भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८ भावप्रकाश निघण्टुः पेशियों पर इसकी अवसादक क्रिया होती है तथा अन्नवह प्रणाली के ऊपर इसका प्रक्षोभक प्रभाव पड़ता है। (१) कुछ लेखकों ने इसे सभी प्रकार के आंत्रस्थ कृमियों के लिये उपयोगी बतलाया है लेकिन इसका विशेष प्रभाव स्फीत कृमि (Tape worms) पर पड़ता है। मेलफर्न की अपेक्षा यह कम प्रभावशाली है लेकिन इससे वमन आदि नहीं होता और दुर्बल एवं बच्चों के लिये यह उसकी अपेक्षा अच्छी औषधि है। इसके लिये अतिरिक्त विरेचन की आवश्यकता नहीं होती न कोई पूर्व विरेचन की। २ से ८ माशा चूर्ण दूध, दही, मधु या सुगन्धित पेय के साथ खिला देते हैं । तीसरे या चौथे दस्त में कृमि निकल जाते हैं । यदि ४ घण्टे के बाद भी शौच न हो तो एरण्ड तैल देना चाहिये । इसका कृमिघ्न गुण संभवतः इसके अवसादक प्रभाव के कारण है। (२) इसका बाह्य प्रयोग तैल में मिलाकर दाद, खुजली, चकत्ते, व्रण एवं अग्निदग्ध व्रण आदि में बहुत लाभदायी है। सिर के खालित्य में शतधौत घृत के साथ लगाने से लाभ होता है । (३) इस वृक्ष के पत्ते एवं मूल आदि का चर्म रोगों में अनेक प्रकार से प्रयोग किया जाता है। मात्रा-चूर्ण २-८ माशा। बच्चों को ५ २० मधु से, इससे अधिक एक साथ न दें, यदि गुण न हो तो दूसरे दिन पुनः दें। अथारग्वधस्य (धानवहेरा, अमलतास ) नामगुणानाह आरग्वधो राजवृक्षः शम्पाकश्चतुरङ्गुलः । आरेवतो व्याधिघातः कृतमालः सुवर्णकः ॥ १४८ ॥ कर्णिकारो दीर्घफलः स्वर्णार्ङ्गः स्वर्णभूषणः । आरग्वधोगुरुः स्वादुः शीतलः स्रंसनोत्तमः १ ॥ ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्त्तशूलनुत् । तत्फलं सं सरनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् ॥ ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ॥ १५० ॥ अमलतास (धनवहेरा) के नाम तथा गुण-आरग्वध, राजवृक्ष, शम्पाक, चतुरङ्गुल, आरेवत, व्याधिघात, कृतमाल, सुवर्णक, कर्णिकार, दीर्घफल, स्वर्णाङ्ग और स्वर्णफल ये नाम अमलतास के हैं। अमलतास-गुरु, मधुर, शीतल और उत्तम रेचक है। यह ज्वर, हृद्रोग, रक्तपित्त, वायु, उदावर्त्त और शूल को दूर करता है। अमलतास का फल-मृदु रेचक, रुचिकारक, कुष्ठ, पित्त तथा कफ को दूर करने वाला होता है। यह ज्वर में सदा हितकर होता है एवं कोष्ठ को अत्यन्त शुद्ध करने वाला होता है ॥ १४८-१५० ॥ ४५ आरग्वध ( अमलतास ) हि०-अमलतास, सोनहाली । ब०-सोन्दाली, सोनालु, बन्दर लाठी । म०-बाहवा । क०- कक्केमर । ते०-रेलचेट्टु । गु०-गरमालो । पं०-अमलतास, करङ्गल, कनियार । ता०-कोन्नेमरं, शरकोन्ने, कोरैकाय । फा०-ख्यारेचम्बर । अ०-ख्यारे शम्बर, ख्यारशम्बर । अं०-Pudding Pipe Tree (पुडिंग पाइप ट्री ) या Indian Laburnum (इण्डियन लैबर्नम् ), या Purging Cassia ( पर्जिंग केशियां ) । ले०-Cassia fistula, Linn. (केशिया फिस्टुला, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी ) । यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है । १. 'मृदु'रिति पा० । हरीतक्यादिवर्गः | ६६ इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है, किन्तु कहीं कहीं बड़े वृक्ष भी देखने में आते हैं। लकड़ी बहुत मजबूत होती है। १२ से १८ इञ्च तक की लम्बी लम्बी सींकों पर ४ से ८ जोड़े पत्ते लगते हैं जो १॥ से ३॥ इञ्च तक लम्बे, अण्डाकार होते हैं । १०-२० इञ्च तक की लम्बी टहनियों पर सुनहले चमकीले पीले पीले रङ्ग के पांच पांच दल वाले फूलों के घनहरे लगते हैं, जो चैत के अन्त से ज्येष्ठ तक वृक्षों को सुशोभित करते हैं। जेठ में पतली पतली सलाई के समान हरी हरी फलियां निकल कर वर्षा के अन्त तक १-२ फीट लम्बी १ इञ्च तक मोटी हरी हरी फलियां लटकती दिखाई पड़ती हैं । फिर हेमन्त के अन्त से काला रूप धारण करके वसन्त में पक जाती हैं । फलियों के भीतर पुरानी चवन्नी बराबर गोल गोल पतले पतले काले रस से लिपटे हुए परत रहते हैं और परतों के बीच सिरस के बीज के समान बीज होते हैं। रासायनिक संगठन-अमलतास के गूदे में गोंद, पेक्टिन (Pectin), रंजक पदार्थ, शर्करा, अल्प मात्रा में एक मधुगंधि उड़नशील तैल तथा हाइड्रोक्सिमेथिल्-अन्थ्राँक्विनोन् ( Hydroxy- methyl-anthraquinones ) आदि पदार्थ पाये जाते हैं । गुण और प्रयोग- ( १ ) अमलतास की गूदी आनुलोमिक, दाहशामक एवं वेदना स्थापक है। यह मृदु विरेचनों में सर्वश्रेष्ठ है। इसका प्रयोग ज्वरावस्था में तथा सुकुमार, बाल, गर्भिणी एवं कोमल प्रकृति की नारियों में किया जाता है। मृदु विरेचन के लिये इसके स्वतंत्र प्रयोग की अपेक्षा सनाय के साथ बनाया हुआ अवलेह (Confectio senna) अधिक अच्छा है जिससे मरोड़, हल्लास, शूल, आध्मान आदि नहीं होते जो स्वतन्त्र प्रयोग में अधिक मात्रा में लेने से होते हैं। इससे बनी गुलकन्द का भी व्यवहार किया जाता है। रक्त की उष्णता बढ़ने पर अथवा मल संचय होकर वातरक्त एवं आमवात आदि रोग उत्पन्न होने पर विरेचन के लिये इसका उपयोग करते हैं। जिन्हें कब्जियत की शिकायत हमेशा रहती है उन्हें अल्प मात्रा में इसे वरावर सेवन कराया जाता है। अधिक दिन प्रयोग से मूत्र का रंग गहरे बादामी रंग का हो जाता है। ज्वर में अथवा मधुमेह में विरेचन की आवश्यकता हो तो इसका उपयोग कर सकते हैं। कॉफी के सत्व में इसकी मिलावट की जाती है। इसका लेप आमवात, वातरक्त एवं प्रणशोथ आदि पर किया जाता है। ( २ ) इसके बीज वामक होते हैं तथा ५-७ बीजों का चूर्ण वमन के लिये दिया जाता है । ( ३ ) इसकी छाल के क्वाथ से कवल करने से गले की गांठों की सूजन कम होती है । ( ४ ) इसके पत्तों का रस अर्दित में पिलाया जाता है तथा जिस अंग का घात हुआ हो वहां इससे मला जाता है। दाद तथा भिलावें की सूजन पर इसके लगाने से लाभ होता है । ( ५ ) इसकी मूल तीव्र विरेचक एवं ज्वरहर होती है । मात्रा-गुदी ४-८ माशा । अथ कटुकाया नामगुणानाह कट्वी तु कटुका तिक्ता कृष्णभेदा कटम्भरा १ ॥ अशोका मत्स्यशकला चक्राङ्गी शकुलादनी ॥ मत्स्यपित्ता काण्डरुहा रोहिणी कटुरोहिणी ॥ १५१ ॥ १. 'कटुम्भरे'ति पा० ।