भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०० भावप्रकाश निघण्टुः (५) इसका बाह्य लेप सोरियेसिस् ( Psoriasis ) नामक जीर्ण चर्मरोग में किया जाता है तथा मसूड़ों आदि से खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराया जाता है । मात्रा - चूर्ण ३-२ मा० । अथ कट्फलस्य ( कायफल ) नामानि गुणांश्चाह कट्फलः सोमवल्कश्च कैटर्यः कुम्भिकाऽपि च । श्रीपर्णिका कुमुदिका भद्रा भद्रवतीति च ॥ कट्फलस्तुवरस्तिक्तः कटुर्वातकफज्वरान् । हन्ति श्वासप्रमेहार्शः कासकण्ठामयारुचीः ॥ १८१॥ कायफल के नाम तथा गुण - कट्फल, सोमवल्क, कैटर्य, कुम्भिका, श्रीपर्णिका, कुमुदिका, भद्रा और भद्रवती ये सब कायफल के नाम हैं। कायफल - कषाय, तिक्त तथा कटु रसयुक्त होता है तथा वात, कफ, ज्वर, श्वास, प्रमेह, बवासीर, कास, कण्ठसम्बन्धी रोग तथा अरुचि को दूर करता है ॥ १८०-१८१ ॥ ६० कट्फल (कायफल ) हि०-कायफर, कायफल, काफल । ब०-कायछाल, कायफल, कट्फल । क०-किरिशि- वनि । ते०-कैदूर्यमु । म०-मा०-गु०-पं०-कायफल । खासिया०-डिंगसोलिर । ता०-मरु- दम्पतै । फा०-दारशीशान् । अ०-उदुलुवर्क, अजूरी । अं०-Box Myrtle; Bay-berry ( बाक्स मिर्टल; बे-बेरी) । ले०- Myrica nagi, Thunb.; (मायूरिका नेगी) Fam. Myricaceae ( मायरीकेसी ) । यह हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में रावी से पूरब की ओर, खासिया पहाड़, सिलहट तक, ३-६ हजार फीट के बीच पाया जाता है और सिंगापुर में भी इसके वृक्ष देखने में आते हैं। चीन तथा जापान में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसके मध्यम ऊंचाई के सदाहरित वृक्ष होते हैं। छाल बादामी धूसर अथवा कृष्णाभ, भारी, सुगन्धित, करीब ३/८ इंच मोटी और खुरदरी होती है। काष्ठ-३/४ इंच से १ इंच मोटा, बिना रेशे का और रक्ताभ बादामी होता है। पत्रनाल, मञ्जरी तथा नवीन शाखाओं पर बादामी रोमावरण होता है। पत्ते-४ से ८ इंच लम्बे तथा १ १/२-२ इंच चौड़े, ऊपर से भालाकार अथवा कुछ २ आय- ताकार भी और उनके अधः पृष्ठ प्रायः सुरमई रंग के होते हैं। फूल-लाल । फल ३/८ इंच लम्बे, अण्डाकार, कुछ चिपटे, पृष्ठ पर दानेदार और पकने पर रक्ताभ या पीताभ बादामी होते हैं। फलों में मोम की तरह एक तेल होता है। ये फल स्वाद में कुछ खट्टे होते हैं। इन्हें सिलहट में 'सोफी' कहते हैं जिन्हें लोग खाते हैं। यद्यपि इस वृक्ष का नाम कायफल है तब भी औषधार्थ इसकी छाल का ही प्रयोग 'काय- फल' नाम से किया जाता है। इस छाल को सूंघने से छींक आती है तथा इसे जल में डालने पर जल लाल हो जाता है । आधुनिक विद्वान् इसके फल का भी औषधार्थ प्रयोग बतलाते हैं। भ्रमवश कितने वैघ जंगली जायफल, ले०-मायरिस्टिका मलवारिका (Myristica malab- arica Lam. ) के वृक्ष को कायफल का वृक्ष बतलाते हैं। जंगली जायफल के फल के ऊपर जावित्री के समान जो छिलका होता है उसको रामपत्री कहते हैं। कायफल के फल का छिलका न जावित्री के समान होता है और न रामपत्री कहलाता है। कुछ लोगों ने इस वृक्ष को कुम्भी वृक्ष, ले०-केरेया आर्बोरिया (Careya arborea Roxb.) माना है जो गलत है। हरीतक्यादिवर्गः १०१ रासायनिक संगठन - इसमें कुछ टैनिन, शर्करा सम द्रव्य तथा कुछ लवण रहते हैं। इसके चूर्ण में एक मायुरिसेटिन ( Myricetin ) नामक रंजक पदार्थ प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ग्राही, स्वेदजनक, कफघ्न, वातहर, शोथघ्न, शिरोविरेचक, उत्तेजक तथा गर्भाशयसंकोचक है। अधिक मात्रा में लेने से इससे वमन होता है तथा थकावट मालूम होती है । इसका प्रयोग घरेलू औषध के रूप में अनेक रोगों में किया जाता है। (१) सोंठ एवं दालचीनी के साथ इसका क्वाथ प्रतिश्याय, गले की सूजन, मुखपाक, स्वरभंग, तमकश्वास, जीर्ण श्वासनलिका शोथ, कास तथा अग्निमांद्य, अरुचि, आध्मान, कुपचन, आमा- तिसार, रक्तातिसार, मूत्रातिसार, गण्डमाला एवं गृध्रसी आदि में दिया जाता है। (२) अर्श में कत्था, हींग एवं कर्पूर के साथ या घृत के साथ इसका लेप लाभदायक है तथा इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। (३) केशर, काले तिल तथा सनई के बीजों को इसके साथ पूर्ण मात्रा में गुड़ के साथ देते हैं जिससे कष्टार्तव में अच्छा लाभ होता है। इसके देने के कुछ देर बाद भोजन देना चाहिये नहीं तो जी मिचलाने लगता है। इसके चूर्ण का पिचु भी योनि में धारण कराया जाता है। (४) प्रतिश्याय, चक्कर, शिरःशूल एवं अपस्मार आदि में इसके नस्य से लाभ होता है। (५) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन किया जाता है तथा इसका चूर्ण व्रणों पर डाला जाता है। इसको घिसकर सूजन, चोट एवं मोच आदि पर लगाने से लाभ होता है। (६) इसका तैल व्रणों के लिये लाभदायक है तथा संधिशूल में इसे लगाते हैं। (७) सिरके में इसे घिसकर मसूड़ों पर रगड़ने से दंतशूल दूर होता है तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं। (८) इससे सिद्ध तैल का प्रयोग कर्णशूल में कर्णबिन्दू के रूप में किया जाता है। (९) हैजे में हाथ पैर ठंडे हो जाने पर इसके चूर्ण को सोंठ के साथ मिलकर हाथ पैरों पर मलते हैं। (१०) इसके फलों को उबालने से एक मोम के सदृश पदार्थ निकलता है जिसका व्रण पूरण के लिये प्रयोग करते हैं। मात्रा - चूर्ण १०-३० र० आर्द्रक रस एवं मधु के साथ । बच्चों को १-२ र० । अथ भार्गी ( भारङ्गी ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह भार्गी भृगुभवा पद्मा फञ्जी ब्राह्मणयष्टिका । ब्राह्मण्यङ्गारवल्ली च खरशाकश्च हञ्जिका ॥ १८४॥ भार्गी रुक्षा कटुस्तिक्ता रुच्योष्णा पाचनी लघुः । दीपनी तुवरा गुल्मरक्तनुन्नाशयेद् ध्रुवम् ॥ शोथकासकफश्वासपीनसज्वरमारुतान् ॥ १८३ ॥ भार्ङ्गी (बभनेटी) के नाम तथा गुण - भार्गी, भृगुभवा, पद्मा, फञ्जी, ब्राह्मणयष्टिका, ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाक और हञ्जिका ये सब नाम भार्ङ्गी के हैं। भार्ङ्गी-रूक्ष, कटु, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त रुचिकारक, उष्णवीर्य, पाचक, लघु तथा अग्निदीपक होती है। एवं गुल्म, रक्तदोष, शोथ, कास, कफ, श्वास, पीनस, ज्वर और वायु को नष्ट करती है ॥ १८२-१८३ ॥