भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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(४) पैत्तिक शिरःशूल में इसके पत्तों का स्वरस सिर पर लगाया जाता है तथा उसके साथ-साथ मुख में तैल का कवलग्रह किया जाता है । (५) पानीदार विस्फोटों एवं दुर्गन्धयुक्त व्रणों में स्राव को कम करने के लिये तथा व्रण पूरण के लिये इसके पुष्पचूर्ण का उपयोग किया जाता है तथा इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी करते हैं। (६) आसवारिष्टों में शीघ्र किण्वोत्पत्ति के लिए धाय के फूलों का व्यवहार किया जाता है। इससे सन्धान भली प्रकार हो जाता है । मात्रा - पुष्पचूर्ण १-२ माशा ।

अथ मञ्जिष्ठा ( मंजीठ ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह मञ्जिष्ठा विकसा जिङ्गी समङ्गा कालमेषिका ॥ १८८ ॥ मण्डूकपर्णी भण्डीरी भण्डी योजनवल्ल्यपि । रसायनेयरुणा काला रक्ताङ्गी रक्तयष्टिका । भण्डीतकी च गण्डीरी मञ्जूषा वस्त्ररञ्जिनी । मञ्जिष्ठा मधुरा तिक्ता कषाया स्वरवर्णकृत् । गुरुष्णा विषश्लेष्मशोथयोन्यक्षिकर्णरुक् । रक्तातिसारकुष्ठाम्रवीसर्पव्रणमेहनुत् ॥ १९१ ॥

मंजीठ के नाम तथा गुण - मंजिष्ठा, विकसा, जिङ्गी, समङ्गा, कालमेषिका, मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, भण्डी, योजनवल्ली, रसायनी, अरुणा, काला, रक्ताङ्गी, रक्तयष्टिका, भण्डीतकी, गण्डीरी, मञ्जूषा और वस्त्ररञ्जिनी ये सब मंजीठ के नाम हैं। मंजीठ-मधुर, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वर को उत्तम करने वाली तथा वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, गुरु, तथा उष्णवीर्य होती है और विष, कफ, शोथ, योनि, नेत्र तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, रक्तातिसार, कुष्ठ, रक्तदोष, विसर्प, व्रण और प्रमेह दूर करने वाली होती है ॥ १८८-१९१ ॥

६४ मञ्जिष्ठा ( मजीठ ) हि०-मजीठ, मंजीठ । बं०-मञ्जिष्ठा । म०-मञ्जिष्ठ । ते०-मञ्जिष्ठतीठो, ताम्रवल्ली, मण्डास्टिक । ता०-मञ्जिट्टी, मन्दित्ता । गु०-मजीठ । पं०-मजीठ । मल०-पुन्त । फा०-रोदक । अ०-फुव्वहतु, फुव्वाह, फौहुल अवागीन । अं०-Madder root ( मँडर रूट ); Indian madder ( इण्डियन् मँडर ) । ले०-Rubia cordifolia, Linn. ( रूबिया कॉर्डिफोलिया, लिन्. ) । Fam. Rubiaceae ( रूबिएसी ) । मजीठ इस देश की पहाड़ी भूमि में पश्चिमोत्तर हिमालय से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर नीलगिरी, सीलोन और मलाका एवं नेपाल में ८ हजार फीट तक उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में दूर दूर तक फैल जाती है। इसकी लम्बी जड़ भूमि के भीतर दूर तक घुस जाती है। डण्ठल-कई गज लम्बा, गावदुम, खुरदरा, जड़ की ओर कठोर । छाल-सफेदी मायल किन्तु भीतर का भाग लाल होता है। शाखा प्रशाखाओ करके सघन बेल निकटवर्ती वृक्षो पर चढ़कर फैलती है। पत्ते-प्रत्येक ग्रन्थि पर चार चार के चक्रों में, जिसमें से दो बड़े होते हैं। ये १॥ से ४ इञ्च लम्बे, लट्वाकार-ताम्बूलाकार, नोकीले, खरस्पर्श युक्त या चिकने होते हैं। पत्रनाल-२ से ४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-नन्हें नन्हें श्वेतवर्ण के गुच्छों में रहते हैं। फल-काले, चने के बराबर तथा दो बीजों से युक्त होते हैं। मूल-लम्बे, लम्बगोल तथा ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर कुछ काले हो जाते हैं। मूल का स्वाद


प्रारम्भ में मिठास लिये हुये, लेकिन बाद में कुछ तीता और कड़वा होता है। इन्हीं मूलों का औषध में व्यवहार किया जाता है। बाजार में नेपाली, ईरानी, अफगानी तथा हिन्दुस्तानी नाम से चार प्रकार के मूल बिकते हैं जिसमें से अफगानी मूल जो सिन्ध के रास्ते से आता है वह अच्छा समझा जाता है तथा हिन्दुस्तानी कनिष्ठ मानते हैं। इनका व्यवहार रंगने के काम में भी किया जाता है। इसका पर्याय नाम जो 'समङ्गा' दिया गया है उसके विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसकी कभी कभी चिरायते में मिलावट रहती है। रासायनिक संगठन- इसके मूल में राल, गोंद, शर्करा, चूने के योग एवं रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। रंजक द्रव्यों में रक्त रविदास परपूरिन् ( Purpurin, पीत ग्लूकोसाइड मंजिस्टिन एवं गैरैन्सिन् ( Manjistin & Garancin ), नारंगरक्त अॅलिझॅरिन् ( Alizarin ) एवं पीत क्झैंथाइन् ( Xanthine ) आदि पाये जाते हैं। गुण तथा प्रयोग- यह रक्तशोधक, ग्राही, पौष्टिक, गर्भाशय संकोचक, शोथघ्न, त्वग्दोषहर, वेदनास्थापक, मूत्रल एवं व्रणरोपक है। अल्पमात्रा में देने से इससे मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों पर शामक प्रभाव पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में देने से कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इससे मूत्र एवं दुग्ध का रंग लाल हो जाता है। इसका क्वाथ अक्षवात, कामला, मूत्रावरोध, अश्मरी, आर्तववि- कार, अनार्त्तव, शोथ, रक्तातिसार, प्रमेह, छाती के शोथयुक्त विकार एवं चर्मरोग आदि में दिया जाता है। ( १ ) मंजिष्ठादि क्वाथ का उपयोग चर्मरोगों में बहुत लाभदायक है। इसके प्रयोग से त्वचा की रक्ताभिसरण क्रिया बढ़ कर उसकी विनिमय क्रिया में परिवर्तन होता है। इससे वातरक्त, दाद, खुजली, श्वित्र एवं व्यंग आदि में बहुत लाभ होता है । ( २ ) यह गर्भाशय संकोचक होने से प्रसव में बाद गर्भाशय शुद्धि के लिये इसके साथ ईश्वर मूल, पिपरामूल आदि अन्य औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इससे गर्भाशय संकोच होकर स्राव की वृद्धि होती है तथा पीड़ा कम होती है। ( ३ ) अश्मरी में शस्त्रकर्म करने के पूर्व एक बार इसका प्रयोग करके देखना चाहिये। इसके चूर्ण को १ माशे की मात्रा में दिन मे ३ बार देना चाहिये। इससे सभी प्रकार की पथरी गलकर निकल जाती है। यदि इससे लाभ न हुआ तो फिर शस्त्रकर्म किया जा सकता है। ( ४ ) यह फकरोग ( Rickets ) राजयक्ष्मा, आंत्रिकशैथिल्य एवं दुर्गन्ध युक्त जीर्ण अतिसार आदि में भी लाभदायक है। राजयक्ष्मज अतिसार एवं आंत्रिक व्रणों में इसके उपयोग से वेदना की शांति होती है। फुफ्फुसावरणशोथ ( प्ल्युरिसी-Pleurisy ) आदि छाती के विकारों में भी इससे लाभ होता है। ( ५ ) मंजिष्ठामेह में चन्दन के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। ( ६ ) मधु के साथ इसकी घिस कर लगाने से व्यङ्ग, दाद एवं श्वित्र आदि जीर्ण चर्मरोगों में बहुत लाभ होता है। लोध्र एवं चन्दन के साथ पीस कर इसे लगाने से विसर्प में लाभ होता है। ( ७ ) मजीठ, अर्जुन, मुलेठी एवं सुगन्धवाला इनका क्वाथ अस्थिभग्न में पिलाया जाता है तथा उसी का लेप भी करते हैं। केवल मजीठ एवं मुलेठी को काञ्जी में पीस कर लगाने से भी शोथ कम होकर पीड़ा कम होती है।