भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 61, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें१०४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी छोटी झाड़ी हिमालय तथा दक्षिण में कोंकण के पहाड़ी भागों में बरसात के दिनों में होती है। इसका वायवीय भाग मुलायम एवं शाखकीय होने से यह ऊँचा नहीं होता तथा पत्तियाँ जमीन पर फैली रहती हैं। पत्ते-४ इंच तक लंबे, २ से ३ इंच चौड़े, विनाल, अभिलट्वाकार, शिराओं पर मृदुरोमश एवं शिराएँ ५ युग्म होती हैं। पुष्प-छोटे, श्वेत, एवं १ १/२ इंच व्यास के समस्थ काण्डज गुच्छ में आते हैं। फल-१/२ इंच एवं गोल होता है। मूल-जमीन के नीचे, लंबे परंतु थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठदार होते हैं। ये गन्धहीन एवं स्वाद में कड़वे होते हैं तथा इनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूलत्वक में एक नारङ्गी बादामी रङ्ग की अम्ल राल तथा अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ तथा कुछ स्टार्च रहता है। इसमें टैनिन् नहीं होता। गुण और प्रयोग-मारङ्गी नाम से यद्यपि कोंकण की तरफ इसका व्यवहार होता है तब भी इसमें भारङ्गी के गुण नहीं हैं। डा० देसाई लिखते हैं कि इसका उपयोग करके देखा गया लेकिन इसमें भारङ्गी के गुण नहीं मालूम पड़े। प्रतिश्याय आदि में इसका उपयोग करते हैं। तमकश्वास में इसका कल्क सोंठ तथा उष्ण जल के साथ या भारङ्गी मूल को आर्द्रक स्वरस या उष्ण जल के साथ देते हैं। शिरःशूल में इसकी जड़ उष्ण जल में घिसकर सर में लगाई जाती है। कानों में व्रण होने पर इसको मधु में घिसकर कान में डालते हैं। गठिया में इसका उपयोग करते हैं। इसे बिहार में गठिया, गँठिया कहते भी हैं। इसके बीजों को मठ्ठे में उबाल कर उदर रोग में शौच साफ होने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (घ) Clerodendrum siphonanthus, (R. Br.) C. B. Clarke (क्लेरोडेन्ड्रम् सिफोनेन्थस्)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनेसी)। हि०-चिनगारी, भारंगी। सं०-ब्रह्मय- ष्टिका। बं०-बामनहाटी। पं०-अरनि। इसके क्षुप हिमालय में तथा दक्षिण के पर्वतीय भागों में मिलते हैं। यह ४-६ फीट ऊँचा होता है। कांड-१ इंच तक मोटा, नालीदार तथा भीतर से पोला होता है। पत्ते-प्रति चक्र में ३-५ की संख्या में तथा ६ से ९ इंच लम्बे, १ से १॥ इंच चौड़े, पतले भालाकार, विनाल तथा कड़े होते हैं। पुष्प-९-१८ इंच लम्बी डंडी पर सफेद रंग के कुछ रक्तिमा लिये हुये होते हैं। पुष्पकोश की नली ३-४ इंच लम्बी होती है। फल-गोलाकार, ३/८ इंच लम्बे एवं जामुनी रंग के होते हैं तथा वाह्यपुट गहरे लाल रंग का एवं बढ़ा हुआ होता है। बीज-१ से ४ तक जुड़े हुए होते हैं। मूलका स्वाद-कड़वा तथा कषाय होता है तथा औषधि कार्य में इसी का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसका मुख्य सत्व एक क्षाराम होता है। गुण और प्रयोग-इसके पोले कांड के टुकड़े बंगाल में तागे में पिरोकर कई रोगों से बचने के लिये पहने जाते हैं। इसका मूल खांसी तथा तमक श्वास में दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके मूल का कल्क तथा सोंठ को उष्ण जल के साथ खिलाते हैं। इसके पत्तों का रस घी के साथ मिला कर परिसर्प में लगाया जाता है। मांसक्षय वाले बच्चों को इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है।
अथ पाषाणभेदः, तस्य नामानि गुणांश्चाह पाषाणभेदकोऽश्मघ्नो गिरिभिद्भिन्नीयोजिनी। अश्मभेदो हिमस्तिक्तः कषायो बस्तिशोधनः॥ भेदनो हन्ति दोषार्शोगुल्मकृच्छ्राश्महृद्रुजः। योनिरोगप्रमेहांश्च प्लीहशूलव्रणानि च ॥
हरीतक्यादिवर्गः १०५ पाषाणभेद के नाम तथा गुण-पाषाणभेदक, अश्मघ्न, गिरिभिद् और भिन्नीयोजिनी ये सब पाषाणभेद के नाम हैं। पाषाणभेद-शीतल तथा तिक्त और कषायरस युक्त, बस्ति (मूत्राशय) का शोधन करने वाला और भेदक होता है। और वातादिक दोष, बवासीर, गुल्म, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, हृद्रोग, योनिरोग, प्रमेह, प्लीहा, शूल तथा व्रण को दूर करता है॥ १८४-१८५॥
६२ पाषाणभेद पाषाणभेद एक संदिग्ध वस्तु है। इसके स्थान पर अनेक वनस्पतियाँ ली जाती हैं तथा विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न वनस्पतियों को पाषाणभेद मानते हैं। राजनिघण्टु में पाषाणभेदक, वटपत्री, शिलावल्का तथा चतुष्पत्री ये पाषाणभेद के चार भेद वर्णित हैं। निम्नलिखित वनस्पतियों को भिन्न-भिन्न आधुनिक विद्वान् पाषाणभेद मानते हैं। १. Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वॉल,)। Fam. Saxifragaceae (सैक्सिक्रॅगासी)। २. Aerva lanata, Juss. (एख्वा लैनेटा, जस.)। Fam. Amaranthaceae (अॅमरेंन्थेसी)। ३. Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅन्चो पिन्नॅटा पर्स.)। Fam. Crassulaceae (क्रॅसुलॅसी)। ४. Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् अॅरोमैटिकस्, बेन्थ.)। Fam. Labiatae (लेबियैटी)। ५. Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)। ६. Rotula aquatica Lour. (रोटुला अॅक्वेंटिका लोर.)। Fam. Boraginaceae (बोरंजिनॅसी)। ७. Ocimum basilicum Linn. (ओसिमम् बॅसिलिकम् लिन.)। Fam. Labiatae (लेबियटी)। इन वनस्पतियों के अतिरिक्त कुछ लोगों ने एक खनिज पाषाणभेद भी लिखा है लेकिन उसका विशेष वर्णन नहीं मिलता है। उपर्युक्त वनस्पतियों में से अधिकांश मूत्रल अवश्य हैं लेकिन प्रथम वनस्पति सैक्सिफ़्रेगा लिग्युलेटा का ही ग्रहण पाषाणभेद नाम से उचित है। उपर्युक्त वन- स्पतियों का अलग-अलग वर्णन आगे दिया जा रहा है। ओसिमम् बॅसिलिकम् का वर्णन आगे तुलसी के साथ दिया जावेगा। (१) Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। सं०-पाषाणभेद, वटपत्रीभेद। हि०-पखानभेद, सिलफडा, पोपल, वनपत्रक, दकचु। म०- पाषाणभेद । पं०-शफ़्रोकी। ने०-सोहंपे सोभा। का०-बयेव। रावी-सप्रोत्री। खासिया-अतिभ। चिनाब-बलूपिया। कुमाऊँ-शिलफोडा। इसके पौधे कश्मीर, नेपाल तथा हिमालय के मध्य भाग में प्रायः ५००० फीट के ऊपर पर्वतों की ढालों पर पत्थरों की दरारों में बहुतायत से निकलते रहते हैं। यह क्षुप जाति की वनस्पति बारहौ मास पायी जाती है। मूलस्तम्भ-रक्ताभ (भीतर सफेद) और लगभग एक इञ्च मोटा होता है। इससे पतले उपमूल निकलकर पत्थरों के बीच में फैले रहते