बाद में विरेचन भी होता है। इस वामक प्रयोग को हृष्ट-पुष्ट मनुष्य में व्यवहार में लाना चाहिये। (२) इसके २-३ फलों के गूदे को कूट कर ½ पाव जल में १०-१५ मिनट मसल कर छानकर प्रयोग किया जाय तो प्रायः १० मिनट में हल्लास और वमन शुरू हो जाता है। इसको देने के बाद उष्ण जल पिलाने से और भी वमन होता है। या केवल १ फल का गूदा भी पर्याप्त हो सकता है। (३) इसके गूदे को सुखाकर रख सकते हैं तथा १ से ४ माशे तक वामक औषधि के रूप में या २-३-५ र० कफनिःसारक एवं स्वेदल औषधि के रूप में व्यवहार में ला सकते हैं। (४) मुलेठी मन्दार एवं मैनफल का चूर्ण २-७ र० देने से श्वास तथा खाँसी में लाभ होता हैं एवं अधिक मात्रा में (१०-३० र०) अजीर्ण, शूल, शिरःशूल और अण्डकोष शोथ में वमन कराने के लिये देते हैं। (५) अन्य सुगन्धि औषधियों के साथ रक्तातिसार, पर्यायिक ज्वर एवं शिरःशूल में इसके गूदे को देते हैं। अतिसार में १ से २ माशा गूदा दिया जाता है। यह इपीकाक का अच्छा प्रति- निधि है। (६) इसके गूदे का टिंक्चर १५-६० बूंद कुकास एवं पागलपन में तथा उद्वेष्टन निरोधि एवं शामक औषधि के रूप में व्यवहार में लाया जाता है। (७) इसका फलत्वक् एवं बीज विरेचक एवं कृमिघ्न हैं एवं बच्चों में पित्तमयता तथा कृमि दूर करने के लिये व्यवहार में आता है। (८) इसके वृक्ष की छाल का बाह्य लेप शोथहर एवं वेदनाहर है एवं आमवात, फोड़े तथा चोट एवं हड्डियों की पीड़ा पर लगाया जाता है। अतिसार, संग्रहणी, ज्वर तथा आमवात में इस वृक्ष की छाल का आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। कांजी के साथ इसके फल को पीस कर नाभि के चारों तरफ लगाने से उदरशूल दूर होता है। मुखदूषिका (acne) एवं फोड़े आदि में इसके फल के लेप से लाभ होता है। (९) बच्चों में दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर इसके गूदे के चूर्ण को तालू तथा मसूड़ों पर रगड़ते हैं। (१०) वन्ध्यत्व दूर करने के लिये ६ माशा इसके बीज के चूर्ण को दूध, शक्कर वा केशर के साथ खिलाना चाहिये तथा ८, १० रत्ती चूर्ण की गुड़ के साथ बत्ती बनाकर योनि में धारण करानी चाहिये। इस प्रयोग से गर्भाशय शोथ आदि विकार दूर होकर कष्टार्तव एवं अनियमितात्तंव आदि में भी लाभ होता है।


हरीतक्यादिवर्गः । ७९ (११) सर्पविष में यह औषधि लाभदायक है। इसके मूल को बैल के मूत्र में पीसकर अंजन कराया जाता हैं तथा शुष्क मज्जा का आन्तरिक प्रयोग (५-१५ र०) करते हैं। मात्रा— वामक-१ फल का हिम। गूदे का चूर्ण १-४ माशा। अन्य गुणों के लिये २-४ रत्ती।

अथ रास्नाया नामगुणानाह

रास्ना युक्तरसा रस्र्या सुवहा रसना रसा। एलापर्णी च सुरसा सुगन्धा श्रेयसी तथा ॥१६२॥ रास्नाऽऽमपाचिनी तिक्ता गुरुष्णा कफवातजित् ॥ १६३ ॥ शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा। कासज्वरविषाशीतिवातिकामयसिद्धहृत् ॥ १६४ ॥ रास्ना के नाम तथा गुण— रास्ना, युक्तरसा, रस्र्या सुवहा, रसना, रसा, एलापर्णी, सुरसा, सुगन्धा तथा श्रेयसी ये सब रास्ना के नाम हैं। रास्ना— आम को पचाने वाली, तिक्तरस युक्त, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वात नाशक है तथा शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, ज्वर, विष, अस्सी (८०) प्रकार के वात रोग तथा सिध्म इन सब को दूर करती है ॥१६३-१६४॥

५० रास्ना

आज कल वैद्य समाज में रास्ना एक अप्राप्तव्य औषधि मानी जा रही है। वात विकारों के लिये आयुर्वेद में इसका प्रयोग रास्नादि, महारास्नादि क्वाथ के रूप में बहुत किया जाता है। भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न औषधि रास्ना नाम से ली जाती है। प्राचीन ग्रन्थों में इसके परिचय में निम्न श्लोक प्राप्त होते हैं। रास्ना तु त्रिविधा प्रोक्ता मूले पत्रं तृणं तथा। द्वयो मूलदलौ श्रेष्ठौ तृणरास्ना तु मध्यमा ॥ (रा. नि.) अथ रास्ना भृङ्गपत्रा पाषाणादौ प्रजायते। गिरौ च लघु-रास्ना स्यात् ततो हीनगुणा स्मृता ॥ सुगन्धमूला, एलापर्णी ॥ (शिवदत्तः) नीचे रास्ना नाम से ली जाने वाली विभिन्न वनस्पतियों का वर्णन अलग २ किया गया है। (१) Pluchea lanceolata Oliver & Hiern (प्लूचिया लैन्सिओलेटा)। Fam-Compo- sitae (काम्पोज़िटी)। हि०- रायसन, रोशना, वायसुरई। पं०- रासनं। सिन्ध०- कौरसन। रा० पु०- छोटा कलिया। अलीगढ़- वनतेरई, वनसोरई, वायसुरई। आगरा- छोटी कलिया। कानपुर- सुरई, सोरहि। बिहार- रोशना, रचना, रोचना। यह अपर बंगाल, बिहार, अवध, कानपुर और पश्चिम की ओर पञ्जाब तथा सिन्ध तक पाई जाती है। पत्तों का आकार रास्ता अर्थात् जिह्वा के सदृश होने से इस का नाम रास्ना रखा गया है। इसी के आधार पर उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश आदि जगहों के अधिकांश वैद्य वाय- सुरई को ही 'रास्ना' मानते हैं। बिहार के ग्रामीण इसको 'रचना' और 'रोचना' के नाम से पुकारते हैं। मालूम होता है कि—रचना शब्द रसना का अपभ्रंश है। बिहार के अधिकांश वैद्य भी इसको उपयोग में लाते हैं। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी इसी को उपयोग में लाने की सलाह देते हैं।