भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठों का सम्पूर्ण और सटीक पाठ प्रस्तुत है:
[पृष्ठ ६८]
भावप्रकाशनिघण्टुः
(५) कुष्ठ (Leprosy) में इसके स्वरस को १ तोले की मात्रा में ४० दिन तक रोज सबेरे दूध के साथ पिलाने से लाभ होता है। यह रसायन एवं बलवर्धक है तथा फिरंगादि में भी यह लाभदायक होता है। (६) सरसों में इसके बीजों की मिलावट करके तेल निकालते हैं। ऐसा मिलावटी तेल बहुत हानिकार होता है तथा इससे बेरीबेरी (Beri beri) एवं एपिडेमिकू ड्राप्सी (Epidemic dropsy) नामक रोग होते हैं जिसमें पैरों में सूजन, हृदय की दुर्बलता, पचनसंस्थान के विकार एवं वात नाडी शोथ आदि होते हैं।
**परीक्षा—**सरसों के तेल में इसकी मिलावट है या नहीं इसकी निम्न परीक्षायें की जाती हैं। (क) सरसों के तेल के बराबर शोरे का तेजाब (Nitric acid-नाइट्रिक एसिड) मिलाकर हिलाने से मिलावट न होने पर धूसर लाल (Brownish red) या नारंग (Orange) रंग उत्पन्न नहीं होता। (ख) ३ मि. लि. सरसों का तेल, १ मि. लि. ग्लेशियल एसिटिक ॲसिड (Glacial acetic acid) तथा क्यूप्रिक अॅसिटेट (Cupric acetate) के जलीय ३% घोल का ३ मि. लि. धीरे २ हिलावें। फिर जलयुक्त पात्र में इसके पात्र को रख कर १५ मिनट गरम करके फिर अच्छी तरह हिला कर रख दें। मिलावट न होने पर अवक्षेप नहीं होता तथा उसके जलीय भाग में नीले रंग से हरे रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता। **मात्रा—**बीज तैल १० बूँद; बीज ३ तो०; पीतवर्ण का दुग्ध १-२ माशा; मूल २-४ माशा ।
अथ कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह
शृङ्गी कर्कटशृङ्गी च स्यात्कुलीरविषाणिका । अजशृङ्गी च चक्रा च कर्कटाख्या च कीर्त्तिता ॥ शृङ्गी कषाया तिक्तोष्णा कफवातक्षयज्वरान् । श्वासोर्ध्ववाततृट्कासहिक्काछर्दिंवमीन्हरेत् ॥
**काकड़ासिंगी के नाम तथा गुण—**शृङ्गी, कर्कटशृङ्गी, कुलीरविषाणिका, अजशृङ्गी, चक्रा और कर्कटाख्या ये सब काकड़ासिङ्गी के नाम हैं। काकड़ासिङ्गी-कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं उष्ण-वीर्य होती है। और यह कफ, वात, क्षय, ज्वर, श्वास, ऊर्ध्ववात, प्यास, कास, हिक्की, अरुचि तथा वमन को दूर करने वाली होती है ॥ १७८–१७९ ॥
५९ कर्कटशृङ्गी (ककड़ासिंगी)
- **हि०—**ककड़ासिंगी, काकड़ासिंगी, काकरासिंगी (धौ¹, ककड़ाव।
- **बं०—**कांकराशृङ्गी।
- **म०—**काकड़-शिंगी।
- **क०—**कर्कटिशृङ्गी, दुष्टपुचत्तु।
- **ने०—**काकर सिंगी।
- **ता०—**काक्कट शिंगी।
- **मा०—**काकड़ा-शिंगी।
- **पं०—**ककर, सुमाक।
- **गु०—**काकड़ा सांगी।
- **काश्मी०—**कक्कर।
- **लै०—**Pistacia integerrima, Stew. ex Brandis (पिस्टैंसिया इंटिजिर्रिमा)।
- Fam. Anacardiaceae (ॲनॅकार्डिएसी)।
इसके वृक्ष उत्तर पश्चिमी हिमालय के बाहरी कतारों पर १५००–८००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब, सीमाप्रान्त आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष मध्यमाकार के होते हैं। **छाल—**सफेद रंग की। **पत्र—**युग्म अथवा अयुग्मपक्षाकार तथा ६–९ इञ्च लम्बे। **पत्रक—**४–६ जोड़े, किञ्चित सनाल, भालाकार, लम्बे नोक तथा सरल धार
¹ 'वक्रे'ति पाठान्तर प्रामादिकम् ।
[पृष्ठ ६९]
हरीतक्यादिवर्गः
वाले और चिकने। कोपलें (नवीन पत्र) लाल रंग की। **पुष्प—**स्त्रीपुष्प और पुंपुष्प अलग २ वृक्षों पर तथा सवृन्त काण्डज पुष्पसमूहों में एवं बाह्य कोषों (पंखुड़ियों) से हीन। अष्ठिफल (Drupe) शुष्क, चिकने, झुर्रीदार, गोल, बहुत छोटे, एवं पकने पर धूसर वर्ण के हो जाते हैं।
इस वृक्ष की पत्तियों, पर्णवृन्तों तथा टहनियों पर एक प्रकार की लम्बी २ शृङ्गवत् रचना लगी रहती है जिन्हें कृमिगृह (Galls-गॉल्स) कहते हैं। ये एक प्रकार के कीड़ों, जिन्हें एफिस (Aphis) कहा जाता है द्वारा निर्मित होते हैं। इन कृमिगृहों को ही काकरासिंगी कहते हैं। ये विभिन्न माप के ३-९ इञ्च लम्बे, पोले, एवं कड़े होते हैं। इनका बाह्य पृष्ठ हल्का हरिताभ बादामी रंग का, पतला तथा झालरदार (Fimbriated) दिखलाई देता है। इसको तोड़ने पर अन्दर का पृष्ठ रक्ताभ दिखलाई देना है जो महीन रजः कणों से ढका रहता है। सूक्ष्मदर्शक यन्त्र द्वारा देखने से यह सिद्ध हुआ है कि ये कण उन कीड़ों के भूतदेह तथा उनके मल हैं। काकरा-सिंगी का चूर्ण स्वाद में अत्यन्त कसैला तथा कुछ कड़वा होता है तथा इसमें तारपीन के तैल की तरह गन्ध आती है।
सिंतिडीक जाति (Rhus) के वृक्षों में भी कृमिगृह बनते हैं परन्तु वे काकरासिंगी से भिन्न हैं। कुछ लोगों ने भ्रम से कर्कट वृक्ष का नाम हस् सक्सिडेनिया (Rhus succedanea Linn.) दे दिया है जो उचित नहीं है।
प्राचीन ग्रन्थों में इसके कीड़ों से उत्पन्न होने के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता लेकिन कास आदि के लिये इसका बहुत प्रयोग किया गया है।
**रासायनिक संगठन—**इसमें एक हलके हरिताभ पीतवर्ण का एवं तारपीन के तेल की तरह गन्धवाला उड़नशील तैल १-३%, रवेदार हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) ३-४%, टॅनिन ६०%, गम मॅस्टिक (Gum mastic) ५%, एक रालीय पदार्थ तथा दो अन्य रवेदार अम्ल पाये जाते हैं।
**गुण और प्रयोग—**यह बल्य, कफनिःसारक, उष्ण एवं ग्राही है। इसमें के उड़नशील तैल के कारण इससे चमकश्वास कास, श्वासनलिका शोथ एवं राजयक्ष्मा आदि में अच्छा लाभ होता है। इससे श्लेष्मिककला को बल मिलकर कफ बाहर निकलने लगता है एवं नया कफ बनने नहीं पाता। इसमें टॅनिन बहुत होने के कारण इसका अतिसारादि में भी अन्य औषध के साथ उपयोग किया जाता है। आमाशय के प्रकोप से उत्पन्न वमन, हिक्का, जीर्ण अतिसार, आमातिसार तथा उपजिह्विका की वृद्धि से उत्पन्न खांसी आदि में इसको देने से अच्छा लाभ होता है। बच्चों के लिये यह विशेष लाभदायक है। वयस्कों के लिये इसकी साधारण मात्रा १०–२० की है।
(१) इसके चूर्ण को घृत में भूनकर उसमें मिश्री मिलाकर संग्रहणी (Dysentery) में देने से बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में दन्तोद्भव के समय जब खांसी, ज्वर, अतिसार एवं पाचन के विकार आदि होते हैं, तब काकरासिंगी, अतीस एवं छोटी पीपल समान मात्रा में लेकर उसके चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इस चूर्ण में नागरमोथा भी कुछ लोग मिलाते हैं। बच्चों के श्वास में मूली के फल एवं इसके चूर्ण को मधु तथा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (३) शुष्क कास तथा अन्य श्वसन संस्थान के विकारों में काकरासिंगी, भारङ्गीमूल, सोंठ, छोटी पीपल, कचूर तथा मुनक्का इन का चूर्ण १५ र० की मात्रा में मधु के साथ देना चाहिये। (४) कफज छर्दि में नागरमोथा एवं इसका चूर्ण मधु के साथ चटाने से लाभ होता है।