भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०२ भावप्रकाशनिघण्टुः ६१ भार्गी ( भारङ्गी ) भारङ्गी के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं तथा इस नाम से ४ वनस्पतियों की छाल ली जाती है। बङ्गाल में काशिया नामक डाक्टरी ओषधि का प्रतिनिधि 'ख' का व्यवहार भारङ्गी नाम से होता है। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी अपनी 'वनौषधि दर्शिका' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि भारङ्गी नाम से बाजार में बिकनेवाली छाल क्लेरोडेंड्रान ( Clerodendron ) की नहीं मालूम होती जिसे अधिकांश लोगों ने भारङ्गी माना है तथा यह संभवतः 'ख' की ही छाल हो। डा० देसाई 'क' को ही शाखीय भारङ्गी मानते हैं तथा अन्य अधिकांश विद्वानों ने भी इसे ही भारङ्गी माना है। अन्य दो 'ग' तथा 'घ' वनस्पतियों का भी कहीं २ व्यवहार होता है। इन चारो वनस्पतियों का अलग २ वर्णन नीचे दिया जा रहा है। प्राचीन समय में इसका आन्तरिक प्रयोग श्वास, कास आदि में किया गया है तथा सुश्रुत (उ० अ० ६१) में अपस्मार के लिये एक विशेष प्रकार से निर्मित सुरा का प्रयोग बतलाया गया है। इसका बाह्य प्रयोग गण्डमाला, कुरंड ( वृद्धि ) तथा शस्त्रक्षत में किया गया है। ( क ) Clerodendron serratum, Spreng. (क्लेरोडेन्ड्रोनू सेरेंटम्, स्प्रेग) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हि०-भारङ्गी, भारिङ्गी, ब्रह्मयष्टि, बभनेटी। बं०-बामन हाटी, भुइजाम । म०-भारङ्ग । गु०-भारङ्गी। क०-गंडुभारङ्गी । ते०-नालनिरंडु । ने०-चूया । पं०- भाड़ङ्गी । मा०-भाराङ्गमूल । ता०-चेरूट्टेकु । जोनसार०-बनवाकरी । फा०-हंजिका । यह हिमालय में सतलज से खांसिया पहाड़ और आसाम तक तथा ब्रह्मा, नीलगिरी, पश्चिम- घाट थाना, रत्नागिरी और सिलोन में पाई जाती है। इसके पौधे ३ से ५ हजार फीट की ऊँचाई तक प्रायः पर्वतों के घासवाले ढालों पर होते हैं। भारङ्गी क्षुप जाति की वनौषधि ४-८ फीट तक ऊँची होती है। शाखाएँ-इसके काष्ठमय मूलस्तम्भ से प्रतिवर्ष शाखाएं निकलती हैं। प्रत्येक गांठ पर तीन-तीन पत्ते रहते हैं जो ४ से ८ इञ्च लम्बे, १५-२३ इञ्च चौड़े, आयताकार, अंडाकार-आयताकार या भालाकार, तीक्ष्ण दन्तुर तथा शिराओं के ५ जोड़ों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या कुछ नीले रङ्ग के आते हैं। फल-चौथाई इञ्च लम्बे, गोल, काले, पकने पर जामुनी रङ्ग के हो जाते हैं। इस क्षुप की छाल या जड़ का व्यवहार किया जाता है। अधिकांश विद्वान् इसको ही शाखीय भारङ्गी मानते हैं लेकिन श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी लिखते हैं कि इस नाम से जो छाल बाजारों में बिकती है वह इस वनस्पति की न होकर सम्भवतः निम्न वर्णित 'ख' की छाल हो । क्योंकि बाजार की छाल मोटी होती है जो इस छोटे से क्षुप की नहीं हो सकती । रासायनिक संगठन-इसमें एक नारङ्गी रंग का रालीय पदार्थ, स्टार्च तथा अन्य तिक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कफघ्न, श्वासहर, वातघ्न, दीपन, पाचन तथा शोथघ्न है। इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, यक्ष्मज कास, फुफ्फुस विकार, वातकफज्वर तथा आमवात में किया जाता है। इसमें ज्वरघ्न तथा कफघ्न गुण अल्प मात्रा में होने के कारण ज्वर में इसके साथ अन्य ज्वरहर औषधियां देनी पड़ती हैं तथा कफज व्याधियों में काकड़ासिंगी या कायफल इसके साथ दिया जाता है। प्रतिश्याय एवं कफयुक्त श्वास आदि में इसके साथ सोंठ या घोड़वच देते हैं।
हरीतक्यादिवर्गः १०३ इसके पत्तों का पोल्टिस बनाकर फोड़ों के ऊपर लगाते हैं। उपदंशजन्य सन्धिवात में इसका गोंद लाभदायक है। इसके पत्तों तथा कोमल डालियों का रस परिसर्प ( इरपीज ) एवं पेंफीगस् नामक विस्फोटों पर लगाया जाता है। रत्नागिरी में इसके पत्तों का शाक मलेरिया में खाते हैं। इसके बीजों का चूर्ण घी में भूनकर शोथ में रसायन के रूप में खाते हैं। मात्रा-चूर्ण १३-३ मा० । ( ख ) Picrasma quassioides, Ben. (पिक्रेस्मा क्वासिओइडिस, बेन) । Fam. Sima- rubaceae (सिमॅरूबेंसी)। हि०-भारङ्गी, करूई-तिथाई। बं०-मुसुंगी । म०-कदाशिंग । पं०-तित्थ, बेरिंग, पुथोरिन । ने०-शामबारंगी । अं०-Quassia (कॅसिया) । यह हिमालय के बाहरी भाग में चेनाव से लेकर पूर्व की ओर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर तथा चम्बा, कुल्लू, बशहर, उत्तरी गढ़वाल में ६०००-८००० फीट की ऊँचाई पर एवं नेपाल, भूटान तथा आसाम में खासी एवं नागा पहाड़ियों पर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर पायी जाती है। इसकी बड़ी-बड़ी झाड़ी या छोटे वृक्ष होते हैं जिनमें थोड़ी परन्तु मजबूत शाखायें होती हैं जिनपर प्रायः सफेद दाग होते हैं। पत्र-अयुग्म पक्षकार, ९-१५ इञ्च लम्बे, अरलु वृक्ष के पत्तों के समान तथा रक्तरोमश मालूम होते हैं। पत्रक-९-१५, अभिलट्वाकार, आरावत तथा उनका अग्र लम्बा होता है एवं सबसे नीचे के पत्रक बहुत छोटे तथा उपपत्रों के समान होते हैं। पुष्प- हलके हरे रङ्ग के, पार्श्विक तथा सवृन्त-काण्डज पुष्पसमूहों में। अष्ठिफल-बहुत छोटे, पकने पर काले रंग के तथा प्रत्येक फल में एक बीज होता है। इस क्षुप के टुकड़ों या छाल का व्यवहार बंगाल में भारंगा नाम से किया जाता है। यह पीताभ श्वेत या चमकीले पीले रंग के, हल्के, लचीले लेकिन आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन तथा स्वाद में अत्यन्त कड़वे होते हैं। यह डाक्टरी की काशिया नामक वनस्पति का अच्छा प्रतिनिधि है। रासायनिक संगठन-इसमें पिकैस्मिन् ( Picrasmin ) से ठीक मिलता जुलता एक क्षाराम ०००५%, एक क्वासीन् (Quassin) नामक कडवा पदार्थ तथा एक अन्य प्रभायुक्त एवं क्लोरोफार्म में घुलनशील कडवा पदार्थ ००१५% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह एक अत्यन्त कटु द्रव्य है। इसका प्रयोग आमाशय के दौर्बल्य से उत्पन्न अग्निमान्द्य में लाभदायक होता है लेकिन अधिक मात्रा में लेने से इससे प्रक्षोभ होकर वमन होता है। इसमें अन्य कडवे द्रव्यों की तरह टैनिन् न होने के कारण इसको लोह के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इसको फांट या हिम के रूप में अधिकतर व्यवहार करते हैं। पंजाब में ज्वर एवं कृमियों के लिये इसकी छाल तथा पत्तों का व्यवहार किया जाता है। सूत्रकृमि (Thread-worm) के लिये इसके फांट ( १ में १० ) की बस्ति दी जाती है। इसके पत्तों को पीसकर खुजली आदि में लगाते हैं। इसके सत्त्वों का उपयोग बागवानी में जन्तुओं का नाश करने के लिये किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १-४ रत्ती । हिम ३-१ औंस। ( ग ) Premna herbacea, Roxb. (प्रेम्ना हरबेसिया रॉक्सव.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हि०-भारंगी । बं०-भुइजाम । क०-नयित याग। ता०-शिरुकेट। ने०-चूअ । कों०-निचिंश । लेप०-ईं।