भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०६ भावप्रकाशनिघण्टुः हैं। पत्र-मांसल, चिकने, कुछ-कुछ गोलाई लिये, प्रायः ३-५ इञ्च व्यास में, किनारे पर सूक्ष्म सघन शल्कों से युक्त (Ciliate = सीलियेद) तथा निचले पृष्ठ पर प्रायः गुलाबी रंग के होते हैं। एक स्थान में प्रायः ३ या ४ पत्तियों से अधिक नहीं निकलतीं। फूल-छोटे, सफेद, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं। फल-नीलाभ श्वेत तथा छोटे होते हैं। इनके मोटे मूल के टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये टुकड़े करीब १-२ इञ्च लम्बे, ३-१ इञ्च मोटे, कपिशवर्ण के, कड़े एवं इनकी छाल खुरंदरी तथा झुर्रीदार होती है। इन पर टूटे हुये उपमूलों के निशान एवं गोल गढ़े रहते हैं। इनका आन्तरिक भाग सफेद होता है। इनका स्वाद कुछ सुगन्धित एवं कसैला होता है। कुछ लोग इसे वटपत्री मानते हैं। रासायनिक संगठन - इसके मूल में चूना १११%, टैनिक तथा गॅलिक ॲसिड १५३%, शर्करा ५३%, गोंद २३%, अलब्यूमिन् ७१%, स्वांचे १९%, खनिजक्षार ३३% तथा कॅल्शियम ऑक्झॅलेन् (Calcium oxalate) १११% होता है। गुण और प्रयोग - इसका मूल स्नेहन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, ग्रांही एवं श्लेष्मघ्न है। इससे मूत्र की वृद्धि होकर उसकी अस्वच्छता दूर होती है तथा अश्मरी भी घुलकर निकल जाती है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, वस्तिरोग, आमातिसार एवं कास आदि फुप्फुस विकारों में किया जाता है। (१) वृक्कशूल एवं अश्मरी आदि में इससे बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में इसको दूध में घिसकर देने से पेशाब की अस्वच्छता दूर होती है। दन्तोद्भेद के समय जब मुख में व्रण होते हैं तब इसको मधु के साथ घिसकर लगाते हैं। (३) फोड़ों एवं नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप किया जाता है। (४) ग्राही होने के कारण आमातिसार में इससे लाभ होता है। आंत्र के लिए बल्य होने के कारण ज्वर में अतिसार होने पर इसका उपयोग किया जाता है। आन्त्रशिथिलता के कारण उत्पन्न अतिसार में भी प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा - चूर्ण ५-२० र०। (२) Aerva lanata, Juss. (एरवा लॅनॅटा, जस.)। Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरॅन्थेसी)। सं०-आदानपाको, शतकाभेदी ? हि०-गोरखगांजा, गोरखबूटी, कपूरीजड़ी। बं०-चय । गु०-गोरख गांजो, कपूरो मधुरी । म०-कपूरफुटी, कुमरींडी । पं०-भु(बु) इक्कलान । सि०-बूर । ता०-चिरूबूले । ते०-पेंडिदोंड । क०-विलेमुलि । मला०-चिरापुल । इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप सभी स्थानों में मैदानों में पाये जाते हैं। कांड-अनेक, लचीले लेकिन स्वावलम्बी तथा श्वेत रोमों से युक्त। पत्र-एकांतरित, प्रधान काण्ड पर एक इञ्च तक लम्बे, आधा इञ्च तक चौड़े तथा अन्य शाखाओं पर छोटे, दीर्घ वृत्ताकार या अर्ध अंडाकार या कुछ गोलाई लिए हुये एवं अधोतल पर श्वेतररोमयुक्त होते हैं। पुष्प-छोटे, हरितभा श्वेत, गुच्छों में आते हैं। फल-चर्मल फल होता है जिसमें चमकीला काला बीज होता है। मूल-अनन्तमूल के समान और कर्पूर सदृश गन्धयुक्त। इसके पुष्पों को उत्तर हिन्दुस्तान में भु(बु) इक्कलान एवं गुजरात में बूर कहते हैं। गुण और प्रयोग - यह स्नेहन, मूत्रजनन, वेदनाहर, अश्मरीघ्न, कृमिघ्न एवं कासहर है। इसकी क्रिया अपामार्ग की तरह होती है। हरीतक्यादिवर्गः १०७ बस्तिस्थ अश्मरी में इसके पुष्पों का फांट देने से बहुत लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र में इसके मूल का क्वाथ देने से मूत्र की राशि बढ़कर लाभ होता है। तमकश्वास में इसकी सूखी पत्तियों तथा पुष्पों का धूम्रपान किया जाता है। Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅन्चो पिन्नॅटा पर्स.) । Fam. Crassulaceae (क्रासुलेसी) । सं०-पर्णबीज । हि०-जखमेहयात, अहिरावण, महिरावाण, पत्थरचूर । बं०-कोएपाता। म०- घायमारी । क०-काडुसले । इसके मांसल, बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी भागों में उत्पन्न होते हैं लेकिन दक्षिणी बंगाल मे अधिक पाये जाते हैं। कांड-स्वावलम्बी, मोटा, पोला, लाल तथा ४ फीट तक ऊँचा। पत्र-नीचे के प्रायः साधारण किन्तु ऊपर के संयुक्त, ३-५ या कभी ७ पत्रकों से युक्त। पत्रक-गोलदन्तुर, विपरीत क्रम में, मांसल एवं लट्वाकार । पुष्प-बड़े, नलिकाकार, २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ हरित तथा नीचे की ओर झुके हुये। इसके पत्तों के मूल से अंकुर प्ररोह निकलकर नया पौधा उत्पन्न हो जाता है। इसके पत्तों एवं स्वरस का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन - इसके स्वरस में कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium Sulphate) तथा ॲसिड टारट्रेट् ऑक पोटॅशियम् (Acid Tartrate of Potassium) एवं बचे हुए कल्क में कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate) होता है। गुण और प्रयोग - इसके पत्ते व्रणशोधक, व्रणरोपक, रक्तस्तम्भक, ग्राही तथा प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग रक्तस्राव, चोट, अतिसार, अश्मरी एवं विसूचिका आदि में किया जाता है। यह रक्तवाहिनी केशिकाओं का संकोच करके रक्तस्राव रोकता है इसलिये आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के रक्तस्राव में लाभदायक है। (१) रक्तयुक्त अतिसार में इसके पत्तों का रस ३ से ६ तोला, जीरा तथा दुगुने घी के साथ देने से खून गिरना बन्द होता है। (२) चोट, मोच, सभी प्रकार के व्रण, फोड़े एवं कीटदंश आदि पर इसके पत्तों को जरा गरम करके कूचकर बांधने से सूजन, रक्तिमा एवं वेदना कम होकर लाभ होता है। घावों के लिये यह बहुत ही अच्छी ओषधि है। नये व्रण का इतने जल्दी व्रण पूरण होता है कि बाद में निशान तक नहीं रहता । मात्रा-३-३ तो० । (४) Coleus aromaticus, Benth. (कोलियस ॲरोमेटिकस्, बेन्थ.) Fam. Labiatae (लॅवियेटी) । सं०-पाषाणभेदी । हि०-पाथरचूर, पत्थरचूर, पाषाणभेद। बं०-पाथर कुची, अम्ल कुची, पात्तेरचूर । म०-पानांचा ओवां । गो०-ओवापान । ता०-कर्पूरवल्ली । अं०-Country borage (कन्ट्री बोरेज)। इसका बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी प्रान्तों में तथा लङ्का में बगीचों आदि में रोपण किया जाता है। राजपूताना में वन्य अवस्था में भी मिलता है। इसका क्षुप १-३ फीट ऊँचा; कांड-सरस; पत्र-मोटे, सरस, गूदेदार, दन्तुर, रोमश, १-३ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, सुगन्धयुक्त एवं स्वाद में कटु । पुष्प-पुराने क्षुपों में ३ इञ्च लम्बे, हल्के बैगनी तथा गुच्छों में आते हैं।