भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४ भावप्रकाश निघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, विषमज्वर, दाह, अग्निमान्द्य, शैथिल्यप्रधान कुपचन, आध्मान, अम्लपित्त, यकृत विकार, कामला, पांडु, श्वास, शोथ, गण्डमाला तथा कृमिरोग एवं व्रण में किया जाता है। (१) पुराने ज्वर में जब अग्निमांद्य तथा शरीर में दाह रहता है तब इसके फांट या चूर्ण से लाभ होता है। सुदर्शन चूर्ण, जिसमें इसकी आधी मात्रा रहती है, बहुत व्यवहार में आता है। (२) रोग संनिवृत्तावस्था में पाचन सुधारने के लिए तथा अग्निवृद्धि के लिए बल्य औषधि के रूप में इसके फाण्ट का व्यवहार लौंग दालचीनी आदि सुगन्धि औषधियों के साथ किया जाता है। (३) हिचकी, गर्भिणीवमन एवं मद्यपान करने वालों में यदि वमन हो तो इसके चूर्ण या क्वाथ का प्रयोग मधु या शर्करा मिलाकर करते हैं। (४) वातरक्त में बल्य औषधि की तरह इसका प्रयोग किया जाता है। (५) उष्ण कटिबन्धज यकृत् विकारों में धनियां तथा चिरायते का क्वाथ मधु के साथ देने से लाभ होता है। (६) भूनिम्बादि चूर्ण जिसमें चिरायता, कुटकी, त्रिकटु, मुस्तक, इन्द्रयव, कुरैया की छाल एवं चित्रक आदि पदार्थ रहते हैं, उसका व्यवहार कुपचन, संग्रहणी, ज्वर तथा कृमिरोग में किया जाता है। (७) सुदर्शन चूर्ण तथा टङ्कण क्षार का दो तीन बार बाह्य प्रयोग करने से 'अजगल्लिका' (Impetigo contagiosa) नामक फुन्सियों में पारद मलहम की अपेक्षा अधिक लाभ होता है। (८) जीर्णज्वर में पांडु तथा कृशता होने पर किरातादि तैल से अभ्यङ्ग कराया जाता है। मात्रा-चूर्ण ४-१५ रत्ती। प्रतिनिधि-ये सभी जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं। (१) S. purpurascens Wall. (स्व० परव्यूरासेन्स्) - यह पश्चिमोत्तर हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से कुमाऊँ तक प्राप्त होता है। कांड छोटे; शाखायें फैली हुई; पत्र आयताकार वा भालाकार, १/२ x ७ इञ्च; दलपत्र हल्के सुखों लिये बैंगनी रंग के और उनके आधार पर एक कालाचक्र, विच्छेद बाहर की ओर मुड़े हुये और एक एक ग्रन्थि से युक्त होते हैं। (२) S. decussata Nimmo ex Grah. (स्व० डिकैसेटा) - म०-सिलाजित, महा- बलेश्वर-कडू, द०-कवि। इसका छोटा क्षुप दक्षिण के पश्चिमी भागों में होता है। कांड चौपहल; पुष्प श्वेत। इसके टुकड़े २ इञ्च लम्बे एवं हंस के पंख के इतने मोटे होते हैं। ये महाबलेश्वर में बिकते हैं। स्वाद अत्यन्त कडुवा। गुण करू (जै. कुर्रों) की तरह। (३) S. chinensis Franchet (स्व० चाइनेन्सिस) - जापानी चिरायता का क्षुप छोटा एवं ४-१४ इञ्च ऊँचा होता है। कांड बहुत बारीक। यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा अधिक कडुवा होता है। (४) S. paniculata Wall. (स्व० पॅनिक्युलॅटा) बं०-कड़वी। (५) S. perennis Linn. (स्व० पेरेन्निस) (६) S. corymbosa Wight (स्व० कोरिम्बोसा) (७) S. affinis Clarke (स्व० अफिनिस्) (८) Exacum bicolor Roxb. (एक्सकिक्म बाइकलर) - हि० बड़ा चिरायता।
हरीतक्यादिवर्गः ७५ इसका क्षुप दक्षिण में कोंकण में बरसात के दिनों में उत्पन्न होता है। पुष्प श्वेत और सुन्दर । दलपत्रों के अन्तिम हिस्से जरा नीले से रहते हैं। गुण-पौष्टिक, अग्निवर्धक एवं करू की तरह । (९) E. tetragonum Roxb. (ए. टेट्रागोनम्) - हि०-तितखन, म०- ऊदकिराईत । इसका वर्षांयु क्षुप उत्तर हिन्दुस्तान के पहाड़ी प्रदेश एवं हिमालय पर उत्पन्न होता है। यह एक हाथ ऊँचा, कांड चौपहल; पत्र-विपरीत, विनाल, शल्याकृति लेकिन कुछ चौड़े, एक अङ्गुल लम्बे और ५ शिरायुक्त; पुष्प नीले। गुण-दीपन एवं कडुवापौष्टिक । इसका प्रयोग जीर्णज्वर तथा कुपचन में किया जाता है। (१०) Erythraea roxburghii G. Don (एरित्रिआ रॉक्सबर्गाय) । ब०-गिर्मि । म०-लन्तक । इसका छोटा सा क्षुप कोंकण में बरसात के बाद उत्पन्न होता है। पुष्प सुन्दर, गुलाबी एवं सितारों के समान । स्वाद कडुवा । गुण-इसको कडुनाई भी कहते हैं तथा पौष्टिक कडुवी औषधि की तरह बङ्गाल में व्यवहार में आती है। कुपचन तथा ज्वर में इसका प्रयोग किया जाता है। (११) Enicostemma littorale Blume (एनिकोस्टेमा लिटोरेल) - हि०, म०-छोटा चिरायता, गु०-मामिज्वा; ते०-नेलगाल्लि । इसका छोटा क्षुप सभी जगह किन्तु समुद्र के किनारे तथा तर जमीन में अधिक होता है। यह बंगाल में नहीं होता। गुजरात तथा उत्तरी कोंकण में बहुत होता है। इसका क्षुप एक बित्ता ऊँचा एवं बहुत शाखायुक्त होता है। कांड सीधा, चौपहल एवं मूल से ऊपर तक पत्र युक्त। पत्र विपरीत, विनाल, शल्याकृति, सनाय वा इमली की तरह एवं ३ शिरायुक्त । पुष्प श्वेत, छोटे, विनाल, प्रत्येक कोण में २, ३ । फल गोल फली । स्वाद अत्यन्त कडुवा। इसके पञ्चांग का व्यवहार गुजरात तथा मद्रास में अधिक किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, आनुलोमिक एवं तिक्त पौष्टिक है। इसको रत्ती दो रत्ती मात्रा में कुपचन में देते हैं। व्यामिश्रण-इनमें से प्रथम दो जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं। (१) S. angustifolia Buch.-Ham. (स्व० ॲगस्टिफोलिया) - इसका कांड चौपहल एवं पंखयुक्त होता है। यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा कम कड़ु होता है एवं इसमें पिथ कोष (Pith cells) बहुत ही अल्प रहते हैं। (२) S. alata Royle ex D. Don (स्व० अॅलाट) - यह बिलकुल कडुवा नहीं होता। इसमें पिथ (Pith) पूर्ण संवर्धित रहता है। चिरायता इससे अधिक गहरे रंग का, स्वाद में अत्यन्त कडुवा और इसका पिथ (Pith) संतत (Continuous) रहता है। (३) Rubia cordifolia Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया) (Fam. - Rubiaceae-रूबि- एसी) - इसकी पहचान इसके बैंगनी (Purple) रंग से हो जाती है। (४) Andrographis paniculata Nees (Fam. Acanthaceae-अॅकेंथेन्सी) (अंड्रो- ग्राफिस् पॅनिक्युलेँटा) - हि० कालमेघ। इसके कांड हरे, अनेक सीधी, पतली विपरीत शाखाएं एवं पत्र भालाकार और हरे होते हैं जिससे इसका भेद किया जा सकता है। देशी चिरायता के नाम से यह बजार में बिकता है।