भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभावप्रकाश निघण्टुः कट्वी तु कटुका पाके तिक्ता रूक्षा हिमा लघुः । भेदिनी दीपनी हृद्या कफपित्तज्वरापहा । प्रमेहश्वासकासास्रदाहकुष्ठक्रिमिप्रणुत् ॥ १५२ ॥ कुटकी के नाम तथा गुण-कट्वी, कटुका, तिक्ता, कृष्णभेदा, कटम्भरा, अशोका, मत्स्य- शकला, चक्राङ्गी, शकुलादनी, मत्स्यपित्ता, काण्डरुहा, रोहिणी और कङ्कटरोहिणी ये सब कुटकी के नाम हैं। कुटकी-तिक्त रसयुक्त, परिपाक में कडु रसयुक्त, रूक्ष, शीतल, लघु, मलको भेदन करने वाली, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकर, कफ, पित्तज्वर, प्रमेह, श्वास, कास, रक्त दोष, दाह, कुष्ठ तथा कृमि का नाश करने वाली होती है ॥ १५१-१५२ ॥ ४६ कुटकी हि०-कुटकी, कडुकी, कटुका । ब०-कटकी । म०-केदारकडू, काली कुटकी । गु०-बालकडू कडू । ते०-कडुकरोणी । क०-कडुक रोहिणी, कडुकरोहिणी । सा०-कडुक्कु रोगणी । फा०-खर्वके- हिन्दी । अ०-सर्वके अस्वद, खानेखस्वेल्ल । अं०-Picrorhiza (पिक्रोहाइझा) । ले०-Picro- rhiza kurroa Royle ex Benth. (पिक्रोहाइझा कुर्रों) । Fam. Scrophulariaceae (स्क्रोपफुलरियासी) । यह हिमालय पहाड़ की ९०००-१५००० फीट ऊँची चोटियों पर काश्मीर से सिक्कम तक बहुत उत्पन्न होती है। इसका क्षुप रोमश होता है। इसका भौमिक तना बहुवर्षाणु, छोटी उँगली के समान मोटा एवं ६ से १०-१२ इञ्च तक लम्बा होता है। पत्ते २-४ इञ्च लम्बे, सुवाकार, जड़ की ओर संकुचित, आगे की ओर चौड़े, किञ्चित चिकने और कटे हुए झालरदार किनारे वाले होते हैं। क्षुप के बीच से एक डण्डी निकलती है जिसके अन्त में फूलों के गुच्छे लगते हैं। फूल-नीले या सफेद रङ्ग के आते हैं। फली-चौथाई इञ्च की होती है। कुटकी इस क्षुप के मूल (भौमिकतने-Rhizome) को कहते हैं। यह १ से २ इञ्च लम्बे, कषिश लोहबान की तरह रंग वाले, खुरदरें एवं मुड़े हुए टुकड़े होते हैं। इन पर छोटी छोटी चक्रा- कार गांठें तथा गिरे हुए पत्तों एवं मूल के निशान रहते हैं। यह एक तरफ मोटी तथा दूसरी तरफ पतली होती है तथा इसमें एक प्रकार की हलकी गन्ध होती है। इसका स्वाद अत्यन्त कडुवा होता है। रासायनिक संगठन-इसमें पिक्र्र्रोहाइझिन् (Picrorhizin) नामक एक कडुवा रवेदार मधुमेय (Glycoside) २६.६% पाया जाता है, जिसका उदांशन (Hydrolysis) होने पर पिक्रोहीझेष्टिन् (Picrorhizetin) एवं एक प्रकार की मधु शर्करा (Dextrose) प्राप्त होती है। यह मधुमेय जल, मद्यसार, एसिटोन (Acetone) और एथिल अॅसिटेट (Ethyl acetate) में घुलनशील एवं क्लोरोफॉर्म (Chloroform), बेंझिन (Benzene) और ईथर (Ether) में अघुलनशील होता है। यह अत्यन्त जलग्राही (Hygroscopic) होता है। इसके अतिरिक्त इसमें मधुशर्करा, मोम एवं कॅथार्टिक् अॅसिड् (Cathartic acid) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। • गुण और प्रयोग-यह एक उत्तम कटुपौष्टिक, दीपक, पाचक, पित्तविरेचक और नियतकालिक ज्वरहर है। इसकी क्रिया आंत्र एवं यकृत पर होती है। यह अल्प मात्रा में संस्रन तथा अधिक मात्रा में विरेचक होती है। जेन्शियन की तरह तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। इसका गुण इन्द्रायण के सदृश होता है। इसका उपयोग नियतकालिकज्वर, शीतज्वर, कामला, पांडु, यकृत् विकार, श्वास, कुपचन, हृद्रोग, संग्रहणी, आन्त्र की शिथिलता तथा बच्चों के कृमि विकारों में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः ७१ (१) पुनरावर्तित ज्वरों में इससे अच्छा लाभ होता है लेकिन इसको अधिक मात्रा में (३-४ माशा) देना पड़ता है। अविशिष्ट स्वरूप के सभी पुराण मन्द ज्वरों में, विशेषकर विबन्धयुक्त ज्वर में, इससे अच्छा लाभ होता है। इससे ज्वर जनित दाह की शान्ति होती है। (२) हृदय के ऊपर इसकी क्रिया डिजिटेलिस की तरह होती है। हृदय की अकार्य क्षमता जनित यकृत वृद्धि एवं उदरशोथ में इसको अधिक मात्रा में क्वाथ के रूप में देने से पतले दस्त होकर लाभ होता है तथा हृदय को बल प्राप्त होता है। (३) आरोग्यवर्धिनी गुटिका में इसकी आधी मात्रा रहती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० रत्ती । जीर्णज्वर में-३-४ माशा । प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-(क) कुटकी के ही नाम से जेन्शियाना कुर्रों (Gentiana kurroo, Royle; Fam. Gentianaceae) के मूल जिन्हें 'करु' कहा जाता है, बेचे जाते हैं। ये बाह्य स्वरूप में कुटकी के ही समान दिखलाई देते हैं, लेकिन दोनों की सूक्ष्म रचना में भेद होता है। इनके अनुप्रस्थ विच्छेद (Transverse section) में अन्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। जें० कुर्रों में रसारोहण नलिका (Vessel) के कोषावरणों की वृद्धि से उत्पन्न मोटाई, चक्राकार (Annular) या सीढ़ी के डण्डों की तरह मोटी रेखाकार (Scalariform) होती है, लेकिन कुटकी (P. kurroa) में यह मोटाई बिन्दुमयं (Pitted) होती है। कुटकी (P. kurroa) में मूल के मध्य भाग में रहने वाले कोष्ठ जिन्हें पिथकोष्ठ (Pith cells) कहा जाता है, वे बिन्दुमयं आवरण (Pitted walled) वाले होते हैं लेकिन ये कोष्ठ जे० कुर्रों में अनुपस्थित रहते हैं। गुण धर्म की दृष्टि से भारतीय जे० कुर्रों विदेशी जेन्शियाना का अच्छा प्रतिनिधि समझा जाता है। (ख) जे० कुर्रों के अतिरिक्त इसमें एक तीक्ष्ण औषधि ले०-Helleborus niger Linn. (हेलीबोरस् नाइगर) मिली हुई रहती है, जिसको पहचानना आवश्यक है। इसके टुकड़े १ से ३ इञ्च लंबे और ३ इञ्च से कम मोटे होते हैं। बाह्य पृष्ठ चिकना, टूटे हुये मूल के निशानों से युक्त एवं हल्के रंग का होता है। यह टुकड़े बहुत हल्के तथा दो अंगुलियों के बीच नख से दबाने पर दब जाने वाले होते हैं। ४६ (क) करु सं०-त्रायमाण ? हि०, बं०-करू, कुटकी । पं०-कमल फूल, नीलकंठ । बंबइ०-पाषाणभेद, जितीयाण । अं०-Indian Gentian (इण्डियन् जेन्शियन्) । ले०-Gentiana kurroo Royle (जेन्शियाना कुर्रों) । Fam. Gentianaceae (जेन्शियानेसी) । इसका क्षुप काश्मीर तथा हिमालय के उत्तरी पश्चिमी शिखरों पर ५०००-११००० फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है। पत्र-मूलीय; कोषमय आधार वाले, ३-५ इञ्च लम्बे, रेखाकार (Linear); पुष्प-नीले सफेद दागों से युक्त; मूल-हलका, पीला, चौपहल; फली-लम्बी । चिकित्सा में इसके भौमिक तने तथा मूल का व्यवहार किया जाता है। कुटकी तथा विदेशी 'जेन्शियन्' के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है। इसकी अन्य जातियों का भी इसी प्रकार व्यवहार किया जाता है। इसके टुकड़े १ इञ्च लम्बे एवं इन पर चक्राकार धारियां होती हैं तथा ये ऐंठे हुए से प्रतीत होते हैं। अन्य पार्थक्य ऊपर लिखा गया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक कडुवा पदार्थ तथा एक पारदर्शक राल के समान पीले रंग- का बिना स्वाद का पदार्थ २०% पाया जाता है जो क्षारीय घोल में नहीं घुलता । इसमें जेन्शिय