भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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७२ भावप्रकाश निघण्टुः पिक्रिन (Gentiopicrin) नहीं होता जिसे विदेशी जेन्शियन् (G. lutea) का प्रभावकारी द्रव्य समझा जाता है। शायद यह इसके ताजे मूल से प्राप्त हो सकता है। गुण और प्रयोग— यह कडुवा तथा बल्य है। इससे आमाशयिक रसों की अभिवृद्धि होकर भूख बढ़ती है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह विरेचन कराती है। इसका स्वाद एवं गन्ध अच्छी होने के कारण अनेक बल्य एवं पाचक औषधियों के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें टैनिन न होने के कारण यह ग्राही भी नहीं होता है। ज्वर में इससे लाभ होता है। मात्रा— चूर्ण ५-१५ र०।

४६ (ख) खुरासानी कुटकी हि०— खुरासानी कुटकी। गु०— कडू। म०— कडू। अ०— लेरतिक। इरान— खेरवेकसीआ। अं०— Black hellebore (ब्लैक हेलीबोर), Christmas rose (क्रिस्टमस रोज)। लै०— Helle- borus niger Linn. (हेलीबोरस नाइगर)। Fam. Ranunculaceae) (रैनन्कुलेसी)। इस वनस्पति के मूल नेपाल, हिमालय और अरब से आते हैं। कुटकी में इसकी मिलावट रहती है। विशेष वर्णन कुटकी के साथ दिया गया है। रासायनिक संगठन— इसमें हेल्लेबोरिन् (Helleborin) तथा हेल्लेबोरेइन् (Hellebore- in) नामक पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— यह हृद्य, ज्वरहर, वेदनाहर, विरेचक, आर्तववृद्धिकर एवं कृमिघ्न है। अधिक मात्रा में यह विषैली औषधि है। इससे हृदयातिपात होकर मृत्यु हो सकती है। अधिक मात्रा से प्रथम वमन और विरेचन प्रारम्भ होता है, फिर नाडी की गति कम होते होते मृत्यु हो सकती है। (१) हृदय की अकार्यक्षमता के कारण उत्पन्न जलोदर में पुनर्नवा, अपामार्ग, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका काथ बहुत लाभकर होता है। हृदय पर इसकी क्रिया डिजिटैलिस के समान होती है। इससे हृदय को बल मिलता है एवं नाडी की गति मंद होकर नाडी बलवान् होती है और जलोदर दूर होता है। (२) वेदनायुक्त ज्वर जैसे फुफ्फुस पाक, तीव्र सन्धि शोथ एवं प्रसूतिज्वर आदि में इसके प्रयोग से लाभ होता है। इन रोगों में इसकी क्रिया वत्सनाभ के समान होती है। (३) इसके काथ से व्रण प्रक्षालन करने से व्रणपीडा दूर होती है। यह स्थानिक वेदना- हर भी है। मात्रा— चूर्ण ४-८ र०।

अथ किरातस्य (चिरायता) नामगुणानाह किराततिक्तः कैरातः कटुतिक्तः किरातकः ॥ १५३ ॥ काण्डतिक्तोऽनार्यतिक्तो भूनिम्बो रामसेनकः ॥ किरातकोऽन्यो नेपालः सोऽर्द्धतिक्तो ज्वरान्तकः ॥ १५४ ॥ किरातः सारको रूक्षः शीतलस्तिक्तको लघुः । सन्निपातज्वरश्वासकफपित्तास्रदाहन्नुत् । कासशोथतृषाकुष्ठज्वरव्रणकृमिप्रणुत् ॥ १५५ ॥


हरीतक्यादिवर्गः ७३ चिरायता के नाम तथा गुण— किराततिक्त, कैरात, कटुतिक्त, किरातक, काण्डतिक्त, अनार्यतिक्त भूनिम्ब और रामसेनक ये सब चिरायता के नाम हैं। नेपाल देश में एक प्रकार की चिरायता उत्पन्न होती है जो कि इसकी अपेक्षा आधा तिक्तरसयुक्त होती है। अत एव उसे 'अर्धतिक्त' कहते हैं। वह ज्वरनाशक होती है। चिरायता—सारक (दस्तावर), रूक्ष, शीतल, तिक्तरसयुक्त एवं लघु होती है एवं सन्निपातज्वर, श्वास, कफ, पित्त, रक्तदोष, दाह, कास, शोथ, प्यास, कुष्ठ, ज्वर, व्रण और कृमि इन सबों को दूर करती है ॥ १५३-१५५ ॥

४७ किरात (चिरायता) हि०— चिरायता, चिरेता, चिरैता, चिराइता । ब०— चिराता, चिरेता । म०— काडेचिराईत, चिराइता । गु०— करियातुं । क०— नेलबेवु । ते०— नीलवेमु । ता०— निलस्वेम्बु । फा०— नोनिहाद, मोनिहादन्दी । अ०— कसबुज्जैरीरा, कश्बुक्षझारिरा, कसबुलू रायरह । अं०— Chireta । चिरैटा )। लै०— Swertia Chirata ( Buch-Ham ) । (स्वशिया चिरांटा) Fam. Gentiana eae (जेन्शियानेसी)। चिरायता हिमालय पहाड़ के गरम प्रान्तों में काश्मीर से भूटान तक और खासिया के पहाड़ पर उत्पन्न होता है। प्रायः पृथ्वी के सब देशों में १८० प्रकार का चिरायता पाया जाता है, इनमें हमारे देश में ३७ प्रकार का होने का अनुभव किया गया है। जिस चिरायते को हम लोग व्यवहार में लाते हैं और जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है, वह हिमालय पहाड़ के लगभग ४ हजार से १० हजार फीट ऊँची चोटियों पर तथा खासिया के पहाड़ पर ४ हजार से ५ हजार फीट की ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसका वर्षायु क्षुप-दो फीट से ५ फीट तक ऊँचा होता है। कांड—नारंगी कालासा या जामुनी, मूल की तरफ गोल, मोटा, ऊपर बहुशाखा युक्त तथा चौपहल; पत्र—चौड़े भालाकार, ४ x १.५ इञ्च, चिकने, नोकदार, ३ से ७ शिराओं से युक्त, विपरीत; दलपत्र—हरित पीत, परंतु बैगनी रंग की छाया भी हो सकती है। प्रत्येक विच्छेद पर दो दो हरिताभ और रोमश ग्रन्थियाँ होती हैं। फूलने पर इसमें डोंडी लगती है जिनमें बहुत बारीक बीज निकलते हैं। पुष्पित होने पर सम्पूर्ण क्षुप को उखाड़ कर सुखाकर बेचते हैं जिसका औषधि में व्यवहार होता है। यह अत्यन्त कडवा होता है। रासायनिक संगठन— इसमें चिरातिन् (Chiratin, $C_{52} H_{96} O_{30}$) और ओफेलिक् एसिड ( Ophelic acid, $C_{26} H_{40} O_{20}$ ) नामक दो कडुवे द्रव्य १.४२-१.५२% रहते हैं। इनमें पहला हलके पीले रंग का पदार्थ है एवं दूसरा भी हल्के पीले बादामी रंग का, आर्द्र, चासनी की तरह पदार्थ होता है जो जल तथा मद्यसार में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें यवक्षार, चूना, राल एवं ओलिक् (Oleic), पामिटिक् (Palmitic) और स्टियरिक् अम्ल (Stearic acids) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— चिरायता दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ज्वरहर, दाहप्रशमन, पित्तविरेचक एवं कृमिघ्न है। जेन्शियन की तरह ही यह लाभदायक है। इसके प्रयोग से भूख बढ़ती है, पाखाना साफ होता है तथा पुराने ज्वर में लाभ होता है। इसका उपयोग स्वतन्त्र की अपेक्षा अन्य औष- धियों के साथ अधिक किया जाता है।