भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
७२ भावप्रकाश निघण्टुः पिक्रिन (Gentiopicrin) नहीं होता जिसे विदेशी जेन्शियन् (G. lutea) का प्रभावकारी द्रव्य समझा जाता है। शायद यह इसके ताजे मूल से प्राप्त हो सकता है। गुण और प्रयोग— यह कडुवा तथा बल्य है। इससे आमाशयिक रसों की अभिवृद्धि होकर भूख बढ़ती है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह विरेचन कराती है। इसका स्वाद एवं गन्ध अच्छी होने के कारण अनेक बल्य एवं पाचक औषधियों के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। इसमें टैनिन न होने के कारण यह ग्राही भी नहीं होता है। ज्वर में इससे लाभ होता है। मात्रा— चूर्ण ५-१५ र०।
४६ (ख) खुरासानी कुटकी हि०— खुरासानी कुटकी। गु०— कडू। म०— कडू। अ०— लेरतिक। इरान— खेरवेकसीआ। अं०— Black hellebore (ब्लैक हेलीबोर), Christmas rose (क्रिस्टमस रोज)। लै०— Helle- borus niger Linn. (हेलीबोरस नाइगर)। Fam. Ranunculaceae) (रैनन्कुलेसी)। इस वनस्पति के मूल नेपाल, हिमालय और अरब से आते हैं। कुटकी में इसकी मिलावट रहती है। विशेष वर्णन कुटकी के साथ दिया गया है। रासायनिक संगठन— इसमें हेल्लेबोरिन् (Helleborin) तथा हेल्लेबोरेइन् (Hellebore- in) नामक पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— यह हृद्य, ज्वरहर, वेदनाहर, विरेचक, आर्तववृद्धिकर एवं कृमिघ्न है। अधिक मात्रा में यह विषैली औषधि है। इससे हृदयातिपात होकर मृत्यु हो सकती है। अधिक मात्रा से प्रथम वमन और विरेचन प्रारम्भ होता है, फिर नाडी की गति कम होते होते मृत्यु हो सकती है। (१) हृदय की अकार्यक्षमता के कारण उत्पन्न जलोदर में पुनर्नवा, अपामार्ग, चिरायता एवं सोंठ के साथ इसका काथ बहुत लाभकर होता है। हृदय पर इसकी क्रिया डिजिटैलिस के समान होती है। इससे हृदय को बल मिलता है एवं नाडी की गति मंद होकर नाडी बलवान् होती है और जलोदर दूर होता है। (२) वेदनायुक्त ज्वर जैसे फुफ्फुस पाक, तीव्र सन्धि शोथ एवं प्रसूतिज्वर आदि में इसके प्रयोग से लाभ होता है। इन रोगों में इसकी क्रिया वत्सनाभ के समान होती है। (३) इसके काथ से व्रण प्रक्षालन करने से व्रणपीडा दूर होती है। यह स्थानिक वेदना- हर भी है। मात्रा— चूर्ण ४-८ र०।
अथ किरातस्य (चिरायता) नामगुणानाह किराततिक्तः कैरातः कटुतिक्तः किरातकः ॥ १५३ ॥ काण्डतिक्तोऽनार्यतिक्तो भूनिम्बो रामसेनकः ॥ किरातकोऽन्यो नेपालः सोऽर्द्धतिक्तो ज्वरान्तकः ॥ १५४ ॥ किरातः सारको रूक्षः शीतलस्तिक्तको लघुः । सन्निपातज्वरश्वासकफपित्तास्रदाहन्नुत् । कासशोथतृषाकुष्ठज्वरव्रणकृमिप्रणुत् ॥ १५५ ॥
हरीतक्यादिवर्गः ७३ चिरायता के नाम तथा गुण— किराततिक्त, कैरात, कटुतिक्त, किरातक, काण्डतिक्त, अनार्यतिक्त भूनिम्ब और रामसेनक ये सब चिरायता के नाम हैं। नेपाल देश में एक प्रकार की चिरायता उत्पन्न होती है जो कि इसकी अपेक्षा आधा तिक्तरसयुक्त होती है। अत एव उसे 'अर्धतिक्त' कहते हैं। वह ज्वरनाशक होती है। चिरायता—सारक (दस्तावर), रूक्ष, शीतल, तिक्तरसयुक्त एवं लघु होती है एवं सन्निपातज्वर, श्वास, कफ, पित्त, रक्तदोष, दाह, कास, शोथ, प्यास, कुष्ठ, ज्वर, व्रण और कृमि इन सबों को दूर करती है ॥ १५३-१५५ ॥
४७ किरात (चिरायता) हि०— चिरायता, चिरेता, चिरैता, चिराइता । ब०— चिराता, चिरेता । म०— काडेचिराईत, चिराइता । गु०— करियातुं । क०— नेलबेवु । ते०— नीलवेमु । ता०— निलस्वेम्बु । फा०— नोनिहाद, मोनिहादन्दी । अ०— कसबुज्जैरीरा, कश्बुक्षझारिरा, कसबुलू रायरह । अं०— Chireta । चिरैटा )। लै०— Swertia Chirata ( Buch-Ham ) । (स्वशिया चिरांटा) Fam. Gentiana eae (जेन्शियानेसी)। चिरायता हिमालय पहाड़ के गरम प्रान्तों में काश्मीर से भूटान तक और खासिया के पहाड़ पर उत्पन्न होता है। प्रायः पृथ्वी के सब देशों में १८० प्रकार का चिरायता पाया जाता है, इनमें हमारे देश में ३७ प्रकार का होने का अनुभव किया गया है। जिस चिरायते को हम लोग व्यवहार में लाते हैं और जिसका ऊपर उल्लेख किया गया है, वह हिमालय पहाड़ के लगभग ४ हजार से १० हजार फीट ऊँची चोटियों पर तथा खासिया के पहाड़ पर ४ हजार से ५ हजार फीट की ऊँची चोटियों पर उत्पन्न होता है। इसका वर्षायु क्षुप-दो फीट से ५ फीट तक ऊँचा होता है। कांड—नारंगी कालासा या जामुनी, मूल की तरफ गोल, मोटा, ऊपर बहुशाखा युक्त तथा चौपहल; पत्र—चौड़े भालाकार, ४ x १.५ इञ्च, चिकने, नोकदार, ३ से ७ शिराओं से युक्त, विपरीत; दलपत्र—हरित पीत, परंतु बैगनी रंग की छाया भी हो सकती है। प्रत्येक विच्छेद पर दो दो हरिताभ और रोमश ग्रन्थियाँ होती हैं। फूलने पर इसमें डोंडी लगती है जिनमें बहुत बारीक बीज निकलते हैं। पुष्पित होने पर सम्पूर्ण क्षुप को उखाड़ कर सुखाकर बेचते हैं जिसका औषधि में व्यवहार होता है। यह अत्यन्त कडवा होता है। रासायनिक संगठन— इसमें चिरातिन् (Chiratin, $C_{52} H_{96} O_{30}$) और ओफेलिक् एसिड ( Ophelic acid, $C_{26} H_{40} O_{20}$ ) नामक दो कडुवे द्रव्य १.४२-१.५२% रहते हैं। इनमें पहला हलके पीले रंग का पदार्थ है एवं दूसरा भी हल्के पीले बादामी रंग का, आर्द्र, चासनी की तरह पदार्थ होता है जो जल तथा मद्यसार में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त इसमें यवक्षार, चूना, राल एवं ओलिक् (Oleic), पामिटिक् (Palmitic) और स्टियरिक् अम्ल (Stearic acids) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग— चिरायता दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ज्वरहर, दाहप्रशमन, पित्तविरेचक एवं कृमिघ्न है। जेन्शियन की तरह ही यह लाभदायक है। इसके प्रयोग से भूख बढ़ती है, पाखाना साफ होता है तथा पुराने ज्वर में लाभ होता है। इसका उपयोग स्वतन्त्र की अपेक्षा अन्य औष- धियों के साथ अधिक किया जाता है।
७४ भावप्रकाश निघण्टुः इसका प्रयोग ज्वर, विषमज्वर, दाह, अग्निमान्द्य, शैथिल्यप्रधान कुपचन, आध्मान, अम्लपित्त, यकृत विकार, कामला, पांडु, श्वास, शोथ, गण्डमाला तथा कृमिरोग एवं व्रण में किया जाता है। (१) पुराने ज्वर में जब अग्निमांद्य तथा शरीर में दाह रहता है तब इसके फांट या चूर्ण से लाभ होता है। सुदर्शन चूर्ण, जिसमें इसकी आधी मात्रा रहती है, बहुत व्यवहार में आता है। (२) रोग संनिवृत्तावस्था में पाचन सुधारने के लिए तथा अग्निवृद्धि के लिए बल्य औषधि के रूप में इसके फाण्ट का व्यवहार लौंग दालचीनी आदि सुगन्धि औषधियों के साथ किया जाता है। (३) हिचकी, गर्भिणीवमन एवं मद्यपान करने वालों में यदि वमन हो तो इसके चूर्ण या क्वाथ का प्रयोग मधु या शर्करा मिलाकर करते हैं। (४) वातरक्त में बल्य औषधि की तरह इसका प्रयोग किया जाता है। (५) उष्ण कटिबन्धज यकृत् विकारों में धनियां तथा चिरायते का क्वाथ मधु के साथ देने से लाभ होता है। (६) भूनिम्बादि चूर्ण जिसमें चिरायता, कुटकी, त्रिकटु, मुस्तक, इन्द्रयव, कुरैया की छाल एवं चित्रक आदि पदार्थ रहते हैं, उसका व्यवहार कुपचन, संग्रहणी, ज्वर तथा कृमिरोग में किया जाता है। (७) सुदर्शन चूर्ण तथा टङ्कण क्षार का दो तीन बार बाह्य प्रयोग करने से 'अजगल्लिका' (Impetigo contagiosa) नामक फुन्सियों में पारद मलहम की अपेक्षा अधिक लाभ होता है। (८) जीर्णज्वर में पांडु तथा कृशता होने पर किरातादि तैल से अभ्यङ्ग कराया जाता है। मात्रा-चूर्ण ४-१५ रत्ती। प्रतिनिधि-ये सभी जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं। (१) S. purpurascens Wall. (स्व० परव्यूरासेन्स्) - यह पश्चिमोत्तर हिमालय के गरम प्रान्तों में काश्मीर से कुमाऊँ तक प्राप्त होता है। कांड छोटे; शाखायें फैली हुई; पत्र आयताकार वा भालाकार, १/२ x ७ इञ्च; दलपत्र हल्के सुखों लिये बैंगनी रंग के और उनके आधार पर एक कालाचक्र, विच्छेद बाहर की ओर मुड़े हुये और एक एक ग्रन्थि से युक्त होते हैं। (२) S. decussata Nimmo ex Grah. (स्व० डिकैसेटा) - म०-सिलाजित, महा- बलेश्वर-कडू, द०-कवि। इसका छोटा क्षुप दक्षिण के पश्चिमी भागों में होता है। कांड चौपहल; पुष्प श्वेत। इसके टुकड़े २ इञ्च लम्बे एवं हंस के पंख के इतने मोटे होते हैं। ये महाबलेश्वर में बिकते हैं। स्वाद अत्यन्त कडुवा। गुण करू (जै. कुर्रों) की तरह। (३) S. chinensis Franchet (स्व० चाइनेन्सिस) - जापानी चिरायता का क्षुप छोटा एवं ४-१४ इञ्च ऊँचा होता है। कांड बहुत बारीक। यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा अधिक कडुवा होता है। (४) S. paniculata Wall. (स्व० पॅनिक्युलॅटा) बं०-कड़वी। (५) S. perennis Linn. (स्व० पेरेन्निस) (६) S. corymbosa Wight (स्व० कोरिम्बोसा) (७) S. affinis Clarke (स्व० अफिनिस्) (८) Exacum bicolor Roxb. (एक्सकिक्म बाइकलर) - हि० बड़ा चिरायता।
हरीतक्यादिवर्गः ७५ इसका क्षुप दक्षिण में कोंकण में बरसात के दिनों में उत्पन्न होता है। पुष्प श्वेत और सुन्दर । दलपत्रों के अन्तिम हिस्से जरा नीले से रहते हैं। गुण-पौष्टिक, अग्निवर्धक एवं करू की तरह । (९) E. tetragonum Roxb. (ए. टेट्रागोनम्) - हि०-तितखन, म०- ऊदकिराईत । इसका वर्षांयु क्षुप उत्तर हिन्दुस्तान के पहाड़ी प्रदेश एवं हिमालय पर उत्पन्न होता है। यह एक हाथ ऊँचा, कांड चौपहल; पत्र-विपरीत, विनाल, शल्याकृति लेकिन कुछ चौड़े, एक अङ्गुल लम्बे और ५ शिरायुक्त; पुष्प नीले। गुण-दीपन एवं कडुवापौष्टिक । इसका प्रयोग जीर्णज्वर तथा कुपचन में किया जाता है। (१०) Erythraea roxburghii G. Don (एरित्रिआ रॉक्सबर्गाय) । ब०-गिर्मि । म०-लन्तक । इसका छोटा सा क्षुप कोंकण में बरसात के बाद उत्पन्न होता है। पुष्प सुन्दर, गुलाबी एवं सितारों के समान । स्वाद कडुवा । गुण-इसको कडुनाई भी कहते हैं तथा पौष्टिक कडुवी औषधि की तरह बङ्गाल में व्यवहार में आती है। कुपचन तथा ज्वर में इसका प्रयोग किया जाता है। (११) Enicostemma littorale Blume (एनिकोस्टेमा लिटोरेल) - हि०, म०-छोटा चिरायता, गु०-मामिज्वा; ते०-नेलगाल्लि । इसका छोटा क्षुप सभी जगह किन्तु समुद्र के किनारे तथा तर जमीन में अधिक होता है। यह बंगाल में नहीं होता। गुजरात तथा उत्तरी कोंकण में बहुत होता है। इसका क्षुप एक बित्ता ऊँचा एवं बहुत शाखायुक्त होता है। कांड सीधा, चौपहल एवं मूल से ऊपर तक पत्र युक्त। पत्र विपरीत, विनाल, शल्याकृति, सनाय वा इमली की तरह एवं ३ शिरायुक्त । पुष्प श्वेत, छोटे, विनाल, प्रत्येक कोण में २, ३ । फल गोल फली । स्वाद अत्यन्त कडुवा। इसके पञ्चांग का व्यवहार गुजरात तथा मद्रास में अधिक किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह दीपन, पाचन, वातानुलोमक, आनुलोमिक एवं तिक्त पौष्टिक है। इसको रत्ती दो रत्ती मात्रा में कुपचन में देते हैं। व्यामिश्रण-इनमें से प्रथम दो जेन्शियानेसी (Gentianaceae) वर्ग के हैं। (१) S. angustifolia Buch.-Ham. (स्व० ॲगस्टिफोलिया) - इसका कांड चौपहल एवं पंखयुक्त होता है। यह स्वाद में चिरायते की अपेक्षा कम कड़ु होता है एवं इसमें पिथ कोष (Pith cells) बहुत ही अल्प रहते हैं। (२) S. alata Royle ex D. Don (स्व० अॅलाट) - यह बिलकुल कडुवा नहीं होता। इसमें पिथ (Pith) पूर्ण संवर्धित रहता है। चिरायता इससे अधिक गहरे रंग का, स्वाद में अत्यन्त कडुवा और इसका पिथ (Pith) संतत (Continuous) रहता है। (३) Rubia cordifolia Linn. (रूबिया कॉर्डिफोलिया) (Fam. - Rubiaceae-रूबि- एसी) - इसकी पहचान इसके बैंगनी (Purple) रंग से हो जाती है। (४) Andrographis paniculata Nees (Fam. Acanthaceae-अॅकेंथेन्सी) (अंड्रो- ग्राफिस् पॅनिक्युलेँटा) - हि० कालमेघ। इसके कांड हरे, अनेक सीधी, पतली विपरीत शाखाएं एवं पत्र भालाकार और हरे होते हैं जिससे इसका भेद किया जा सकता है। देशी चिरायता के नाम से यह बजार में बिकता है।
७६ भावप्रकाशनिघण्टुः अथेन्द्रयवस्य नामगुणानाह उक्तं कुटजबीजं तु यवमिन्द्रयवं तथा । कलिङ्गं चापि कालिङ्गं तथा भद्रयवा अपि ॥ १५६ ॥ इन्द्रयव के नाम तथा गुण—कुटज (कुडा या कुरैया) के बीज को इन्द्रयव कहते हैं उसके नाम—कुटजबीज, यव, इन्द्रयव, कलिङ्ग, लिङ्गका और भद्रयव ये सब हैं ॥ १५६ ॥ ॐइति क्लीबेऽमरोप्याह ॥ १५६ ॥ 'अमरसिंहने 'अमरकोश' में इन्द्रयव को नपुंसकलिङ्ग कहा है ॥ १५६ ॥ क्वचिदिन्द्रस्य नामैव भवेत्तदभिधायकम् । फलानीन्द्रयवास्तस्य तथा भद्रयवा अपि ॥१५७॥ कहीं पर इन्द्र के जो नाम हैं वे ही इन्द्रयव के भी समझे जाते हैं और कुरैया के फल का इन्द्रयव तथा भद्रयव नाम है ॥ १५७ ॥ ॐइति धन्वन्तरिः प्राह ॥ १५७ ॥ यहां पर यह और समझना चाहिये कि यह वचन 'धन्वन्तरि' भगवान् का है, इससे इन्द्रयव का पुंल्लिङ्ग में भी प्रयोग होता है ॥ १५७ ॥ इन्द्रयवं त्रिदोषघ्नं संग्राहि कटु शीतलम् ॥ १५८ ॥ ज्वरातीसाररक्ताशविमवीसर्पकुष्ठनुत् । दीपनं गुदकीलाऽस्रवातास्रश्लेष्मशूलजित् ॥ १५९ ॥ इन्द्रजव त्रिदोषनाशक, संग्राही, कटु रस युक्त और शीतल है। यह ज्वर, अतीसार, खूनी बवासीर, वमन, वीसर्प एवं कुष्ठ को दूर करने वाला, अग्निदीपक एवं गुदकील, रक्तदोष, वातरक्त, कफ तथा शूल को दूर करता है ॥ १५८-१५९ ॥ ४८ इन्द्रयव हि०-इन्द्रजव, कड़वा इन्द्रजव । गु०-इन्दर जब, इन्द्र जब । म०-कुट्याचे बी । ले०- Holarrhena antidysenterica Wall. (हॉलेहीना एन्टिडिसेन्टेरिका) । Fam. Apocy- naceae (एपोसइनेसी) । कुड़ा वृक्ष की फलियों के बीज को 'इन्द्रजव' कहते हैं। यह देखने में जई के आकार का होता है। इन्द्रजव कड़वा और इन्द्रजव मीठा इन भेदों से यह दो प्रकार का होता है। मीठा या कम कड़वा इन्द्रजव, कुटज भेद, राइटिया टिन्क्टोरिया (Wrightia tinctoria R. Br.) के बीज को कहते हैं जो कम गुण वाला होता है। इनका शेष परिचय कुटज वृक्ष के प्रकरण में दिया जायगा। गुण और प्रयोग—यह कडुवा, दीपन, संग्राही, ज्वरहर, कृमिघ्न, वातानुलोमक, वृष्य, बल्य एवं रक्तसंग्राहक है। इसका प्रयोग रक्तातिसार, ज्वरातिसार, शीतज्वर, रक्तार्श, संग्रहणी, प्रवाहिका, पथरी तथा श्वास एवं पुराने फुफ्फुस विकारों में किया जाता है। इसको भूनकर फांट, क्वाथ या चूर्ण के रूप में दिया जाता है। (१) बच्चों के रक्तातिसार में कड़वा इन्द्रजव एवं नागरमोथा के क्वाथ में मधु मिलाकर दिया जाता है। (२) रक्तार्श में सोंठ के साथ इसके क्वाथ को देने से लाभ होता है। इसको दूध के साथ क्वाथ करके देने से इसमें बहुत लाभ होता है।
हरीतक्यादिवर्गः । ७७ (३) कुपचन, उदरशूल एवं अग्निमान्द्य आदि के लिये इसके चूर्ण को अल्प मात्रा में नित्य लेने से लाभ होता है। वमन में इसको भूनकर या फांट या क्वाथ बनाकर देना चाहिये। (४) पुराने फुफ्फुस के विकार तथा दमा में इसका व्यवहार किया जाता है। (५) पाथयििकज्वर तथा शीतज्वर में इसको गुडूच के साथ क्वाथ बनाकर देना चाहिये। नित्य इन्द्रजव का चूर्ण खाते रहने से शीतज्वर नहीं आता। (६) पूयदन्त (Pyorrhoea) में मसूढ़ों पर इसके चूर्ण को मलने से रक्तस्त्राव कम होता है तथा पूय एवं दुर्गन्धि दूर होती है। मात्रा—चूर्ण १-४ माशा भूनकर या ३-३ तो० क्वाथ बनाकर। मीठा इन्द्रयव बलवर्धक है तथा धातुपौष्टिक के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। अथ मदनस्य ( मैनफल ) नामगुणानाह मदनश्छर्द्दनः पिण्डो नटः¹ पिण्डीतकस्तथा । करहाटो मरुबकः शल्यको विषपुष्पकः ॥ १६०॥ मदनो मधुरस्तिक्तो वीर्योष्णो लेखन्यो लघुः । वान्तिहृद्विद्रधिहरः प्रतिश्यायव्रणान्तकः ॥ रूक्षः कुष्ठकफानाहशोथगुल्मव्रणापहः ॥ १६१ ॥ मैनफल के नाम तथा गुण—मदन, छर्दन, पिण्ड, नट, पिण्डीतक, करहाट, मरुवक, शल्यक तथा विषपुष्पक ये सब मैनफल के नाम हैं। मैनफल—मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, उष्णवीर्य, लेखन, लघु, वमनकारक, विद्रधिरोग को दूर करने वाला, प्रतिश्याय (जुकाम) और व्रणका नाशक, रूक्ष एवं कुष्ठ, कफ, आनाह, शोथ, गुल्म तथा क्षत को दूर करने वाला होता है ॥ १६०-१६१ ॥ ४९ मदन (मैनफल ) हि०-मैनफल, मयनफल । ब०-मैनफल, मयना कांटार गाछ । म०-गेल, गेलफल । गु०- मींडोल, मींढळ । क०-मंगरर्कि । ते०-बसन्त कड़िमि चेट्टु, मण्डचेट्टु, मंगचेट्टु । सा०-मर- कलम्, पुगारै, । ने०-मैदल । फा०-झुझ-उल्-कुच् । अ०-जौजुल कौसल । अं०-Emetic Nut (एमेटिक नट्), Bushy Gardenia (बुशी गार्डैनिया) । ले०-Randia dumetorum Lam. (रैंडिया डयुमेटोरम् ) । Fam. Rubiaceae (रुबियेसी) । यह हिमालय के साधारण प्रदेश में जम्मू से पूरब की ओर सिक्कम तथा दक्षिण की ओर चट्टगांव, खासिया पहाड़, सिलहट आदि प्रान्तों में पाया जाता है। इसका वृक्ष—१-२॥ इञ्च लम्बे लम्बे मजबूत पत्र कोणीय कांटों से भरा हुआ छोटे कद का होता है। छाल-भूरे रङ्ग की, लकड़ी-सफेद या भूरे रङ्ग की होती है। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे ऊपर से लट्त्वाकार और नीचे की ओर क्रमशः पतले होकर पंखयुक्त पत्रनाल में परिवर्तित होते हैं और प्रायः दलबद्ध होकर रहते हैं। फूल-पांच पंखड़ों वाले किञ्चित् हरिताभ, सफेद और सुगन्धयुक्त होते हैं। फल-जङ्गली अञ्जीर, सुपारी या अखरोट के आकार के होते हैं और पकने पर पीले पड़ जाते हैं। बीज-दीहीदाने के समान होते हैं। इन्हीं फलों को मैनफल कहते हैं। रासायनिक संगठन—इसके फल में संपोनिन् (Saponin) तथा व्हॅलेरियानिक एसिड (Valerianic acid), मोम, राल एवं रंजक पदार्थ आदि पाये जाते हैं। १. 'राठः' इति पाठा० ।
७८ भावप्रकाशनिघण्टुः । गुण और प्रयोग— मैनफल बहुत अच्छा वमन द्रव्य माना गया है। प्राचीन शास्त्रकारों ने इसके बीजों को एक विशेष प्रकार से संग्रह कर व्यवहार करने को लिखा है। नये ग्रन्थकार इसके बीज वा फल की छाल को वामक नहीं मानते लेकिन इसके गूदे (Pulp) को वामक मानते हैं। डा० देसाई प्राचीन मत से सहमत हैं। कुछ भी हो सम्पूर्ण फल वामक अवश्य है। कुछ विद्वान् इसको इपीकाक् का अच्छा प्रतिनिधि बतलाते हैं। इसका उपयोग गर्भपात कराने के लिये किया जाता है तथा यह मछलियों के लिये विषैला है। (१) एक फल कूट कर २५ तो० जल में १ घंटा भिगोकर रखना चाहिये। फिर पत्थर के खरल में घोंटकर, कपड़े से छान कर, उसमें थोड़ा मधु तथा पीपर मिलाकर खाली पेट पिलाने से १ घण्टे बाद १-२ साफ वमन हो जाता हैं और कभी कभी बाद में विरेचन भी होता है। इस वामक प्रयोग को हृष्ट-पुष्ट मनुष्य में व्यवहार में लाना चाहिये। (२) इसके २-३ फलों के गूदे को कूट कर ½ पाव जल में १०-१५ मिनट मसल कर छानकर प्रयोग किया जाय तो प्रायः १० मिनट में हल्लास और वमन शुरू हो जाता है। इसको देने के बाद उष्ण जल पिलाने से और भी वमन होता है। या केवल १ फल का गूदा भी पर्याप्त हो सकता है। (३) इसके गूदे को सुखाकर रख सकते हैं तथा १ से ४ माशे तक वामक औषधि के रूप में या २-३-५ र० कफनिःसारक एवं स्वेदल औषधि के रूप में व्यवहार में ला सकते हैं। (४) मुलेठी मन्दार एवं मैनफल का चूर्ण २-७ र० देने से श्वास तथा खाँसी में लाभ होता हैं एवं अधिक मात्रा में (१०-३० र०) अजीर्ण, शूल, शिरःशूल और अण्डकोष शोथ में वमन कराने के लिये देते हैं। (५) अन्य सुगन्धि औषधियों के साथ रक्तातिसार, पर्यायिक ज्वर एवं शिरःशूल में इसके गूदे को देते हैं। अतिसार में १ से २ माशा गूदा दिया जाता है। यह इपीकाक का अच्छा प्रति- निधि है। (६) इसके गूदे का टिंक्चर १५-६० बूंद कुकास एवं पागलपन में तथा उद्वेष्टन निरोधि एवं शामक औषधि के रूप में व्यवहार में लाया जाता है। (७) इसका फलत्वक् एवं बीज विरेचक एवं कृमिघ्न हैं एवं बच्चों में पित्तमयता तथा कृमि दूर करने के लिये व्यवहार में आता है। (८) इसके वृक्ष की छाल का बाह्य लेप शोथहर एवं वेदनाहर है एवं आमवात, फोड़े तथा चोट एवं हड्डियों की पीड़ा पर लगाया जाता है। अतिसार, संग्रहणी, ज्वर तथा आमवात में इस वृक्ष की छाल का आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। कांजी के साथ इसके फल को पीस कर नाभि के चारों तरफ लगाने से उदरशूल दूर होता है। मुखदूषिका (acne) एवं फोड़े आदि में इसके फल के लेप से लाभ होता है। (९) बच्चों में दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर इसके गूदे के चूर्ण को तालू तथा मसूड़ों पर रगड़ते हैं। (१०) वन्ध्यत्व दूर करने के लिये ६ माशा इसके बीज के चूर्ण को दूध, शक्कर वा केशर के साथ खिलाना चाहिये तथा ८, १० रत्ती चूर्ण की गुड़ के साथ बत्ती बनाकर योनि में धारण करानी चाहिये। इस प्रयोग से गर्भाशय शोथ आदि विकार दूर होकर कष्टार्तव एवं अनियमितात्तंव आदि में भी लाभ होता है।
हरीतक्यादिवर्गः । ७९ (११) सर्पविष में यह औषधि लाभदायक है। इसके मूल को बैल के मूत्र में पीसकर अंजन कराया जाता हैं तथा शुष्क मज्जा का आन्तरिक प्रयोग (५-१५ र०) करते हैं। मात्रा— वामक-१ फल का हिम। गूदे का चूर्ण १-४ माशा। अन्य गुणों के लिये २-४ रत्ती।
अथ रास्नाया नामगुणानाह
रास्ना युक्तरसा रस्र्या सुवहा रसना रसा। एलापर्णी च सुरसा सुगन्धा श्रेयसी तथा ॥१६२॥ रास्नाऽऽमपाचिनी तिक्ता गुरुष्णा कफवातजित् ॥ १६३ ॥ शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा। कासज्वरविषाशीतिवातिकामयसिद्धहृत् ॥ १६४ ॥ रास्ना के नाम तथा गुण— रास्ना, युक्तरसा, रस्र्या सुवहा, रसना, रसा, एलापर्णी, सुरसा, सुगन्धा तथा श्रेयसी ये सब रास्ना के नाम हैं। रास्ना— आम को पचाने वाली, तिक्तरस युक्त, गुरु, उष्णवीर्य और कफ वात नाशक है तथा शोथ, श्वास, वातरक्त, वातशूल, उदर रोग, कास, ज्वर, विष, अस्सी (८०) प्रकार के वात रोग तथा सिध्म इन सब को दूर करती है ॥१६३-१६४॥
५० रास्ना
आज कल वैद्य समाज में रास्ना एक अप्राप्तव्य औषधि मानी जा रही है। वात विकारों के लिये आयुर्वेद में इसका प्रयोग रास्नादि, महारास्नादि क्वाथ के रूप में बहुत किया जाता है। भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न भिन्न औषधि रास्ना नाम से ली जाती है। प्राचीन ग्रन्थों में इसके परिचय में निम्न श्लोक प्राप्त होते हैं। रास्ना तु त्रिविधा प्रोक्ता मूले पत्रं तृणं तथा। द्वयो मूलदलौ श्रेष्ठौ तृणरास्ना तु मध्यमा ॥ (रा. नि.) अथ रास्ना भृङ्गपत्रा पाषाणादौ प्रजायते। गिरौ च लघु-रास्ना स्यात् ततो हीनगुणा स्मृता ॥ सुगन्धमूला, एलापर्णी ॥ (शिवदत्तः) नीचे रास्ना नाम से ली जाने वाली विभिन्न वनस्पतियों का वर्णन अलग २ किया गया है। (१) Pluchea lanceolata Oliver & Hiern (प्लूचिया लैन्सिओलेटा)। Fam-Compo- sitae (काम्पोज़िटी)। हि०- रायसन, रोशना, वायसुरई। पं०- रासनं। सिन्ध०- कौरसन। रा० पु०- छोटा कलिया। अलीगढ़- वनतेरई, वनसोरई, वायसुरई। आगरा- छोटी कलिया। कानपुर- सुरई, सोरहि। बिहार- रोशना, रचना, रोचना। यह अपर बंगाल, बिहार, अवध, कानपुर और पश्चिम की ओर पञ्जाब तथा सिन्ध तक पाई जाती है। पत्तों का आकार रास्ता अर्थात् जिह्वा के सदृश होने से इस का नाम रास्ना रखा गया है। इसी के आधार पर उत्तर प्रदेश, पश्चिमोत्तर प्रदेश आदि जगहों के अधिकांश वैद्य वाय- सुरई को ही 'रास्ना' मानते हैं। बिहार के ग्रामीण इसको 'रचना' और 'रोचना' के नाम से पुकारते हैं। मालूम होता है कि—रचना शब्द रसना का अपभ्रंश है। बिहार के अधिकांश वैद्य भी इसको उपयोग में लाते हैं। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी इसी को उपयोग में लाने की सलाह देते हैं।
८२ भावप्रकाशनिघण्टुः ।
इसका क्षुप १-२ फीट ऊँचा, अनेक शाखा प्रशाखा करके झाड़दार तथा उन पर असंख्य बारीक भूरे रङ्ग के रोवें होते हैं। पत्ते-१-२ इञ्च लम्बे सनाय के पत्तों के आकार वाले किन्तु उससे बड़े होते हैं तथा सूखने पर पीलापन लिये भूरे रङ्ग के हो जाते हैं। पर्णवृन्त छोटा एवं ऐंठा हुआ होता है। पतली पतली शाखाओं के अन्त में नन्हे नन्हे बैंगनी रङ्ग के फूलों की घुण्डियां लगती हैं । गुण और प्रयोग—इसके पत्र सनाय की तरह भेदन हैं तथा सनाय के स्थान पर प्रयोग में आते हैं। (२) Inula racemosa Hook. f. (इनुला रेसिमोसा)। Fam. Compositae (कॉम्पो- झिटी)। फा०-रासन, कुष्ठ-इ-शामी । अ०-जंजबीलशमी । ईरान०-पिल् गुश् शर्ष। कश्मीर- पोष्कर । डा० देसाई अन्य शास्त्रज्ञों के साथ सहमत होते हुए रास्ना के स्थान पर इसी क्षुप के मूल को व्यवहार करने की सलाह देते हैं क्योंकि इसके गुण रास्ना से मिलते जुलते हैं। कुछ अन्य विद्वान् इनुला को पुष्करमूल मानते हैं । स्थान भेद से इसके क्षुप की ३, ४ जातियां पाई जाती हैं । यह काश्मीर तथा उत्तर-पश्चिम हिमालय में होती हैं। भारत में जहां जहां सुगन्ध कूठ होता है वहां वहां यह उत्पन्न होने से तथा उसके समान दिखलाई देने से कूठ में इसकी मिलावट की जाती है। रासन का क्षुप ५ फीट तक ऊंचा एवं दृढ होता है। पत्र-चर्मवत्, ऊपर से खुरदरे एवं नीचे से घनर्रोमश तथा दन्तुर होते हैं। आधारीय पत्र ८-१८ इञ्च x ५-८ इञ्च बड़े, दीर्घ वृत्ताकार-भालाकार एवं लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं । काण्डपत्र अंडाकार-आयताकार, अर्धकाण्डांसक्त एवं प्रायः आधार पर गहराईतक खंडित होते हैं । पुष्प-पीत वर्ण के १.५-२ इञ्च व्यास के गुच्छों में आते हैं। फल-छोटे, महीन एवं अग्र पर रकाब रोमयुक्त होते हैं। इसकी ताजी जड़ में ओरिसू एवं कर्पूर जैसी तीव्र गंध होती है जो रखने पर कम हो जाती है । रासायनिक संगठन—रासन में अल्प मात्रा में उड़नशील तैल और इनुलिन् (Inulin) होता है। तैल में एलेन्ट्रोलैक्टोन (Alantolactone, C15 H20 O2) नामक एक कृमिनाशक, कफनिःसारक एवं मूत्रल द्रव्य होता है । गुण और प्रयोग—यह पाचन, वातहर, कफहर, श्वासहर एवं गर्भाशय संकोचक है। इसका क्वाथ आधमान, उदरशूल, कुपचन, अनार्तव, कष्टार्तव, फुफ्फुस विकार जैसे दमा, जीर्ण श्वसनिका शोथ, क्षय, फुफ्फुसावरण शोथ एवं आमवात तथा अन्य वातिक रोगों में दिया जाता है। इससे ज्वर तथा सूजन कम होती है तथा वेदना दूर होती है । कण्डू आदि त्वचा के रोगों में इसके काथ को शरीर पर लगाया जाता है। मूल को गोमूत्र में रगड़ कर खुजली, दाद एवं पामा आदि पर लगाया जाता है। राजयक्ष्मा के जन्तुओं से उत्पन्न त्वचा के व्रणों में इससे लाभ होता है। जन्तुओं के विष को दूर करने के लिये इसका उपयोग करते हैं तथा इससे वेदना कम होती है। प्रतिनिधि-कूठ । (३) Vanda roxburghii R. Br. (वैण्डा रॉक्सबर्गाइ)। Fam. Orchidaceae (ओरचिडेसी)। बांदा, वंगीय रास्ना। बं०-रास्ना । संताल-दरेवंकि । क०-मरबाले । ते०- कनपचेट्टू, बदनिके, नेरदानचेट्टू ।
हरीतक्यादिवर्गः ८३
यह बंगाल, बिहार, गुजरात तथा कोंकण से त्रावनकोर तक प्राप्त होते हैं। इसके पौधे प्रायः आम और मधूक वृक्षों की डालियों पर उगे हुए पाये जाते हैं। काण्ड १-२ फीट लम्बा तथा उसकी ग्रन्थियों से अनेक मोटे और मांसल वातलम्बी (Epiphytic = एपिफाइटिक् ) मूल निकले रहते हैं। पत्तियां-६-८ इञ्च लंबी, मध्य पर्शुका पर गहरी और दो कतारों में निकली हुई रहती हैं। सदण्डिक पुष्पमंजरियां पत्तियों से लम्बी होती हैं। पुष्प व्यास में १/२-२ इञ्च और पंखड़ियां प्रायः मिश्रित वर्ण की होती हैं। वे अधिकतर पीताभ और कभी कभी नीलाभ होती हैं और उनके कुछ भागों में बदामी, बैंगनी तथा सफेद रंग भी होते हैं। फल--३-३/२ इञ्च लम्बा और सन्धियों पर रीढदार होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। बंगाल के अधिकांश कविराज इसी को उपयोग में लाते हैं। वे प्रायः वाटिकाओं में आम के वृक्षों की मोटी टहनियों के ऊपर की खरदरी छाल को पृथक् कर उस पर उक्त रासन को शोरियां युक्त बिठा रस्सी से बांध कुछ मिट्टी का अंश दे पानी से कुछ रोज सींचा करते हैं। गुण और प्रयोग-आमवातादि में इससे कुछ लाभ होता है। ज्वर में सर्वाङ्ग पर इसके पत्तों का लेप किया जाता है। कर्णस्राव में इसके पत्तों का रस कान में डालते हैं। अनेक वात- विकारों तथा आमवातादि में बाह्य प्रयोग के लिये इससे बने तेल का उपयोग किया जाता है। यह फिरङ्ग की द्वितीयावस्था तथा वृश्चिक दंश पर लाभदायक है। (४) Saccolabium papillosum Lindl. (सँक्कोलेबिअम् पॅपिल्लोसम्)। Fam Orchi- daceae (ऑरचिडेसी)। क०-मरबाले । म०-कानभेर । इसके बांदे भी आम्रवृक्ष के ऊपर होने वाले बूंदों की तरह दिखलाई देते हैं । गुण और प्रयोग-यह तिक्त पौष्टिक है तथा इसका आमवातादि में प्रयोग होता है। केले के पत्तों में इसके पत्ते लपेटकर पुटपाक करके उसके रस को मधु के साथ कर्णपिटिका के लिये कान में डालते हैं जिससे कर्णपीड़ा दूर होती है। (५) Tylophora asthmatica W. & A. (टाइलोफोरा एस्थमेटिका) । Fam. Asclepi- adaceae एस्क्लेपिण्डेसी )। हि०-अंतमूल, जंगली पिकंवन । ब०-अन्तोमूल । म०-पितकारी, खडकी रास्ना । ता०- नायपाले । ते०-वेरिपल । मळ०-वल्लीपाल । क०-किरूमंजी । उडि०-मैंडी । सं०-मूलिनी, मूल- रास्ना, पित्तवल्ली, आन्त्रपाचक । इसकी लता उत्तरी बंगाल, आसाम, कछार, उड़ीसा, कोंकण, दक्षिणी भारत, कनारा, मद्रास प्रान्त एवं पूर्व पाकिस्तान, बर्मा, मलाक्का द्वीप तथा लंका आदि स्थानों पर पायी जाती है। यह रेतीली भूमि पर अधिक होती है ! बंबई के बाजार में रास्ना के नाम से इसके मूल भी बिकते हैं। इसकी बहुवर्षायु लता होती है। पत्र-२ से ५ इञ्च लम्बे, १ से २ इञ्च चौड़े, लट्वाकार या अंडाकार, तीक्ष्णाग्र वा लम्बाग्र, आधार पर तांबूलाकार, अखण्ड, सनाल, ऊपरी पृष्ठ चिकना, अधो- पृष्ठ रोमश भूरे रंग का, ताजी अवस्था में स्वाद एवं गंध ह्यल्लासकर एवं सूखने पर गन्धहीन एवं रुचिहीन । पुष्प-बहुत, छोटे, हलके पीले रंग के, अन्दर से बैंगनी एवं गुच्छों में । फल-(Follicle) -२ से ४ इञ्च लंबा अग्र की तरफ नुकीला होता जाता है। मूल-बहुत लम्बे, मांसल, अनेक, बारीक, हलके पीले या मटमैले तन्तुयुक्त, अन्दर से हलके पीले रंग के, आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन, स्वाद प्रारंभ में मीठा लेकिन बाद में कडु । इसकी लता ईश्वरमूल की तरह दिखलाई देती है लेकिन उसके पत्र के दोनों पृष्ठ हरे और चिकने तथा पुष्प बड़े होते हैं। इसके मूल तथा पत्र का व्यवहार किया जाता है जिनमें पत्र अधिक गुणकारी है। ६ भा० नि०
रासायनिक संगठन--इसमें टाइलोफोराइन (Tylophorine, C24 H27 O4 N), टाइलो- फोरिनाइन् (Tylophorinine, C23 H27 O4 N, 0.5 H2 O), ये दो रवेदार क्षाराम, एक उडनशील तैल ०.२६%, एक रंगहीन रवेदार अन्य पदार्थ ०.१८%, खनिज (Mineral matter) १५% तथा एक वामक द्रव्य आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग--इसके मूल तथा पत्र अच्छे वामक, कफनिःसारक, स्वेदल, रक्तशोधक, आनुलोमिक एवं आमपाचक हैं। यह एपीकैक के अच्छे प्रतिनिधि हैं। अल्प मात्रा में इससे खांसी दमा, बच्चों की कुक्कुर खांसी, अतिसार एवं संग्रहणी आदि में बहुत लाभ होता है। अधिक मात्रा में यह वामक तथा अधिक बार प्रयोग से वमन के साथ विरेचन भी होता है। (१) यह १ मा० की मात्रा में चूर्ण के रूप में अतिसार, रक्तातिसार एवं संग्रहणी आदि में देने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ सोंठ, गोंद या अल्प मात्रा में अफ़ीम मिलाई जा सकती है। (२) कफ विकारों में इसके चूर्ण को घोडवच एवं मुलेठी आदि के साथ देने से लाभ होता है। (३) प्रसूति के बाद स्रावशुद्धि के लिए इसका उपयोग करते हैं। (४) अजीर्ण आदि में वमन कराने के लिये ४ इञ्च लंबी ताजी जड़ की छाल जल में घिस कर देने से वमन होता है या १-२ माशा पत्र चूर्ण जल के साथ दिया जाता है। (५) इसको रसायन तथा रक्तशोधक मानते हैं एवं आमवात, फिरंगज आमवाताभ विकृति, सन्निपात, शरीरपीड़ा एवं सर्पदंश आदि में इसका उपयोग करते हैं। (६) वातरक्त में इसके मूल का बाह्यलेप किया जाता है। मात्रा-३-१० र०; वामक १-२ मा०। इन उपर्युक्त वनस्पतियों के अतिरिक्त मद्रास की तरफ कुलिञ्जन का व्यवहार रास्ना के नाम से कुछ लोग करते हैं तथा धवलबरुआ और सर्पाक्षी-ले० ओफिओराइज्झा मुन्गोस् (Ophiorr- hiza mungos Linn.) एवं अन्य अनेक औषधियां भी रास्ना नाम से ली जाती हैं। इनमें से प्रथम ३ औषधियां अधिक प्रचलित हैं। नोटः-सर्पाक्षी का वर्णन गुडूच्यादि वर्ग तथा धवलबरुआ का वर्णन नाकुली में किया गया है।
अथ (रास्नाभेदः) नाकुली नामगुणानाह नाकुली सुरसा नागसुगन्धा गन्धनाकुली । नकुलेष्टा भुजङ्गाक्षी सर्पाक्षी विषनाशिनी ॥ नाकुली तुवरा तिक्ता कटूकोष्णा विनाशयेत् । भोगिलूतावृश्चिकाखुविषज्वरकृमिव्रणान् ॥ नाकुलीकन्द के नाम तथा गुण-नाकुली, सुरसा, नागसुगन्धा, गन्धनाकुली, नकुलेष्टा, भुजङ्गाक्षी, सर्पाक्षी तथा विषनाशिनी ये सब नाम 'नाकुलीकन्द' के हैं। नाकुलीकन्द-कषाय, तिक्त एवं कटरसयुक्त तथा उष्णवीर्य होता है। और सर्प, मकड़ी, बिच्छू तथा मूसा इन सबों के विषको दूर करने वाला एवं ज्वर, कृमि तथा व्रण को भी नष्ट करने वाला होता है ॥ १६५-१६६ ॥
५१ नाकुली (धवलबरुआ, सर्पगन्धा) हि०-नकुलकन्द, नाकुलीकन्द, नाई, हरकाई चन्द्रा, रास्नाभेद, छोटाचांद । उड़ीसा, बिहार- धनेंदना, धनबरुआ, धवलबरुआ, सनोचांडो । बं०-नाकुली, गन्धरास्ना, चन्द्र । म०-अडकई, चन्द्र । ०-नोलवेल, अमेलपोदी । क०-सूत्रनाभि । ते०-पातालभगंधि । मा०-हरकय । मलयां०-चुवन्ना अविलपोरी । फा०-छोटाचान्दा । ले०-Rauwolfia serpentina Benth. ex Kurz- (रॉवोल्फिया सर्पेन्टाइना) । Fam. Apocynaceae (एपोसइनेसी) । वैद्य समाज में नकुलकन्द भी एक सन्दिग्ध वनौषधि है। कुछ लोगों ने नाकुली को ले०-एरिस्टोलोकिया इण्डिका (Aristolochia indica Linn.), ईश्वरमूल लिखा है तथा श्री ठा० बलवन्त सिंह जी भी उनसे सहमत होते हुए सर्पगन्धा नाम भी उसी के (नाकुली) लिये तथा धवलबरुआ के लिए राजनिघण्टु का जम्बू नाम उचित समझते हैं जिसको श्री भगीरथ स्वामी ने माना है। प्राचीन ग्रंथों में केवल सुश्रुत के अमानुषोपसर्गाध्याय में मानसरोगहर अपराजितगण में सर्पगन्धा नाम का उल्लेख मिलता है। यहां पर पहले वर्णन 'रावोल्फिया' का दिया जा रहा है जिसके बाद ईश्वरमूल का स्वतंत्र वर्णन दिया जावेगा । धवलबरुआ के क्षुप हिमालय के निचले प्रदेशों में सरहिन्द से लेकर पूर्व में आसाम तक विशेष कर देहरादून, सिवालिक पहाड़ी भाग तथा रोहिलखण्ड, उत्तरी अवध और गोरखपुर के हिमालय के निचले भाग में ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं कोंकण, उत्तरी कनारा, दक्षिणी महाराष्ट्र प्रान्त, मद्रास के पूर्वी तथा पश्चिमी घाट में ३००० फीट तक और बिहार के अनेक भाग में जैसे पटना, भागलपुर तथा उत्तरी एवं मध्य बंगाल, बर्मा, श्याम और जावा आदि स्थानों में पाये जाते हैं। इसका क्षुप छोटा, आकर्षक, १ से २ फीट ऊँचा क्वचित् ३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्र-हरे, चमकीले, ३-७ इंच लम्बे, १॥-२॥ इंच चौड़े, भालाकार या व्यस्तभालाकार, तीक्ष्णाग्र या लम्बाग्र, आधार की ओर पतले होकर ३ क्षुद्र पत्रनाल से युक्त एवं टहनी के प्रत्येक गांठ पर ३-४ के चक्री में (Whorled)। पुष्प-श्वेत या साधारण गुलाबी गुच्छों में, २-४ इञ्च लम्बे पुष्प दण्डों पर । फल-छोटे, मांसल एक या दो दो जुड़े हुये पकने पर बैगनी काले । मूल-सर्प की तरह टेढ़ा मेढ़ा, करीब १५ इञ्च तक लम्बा, ।।३ इ० मोटा, खुरदरा, कुछ कुछ झुर्रियों से युक्त, शाखाओं से युक्त और उस पर लम्बाई में धारियां रहती हैं। इसे तोड़ने पर भग्न छोटा एवं अनियमित । मूल की छाल धूसरित पीत (Greyish yellow) तथा अन्दर का काष्ठ श्वेत। स्वाद में अत्यन्त कडवा तथा गन्धहीन । इसके मूल को तोड़कर कटे भाग पर २ भाग शोरे का तेजाब (Nitric acid) और १ भाग जल मिले घोल के २ बूंद डालने से मेड्युलरी रेज् (Medullary rays) विशेष कर अन्तःचर्म (Cortex) के पास वाले भाग रंगीन हो जाते हैं। इस क्षुप के ३, ४ साल पुराने पौधे के मूल को शरदकाल में संग्रह कर छाल सहित सुखाकर व्यवहार में लाया जाता है। रासायनिक संगठन-बिहार में उत्पन्न मूल में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा ०-८-१-३% रहती है जिसमें अजमेलाइन (Ajmaline, C20H26O2N2, 3 H2O), अजर्मेलीनाइन् (Ajmaline, C20H26O3N2, 1.5 H2O), अजर्मेलीसाइन (Ajmalicine) तथा पीत वर्ण के क्षाराम सर्पेन्टाइन् (Serpentine, C20H20O3N2, 1.5 H2O), सर्पेन्टिनाइन् (Serpentinine, C20H20O2N2, 1.5 H2O) तथा बिना रवेदार (Amorphous) क्षार (Bases) रहते हैं। देहरादून से प्राप्त जड़ में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा १-१-३% तक रहती है लेकिन उसमें पीत वर्ण के क्षाराम नहीं रहते तथा इसमें अजर्मेलाइन् और अजर्मेलीनाइन् के समसंगठन (Isomeric) वाले दो क्षार द्रव्य रहते हैं। इनके अतिरिक्त उभयविध प्रतिक्रिया (Amphoteric character) वाले कुछ दूसरे भी क्षाराम होते हैं। इन क्षारामों के अतिरिक्त इसके मूल में एक तैलीय राल (Oleoresin) और सरपोस्टेरॉल (Serposterol, C30 H48O2) रहता है।
८४ भावप्रकाश निघण्टुः रसमें के अज्मैलाइन, सर्पेन्टाइन् और सर्पेन्टिनाइन् क्षाराम केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान को उत्तेजित करते हैं जिसमें से सर्पेन्टाइन् अधिक प्रभावशाली तथा विषैला है। इन ३ क्षारामों से रहित सम्पूर्ण क्षाराम तथा मद्यसारीय सत्व (Alcoholic extract) में शामक (Sedative) एवं निद्राकर (Hypnotic) गुण हैं। कुछ क्षाराम मिश्रित रूप से हृदय, रक्तवाहिनी एवं रक्तवाहिनी नियन्त्रक केन्द्र (Vaso-motor centre) के लिये अवसादक (Depressant) हैं। इसका निद्राकर (Hypnotic) प्रभाव क्षाराम की अपेक्षा प्रधानतया इसके रालीय भाग में है। इसके शामक गुणों के कारण पागलपन एवं अन्य मानसिक व्याधियों में इसके मूल का बहुत व्यवहार हो रहा है तथा इसके मद्यसारीय सत्व का उपयोग रक्तचाप (Blood pressure) को कम करने के लिये किया जा रहा है। इधर कुछ दिनों से इस औषधि के संबंध में विदेशों में विशेष अनुसन्धान किया जा रहा है और इसके कार्यकारी सत्व को रीसर्पाइन् (Reserpine) नाम दिया गया है जो मूल की अपेक्षा १ हजार गुना अधिक कार्यकारी कहा जाता है। यह नाड़ीकेन्द्रों में अवरोध (Ganglionic blockade) उत्पन्न नहीं करता वरन् ऐसा मालूम होता है कि रक्तचाप को कम करने का इसका प्रभाव कुछ अंश में स्वतन्त्र नाड़ी संस्थान के केन्द्रीय निरोध (Central inhibition of sym- pathetic nervous system) के कारण है। गुण और प्रयोग—यह तिक्त पौष्टिक, शामक, निद्राकर, ज्वरहर, गर्भाशय उत्तेजक एवं विषहर है। इसका उपयोग बालतिसार और हैजे में ईश्वर मूल के साथ, उदरशूल में जंगली एरण्डमूल के साथ, रक्तातिसार में कुटज के साथ तथा जीर्णज्वर में मिरिच, घोडवच, डिकेमाली, चिरायता एवं विडलवण के साथ किया जाता रहा है। प्रसव के समय आवि (Uterine contra- ction) वृद्धि के लिये एवं सर्पविष एवं अन्यान्य विषों को दूर करने के लिये भी इसको उपयोग में लाते हैं। सर्पविष में इसके १ से २ तो० मूल को जल में घिसकर पिलाते हैं तथा इसका लेप भी किया जाता है। नेत्र शुक्र में इसके पत्तों का रस आँख में डालते हैं। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त यह औषधि युक्तप्रान्त तथा बिहार के प्रान्तों में पागल की दवा के नाम से बहुत दिनोंसे प्रसिद्ध है तथा इस कार्य के लिये बहुत दिनों से सफलतापूर्वक व्यवहार में लाई जा रही है। इधर विदेशी शास्त्रज्ञों ने इसके गुणों से आकृष्ट होकर इसका प्रयोग करना शुरू किया है तथा आज यह रक्तचाप (Hyperpiesis), वातिक उन्माद, अनिद्रा एवं अन्यान्य मानसिक विकारों के लिये बहुत उत्कृष्ट औषधि सिद्ध हुई है। इस औषधि के प्रारम्भ करने के पश्चात् २ से ७ दिनों में इसका असर प्रारम्भ होता है तथा ३-६ सप्ताह में इसका पूर्ण प्रभाव स्पष्ट होता है तथा इसको बन्द करने के पश्चात् १ से ३ सप्ताह में इसका असर निकल जाता है। इसके उपयोग से मानसिक प्रक्षोभ दूर होकर शान्ति मिलती है एवं शिरःशूल, भ्रम आदि दूर होते हैं। रक्त चाप (Blood pressure) की अधिकता के लिये यह सबसे कम विषैली तथा उत्कृष्ट औषधि है। इसमें एक विशेष लाभ यह है कि इससे एकाएक आसन परिवर्तनजन्य रक्तभाराल्पता (Postural hypotension) तथा बहुत अधिक रक्तभाराल्पता नहीं होती। अधिक मात्रा में लेने से अतिसार या अनिष्ट स्वप्न (Nightmares) होते हैं लेकिन कोई तीव्र दुष्परिणाम नहीं होते। इसके अवांछनीय गुण जैसे रक्तचाप की कमी एवं मन्दहृदयता आदि चिकित्सा काल में बराबर बने रहते हैं। इसके उपयोग के समय नाक में रक्ताधिक्य (Nasal congestion), शरीर भार वृद्धि, बृहदान्त्र की गति वृद्धि तथा कुछ लोगों में मैथुन शक्ति (Libido) का ह्रास होता है। इसके उपयोग मे निद्रा की अपेक्षा हरीतक्यादिवर्गः ८५ तन्द्रा आती है तथा घबड़ाहट, चिड़चिड़ापन, तनाव, हृदय की धड़कन, एवं थकावट आदि दूर होकर रोगी को बहुत आराम मिलता है। रक्तभार की अधिकता में प्रथम इसी औषधि को प्रारम्भ करना चाहिये। इसके चूर्ण की मात्रा १ रत्ती से लेकर १ माशे तक दी जा सकती है। यदि ६ सप्ताह में लाभ न हो तो अन्य औषधियां उसके साथ मिलाई जा सकती हैं। अंग्रेजी दवा की दुकानों में इसकी गोलियां तथा इसके सत्व की गोलियां बिकती हैं जिनका उपयोग सुगमता की दृष्टि से किया जा सकता है। रीसर्पाइन नामक इसके सत्व का उपयोग तमकश्वास, सप्रणस्थूलान्त्रशोथ (Ulcerative colitis), पैत्तिकशूल, वृक्कशूल एवं मानसिक अवसाद (Mental depression) आदि अवस्थाओं में नहीं करना चाहिये। व्यामिश्रण—इस में रा कैनेसेन्स (R. canescens Linn.) तथा रा. डेन्सिफ्लोरा (R. densiflora Benth.) के मूल की मिलावट होती है। मात्रा—चूर्ण १ से २ माशा। ५२ नाकुली ? (ईश्वरमूल) सं०-नाकुली, ईश्वरी, अर्कमूल । हि०-ईशारमूल, रुद्रजटा । म०-सापसन । ब०-ईशरमूल । गु०-नोलवेल । ता०-इचचुरामूली । ते०-ईश्वरवेरु । उडि०-गोपोकरोनि । अ०, फा०-जरवन्दे हिन्दी । उर्दू०-शपेसन्द । अं०-Indian birthwort (इन्डियन बर्थवर्ट) । Aristolochia indica Linn. (परिस्टोलोकिआ इन्डिका) । Fam. Aristolochiaceae (परिस्टोलोकि- एसी)। इसकी लता भारतवर्ष के सभी भागों में विशेष कर दक्षिण कोंकण में होती है। इस लता के कांड लम्बे, २-४ इञ्च मोटे, गोल, चिकने तथा लम्बाई में धारियों से युक्त एवं कपूरवत् गंधयुक्त होते हैं। पत्र-हरे, डण्ठल की तरफ चौड़े तथा अग्र पर नुकीले विभिन्न आकार के एवं ५ शिराओं से युक्त । पुष्प-सद्पिण्डक हरित् । बीज-अण्डाकार, चपटे एवं पंखयुक्त । मूल-गांठदार, शाखाओं से युक्त, मोटा भाग ४-६ इञ्च, हलके बादामी रंग के तथा मूलत्वक् मोटी, कहीं २ अलग भई हुई । काष्ठ-श्वेत । भग्न-तन्तुमय । स्वाद-कुछ कड़ुआ । इसके पञ्चांग का व्यवहार होता है। रासायनिक संगठन-इसमें ॲरिस्टोलोचीन (Aristolochine) नामक तीन विभिन्न क्षार (Bases) पाये जाते हैं। इनके अतिरिक्त इसमें ३ भूयात्य अम्ल (Nitrogenous acids) जिन्हें अॅरिस्टिनिक् (Aristinic), अॅरिस्टिडिनिक् (Aristidinic) और अॅरिस्टोलिक् (Aristolic) अम्ल कहते हैं तथा एक उड़नशील तैल जिसमें शायद बोर्निओल (Borneol) रहता है एवं राल, टैनिन् एवं स्टार्च आदि पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—यह बल्य, उत्तेजक, गर्भाशयसंकोचक, ज्वरहर, शूलहर तथा विषहर है। अल्प मात्रा में यह आमाशय के लिये उत्तेजक है लेकिन अधिक मात्रा में स्थानिक प्रक्षोभ उत्पन्न होकर हृल्लास, मरोड़, शूल तथा कभी २ वमन एवं कुंथन भी होता है। ॲरिस्टोलोचीन् (Aristolochine) की क्रिया अॅलोइन (Aloin) के समान होती है लेकिन उससे यह विषैला है। यह उच्च श्रेणी के जानवरों में पाचन संस्थान तथा वृक्क में प्रक्षोभ उत्पन्न करता है तथा संन्यास एवं श्वसनाघात से मृत्यु होती है। (१) इसके चूर्ण का उपयोग ज्वर, आमवात, संधिशोध एवं जलोदर आदि में बहुत लाभदायक है।
८६ भावप्रकाश निघण्टुः (२) प्रसव के समय आविवृद्धि के लिये पिपरामूल के साथ देते हैं तथा अनार्तव, कष्टार्तव एवं प्रसव पश्चात् भी इसका उपयोग किया जाता है। गर्भपात करने के लिये भी इसका लोग उपयोग करते हैं। (३) मिरिच के साथ इसका प्रयोग पाचन के विकार जैसे कुपचन, अतिसार एवं शूल आदि में बहुत लाभदायक है। बच्चों में दन्तोद्भव के समय इसका अधिक व्यवहार किया जाता है। (४) सर्पविष तथा अन्य विषों के लिये भी इसका बहुत व्यवहार किया जाता है। सर्पविष में इसके पत्तों का रस अथवा चूर्ण को काली मिर्च के साथ खिलाते हैं तथा बाह्य लेप भी करते हैं। (५) मधु के साथ श्वित्र पर इसका स्वरस लगाया जाता है। (६) बच्चों के विबन्ध में इसके पत्तों का लेप उदर पर किया जाता है। व्यामिश्रण- इसकी कई जातियां इस औषधि में मिली रहती हैं जिसमें से अँ० ब्रॅक्टियाटा (A. bracteata Retz.), अँ० टैगॅला (A. tagala Cham.) आदि मुख्य हैं जिनके पत्र की आकृति में अन्तर रहता है। मात्रा - पंचाङ्ग चूर्ण ५-१५ र०; टिंक्चर ३-१ तो० ।
अथ माचिका (पश्चिमदेशे 'मोइआ' इति लोके प्रसिद्धो वृक्षविशेषः) तस्या नामानि गुणांश्चाह - माचिकाप्रस्थिकाऽम्बष्ठा तथा चाम्बालिकांडबिका । मयूरविदला केशीसहस्रा बालमूलिका ॥ माचिकाऽम्ला रसे पाके कषाया शीतला लघुः । पक्कातीसारपित्तास्रकफकण्ठामयापहा ॥ मोइया (पश्चिम देश में प्रसिद्ध वृक्ष विशेष) के नाम तथा गुण - माचिका, प्रस्थिका, अम्बष्ठा, अम्बालिका, अंबिका, मयूरविदला, केशी, सहस्रा और बालमूलिका ये सब मोइया के नाम है। मोइया-अम्लरसयुक्त, परिपाक में कषाय रसयुक्त, शीतल तथा लघु होती है और पक्कातीसार, रक्तपित्त, कफ तथा कण्ठसम्बन्धी रोगों को दूर करती है ॥ १६७-१६८ ॥ ५३ माचिका (मोइया) माचिका के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। कुछ लोगों ने इसको (ले०) सोलेनम् नाइग्रम् (Solanum nigrum) लिखा है लेकिन यह तो काकमाची (छोटी मकोय) का नाम है। अन्य लोगों ने इसको (ले०) हिबिसकस कंनाबिनस् (Hibiscus cannabinus) लिखा है जो पटुआ (पटसन) का नाम है तथा इसके गुण भी शास्त्रीय माचिका के गुणों से मिलते नहीं। छोटी माई तथा बड़ी माई जिन्हें क्रमशः (ले०) टॅमॅरिक्स आर्टिक्युलेटा तथा टॅ. गॅलिका (Tam- arix articulata & T. gallica) कहते हैं उनके गुण माचिका के शास्त्रीय गुणों से मिलते होने के कारण इन्हीं का व्यवहार माचिका नाम से करना चाहिये । माई के अर्थ में माचिका का वर्णन नीचे दिया जा रहा है तथा प्रसङ्गवश पटुआ का वर्णन भी आगे दिया जायगा। कुछ लोगों ने बड़ी माई को हाऊबेर माना है जो गलत है। हाऊबेर का वर्णन पहले ५० पृष्ठ पर आ चुका है। (क) Tamarix articulata Vahl (टॅमॅरिक्स आर्टिक्युलेटा) । Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकेसी)। सं०-झावुक । हिं०-लाल झाऊ, झाव, (कृमिगृह-छोटी माई) । बं०, गु०-झाऊ। पं०- परवन, फरस, फरवा । सिं०-लई, असरेले । इरा०-मझबरू अझ्वा । यू०-सुम्रत् अल् अस्ल ।
हरीतक्यादिवर्गः ८७ इसकी झाड़ी उत्तर भारत में नदी के किनारों पर उत्पन्न होती है। सिंध तथा पञ्जाब में यह अधिकता से पाई जाती है तथा इसकी उपज भी की जाती है। इस झाड़ी के कृमि गृहों (Galls-गॉल्स) को छोटी माई, मगिया मैन, छोटी मैन आदि कहा जाता है। यद्यपि इन्हें लोग फल कहते हैं तथापि ये फल न हो कर एक प्रकार के कृमियों द्वारा निर्मित गृह होते हैं। ये गोल, ग्रन्थि युक्त, चने के बराबर तथा पीताभ धूसरित रङ्ग के होते हैं। ये त्रिकोणाकृति के नहीं होते। औषधि में ये कृमिगृह, इसकी छाल तथा पञ्चांग के क्षार का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक सङ्घटन - छोटी माई में माजूफल में होने वाला गॅलिक् (Gallic) तथा टॅनिक् (Tannic) अम्ल बहुत होता है। रेतीली तथा समुद्र के किनारे होने वाली झाड़ी के पंचांग की राख में खारा नमक (Sodium sulphate सोडियम् सल्फेट) बहुत होता है। गुण और प्रयोग-छोटी माई माजूफल के समान ही गुण वाली है। यह ग्राही, स्तम्भन तथा रक्त स्रावावरोधक है। इसकी छाल तिक्त, ग्राही तथा बल्य होती है। छोटी माई का प्रयोग माजूफल के स्थान पर किया जाता है। (१) यह उत्तम संग्राह्यी होने के कारण पित्तज अतिसार, रक्तातिसार तथा रक्ताशं में उपयोगी है। (२) इसमें रक्तस्तम्भक गुण बहुत प्रबल होता है। अतः इसका उपयोग रक्तष्ठीवन, नासा- रक्त स्राव तथा प्रदर आदि रक्त स्रावी व्याधियों में मुख द्वारा एवं स्थानीय प्रयोग के रूप में किया जाता है। (३) गुल्म, प्लीहा, श्वेत प्रदर, शीघ्रपतन एवं शुक्रतारल्य आदि में भी इससे लाभ होता है। (४) इसकी छाल, कबीला एवं तैल का प्रयोग वाजीकरण के लिये किया जाता है। (५) इसका प्रलेप सिर के अपरस (Eczema-एक्झिमा) में किया जाता है। (६) गलशुण्डी वृद्धि तथा दन्तशूल में इसके चूर्ण का मञ्जन तथा काढ़े का कुल्ला कराया जाता है। मात्रा-छो. माई चूर्ण २-४ मा०; छाल ३-१ तो० क्वाथ बना कर । (ख) Tamarix gallica Linn. (टॅमॅरिक्स गॅलिका)। Fam. Tamaricaceae (टॅमॅरिकेसी)। सं०-झावुक । हिं०-झाऊ, झाव, पडवास, (कृमिगृह-बड़ी माई) । बं०-बोनझाऊ, झाउ, (कृमिगृह-बड़ी माई) । म०-झाऊ, (कृमिगृह-मगिया माई, बड़ी मुई ) । पं०-झाऊ, पिलची, (कृमिगृह-बड़ी मांडी) । ता०-सिरुसडुक्कु । ते०-एरूसारू । उर्दू-जद्देव । इरा०-गझनाझू । यू०-सुम्रात उल् तुफार्ह । अँ०-Tamarix (टॅमॅरिक्स), Tamarisk (टॅमॅरिस्क) । इसकी झाड़ी भारत के सभी भागों में विशेष कर पञ्जाब तथा उत्तर प्रदेश में होती है। बंगाल में यह नदियों के किनारों एवं आर्द्र भूमि में उत्पन्न होती है। यह सिन्ध, बलूचिस्तान, इरान एवं अफगानिस्तान में भी बहुत होती है। इसकी झाड़ी छोटी माई की झाड़ी की अपेक्षा बड़ी होती है तथा कभी २ इसके छोटे वृक्ष भी देखने में आते हैं। शाखाएं-पतली तथा आपस में मिली हुई। पत्र-सूक्ष्म, विनाकोषयुक्त, चिकने,
८८ भावप्रकाशनिघण्टुः वल्क सदृश एवं तीक्ष्णाग्र । पुष्प-द्विलिङ्गी, बहुत छोटे, १/७ इंच के घेरे में, श्वेत वा गुलाबी, शाखाओं के अन्त में गुच्छों के रूपमें । फली दै० इंच लम्बी। कृमिगृह (Galls- = गॉल्स) गोल, जायफल इतने बड़े, तीन कोणयुक्त, गांठदार, पीले, हरिताभ मटमैले तथा पुराने होने पर धूस- रित तथा स्वाद में कषाय एवं कडुवे । इसके विदेशी वृक्षों से एक प्रकार की शर्करा प्राप्त होती है जिसे गशंजबीन कहते हैं । यह शर्करा यहां की जलवायु में पतली हो जाती है तथा बजार में मधु के समान गाढ़ा पीत पदार्थ इस नाम से मिलता है । बजारू शर्करा में अन्य वृक्षों से प्राप्त शर्कराएं भी मिली रहती हैं । भारतीय वृक्षों से यह शर्करा प्राप्त नहीं होती । रासायनिक संघटन —इसमें ४०% तक टॅनिक ॲसिड होता है । गजंजबीन में विभिन्न शर्कराएं होती हैं । गुण और प्रयोग —इसके कृमिगृह ( गॉल ) माजूफल तथा छो. माई के समान ग्राही, स्तम्भन तथा रक्तस्तम्भक होते हैं । गजंजबीन मृदु विरेचक तथा कफघ्न है। इससे पाखाना पतला होता है लेकिन इससे आंत्र को कोई नुकसान नहीं होता । इसके पञ्चाङ्ग की राख मूत्रल एवं संसन होती है तथा पञ्चाङ्ग का क्वाथ ग्राही, शिथिलता दूर करने वाला एवं बल्य होता है । (१) गजंजबीन मीठा तथा सौम्य होने के कारण बच्चों को दस्त साफ होने के लिये व्यव- हार में लाया जाता है। इसके लिये इसको दूध के साथ दे सकते हैं । अनेक विरेचक एवं कफघ्न मिश्रणों में यह प्रयुक्त होता है । (२) कृमिगृह ( गॉल ) का प्रयोग माजूफल के स्थानपर किया जाता है। ग्राही होने के कारण यह अतिसार, आमातिसार, संग्रहणी, अत्यार्त्तव, रक्तष्ठीवन एवं प्रदर में लाभदायक है । इसके लिये चतुर्गुण जल में इसका फांट बनाकर २ से ४ तोले की मात्रा में पिलाते हैं । (३) इसके फांट का उपयोग दुष्ट व्रण तथा बद (Bubo ) के प्रक्षालन के लिये तथा मुखपाक, गले की तकलीफ एवं दन्त तथा मसूढ़ों की दुर्बलता में कुल्ला करने के लिये किया जाता है । (४) इसके पत्तों का लेप शोथघ्न है तथा प्लीहा एवं यकृत वृद्धि पर इसका लेप किया जाता है । मसूरिका, दूषित व्रण एवं अर्श में इसका धूआं दिया जाता है । (५) काले रंग का इसके पञ्चाङ्ग का घन काथ झाव नाम से काठियावाड़ में बिकता है तथा गलशुण्डी वृद्धि, गले की शिथिलता तथा शुष्क कास में इसको चटाते हैं । (६) इसके कृमिगृह ( गॉल ) का चूर्ण ४ से ८ माशा, अफीम २ माशा, एवं हेंसलीन २ तो० इनका मलहम बनाकर व्रण युक्त अर्श एवं गुद विदार ( Anal fissure=अॅनलफिशर् ) पर लगाते हैं । यह मलहम विदेशी गॉल से बने इसी प्रकार के डाक्टरी मलहम के समान ही लाभदायक होता है । (७) झाऊ की लकड़ी के पात्र में जल पीने से प्लीहा वृद्धि शीघ्र कम हो जाती है । मात्रा—कृमि गृह ( गॉल ) चूर्ण २-४ माशा; गशंजबीन १-४ माशा । (ग) Hibiscus cannabinus Linn. (हिबिस्कस् कॅन्नाबिनस् ) । Fam. Malvaceae ( माल्वेंसी ) । सं०-मात्रिका (?) अम्बष्ठा । हि०-मोइया, अम्बारी, पटसन, पड़वा, सन, कुद्रुम । ब०-मेस्ता- पाट । क०-पुडोम । म०-अम्बाडी । गु०-भिंडी, अम्बोई । ता०-पुलुड्डु । ते०-गोगुकुरू । सम्ता०- डरेकुद्रुम । उडि०-कनुरिया । सिन्ध-सज्जाडो । अं०-Indian hemp ( इण्डियन हेम्प ); Jute हरीतक्यादिवर्गः ८६ ( जूट ); Deccan hemp ( डेक्कन हेम्प ); Bimlipatam Jute (बिमलीपटन्रूट), Ambari hemp ( अम्बारी हेम्प ) । प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है परन्तु पश्चिमीघाट के पूर्व में यह आपही आप जङ्गली उत्पन्न होता है । इसका क्षुप-३ से ५-६ हाथ तक ऊँचा होता है और इस पर सूक्ष्म कांटेदार रोवें होते हैं । जड़ की ओर के पत्ते गोलाकार किञ्चित् कटे किनारे वाले होते हैं किन्तु ज्यों ज्यों पौधे बढ़ते जाते हैं त्यों त्यों पत्ते का आकार बदलता जाता है । ऊपर के पत्ते ५-७ भागों में विभक्त हो जाते हैं और प्रत्येक भाग दन्तुर होता है। फूल-पीले रंग के आते हैं । पुष्पदल के मध्य का हिस्सा बैंगनी रंग का होता है । डोडी (फल)-गोलाकार नुकीली होती हैं। बीज-भूरे रंग के होते हैं। इसका सर्वाङ्ग खट्टा होता है । तन्तु ( Fibre के लिए इसकी काफी खेती की जाती है, विशेषकर दक्षिण में । रासायनिक संगठन—इसके बीजों में एक प्रकार का खाने योग्य तैल पाया जाता है । गुण और प्रयोग—इसके पत्र तथा पुष्प विरेचक, रुचिकारक तथा हृद्य हैं । पित्तमयता में इनका शाक बनाकर खाया जाता है । इसके पुष्पों का १ तो० स्वरस मरिच एवं मिश्री के साथ पित्त प्रकोप में दिया जाता है, जिससे शौच साफ हो जाता है । इसके बीजों के तेल को पीड़ा एवं मोच आदि पर मलते हैं तथा पुष्टि एवं वाजीकरण के लिए इस तैल का सेवन करते हैं । तीसी और तिल में तेल निकालते समय इसके बीज की मिलावट की जाती है । अथ तेजवती । ( तेजवल्कल १ 'तेजबळ' इति च लोके) तस्या नामानि गुणांश्चाह- तेजस्विनी तेजवती तेजोह्वा तेजनी तथा ॥ १६९ ॥ तेजस्विनी कफश्वासकास्याम्यवातहृत् । पाचण्युष्णाऽरुचिस्तक्कारुचिवह्निप्रदीपिनी ॥ १७० ॥ तेजवती ( तेजवल्कल या तेजबुल नाम से भी लोक में प्रसिद्ध द्रव्य ) के नाम तथा गुण - तेज- स्विनी, तेजवती, तेजोह्वा तथा तेजनी ये सब तेजबुल के नाम हैं । तेजबुल-कफ श्वास, कास, मुखसम्बन्धीरोग तथा वायु को नष्ट करनेवाला होता है । तथा यह पाचक, उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्त- रसयुक्त, रुचिकारक एवम् अग्निदीपक होता है ॥ १६९-१७० ॥ ५४ तेजवती ( तेजबुल ) हि०-तेजबल । म०-ब०-गु०-तेजबुल । अं०-Toothache Tree (टूथएक ट्री ) । ले०- Zanthoxylum alatum Roxb. (झॅन्थोक्सइलम् एलैटम् ) । Fam. Rutaceae ( रूटेसी ) । जिस वनौषधि का परिचय 'तुम्बुरु' के नाम से दिया जा चुका है उसी वृक्ष की छाल को तेजबल और कालीमिरच के आकार वाले तथा फटे मुखवाले फल को 'तुम्बुरु' कहते हैं। कुछ लोगों ने उसी वंश की अन्य जाति को तेजबुल लिखा है जिसके फलों को भी दन्तशूल में दबाने के लिए देते हैं । १. 'तेजबुल' स्थाने 'तेजपात' इति पाठान्तरम् ।
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठों का मूल रूप में सटीक पाठ्यान्तरण (Transcription) दिया गया है:
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६० भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ ज्योतिष्मती (मालकांगनी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह ज्योतिष्मती स्यात्कटभी ज्योतिष्का कङ्गुनीति च । पारावतपदी $^{१}$पण्या लता प्रोक्ता ककुन्दनी ॥ ७१ ॥ ज्योतिष्मती कटुतिक्ता सरा कफसमीरजित् । अत्युष्णा वामनी तीक्ष्णा वह्निबुद्धिस्मृतिप्रदा ॥
**मालकांगनी के नाम तथा गुण—**ज्योतिष्मती, कटभी, ज्योतिष्का, कङ्गुनी, पारावतपदी, पिण्या, लता और ककुन्दनी ये सब नाम मालकांगनी के हैं। **मालकांगनी—**कटु तथा तिक्तरस युक्त, सारक (दस्तावर), कफ वातनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, वमन करानेवाली और तीक्ष्ण एवं जठराग्नि, बुद्धि तथा स्मरणशक्ति को बढ़ाने वाली होती है ॥ १७१-१७२ ॥
५५ ज्योतिष्मती (मालकांगनी) **हिं०—**मालकांगनी, मालकौनी, मालटांगुन । **ब०—**लताफटकी, बनउच्छे । **म०—**मालकांगोणी, करडकंपोनी, पिंगवी, पेंगी । **क०—**करिगन्ने । **ते०—**बावंजी । **गु०, मा०—**मालकांगणां । ता०— वलुलुवै । **फा०—**काल । **अ०—**हब्बे किलिकिल् । **अं०—**Staff tree (स्टाफ् ट्री) । ले०—Celastrus paniculatus Willd. (सिलेस्ट्रस् पैनिक्युलेटस्) । Fam. Celastraceae (सिलेक्ट्रेसी) ।
यह हिमालय पहाड़ के उष्ण तथा साधारण जगहों में पंजाब, झेलम के आसपास तक समस्त भारतवर्ष की पहाड़ी भूमि में, पूर्वी बंगाल, बिहार, दक्षिण भारत, ब्रह्मा और सिलोन आदि प्रदेशों में होती है ।
इसकी सुविस्तृत काष्ठमय लता होती है जिसकी नवीन शाखाओं पर बहुत श्वेत बिन्दु पड़े रहते हैं। **पत्ते—**विषमवर्त्ता लगते हैं और आकार में कई प्रकार के होते हैं तथा गोलाई लिये किञ्चित् लम्बे, ऊपर से लट्वाकार, चिकने, चर्मवत् और नुकीले तथा गोल दांतों से युक्त धार वाले होते हैं। प्रायः इनकी लम्बाई २ से ४ इञ्च तक और चौड़ाई १।। से ३ इञ्च तक होती है। **फूल—**आध इञ्च के घेरे में पीलापन लिये हरे रंग के होते हैं। इन पर आध आध इञ्च के डोडे (डेंड़ी) लगते हैं जो गोलाई लिये किञ्चित् चिपटे, चमकीले, कच्ची अवस्था में हरे और पक होने पर पीले रंग के होते हैं और उनके आगे का हिस्सा फटे रहने से बीज दिखलाई पड़ते हैं। आषाढ़ एवं श्रावण के महीने में जब इसमें पक फलों के गुच्छे लगते हैं तब यह लता बहुत सुन्दर प्रतीत होती है। प्रत्येक फल में ३ खण्ड होते हैं। उनमें १ से ६ तक लगभग तिहाई इञ्च के काले बीज होते हैं और वे एक प्रकार के लाल आवरण से ढके रहते हैं।
**रासायनिक संगठन—**इसके बीजों में एक गाढ़ा, रक्ताभ, कड़वा और गन्धयुक्त तैल ३०%, एक कडवी राल, राख ५% और टैनिन् आदि द्रव्य रहते हैं। इसके बीजों को जलाकर पाताल यन्त्र द्वारा भी एक तैल निकाल सकते हैं।
**गुण और प्रयोग—**मालकांगनी के बीज उष्ण, स्वेदजनन, उत्तेजक, बुद्धि एवं स्मृतिवर्धक, वातहर, वातनाड़ी बल्य एवं त्वग्दोषहर हैं।
(१) इसके बीजों के साथ लोहबान, लवंग, जायफल और जावित्री मिलाकर पाताल यन्त्र द्वारा एक तैल निकाला जाता है जिसे कृष्णतैल (Black oil) या ओलियम् नाइग्रम् (Oleum Nigrum) कहते हैं। यह तैल विजगापट्टम्, मसुलिपट्टम और एलौर आदि स्थानों में बिकता है।
१. 'पण्ये'ति पाठान्तरम् ।
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हरीतक्यादिवर्गः ६१
यह तैल अत्यन्त उत्तेजक, मूत्रनिःसारक तथा स्वेदल होता है। नवीन बेरी बेरी (Beri Beri) नामक रोग में १० से १५ बूंद इस तैल को देने से बहुत लाभ होता है। या इसके बीजों को क्रमशः बढ़ाते हुये एक दिन में ५० बीजों तक सोंठ के साथ देते हैं। पहले इससे मूत्र की मात्रा बढ़ती है और बाद में जलशोथ कम होकर फिर संवेदनाशक्ति वापस आती है। जलोदर में भी इस तैल से लाभ होता है। मलेरिया ज्वर जैसी पीडा जब आमवात में होती है तब तथा अङ्गघात आदि में इसको रक्तोत्क्लेशक (Rubefacient) के रूप में लगाते हैं। बुद्धि बढ़ाने के लिये आठगुने मक्खन में इसे मिलाकर सर में लगाया जाता है ।
(२) इसके बीजों को दबाकर भी तेल निकाला जाता है। २ से १० बूंद की मात्रा में आमा- शय के रोगों में एवं बुद्धि तथा स्मृतिवृद्धि के लिये इसको खिलाते हैं। सुश्रुत में इस तैल को जलोदर के लिये हींग तथा जवाखार के साथ दूध में पीने को लिखा है। रसरत्नसमुच्चय में इसके तेल को स्मृति एवं बुद्धि वृद्धि के लिये बहुत उपयोगी माना है।
(३) इसके बीजों का क्वाथ अन्य सुगन्धित औषधों के साथ आमवात, वातरक्त, अंगघा- तादि वातरोग एवं कुष्ठ में लाभदायक है।
(४) इसके बीजों को व्रण के ऊपर पीसकर लगाने से न भरने वाले व्रण जल्दी भरते हैं।
**मात्रा—**कृष्णतैल–मूत्र वृद्धिकर १०–३० बूंद। स्वेदजनक ५–१५ बूंद। ज्ञानतन्तु उत्तेजक १०–२५ बूंद। दबाकर निकाला तैल २–१० बूंद।
अथ कुष्ठम् (कूठ) तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुष्ठं रोगाह्वयं वाप्यं $^{१}$ पारिभाव्यं तथोत्पलम् ॥ कुष्ठमुष्णं कटु स्वादु शुक्रलं तिक्तकं लघु । हन्ति वातास्रवीसर्पकासकुष्ठामहरुक्फवान् ॥ १७३ ॥
**कूठ के नाम तथा गुण—**कुष्ठ, रोगाह्वय (रोगवाची शब्द), वाप्य, पारिभाव्य तथा उत्पल ये सब कूठ के नाम हैं। **कूठ—**उष्णवीर्य, कटु, स्वादु तथा तिक्त रसयुक्त, शुक्रजनक और लघु होता है। और यह वातरक्त, विसर्प, कास, कुष्ठ, वायु तथा कफ को दूर करता है ॥ १७३ ॥
५६ कुष्ठ (कूठ) **हिं०—**कूठ, कूट, कुष्ठ । **बं०—**पाचक, कुर । **म०—**कोष्ठ, उपलेट । **गु०—**उपलेट, कठ । **क०—**कोष्ट । **ते०—**चेंगुलकोष्ठम् । **प०—**कुष्ठह, कुट, कोठ । **फा०—**कुष्ठ-ई-तल्ख । **अ०—**कुस्तबहेरी । काश्मी०— पोस्तखै, कूठ । **भोटिया०—**कुष्ठ । **ता०—**कोष्ठम्, गोष्ठम् । **अं०—**Costus root (कोस्टस् रूट) । ले०—Saussurea lappa, C. B Clarke (सॉस्सुरिया लप्पा) । Fam. Compositae (कॉम्पोजिटी) ।
इसके क्षुप काश्मीर तथा उसके आसपास के आर्द्र ढालों पर ८०००–१३००० फीट की ऊंचाई पर तथा चेनाव और झेलम नदियों के आसपास के प्रदेशों में १००००–१३००० फीट की ऊंचाई पर पाये जाते हैं।
१. व्याप्यमाप्यं वेति पाठान्तरे ।
६२ भावप्रकाश निघण्टुः इसका बहुवर्षाणु क्षुप-बहुत दृढ़ होता है। काण्ड स्वावलम्बी, ४-७ फीट ऊँचा, बड़ा, जड़ की ओर छोटी उङ्गली प्रमाण मोटा होता है । पत्ते-कौशेय सदृश, विषम दन्तुर, खण्डित, आधरोय बहुत लम्बे, २-४ फीट, त्रिकोणाकार, लम्बे खण्डयुक्त सपक्ष डण्ठलवाले तथा ऊपर के छोटे । फूल-दृढ़ १ से १५ इन्च गोल, विनाल, गुच्छेदार, गहरे नील बैंगनी रंग के या काले । फल-०-३१ इन्च तक लम्बे, दबे हुये, मुड़े हुये चर्मलफल (Achene) । मूल-हलके मुरचर्र लाल या काले बादामी, हलके, दृढ़, सीधे, १ से ३ इन्च लम्बे, १ से १३ इन्च मोटे, छोटे छोटे उभारों से युक्त; मोटे टुकड़े अन्दर से पोले; इसके ठीक कटे हुये पृष्ठ में ३ भाग स्पष्ट दिखाई देते हैं जिसमें से बाहरी भाग अंगूठी की तरह गोल, बीच का काष्ठमय भाग कुछ हलके रंग का तथा महीन किरणों के समान धारियों से युक्त एवं अन्दर में मध्यभाग; भग्न-छोटा तथा शृङ्गवत् (Horny) ; गंध-मधुर; स्वाद-कुछ कडवा । इन्हीं मूलों का व्यवहार औषध में किया जाता है। चक्रपाणि ने अच्छे कूठ की पहचान यह दी है कि उसे तोड़ने पर नीचे उसके कण अलग होकर नहीं गिरते तथा वह मृगशृङ्ग के समान होता है । कुछ लोग मीठा और कडवा कूठ करके दो भेद करते हैं और मीठा कूठ, पुष्करमूल को कहते हैं । शास्त्रीय गुणों में पुष्करमूल कटु, तिक्त कहा गया है लेकिन कूठ कटु और स्वादु लिखा गया है । इससे यह बात स्पष्ट है कि मीठा कूठ, पुष्करमूल नहीं है। कुछ लोगों ने इसका समाधान इस प्रकार किया है कि परिपक्व कूठ की मूल कडवी तथा अपक्व कूठ की मूल कुछ मीठी होती है। फारसी लेखक तिक्त कुष्ठ को कुस्त-ई-तल्ख और मीठे कूठ को कुस्त-ई-सिरीन् लिखते हैं और मीठे कूठ को पुष्कर मूल का अंग्रेजी नाम ओरिस्रूट बतलाते हैं। कूठ काश्मीर से चीन को बहुत जाता है जिसे वहां लोग धूप की तरह व्यवहार में लाते हैं। ऊनी वस्त्रों की कृमियों से रक्षा करने के लिये कूठ के टुकड़ों को उनमें रखते हैं। रासायनिक संगठन- इसके मूल में एक उड़नशील तैल १५-२५%, एक सॉसुराइन (Saussurine) नामक क्षाराम ०५%, राल ६%, इन्युलिन (Inulin) १८%, तैल, पोटेशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate), शर्करा तथा टैनिन आदि द्रव्य रहते हैं। एक अन्य कुष्टिन (Kushtin, C20H26O3) नामक तरल पदार्थ भी इससे प्राप्त होता है। इसके उड़नशील तैल में कोस्टस् लॅक्टोन (Costus lactone, C15H20O2) १२, कोन्दुसिक एसिड (Costusic acid, C15H22O2) १४, डीहाइड्रोकोस्टस् लॅक्टोन (Dihydrocostus lactone) १५, अॅप्लोटोक्सिन (Aplotoxin) २०, अॅल्फा-कोस्टेन (a-costene) ६, बीटा-कोस्टेन (B-Costene) ६, फेलॅन्ड्रेन (Phelandrene) ०.४, कॅम्फेन (Camphene) ०.४, तथा टरपेन ॲल्कोहोल (Terpene alcohol) ०.२% पाया जाता है। इसके पत्तों में भी क्षाराभ आदि पाये जाते हैं लेकिन उड़नशील तैल नहीं रहता। कुछ लोगों के मत से इसमें हॅलेरिक अम्ल (Valeric acid) के लवण तथा इसकी राख से मैंगनीज (Manganese) भी पाया जाता है। सॉसुराइन नामक क्षाराभ की क्रिया सुषुम्नाशीर्ष (Medulla) स्थित प्राणदा (Vagus) नाडी केन्द्र पर तथा श्वसनिका (Bronchioles) एवं पचनसंस्थान (Gastro-intestinal tract) की अनैच्छिक (Involuntary) मांसपेशी तन्तुओं पर अवसादक (Depressant) होती है जिससे श्वसनिकाओं का विस्तार (Relaxation) होता है। इससे रक्तचाप की कुछ वृद्धि होती है जो लगातार बनी रहती है तथा हृदय, विशेष कर उसके निलय (Ventricles) के संकोच तथा विस्तार की शक्ति बढ़ती है। श्वसनिका विस्तार की क्रिया अॅड्रेनलीन (Adrena- line) के जितनी तीव्र नहीं होती न यह उतनी जल्दी कार्य ही करता है लेकिन इसका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है। हरीतक्यादिवर्गः ६३ इसमें का उड़नशील तैल (Volatile oil) जीवाणुओं के लिये, विशेष कर स्तबक तथा माला गोलाणु (Staphylo and Streptococcus) के लिए प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्ग नाशक (Disinfectant) है। यह वातानुलोमक, हृदयोत्तेजक, कफनिःसारक एवं मूत्रल है तथा अनैच्छिक मांसपेशी तन्तुओं को यह शिथिल करता है जिससे श्वसनिकाओं का विस्तार होता है । केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर इसका प्रभाव अन्य उड़नशील तैलों की तरह ही होता है। इसका उत्सर्ग वृक्क तथा फुफ्फुसों द्वारा होता है जिससे यह मूत्रल तथा कफनिःसारक है। इसका प्रवाही सत्व अधिक मात्रा में (१०-२० सी० सी०) यदि सेवन किया जाय तो उदर में कुछ प्रक्षोभ तथा बेचैनी होती है तथा तन्द्रा उत्पन्न होती है। कूठ का धूम्रपान केन्द्रीय वातनाडी संस्थान (Central Nervous System) में अवसाद उत्पन्न करता है और शायद यही कारण है कि अफीम के स्थान पर इसका धूम्रपान किया जाता है । गुण और प्रयोग-कूठ उष्ण, दीपन, पाचन, सुगन्धि, उत्तेजक कफनिःसारक, उद्वेष्टननिरोधी, कुष्ठ मूत्रल, वाजीकर, रसायन, आर्तवजनन, व्रणशोधक एवं रोपक, त्वक्दोषहर, प्रतिदूषक (Antiseptic) तथा उपसर्गनाशक (Disinfectant) है। इसका उपयोग फुफ्फुस विकार जैसे तमकश्वास, कास एवं कुपचन, विसूचिका, जीर्ण चर्मरोग, उन्माद, अपस्मारादि वातरोग, आमवात, वातकफज्वर, नष्टार्तव, कष्टार्तव, हृदयोदर, जलोदर तथा शिरःशूल आदि में किया जाता है। (१) तमकश्वास (Asthma) के लिए- यह औषध बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई है। इसके लिए इसका मद्यसारोय प्रवाही सत्व १-२ ड्राम की मात्रा में या इसका चूर्ण दिन में ३, ४ बार दिया जाता है। रात को सोते समय तथा जब भी श्वास के आवेग की सम्भावना हो तो इसकी एक मात्रा देने से आवेग नहीं आता न इससे अॅड्रिनॅलीन (Adrenaline) के इन्जेक्शन वा दमे की सिगरेट आदि की तरह निद्रानाश आदि दुष्परिणाम ही होते हैं क्योंकि यह उद्वेष्टन निरोधि होने के साथ-साथ केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर इसका अवसादक प्रभाव भी होता है। इस औषध को १०, १५ दिन लगातार देकर फिर कुछ दिन रोककर देखना चाहिये कि फिर दौरा तो नहीं होता। यदि फिर दौरा हो तो फिर इसे देना चाहिये। इसका न तो कोई संचायि (Cumulative) दुष्परिणाम होता है न सहनशीलता (Tolerance) ही उत्पन्न होती है जिससे प्रत्येक बार मात्रा में वृद्धि करनी पड़े। इस औषध के प्रयोग के समय तमकश्वास के कारणों की अवश्य खोज करनी चाहिये तथा उनको दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये क्योंकि जब तक कारण दूर नहीं होंगे तब तक स्थायी लाभ नहीं हो सकेगा। यह प्राणदा नाडी की उत्तेजना से होने वाले आवेगों (हँगोटोनिक् टाइप = Vagotonic type) को रोकने में विशेष समर्थ है। इसके क्षाराम तथा तैल दोनों संयुक्त मिलकर कार्य करते हैं। तैल श्वसनिकाओं के उद्वेष्टन को दूर करने के साथ-साथ श्लेष्मा को भी बाहर निकालता है तथा उससे श्लेष्मलकला की सूजन दूर होती है। इसके प्रवाही सत्व को पोटैशियम् आयोड़ाइड के मिश्रण के साथ भी दे सकते हैं। इसका अल्प मात्रा में धूम्रपान भी लाभदायक है। (२) पाचन के विकार जैसे अजीर्ण, कुपचन, शूल, आध्मान, अतिसार एवं विसूचिका आदि में इससे युक्त अग्निसुख चूर्ण (चक्र.) १०-२० र० की मात्रा में सुरा आदि के साथ लाभदायक है। विसूचिका में बड़ी इलायची के साथ इसका फांट दिया जाता है। हृद्दौर्बल्यजन्य जलोदर में भी इससे पाचन सुधरता है तथा मूत्रवृद्धि होकर लाभ होता है।
यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
६४ भावप्रकाश निघण्टुः
(३) आमवात में इसके चूर्ण को एरण्ड तैल के साथ खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं। (४) रसायन के लिये इसके चूर्ण को घृत तथा मधु के साथ नित्य सुबह चाटना चाहिये जिससे किसी भी प्रकार के रोग नहीं होने पाते तथा आयु की वृद्धि एवं शरीर की कांति बढ़ती है। अथर्ववेद में भी इसके रसायन गुणों के साथ इसे शिरोरोग, तृतीयक ज्वर, कुष्ठ एवं कृमि रोगों के लिये उपयोगी माना है लेकिन आधुनिक विद्वान् मलेरिया, आंत्रिक कृमि, महलूष्ठ एवं आमवातादि में अनुपयोगी बतलाते हैं । (५) बार-बार आनेवाली हिक्का में यह औषध लाभदायक है। इसमें कूठ तथा राल का धूम्रपान कराया जाता है। (६) चर्मरोगों में यह बहुत लाभदायक सिद्ध हुई है। व्रणों पर इसके मलहम का उपयोग किया जाता है। अरूंषिका (सर के क्लेदयुक्त फोड़े फुन्सी ) में इसका चूर्ण खपरैल में भूनकर तेल के साथ लगाया जाता है जिससे खुजली, जलन, पीडा एवं सर के व्रण आदि अच्छे होते हैं। मुख कान्ति वृद्धि के लिये इसे नींबू के रस में ७ दिन भिगोकर मधु के साथ मुख पर लगाना चाहिये । (७) एरण्डमूल के साथ इसको कांजी में पीसकर उसके लेप से शिरःशूल दूर होता है । (८) यह गुलाबजल में पीसकर हाथ पैरों की सूजन, उदरवृद्धि, शिरःशूल तथा मोच आदि पर लगाया जाता है । (९) चीन में इसका उपयोग बालों को काला करने के लिए मसाले के रूप में एवं धूपन के लिये किया जाता है तथा दन्तशूल में कस्तूरी के साथ उसे लगाते हैं। बालों को धोने के काम में भी इसका उपयोग होता है। मात्रा—चूर्ण २-१५ २०; तरळसव ३-२ ड्राम । प्रतिनिधि तथा व्यामिश्रण—कभी कभी सॉस्सुरिया हाइपोल्यूका (Saussurea hypoleuca) के मूल इसके प्रतिनिधि के रूप में व्यवहार में आते हैं। इसमें कभी-कभी लॅबियैटी (Labiateae) वर्ग की सलविया लॅनेटा (Salvia lanata) या लियुलॅरिया (Ligularia) के मूल, निर्विश (Kyllingia triceps), रास्ना भेद (Inula racemosa), कुछ हीन जाति के अंकोनाइट (Aconite) के मूल एवं सेनेसिओ जकेमाँन्टियानस् (Senecio jacquemontianus) जिसे काश्मीर में पोहकर कहते हैं आदि का व्यामिश्रण किया जाता है जिनको सूक्ष्मदर्शन यन्त्र एवं अन्य आकारादि द्वारा अलग पहचान सकते हैं। दक्षिण की तरफ कहीं-कहीं संभवतः केबुक (Costus speciosus-कोस्टस् स्पेशिओसस्) इसके स्थान पर लिया जाता रहा।
अथ कुष्ठभेदः-पुष्करमूलम्, तस्य नामानि गुणांश्चाह तर्कं पुष्करमूलं तु पौष्करं पुष्करञ्च तत् । पद्मपत्रञ्च काश्मीरं कुष्ठभेदमिमं जगुः ॥१७४॥ पौष्करं कटुकं तिक्तमूष्णं वातकफज्वरान् । हन्ति शोथारुचिश्वासान्विशेषात्पार्श्वशूलनुत् ॥ कूठ के भेद पोहकर मूल के नाम तथा गुण-पुष्करमूल, पौष्कर, पुष्कर, पद्मपत्र, काश्मीर और कुष्ठभेद ये सब पोहकर मूल के नाम हैं। पोहकरमूल-कडु तथा तिक्त रसयुक्त होता है और वात कफ ज्वर, शोथ, अरुचि तथा श्वास को दूर करता है। और यह विशेषतः पार्श्वशूल को नष्ट करने वाला होता है ॥ १७४-१७५ ॥
हरीतक्यादिवर्गः | ६५
५७ पुष्करमूल हिं०-पोहकरमूल, पुष्करमूल । बं०-पुष्करमूल, कुष्ठविशेष । म०-पुष्करमूल, बालवेखण्ड । गु०-पोहकरमूल । पं०-पोहकरमूल, इरप्ता । काश्मी०-पातालपद्मिनी । अ०-सोसन इरप्ता । फा०-बेख-इ-बनफ्शा । अं०-Orris root (ओरिस रूट) । ले०-Iris germanica, Linn. (आइरिस् जरमॅनिका, लिन) । Fam. Iridaceae (आइरिडेसी) । पुष्करमूल के सम्बन्ध में विद्वानों में कुछ मतभेद है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि पुष्कर- मूल के अभाव में कूठ लेना चाहिये । प्राचीन समय में इसका अभाव होगा ऐसा प्रतीत नहीं होता। आधुनिक विद्वानों में डा० देसाई ने पुष्करमूल को (ले०) आइरिस् जर्मॅनिका (Iris germa- nica) माना है लेकिन उसी को वह बालवच (हैमवती, श्वेतवचा) भी मानते हैं। कुछ अन्य विद्वान् पुष्करमूल को (ले०) इनूला रेसिमोसा (Inula racemosa) मानते हैं जिसको डा० देसाई ने 'रास्ना' माना है तथा बालवच (हैमवती, श्वेतवचा) को (ले०) आइरिस हेरसिकलर (Iris versicolor) मानते हैं। सभी विद्वान् पुष्करमूल का अंग्रेजी नाम ओरिस रूट (Orris Root) लिखते हैं। ओरिस रूट, (ले०) आइरिस फ्लोरेन्टिना (Iris florentina Linn) का मूल है। बम्बई के बाजार में (अं०) ओरिस रूट नाम से अधिकतर (ले०) आइरिस जर्मॅनिका के मूल बिकते हैं, जो उसी जाति का है। गुणों की दृष्टि से (ले०) आइरिस जर्मॅनिका के गुण कूठ से मिलते जुलते होने से इसका ग्रहण उचित जान पड़ता है। कुछ लोग कमल की जड़ को पुष्करमूल के नाम से लेते हैं जो बिलकुल गलत मालूम होता है। कूठ के स्थान पर लिये जाने वाले द्रव्यों को भी इसके स्थान पर कुछ लोग लेते हैं जो उचित नहीं है। (ले०) इनूला रेसिमोसा का वर्णन 'रास्ना' के अन्तर्गत किया जा चुका है। यहां पर निम्न वर्णन (ले०) आइरिस जर्मॅनिका का किया जा रहा है। यह इरान तथा काश्मीर में उत्पन्न होता है तथा काश्मीर में इसकी उपज भी की जाती है। इसका छोटा पौधा होता है। पत्ते-अनेक, चौड़े तथा तलवार के आकार के होते हैं। पुष्प-लम्बे दंड पर आते हैं। मूल-कठोर, पीताभश्वेत, ५ से १० से० मी० लम्बे तथा २-३ से० मी० चौड़े टुकड़ों में, चिपटे, वार्षिक वृद्धि के कारण उत्पन्न सान्तर संकोच युक्त, सुगन्ध युक्त एवं स्वाद में तिक्त रहते हैं। ३ साल पुराने पौधे की जड़ निकाल कर छील कर हल्की धूप में ५-६ दिन सुखाते हैं फिर ३ वर्ष तक बंद करके रखते हैं तब इसमें गन्ध आती है। ताजी अवस्था में यह गन्धहीन एवं स्वाद में कुछ कडु रहता है। मूल का उपयोग चिकित्सा के अतिरिक्त पाउडर में तथा सुगन्ध द्रव्य के रूप में किया जाता है। रासायनिक संगठन- इसमें उड़नशील तैल, आइरीडीन (Iridin) ग्लूकोसाइड, स्टार्च, शर्करा, राल, टैनिन तथा कैल्शियम ऑक्सेलेट आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग- इसके गुण कूठ के समान हैं तथा यह उष्ण, आनुलोमिक, मूत्रजनन, उत्तेजक, शोथघ्न एवं व्रणरोपक है। अधिक मात्रा में यह विरेचक तथा वामक है। इसका उपयोग श्वास, कास, पार्श्वशूल, कुपचन, अरुचि तथा पित्ताशय की बीमारियों में किया जाता है। हकीम लोग इसको विरेचक एवं मूत्रल मानते हैं तथा यकृत के विकारों में इसका प्रयोग करते हैं। दंतशूल तथा दांत हिलते हों तब एवं मुख दुर्गन्धि में इसके चूर्ण से मंजन किया
५६ भावप्रकाशनिघण्टुः जाता है तथा इसके टुकड़े को मुख में रखकर चूसते भी हैं। केशर्तलों को सुगन्धित करने के लिये इसका व्यवहार किया जाता है। छोटे व्रणों तथा फोड़े फुन्सियों पर इसका लेप लाभदायक है। मात्रा-२ से १५ र० । अथ कटुपर्णी (चोक) तस्या नामानि गुणाँश्चाह कटुपर्णी हैमवती हेमक्षीरी हिमावती । हेमाह्वा पीतदुग्धा च तन्मूलं चोकमुच्यते ॥१७६॥ हेमाह्वा रेचनी तिक्ता भेदिन्युत्क्लेशकारिणी । कृमिकण्डूविषानाहकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ॥१७७॥ सत्यानाशी ( चोक ) के नाम तथा गुण-कटुपर्णी, हैमवती, हेमक्षीरी, हिमावती, हेमाह्वा और पीतदुग्धा ये सब सत्यानाशी के नाम हैं और इसी के जड़ भाग को चोक कहते हैं। सत्यानाशी-रेचक, तिक्तरसयुक्त, भेदक (मल को भेदन करने वाली) और उत्क्लेश कारक होती है एवम् कृमि, खुजली, विष, आनाह, कफ, पित्त, रक्त विकार और कुष्ठ को दूर करने वाली होती है ॥ १७६-१७७ ॥ ५८ कटुपर्णी (चोक) हि०-सत्यानाशी, पीला धतूरा, फरंगी धतूरा, उजर कांटा, सियाल कांटा, भड़भांड़, चोक । बं०-सोनाखिरणी, शियाल कांटा, बड़ो सियाल कांटा । म०-कांटे धोत्रा । गु०-दारूडी । क०- अरसिन उन्मत्त । ता०-ब्रह्मदण्डु, कुडियोट्टि, कुरुक्कुम चेडि । ते०-ब्रह्मदण्डी चेट्टु । पं०- कण्डियारी, स्यालकांटा, भटमिल, सत्यनशा, भेरबण्ड, भटकटैया । सम्ता०-गोकुहल जानम । पश्चिमो०-भरभुरवा, कडवइ कण्टेला । मला०-पोन्नुम्मत्तम् । उडि०-कांटाकुशम । अं०- Mexican poppy (मेक्सिकन पॉप्पी), Prickly poppy (प्रिक्ली पॉप्पी), Yellow thistle (यलो थिसल्) । लै०-Argemone mexicana Linn. (आर्जिमोन् मेक्सिकाना) । Fam. Papaveraceae (पैपेहरेसी) । यह सब प्रान्तों के खेत, मैदान, झाड़ी, खण्डहर, सड़क के किनारे आदि गन्दी जमीन में उत्पन्न होती है। शिमले में ५००० फीट ऊँची भूमि पर भी पाई जाती है। सत्यानाशी क्षुप जाति की वनस्पति २ से ४ फीट तक ऊँची, अनेक शाखाओं से युक्त सघन होती है। इसके क्षुप, पत्ते, फल इत्यादि पर तीक्ष्ण कांटे होते हैं। डण्डी और पत्तों को तोड़ने से पीला दूध निकलता है। पत्ते ३ से ७ इञ्च तक लम्बे, कटे हुए, तीक्ष्ण कँटीले नोक वाले, सफेद धब्बों से युक्त तथा रेशेवाले होते हैं। फूल-कटोरी नुमा चमकीले पीले रंग के आते हैं और वे खुले मुख होते हैं। फल-लम्बे तथा गोल होते हैं और उनसे राई के समान काले रंग के बीज निकलते हैं। वैशाख, ज्येष्ठ की गरमी से इसका क्षुप सूख कर नष्ट हो जाता है। फल के सूखने पर बीज भूमि पर गिर जाते हैं और वे ही शरद ऋतु में अङ्कुरित हो पौधे के रूप में परिणत हो जाते हैं। इसकी जड़ का नाम 'चोक' है। कुछ विद्वान् इस पौधे को विदेशी मानते हैं तथा इसे प्राचीन 'स्वर्णक्षीरी' नहीं मानते । इस वनस्पति के ताजे मूल, क्षीर, बीज तथा तैलादि का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-पहले ऐसा समझा जाता रहा कि इस वनस्पति के पत्तों तथा फलियों में मॉर्फीन (Morphine) या आर्जेमोनाइन् (Argemonine) क्षाराम पाये जाते हैं लेकिन हरीतक्यादिवर्गः ५७ बाद के प्रयोगों से ज्ञात हुआ कि इसमें इस प्रकार के कोई क्षाराम नहीं रहते लेकिन बर्बेरीन (Berberine) तथा प्रोटोपाइन (Protopine) नामक अन्य क्षाराम होते हैं। इसके बीजों में एक गहरे बादामी रंग का, स्वादहीन तैल २२% पाया जाता है जो पहले पतला रहता है लेकिन बाद में रखने पर गाढ़ा होता जाता है। इसके अतिरिक्त इन बीजों में कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohy- drates) एवं अॅल्ब्युमिन (Albumin) ४९%, आर्द्रता ९% तथा राख ६% पाई जाती है। इस राख में क्षारीय फॉस्फेट (Phosphate) तथा सल्फेट (Sulphate) पाये जाते हैं। इस वनस्पति में पीले रंग का दूध बहुत होता है जिसमें अल्प मात्रा में बर्बेरीन (Berberine) होता है। पोटैशियम नाइट्रेट (Potassium nitrate) लवण भी इसमें होता है। गुण और प्रयोग-यह विरेचक, रसायन, कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न है तथा इसका प्रयोग फिरंग, उपदंश, सोजाक, कुष्ठ, चर्मरोग तथा नेत्र विकारों में किया जाता है। (१) इसके बीजों का तेल मृदुरेचक, रसायन, कुष्ठघ्न एवं त्वचा के रोगों में लाभदायक है। यह ३० बूंद की मात्रा में शर्करा के साथ दिया जाता है। इसके नये बीज वामक होने के कारण इन बीजों को एक मास रख कर फिर तेल निकालते हैं तथा ताजे निकाले तेल का ही उपयोग अच्छा होता है। इसमें एरण्ड तैल के समान न तो कोई दुर्गन्ध या खराब स्वाद होता है न इससे मरोड़ आदि होती है तथा यह अल्प मात्रा में प्रभावशाली होता है। आमातिसार, संग्रहणी, विसू- चिका उदरशूल, विबन्ध युक्त उदरशूल एवं सर्वांगशोथ आदि में इसका उपयोग किया जाता है। फिरङ्ग तथा उपदंश में इसके बीजों का प्रयोग विरेचन के लिये किया जाता है। कुष्ठ, दाद, विसर्प, श्वित्र एवं अन्यान्य पीड़ा एवं दाहयुक्त चर्मविकारों में इसका तैल लगाया जाता है जिससे शान्ति मिलती है। (२) इसके बीज वामक तथा उत्क्लेशकारक होने के कारण इनका उपयोग गले के विकार, फुफ्फुस विकार, कास, कुक्कास एवं तमकश्वास आदि में लाभदायक होता है। इसमें कोई उद्वेष्टन निरोधि गुण नहीं है जो तमकश्वास में लाभदायक होता हो । ये रेचक तथा वेदनास्थापक भी होते हैं। दांतों में गड्ढे होकर पीड़ा होती हो तो इनके धूम्रपान से लाभ होता है। (३) इस पौधे में जो पीले रंग का दूध होता है वह रसायन, कुष्ठघ्न, मूत्रजनन, व्रणशोधक तथा रोपक, शोथप्रतिकारक, ज्वरहर एवं नेत्र के लिये हितकारक होता है। फिरंग, उपदंश एवं सोजाक आदि में 'किडमार' (Aristolochia bracteata Retz) के रस के साथ इसको पिलाते हैं। मलेरिया आदि जीर्ण विषमज्वरों में नींबू के रस में इसे घोंट कर पिलाते हैं। सोजाक में इसको घी के साथ देने से भी लाभ होता है। जलोदर एवं कामला आदि में भी इसका व्यवहार किया जाता है। नेत्राभिष्यन्द में पलकों पर इसको लगाते हैं तथा नेत्रशुक्र, अधिमांस एवं दृष्टिमांद्य आदि में घी के साथ १ बूंद इसे आंखों में डालते हैं। इससे किसी प्रकार की हानि नहीं होती। सर्वदा के प्रयोग के लिये इसको सुखाकर रख सकते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर घी या दूध में घिसकर उपयोग में ला सकते हैं। पुराने व्रण, फिरंगादि से उत्पन्न व्रण एवं खुजली (Scabies) आदि में इसको लगाने से लाभ होता है। (४) इसका मूल रसायन, कृमिघ्न तथा कुष्ठघ्न है। फिरंग, उपदंश, सोजाक, अश्मरी तथा अन्य चर्मरोगों में इसका क्वाथ दिया जाता है एवं इसका लेप भी करते हैं। स्फीत कृमि (Ta- pe-worm) के लिये इसके चूर्ण को ४ माशा की मात्रा में खिलाते हैं। बिच्छू काटने पर इसकी 7 ताजी जड़ को घिस कर लगाते हैं। ७ भाव० नि०
यहाँ पृष्ठों का सम्पूर्ण और सटीक पाठ प्रस्तुत है:
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(५) कुष्ठ (Leprosy) में इसके स्वरस को १ तोले की मात्रा में ४० दिन तक रोज सबेरे दूध के साथ पिलाने से लाभ होता है। यह रसायन एवं बलवर्धक है तथा फिरंगादि में भी यह लाभदायक होता है। (६) सरसों में इसके बीजों की मिलावट करके तेल निकालते हैं। ऐसा मिलावटी तेल बहुत हानिकार होता है तथा इससे बेरीबेरी (Beri beri) एवं एपिडेमिकू ड्राप्सी (Epidemic dropsy) नामक रोग होते हैं जिसमें पैरों में सूजन, हृदय की दुर्बलता, पचनसंस्थान के विकार एवं वात नाडी शोथ आदि होते हैं।
**परीक्षा—**सरसों के तेल में इसकी मिलावट है या नहीं इसकी निम्न परीक्षायें की जाती हैं। (क) सरसों के तेल के बराबर शोरे का तेजाब (Nitric acid-नाइट्रिक एसिड) मिलाकर हिलाने से मिलावट न होने पर धूसर लाल (Brownish red) या नारंग (Orange) रंग उत्पन्न नहीं होता। (ख) ३ मि. लि. सरसों का तेल, १ मि. लि. ग्लेशियल एसिटिक ॲसिड (Glacial acetic acid) तथा क्यूप्रिक अॅसिटेट (Cupric acetate) के जलीय ३% घोल का ३ मि. लि. धीरे २ हिलावें। फिर जलयुक्त पात्र में इसके पात्र को रख कर १५ मिनट गरम करके फिर अच्छी तरह हिला कर रख दें। मिलावट न होने पर अवक्षेप नहीं होता तथा उसके जलीय भाग में नीले रंग से हरे रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता। **मात्रा—**बीज तैल १० बूँद; बीज ३ तो०; पीतवर्ण का दुग्ध १-२ माशा; मूल २-४ माशा ।
अथ कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
शृङ्गी कर्कटशृङ्गी च स्यात्कुलीरविषाणिका । अजशृङ्गी च चक्रा च कर्कटाख्या च कीर्त्तिता ॥ शृङ्गी कषाया तिक्तोष्णा कफवातक्षयज्वरान् । श्वासोर्ध्ववाततृट्कासहिक्काछर्दिंवमीन्हरेत् ॥
**काकड़ासिंगी के नाम तथा गुण—**शृङ्गी, कर्कटशृङ्गी, कुलीरविषाणिका, अजशृङ्गी, चक्रा और कर्कटाख्या ये सब काकड़ासिङ्गी के नाम हैं। काकड़ासिङ्गी-कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं उष्ण-वीर्य होती है। और यह कफ, वात, क्षय, ज्वर, श्वास, ऊर्ध्ववात, प्यास, कास, हिक्की, अरुचि तथा वमन को दूर करने वाली होती है ॥ १७८–१७९ ॥
५९ कर्कटशृङ्गी (ककड़ासिंगी)
- **हि०—**ककड़ासिंगी, काकड़ासिंगी, काकरासिंगी (धौ¹, ककड़ाव।
- **बं०—**कांकराशृङ्गी।
- **म०—**काकड़-शिंगी।
- **क०—**कर्कटिशृङ्गी, दुष्टपुचत्तु।
- **ने०—**काकर सिंगी।
- **ता०—**काक्कट शिंगी।
- **मा०—**काकड़ा-शिंगी।
- **पं०—**ककर, सुमाक।
- **गु०—**काकड़ा सांगी।
- **काश्मी०—**कक्कर।
- **लै०—**Pistacia integerrima, Stew. ex Brandis (पिस्टैंसिया इंटिजिर्रिमा)।
- Fam. Anacardiaceae (ॲनॅकार्डिएसी)।
इसके वृक्ष उत्तर पश्चिमी हिमालय के बाहरी कतारों पर १५००–८००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब, सीमाप्रान्त आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष मध्यमाकार के होते हैं। **छाल—**सफेद रंग की। **पत्र—**युग्म अथवा अयुग्मपक्षाकार तथा ६–९ इञ्च लम्बे। **पत्रक—**४–६ जोड़े, किञ्चित सनाल, भालाकार, लम्बे नोक तथा सरल धार
¹ 'वक्रे'ति पाठान्तर प्रामादिकम् ।
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हरीतक्यादिवर्गः
वाले और चिकने। कोपलें (नवीन पत्र) लाल रंग की। **पुष्प—**स्त्रीपुष्प और पुंपुष्प अलग २ वृक्षों पर तथा सवृन्त काण्डज पुष्पसमूहों में एवं बाह्य कोषों (पंखुड़ियों) से हीन। अष्ठिफल (Drupe) शुष्क, चिकने, झुर्रीदार, गोल, बहुत छोटे, एवं पकने पर धूसर वर्ण के हो जाते हैं।
इस वृक्ष की पत्तियों, पर्णवृन्तों तथा टहनियों पर एक प्रकार की लम्बी २ शृङ्गवत् रचना लगी रहती है जिन्हें कृमिगृह (Galls-गॉल्स) कहते हैं। ये एक प्रकार के कीड़ों, जिन्हें एफिस (Aphis) कहा जाता है द्वारा निर्मित होते हैं। इन कृमिगृहों को ही काकरासिंगी कहते हैं। ये विभिन्न माप के ३-९ इञ्च लम्बे, पोले, एवं कड़े होते हैं। इनका बाह्य पृष्ठ हल्का हरिताभ बादामी रंग का, पतला तथा झालरदार (Fimbriated) दिखलाई देता है। इसको तोड़ने पर अन्दर का पृष्ठ रक्ताभ दिखलाई देना है जो महीन रजः कणों से ढका रहता है। सूक्ष्मदर्शक यन्त्र द्वारा देखने से यह सिद्ध हुआ है कि ये कण उन कीड़ों के भूतदेह तथा उनके मल हैं। काकरा-सिंगी का चूर्ण स्वाद में अत्यन्त कसैला तथा कुछ कड़वा होता है तथा इसमें तारपीन के तैल की तरह गन्ध आती है।
सिंतिडीक जाति (Rhus) के वृक्षों में भी कृमिगृह बनते हैं परन्तु वे काकरासिंगी से भिन्न हैं। कुछ लोगों ने भ्रम से कर्कट वृक्ष का नाम हस् सक्सिडेनिया (Rhus succedanea Linn.) दे दिया है जो उचित नहीं है।
प्राचीन ग्रन्थों में इसके कीड़ों से उत्पन्न होने के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता लेकिन कास आदि के लिये इसका बहुत प्रयोग किया गया है।
**रासायनिक संगठन—**इसमें एक हलके हरिताभ पीतवर्ण का एवं तारपीन के तेल की तरह गन्धवाला उड़नशील तैल १-३%, रवेदार हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) ३-४%, टॅनिन ६०%, गम मॅस्टिक (Gum mastic) ५%, एक रालीय पदार्थ तथा दो अन्य रवेदार अम्ल पाये जाते हैं।
**गुण और प्रयोग—**यह बल्य, कफनिःसारक, उष्ण एवं ग्राही है। इसमें के उड़नशील तैल के कारण इससे चमकश्वास कास, श्वासनलिका शोथ एवं राजयक्ष्मा आदि में अच्छा लाभ होता है। इससे श्लेष्मिककला को बल मिलकर कफ बाहर निकलने लगता है एवं नया कफ बनने नहीं पाता। इसमें टॅनिन बहुत होने के कारण इसका अतिसारादि में भी अन्य औषध के साथ उपयोग किया जाता है। आमाशय के प्रकोप से उत्पन्न वमन, हिक्का, जीर्ण अतिसार, आमातिसार तथा उपजिह्विका की वृद्धि से उत्पन्न खांसी आदि में इसको देने से अच्छा लाभ होता है। बच्चों के लिये यह विशेष लाभदायक है। वयस्कों के लिये इसकी साधारण मात्रा १०–२० की है।
(१) इसके चूर्ण को घृत में भूनकर उसमें मिश्री मिलाकर संग्रहणी (Dysentery) में देने से बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में दन्तोद्भव के समय जब खांसी, ज्वर, अतिसार एवं पाचन के विकार आदि होते हैं, तब काकरासिंगी, अतीस एवं छोटी पीपल समान मात्रा में लेकर उसके चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इस चूर्ण में नागरमोथा भी कुछ लोग मिलाते हैं। बच्चों के श्वास में मूली के फल एवं इसके चूर्ण को मधु तथा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (३) शुष्क कास तथा अन्य श्वसन संस्थान के विकारों में काकरासिंगी, भारङ्गीमूल, सोंठ, छोटी पीपल, कचूर तथा मुनक्का इन का चूर्ण १५ र० की मात्रा में मधु के साथ देना चाहिये। (४) कफज छर्दि में नागरमोथा एवं इसका चूर्ण मधु के साथ चटाने से लाभ होता है।
१०० भावप्रकाश निघण्टुः (५) इसका बाह्य लेप सोरियेसिस् ( Psoriasis ) नामक जीर्ण चर्मरोग में किया जाता है तथा मसूड़ों आदि से खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराया जाता है । मात्रा - चूर्ण ३-२ मा० । अथ कट्फलस्य ( कायफल ) नामानि गुणांश्चाह कट्फलः सोमवल्कश्च कैटर्यः कुम्भिकाऽपि च । श्रीपर्णिका कुमुदिका भद्रा भद्रवतीति च ॥ कट्फलस्तुवरस्तिक्तः कटुर्वातकफज्वरान् । हन्ति श्वासप्रमेहार्शः कासकण्ठामयारुचीः ॥ १८१॥ कायफल के नाम तथा गुण - कट्फल, सोमवल्क, कैटर्य, कुम्भिका, श्रीपर्णिका, कुमुदिका, भद्रा और भद्रवती ये सब कायफल के नाम हैं। कायफल - कषाय, तिक्त तथा कटु रसयुक्त होता है तथा वात, कफ, ज्वर, श्वास, प्रमेह, बवासीर, कास, कण्ठसम्बन्धी रोग तथा अरुचि को दूर करता है ॥ १८०-१८१ ॥ ६० कट्फल (कायफल ) हि०-कायफर, कायफल, काफल । ब०-कायछाल, कायफल, कट्फल । क०-किरिशि- वनि । ते०-कैदूर्यमु । म०-मा०-गु०-पं०-कायफल । खासिया०-डिंगसोलिर । ता०-मरु- दम्पतै । फा०-दारशीशान् । अ०-उदुलुवर्क, अजूरी । अं०-Box Myrtle; Bay-berry ( बाक्स मिर्टल; बे-बेरी) । ले०- Myrica nagi, Thunb.; (मायूरिका नेगी) Fam. Myricaceae ( मायरीकेसी ) । यह हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में रावी से पूरब की ओर, खासिया पहाड़, सिलहट तक, ३-६ हजार फीट के बीच पाया जाता है और सिंगापुर में भी इसके वृक्ष देखने में आते हैं। चीन तथा जापान में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसके मध्यम ऊंचाई के सदाहरित वृक्ष होते हैं। छाल बादामी धूसर अथवा कृष्णाभ, भारी, सुगन्धित, करीब ३/८ इंच मोटी और खुरदरी होती है। काष्ठ-३/४ इंच से १ इंच मोटा, बिना रेशे का और रक्ताभ बादामी होता है। पत्रनाल, मञ्जरी तथा नवीन शाखाओं पर बादामी रोमावरण होता है। पत्ते-४ से ८ इंच लम्बे तथा १ १/२-२ इंच चौड़े, ऊपर से भालाकार अथवा कुछ २ आय- ताकार भी और उनके अधः पृष्ठ प्रायः सुरमई रंग के होते हैं। फूल-लाल । फल ३/८ इंच लम्बे, अण्डाकार, कुछ चिपटे, पृष्ठ पर दानेदार और पकने पर रक्ताभ या पीताभ बादामी होते हैं। फलों में मोम की तरह एक तेल होता है। ये फल स्वाद में कुछ खट्टे होते हैं। इन्हें सिलहट में 'सोफी' कहते हैं जिन्हें लोग खाते हैं। यद्यपि इस वृक्ष का नाम कायफल है तब भी औषधार्थ इसकी छाल का ही प्रयोग 'काय- फल' नाम से किया जाता है। इस छाल को सूंघने से छींक आती है तथा इसे जल में डालने पर जल लाल हो जाता है । आधुनिक विद्वान् इसके फल का भी औषधार्थ प्रयोग बतलाते हैं। भ्रमवश कितने वैघ जंगली जायफल, ले०-मायरिस्टिका मलवारिका (Myristica malab- arica Lam. ) के वृक्ष को कायफल का वृक्ष बतलाते हैं। जंगली जायफल के फल के ऊपर जावित्री के समान जो छिलका होता है उसको रामपत्री कहते हैं। कायफल के फल का छिलका न जावित्री के समान होता है और न रामपत्री कहलाता है। कुछ लोगों ने इस वृक्ष को कुम्भी वृक्ष, ले०-केरेया आर्बोरिया (Careya arborea Roxb.) माना है जो गलत है। हरीतक्यादिवर्गः १०१ रासायनिक संगठन - इसमें कुछ टैनिन, शर्करा सम द्रव्य तथा कुछ लवण रहते हैं। इसके चूर्ण में एक मायुरिसेटिन ( Myricetin ) नामक रंजक पदार्थ प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ग्राही, स्वेदजनक, कफघ्न, वातहर, शोथघ्न, शिरोविरेचक, उत्तेजक तथा गर्भाशयसंकोचक है। अधिक मात्रा में लेने से इससे वमन होता है तथा थकावट मालूम होती है । इसका प्रयोग घरेलू औषध के रूप में अनेक रोगों में किया जाता है। (१) सोंठ एवं दालचीनी के साथ इसका क्वाथ प्रतिश्याय, गले की सूजन, मुखपाक, स्वरभंग, तमकश्वास, जीर्ण श्वासनलिका शोथ, कास तथा अग्निमांद्य, अरुचि, आध्मान, कुपचन, आमा- तिसार, रक्तातिसार, मूत्रातिसार, गण्डमाला एवं गृध्रसी आदि में दिया जाता है। (२) अर्श में कत्था, हींग एवं कर्पूर के साथ या घृत के साथ इसका लेप लाभदायक है तथा इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। (३) केशर, काले तिल तथा सनई के बीजों को इसके साथ पूर्ण मात्रा में गुड़ के साथ देते हैं जिससे कष्टार्तव में अच्छा लाभ होता है। इसके देने के कुछ देर बाद भोजन देना चाहिये नहीं तो जी मिचलाने लगता है। इसके चूर्ण का पिचु भी योनि में धारण कराया जाता है। (४) प्रतिश्याय, चक्कर, शिरःशूल एवं अपस्मार आदि में इसके नस्य से लाभ होता है। (५) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन किया जाता है तथा इसका चूर्ण व्रणों पर डाला जाता है। इसको घिसकर सूजन, चोट एवं मोच आदि पर लगाने से लाभ होता है। (६) इसका तैल व्रणों के लिये लाभदायक है तथा संधिशूल में इसे लगाते हैं। (७) सिरके में इसे घिसकर मसूड़ों पर रगड़ने से दंतशूल दूर होता है तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं। (८) इससे सिद्ध तैल का प्रयोग कर्णशूल में कर्णबिन्दू के रूप में किया जाता है। (९) हैजे में हाथ पैर ठंडे हो जाने पर इसके चूर्ण को सोंठ के साथ मिलकर हाथ पैरों पर मलते हैं। (१०) इसके फलों को उबालने से एक मोम के सदृश पदार्थ निकलता है जिसका व्रण पूरण के लिये प्रयोग करते हैं। मात्रा - चूर्ण १०-३० र० आर्द्रक रस एवं मधु के साथ । बच्चों को १-२ र० । अथ भार्गी ( भारङ्गी ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह भार्गी भृगुभवा पद्मा फञ्जी ब्राह्मणयष्टिका । ब्राह्मण्यङ्गारवल्ली च खरशाकश्च हञ्जिका ॥ १८४॥ भार्गी रुक्षा कटुस्तिक्ता रुच्योष्णा पाचनी लघुः । दीपनी तुवरा गुल्मरक्तनुन्नाशयेद् ध्रुवम् ॥ शोथकासकफश्वासपीनसज्वरमारुतान् ॥ १८३ ॥ भार्ङ्गी (बभनेटी) के नाम तथा गुण - भार्गी, भृगुभवा, पद्मा, फञ्जी, ब्राह्मणयष्टिका, ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाक और हञ्जिका ये सब नाम भार्ङ्गी के हैं। भार्ङ्गी-रूक्ष, कटु, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त रुचिकारक, उष्णवीर्य, पाचक, लघु तथा अग्निदीपक होती है। एवं गुल्म, रक्तदोष, शोथ, कास, कफ, श्वास, पीनस, ज्वर और वायु को नष्ट करती है ॥ १८२-१८३ ॥
१०२ भावप्रकाशनिघण्टुः ६१ भार्गी ( भारङ्गी ) भारङ्गी के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं तथा इस नाम से ४ वनस्पतियों की छाल ली जाती है। बङ्गाल में काशिया नामक डाक्टरी ओषधि का प्रतिनिधि 'ख' का व्यवहार भारङ्गी नाम से होता है। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी अपनी 'वनौषधि दर्शिका' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि भारङ्गी नाम से बाजार में बिकनेवाली छाल क्लेरोडेंड्रान ( Clerodendron ) की नहीं मालूम होती जिसे अधिकांश लोगों ने भारङ्गी माना है तथा यह संभवतः 'ख' की ही छाल हो। डा० देसाई 'क' को ही शाखीय भारङ्गी मानते हैं तथा अन्य अधिकांश विद्वानों ने भी इसे ही भारङ्गी माना है। अन्य दो 'ग' तथा 'घ' वनस्पतियों का भी कहीं २ व्यवहार होता है। इन चारो वनस्पतियों का अलग २ वर्णन नीचे दिया जा रहा है। प्राचीन समय में इसका आन्तरिक प्रयोग श्वास, कास आदि में किया गया है तथा सुश्रुत (उ० अ० ६१) में अपस्मार के लिये एक विशेष प्रकार से निर्मित सुरा का प्रयोग बतलाया गया है। इसका बाह्य प्रयोग गण्डमाला, कुरंड ( वृद्धि ) तथा शस्त्रक्षत में किया गया है। ( क ) Clerodendron serratum, Spreng. (क्लेरोडेन्ड्रोनू सेरेंटम्, स्प्रेग) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हि०-भारङ्गी, भारिङ्गी, ब्रह्मयष्टि, बभनेटी। बं०-बामन हाटी, भुइजाम । म०-भारङ्ग । गु०-भारङ्गी। क०-गंडुभारङ्गी । ते०-नालनिरंडु । ने०-चूया । पं०- भाड़ङ्गी । मा०-भाराङ्गमूल । ता०-चेरूट्टेकु । जोनसार०-बनवाकरी । फा०-हंजिका । यह हिमालय में सतलज से खांसिया पहाड़ और आसाम तक तथा ब्रह्मा, नीलगिरी, पश्चिम- घाट थाना, रत्नागिरी और सिलोन में पाई जाती है। इसके पौधे ३ से ५ हजार फीट की ऊँचाई तक प्रायः पर्वतों के घासवाले ढालों पर होते हैं। भारङ्गी क्षुप जाति की वनौषधि ४-८ फीट तक ऊँची होती है। शाखाएँ-इसके काष्ठमय मूलस्तम्भ से प्रतिवर्ष शाखाएं निकलती हैं। प्रत्येक गांठ पर तीन-तीन पत्ते रहते हैं जो ४ से ८ इञ्च लम्बे, १५-२३ इञ्च चौड़े, आयताकार, अंडाकार-आयताकार या भालाकार, तीक्ष्ण दन्तुर तथा शिराओं के ५ जोड़ों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या कुछ नीले रङ्ग के आते हैं। फल-चौथाई इञ्च लम्बे, गोल, काले, पकने पर जामुनी रङ्ग के हो जाते हैं। इस क्षुप की छाल या जड़ का व्यवहार किया जाता है। अधिकांश विद्वान् इसको ही शाखीय भारङ्गी मानते हैं लेकिन श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी लिखते हैं कि इस नाम से जो छाल बाजारों में बिकती है वह इस वनस्पति की न होकर सम्भवतः निम्न वर्णित 'ख' की छाल हो । क्योंकि बाजार की छाल मोटी होती है जो इस छोटे से क्षुप की नहीं हो सकती । रासायनिक संगठन-इसमें एक नारङ्गी रंग का रालीय पदार्थ, स्टार्च तथा अन्य तिक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कफघ्न, श्वासहर, वातघ्न, दीपन, पाचन तथा शोथघ्न है। इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, यक्ष्मज कास, फुफ्फुस विकार, वातकफज्वर तथा आमवात में किया जाता है। इसमें ज्वरघ्न तथा कफघ्न गुण अल्प मात्रा में होने के कारण ज्वर में इसके साथ अन्य ज्वरहर औषधियां देनी पड़ती हैं तथा कफज व्याधियों में काकड़ासिंगी या कायफल इसके साथ दिया जाता है। प्रतिश्याय एवं कफयुक्त श्वास आदि में इसके साथ सोंठ या घोड़वच देते हैं।
हरीतक्यादिवर्गः १०३ इसके पत्तों का पोल्टिस बनाकर फोड़ों के ऊपर लगाते हैं। उपदंशजन्य सन्धिवात में इसका गोंद लाभदायक है। इसके पत्तों तथा कोमल डालियों का रस परिसर्प ( इरपीज ) एवं पेंफीगस् नामक विस्फोटों पर लगाया जाता है। रत्नागिरी में इसके पत्तों का शाक मलेरिया में खाते हैं। इसके बीजों का चूर्ण घी में भूनकर शोथ में रसायन के रूप में खाते हैं। मात्रा-चूर्ण १३-३ मा० । ( ख ) Picrasma quassioides, Ben. (पिक्रेस्मा क्वासिओइडिस, बेन) । Fam. Sima- rubaceae (सिमॅरूबेंसी)। हि०-भारङ्गी, करूई-तिथाई। बं०-मुसुंगी । म०-कदाशिंग । पं०-तित्थ, बेरिंग, पुथोरिन । ने०-शामबारंगी । अं०-Quassia (कॅसिया) । यह हिमालय के बाहरी भाग में चेनाव से लेकर पूर्व की ओर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर तथा चम्बा, कुल्लू, बशहर, उत्तरी गढ़वाल में ६०००-८००० फीट की ऊँचाई पर एवं नेपाल, भूटान तथा आसाम में खासी एवं नागा पहाड़ियों पर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर पायी जाती है। इसकी बड़ी-बड़ी झाड़ी या छोटे वृक्ष होते हैं जिनमें थोड़ी परन्तु मजबूत शाखायें होती हैं जिनपर प्रायः सफेद दाग होते हैं। पत्र-अयुग्म पक्षकार, ९-१५ इञ्च लम्बे, अरलु वृक्ष के पत्तों के समान तथा रक्तरोमश मालूम होते हैं। पत्रक-९-१५, अभिलट्वाकार, आरावत तथा उनका अग्र लम्बा होता है एवं सबसे नीचे के पत्रक बहुत छोटे तथा उपपत्रों के समान होते हैं। पुष्प- हलके हरे रङ्ग के, पार्श्विक तथा सवृन्त-काण्डज पुष्पसमूहों में। अष्ठिफल-बहुत छोटे, पकने पर काले रंग के तथा प्रत्येक फल में एक बीज होता है। इस क्षुप के टुकड़ों या छाल का व्यवहार बंगाल में भारंगा नाम से किया जाता है। यह पीताभ श्वेत या चमकीले पीले रंग के, हल्के, लचीले लेकिन आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन तथा स्वाद में अत्यन्त कड़वे होते हैं। यह डाक्टरी की काशिया नामक वनस्पति का अच्छा प्रतिनिधि है। रासायनिक संगठन-इसमें पिकैस्मिन् ( Picrasmin ) से ठीक मिलता जुलता एक क्षाराम ०००५%, एक क्वासीन् (Quassin) नामक कडवा पदार्थ तथा एक अन्य प्रभायुक्त एवं क्लोरोफार्म में घुलनशील कडवा पदार्थ ००१५% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह एक अत्यन्त कटु द्रव्य है। इसका प्रयोग आमाशय के दौर्बल्य से उत्पन्न अग्निमान्द्य में लाभदायक होता है लेकिन अधिक मात्रा में लेने से इससे प्रक्षोभ होकर वमन होता है। इसमें अन्य कडवे द्रव्यों की तरह टैनिन् न होने के कारण इसको लोह के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इसको फांट या हिम के रूप में अधिकतर व्यवहार करते हैं। पंजाब में ज्वर एवं कृमियों के लिये इसकी छाल तथा पत्तों का व्यवहार किया जाता है। सूत्रकृमि (Thread-worm) के लिये इसके फांट ( १ में १० ) की बस्ति दी जाती है। इसके पत्तों को पीसकर खुजली आदि में लगाते हैं। इसके सत्त्वों का उपयोग बागवानी में जन्तुओं का नाश करने के लिये किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १-४ रत्ती । हिम ३-१ औंस। ( ग ) Premna herbacea, Roxb. (प्रेम्ना हरबेसिया रॉक्सव.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हि०-भारंगी । बं०-भुइजाम । क०-नयित याग। ता०-शिरुकेट। ने०-चूअ । कों०-निचिंश । लेप०-ईं।
१०४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी छोटी झाड़ी हिमालय तथा दक्षिण में कोंकण के पहाड़ी भागों में बरसात के दिनों में होती है। इसका वायवीय भाग मुलायम एवं शाखकीय होने से यह ऊँचा नहीं होता तथा पत्तियाँ जमीन पर फैली रहती हैं। पत्ते-४ इंच तक लंबे, २ से ३ इंच चौड़े, विनाल, अभिलट्वाकार, शिराओं पर मृदुरोमश एवं शिराएँ ५ युग्म होती हैं। पुष्प-छोटे, श्वेत, एवं १ १/२ इंच व्यास के समस्थ काण्डज गुच्छ में आते हैं। फल-१/२ इंच एवं गोल होता है। मूल-जमीन के नीचे, लंबे परंतु थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठदार होते हैं। ये गन्धहीन एवं स्वाद में कड़वे होते हैं तथा इनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूलत्वक में एक नारङ्गी बादामी रङ्ग की अम्ल राल तथा अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ तथा कुछ स्टार्च रहता है। इसमें टैनिन् नहीं होता। गुण और प्रयोग-मारङ्गी नाम से यद्यपि कोंकण की तरफ इसका व्यवहार होता है तब भी इसमें भारङ्गी के गुण नहीं हैं। डा० देसाई लिखते हैं कि इसका उपयोग करके देखा गया लेकिन इसमें भारङ्गी के गुण नहीं मालूम पड़े। प्रतिश्याय आदि में इसका उपयोग करते हैं। तमकश्वास में इसका कल्क सोंठ तथा उष्ण जल के साथ या भारङ्गी मूल को आर्द्रक स्वरस या उष्ण जल के साथ देते हैं। शिरःशूल में इसकी जड़ उष्ण जल में घिसकर सर में लगाई जाती है। कानों में व्रण होने पर इसको मधु में घिसकर कान में डालते हैं। गठिया में इसका उपयोग करते हैं। इसे बिहार में गठिया, गँठिया कहते भी हैं। इसके बीजों को मठ्ठे में उबाल कर उदर रोग में शौच साफ होने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (घ) Clerodendrum siphonanthus, (R. Br.) C. B. Clarke (क्लेरोडेन्ड्रम् सिफोनेन्थस्)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनेसी)। हि०-चिनगारी, भारंगी। सं०-ब्रह्मय- ष्टिका। बं०-बामनहाटी। पं०-अरनि। इसके क्षुप हिमालय में तथा दक्षिण के पर्वतीय भागों में मिलते हैं। यह ४-६ फीट ऊँचा होता है। कांड-१ इंच तक मोटा, नालीदार तथा भीतर से पोला होता है। पत्ते-प्रति चक्र में ३-५ की संख्या में तथा ६ से ९ इंच लम्बे, १ से १॥ इंच चौड़े, पतले भालाकार, विनाल तथा कड़े होते हैं। पुष्प-९-१८ इंच लम्बी डंडी पर सफेद रंग के कुछ रक्तिमा लिये हुये होते हैं। पुष्पकोश की नली ३-४ इंच लम्बी होती है। फल-गोलाकार, ३/८ इंच लम्बे एवं जामुनी रंग के होते हैं तथा वाह्यपुट गहरे लाल रंग का एवं बढ़ा हुआ होता है। बीज-१ से ४ तक जुड़े हुए होते हैं। मूलका स्वाद-कड़वा तथा कषाय होता है तथा औषधि कार्य में इसी का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसका मुख्य सत्व एक क्षाराम होता है। गुण और प्रयोग-इसके पोले कांड के टुकड़े बंगाल में तागे में पिरोकर कई रोगों से बचने के लिये पहने जाते हैं। इसका मूल खांसी तथा तमक श्वास में दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके मूल का कल्क तथा सोंठ को उष्ण जल के साथ खिलाते हैं। इसके पत्तों का रस घी के साथ मिला कर परिसर्प में लगाया जाता है। मांसक्षय वाले बच्चों को इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है।
अथ पाषाणभेदः, तस्य नामानि गुणांश्चाह पाषाणभेदकोऽश्मघ्नो गिरिभिद्भिन्नीयोजिनी। अश्मभेदो हिमस्तिक्तः कषायो बस्तिशोधनः॥ भेदनो हन्ति दोषार्शोगुल्मकृच्छ्राश्महृद्रुजः। योनिरोगप्रमेहांश्च प्लीहशूलव्रणानि च ॥
हरीतक्यादिवर्गः १०५ पाषाणभेद के नाम तथा गुण-पाषाणभेदक, अश्मघ्न, गिरिभिद् और भिन्नीयोजिनी ये सब पाषाणभेद के नाम हैं। पाषाणभेद-शीतल तथा तिक्त और कषायरस युक्त, बस्ति (मूत्राशय) का शोधन करने वाला और भेदक होता है। और वातादिक दोष, बवासीर, गुल्म, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, हृद्रोग, योनिरोग, प्रमेह, प्लीहा, शूल तथा व्रण को दूर करता है॥ १८४-१८५॥
६२ पाषाणभेद पाषाणभेद एक संदिग्ध वस्तु है। इसके स्थान पर अनेक वनस्पतियाँ ली जाती हैं तथा विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न वनस्पतियों को पाषाणभेद मानते हैं। राजनिघण्टु में पाषाणभेदक, वटपत्री, शिलावल्का तथा चतुष्पत्री ये पाषाणभेद के चार भेद वर्णित हैं। निम्नलिखित वनस्पतियों को भिन्न-भिन्न आधुनिक विद्वान् पाषाणभेद मानते हैं। १. Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वॉल,)। Fam. Saxifragaceae (सैक्सिक्रॅगासी)। २. Aerva lanata, Juss. (एख्वा लैनेटा, जस.)। Fam. Amaranthaceae (अॅमरेंन्थेसी)। ३. Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅन्चो पिन्नॅटा पर्स.)। Fam. Crassulaceae (क्रॅसुलॅसी)। ४. Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् अॅरोमैटिकस्, बेन्थ.)। Fam. Labiatae (लेबियैटी)। ५. Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)। ६. Rotula aquatica Lour. (रोटुला अॅक्वेंटिका लोर.)। Fam. Boraginaceae (बोरंजिनॅसी)। ७. Ocimum basilicum Linn. (ओसिमम् बॅसिलिकम् लिन.)। Fam. Labiatae (लेबियटी)। इन वनस्पतियों के अतिरिक्त कुछ लोगों ने एक खनिज पाषाणभेद भी लिखा है लेकिन उसका विशेष वर्णन नहीं मिलता है। उपर्युक्त वनस्पतियों में से अधिकांश मूत्रल अवश्य हैं लेकिन प्रथम वनस्पति सैक्सिफ़्रेगा लिग्युलेटा का ही ग्रहण पाषाणभेद नाम से उचित है। उपर्युक्त वन- स्पतियों का अलग-अलग वर्णन आगे दिया जा रहा है। ओसिमम् बॅसिलिकम् का वर्णन आगे तुलसी के साथ दिया जावेगा। (१) Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। सं०-पाषाणभेद, वटपत्रीभेद। हि०-पखानभेद, सिलफडा, पोपल, वनपत्रक, दकचु। म०- पाषाणभेद । पं०-शफ़्रोकी। ने०-सोहंपे सोभा। का०-बयेव। रावी-सप्रोत्री। खासिया-अतिभ। चिनाब-बलूपिया। कुमाऊँ-शिलफोडा। इसके पौधे कश्मीर, नेपाल तथा हिमालय के मध्य भाग में प्रायः ५००० फीट के ऊपर पर्वतों की ढालों पर पत्थरों की दरारों में बहुतायत से निकलते रहते हैं। यह क्षुप जाति की वनस्पति बारहौ मास पायी जाती है। मूलस्तम्भ-रक्ताभ (भीतर सफेद) और लगभग एक इञ्च मोटा होता है। इससे पतले उपमूल निकलकर पत्थरों के बीच में फैले रहते
१०६ भावप्रकाशनिघण्टुः हैं। पत्र-मांसल, चिकने, कुछ-कुछ गोलाई लिये, प्रायः ३-५ इञ्च व्यास में, किनारे पर सूक्ष्म सघन शल्कों से युक्त (Ciliate = सीलियेद) तथा निचले पृष्ठ पर प्रायः गुलाबी रंग के होते हैं। एक स्थान में प्रायः ३ या ४ पत्तियों से अधिक नहीं निकलतीं। फूल-छोटे, सफेद, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं। फल-नीलाभ श्वेत तथा छोटे होते हैं। इनके मोटे मूल के टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये टुकड़े करीब १-२ इञ्च लम्बे, ३-१ इञ्च मोटे, कपिशवर्ण के, कड़े एवं इनकी छाल खुरंदरी तथा झुर्रीदार होती है। इन पर टूटे हुये उपमूलों के निशान एवं गोल गढ़े रहते हैं। इनका आन्तरिक भाग सफेद होता है। इनका स्वाद कुछ सुगन्धित एवं कसैला होता है। कुछ लोग इसे वटपत्री मानते हैं। रासायनिक संगठन - इसके मूल में चूना १११%, टैनिक तथा गॅलिक ॲसिड १५३%, शर्करा ५३%, गोंद २३%, अलब्यूमिन् ७१%, स्वांचे १९%, खनिजक्षार ३३% तथा कॅल्शियम ऑक्झॅलेन् (Calcium oxalate) १११% होता है। गुण और प्रयोग - इसका मूल स्नेहन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, ग्रांही एवं श्लेष्मघ्न है। इससे मूत्र की वृद्धि होकर उसकी अस्वच्छता दूर होती है तथा अश्मरी भी घुलकर निकल जाती है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, वस्तिरोग, आमातिसार एवं कास आदि फुप्फुस विकारों में किया जाता है। (१) वृक्कशूल एवं अश्मरी आदि में इससे बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में इसको दूध में घिसकर देने से पेशाब की अस्वच्छता दूर होती है। दन्तोद्भेद के समय जब मुख में व्रण होते हैं तब इसको मधु के साथ घिसकर लगाते हैं। (३) फोड़ों एवं नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप किया जाता है। (४) ग्राही होने के कारण आमातिसार में इससे लाभ होता है। आंत्र के लिए बल्य होने के कारण ज्वर में अतिसार होने पर इसका उपयोग किया जाता है। आन्त्रशिथिलता के कारण उत्पन्न अतिसार में भी प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा - चूर्ण ५-२० र०। (२) Aerva lanata, Juss. (एरवा लॅनॅटा, जस.)। Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरॅन्थेसी)। सं०-आदानपाको, शतकाभेदी ? हि०-गोरखगांजा, गोरखबूटी, कपूरीजड़ी। बं०-चय । गु०-गोरख गांजो, कपूरो मधुरी । म०-कपूरफुटी, कुमरींडी । पं०-भु(बु) इक्कलान । सि०-बूर । ता०-चिरूबूले । ते०-पेंडिदोंड । क०-विलेमुलि । मला०-चिरापुल । इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप सभी स्थानों में मैदानों में पाये जाते हैं। कांड-अनेक, लचीले लेकिन स्वावलम्बी तथा श्वेत रोमों से युक्त। पत्र-एकांतरित, प्रधान काण्ड पर एक इञ्च तक लम्बे, आधा इञ्च तक चौड़े तथा अन्य शाखाओं पर छोटे, दीर्घ वृत्ताकार या अर्ध अंडाकार या कुछ गोलाई लिए हुये एवं अधोतल पर श्वेतररोमयुक्त होते हैं। पुष्प-छोटे, हरितभा श्वेत, गुच्छों में आते हैं। फल-चर्मल फल होता है जिसमें चमकीला काला बीज होता है। मूल-अनन्तमूल के समान और कर्पूर सदृश गन्धयुक्त। इसके पुष्पों को उत्तर हिन्दुस्तान में भु(बु) इक्कलान एवं गुजरात में बूर कहते हैं। गुण और प्रयोग - यह स्नेहन, मूत्रजनन, वेदनाहर, अश्मरीघ्न, कृमिघ्न एवं कासहर है। इसकी क्रिया अपामार्ग की तरह होती है। हरीतक्यादिवर्गः १०७ बस्तिस्थ अश्मरी में इसके पुष्पों का फांट देने से बहुत लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र में इसके मूल का क्वाथ देने से मूत्र की राशि बढ़कर लाभ होता है। तमकश्वास में इसकी सूखी पत्तियों तथा पुष्पों का धूम्रपान किया जाता है। Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅन्चो पिन्नॅटा पर्स.) । Fam. Crassulaceae (क्रासुलेसी) । सं०-पर्णबीज । हि०-जखमेहयात, अहिरावण, महिरावाण, पत्थरचूर । बं०-कोएपाता। म०- घायमारी । क०-काडुसले । इसके मांसल, बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी भागों में उत्पन्न होते हैं लेकिन दक्षिणी बंगाल मे अधिक पाये जाते हैं। कांड-स्वावलम्बी, मोटा, पोला, लाल तथा ४ फीट तक ऊँचा। पत्र-नीचे के प्रायः साधारण किन्तु ऊपर के संयुक्त, ३-५ या कभी ७ पत्रकों से युक्त। पत्रक-गोलदन्तुर, विपरीत क्रम में, मांसल एवं लट्वाकार । पुष्प-बड़े, नलिकाकार, २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ हरित तथा नीचे की ओर झुके हुये। इसके पत्तों के मूल से अंकुर प्ररोह निकलकर नया पौधा उत्पन्न हो जाता है। इसके पत्तों एवं स्वरस का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन - इसके स्वरस में कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium Sulphate) तथा ॲसिड टारट्रेट् ऑक पोटॅशियम् (Acid Tartrate of Potassium) एवं बचे हुए कल्क में कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate) होता है। गुण और प्रयोग - इसके पत्ते व्रणशोधक, व्रणरोपक, रक्तस्तम्भक, ग्राही तथा प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग रक्तस्राव, चोट, अतिसार, अश्मरी एवं विसूचिका आदि में किया जाता है। यह रक्तवाहिनी केशिकाओं का संकोच करके रक्तस्राव रोकता है इसलिये आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के रक्तस्राव में लाभदायक है। (१) रक्तयुक्त अतिसार में इसके पत्तों का रस ३ से ६ तोला, जीरा तथा दुगुने घी के साथ देने से खून गिरना बन्द होता है। (२) चोट, मोच, सभी प्रकार के व्रण, फोड़े एवं कीटदंश आदि पर इसके पत्तों को जरा गरम करके कूचकर बांधने से सूजन, रक्तिमा एवं वेदना कम होकर लाभ होता है। घावों के लिये यह बहुत ही अच्छी ओषधि है। नये व्रण का इतने जल्दी व्रण पूरण होता है कि बाद में निशान तक नहीं रहता । मात्रा-३-३ तो० । (४) Coleus aromaticus, Benth. (कोलियस ॲरोमेटिकस्, बेन्थ.) Fam. Labiatae (लॅवियेटी) । सं०-पाषाणभेदी । हि०-पाथरचूर, पत्थरचूर, पाषाणभेद। बं०-पाथर कुची, अम्ल कुची, पात्तेरचूर । म०-पानांचा ओवां । गो०-ओवापान । ता०-कर्पूरवल्ली । अं०-Country borage (कन्ट्री बोरेज)। इसका बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी प्रान्तों में तथा लङ्का में बगीचों आदि में रोपण किया जाता है। राजपूताना में वन्य अवस्था में भी मिलता है। इसका क्षुप १-३ फीट ऊँचा; कांड-सरस; पत्र-मोटे, सरस, गूदेदार, दन्तुर, रोमश, १-३ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, सुगन्धयुक्त एवं स्वाद में कटु । पुष्प-पुराने क्षुपों में ३ इञ्च लम्बे, हल्के बैगनी तथा गुच्छों में आते हैं।
१०८ भावप्रकाशनिघण्टुः मद्य को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। औषध में इसके पञ्चाङ्ग का व्यव- हार किया जाता है। मवेशियों के रोगों में भी इसे व्यवहार में लाते हैं। बंगाल की तरफ पाषाण भेद नाम से इसका उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक कार्व्हकाल (Carvacrol) नामक उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह दीपन, पाचन, वातनुलोमक, उद्वेष्टननिरोधी एवं अश्मरीघ्न है। इसका उपयोग अपचन, आध्मान, उदरशूल, दमा, जीर्णकास, अपस्मार एवं मूत्रसंस्थान के रोगों में किया जाता है। (१) अपचन, उदरशूल एवं आध्मान आदि में एक दो पत्तियों के ही उपयोग से शीघ्र लाभ होता है। बच्चों के उदरशूल में यह विशेष लाभदायक है। (२) दमा, जीर्णकास एवं अपस्मार आदि में इसका क्वाथ दिया जाता है। (३) नेत्राभिष्यन्द में इसका स्वरस पलकों पर लगाने से वेदना कम होती है। (४) शिरःशूल तथा गोजर के काटने पर इसको पीसकर लगाने से वेदना दूर होती है। मात्रा—स्वरस ५-६ बूंद शर्करा के साथ। (५) Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Eupho- rbiaceae (यूफोर्बियेसी)। सं०-पाषाणभेदक। हि०-छोटा पाषाणभेद। ता०-चेप्पुंजेरिजल। ने०-खोलासइस। बर्मा- मोमाका। इसकी हमेशा हरी रहने वाली झाड़ी आसाम, उत्तरी बंगाल, पश्चिम प्रायद्वीप, बर्मा तथा मध्य प्रदेश में उत्पन्न होती है। इसके पत्र-३ से ६ इंच लम्बे तथा १/२-३/४ इंच तक चौड़े होते हैं। पुष्प-मंजरी में छोटे-छोटे आते हैं। इसकी जड़ का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—यह मूत्रल तथा मृदुविरेचक होता है। इसका क्वाथ अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, सोजाक एवं फिरंग में प्रयुक्त होता है। (६) Rotula aquatica Lour. (रोटूला अॅक्वैटिका लोर.)। Fam. Boraginaceae (बोरेजिनेसी)। सं०-पाषाणभेद। ता०-चेप्पुनेरिजल। यह सभी स्थानों पर विशेषकर नदी के कछार में होता है। इसकी छोटी झाड़ी होती है। पत्ते-१/४-१ इंच लंबे, विनाल, सुवाकार तथा न्यूनाधिक रोमश होते हैं। पुष्प-छोटे तथा गुलाबी रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग—इसका मूल पाषाणभेदक के समान अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, एवं फिरंगादि रतिजन्य रोगों में व्यवहृत होता है। अथ धातकी (धाई) तस्या नामानि गुणाँश्चाह धातकी धातुपुष्पी च ताम्रपुष्पी च कुञ्जरा । सुभिक्षा बहुपुष्पी च वह्निज्वाला च सा स्मृता ॥ १८५ ॥ धातकी कटुका शीता मृदुकृत्तुवरा लघुः । तृष्णाऽतीसारपित्तास्रविषकृमिविसर्पजित् ॥ १. 'मदकृदि'ति पाठः । हरीतक्यादिवर्गः १०६ धायके नाम तथा गुण—धातकी, धातुपुष्पी, ताम्रपुष्पी, कुञ्जरा, सुभिक्षा, बहुपुष्पी और वह्निज्वाला ये सब धाय के नाम हैं। धाय-कडु तथा कषायरसयुक्त, शीतवीर्य, मृदुकारक (पाठा- न्तर मदकारक) और लघु है और यह प्यास, अतीसार, रक्तपित्त, विष, कृमि और विसर्प को दूर करती है ॥ १८६-१८७ ॥ ६३ धातकी हि०-धातकी, धवई, धाई, धाओला, धावा, धाय (धाय के फूल)। बं०-धाइफुल। मं०- धायटी, धावस । गु०-धावणी, धावडी ना फूल । क०-धांतकि । ते०-सेरिंगी, एर्रांपुड्डुं। उ०-जातिको। पं०-धा। अवध-धैती । ने०-दहिरी । ले०-Woodfordia floribunda, Salisb. (बुडफोर्डिआ फ्लोरीबंडा. सॅलिस्ब.); Syn. Woodfordia fruticosa Kurz. (बुडफोर्डिआ फ्रूटिकोसा, कुर्ज.)। Fam. Lythraceae (लिथ्रेसी)। धातकी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं देखने में आते हैं। ये पहाड़ों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं देहरादून के जंगलों में बहुतायत से पाये जाते हैं तथा वाटिकाओं में भी रोपण किये जाते हैं। इसका क्षुप बड़ा तथा १०-१२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएं-लम्बी, फैली हुई और सघन रहती हैं। नवीन शाखाओं तथा पत्तियों पर काले-काले बिन्दु होते हैं। पत्ते-समवर्ती या कुछ विषमवर्ती और कहीं-कहीं तीन-तीन पत्ते एक साथ गुच्छों में दिखाई पड़ते हैं। वे २-४ इंच लम्बे, ३/४-१ ३/४ इंच चौड़े, भालाकार या लट्वाकार-भालाकार, नोकदार तथा सरलधार होते हैं। पुष्प-१/२ से ३/४ इंच, चमकीले लालरंग के नलिकाकार फूल आते हैं। यह शाखाओं के संपूर्ण काण्ड से छोटे-छोटे गुच्छों में निकले रहते हैं। बीजकोष—छोटा और बीज—चिकने भूरे रंग के होते हैं। औषधि के लिये इसके फूलों का व्यवहार किया जाता है तथा इससे रेशम रंगने के लिये एक लाल रंग निकाला जाता है। रासायनिक संगठन —इसके फूलों में २०३/४% टैनिन् होता है तथा इसके क्षुप से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जो रंगने के काम आता है। गुण और प्रयोग—इसके फूल संग्राहक, उत्तेजक, विषहर, रक्तस्राव रोकने वाले एवं व्रणशोधक तथा व्रणरोपक होते हैं। इनका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, ज्वरातिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, अर्श, यकृत् विकार, सर्पविष तथा व्रण में किया जाता है। गर्भिणी में उत्तेजक औषध के रूप में बिना किसी हानि के इसका प्रयोग किया जा सकता है। अतिसार आदि में इसके साथ अन्य औषधियाँ भी दी जाती हैं। आसवों में सन्धान क्रिया ठीक होने एवं उसका रंग सुन्दर बनाने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) अतिसार एवं प्रवाहिका आदि में मट्ठे या मधु के साथ इसका पुष्पचूर्ण दिया जाता है या धाय के फूल, बेल की गूदी, लोध्र की छाल, सुगन्धवाला एवं गजपीपल सब समान लेकर, २ तोले का क्वाथ बना कर प्रयोग करते हैं। बच्चों के अतिसार में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। (२) मधु के साथ इसका चूर्ण या अवलेह रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अर्श आदि में लाभदायक है। श्वेतप्रदर में १ तोला पुष्प चावल के धोवन के साथ दिया जाता है। (३) कोंकण की तरफ 'मण्यारी' नामक सर्पविष के लिये यह रामबाण औषध मानी जाती है। इसके लिये धाय के पत्तों का स्वरस पिलाते हैं, नाक में डालते हैं एवं शरीर पर उसे मलते हैं।
(४) पैत्तिक शिरःशूल में इसके पत्तों का स्वरस सिर पर लगाया जाता है तथा उसके साथ-साथ मुख में तैल का कवलग्रह किया जाता है । (५) पानीदार विस्फोटों एवं दुर्गन्धयुक्त व्रणों में स्राव को कम करने के लिये तथा व्रण पूरण के लिये इसके पुष्पचूर्ण का उपयोग किया जाता है तथा इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी करते हैं। (६) आसवारिष्टों में शीघ्र किण्वोत्पत्ति के लिए धाय के फूलों का व्यवहार किया जाता है। इससे सन्धान भली प्रकार हो जाता है । मात्रा - पुष्पचूर्ण १-२ माशा ।
अथ मञ्जिष्ठा ( मंजीठ ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह मञ्जिष्ठा विकसा जिङ्गी समङ्गा कालमेषिका ॥ १८८ ॥ मण्डूकपर्णी भण्डीरी भण्डी योजनवल्ल्यपि । रसायनेयरुणा काला रक्ताङ्गी रक्तयष्टिका । भण्डीतकी च गण्डीरी मञ्जूषा वस्त्ररञ्जिनी । मञ्जिष्ठा मधुरा तिक्ता कषाया स्वरवर्णकृत् । गुरुष्णा विषश्लेष्मशोथयोन्यक्षिकर्णरुक् । रक्तातिसारकुष्ठाम्रवीसर्पव्रणमेहनुत् ॥ १९१ ॥
मंजीठ के नाम तथा गुण - मंजिष्ठा, विकसा, जिङ्गी, समङ्गा, कालमेषिका, मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, भण्डी, योजनवल्ली, रसायनी, अरुणा, काला, रक्ताङ्गी, रक्तयष्टिका, भण्डीतकी, गण्डीरी, मञ्जूषा और वस्त्ररञ्जिनी ये सब मंजीठ के नाम हैं। मंजीठ-मधुर, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वर को उत्तम करने वाली तथा वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, गुरु, तथा उष्णवीर्य होती है और विष, कफ, शोथ, योनि, नेत्र तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, रक्तातिसार, कुष्ठ, रक्तदोष, विसर्प, व्रण और प्रमेह दूर करने वाली होती है ॥ १८८-१९१ ॥
६४ मञ्जिष्ठा ( मजीठ ) हि०-मजीठ, मंजीठ । बं०-मञ्जिष्ठा । म०-मञ्जिष्ठ । ते०-मञ्जिष्ठतीठो, ताम्रवल्ली, मण्डास्टिक । ता०-मञ्जिट्टी, मन्दित्ता । गु०-मजीठ । पं०-मजीठ । मल०-पुन्त । फा०-रोदक । अ०-फुव्वहतु, फुव्वाह, फौहुल अवागीन । अं०-Madder root ( मँडर रूट ); Indian madder ( इण्डियन् मँडर ) । ले०-Rubia cordifolia, Linn. ( रूबिया कॉर्डिफोलिया, लिन्. ) । Fam. Rubiaceae ( रूबिएसी ) । मजीठ इस देश की पहाड़ी भूमि में पश्चिमोत्तर हिमालय से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर नीलगिरी, सीलोन और मलाका एवं नेपाल में ८ हजार फीट तक उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में दूर दूर तक फैल जाती है। इसकी लम्बी जड़ भूमि के भीतर दूर तक घुस जाती है। डण्ठल-कई गज लम्बा, गावदुम, खुरदरा, जड़ की ओर कठोर । छाल-सफेदी मायल किन्तु भीतर का भाग लाल होता है। शाखा प्रशाखाओ करके सघन बेल निकटवर्ती वृक्षो पर चढ़कर फैलती है। पत्ते-प्रत्येक ग्रन्थि पर चार चार के चक्रों में, जिसमें से दो बड़े होते हैं। ये १॥ से ४ इञ्च लम्बे, लट्वाकार-ताम्बूलाकार, नोकीले, खरस्पर्श युक्त या चिकने होते हैं। पत्रनाल-२ से ४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-नन्हें नन्हें श्वेतवर्ण के गुच्छों में रहते हैं। फल-काले, चने के बराबर तथा दो बीजों से युक्त होते हैं। मूल-लम्बे, लम्बगोल तथा ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर कुछ काले हो जाते हैं। मूल का स्वाद
प्रारम्भ में मिठास लिये हुये, लेकिन बाद में कुछ तीता और कड़वा होता है। इन्हीं मूलों का औषध में व्यवहार किया जाता है। बाजार में नेपाली, ईरानी, अफगानी तथा हिन्दुस्तानी नाम से चार प्रकार के मूल बिकते हैं जिसमें से अफगानी मूल जो सिन्ध के रास्ते से आता है वह अच्छा समझा जाता है तथा हिन्दुस्तानी कनिष्ठ मानते हैं। इनका व्यवहार रंगने के काम में भी किया जाता है। इसका पर्याय नाम जो 'समङ्गा' दिया गया है उसके विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसकी कभी कभी चिरायते में मिलावट रहती है। रासायनिक संगठन- इसके मूल में राल, गोंद, शर्करा, चूने के योग एवं रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। रंजक द्रव्यों में रक्त रविदास परपूरिन् ( Purpurin, पीत ग्लूकोसाइड मंजिस्टिन एवं गैरैन्सिन् ( Manjistin & Garancin ), नारंगरक्त अॅलिझॅरिन् ( Alizarin ) एवं पीत क्झैंथाइन् ( Xanthine ) आदि पाये जाते हैं। गुण तथा प्रयोग- यह रक्तशोधक, ग्राही, पौष्टिक, गर्भाशय संकोचक, शोथघ्न, त्वग्दोषहर, वेदनास्थापक, मूत्रल एवं व्रणरोपक है। अल्पमात्रा में देने से इससे मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों पर शामक प्रभाव पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में देने से कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इससे मूत्र एवं दुग्ध का रंग लाल हो जाता है। इसका क्वाथ अक्षवात, कामला, मूत्रावरोध, अश्मरी, आर्तववि- कार, अनार्त्तव, शोथ, रक्तातिसार, प्रमेह, छाती के शोथयुक्त विकार एवं चर्मरोग आदि में दिया जाता है। ( १ ) मंजिष्ठादि क्वाथ का उपयोग चर्मरोगों में बहुत लाभदायक है। इसके प्रयोग से त्वचा की रक्ताभिसरण क्रिया बढ़ कर उसकी विनिमय क्रिया में परिवर्तन होता है। इससे वातरक्त, दाद, खुजली, श्वित्र एवं व्यंग आदि में बहुत लाभ होता है । ( २ ) यह गर्भाशय संकोचक होने से प्रसव में बाद गर्भाशय शुद्धि के लिये इसके साथ ईश्वर मूल, पिपरामूल आदि अन्य औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इससे गर्भाशय संकोच होकर स्राव की वृद्धि होती है तथा पीड़ा कम होती है। ( ३ ) अश्मरी में शस्त्रकर्म करने के पूर्व एक बार इसका प्रयोग करके देखना चाहिये। इसके चूर्ण को १ माशे की मात्रा में दिन मे ३ बार देना चाहिये। इससे सभी प्रकार की पथरी गलकर निकल जाती है। यदि इससे लाभ न हुआ तो फिर शस्त्रकर्म किया जा सकता है। ( ४ ) यह फकरोग ( Rickets ) राजयक्ष्मा, आंत्रिकशैथिल्य एवं दुर्गन्ध युक्त जीर्ण अतिसार आदि में भी लाभदायक है। राजयक्ष्मज अतिसार एवं आंत्रिक व्रणों में इसके उपयोग से वेदना की शांति होती है। फुफ्फुसावरणशोथ ( प्ल्युरिसी-Pleurisy ) आदि छाती के विकारों में भी इससे लाभ होता है। ( ५ ) मंजिष्ठामेह में चन्दन के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। ( ६ ) मधु के साथ इसकी घिस कर लगाने से व्यङ्ग, दाद एवं श्वित्र आदि जीर्ण चर्मरोगों में बहुत लाभ होता है। लोध्र एवं चन्दन के साथ पीस कर इसे लगाने से विसर्प में लाभ होता है। ( ७ ) मजीठ, अर्जुन, मुलेठी एवं सुगन्धवाला इनका क्वाथ अस्थिभग्न में पिलाया जाता है तथा उसी का लेप भी करते हैं। केवल मजीठ एवं मुलेठी को काञ्जी में पीस कर लगाने से भी शोथ कम होकर पीड़ा कम होती है।