भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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७६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथेन्द्रयवस्य नामगुणानाह उक्तं कुटजबीजं तु यवमिन्द्रयवं तथा । कलिङ्गं चापि कालिङ्गं तथा भद्रयवा अपि ॥ १५६ ॥ इन्द्रयव के नाम तथा गुण—कुटज (कुडा या कुरैया) के बीज को इन्द्रयव कहते हैं उसके नाम—कुटजबीज, यव, इन्द्रयव, कलिङ्ग, लिङ्गका और भद्रयव ये सब हैं ॥ १५६ ॥ ॐइति क्लीबेऽमरोप्याह ॥ १५६ ॥ 'अमरसिंहने 'अमरकोश' में इन्द्रयव को नपुंसकलिङ्ग कहा है ॥ १५६ ॥ क्वचिदिन्द्रस्य नामैव भवेत्तदभिधायकम् । फलानीन्द्रयवास्तस्य तथा भद्रयवा अपि ॥१५७॥ कहीं पर इन्द्र के जो नाम हैं वे ही इन्द्रयव के भी समझे जाते हैं और कुरैया के फल का इन्द्रयव तथा भद्रयव नाम है ॥ १५७ ॥ ॐइति धन्वन्तरिः प्राह ॥ १५७ ॥ यहां पर यह और समझना चाहिये कि यह वचन 'धन्वन्तरि' भगवान् का है, इससे इन्द्रयव का पुंल्लिङ्ग में भी प्रयोग होता है ॥ १५७ ॥ इन्द्रयवं त्रिदोषघ्नं संग्राहि कटु शीतलम् ॥ १५८ ॥ ज्वरातीसाररक्ताशविमवीसर्पकुष्ठनुत् । दीपनं गुदकीलाऽस्रवातास्रश्लेष्मशूलजित् ॥ १५९ ॥ इन्द्रजव त्रिदोषनाशक, संग्राही, कटु रस युक्त और शीतल है। यह ज्वर, अतीसार, खूनी बवासीर, वमन, वीसर्प एवं कुष्ठ को दूर करने वाला, अग्निदीपक एवं गुदकील, रक्तदोष, वातरक्त, कफ तथा शूल को दूर करता है ॥ १५८-१५९ ॥ ४८ इन्द्रयव हि०-इन्द्रजव, कड़वा इन्द्रजव । गु०-इन्दर जब, इन्द्र जब । म०-कुट्याचे बी । ले०- Holarrhena antidysenterica Wall. (हॉलेहीना एन्टिडिसेन्टेरिका) । Fam. Apocy- naceae (एपोसइनेसी) । कुड़ा वृक्ष की फलियों के बीज को 'इन्द्रजव' कहते हैं। यह देखने में जई के आकार का होता है। इन्द्रजव कड़वा और इन्द्रजव मीठा इन भेदों से यह दो प्रकार का होता है। मीठा या कम कड़वा इन्द्रजव, कुटज भेद, राइटिया टिन्क्टोरिया (Wrightia tinctoria R. Br.) के बीज को कहते हैं जो कम गुण वाला होता है। इनका शेष परिचय कुटज वृक्ष के प्रकरण में दिया जायगा। गुण और प्रयोग—यह कडुवा, दीपन, संग्राही, ज्वरहर, कृमिघ्न, वातानुलोमक, वृष्य, बल्य एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, ज्वरातिसार, शीतज्वर, रक्तार्श, संग्रहणी, प्रवाहिका, पथरी तथा श्वास एवं पुराने फुफ्फुस विकारों में किया जाता है। इसको भूनकर फांट, क्वाथ या चूर्ण के रूप में दिया जाता है। (१) बच्चों के रक्तातिसार में कड़वा इन्द्रजव एवं नागरमोथा के क्वाथ में मधु मिलाकर दिया जाता है। (२) रक्तार्श में सोंठ के साथ इसके क्वाथ को देने से लाभ होता है। इसको दूध के साथ क्वाथ करके देने से इसमें बहुत लाभ होता है।


हरीतक्यादिवर्गः । ७७ (३) कुपचन, उदरशूल एवं अग्निमान्द्य आदि के लिये इसके चूर्ण को अल्प मात्रा में नित्य लेने से लाभ होता है। वमन में इसको भूनकर या फांट या क्वाथ बनाकर देना चाहिये। (४) पुराने फुफ्फुस के विकार तथा दमा में इसका व्यवहार किया जाता है। (५) पाथयििकज्वर तथा शीतज्वर में इसको गुडूच के साथ क्वाथ बनाकर देना चाहिये। नित्य इन्द्रजव का चूर्ण खाते रहने से शीतज्वर नहीं आता। (६) पूयदन्त (Pyorrhoea) में मसूढ़ों पर इसके चूर्ण को मलने से रक्तस्त्राव कम होता है तथा पूय एवं दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—चूर्ण १-४ माशा भूनकर या ३-३ तो० क्वाथ बनाकर। मीठा इन्द्रयव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ मदनस्य ( मैनफल ) नामगुणानाह मदनश्छर्द्दनः पिण्डो नटः¹ पिण्डीतकस्तथा । करहाटो मरुबकः शल्यको विषपुष्पकः ॥ १६०॥ मदनो मधुरस्तिक्तो वीर्योष्णो लेखन्यो लघुः । वान्तिहृद्विद्रधिहरः प्रतिश्यायव्रणान्तकः ॥ रूक्षः कुष्ठकफानाहशोथगुल्मव्रणापहः ॥ १६१ ॥ मैनफल के नाम तथा गुण—मदन, छर्दन, पिण्ड, नट, पिण्डीतक, करहाट, मरुवक, शल्यक तथा विषपुष्पक ये सब मैनफल के नाम हैं। मैनफल—मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, लेखन, लघु, वमनकारक, विद्रधिरोग को दूर करने वाला, प्रतिश्याय (जुकाम) और व्रणका नाशक, रूक्ष एवं कुष्ठ, कफ, आनाह, शोथ, गुल्म तथा क्षत को दूर करने वाला होता है ॥ १६०-१६१ ॥ ४९ मदन (मैनफल ) हि०-मैनफल, मयनफल । ब०-मैनफल, मयना कांटार गाछ । म०-गेल, गेलफल । गु०- मींडोल, मींढळ । क०-मंगरर्कि । ते०-बसन्त कड़िमि चेट्टु, मण्डचेट्टु, मंगचेट्टु । सा०-मर- कलम्, पुगारै, । ने०-मैदल । फा०-झुझ-उल्-कुच् । अ०-जौजुल कौसल । अं०-Emetic Nut (एमेटिक नट्), Bushy Gardenia (बुशी गार्डैनिया) । ले०-Randia dumetorum Lam. (रैंडिया डयुमेटोरम् ) । Fam. Rubiaceae (रुबियेसी) । यह हिमालय के साधारण प्रदेश में जम्मू से पूरब की ओर सिक्कम तथा दक्षिण की ओर चट्टगांव, खासिया पहाड़, सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष—१-२॥ इञ्च लम्बे लम्बे मजबूत पत्र कोणीय कांटों से भरा हुआ छोटे कद का होता है। छाल-भूरे रङ्ग की, लकड़ी-सफेद या भूरे रङ्ग की होती है। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे ऊपर से लट्त्वाकार और नीचे की ओर क्रमशः पतले होकर पंखयुक्त पत्रनाल में परिवर्तित होते हैं और प्रायः दलबद्ध होकर रहते हैं। फूल-पांच पंखड़ों वाले किञ्चित् हरिताभ, सफेद और सुगन्धयुक्त होते हैं। फल-जङ्गली अञ्जीर, सुपारी या अखरोट के आकार के होते हैं और पकने पर पीले पड़ जाते हैं। बीज-दीहीदाने के समान होते हैं। इन्हीं फलों को मैनफल कहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में संपोनिन् (Saponin) तथा व्हॅलेरियानिक एसिड (Valerianic acid), मोम, राल एवं रंजक पदार्थ आदि पाये जाते हैं। १. 'राठः' इति पाठा० ।