भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ भावप्रकाशनिघण्टुः (८) अग्निदग्ध व्रण पर मजीठ, रक्तचन्दन तथा मूर्वा से सिद्ध घृत का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा का शमन होकर व्रण दूर होता है। (९) इसके फल का प्रयोग यकृत् के कारण उत्पन्न अवरोध में किया जाता है। मात्रा-मूल चूर्ण १ से ३ माशा दिन में तीन बार। अथ कुसुम्भम्, तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्यात्कुसुम्भं वह्निशिखं वस्त्ररञ्जकमित्यपि । कुसुम्भं वातलं कृच्छ्ररक्तपित्तकफापहम् ॥१९२॥ कुसुम के नाम तथा गुण-कुसुम्भ, वह्निशिख और वस्त्ररञ्जक ये नाम कुसुम के हैं। कुसुम- वातकारक तथा मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त और कफ का नाश करने वाला होता है ॥ १९२ ॥ ६५ कुसुम्भ हि०-कुसुम, कसुम्भ, बर्रे । बं०-कुसुम फूल । म०-करडई । गु०-कसुम्बो । क०-कसुम्बे । ते०-उत्तुक, लक्क, बंगारसु, बंगारम, अग्निशिखा, कुसुम्बा वित्तुलु । पं०-कूसम, कर्तुम, कुसुंभ, करर । उ० प्र०-बर्रे, कर्रे । फा०-खस्कदाने, गुलेमश्कर । अ०-अखरिज, जरतम । अं०-Safflower ( सॅफ्फ्लावर ); Parrot seed (पॅरट् सीड); Bastard saffron (बॅस्टर्ड सॅफ्रॉन् ) । ले०- Carthamus tinctorius, Linn. (कार्थेमस् टिंक्टोरियस्, लिन. )। Fam, Compositae (कॉम्पोज़िटी ) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप १-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-लम्बे, किनारों पर कटे हुए, नुकीले और काँटेदार होते हैं। पुष्प-केसरिया लाल रंग के पुष्प गोल गुच्छों में आते हैं। फल-चतुष्कोणीय चर्मल फल आते हैं। बीज-सफेद, चिकने तथा शंख की आकृति के समान होते हैं। कृषिजन्य इसके अनेक प्रभेद पाये जाते हैं तथापि इनका वर्गीकरण दो वर्गों में किया जा सकता है। एक में काँटे होते हैं और दूसरे में काँटे नहीं होते। काँटे वाले की अपेक्षा बिना काँटे वाले के फूलों से बहुत उत्तम रंग निकलता है। काँटेवाले पौधे तैल की दृष्टि से अच्छे समझे जाते हैं। इसके पुष्पों के किञ्जल्क केसर के समान दिखलाई देते हैं तथा केसर में इनकी मिलावट की जाती है। असली केसर के तन्तु सुगन्धित तथा एक रङ्ग के होते हैं किन्तु कुसुम के किंजल्क तन्तु गन्धरहित तथा श्वेत धब्बों से युक्त होते हैं। इसके बीज, पंचांग, तैल, पुष्प एवं मूल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन - इसके पुष्पों में जल में अविलेय कार्थामिन् ( Carthamin ) नामक एक लाल रंग एवं जल में विलेय अन्य पीत रंग पाये जाते हैं। इसके बीजों में २०-३०% तक एक स्थिर तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग - इसके बीज विरेचक, मूत्रल तथा बल्य होते हैं। इसका पुष्प विरेचक, स्वेदजनन, बल्य एवं आर्तव वृद्धिकर होता है। तैल विरेचक, एवं व्रणरोपक है। इसका मूल मूत्रल तथा पंचांग उष्ण होता है। (१) इसके कोमल पत्तों का शाक प्रतिश्याय में खाया जाता है। इसके पत्तों में रेनेत् (Rennet) की तरह दूध जमाने की शक्ति होती है। हरीतक्यादिवर्गः ११३ (२) इसके शुष्क पुष्पों को ४ माशे की मात्रा में कामला में देते हैं। इसका फांट स्वेदल होता है तथा प्रतिश्याय, कष्टार्तव एवं मांसपेशीय आमवात (Muscular rheumatism- मस्क्यूलर ह्यूमैटिज्म ) में दिया जाता है तथा इसका हिम रोमान्तिका आदि विस्फोटक ज्वरों में (Eruptive fevers-एरप्टिव फीवरस् ) में विस्फोट बाहर निकालने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (३) इसके बीजों से प्राप्त तैल खाने के काम आता है। बाजारू मीठे तेल में तथा घी में इसकी मिलावट करते हैं। इससे पाखाना साफ होता है। प्रमेह में इसके तैल को खाने से लाभ होता है। खुजली में इसको ५, ६ बार लगाने से बहुत लाभ होता है। आमवात एवं सन्थिशोध में इसकी मालिश की जाती है तथा व्रणों पर इसको लगाते हैं। सुगन्धि के काम के लिए विदेशों में इसका निर्यात किया जाता है। कुछ लोगों ने इसके पंचांग से सिद्ध तिलतैल का व्यवहार सन्थिशोध, आमवात, अङ्घात, खुजली एवं पुराने घाव आदि में लगाने के लिये लिखा है। कुसुम बीजतैल का प्रयोग भी इसके स्थान पर किया जा सकता है। इसकी खली टिकाऊ होती है तथा जानवरों के खाने के काम में एवं ऊख आदि के लिये खाद के रूप में काम में लो जाती है। साबुन एवं तैलीय रंगों में भी खली का उपयोग होता है। (४) इसके बीज द्राक्षारस के साथ अश्मरी एवं मूत्रकृच्छ्र में लाभदायक हैं। इसके बीजों की मांड मृदुविरेचक होती है एवं उदरशूल तथा आमवात में दी जाती है। प्रसूता में गर्भाशय की पीडा हो तो इसकी पुल्टिस बनाकर पेडू पर बांधा जाता है। मात्रा-शुष्क पुष्प चूर्ण २-४ माशा । बीज २-४ माशा । अथ लाक्षा (लाही) तस्या नामानि गुणाँश्चाह लाक्षा पलंकषाऽल्क्तो यावो वृक्षामयो जतुः । लाक्षा वर्ण्या हिमा बल्या स्निग्धा च तुवरालघुः ॥ ( ब्राह्मय्यङ्गारवल्ली' च खरशाखा च हञ्जिका )। अनुष्णा कफपित्तास्रहिक्काकासज्वरप्रणुत् । व्रणोरःक्षतवीसर्पकृमिकुष्ठगदापहा । अलक्तको गुणैस्तद्वद्विशेषाद्व्यङ्गनाशनः ॥ १९५ ॥ लाख के नाम तथा गुण-लाक्षा, पलङ्कषा, अलक्त, याव, वृक्षामय, और जतु ये सब लाख के पर्यायवाची शब्द हैं। किसी किसी पुस्तकों में ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाखा और हञ्जिका ये अधिक पर्याय मिलते हैं। लाख-शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, शीतल, बलकारक, स्निग्ध, कषायरसयुक्त, लघु और अनुष्ण (थोड़ी गरम) होता है तथा यह कफ, रक्तपित्त (पित्त, रक्त) हिचकी, कास, ज्वर, व्रण, उरःक्षत, विसर्प, कृमि और कुष्ठरोग को दूर करने वाली होती है। लाख से उत्पन्न हुये अलक्तक (महावर) में भी उपरोक्त लाख के सभी गुण होते हैं किन्तु विशेषतः यह व्यङ्गरोग (झांई) की नाशक होता है ॥ १९३-१९५ ॥ ६६ लाख हि०-लाख, लाही, लाह । बं०-गाला, लाहा । प०, मा०, गु०, म०-लाख । क०-अरगु । ते०-लवका, लक्का, लाका । ता०-अरकु । फा०-लाक । अ०-लुक, लुक मकतूल । अं०-Lac (लॅक) या Shell lac (शेल लॅक ) । ले०-कीटनाम-Laccifer lacca (Kerr ) (लॅसिफेर लॅक्का) । Fam, Lacciferidae ( लसिफेरिडी ) । 8 १. कोष्ठस्थः पाठः काञ्चिकः । ८ भा० नि०