भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१०८ भावप्रकाशनिघण्टुः मद्य को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। औषध में इसके पञ्चाङ्ग का व्यव- हार किया जाता है। मवेशियों के रोगों में भी इसे व्यवहार में लाते हैं। बंगाल की तरफ पाषाण भेद नाम से इसका उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक कार्व्हकाल (Carvacrol) नामक उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह दीपन, पाचन, वातनुलोमक, उद्वेष्टननिरोधी एवं अश्मरीघ्न है। इसका उपयोग अपचन, आध्मान, उदरशूल, दमा, जीर्णकास, अपस्मार एवं मूत्रसंस्थान के रोगों में किया जाता है। (१) अपचन, उदरशूल एवं आध्मान आदि में एक दो पत्तियों के ही उपयोग से शीघ्र लाभ होता है। बच्चों के उदरशूल में यह विशेष लाभदायक है। (२) दमा, जीर्णकास एवं अपस्मार आदि में इसका क्वाथ दिया जाता है। (३) नेत्राभिष्यन्द में इसका स्वरस पलकों पर लगाने से वेदना कम होती है। (४) शिरःशूल तथा गोजर के काटने पर इसको पीसकर लगाने से वेदना दूर होती है। मात्रा—स्वरस ५-६ बूंद शर्करा के साथ। (५) Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Eupho- rbiaceae (यूफोर्बियेसी)। सं०-पाषाणभेदक। हि०-छोटा पाषाणभेद। ता०-चेप्पुंजेरिजल। ने०-खोलासइस। बर्मा- मोमाका। इसकी हमेशा हरी रहने वाली झाड़ी आसाम, उत्तरी बंगाल, पश्चिम प्रायद्वीप, बर्मा तथा मध्य प्रदेश में उत्पन्न होती है। इसके पत्र-३ से ६ इंच लम्बे तथा १/२-३/४ इंच तक चौड़े होते हैं। पुष्प-मंजरी में छोटे-छोटे आते हैं। इसकी जड़ का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—यह मूत्रल तथा मृदुविरेचक होता है। इसका क्वाथ अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, सोजाक एवं फिरंग में प्रयुक्त होता है। (६) Rotula aquatica Lour. (रोटूला अॅक्वैटिका लोर.)। Fam. Boraginaceae (बोरेजिनेसी)। सं०-पाषाणभेद। ता०-चेप्पुनेरिजल। यह सभी स्थानों पर विशेषकर नदी के कछार में होता है। इसकी छोटी झाड़ी होती है। पत्ते-१/४-१ इंच लंबे, विनाल, सुवाकार तथा न्यूनाधिक रोमश होते हैं। पुष्प-छोटे तथा गुलाबी रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग—इसका मूल पाषाणभेदक के समान अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, एवं फिरंगादि रतिजन्य रोगों में व्यवहृत होता है। अथ धातकी (धाई) तस्या नामानि गुणाँश्चाह धातकी धातुपुष्पी च ताम्रपुष्पी च कुञ्जरा । सुभिक्षा बहुपुष्पी च वह्निज्वाला च सा स्मृता ॥ १८५ ॥ धातकी कटुका शीता मृदुकृत्तुवरा लघुः । तृष्णाऽतीसारपित्तास्रविषकृमिविसर्पजित् ॥ १. 'मदकृदि'ति पाठः । हरीतक्यादिवर्गः १०६ धायके नाम तथा गुण—धातकी, धातुपुष्पी, ताम्रपुष्पी, कुञ्जरा, सुभिक्षा, बहुपुष्पी और वह्निज्वाला ये सब धाय के नाम हैं। धाय-कडु तथा कषायरसयुक्त, शीतवीर्य, मृदुकारक (पाठा- न्तर मदकारक) और लघु है और यह प्यास, अतीसार, रक्तपित्त, विष, कृमि और विसर्प को दूर करती है ॥ १८६-१८७ ॥ ६३ धातकी हि०-धातकी, धवई, धाई, धाओला, धावा, धाय (धाय के फूल)। बं०-धाइफुल। मं०- धायटी, धावस । गु०-धावणी, धावडी ना फूल । क०-धांतकि । ते०-सेरिंगी, एर्रांपुड्डुं। उ०-जातिको। पं०-धा। अवध-धैती । ने०-दहिरी । ले०-Woodfordia floribunda, Salisb. (बुडफोर्डिआ फ्लोरीबंडा. सॅलिस्ब.); Syn. Woodfordia fruticosa Kurz. (बुडफोर्डिआ फ्रूटिकोसा, कुर्ज.)। Fam. Lythraceae (लिथ्रेसी)। धातकी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं देखने में आते हैं। ये पहाड़ों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं देहरादून के जंगलों में बहुतायत से पाये जाते हैं तथा वाटिकाओं में भी रोपण किये जाते हैं। इसका क्षुप बड़ा तथा १०-१२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएं-लम्बी, फैली हुई और सघन रहती हैं। नवीन शाखाओं तथा पत्तियों पर काले-काले बिन्दु होते हैं। पत्ते-समवर्ती या कुछ विषमवर्ती और कहीं-कहीं तीन-तीन पत्ते एक साथ गुच्छों में दिखाई पड़ते हैं। वे २-४ इंच लम्बे, ३/४-१ ३/४ इंच चौड़े, भालाकार या लट्वाकार-भालाकार, नोकदार तथा सरलधार होते हैं। पुष्प-१/२ से ३/४ इंच, चमकीले लालरंग के नलिकाकार फूल आते हैं। यह शाखाओं के संपूर्ण काण्ड से छोटे-छोटे गुच्छों में निकले रहते हैं। बीजकोष—छोटा और बीज—चिकने भूरे रंग के होते हैं। औषधि के लिये इसके फूलों का व्यवहार किया जाता है तथा इससे रेशम रंगने के लिये एक लाल रंग निकाला जाता है। रासायनिक संगठन —इसके फूलों में २०३/४% टैनिन् होता है तथा इसके क्षुप से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जो रंगने के काम आता है। गुण और प्रयोग—इसके फूल संग्राहक, उत्तेजक, विषहर, रक्तस्राव रोकने वाले एवं व्रणशोधक तथा व्रणरोपक होते हैं। इनका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, ज्वरातिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, अर्श, यकृत् विकार, सर्पविष तथा व्रण में किया जाता है। गर्भिणी में उत्तेजक औषध के रूप में बिना किसी हानि के इसका प्रयोग किया जा सकता है। अतिसार आदि में इसके साथ अन्य औषधियाँ भी दी जाती हैं। आसवों में सन्धान क्रिया ठीक होने एवं उसका रंग सुन्दर बनाने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) अतिसार एवं प्रवाहिका आदि में मट्ठे या मधु के साथ इसका पुष्पचूर्ण दिया जाता है या धाय के फूल, बेल की गूदी, लोध्र की छाल, सुगन्धवाला एवं गजपीपल सब समान लेकर, २ तोले का क्वाथ बना कर प्रयोग करते हैं। बच्चों के अतिसार में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। (२) मधु के साथ इसका चूर्ण या अवलेह रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अर्श आदि में लाभदायक है। श्वेतप्रदर में १ तोला पुष्प चावल के धोवन के साथ दिया जाता है। (३) कोंकण की तरफ 'मण्यारी' नामक सर्पविष के लिये यह रामबाण औषध मानी जाती है। इसके लिये धाय के पत्तों का स्वरस पिलाते हैं, नाक में डालते हैं एवं शरीर पर उसे मलते हैं।