भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

यहाँ पृष्ठों का सम्पूर्ण और सटीक पाठ प्रस्तुत है:


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भावप्रकाशनिघण्टुः

(५) कुष्ठ (Leprosy) में इसके स्वरस को १ तोले की मात्रा में ४० दिन तक रोज सबेरे दूध के साथ पिलाने से लाभ होता है। यह रसायन एवं बलवर्धक है तथा फिरंगादि में भी यह लाभदायक होता है। (६) सरसों में इसके बीजों की मिलावट करके तेल निकालते हैं। ऐसा मिलावटी तेल बहुत हानिकार होता है तथा इससे बेरीबेरी (Beri beri) एवं एपिडेमिकू ड्राप्सी (Epidemic dropsy) नामक रोग होते हैं जिसमें पैरों में सूजन, हृदय की दुर्बलता, पचनसंस्थान के विकार एवं वात नाडी शोथ आदि होते हैं।

**परीक्षा—**सरसों के तेल में इसकी मिलावट है या नहीं इसकी निम्न परीक्षायें की जाती हैं। (क) सरसों के तेल के बराबर शोरे का तेजाब (Nitric acid-नाइट्रिक एसिड) मिलाकर हिलाने से मिलावट न होने पर धूसर लाल (Brownish red) या नारंग (Orange) रंग उत्पन्न नहीं होता। (ख) ३ मि. लि. सरसों का तेल, १ मि. लि. ग्लेशियल एसिटिक ॲसिड (Glacial acetic acid) तथा क्यूप्रिक अॅसिटेट (Cupric acetate) के जलीय ३% घोल का ३ मि. लि. धीरे २ हिलावें। फिर जलयुक्त पात्र में इसके पात्र को रख कर १५ मिनट गरम करके फिर अच्छी तरह हिला कर रख दें। मिलावट न होने पर अवक्षेप नहीं होता तथा उसके जलीय भाग में नीले रंग से हरे रंग में कोई परिवर्तन नहीं होता। **मात्रा—**बीज तैल १० बूँद; बीज ३ तो०; पीतवर्ण का दुग्ध १-२ माशा; मूल २-४ माशा ।


अथ कर्कटशृङ्गी (काकड़ासिंगी) तस्या नामानि गुणाँश्चाह

शृङ्गी कर्कटशृङ्गी च स्यात्कुलीरविषाणिका । अजशृङ्गी च चक्रा च कर्कटाख्या च कीर्त्तिता ॥ शृङ्गी कषाया तिक्तोष्णा कफवातक्षयज्वरान् । श्वासोर्ध्ववाततृट्कासहिक्काछर्दिंवमीन्हरेत् ॥

**काकड़ासिंगी के नाम तथा गुण—**शृङ्गी, कर्कटशृङ्गी, कुलीरविषाणिका, अजशृङ्गी, चक्रा और कर्कटाख्या ये सब काकड़ासिङ्गी के नाम हैं। काकड़ासिङ्गी-कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं उष्ण-वीर्य होती है। और यह कफ, वात, क्षय, ज्वर, श्वास, ऊर्ध्ववात, प्यास, कास, हिक्की, अरुचि तथा वमन को दूर करने वाली होती है ॥ १७८–१७९ ॥


५९ कर्कटशृङ्गी (ककड़ासिंगी)

  • **हि०—**ककड़ासिंगी, काकड़ासिंगी, काकरासिंगी (धौ¹, ककड़ाव।
  • **बं०—**कांकराशृङ्गी।
  • **म०—**काकड़-शिंगी।
  • **क०—**कर्कटिशृङ्गी, दुष्टपुचत्तु।
  • **ने०—**काकर सिंगी।
  • **ता०—**काक्कट शिंगी।
  • **मा०—**काकड़ा-शिंगी।
  • **पं०—**ककर, सुमाक।
  • **गु०—**काकड़ा सांगी।
  • **काश्मी०—**कक्कर।
  • **लै०—**Pistacia integerrima, Stew. ex Brandis (पिस्टैंसिया इंटिजिर्रिमा)।
  • Fam. Anacardiaceae (ॲनॅकार्डिएसी)।

इसके वृक्ष उत्तर पश्चिमी हिमालय के बाहरी कतारों पर १५००–८००० फीट की ऊँचाई तक तथा पंजाब, सीमाप्रान्त आदि स्थानों पर पाये जाते हैं। इसके वृक्ष मध्यमाकार के होते हैं। **छाल—**सफेद रंग की। **पत्र—**युग्म अथवा अयुग्मपक्षाकार तथा ६–९ इञ्च लम्बे। **पत्रक—**४–६ जोड़े, किञ्चित सनाल, भालाकार, लम्बे नोक तथा सरल धार


¹ 'वक्रे'ति पाठान्तर प्रामादिकम् ।


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हरीतक्यादिवर्गः

वाले और चिकने। कोपलें (नवीन पत्र) लाल रंग की। **पुष्प—**स्त्रीपुष्प और पुंपुष्प अलग २ वृक्षों पर तथा सवृन्त काण्डज पुष्पसमूहों में एवं बाह्य कोषों (पंखुड़ियों) से हीन। अष्ठिफल (Drupe) शुष्क, चिकने, झुर्रीदार, गोल, बहुत छोटे, एवं पकने पर धूसर वर्ण के हो जाते हैं।

इस वृक्ष की पत्तियों, पर्णवृन्तों तथा टहनियों पर एक प्रकार की लम्बी २ शृङ्गवत् रचना लगी रहती है जिन्हें कृमिगृह (Galls-गॉल्स) कहते हैं। ये एक प्रकार के कीड़ों, जिन्हें एफिस (Aphis) कहा जाता है द्वारा निर्मित होते हैं। इन कृमिगृहों को ही काकरासिंगी कहते हैं। ये विभिन्न माप के ३-९ इञ्च लम्बे, पोले, एवं कड़े होते हैं। इनका बाह्य पृष्ठ हल्का हरिताभ बादामी रंग का, पतला तथा झालरदार (Fimbriated) दिखलाई देता है। इसको तोड़ने पर अन्दर का पृष्ठ रक्ताभ दिखलाई देना है जो महीन रजः कणों से ढका रहता है। सूक्ष्मदर्शक यन्त्र द्वारा देखने से यह सिद्ध हुआ है कि ये कण उन कीड़ों के भूतदेह तथा उनके मल हैं। काकरा-सिंगी का चूर्ण स्वाद में अत्यन्त कसैला तथा कुछ कड़वा होता है तथा इसमें तारपीन के तैल की तरह गन्ध आती है।

सिंतिडीक जाति (Rhus) के वृक्षों में भी कृमिगृह बनते हैं परन्तु वे काकरासिंगी से भिन्न हैं। कुछ लोगों ने भ्रम से कर्कट वृक्ष का नाम हस् सक्सिडेनिया (Rhus succedanea Linn.) दे दिया है जो उचित नहीं है।

प्राचीन ग्रन्थों में इसके कीड़ों से उत्पन्न होने के विषय में कोई उल्लेख नहीं मिलता लेकिन कास आदि के लिये इसका बहुत प्रयोग किया गया है।

**रासायनिक संगठन—**इसमें एक हलके हरिताभ पीतवर्ण का एवं तारपीन के तेल की तरह गन्धवाला उड़नशील तैल १-३%, रवेदार हाइड्रोकार्बन (Hydrocarbon) ३-४%, टॅनिन ६०%, गम मॅस्टिक (Gum mastic) ५%, एक रालीय पदार्थ तथा दो अन्य रवेदार अम्ल पाये जाते हैं।

**गुण और प्रयोग—**यह बल्य, कफनिःसारक, उष्ण एवं ग्राही है। इसमें के उड़नशील तैल के कारण इससे चमकश्वास कास, श्वासनलिका शोथ एवं राजयक्ष्मा आदि में अच्छा लाभ होता है। इससे श्लेष्मिककला को बल मिलकर कफ बाहर निकलने लगता है एवं नया कफ बनने नहीं पाता। इसमें टॅनिन बहुत होने के कारण इसका अतिसारादि में भी अन्य औषध के साथ उपयोग किया जाता है। आमाशय के प्रकोप से उत्पन्न वमन, हिक्का, जीर्ण अतिसार, आमातिसार तथा उपजिह्विका की वृद्धि से उत्पन्न खांसी आदि में इसको देने से अच्छा लाभ होता है। बच्चों के लिये यह विशेष लाभदायक है। वयस्कों के लिये इसकी साधारण मात्रा १०–२० की है।

(१) इसके चूर्ण को घृत में भूनकर उसमें मिश्री मिलाकर संग्रहणी (Dysentery) में देने से बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में दन्तोद्भव के समय जब खांसी, ज्वर, अतिसार एवं पाचन के विकार आदि होते हैं, तब काकरासिंगी, अतीस एवं छोटी पीपल समान मात्रा में लेकर उसके चूर्ण को १-२ र० की मात्रा में मधु के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। इस चूर्ण में नागरमोथा भी कुछ लोग मिलाते हैं। बच्चों के श्वास में मूली के फल एवं इसके चूर्ण को मधु तथा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है। (३) शुष्क कास तथा अन्य श्वसन संस्थान के विकारों में काकरासिंगी, भारङ्गीमूल, सोंठ, छोटी पीपल, कचूर तथा मुनक्का इन का चूर्ण १५ र० की मात्रा में मधु के साथ देना चाहिये। (४) कफज छर्दि में नागरमोथा एवं इसका चूर्ण मधु के साथ चटाने से लाभ होता है।

१०० भावप्रकाश निघण्टुः (५) इसका बाह्य लेप सोरियेसिस् ( Psoriasis ) नामक जीर्ण चर्मरोग में किया जाता है तथा मसूड़ों आदि से खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराया जाता है । मात्रा - चूर्ण ३-२ मा० । अथ कट्फलस्य ( कायफल ) नामानि गुणांश्चाह कट्फलः सोमवल्कश्च कैटर्यः कुम्भिकाऽपि च । श्रीपर्णिका कुमुदिका भद्रा भद्रवतीति च ॥ कट्फलस्तुवरस्तिक्तः कटुर्वातकफज्वरान् । हन्ति श्वासप्रमेहार्शः कासकण्ठामयारुचीः ॥ १८१॥ कायफल के नाम तथा गुण - कट्फल, सोमवल्क, कैटर्य, कुम्भिका, श्रीपर्णिका, कुमुदिका, भद्रा और भद्रवती ये सब कायफल के नाम हैं। कायफल - कषाय, तिक्त तथा कटु रसयुक्त होता है तथा वात, कफ, ज्वर, श्वास, प्रमेह, बवासीर, कास, कण्ठसम्बन्धी रोग तथा अरुचि को दूर करता है ॥ १८०-१८१ ॥ ६० कट्फल (कायफल ) हि०-कायफर, कायफल, काफल । ब०-कायछाल, कायफल, कट्फल । क०-किरिशि- वनि । ते०-कैदूर्यमु । म०-मा०-गु०-पं०-कायफल । खासिया०-डिंगसोलिर । ता०-मरु- दम्पतै । फा०-दारशीशान् । अ०-उदुलुवर्क, अजूरी । अं०-Box Myrtle; Bay-berry ( बाक्स मिर्टल; बे-बेरी) । ले०- Myrica nagi, Thunb.; (मायूरिका नेगी) Fam. Myricaceae ( मायरीकेसी ) । यह हिमालय के साधारण उष्ण प्रदेशों में रावी से पूरब की ओर, खासिया पहाड़, सिलहट तक, ३-६ हजार फीट के बीच पाया जाता है और सिंगापुर में भी इसके वृक्ष देखने में आते हैं। चीन तथा जापान में इसकी बहुत उपज की जाती है। इसके मध्यम ऊंचाई के सदाहरित वृक्ष होते हैं। छाल बादामी धूसर अथवा कृष्णाभ, भारी, सुगन्धित, करीब ३/८ इंच मोटी और खुरदरी होती है। काष्ठ-३/४ इंच से १ इंच मोटा, बिना रेशे का और रक्ताभ बादामी होता है। पत्रनाल, मञ्जरी तथा नवीन शाखाओं पर बादामी रोमावरण होता है। पत्ते-४ से ८ इंच लम्बे तथा १ १/२-२ इंच चौड़े, ऊपर से भालाकार अथवा कुछ २ आय- ताकार भी और उनके अधः पृष्ठ प्रायः सुरमई रंग के होते हैं। फूल-लाल । फल ३/८ इंच लम्बे, अण्डाकार, कुछ चिपटे, पृष्ठ पर दानेदार और पकने पर रक्ताभ या पीताभ बादामी होते हैं। फलों में मोम की तरह एक तेल होता है। ये फल स्वाद में कुछ खट्टे होते हैं। इन्हें सिलहट में 'सोफी' कहते हैं जिन्हें लोग खाते हैं। यद्यपि इस वृक्ष का नाम कायफल है तब भी औषधार्थ इसकी छाल का ही प्रयोग 'काय- फल' नाम से किया जाता है। इस छाल को सूंघने से छींक आती है तथा इसे जल में डालने पर जल लाल हो जाता है । आधुनिक विद्वान् इसके फल का भी औषधार्थ प्रयोग बतलाते हैं। भ्रमवश कितने वैघ जंगली जायफल, ले०-मायरिस्टिका मलवारिका (Myristica malab- arica Lam. ) के वृक्ष को कायफल का वृक्ष बतलाते हैं। जंगली जायफल के फल के ऊपर जावित्री के समान जो छिलका होता है उसको रामपत्री कहते हैं। कायफल के फल का छिलका न जावित्री के समान होता है और न रामपत्री कहलाता है। कुछ लोगों ने इस वृक्ष को कुम्भी वृक्ष, ले०-केरेया आर्बोरिया (Careya arborea Roxb.) माना है जो गलत है। हरीतक्यादिवर्गः १०१ रासायनिक संगठन - इसमें कुछ टैनिन, शर्करा सम द्रव्य तथा कुछ लवण रहते हैं। इसके चूर्ण में एक मायुरिसेटिन ( Myricetin ) नामक रंजक पदार्थ प्राप्त होता है । गुण और प्रयोग-यह उष्ण, ग्राही, स्वेदजनक, कफघ्न, वातहर, शोथघ्न, शिरोविरेचक, उत्तेजक तथा गर्भाशयसंकोचक है। अधिक मात्रा में लेने से इससे वमन होता है तथा थकावट मालूम होती है । इसका प्रयोग घरेलू औषध के रूप में अनेक रोगों में किया जाता है। (१) सोंठ एवं दालचीनी के साथ इसका क्वाथ प्रतिश्याय, गले की सूजन, मुखपाक, स्वरभंग, तमकश्वास, जीर्ण श्वासनलिका शोथ, कास तथा अग्निमांद्य, अरुचि, आध्मान, कुपचन, आमा- तिसार, रक्तातिसार, मूत्रातिसार, गण्डमाला एवं गृध्रसी आदि में दिया जाता है। (२) अर्श में कत्था, हींग एवं कर्पूर के साथ या घृत के साथ इसका लेप लाभदायक है तथा इसका आन्तरिक प्रयोग भी किया जाता है। (३) केशर, काले तिल तथा सनई के बीजों को इसके साथ पूर्ण मात्रा में गुड़ के साथ देते हैं जिससे कष्टार्तव में अच्छा लाभ होता है। इसके देने के कुछ देर बाद भोजन देना चाहिये नहीं तो जी मिचलाने लगता है। इसके चूर्ण का पिचु भी योनि में धारण कराया जाता है। (४) प्रतिश्याय, चक्कर, शिरःशूल एवं अपस्मार आदि में इसके नस्य से लाभ होता है। (५) इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन किया जाता है तथा इसका चूर्ण व्रणों पर डाला जाता है। इसको घिसकर सूजन, चोट एवं मोच आदि पर लगाने से लाभ होता है। (६) इसका तैल व्रणों के लिये लाभदायक है तथा संधिशूल में इसे लगाते हैं। (७) सिरके में इसे घिसकर मसूड़ों पर रगड़ने से दंतशूल दूर होता है तथा मसूढ़े मजबूत होते हैं। (८) इससे सिद्ध तैल का प्रयोग कर्णशूल में कर्णबिन्दू के रूप में किया जाता है। (९) हैजे में हाथ पैर ठंडे हो जाने पर इसके चूर्ण को सोंठ के साथ मिलकर हाथ पैरों पर मलते हैं। (१०) इसके फलों को उबालने से एक मोम के सदृश पदार्थ निकलता है जिसका व्रण पूरण के लिये प्रयोग करते हैं। मात्रा - चूर्ण १०-३० र० आर्द्रक रस एवं मधु के साथ । बच्चों को १-२ र० । अथ भार्गी ( भारङ्गी ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह भार्गी भृगुभवा पद्मा फञ्जी ब्राह्मणयष्टिका । ब्राह्मण्यङ्गारवल्ली च खरशाकश्च हञ्जिका ॥ १८४॥ भार्गी रुक्षा कटुस्तिक्ता रुच्योष्णा पाचनी लघुः । दीपनी तुवरा गुल्मरक्तनुन्नाशयेद् ध्रुवम् ॥ शोथकासकफश्वासपीनसज्वरमारुतान् ॥ १८३ ॥ भार्ङ्गी (बभनेटी) के नाम तथा गुण - भार्गी, भृगुभवा, पद्मा, फञ्जी, ब्राह्मणयष्टिका, ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाक और हञ्जिका ये सब नाम भार्ङ्गी के हैं। भार्ङ्गी-रूक्ष, कटु, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त रुचिकारक, उष्णवीर्य, पाचक, लघु तथा अग्निदीपक होती है। एवं गुल्म, रक्तदोष, शोथ, कास, कफ, श्वास, पीनस, ज्वर और वायु को नष्ट करती है ॥ १८२-१८३ ॥

१०२ भावप्रकाशनिघण्टुः ६१ भार्गी ( भारङ्गी ) भारङ्गी के विषय में विद्वानों में कुछ मतभेद हैं तथा इस नाम से ४ वनस्पतियों की छाल ली जाती है। बङ्गाल में काशिया नामक डाक्टरी ओषधि का प्रतिनिधि 'ख' का व्यवहार भारङ्गी नाम से होता है। श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी अपनी 'वनौषधि दर्शिका' नामक पुस्तक में लिखते हैं कि भारङ्गी नाम से बाजार में बिकनेवाली छाल क्लेरोडेंड्रान ( Clerodendron ) की नहीं मालूम होती जिसे अधिकांश लोगों ने भारङ्गी माना है तथा यह संभवतः 'ख' की ही छाल हो। डा० देसाई 'क' को ही शाखीय भारङ्गी मानते हैं तथा अन्य अधिकांश विद्वानों ने भी इसे ही भारङ्गी माना है। अन्य दो 'ग' तथा 'घ' वनस्पतियों का भी कहीं २ व्यवहार होता है। इन चारो वनस्पतियों का अलग २ वर्णन नीचे दिया जा रहा है। प्राचीन समय में इसका आन्तरिक प्रयोग श्वास, कास आदि में किया गया है तथा सुश्रुत (उ० अ० ६१) में अपस्मार के लिये एक विशेष प्रकार से निर्मित सुरा का प्रयोग बतलाया गया है। इसका बाह्य प्रयोग गण्डमाला, कुरंड ( वृद्धि ) तथा शस्त्रक्षत में किया गया है। ( क ) Clerodendron serratum, Spreng. (क्लेरोडेन्ड्रोनू सेरेंटम्, स्प्रेग) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हि०-भारङ्गी, भारिङ्गी, ब्रह्मयष्टि, बभनेटी। बं०-बामन हाटी, भुइजाम । म०-भारङ्ग । गु०-भारङ्गी। क०-गंडुभारङ्गी । ते०-नालनिरंडु । ने०-चूया । पं०- भाड़ङ्गी । मा०-भाराङ्गमूल । ता०-चेरूट्टेकु । जोनसार०-बनवाकरी । फा०-हंजिका । यह हिमालय में सतलज से खांसिया पहाड़ और आसाम तक तथा ब्रह्मा, नीलगिरी, पश्चिम- घाट थाना, रत्नागिरी और सिलोन में पाई जाती है। इसके पौधे ३ से ५ हजार फीट की ऊँचाई तक प्रायः पर्वतों के घासवाले ढालों पर होते हैं। भारङ्गी क्षुप जाति की वनौषधि ४-८ फीट तक ऊँची होती है। शाखाएँ-इसके काष्ठमय मूलस्तम्भ से प्रतिवर्ष शाखाएं निकलती हैं। प्रत्येक गांठ पर तीन-तीन पत्ते रहते हैं जो ४ से ८ इञ्च लम्बे, १५-२३ इञ्च चौड़े, आयताकार, अंडाकार-आयताकार या भालाकार, तीक्ष्ण दन्तुर तथा शिराओं के ५ जोड़ों से युक्त होते हैं। फूल-सफेद या कुछ नीले रङ्ग के आते हैं। फल-चौथाई इञ्च लम्बे, गोल, काले, पकने पर जामुनी रङ्ग के हो जाते हैं। इस क्षुप की छाल या जड़ का व्यवहार किया जाता है। अधिकांश विद्वान् इसको ही शाखीय भारङ्गी मानते हैं लेकिन श्रीमान् ठा० बलवन्तसिंहजी लिखते हैं कि इस नाम से जो छाल बाजारों में बिकती है वह इस वनस्पति की न होकर सम्भवतः निम्न वर्णित 'ख' की छाल हो । क्योंकि बाजार की छाल मोटी होती है जो इस छोटे से क्षुप की नहीं हो सकती । रासायनिक संगठन-इसमें एक नारङ्गी रंग का रालीय पदार्थ, स्टार्च तथा अन्य तिक्त पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, कफघ्न, श्वासहर, वातघ्न, दीपन, पाचन तथा शोथघ्न है। इसका प्रयोग श्वास, कास, प्रतिश्याय, यक्ष्मज कास, फुफ्फुस विकार, वातकफज्वर तथा आमवात में किया जाता है। इसमें ज्वरघ्न तथा कफघ्न गुण अल्प मात्रा में होने के कारण ज्वर में इसके साथ अन्य ज्वरहर औषधियां देनी पड़ती हैं तथा कफज व्याधियों में काकड़ासिंगी या कायफल इसके साथ दिया जाता है। प्रतिश्याय एवं कफयुक्त श्वास आदि में इसके साथ सोंठ या घोड़वच देते हैं।

हरीतक्यादिवर्गः १०३ इसके पत्तों का पोल्टिस बनाकर फोड़ों के ऊपर लगाते हैं। उपदंशजन्य सन्धिवात में इसका गोंद लाभदायक है। इसके पत्तों तथा कोमल डालियों का रस परिसर्प ( इरपीज ) एवं पेंफीगस् नामक विस्फोटों पर लगाया जाता है। रत्नागिरी में इसके पत्तों का शाक मलेरिया में खाते हैं। इसके बीजों का चूर्ण घी में भूनकर शोथ में रसायन के रूप में खाते हैं। मात्रा-चूर्ण १३-३ मा० । ( ख ) Picrasma quassioides, Ben. (पिक्रेस्मा क्वासिओइडिस, बेन) । Fam. Sima- rubaceae (सिमॅरूबेंसी)। हि०-भारङ्गी, करूई-तिथाई। बं०-मुसुंगी । म०-कदाशिंग । पं०-तित्थ, बेरिंग, पुथोरिन । ने०-शामबारंगी । अं०-Quassia (कॅसिया) । यह हिमालय के बाहरी भाग में चेनाव से लेकर पूर्व की ओर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर तथा चम्बा, कुल्लू, बशहर, उत्तरी गढ़वाल में ६०००-८००० फीट की ऊँचाई पर एवं नेपाल, भूटान तथा आसाम में खासी एवं नागा पहाड़ियों पर ३०००-८००० फीट की ऊँचाई पर पायी जाती है। इसकी बड़ी-बड़ी झाड़ी या छोटे वृक्ष होते हैं जिनमें थोड़ी परन्तु मजबूत शाखायें होती हैं जिनपर प्रायः सफेद दाग होते हैं। पत्र-अयुग्म पक्षकार, ९-१५ इञ्च लम्बे, अरलु वृक्ष के पत्तों के समान तथा रक्तरोमश मालूम होते हैं। पत्रक-९-१५, अभिलट्वाकार, आरावत तथा उनका अग्र लम्बा होता है एवं सबसे नीचे के पत्रक बहुत छोटे तथा उपपत्रों के समान होते हैं। पुष्प- हलके हरे रङ्ग के, पार्श्विक तथा सवृन्त-काण्डज पुष्पसमूहों में। अष्ठिफल-बहुत छोटे, पकने पर काले रंग के तथा प्रत्येक फल में एक बीज होता है। इस क्षुप के टुकड़ों या छाल का व्यवहार बंगाल में भारंगा नाम से किया जाता है। यह पीताभ श्वेत या चमकीले पीले रंग के, हल्के, लचीले लेकिन आसानी से टूटने वाले, गन्धहीन तथा स्वाद में अत्यन्त कड़वे होते हैं। यह डाक्टरी की काशिया नामक वनस्पति का अच्छा प्रतिनिधि है। रासायनिक संगठन-इसमें पिकैस्मिन् ( Picrasmin ) से ठीक मिलता जुलता एक क्षाराम ०००५%, एक क्वासीन् (Quassin) नामक कडवा पदार्थ तथा एक अन्य प्रभायुक्त एवं क्लोरोफार्म में घुलनशील कडवा पदार्थ ००१५% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह एक अत्यन्त कटु द्रव्य है। इसका प्रयोग आमाशय के दौर्बल्य से उत्पन्न अग्निमान्द्य में लाभदायक होता है लेकिन अधिक मात्रा में लेने से इससे प्रक्षोभ होकर वमन होता है। इसमें अन्य कडवे द्रव्यों की तरह टैनिन् न होने के कारण इसको लोह के साथ प्रयोग कर सकते हैं। इसको फांट या हिम के रूप में अधिकतर व्यवहार करते हैं। पंजाब में ज्वर एवं कृमियों के लिये इसकी छाल तथा पत्तों का व्यवहार किया जाता है। सूत्रकृमि (Thread-worm) के लिये इसके फांट ( १ में १० ) की बस्ति दी जाती है। इसके पत्तों को पीसकर खुजली आदि में लगाते हैं। इसके सत्त्वों का उपयोग बागवानी में जन्तुओं का नाश करने के लिये किया जाता है। मात्रा-चूर्ण १-४ रत्ती । हिम ३-१ औंस। ( ग ) Premna herbacea, Roxb. (प्रेम्ना हरबेसिया रॉक्सव.) । Fam. Verbenaceae (हर्बिनेंसी)। हि०-भारंगी । बं०-भुइजाम । क०-नयित याग। ता०-शिरुकेट। ने०-चूअ । कों०-निचिंश । लेप०-ईं।

१०४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी छोटी झाड़ी हिमालय तथा दक्षिण में कोंकण के पहाड़ी भागों में बरसात के दिनों में होती है। इसका वायवीय भाग मुलायम एवं शाखकीय होने से यह ऊँचा नहीं होता तथा पत्तियाँ जमीन पर फैली रहती हैं। पत्ते-४ इंच तक लंबे, २ से ३ इंच चौड़े, विनाल, अभिलट्वाकार, शिराओं पर मृदुरोमश एवं शिराएँ ५ युग्म होती हैं। पुष्प-छोटे, श्वेत, एवं १ १/२ इंच व्यास के समस्थ काण्डज गुच्छ में आते हैं। फल-१/२ इंच एवं गोल होता है। मूल-जमीन के नीचे, लंबे परंतु थोड़ी थोड़ी दूर पर गांठदार होते हैं। ये गन्धहीन एवं स्वाद में कड़वे होते हैं तथा इनका चिकित्सा में व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके मूलत्वक में एक नारङ्गी बादामी रङ्ग की अम्ल राल तथा अत्यल्प मात्रा में एक क्षाराभ तथा कुछ स्टार्च रहता है। इसमें टैनिन् नहीं होता। गुण और प्रयोग-मारङ्गी नाम से यद्यपि कोंकण की तरफ इसका व्यवहार होता है तब भी इसमें भारङ्गी के गुण नहीं हैं। डा० देसाई लिखते हैं कि इसका उपयोग करके देखा गया लेकिन इसमें भारङ्गी के गुण नहीं मालूम पड़े। प्रतिश्याय आदि में इसका उपयोग करते हैं। तमकश्वास में इसका कल्क सोंठ तथा उष्ण जल के साथ या भारङ्गी मूल को आर्द्रक स्वरस या उष्ण जल के साथ देते हैं। शिरःशूल में इसकी जड़ उष्ण जल में घिसकर सर में लगाई जाती है। कानों में व्रण होने पर इसको मधु में घिसकर कान में डालते हैं। गठिया में इसका उपयोग करते हैं। इसे बिहार में गठिया, गँठिया कहते भी हैं। इसके बीजों को मठ्ठे में उबाल कर उदर रोग में शौच साफ होने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (घ) Clerodendrum siphonanthus, (R. Br.) C. B. Clarke (क्लेरोडेन्ड्रम् सिफोनेन्थस्)। Fam. Verbenaceae (हर्बिनेसी)। हि०-चिनगारी, भारंगी। सं०-ब्रह्मय- ष्टिका। बं०-बामनहाटी। पं०-अरनि। इसके क्षुप हिमालय में तथा दक्षिण के पर्वतीय भागों में मिलते हैं। यह ४-६ फीट ऊँचा होता है। कांड-१ इंच तक मोटा, नालीदार तथा भीतर से पोला होता है। पत्ते-प्रति चक्र में ३-५ की संख्या में तथा ६ से ९ इंच लम्बे, १ से १॥ इंच चौड़े, पतले भालाकार, विनाल तथा कड़े होते हैं। पुष्प-९-१८ इंच लम्बी डंडी पर सफेद रंग के कुछ रक्तिमा लिये हुये होते हैं। पुष्पकोश की नली ३-४ इंच लम्बी होती है। फल-गोलाकार, ३/८ इंच लम्बे एवं जामुनी रंग के होते हैं तथा वाह्यपुट गहरे लाल रंग का एवं बढ़ा हुआ होता है। बीज-१ से ४ तक जुड़े हुए होते हैं। मूलका स्वाद-कड़वा तथा कषाय होता है तथा औषधि कार्य में इसी का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसका मुख्य सत्व एक क्षाराम होता है। गुण और प्रयोग-इसके पोले कांड के टुकड़े बंगाल में तागे में पिरोकर कई रोगों से बचने के लिये पहने जाते हैं। इसका मूल खांसी तथा तमक श्वास में दिया जाता है। राजयक्ष्मा में इसके मूल का कल्क तथा सोंठ को उष्ण जल के साथ खिलाते हैं। इसके पत्तों का रस घी के साथ मिला कर परिसर्प में लगाया जाता है। मांसक्षय वाले बच्चों को इससे सिद्ध तैल की मालिश की जाती है।

अथ पाषाणभेदः, तस्य नामानि गुणांश्चाह पाषाणभेदकोऽश्मघ्नो गिरिभिद्भिन्नीयोजिनी। अश्मभेदो हिमस्तिक्तः कषायो बस्तिशोधनः॥ भेदनो हन्ति दोषार्शोगुल्मकृच्छ्राश्महृद्रुजः। योनिरोगप्रमेहांश्च प्लीहशूलव्रणानि च ॥


हरीतक्यादिवर्गः १०५ पाषाणभेद के नाम तथा गुण-पाषाणभेदक, अश्मघ्न, गिरिभिद् और भिन्नीयोजिनी ये सब पाषाणभेद के नाम हैं। पाषाणभेद-शीतल तथा तिक्त और कषायरस युक्त, बस्ति (मूत्राशय) का शोधन करने वाला और भेदक होता है। और वातादिक दोष, बवासीर, गुल्म, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, हृद्रोग, योनिरोग, प्रमेह, प्लीहा, शूल तथा व्रण को दूर करता है॥ १८४-१८५॥

६२ पाषाणभेद पाषाणभेद एक संदिग्ध वस्तु है। इसके स्थान पर अनेक वनस्पतियाँ ली जाती हैं तथा विभिन्न विद्वान् भिन्न-भिन्न वनस्पतियों को पाषाणभेद मानते हैं। राजनिघण्टु में पाषाणभेदक, वटपत्री, शिलावल्का तथा चतुष्पत्री ये पाषाणभेद के चार भेद वर्णित हैं। निम्नलिखित वनस्पतियों को भिन्न-भिन्न आधुनिक विद्वान् पाषाणभेद मानते हैं। १. Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वॉल,)। Fam. Saxifragaceae (सैक्सिक्रॅगासी)। २. Aerva lanata, Juss. (एख्वा लैनेटा, जस.)। Fam. Amaranthaceae (अॅमरेंन्थेसी)। ३. Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅन्चो पिन्नॅटा पर्स.)। Fam. Crassulaceae (क्रॅसुलॅसी)। ४. Coleus aromaticus, Benth. (कोलिअस् अॅरोमैटिकस्, बेन्थ.)। Fam. Labiatae (लेबियैटी)। ५. Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बियेसी)। ६. Rotula aquatica Lour. (रोटुला अॅक्वेंटिका लोर.)। Fam. Boraginaceae (बोरंजिनॅसी)। ७. Ocimum basilicum Linn. (ओसिमम् बॅसिलिकम् लिन.)। Fam. Labiatae (लेबियटी)। इन वनस्पतियों के अतिरिक्त कुछ लोगों ने एक खनिज पाषाणभेद भी लिखा है लेकिन उसका विशेष वर्णन नहीं मिलता है। उपर्युक्त वनस्पतियों में से अधिकांश मूत्रल अवश्य हैं लेकिन प्रथम वनस्पति सैक्सिफ़्रेगा लिग्युलेटा का ही ग्रहण पाषाणभेद नाम से उचित है। उपर्युक्त वन- स्पतियों का अलग-अलग वर्णन आगे दिया जा रहा है। ओसिमम् बॅसिलिकम् का वर्णन आगे तुलसी के साथ दिया जावेगा। (१) Saxifraga ligulata, Wall. (सॅक्सिफ्रेगा लिग्युलेटा, वाल.)। Fam. Saxifragaceae (सॅक्सिफ्रॅगासी)। सं०-पाषाणभेद, वटपत्रीभेद। हि०-पखानभेद, सिलफडा, पोपल, वनपत्रक, दकचु। म०- पाषाणभेद । पं०-शफ़्रोकी। ने०-सोहंपे सोभा। का०-बयेव। रावी-सप्रोत्री। खासिया-अतिभ। चिनाब-बलूपिया। कुमाऊँ-शिलफोडा। इसके पौधे कश्मीर, नेपाल तथा हिमालय के मध्य भाग में प्रायः ५००० फीट के ऊपर पर्वतों की ढालों पर पत्थरों की दरारों में बहुतायत से निकलते रहते हैं। यह क्षुप जाति की वनस्पति बारहौ मास पायी जाती है। मूलस्तम्भ-रक्ताभ (भीतर सफेद) और लगभग एक इञ्च मोटा होता है। इससे पतले उपमूल निकलकर पत्थरों के बीच में फैले रहते

१०६ भावप्रकाशनिघण्टुः हैं। पत्र-मांसल, चिकने, कुछ-कुछ गोलाई लिये, प्रायः ३-५ इञ्च व्यास में, किनारे पर सूक्ष्म सघन शल्कों से युक्त (Ciliate = सीलियेद) तथा निचले पृष्ठ पर प्रायः गुलाबी रंग के होते हैं। एक स्थान में प्रायः ३ या ४ पत्तियों से अधिक नहीं निकलतीं। फूल-छोटे, सफेद, गुलाबी या जामुनी रंग के आते हैं। फल-नीलाभ श्वेत तथा छोटे होते हैं। इनके मोटे मूल के टुकड़े बाजार में बिकते हैं। ये टुकड़े करीब १-२ इञ्च लम्बे, ३-१ इञ्च मोटे, कपिशवर्ण के, कड़े एवं इनकी छाल खुरंदरी तथा झुर्रीदार होती है। इन पर टूटे हुये उपमूलों के निशान एवं गोल गढ़े रहते हैं। इनका आन्तरिक भाग सफेद होता है। इनका स्वाद कुछ सुगन्धित एवं कसैला होता है। कुछ लोग इसे वटपत्री मानते हैं। रासायनिक संगठन - इसके मूल में चूना १११%, टैनिक तथा गॅलिक ॲसिड १५३%, शर्करा ५३%, गोंद २३%, अलब्यूमिन् ७१%, स्वांचे १९%, खनिजक्षार ३३% तथा कॅल्शियम ऑक्झॅलेन् (Calcium oxalate) १११% होता है। गुण और प्रयोग - इसका मूल स्नेहन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न, ग्रांही एवं श्लेष्मघ्न है। इससे मूत्र की वृद्धि होकर उसकी अस्वच्छता दूर होती है तथा अश्मरी भी घुलकर निकल जाती है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी, वस्तिरोग, आमातिसार एवं कास आदि फुप्फुस विकारों में किया जाता है। (१) वृक्कशूल एवं अश्मरी आदि में इससे बहुत लाभ होता है। (२) बच्चों में इसको दूध में घिसकर देने से पेशाब की अस्वच्छता दूर होती है। दन्तोद्भेद के समय जब मुख में व्रण होते हैं तब इसको मधु के साथ घिसकर लगाते हैं। (३) फोड़ों एवं नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप किया जाता है। (४) ग्राही होने के कारण आमातिसार में इससे लाभ होता है। आंत्र के लिए बल्य होने के कारण ज्वर में अतिसार होने पर इसका उपयोग किया जाता है। आन्त्रशिथिलता के कारण उत्पन्न अतिसार में भी प्रयोग किया जा सकता है। मात्रा - चूर्ण ५-२० र०। (२) Aerva lanata, Juss. (एरवा लॅनॅटा, जस.)। Fam. Amaranthaceae (ॲमॅरॅन्थेसी)। सं०-आदानपाको, शतकाभेदी ? हि०-गोरखगांजा, गोरखबूटी, कपूरीजड़ी। बं०-चय । गु०-गोरख गांजो, कपूरो मधुरी । म०-कपूरफुटी, कुमरींडी । पं०-भु(बु) इक्कलान । सि०-बूर । ता०-चिरूबूले । ते०-पेंडिदोंड । क०-विलेमुलि । मला०-चिरापुल । इसके छोटे बहुवर्षायु क्षुप सभी स्थानों में मैदानों में पाये जाते हैं। कांड-अनेक, लचीले लेकिन स्वावलम्बी तथा श्वेत रोमों से युक्त। पत्र-एकांतरित, प्रधान काण्ड पर एक इञ्च तक लम्बे, आधा इञ्च तक चौड़े तथा अन्य शाखाओं पर छोटे, दीर्घ वृत्ताकार या अर्ध अंडाकार या कुछ गोलाई लिए हुये एवं अधोतल पर श्वेतररोमयुक्त होते हैं। पुष्प-छोटे, हरितभा श्वेत, गुच्छों में आते हैं। फल-चर्मल फल होता है जिसमें चमकीला काला बीज होता है। मूल-अनन्तमूल के समान और कर्पूर सदृश गन्धयुक्त। इसके पुष्पों को उत्तर हिन्दुस्तान में भु(बु) इक्कलान एवं गुजरात में बूर कहते हैं। गुण और प्रयोग - यह स्नेहन, मूत्रजनन, वेदनाहर, अश्मरीघ्न, कृमिघ्न एवं कासहर है। इसकी क्रिया अपामार्ग की तरह होती है। हरीतक्यादिवर्गः १०७ बस्तिस्थ अश्मरी में इसके पुष्पों का फांट देने से बहुत लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र में इसके मूल का क्वाथ देने से मूत्र की राशि बढ़कर लाभ होता है। तमकश्वास में इसकी सूखी पत्तियों तथा पुष्पों का धूम्रपान किया जाता है। Kalanchoe pinnata Pers. (कॅलॅन्चो पिन्नॅटा पर्स.) । Fam. Crassulaceae (क्रासुलेसी) । सं०-पर्णबीज । हि०-जखमेहयात, अहिरावण, महिरावाण, पत्थरचूर । बं०-कोएपाता। म०- घायमारी । क०-काडुसले । इसके मांसल, बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी भागों में उत्पन्न होते हैं लेकिन दक्षिणी बंगाल मे अधिक पाये जाते हैं। कांड-स्वावलम्बी, मोटा, पोला, लाल तथा ४ फीट तक ऊँचा। पत्र-नीचे के प्रायः साधारण किन्तु ऊपर के संयुक्त, ३-५ या कभी ७ पत्रकों से युक्त। पत्रक-गोलदन्तुर, विपरीत क्रम में, मांसल एवं लट्‌वाकार । पुष्प-बड़े, नलिकाकार, २ इञ्च लम्बे, रक्ताभ हरित तथा नीचे की ओर झुके हुये। इसके पत्तों के मूल से अंकुर प्ररोह निकलकर नया पौधा उत्पन्न हो जाता है। इसके पत्तों एवं स्वरस का औषध में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन - इसके स्वरस में कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium Sulphate) तथा ॲसिड टारट्रेट् ऑक पोटॅशियम् (Acid Tartrate of Potassium) एवं बचे हुए कल्क में कॅल्शियम ऑक्झॅलेट् (Calcium oxalate) होता है। गुण और प्रयोग - इसके पत्ते व्रणशोधक, व्रणरोपक, रक्तस्तम्भक, ग्राही तथा प्रतिदूषक हैं। इसका उपयोग रक्तस्राव, चोट, अतिसार, अश्मरी एवं विसूचिका आदि में किया जाता है। यह रक्तवाहिनी केशिकाओं का संकोच करके रक्तस्राव रोकता है इसलिये आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार के रक्तस्राव में लाभदायक है। (१) रक्तयुक्त अतिसार में इसके पत्तों का रस ३ से ६ तोला, जीरा तथा दुगुने घी के साथ देने से खून गिरना बन्द होता है। (२) चोट, मोच, सभी प्रकार के व्रण, फोड़े एवं कीटदंश आदि पर इसके पत्तों को जरा गरम करके कूचकर बांधने से सूजन, रक्तिमा एवं वेदना कम होकर लाभ होता है। घावों के लिये यह बहुत ही अच्छी ओषधि है। नये व्रण का इतने जल्दी व्रण पूरण होता है कि बाद में निशान तक नहीं रहता । मात्रा-३-३ तो० । (४) Coleus aromaticus, Benth. (कोलियस ॲरोमेटिकस्, बेन्थ.) Fam. Labiatae (लॅवियेटी) । सं०-पाषाणभेदी । हि०-पाथरचूर, पत्थरचूर, पाषाणभेद। बं०-पाथर कुची, अम्ल कुची, पात्तेरचूर । म०-पानांचा ओवां । गो०-ओवापान । ता०-कर्पूरवल्ली । अं०-Country borage (कन्ट्री बोरेज)। इसका बहुवर्षायु क्षुप भारतवर्ष के सभी प्रान्तों में तथा लङ्का में बगीचों आदि में रोपण किया जाता है। राजपूताना में वन्य अवस्था में भी मिलता है। इसका क्षुप १-३ फीट ऊँचा; कांड-सरस; पत्र-मोटे, सरस, गूदेदार, दन्तुर, रोमश, १-३ इञ्च के घेरे में, गोलाकार, सुगन्धयुक्त एवं स्वाद में कटु । पुष्प-पुराने क्षुपों में ३ इञ्च लम्बे, हल्के बैगनी तथा गुच्छों में आते हैं।

१०८ भावप्रकाशनिघण्टुः मद्य को सुगन्धित करने के लिये इसका उपयोग करते हैं। औषध में इसके पञ्चाङ्ग का व्यव- हार किया जाता है। मवेशियों के रोगों में भी इसे व्यवहार में लाते हैं। बंगाल की तरफ पाषाण भेद नाम से इसका उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक कार्व्हकाल (Carvacrol) नामक उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—यह दीपन, पाचन, वातनुलोमक, उद्वेष्टननिरोधी एवं अश्मरीघ्न है। इसका उपयोग अपचन, आध्मान, उदरशूल, दमा, जीर्णकास, अपस्मार एवं मूत्रसंस्थान के रोगों में किया जाता है। (१) अपचन, उदरशूल एवं आध्मान आदि में एक दो पत्तियों के ही उपयोग से शीघ्र लाभ होता है। बच्चों के उदरशूल में यह विशेष लाभदायक है। (२) दमा, जीर्णकास एवं अपस्मार आदि में इसका क्वाथ दिया जाता है। (३) नेत्राभिष्यन्द में इसका स्वरस पलकों पर लगाने से वेदना कम होती है। (४) शिरःशूल तथा गोजर के काटने पर इसको पीसकर लगाने से वेदना दूर होती है। मात्रा—स्वरस ५-६ बूंद शर्करा के साथ। (५) Homonoia riparia, Lour. (होमोनोइया राइपेरिया, लोर.)। Fam. Eupho- rbiaceae (यूफोर्बियेसी)। सं०-पाषाणभेदक। हि०-छोटा पाषाणभेद। ता०-चेप्पुंजेरिजल। ने०-खोलासइस। बर्मा- मोमाका। इसकी हमेशा हरी रहने वाली झाड़ी आसाम, उत्तरी बंगाल, पश्चिम प्रायद्वीप, बर्मा तथा मध्य प्रदेश में उत्पन्न होती है। इसके पत्र-३ से ६ इंच लम्बे तथा १/२-३/४ इंच तक चौड़े होते हैं। पुष्प-मंजरी में छोटे-छोटे आते हैं। इसकी जड़ का उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—यह मूत्रल तथा मृदुविरेचक होता है। इसका क्वाथ अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, सोजाक एवं फिरंग में प्रयुक्त होता है। (६) Rotula aquatica Lour. (रोटूला अॅक्वैटिका लोर.)। Fam. Boraginaceae (बोरेजिनेसी)। सं०-पाषाणभेद। ता०-चेप्पुनेरिजल। यह सभी स्थानों पर विशेषकर नदी के कछार में होता है। इसकी छोटी झाड़ी होती है। पत्ते-१/४-१ इंच लंबे, विनाल, सुवाकार तथा न्यूनाधिक रोमश होते हैं। पुष्प-छोटे तथा गुलाबी रंग के आते हैं। गुण और प्रयोग—इसका मूल पाषाणभेदक के समान अर्श, मूत्राशय की अश्मरी, एवं फिरंगादि रतिजन्य रोगों में व्यवहृत होता है। अथ धातकी (धाई) तस्या नामानि गुणाँश्चाह धातकी धातुपुष्पी च ताम्रपुष्पी च कुञ्जरा । सुभिक्षा बहुपुष्पी च वह्निज्वाला च सा स्मृता ॥ १८५ ॥ धातकी कटुका शीता मृदुकृत्तुवरा लघुः । तृष्णाऽतीसारपित्तास्रविषकृमिविसर्पजित् ॥ १. 'मदकृदि'ति पाठः । हरीतक्यादिवर्गः १०६ धायके नाम तथा गुण—धातकी, धातुपुष्पी, ताम्रपुष्पी, कुञ्जरा, सुभिक्षा, बहुपुष्पी और वह्निज्वाला ये सब धाय के नाम हैं। धाय-कडु तथा कषायरसयुक्त, शीतवीर्य, मृदुकारक (पाठा- न्तर मदकारक) और लघु है और यह प्यास, अतीसार, रक्तपित्त, विष, कृमि और विसर्प को दूर करती है ॥ १८६-१८७ ॥ ६३ धातकी हि०-धातकी, धवई, धाई, धाओला, धावा, धाय (धाय के फूल)। बं०-धाइफुल। मं०- धायटी, धावस । गु०-धावणी, धावडी ना फूल । क०-धांतकि । ते०-सेरिंगी, एर्रांपुड्डुं। उ०-जातिको। पं०-धा। अवध-धैती । ने०-दहिरी । ले०-Woodfordia floribunda, Salisb. (बुडफोर्डिआ फ्लोरीबंडा. सॅलिस्ब.); Syn. Woodfordia fruticosa Kurz. (बुडफोर्डिआ फ्रूटिकोसा, कुर्ज.)। Fam. Lythraceae (लिथ्रेसी)। धातकी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं देखने में आते हैं। ये पहाड़ों में ५ हजार फीट की ऊँचाई तक एवं देहरादून के जंगलों में बहुतायत से पाये जाते हैं तथा वाटिकाओं में भी रोपण किये जाते हैं। इसका क्षुप बड़ा तथा १०-१२ फीट तक ऊँचा होता है। शाखाएं-लम्बी, फैली हुई और सघन रहती हैं। नवीन शाखाओं तथा पत्तियों पर काले-काले बिन्दु होते हैं। पत्ते-समवर्ती या कुछ विषमवर्ती और कहीं-कहीं तीन-तीन पत्ते एक साथ गुच्छों में दिखाई पड़ते हैं। वे २-४ इंच लम्बे, ३/४-१ ३/४ इंच चौड़े, भालाकार या लट्वाकार-भालाकार, नोकदार तथा सरलधार होते हैं। पुष्प-१/२ से ३/४ इंच, चमकीले लालरंग के नलिकाकार फूल आते हैं। यह शाखाओं के संपूर्ण काण्ड से छोटे-छोटे गुच्छों में निकले रहते हैं। बीजकोष—छोटा और बीज—चिकने भूरे रंग के होते हैं। औषधि के लिये इसके फूलों का व्यवहार किया जाता है तथा इससे रेशम रंगने के लिये एक लाल रंग निकाला जाता है। रासायनिक संगठन —इसके फूलों में २०३/४% टैनिन् होता है तथा इसके क्षुप से एक प्रकार का गोंद भी निकलता है जो रंगने के काम आता है। गुण और प्रयोग—इसके फूल संग्राहक, उत्तेजक, विषहर, रक्तस्राव रोकने वाले एवं व्रणशोधक तथा व्रणरोपक होते हैं। इनका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, ज्वरातिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर, अर्श, यकृत् विकार, सर्पविष तथा व्रण में किया जाता है। गर्भिणी में उत्तेजक औषध के रूप में बिना किसी हानि के इसका प्रयोग किया जा सकता है। अतिसार आदि में इसके साथ अन्य औषधियाँ भी दी जाती हैं। आसवों में सन्धान क्रिया ठीक होने एवं उसका रंग सुन्दर बनाने के लिये इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। (१) अतिसार एवं प्रवाहिका आदि में मट्ठे या मधु के साथ इसका पुष्पचूर्ण दिया जाता है या धाय के फूल, बेल की गूदी, लोध्र की छाल, सुगन्धवाला एवं गजपीपल सब समान लेकर, २ तोले का क्वाथ बना कर प्रयोग करते हैं। बच्चों के अतिसार में भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। (२) मधु के साथ इसका चूर्ण या अवलेह रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं अर्श आदि में लाभदायक है। श्वेतप्रदर में १ तोला पुष्प चावल के धोवन के साथ दिया जाता है। (३) कोंकण की तरफ 'मण्यारी' नामक सर्पविष के लिये यह रामबाण औषध मानी जाती है। इसके लिये धाय के पत्तों का स्वरस पिलाते हैं, नाक में डालते हैं एवं शरीर पर उसे मलते हैं।

(४) पैत्तिक शिरःशूल में इसके पत्तों का स्वरस सिर पर लगाया जाता है तथा उसके साथ-साथ मुख में तैल का कवलग्रह किया जाता है । (५) पानीदार विस्फोटों एवं दुर्गन्धयुक्त व्रणों में स्राव को कम करने के लिये तथा व्रण पूरण के लिये इसके पुष्पचूर्ण का उपयोग किया जाता है तथा इसके क्वाथ से व्रण प्रक्षालन भी करते हैं। (६) आसवारिष्टों में शीघ्र किण्वोत्पत्ति के लिए धाय के फूलों का व्यवहार किया जाता है। इससे सन्धान भली प्रकार हो जाता है । मात्रा - पुष्पचूर्ण १-२ माशा ।

अथ मञ्जिष्ठा ( मंजीठ ) तस्या नामानि गुणाँश्चाह मञ्जिष्ठा विकसा जिङ्गी समङ्गा कालमेषिका ॥ १८८ ॥ मण्डूकपर्णी भण्डीरी भण्डी योजनवल्ल्यपि । रसायनेयरुणा काला रक्ताङ्गी रक्तयष्टिका । भण्डीतकी च गण्डीरी मञ्जूषा वस्त्ररञ्जिनी । मञ्जिष्ठा मधुरा तिक्ता कषाया स्वरवर्णकृत् । गुरुष्णा विषश्लेष्मशोथयोन्यक्षिकर्णरुक् । रक्तातिसारकुष्ठाम्रवीसर्पव्रणमेहनुत् ॥ १९१ ॥

मंजीठ के नाम तथा गुण - मंजिष्ठा, विकसा, जिङ्गी, समङ्गा, कालमेषिका, मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, भण्डी, योजनवल्ली, रसायनी, अरुणा, काला, रक्ताङ्गी, रक्तयष्टिका, भण्डीतकी, गण्डीरी, मञ्जूषा और वस्त्ररञ्जिनी ये सब मंजीठ के नाम हैं। मंजीठ-मधुर, तिक्त तथा कषाय रस युक्त, स्वर को उत्तम करने वाली तथा वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, गुरु, तथा उष्णवीर्य होती है और विष, कफ, शोथ, योनि, नेत्र तथा कर्ण सम्बन्धी रोग, रक्तातिसार, कुष्ठ, रक्तदोष, विसर्प, व्रण और प्रमेह दूर करने वाली होती है ॥ १८८-१९१ ॥

६४ मञ्जिष्ठा ( मजीठ ) हि०-मजीठ, मंजीठ । बं०-मञ्जिष्ठा । म०-मञ्जिष्ठ । ते०-मञ्जिष्ठतीठो, ताम्रवल्ली, मण्डास्टिक । ता०-मञ्जिट्टी, मन्दित्ता । गु०-मजीठ । पं०-मजीठ । मल०-पुन्त । फा०-रोदक । अ०-फुव्वहतु, फुव्वाह, फौहुल अवागीन । अं०-Madder root ( मँडर रूट ); Indian madder ( इण्डियन् मँडर ) । ले०-Rubia cordifolia, Linn. ( रूबिया कॉर्डिफोलिया, लिन्. ) । Fam. Rubiaceae ( रूबिएसी ) । मजीठ इस देश की पहाड़ी भूमि में पश्चिमोत्तर हिमालय से पूर्व की ओर तथा दक्षिण की ओर नीलगिरी, सीलोन और मलाका एवं नेपाल में ८ हजार फीट तक उत्पन्न होती है। यह लता जाति की वनौषधि बहुत विस्तार में दूर दूर तक फैल जाती है। इसकी लम्बी जड़ भूमि के भीतर दूर तक घुस जाती है। डण्ठल-कई गज लम्बा, गावदुम, खुरदरा, जड़ की ओर कठोर । छाल-सफेदी मायल किन्तु भीतर का भाग लाल होता है। शाखा प्रशाखाओ करके सघन बेल निकटवर्ती वृक्षो पर चढ़कर फैलती है। पत्ते-प्रत्येक ग्रन्थि पर चार चार के चक्रों में, जिसमें से दो बड़े होते हैं। ये १॥ से ४ इञ्च लम्बे, लट्वाकार-ताम्बूलाकार, नोकीले, खरस्पर्श युक्त या चिकने होते हैं। पत्रनाल-२ से ४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प-नन्हें नन्हें श्वेतवर्ण के गुच्छों में रहते हैं। फल-काले, चने के बराबर तथा दो बीजों से युक्त होते हैं। मूल-लम्बे, लम्बगोल तथा ताजी अवस्था में लाल तथा सूखने पर कुछ काले हो जाते हैं। मूल का स्वाद


प्रारम्भ में मिठास लिये हुये, लेकिन बाद में कुछ तीता और कड़वा होता है। इन्हीं मूलों का औषध में व्यवहार किया जाता है। बाजार में नेपाली, ईरानी, अफगानी तथा हिन्दुस्तानी नाम से चार प्रकार के मूल बिकते हैं जिसमें से अफगानी मूल जो सिन्ध के रास्ते से आता है वह अच्छा समझा जाता है तथा हिन्दुस्तानी कनिष्ठ मानते हैं। इनका व्यवहार रंगने के काम में भी किया जाता है। इसका पर्याय नाम जो 'समङ्गा' दिया गया है उसके विषय में विद्वानों में मतभेद है। इसकी कभी कभी चिरायते में मिलावट रहती है। रासायनिक संगठन- इसके मूल में राल, गोंद, शर्करा, चूने के योग एवं रंजक पदार्थ पाये जाते हैं। रंजक द्रव्यों में रक्त रविदास परपूरिन् ( Purpurin, पीत ग्लूकोसाइड मंजिस्टिन एवं गैरैन्सिन् ( Manjistin & Garancin ), नारंगरक्त अॅलिझॅरिन् ( Alizarin ) एवं पीत क्झैंथाइन् ( Xanthine ) आदि पाये जाते हैं। गुण तथा प्रयोग- यह रक्तशोधक, ग्राही, पौष्टिक, गर्भाशय संकोचक, शोथघ्न, त्वग्दोषहर, वेदनास्थापक, मूत्रल एवं व्रणरोपक है। अल्पमात्रा में देने से इससे मस्तिष्क एवं वातनाड़ियों पर शामक प्रभाव पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में देने से कुछ भ्रम उत्पन्न होता है। इससे मूत्र एवं दुग्ध का रंग लाल हो जाता है। इसका क्वाथ अक्षवात, कामला, मूत्रावरोध, अश्मरी, आर्तववि- कार, अनार्त्तव, शोथ, रक्तातिसार, प्रमेह, छाती के शोथयुक्त विकार एवं चर्मरोग आदि में दिया जाता है। ( १ ) मंजिष्ठादि क्वाथ का उपयोग चर्मरोगों में बहुत लाभदायक है। इसके प्रयोग से त्वचा की रक्ताभिसरण क्रिया बढ़ कर उसकी विनिमय क्रिया में परिवर्तन होता है। इससे वातरक्त, दाद, खुजली, श्वित्र एवं व्यंग आदि में बहुत लाभ होता है । ( २ ) यह गर्भाशय संकोचक होने से प्रसव में बाद गर्भाशय शुद्धि के लिये इसके साथ ईश्वर मूल, पिपरामूल आदि अन्य औषधियों का प्रयोग किया जाता है। इससे गर्भाशय संकोच होकर स्राव की वृद्धि होती है तथा पीड़ा कम होती है। ( ३ ) अश्मरी में शस्त्रकर्म करने के पूर्व एक बार इसका प्रयोग करके देखना चाहिये। इसके चूर्ण को १ माशे की मात्रा में दिन मे ३ बार देना चाहिये। इससे सभी प्रकार की पथरी गलकर निकल जाती है। यदि इससे लाभ न हुआ तो फिर शस्त्रकर्म किया जा सकता है। ( ४ ) यह फकरोग ( Rickets ) राजयक्ष्मा, आंत्रिकशैथिल्य एवं दुर्गन्ध युक्त जीर्ण अतिसार आदि में भी लाभदायक है। राजयक्ष्मज अतिसार एवं आंत्रिक व्रणों में इसके उपयोग से वेदना की शांति होती है। फुफ्फुसावरणशोथ ( प्ल्युरिसी-Pleurisy ) आदि छाती के विकारों में भी इससे लाभ होता है। ( ५ ) मंजिष्ठामेह में चन्दन के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। ( ६ ) मधु के साथ इसकी घिस कर लगाने से व्यङ्ग, दाद एवं श्वित्र आदि जीर्ण चर्मरोगों में बहुत लाभ होता है। लोध्र एवं चन्दन के साथ पीस कर इसे लगाने से विसर्प में लाभ होता है। ( ७ ) मजीठ, अर्जुन, मुलेठी एवं सुगन्धवाला इनका क्वाथ अस्थिभग्न में पिलाया जाता है तथा उसी का लेप भी करते हैं। केवल मजीठ एवं मुलेठी को काञ्जी में पीस कर लगाने से भी शोथ कम होकर पीड़ा कम होती है।

११२ भावप्रकाशनिघण्टुः (८) अग्निदग्ध व्रण पर मजीठ, रक्तचन्दन तथा मूर्वा से सिद्ध घृत का उपयोग किया जाता है। इससे पीड़ा का शमन होकर व्रण दूर होता है। (९) इसके फल का प्रयोग यकृत् के कारण उत्पन्न अवरोध में किया जाता है। मात्रा-मूल चूर्ण १ से ३ माशा दिन में तीन बार। अथ कुसुम्भम्, तस्य नामानि गुणाँश्चाह स्यात्कुसुम्भं वह्निशिखं वस्त्ररञ्जकमित्यपि । कुसुम्भं वातलं कृच्छ्ररक्तपित्तकफापहम् ॥१९२॥ कुसुम के नाम तथा गुण-कुसुम्भ, वह्निशिख और वस्त्ररञ्जक ये नाम कुसुम के हैं। कुसुम- वातकारक तथा मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त और कफ का नाश करने वाला होता है ॥ १९२ ॥ ६५ कुसुम्भ हि०-कुसुम, कसुम्भ, बर्रे । बं०-कुसुम फूल । म०-करडई । गु०-कसुम्बो । क०-कसुम्बे । ते०-उत्तुक, लक्क, बंगारसु, बंगारम, अग्निशिखा, कुसुम्बा वित्तुलु । पं०-कूसम, कर्तुम, कुसुंभ, करर । उ० प्र०-बर्रे, कर्रे । फा०-खस्कदाने, गुलेमश्कर । अ०-अखरिज, जरतम । अं०-Safflower ( सॅफ्फ्लावर ); Parrot seed (पॅरट् सीड); Bastard saffron (बॅस्टर्ड सॅफ्रॉन् ) । ले०- Carthamus tinctorius, Linn. (कार्थेमस् टिंक्टोरियस्, लिन. )। Fam, Compositae (कॉम्पोज़िटी ) । इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसका क्षुप १-३ फीट ऊँचा होता है। पत्ते-लम्बे, किनारों पर कटे हुए, नुकीले और काँटेदार होते हैं। पुष्प-केसरिया लाल रंग के पुष्प गोल गुच्छों में आते हैं। फल-चतुष्कोणीय चर्मल फल आते हैं। बीज-सफेद, चिकने तथा शंख की आकृति के समान होते हैं। कृषिजन्य इसके अनेक प्रभेद पाये जाते हैं तथापि इनका वर्गीकरण दो वर्गों में किया जा सकता है। एक में काँटे होते हैं और दूसरे में काँटे नहीं होते। काँटे वाले की अपेक्षा बिना काँटे वाले के फूलों से बहुत उत्तम रंग निकलता है। काँटेवाले पौधे तैल की दृष्टि से अच्छे समझे जाते हैं। इसके पुष्पों के किञ्जल्क केसर के समान दिखलाई देते हैं तथा केसर में इनकी मिलावट की जाती है। असली केसर के तन्तु सुगन्धित तथा एक रङ्ग के होते हैं किन्तु कुसुम के किंजल्क तन्तु गन्धरहित तथा श्वेत धब्बों से युक्त होते हैं। इसके बीज, पंचांग, तैल, पुष्प एवं मूल का व्यवहार चिकित्सा में किया जाता है। रासायनिक संगठन - इसके पुष्पों में जल में अविलेय कार्थामिन् ( Carthamin ) नामक एक लाल रंग एवं जल में विलेय अन्य पीत रंग पाये जाते हैं। इसके बीजों में २०-३०% तक एक स्थिर तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग - इसके बीज विरेचक, मूत्रल तथा बल्य होते हैं। इसका पुष्प विरेचक, स्वेदजनन, बल्य एवं आर्तव वृद्धिकर होता है। तैल विरेचक, एवं व्रणरोपक है। इसका मूल मूत्रल तथा पंचांग उष्ण होता है। (१) इसके कोमल पत्तों का शाक प्रतिश्याय में खाया जाता है। इसके पत्तों में रेनेत् (Rennet) की तरह दूध जमाने की शक्ति होती है। हरीतक्यादिवर्गः ११३ (२) इसके शुष्क पुष्पों को ४ माशे की मात्रा में कामला में देते हैं। इसका फांट स्वेदल होता है तथा प्रतिश्याय, कष्टार्तव एवं मांसपेशीय आमवात (Muscular rheumatism- मस्क्यूलर ह्यूमैटिज्म ) में दिया जाता है तथा इसका हिम रोमान्तिका आदि विस्फोटक ज्वरों में (Eruptive fevers-एरप्टिव फीवरस् ) में विस्फोट बाहर निकालने के लिये प्रयुक्त करते हैं। (३) इसके बीजों से प्राप्त तैल खाने के काम आता है। बाजारू मीठे तेल में तथा घी में इसकी मिलावट करते हैं। इससे पाखाना साफ होता है। प्रमेह में इसके तैल को खाने से लाभ होता है। खुजली में इसको ५, ६ बार लगाने से बहुत लाभ होता है। आमवात एवं सन्थिशोध में इसकी मालिश की जाती है तथा व्रणों पर इसको लगाते हैं। सुगन्धि के काम के लिए विदेशों में इसका निर्यात किया जाता है। कुछ लोगों ने इसके पंचांग से सिद्ध तिलतैल का व्यवहार सन्थिशोध, आमवात, अङ्घात, खुजली एवं पुराने घाव आदि में लगाने के लिये लिखा है। कुसुम बीजतैल का प्रयोग भी इसके स्थान पर किया जा सकता है। इसकी खली टिकाऊ होती है तथा जानवरों के खाने के काम में एवं ऊख आदि के लिये खाद के रूप में काम में लो जाती है। साबुन एवं तैलीय रंगों में भी खली का उपयोग होता है। (४) इसके बीज द्राक्षारस के साथ अश्मरी एवं मूत्रकृच्छ्र में लाभदायक हैं। इसके बीजों की मांड मृदुविरेचक होती है एवं उदरशूल तथा आमवात में दी जाती है। प्रसूता में गर्भाशय की पीडा हो तो इसकी पुल्टिस बनाकर पेडू पर बांधा जाता है। मात्रा-शुष्क पुष्प चूर्ण २-४ माशा । बीज २-४ माशा । अथ लाक्षा (लाही) तस्या नामानि गुणाँश्चाह लाक्षा पलंकषाऽल्क्तो यावो वृक्षामयो जतुः । लाक्षा वर्ण्या हिमा बल्या स्निग्धा च तुवरालघुः ॥ ( ब्राह्मय्यङ्गारवल्ली' च खरशाखा च हञ्जिका )। अनुष्णा कफपित्तास्रहिक्काकासज्वरप्रणुत् । व्रणोरःक्षतवीसर्पकृमिकुष्ठगदापहा । अलक्तको गुणैस्तद्वद्विशेषाद्व्यङ्गनाशनः ॥ १९५ ॥ लाख के नाम तथा गुण-लाक्षा, पलङ्कषा, अलक्त, याव, वृक्षामय, और जतु ये सब लाख के पर्यायवाची शब्द हैं। किसी किसी पुस्तकों में ब्राह्मणी, अङ्गारवल्ली, खरशाखा और हञ्जिका ये अधिक पर्याय मिलते हैं। लाख-शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली, शीतल, बलकारक, स्निग्ध, कषायरसयुक्त, लघु और अनुष्ण (थोड़ी गरम) होता है तथा यह कफ, रक्तपित्त (पित्त, रक्त) हिचकी, कास, ज्वर, व्रण, उरःक्षत, विसर्प, कृमि और कुष्ठरोग को दूर करने वाली होती है। लाख से उत्पन्न हुये अलक्तक (महावर) में भी उपरोक्त लाख के सभी गुण होते हैं किन्तु विशेषतः यह व्यङ्गरोग (झांई) की नाशक होता है ॥ १९३-१९५ ॥ ६६ लाख हि०-लाख, लाही, लाह । बं०-गाला, लाहा । प०, मा०, गु०, म०-लाख । क०-अरगु । ते०-लवका, लक्का, लाका । ता०-अरकु । फा०-लाक । अ०-लुक, लुक मकतूल । अं०-Lac (लॅक) या Shell lac (शेल लॅक ) । ले०-कीटनाम-Laccifer lacca (Kerr ) (लॅसिफेर लॅक्का) । Fam, Lacciferidae ( लसिफेरिडी ) । 8 १. कोष्ठस्थः पाठः काञ्चिकः । ८ भा० नि०

११४ भावप्रकाशनिघण्टुः

लाख-पुराने वृक्षों की डालियों पर एक प्रकार के बारीक कीड़ों द्वारा स्वरक्षणार्थ निर्मित रक्ताभ या गाढ़े भूरे रंग का रालदार पदार्थ है। बेर, पाकड़, पीपल आदि वृक्षों पर ये कीड़े इसे बनाते हैं। इनमें पीपल वृक्ष की लाक्षी सर्वोत्तम समझी जाती है। वैशाख और आश्विन दो महीने में व्यापारी लोग वृक्षों से छुड़ाकर सुखाते हैं। इसको साफकर कपड़े की लम्बी थैलियों में भरकर गरम करते हैं जिससे लाख गलकर टपकती है। चपड़ा बनाने के लिये गरम करने के पूर्व इसमें हरताल का घोल मिलाते हैं तथा बाद में उसे खींच खींचकर पतला बनाते हैं। लाख को औटाकर लाल रङ्ग तैयार करते हैं और उसे सेमल की रूई में तरकर महावर बनाते हैं। लाख के रङ्ग की बनी हुई रोशनाई बहुत पक्की होती है। औषध की अपेक्षा लाख का अन्य कार्यों में बहुत उपयोग होता है तथा यह निर्यात व्यापार की एक प्रमुख वस्तु है। विदेशों में उत्पन्न न होने से यहाँ से इसका काफी निर्यात किया जाता है। इससे निर्मित रङ्ग का अब बहुत कम उपयोग होता है। उत्तरप्रदेश में मिरजापुर में इसके कारखाने हैं। गुण और प्रयोग- लाख शीतल, रक्तपित्तघ्न, ज्वरनाशक, दाहशामक, बल्य एवं वर्ण्य है। इसका उपयोग रक्तप्रदर, उरःक्षत रक्तपित्त, उरःक्षत, ज्वर, दाह, रक्तविकार एवं कास आदि में किया जाता है। (१) रक्तप्रदर एवं उरःक्षत आदि में इसे दूध में उबालकर या घी में पकाकर फिर चूर्ण करके उसमें दूध मिलाकर पिलाते हैं। इसके चूर्ण को मधु तथा दूध के साथ भी दिया जा सकता है। साफ घोलकर बुकनी की हुई पीपल की कच्ची लाह १ माशा एवं घृत में भूना हुआ शुद्ध गैरिक ४ रत्ती दूध के साथ उध्वंग रक्तपित्त में देने से बहुत लाभ होता है। (२) इससे सिद्ध लाक्षादि, अङ्गारकादि एवं चन्दनबलालाक्षादि आदि तैलों का उपयोग जीर्णज्वर, राजयक्ष्मा एवं दाह आदि में अभ्यङ्ग के लिये किया जाता है। (३) कृमिदन्त तथा व्रणों पर इसको लगाया जाता है। मात्रा-१-३ माशा।

अथ हरिद्रा तस्या नामानि गुणांश्च हरिद्रा काञ्चनी पीता निशाऽऽख्या वरवर्णिनी। कृमिघ्नी हळदी योषित्प्रिया हट्टविलासिनी¹। हरिद्रा कटुका तिक्ता रूक्षोष्णा कफपित्तनुत्। वर्ण्या त्वग्दोषमेहास्त्रशोथपाण्डुव्रणापहा॥ हलदी के नाम तथा गुण-हरिद्रा, काञ्चनी, पीता, निशाऽऽख्या (रात्रीवाची सभी शब्द), वरवर्णिनी, कृमिघ्नी, हल्दी, योषित्प्रिया और हट्टविलासिनी ये नाम हल्दी के हैं। हलदी-कटु तथा तिक्तरस युक्त, रूक्ष, उष्णवीर्य, कफ पित्त नाशक, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली एवम् चर्मदोष, प्रमेह, रक्तविकार, शोथ, पाण्डु तथा व्रण को दूर करने वाली होती है॥ १९६-१९७॥ ६७ हलदी हि०-हलदी, हरदी, हर्दी, हल्दी । वं०-हलुद । म०-हळद । गु०-हलदर । क०-अरसिन, अरिसिन । ते०-पसुपु । पं०-हलडी, हलदर, हलंज । ता०-मंजल । मला०-मन्जल । फा०-जर्द चोब । अ०-उरकुस्सफ । अं०-Turmeric ( टमेरिक ) । लै०-Curcuma longa, Linn. (कर्युमा लोंगा, लिन.) । Fam. Zingiberaceae ( झिंजिबरेसी ) ।

१. 'हरविलासिनी'ति पाठ।०


हरीतक्यादिवर्गः ११५

हल्दी-एक बहुत प्रसिद्ध प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली वस्तु प्रायः सब प्रान्तों के खेत में रोपण की जाती है लेकिन बंबई, मद्रास तथा बंगाल में इसकी विशेष रूप से उपज की जाती है। चीन एवं जावा आदि देशों में भी इसकी उपज होती है। इसका क्षुप-२-३ फीट ऊंचा होता है। पत्ते-केले के नवीन पौधे से निकले हुए पत्ते के समान १-१॥ फुट लम्बे तथा ६-७ इञ्च चौड़े उतने ही लम्बे पर्णवृन्त से युक्त, आयताकार-भालाकार एवं पर्णतल की तरफ कुछ नुकीले होते हैं। पत्तों में आम के समान गन्ध आती है। फूल-अवृन्त काण्डज क्रम में निकले हुवे, पीतवर्ण के, संख्या में अल्प तथा करीब १\frac{१}{३} इञ्च लंबे; पुष्पद्ण्ड-६ इञ्च या अधिक लम्बा तथा पत्रनाल द्वारा आवृत्त; पुष्पद्ण्ड की पत्तियां हल्के हरे रंग की होती हैं। इसकी जड़ के नीचे अदरक के समान अदरक से बड़े-बड़े कन्द होते हैं। यह सर्वाङ्ग पीला होता है। इसी कन्द को हल्दी कहते हैं। ये कन्द विभिन्न आकार के, मूल एवं पर्णवृन्तों के चिन्हों से युक्त होते हैं। अन्दर का भाग पीला या नारंगपीत । भग्न-शृङ्गवत् । गन्ध-मधुर । स्वाद-कड़वा । चूसने पर लालास्राव का वर्ण भी पीत हो जाता है। रंगने के काम में बिना उबाली हल्दी का व्यवहार किया जाता है और खाने के काम में हल्दी को उबाल कर सुखाकर प्रयुक्त करते हैं। उबालने से उष्णवीर्य हल्दी की तीव्रता कम हो जाती है। प्रमेह आदि कफ प्रधान व्यक्तियों में कच्ची हल्दी का रस सहपान या अनुपान के रूप में प्रयुक्त करते हैं। हल्दी को एक विशेष विधि से तयार कर बाजार में बेची जाती है। पहले कन्दों को अलग करके साफ करते हैं। फिर मुलायम होने तक जल में उबालते हैं। स्थान भेद के अनुसार ३० मिनट से ६ घंटे तक उबाला जाता है। उबालते समय इसी के कुछ पत्तों को भी जल में डालते हैं। थोड़ा गोबर मिलाने से इसका रंग अच्छा हो जाता है। फिर इन्हें खुली हवा में फैलाकर बार-बार पलट कर धीरे-धीरे सुखाते हैं। सूखने पर रगड़कर साफ करके उपयोग में लाते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें करक्यूमिन् (Curcumin, C₂₁H₂₀O₆) नामक एक पीला एवं रवेदार रंजक पदार्थ होता है जो मद्यसार में पूर्णतया घुल जाता है जिससे गहरे पीले रंग का घोल बनता है। इस घोल में क्षार मिलाने से घोल रक्ताभ बादामी वर्ण का हो जाता है। इसके अतिरिक्त हल्दी में ५-६% उडनशील तैल होता है जिसमें कर्पूरवद् गन्ध आती है तथा इस तैल में करक्यूमेन (Curcumen) नामक एक टरपेन (Terpene) होता है जो स्नेहद्रव्य कोलेस्टेरॉल (Cholesterol) को घुलाने के लिए बहुत अच्छा द्रव्य है। हल्दी में उपर्युक्त पदार्थों के अतिरिक्त स्टार्च (Starch) २४%, तथा अलव्युमिनाइड्स् (Albuminoids) ३०% होते हैं। गुण और प्रयोग-हलदी उष्ण, उत्तेजक, सुगन्धि, रक्तशोधक, त्वग्दोषहर, शोथहर, दीपन, ग्राही, कफघ्न, वातहर, विषघ्न एवं व्रण के लिए लाभदायक है। मसाले के रूप में इसका नित्य व्यवहार होते हुए भी यह एक बहुत अच्छी औषध है। इसका उपयोग प्रतिश्याय, कफविकार, चर्मरोग, रक्तविकार, प्रमेह, कामला, यकृत् विकार, पाण्डयिक ज्वर, अतिसार, संग्रहणी, व्रण एवं नेत्राभिष्यन्द में किया जाता है। (१) प्रतिश्याय, खांसी, प्रमेह, प्रदर एवं नेत्राभिष्यन्द आदि रोगों में जिनमें श्लेष्मा का अत्यधिक स्राव होता है, इसको दूध में उबालकर गुड़ मिलाकर पिलाते हैं। प्रतिश्याय की प्रारंभिक अवस्था में रात के समय इसके धूएं को नाक से सुंघाते हैं तथा उसके बाद कुछ देर तक जल नहीं पीने देते। इससे बहुत जल्दी लाभ होता है। खांसी में इसको भूनकर १-२ माशा मधु अथवा घृत के साथ चटाने से लाभ होता है।

११६ भावप्रकाशनिघण्टुः

(२) आंवले का रस, हल्दी तथा मधु इसके प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेहों में अच्छा लाभ होता है। प्रदर में इसके साथ गुग्गुलु या रसांजन का प्रयोग करते हैं। (३) खुजली, पामा, दाद, शीतपित्त, उदर्द, फोड़े एवं विचर्चिका आदि रक्तविकार एवं चर्म- रोगों में यह बहुत लाभदायक है। इसके लिए हल्दी का चूर्ण गोमूत्र के साथ खिलाया जाता है एवं मक्खन के साथ स्थानीय लेप भी करते हैं। इसके विशेष योग हरिद्राखंड का १ तो० की मात्रा में नित्य कुछ समय तक लेने से उपर्युक्त विकारों में पर्याप्त लाभ होता है। (४) चूना या सज्जी खार हल्दी के साथ मिलाकर मोच, ऐंठन, चोट, पिच्चित व्रण एवं पुराने घावों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ हल्दी तथा मिश्री को खिलाते भी हैं। बिच्छू एवं सर्प आदि के काटने पर वेदना शान्ति के लिए इसका धूआं देते हैं। हल्दी एवं फिटकिरी (१ में २०) के सूक्ष्म चूर्ण का कर्णस्राव में कान में प्रधमन करते हैं। (५) सभी प्रकार के नेत्राभिष्यन्द के लिए यह बहुत लाभदायक है। एक भाग हल्दी २० भाग जल में उबाल कर छानकर उसे आंख में बार-बार डालते हैं जिससे आंख की वेदना कम होती है तथा कीचड़ आना भी कम होता है। इसके क्वाथ से रंगे हुए कपड़े का व्यवहार नेत्राच्छा- दन के लिए किया जाता है। (६) श्लीपद में इसको गुड़ एवं गोमूत्र के साथ प्रयोग कराया जाता है। (७) शिरःशूल एवं जोंक के काटने पर रक्तप्रवाह को रोकने के लिए इसका लेप लाभदायक है। चक्कर आता हो तो ताजी हल्दी का सिरपर लेप करने से लाभ होता है। घृतकुमारी के गूदे में इसको घिसकर शोथयुक्त अर्श पर लगाते हैं। (८) भूतोन्माद एवं योषापस्मार आदि में इसका धूआं दिया जाता है। (९) हल्दी के ताजे पत्तों का उपयोग मछली भूनने में एवं घृत की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए उपयोग में लाते हैं। ताजी हल्दी का अचार भी बनाया जाता है। मात्रा—चूर्ण २-४ माशा।

अथ कर्पूरहरिद्राया नामानि गुणांश्चाह दार्वीभेदा१ऽऽम्रगन्धा च सुरभीदारुदारु च। कर्पूरा पद्मपत्रा स्यात्सुरभीम२ सुरतारका ॥ आम्रगन्धिर्हरिद्रा या सा शीता वातला मता। पित्तहन्मधुरा तिक्ता सर्वकण्डूविनाशिनी ॥ कपूरहल्दी या आमाहल्दी के नाम तथा गुण—दार्वीभेदा (यह दारुहल्दी के भेद में है अतः दार्वीभेदा भी नाम है), आम्रगन्धा (आम के फल के समान गन्ध होने से आम्रगन्धा भी कहते हैं), सुरभीदारु, दारु, कर्पूरा, पद्मपत्रा सुरीमत और सुरतारका (पाठान्तर में सुरभी और सुरनायिका) ये सब आमाहल्दी के पर्यायवाचक शब्द हैं। जो हल्दी आम के फल के समान गन्ध वाली होती है वह शीतल, वातकारक, पित्त को दूर करने वाली, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त एवं सब प्रकार की खुजली का नाश करनेवाली होती है ॥ १९८-१९९ ॥

६८-आमाहल्दी हिं०-अमिया हल्दी, आमाहल (र) द, आमाहलदी। बं०-आम आदा। म०-अम्बे हलद, अम्बा हलद। गु०-आम्बा हलदर। क०-हुली आरसीन। ते०-कारपुपुपु। ता०-पशु मंजल। १. 'दार्वीभेदे'ति पाठान्तरमसङ्गतम् । २. 'सुरभी सुरनायिके'ति पाठः ।


हरीतक्यादिवर्गः ११७ मा०-आंवा हलदी। पं०-अंबिया हलदी। फा०-दारचोबद् । अ०-दारहल्द । अं०-Mango ginger (मँगो जिंजर)। ले०-Curcuma amada Roxb. (कर्क्युमा अमाडा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेसी)। आमाहल्दी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं पाये जाते हैं। बंगाल और कोंकण में इसकी खेती की जाती है। इसका डंठल मोटा होता है। कन्द-हल्दी की गाँठों से बड़े बड़े, आर्द्रक के समान, हल्के पीले रंग के एवं आम्र की तरह गन्धयुक्त होते हैं। क्षुप-२-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-१-१॥ फुट लम्बे, ५-१ इञ्च चौड़े, आयताकार दीर्घवृत्ताकार और नुकीले होते हैं। फूल-फीके पीले रंग के आते हैं। गाँठों को छोटे छोटे टुकड़े कर सुखा लेते हैं। डा० देसाई लिखते हैं कि बम्बई में आमाहल्दी नाम से जो गाँठें बिकती हैं वे वनहरिद्रा की होती हैं। कुछ विद्वानों ने आमाहल्दी का ले० नाम वनहरिद्रा वाला लिखा है। आमाहल्दी का बंगाल में अधिक प्रयोग होता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल, राल, शर्करा, गोंद, स्टार्च, ॲल्ब्यूमि- नॉइड्स, ऑर्गेनिक अम्ल तथा राख आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं। गुण और प्रयोग—यह वातानुलोमक, शीतल, सुगन्धि, दीपन, पाचन एवं ग्राही है। इसके गुण आर्द्रक के समान दीपन एवं वातानुलोमक हैं लेकिन आर्द्रक उष्ण है और यह शीतल है। इसका उपयोग हल्दी के स्थान पर किया जाता है। सुगन्धित होने के कारण इसे चटनी आदि में उपयोग में लाते हैं। मिठाइयों में आम की गन्ध लाने के लिये इसके फांट का व्यवहार करते हैं। चोट एवं खुजली आदि में इसका लेप किया जाता है। लताकरञ्ज के पत्र रस के साथ कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—चूर्ण २-४ माशा । =

अथ वनहरिद्राया नामगुणानाह अरण्यहल्दीकन्दः कुष्ठवातास्रनाशनः ॥ २०० ॥ वनहरदी के गुण—वनहलदी का कन्द-कुष्ठ तथा वातरक्त का नाशक होता है ॥ २०० ॥ ६९ वनहलदी हिं०-वनहरदी, वनहलदी, जंगली हल्दी। बं०-वनहलुद, वनहलद। म०-वेडीहलद, रान- हलद। क०-काडरसन। ते०-अडवि पसुपु, कस्तुरि पसुपु,। ता०-कस्तुरि मंजल। गु०-वनह- लदर, कपूरकाचली। पं०, मा०-जंगली हल्दी। मला०-कट्टुमञ्जल। अं०-Wild turmeric (वाइल्ड टर्मेरिक्); Yellow zedoary (यलो झिडोरी); Cochin turmeric (कोचीन टर्मेरिकू)। ले०-Curcuma aromatica Salisb. (कर्क्युमा ॲरोमॅटिका)। Fam. Zingi- beraceae (झिंजिबरेसी)। वनहलदी—इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं पाई जाती है। विशेषकर बंगाल एवं दक्षिण के कोचीन, मैसूर, अल्वार आदि स्थानों में अधिक देखने में आती है। इसका क्षुप वर्षजीवी होता है। गरमी में इसका क्षुप सूख जाता है किन्तु भूमि के भीतर इसकी गाँठें जीवित रहती हैं और वर्षा ऋतु में वे अंकुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। पत्ते जब कोमल अवस्था के होते हैं तब उनके बीच का भाग जामुनी रंग का होता है। जब यह अंकुरित होता है

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११८ \quad भावप्रकाशनिघण्टुः \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad हरीतक्यादिवर्गः \quad ११६

\quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad ७० दारुहलदी

तभी इसमें फूल आते हैं । जड़ के नीचे काला सा पीले रंग का कन्द होता है । अच्छी खाद आदि होने से ये कन्द काफी बड़े होते हैं । साधारणतः बीच की गांठें अण्डे के समान, २ इञ्च से बड़ी, कालीसी चक्राकार कड़ों से युक्त तथा अनेक मोटी उपमूलों से युक्त होती हैं। उपमूलों के अंतिम भाग में बदाम के बराबर नारंगपीत गांठे होती हैं। बीच की गांठों के बगलवाली गांठें अंगुली सदृश मोटी होती हैं तथा उनसे थोड़े से मांसल मूल निकले रहते हैं। जंगली हरदी का अन्दर का भाग गाढ़े नारंगी रंग का; गन्ध हरदी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हल्लासकारक होता है। हरदी के स्थान में रंगने के काम में यह आती हैं। त्रावण- कोर में इससे तिखुर निकालते हैं।

रासायनिक संगठन- हरिद्रा के समान ।

गुण और प्रयोग- इसके गुण हलदी की ही तरह होते हैं। रक्तविकार एवं चर्मरोगों में अन्य औषधियों के साथ इसका व्यवहार किया जाता है। (१) सर्पविष में जंगली हलदी, कुष्ठ, अजवायन तथा मैनसिल का धूम दिया जाता है। (२) विस्फोटक ज्वरों में दानों को बाहर निकालने के लिये इसे २-४ र० खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं। (३) खुजली, चोट, सूजन एवं मोच आदि में इसका लेप अथवा इससे सिद्ध तैल का व्यवहार किया जाता है। (४) शिरःशूल में लोहबान के साथ इसे घिसकर लेप करते हैं। मात्रा- १-२ मा० ।

नोट- उपर्युक्त हरिद्राओं के अतिरिक्त बंगाल में एक कालीहलदी (नरकचूर, नीलकण्ठ ) होती है जिसे कर्क्यूमा केसिया (Curcuma caesia Roxb.) कहते हैं। इसकी गांठें काली सी धूसरित वर्ण की एवं चक्राकार कड़ों से युक्त होती हैं। अन्दर का भाग धूसर नील वर्ण का, अत्यन्त कड़ा एवं शृङ्ग के समान होता है। इनका स्वाद एवं गन्ध कर्पूर के समान होता है।

गुण और प्रयोग- इसके गुण कचूर की तरह होते हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों (Cosmetics- कॉसमैटिक्स ) में इसका उपयोग किया जाता है। इसका उबटन पसीना लाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल में इसकी ताजी गांठों का उपयोग हलदी की तरह किया जाता है।

अथ दारुहरिद्राया नामानि गुणांश्चाह

दार्वी दारुहरिद्रा च पर्जन्या पर्जनीति च । कटङ्कटेरी पीता च भवेत्सेव पचम्पचा ॥ सैव कालीयकः प्रोक्तस्तथा कालेयकोऽपि च ॥ २०१ ॥ पीतद्रुश्च हरिद्रुश्चपीतदारु' च पीतकम् । दार्वी निशागुणा किन्तु नेत्र कर्णामयरोगनुत् ॥

दारुहरदी के नाम तथा गुण-दार्वी, दारुहरिद्रा, पर्जन्या, पर्जनी, कटङ्कटेरी, पीता, पचम्पचा, कालीयक, कालेयक, पीतद्रु, हरिद्रु, पीतदारु और पीतक ये सब दारुहलदी के पर्यायवाची शब्द हैं। दारुहलदी-के गुण यद्यपि हलदी के समान ही होते हैं तथापि यह विशेषतः नेत्र, कर्ण तथा मुख- सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ २०१-२०२ ॥

________________________________________________________________ १. 'कपीतकमि'ति पाठान् चिन्त्यम् ।


हि०- दारुहलदी, दारुहरदी, दारहल्द । **बं०-**दारुहरिद्रा । **म०-**दारुहल्द, जरकि हलद । **गु०-**दारुहल्डर । **मा०-**दारुहलदी। **क०-**दोहा मरद रिसिन । **तै०-**मनिपसुपु । **ता०-**मर मञ्जल। **कुमा०-**चित्रा, कीलमोरा । **प०-**सुमलु । **ने०-**चित्रा । **फा०-**दार चोबद्द, फिलझरद् । **अ०-**दार हलक । **अं०-**Indian berberry (इण्डियन बरबेरी) । **ले०-**Berberis species (बर्बेरिस् की विभिन्न जातियां)। Fam. Berberidaceae (बर्बेरिडेसी) ।

दारुहलदी की १२-१३ जाति की कंटकित झाड़ियां अधिकतर हिमालय के पहाड़ों पर तथा आसाम में पाई जाती हैं। इनमें से चार जातियां मध्य तथा दक्षिण भारत (निल गिरी पर्वत) में पाई जाती हैं। छोटा नागपुर के पारसनाथ की पहाड़ी पर भी एक भेद पाया जाता है। इनमें से विशेषरूप से ब० अॅरिस्टेटा एवं ३, ४ अन्य पौधों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है जिनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। दारुहलदी के मूल, काष्ठ, कांड, फल (जिसे झारिष्क कहते हैं) एवं सत्व (रसौत) का व्यवहार किया जाता है। रसौत का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। झरिष्क-ये कलाई लिये लाल तथा सूखने पर काले अंगूर की तरह दिखलाई देते हैं। ये काले अंगूर से छोटे तथा अधिकांश में बीजहीन होते हैं। इनका स्वाद खट्टा या रुचिकर खटमिट्ठा होता है।

(क) Berberis aristata, DC. (बर्बेरिस् अॅरिस्टेटा, डीसी०)। **जौन०-**काशमोई । **गढ०-**किङ्गोरा । इसके क्षुप हिमालय पर्वत पर ६००० से १०५०० फीट की ऊँचाई पर एवं निलगिरी के पहाड़ों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप-बड़ा, पतनशील (Deciduous-डेसिड्युअस् ), कंटीला एवं साधारणतः ६ से १२ फीट तक ऊँचा लेकिन कभी कभी १५ फीट तक ऊँचा एवं ८ इञ्च व्यास के कांड से युक्त होता है। शाखाएँ-श्वेताभ या हल्के पीताभ धूसर वर्ण की होती हैं। पत्ते- १५-४ इञ्च लम्बे, ३-१ इञ्च चौड़े, अभिलट्वाकार, चर्मवत्, सूक्ष्म शिराओं से युक्त, सरल धार वाले या दूर दूर पर तीक्ष्ण कांटों से युक्त एवं उनका अधोपृष्ठ हल्के हरे रङ्ग का होता है। फूल-स्वर्ण-पीत पुष्प २-३ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-बीजिमांसल फल (Berry-बेरी), अण्डाकार, नीले बैगनी रङ्ग के चमकीले एवं रजावृत होते हैं। मूल-पीताभ बादामी, नलिकाकार, कुछ गांठदार, कड़े, मजबूत लेकिन लचीले, साधारणतः कटे हुये टुकड़ों के रूप में एवं थोड़े सी शाखाओं से युक्त होते हैं। छाल-अंदर से गहरे बादामी रङ्ग की, मुलायम एवं तोड़ने पर चूर्ण रूप में हो जाती है। काष्ठ-नींबू के समान पीतवर्ण का, स्पष्ट एवं संकरी मज्जक किरणों से युक्त, जिसमें मज्जक प्रायः नहीं होता और यदि हो तो चमकीले पीतवर्ण का होता है। इसके काष्ठ में ताजी अवस्था में हल्की गन्ध एवं इसका स्वाद कड़वा होता है। इसको कितना भी उबालें तो भी यह पीला ही रहता है।

(ख) B. asiatica, Roxb. ex DC. (ब० एशियाटिका, राक्सब. एक्स डीसी.) । **हि०-**किलमोरा, किंगोरा । **ने०-**माटे किस्सी, चित्रा । इसके क्षुप प्रायः २-८ हजार फीट के बीच या कभी कभी नीचे भी हिमालय की घाटियों में भूटान, गढवाल, बिहार, पारसनाथ की पहाड़ी तथा अफगानिस्तान आदि स्थानों पर पाये जाते हैं।

१२० भावप्रकाश निघण्टुः इसका क्षुप करीब ८ फीट ऊँचा होता है। शाखायें धूसर वर्ण की होती हैं। इसकी पत्तियां अण्डाकार या लटवाकार आयताकार, १-२ १/२ इन्च लम्बी एवं चर्मवत् होती हैं। पत्तियों का शिराजाल ऊपरी पृष्ठ पर घना तथा दृढ होता है। पुष्प-मंजरियों में निकलते हैं। इसके फल कृष्ण नील होते हैं। (ग) B. lycium, Royle. (ब० लाइसियम्, रायलि.)। हि०-चतरोई, काशमल, दारुहरिद्रा । इसके क्षुप ३-७ हजार फीट की ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय में गढवाल से हजारा तक एवं चकरौता तथा मसूरी के नीचे विशेषरूप में प्राप्त होते हैं। ये छोटे एवं समूहबद्ध होकर आते हैं। इसके पत्ते प्रायः पतले तथा लम्बे होते हैं एवं शिराजाल घना नहीं होता। इसके फल विशेष मांसल नहीं होते। रासायनिक संगठन - बर्बेरिस की विभिन्न उपजातियों में कम से कम आठ प्रकार के विभिन्न क्षाराम पाये गये हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- बर्बेरिन् ( Berberine), (ऑक्सिअँर्क- न्थाइन् ( Oxyacanthine ), बर्बेमाइन् (Berbamine ), पामैटाइन (Palmatine ), जंट्रोहीझाइन् (Jatrorrhizine ), कोलंबमाइन् (Columbamine ), बर्बेरूबाइन् (Berberru- bine ) एवं हाइड्रैस्टाइन् (Hydrastine) । इनमें से प्रथम तीन विशेष महत्व के हैं तथा शेष विभिन्न अन्य वनस्पतियों के विशिष्ट क्षाराम हैं। बर्बेरिन् ( Berberine, $C_{20} H_{19} NO_5$ ), शीत जल में घुलनशील, मद्यसार में कम घुलनशील, पीतवर्ण का एवं सूइयों के आकार का क्षाराम है। यह काष्ठ एवं छाल की अपेक्षा मूल में अधिक होता है। यह क्षाराम और भी कई वनस्पतियों में पाया जाता है। इसके लवण भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कषाय द्रव्य, गोंद एवं स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में मॅलिक् ( Malic), टार्ट्रिक् ( Tartric ) एवं साइट्रिक् ( Citric) अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग - दारुहल्दी के मूल एवं काष्ठ बल्य, तिक्त पौष्टिक, दीपन, पाचन, ग्राही, पित्तविरेचक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, श्लेष्मघ्न, रसायन एवं त्वक दोषहर हैं। इसका उपयोग मलेरिया आदि विषम ज्वर, कुपचन, फिरङ्ग, गण्डमाला, अपची, त्वकदोष, भगंदर, प्रदर, अत्यार्त्तव, व्रण, गर्भिणीवमन, यकृत्प्लीहावृद्धि, कामला एवं सर्पदंश आदि में किया जाता है। (१) मलेरिया तथा अन्य विषमज्वरों में इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। ज्वर के साथ हृल्लास, वमन, विरेचन, शिरःशूल एवं थकावट अधिक होती है तब इसके क्वाथ का उपयोग रसौत की अपेक्षा अच्छा होता है। ज्वर में इसके पूर्व विरेचन देना चाहिये। इससे पसीना होकर ज्वर उतर जाता है। क्विनीन की तरह हृदयावसाद एवं बाधिर्य आदि इससे नहीं होते तथा प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। ज्वर अच्छा होने के पश्चात् इसके उपयोग से भूख आदि बढ़ती हैं। यद्यपि उपर्युक्त गुणों के लिये इसका उपयोग किया जाता रहा लेकिन नवीन प्रयोगों से देखा गया कि इसके क्षाराम बर्बेरिन् सल्फेट (Berberine Sulphate ) को १५-३५ ग्रे० की मात्रा में दिन में ३ बार ३ दिन तक देने पर भी किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। मलेरिया में इससे एक लाभ अवश्य होता है कि इसके देने से प्लीहा आदि धातुओं में छिपे हुये मलेरिया के कीटाणु रक्त में आ जाते हैं जिससे रक्त परीक्षा में दिखलाई देने से निदान में आसानी होती है। क्विनीन के साथ ज्वर की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक है।


हरीतक्यादिवर्गः १२१ (२) बर्बेरिन् (Berberine ) - यह क्षाराम अत्यंत विषैला नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में देने से अवश्य विषैला है एवं मृत्यु भी हो सकती है। इसका प्रचूषण आन्त्र एवं सूचिकाभरण द्वारा हो सकता है। बिल्ली एवं कुत्तों को उनके वजन के प्रति किलोग्राम के लिये २ मिलीग्राम की मात्रा में देने से हृदय पर अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। यह क्रिया उन्हीं अंगों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव से एवं प्राणदा (Vagus = वागस) नाडी की उत्तेजना से होती है। प्राणियों में मृत्युत्तर परीक्षण द्वारा देखा गया कि इससे फुफ्फुसों में अत्यन्त रक्ताधिक्य एवं हृदय के अलिन्दों (Auricle = ऑरिक्ल) का विस्फार होकर मृत्यु होती है। इससे वृक्कों में शोथ एवं रक्तस्राव होता है तथा इससे केन्द्रीय वातनाडीसंस्थान के कन्दों की कोशाओं को नुकसान पहुँचता है। यह श्वसन के लिये भी अवसादक है लेकिन १-१० मिलीग्राम की मात्रा में यह आन्त्र, गर्भाशय एवं श्वसनिका की अनैच्छिक मांसपेशियों को उत्तेजित करता है जिससे श्वसनका में संकोच उत्पन्न होता है। साधारण मात्रा में हृदय पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे हृदय की पोषक रक्त- वाहिनियों में रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में देने पर यह अवसादक है। इससे श्वेतकणों की वृद्धि होती है। मलेरिया में निदान की दृष्टि से प्रोद्दीपक रूप में (Provoca- tive dose-प्रोहोकेटिह डोज) इसका उपयोग लाभदायक है जिससे छिपे हुये कीटाणु रक्त में आजाते हैं तथा रक्तपरीक्षण में दिखलाई देने लगते हैं। यह चर्म के नीचे की धातुओं ए श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्पृञ्जनकारक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है। क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरेस (प्रोटोप्लाज्म - Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लीशमॅनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संवर्धन की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियन्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है। बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट ५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है। साधारणतः ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्गों की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं। यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक, (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये। चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये। इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है। (३) दारुहल्दी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हृल्लास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है। बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आंवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं। गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है। कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal-बॅक्टेरिसाइडल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है। (४) दारुहल्दी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबाल कर बेचते हैं। झाडकी

को भी इसके स्थान पर देते हैं।

१२२ भावप्रकाशनिघण्टुः हल्दी (Coscinium fenestratum (Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रैटम्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर ३-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रैन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ॥ रसाञ्जनं ताक्ष्यंशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ॥२०४॥ उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ॥ २०५ ॥ दारूहल्दी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारूहल्दी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डाल कर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्थ्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट काट कर अलग करने वाला ), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है ॥ २०३-२०५ ॥ ७१ रसौत हि०-रसोत, रसौत, रसवत । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०- रसांजन । ते०-रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजह्र । अ०-हुलुज़ोर्हिदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रेक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रेक्टम् बर्बेरिस्) रसोत-कालापन लिये भूरे रङ्ग की, गोंद के समान मुलायम तथा पानी और मदिरा में घुलने वाली दारूहल्दी के क्वाथ और बकरी के दूध से बनी हुई औषधि है। इसका स्वाद कड़वा तथा कसैला होता है। इसको बनाने के लिये वर्षा के आखिर में इसके क्षुप को काट कर उसके पंचांग का क्वाथ बना कर बाद में उसे गाढ़ा बनाते हैं। कुछ लोग क्वाथ में बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाकर फिर गाढ़ा करते हैं। इस बात में मतभेद है कि रसोत केवल ब० लाइसियम् के मूल एवं काष्ठ से बनता है या ब० एशियाटिका से या दोनों से । बाजार में बिकने वाला रसौत प्रायः दोनों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी, मिट्टी आदि पदार्थ मिले रहते हैं। इसलिये इसे १० गुने गरम जल में मिलाकर छान कर सुखाते हैं एवं बचे हुये भाग में मद्यसार मिलाकर छानकर उस मद्यसार को ऊर्ध्वपातन यन्त्र द्वारा अलग कर गाढ़े भाग को उपर्युक्त जल से सुखाये गाढ़े भाग में मिलाकर बन्द शीशी में रखकर काम में लाते हैं । गुण और प्रयोग-यह कड़वा पौष्टिक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, अर्शोन, शोधन, रक्तशोधक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक एवं नेत्रविकारहर है। इसका आन्तरिक उपयोग ज्वर, यकृत् प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श, एवं आमाशय तथा पक्वाशय के व्रण (Gastric & duodenal ulcer-गैस्ट्रिक् अँड डयुओडेनल अल्सर ) में लाभदायक है। इसका बाह्य प्रयोग अर्श, प्राच्यव्रण, कटे हुये भाग, फोड़े फुन्सियां एवं पुराने व्रण आदि में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः /१२३ ( १ ) विषमज्वर के सभी प्रकारों में इसको १५-२० दिन में ३ बार जल के साथ देते हैं। क्वाथ की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा होता है। इससे ज्वर का शमन होकर प्लीहा वृद्धि भी कम होती है। इसके प्रयोग में पहले विरेचन देना चाहिये तथा इसकी पूर्ण मात्रा खाली पेट पर देनी चाहिये। औषधि लेने के पश्चात् रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर सुलाना चाहिये । थोड़ी देर में रोगी को प्यास मालूम पड़ती है तथा जी घबड़ाने लगता है लेकिन उसको जल पीने न दें। एक घण्टे में पसीना निकलने लगता है तथा कमजोरी मालूम होती है। उसके बाद शरीर पोंछ कर लाजमण्ड या चावल का मांड और दूध पीने को दें। इसके बाद रोगी प्रायः सो जाता है तथा उस दिन ज्वर की पारी नहीं आती। इस प्रयोग में एक दोष यह है कि रोगी को कभी पहले रक्तातिसार हुआ हो तो वह फिर उमड़ जाता है। ( २ ) नये एवं पुराने नेत्राभिष्यन्द में इसको पलकों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ इसमें अफीम, सैन्धव एवं फिटकिरी मिलाई जा सकती है । ( ३ ) रक्तार्श में इसको २ से ८ १० मक्खन के साथ खिलाया जाता है एवं इसके घोल ( ३२ में १ ) से अर्श को धोते हैं । ( ४ ) कपूर एवं मक्खन के साथ बना इसका मलहम फोड़े, फुन्सियां, कटे हुये भाग एवं पुराने घावों पर लाभदायक है। मधु के साथ मिलाकर मुख के अन्दर के व्रणों पर एवं अन्य व्रणों पर लगाते हैं। शोथ पर इसके लेप से लाभ होता है। मुखरोग में इसके घोल से गण्डूष कराते हैं । प्राच्यव्रण के लिये भी यह लाभदायक है क्योंकि इसमें क्षाराम की पर्याप्त मात्रा रहती है । मात्रा-३-२ मा०। अथ बाकुची । तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह अवल्गुजॊ बाकुची स्यात्सोमराजी सुवर्णिका । शशिलेखा कृष्णफला सोमा पूतिफलीति च ॥ २०६ ॥ सोमवल्ली कालमेषी कुष्ठघ्नी च प्रकीर्तिता । बाकुची मधुरा तिक्ता कटुपाका रसायनी ॥ विष्टम्भहृद्धिमा रुच्या सरा श्लेष्मास्रपित्तनुत् । रूक्षा हृद्या श्वासकुष्ठमेहज्वरकृमिप्रणुत् ॥ २०८ ॥ तत्फलं पित्तलं कुष्ठकफानिलहरं कटु । केश्यं त्वच्यञ्च १मिश्रासकासशोथामपाण्डुनुत् ॥२०९॥ बाकुची के नाम और उसके तथा उसके फल के गुण - अवल्गुज, बाकुची, सोमराजी, सुवर्णिका, शशिलेखा, कृष्णफला, सोमा, पूतिफली, सोमवल्ली, कालमेषी और कुष्ठघ्नी ये सब बाकुची के नामा- न्तर हैं। बाकुची-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, रसायन, विष्टम्भ को दूर करने वाली, शीतवीर्य, रुचिजनेक, सारक (दस्तावर), कफ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है तथा यह रूक्ष, हृदय के लिए हितकर तथा श्वास, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर और कृमि को नष्ट करने वाली होती है। इसका फल-पित्तकारक, कुष्ठ, कफ और वात को दूर करने वाला, कटुरसयुक्त, केश तथा त्वचा के लिए हितकारी होता है तथा कृमि, श्वास, कास, शोथ आम और पाण्डु इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है ॥ २०६-२०९ ॥ १. पाठ० वमिश्रास ।

१२४ भावप्रकाशनिघण्टुः ७२ बाकुची हि०-बाकुची, बकुची, बावची, बावंची, सोमराजी । बं०-लताकस्तूरी, हाकुच । म०-बावची । गु०-बावची, बावची । क०-बाउचिंगे । ते०-भवंचि, कालाजिउजा । ता०-कर्पोकरशि । फा०-बाव- कुचि । अं०-Psoralea seed (सोरैलिया सीड); Malaya tea (मलाया टी) । ले०-Psoralea corylifolia, Linn. ( सोरैलिया कोरिलीफ़ोलिया, लिन. ) । Fam. Leguminosae ( लेग्यु- मिनोसी) । बाकुची-प्रायः सब प्रान्तों के जंगली झाड़ियों में तथा खादर अथवा कंकरीली भूमि में उत्पन्न होती है एवं सिलोन में भी प्राप्त होती है। अमेरिका में भी इसकी कई उपजातियां होती हैं जिनके गुण भी इसी के समान हैं । इसका क्षुप-१-४ फीट तक ऊँचा, वर्षायु एवं स्वावलम्बी होता है । पत्ते-१-३ इञ्च के घेरे में छोटी अरणी के पत्तों के समान गोलाकार होते हैं। ये नालयुक्त, कड़े, चिकने, लहरदार दन्तुर एवं इनके दोनों पृष्ठों पर काले धब्बे होते हैं। इन ग्रन्थियों के चिह्न शाखाओं पर भी होते हैं। १०-२० छोटे, नीले बैगनी रंग के पुष्प-१ से २ इञ्च लम्बे पुष्पद्ण्ड पर आते हैं। फली-छोटी, गोल, काली, चिकनी, एक बीज युक्त, अस्फोटी एवं फलभित्ति बीज से चिपकी होती है। बीज- बाकुची वास्तव में फल ही है जिसकी फलभित्ति बीजावरण से चिपकी रहती है। यह अण्डाकार, आयताकार, कुछ चिपटे, चिकने, अग्र की तरफ नुकीले, काले रंग के एवं महीन गर्तों से युक्त होते हैं तथा तालद्वारा बड़ा करके देखने पर नहाने के स्पञ्ज की तरह दिखलाई देते हैं। इसको चबाने पर एक तीव्र गन्ध आती है तथा इनका स्वाद कडवा, तीता एवं दाहजनक होता है। औषधि कार्य में इनका तथा इनसे निकले तैल का व्यवहार किया जाता है। नोट-कुछ विद्वानों ने सोमराजी नाम से ले० हर्नोनिया अंथेलमिंटिका ( Vernonia anthe- Imintica Willd. ) का ग्रहण किया है लेकिन वह नाम तो अरण्यजीरक का है जिसका वर्णन परिशिष्ट में किया गया है । रासायनिक संगठन-बाकुची के फलों में राल, उड़नशील तैल, तारपीन की तरह तैल, स्थिर तैल, एवं सोरैलेन् (Psoralen) तथा आइसो-सोरैलेन् (Iso-psoralen) नामक दो रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं । बाकुची के कृमिघ्न तथा त्वच्य गुण इन्हीं रवेदार पदार्थों के मिश्रण से हैं । यह तैल में घुलने वाले (फ्यूरोकाउमरिनस्-Furocoumarins ) हैं । प्रथम सोरैलेन अंजीर से प्राप्त होने वाले फिक्युसिन् (Ficusin ) के समान होता है । इसकी फलभित्ति (Pericarp पेरीकार्प) से सोरैलिडिन् ( Psoralidin ) नामक एक अन्य रवेदार पदार्थ भी प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह सौम्य उत्तेजक, वातनाड़ियों के लिए बल्य, कृमिघ्न, त्वग् दोषहर, व्रण शोधक, व्रणरोपक, मृदुविरेचक, मूत्रल, स्वेदल एवं वृष्य है। इसका अन्त: बाह्य प्रयोग श्वित्र, कुष्ठ, पामा, कण्डू, गजचर्म ( सोरियासिस-Psoriasis ) एवं चर्म के अन्य शोथयुक्त विकारों में किया जाता है । (१) श्वित्र में चौथाई भाग हरताल के साथ गोमूत्र में पीस कर इसका लेप लाभदायक होता है । खैर एवं आंवले के क्वाथ के साथ इसके चूर्ण का सेवन भी लाभदायक है । सालभर तक यदि बाकुची एवं काले तिल का सेवन करें तो सभी प्रकार के कुष्ठ अच्छे होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है । इसको जल के साथ पीस कर भी लेप किया जा सकता है । नवीन तथा युवावस्था के श्वेत कुष्ठ रोग में शीघ्र लाभ होता है किन्तु अधिक दिन तक लगाना पड़ता है । इससे दाग लाल हो जाते हैं ।

हरीतक्यादिवर्गः १२५ ( २ ) बाकुची में रहने वाला तैल ही प्रधान कार्यकारी भाग है। यह तैल चर्म के ऊपर रहने वाले मालागोलाणुओं ( Streptococci ) के लिये घातक है। अंतस्त्वचीय धमनिकाओं के ऊपर इसका निश्चित प्रभाव पड़ता है जिससे इनका विस्फार होकर वहां रक्तरस ( Plasma-प्लाज्मा ) का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे चर्म लाल हो जाता है तथा रञ्जक कोषों (मेलैनोब्लास्टस्-Mela- noblasts ) को उत्तेजना मिलकर रञ्जक का निर्माण होता है । यह रञ्जक, सफेद दागों में फैलकर उसका वर्ण परिवर्त्तन कर देता है । अधिकांश लोगों में इससे सफेद दाग लाल हो जाते हैं लेकिन कुछ (५%) लोगों में इससे छाले पड़ जाते हैं इसलिए इसको अन्य चीजों के साथ आवश्यक प्रमाण में मिश्रण कर लेना चाहिये जिससे दागों में केवल लाली आ जाय । श्वित्र के साथ-साथ यदि अन्य आंत्रिक विकार जैसे आमातिसार आदि हों तो उनकी भी चिकित्सा साथ-साथ करनी चाहिये । ( ३ ) फिरंगोत्तर श्वित्र में बाकुची के तैलीय राल सदृश सत्व ( Oleo-resinous extract) का लेप लाभदायक होता है। इस सत्व में सोरैलेन् तथा आइसो-सोरैलेन् दोनो ही रहते हैं। इसको चाँलमोगरा के तेल के साथ मिलाकर लगाया जाता है तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं जिससे श्वित्र, सिध्म तथा सोरियासिस् में लाभ होता है। लगाने के लिये इसके साथ २ भाग चाँलमोगरा का तेल तथा २ भाग लॅनोलिन् मिलाकर मलहम बनाकर दिन में एक, दो बार दागों पर मलना चाहिये । करीब ३ महीने में लाभ होता है । मात्रा-बीज चूर्ण १-३ माशा । अथ चक्रमर्दः (चकवड़) । तस्यै नामानि तत्फलस्य च गुणांश्चाह चक्रमर्दः प्रपुन्नाटो दद्रुघ्नो मेषलोचनः । पद्द्माटः स्यादेड गजश्ची पुन्नाट इत्यपि ॥२१०॥ चक्रमर्दो लघुः स्वादू रूक्षः पित्तानिलापहः । हद्यो हिमः कफश्वासकुष्ठदद्रुकृमीन्हरेत् ॥२११॥ हन्त्युष्णं तत्फलं कुष्ठकण्डूदद्रुविषानिलान् । गुल्मकासकृमिश्र्वासनाशनं कटुकं स्मृतम् ॥२१२॥ चकवड़ के नाम और उसके तथा उसके फल के गुण-चक्रमर्द, प्रपुन्नाट, दद्रुघ्न, मेषलोचन, पद्माट, एडगज, चक्री और पुन्नाट ये सब चकवड़ के नामान्तर हैं। चकवड़-लघु, स्वादिष्ठ, रूक्ष, पित्तवात (वातपित्त) नाशक, हृदय के लिए हितकर, शीतवीर्य, कफ, श्वास, कुष्ठ, दद्रु (दाद) और कृमि को नष्ट करने वाला होता है। चकवड़ का फल-उष्णवीर्य और कटु रस युक्त होता है एवम् कुष्ठ, खुजली, दाद, विष, वायु, गुल्म, कास, कृमि और श्वास इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है ॥ २१०-२१२ ॥ ७३ चकवड़ हि०-चकवड़, पवांड, पवांर । बं०-चकुन्द्रा, पनेवार । म०-तरोटा, टाकला । गु०-कुंवाडीयो । क०-तगचे । ते०-तगिरिस । ता०-उशिदुगरै । पं०-पंवार, चकुन्दा । फा०-संगसतुया । अ०- कुल्ब । अं०-Fetid cassia (फ़ीटिड कॅशिया) । ले०-Cassia tora Linn. (कॅशिया टोरा, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल, झाड़ी, खेत, मैदान, कूड़ा करकट, सड़क के किनारे एवं गन्दे स्थानों में आप ही आप उत्पन्न होता है। इसका २-५ फीट तक ऊँचा एकवर्षायु क्षुप वर्षा ऋतु में बहुतायत से उत्पन्न होता है। पत्र- संयुक्त पक्षकार और पत्रक तीन जोड़े, अभिलट्वाकार, १-२ इञ्च लंबे, चिकने, मचकीले, दुर्गन्ध

१२६ भावप्रकाशनिघण्टुः युक्त एवं स्पष्ट शिराजाल से युक्त होते हैं। इसके निचले पत्रकों के बीच में एक ग्रन्थि होती है। पुष्प-छोटे पीले रंग के अक्षकोणीय एवं दो-दो के जोड़े में आते हैं। फलियां-४-८ इञ्च लम्बी, पतली, चौकोनी, कुछ मुड़ी हुई तथा इनका अग्र नुकीला होता है। बीज-बहुत, कड़े एवं मेथी के समान होते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग बनाया जाता है तथा औषधि में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। इसी का एक दूसरा भेद है जिसे कॅशिया ऑब्च्यूसिफोलिया ( Cassia obtusifolia ) कहते हैं। इसका क्षुप भी ऊपर के क्षुप के समान ही होता है लेकिन इसमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा इसके आधारीय पत्रकद्वय के बीच में एक ग्रन्थि होती है। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में इमोडिन (Emodin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है जो क्राइसोफेनिक एसिड ( Chrysophanic acid) की तरह होता है। इसके पत्तों में कॅथार्टिन (Cathartin) नामक एक विरेचक द्रव्य तथा लाल रंग होता है। गुण और प्रयोग—इसके बीज बल्य, दीपन, पाचन एवं त्वक् दोषहर होते हैं तथा पत्र विरेचक, कृमिघ्न एवं पार्यायिक ज्वरहर होते हैं। (१) इसके बीज की क्रिया त्वचा पर होती है। दाद, खुजली, कुष्ठ, सिध्म, पामा एवं छाजन ( एक्झिमा ) आदि में यह बहुत लाभदायक है। जिन रोगों में त्वचा मोटी हो जाती है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। दाद में मूली के पत्ते के साथ या नींबू के रस के साथ या करंज के तेल के साथ पीस कर इसे लगाया जाता है। छाजन में मट्ठे के साथ पीस कर लगाते हैं। सिध्म के लिये कांजी में पीसकर लगाना चाहिये । व्रणवस्तु के स्थान पर उत्पन्न होनेवाली तन्तु युक्त गांठों (कीलॉयड-Cheloid) के लिये इसके बीजों को सेहुंड के दूध में भिगोकर फिर गोमूत्र में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। अर्धावभेदक आदि शिरोरोग में कांजी के साथ इसका लेप उपयोगी है। इसका सेवन कॉफी के रूप में भी किया जाता है। (२) इसके पत्तों का क्वाथ बच्चों के विकारों में विशेषकर दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर मृदु विरेचक के रूपमें दिया जाता है। इसका रस भिलावे से उत्पन्न दाह पर लगाया जाता है। इसका पोल्टिस बनाकर फोड़ों पर बांधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं एवं वातरक्त, गृध्रसी तथा संधिवात में भी इनके बांधने से वेदना कम होती है। इसके पत्तों को एरण्ड तैल में भूनकर दुर्गंध युक्त व्रणों में पुल्टिस के रूप में प्रयोग से लाभ होता है। मात्रा—बीज चूर्ण १-२ माशा। अथातिविषा (अतीस )। तस्या नामगुणानाह विषा त्वतिविषा विश्वा शृङ्गी प्रतिविषाऽरुणा । शुक्लकन्दा चोपविषा भङ्गुरा घुणवल्लभा ॥ विषा सोष्णा कटुस्तिक्ता पाचनी दीपनी हरेत् । कफपित्तातिसारामविषकासवमिक्रिमीन् ॥ अतीस के नाम तथा गुण—विषा, अतिविषा, विश्वा, शृङ्गी, प्रतिविषा, अरुणा, शुक्लकन्दा, उपविषा, भङ्गुरा और घुणवल्लभा ये सब अतीस के नाम हैं। अतीस—उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरस युक्त, पाचक तथा अग्निदीपक होती है एवम् कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, कास, वमन और कृमि इन सब रोगों को दूर करनेवाली होती है ॥ २१३-२१४ ॥


हरीतक्यादिवर्गः १२७ ७४ अतीस हि०-अतीस । बं०-आतइच । म०-अतिविष । पं०-अतीस । ते०-अतिवस । क०-अतिविषा । गु०-अतिवखनी कली । ता०-अतिवदयम । भोटि०-अइस । अं०-Indian Atees (इन्डियन् अतीस ) । ले०-Aconitum heterophyllum, Wall. (एकोनाइइटम् हेटरोफाइलम्, वाल. ); Fam. Ranunculaceae (रॅनन्क्युलेसी) । यह हिमालय पहाड़ में कुमाऊँ से हसोरा तक शिमला और इसके आस पास में तथा चम्बा प्रान्त में ६ से १५ हज़ार फुट ऊँची चोटियों पर पाया जाता है। इसका क्षुप-२ से ४ फीट ऊँचा होता है। काण्ड-गोल, सीधा तथा विभिन्न आकार वाली पत्तियों से घिरा होता है। पत्र-नीचे के पत्तों के फलक प्रायः पाँच विच्छेदों से युक्त एवं गोलाई लिये हुये ताम्बूलाकार या लट्वाकार-ताम्बूलाकार होते हैं। ऊपर के पत्ते छोटे तथा धार पर दन्तुर होते हैं। पुष्प-नील अथवा हरितनील, १ से १॥ इञ्च लम्बे एवं चमकीले होते हैं। आभ्यंतर पुट का एक दल सबसे बड़ा और फणाकार होता है। मूल-मूल में दो कन्द होते हैं जिनमें एक पिछले वर्ष का और दूसरा नये वर्ष का होता है। नवीन कन्द लम्बगोल या शंक्वा- कार, हाथी की सूँड की तरह, १ इञ्च लम्बा तथा ½ से ३/४ इञ्च मोटा होता है। कन्दत्वक्-पतली तथा श्वेताभ, फीके राख के रङ्ग की तरह होती है। कन्द-स्वाद में अत्यंत कडुवा, आसानी से टूट जाने वाला और भीतर से श्वेत तथा पिष्टमय पदार्थ से युक्त रहता है। इसे तोड़ने पर श्वेत मध्य भाग के चारों तरफ ४ काले धब्बे दिखलाई देते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती। इसमें कीड़े बहुत जल्दी लग जातें हैं तथा कीड़े लगने पर यह निःसत्व हो जाता है इसलिये औषधि में बिना कीड़े लगे हुये अच्छे मूलकन्द का ही व्यवहार करना चाहिये । अन्य निघण्टुकारों ने वर्ण भेद से इसके २, ४ भेद लिखे हैं लेकिन आजकल केवल एक ही भेद और मिलता है। जिसका वर्णन नीचे दिया गया है। ( क ) Aconitum palmatum D. Don ( एकोनाइटम् पामैटम् ) हि०-वखमा । सं०- प्रतिविषा । इसके क्षुप पूर्वी हिमालय में सिक्किम, गुर्वाल तथा मिश्री पर्वतों में पाये जाते हैं। इसके मूल अतीस की अपेक्षा अधिक लम्बे, कम मोटे, तोड़ने में सख्त, अधिक काले रङ्ग के तथा वजन में बहुत भारी होते हैं। इन पर गाँठें होती हैं। गुण आदि में यह अतीस के समान ही है। रासायनिक संगठन—वत्सनाभ वर्ग की औषधि होने पर भी यह विषैली नहीं है। इसमें एक अत्यन्त कडवा बिना रवेदार क्षाराम अतीसिन ( Atisine ) होता है जो विषैला नहीं है। इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक एसिड (Aconitic acid), टैनिक एसिड, अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ, वसा तथा ओलिइक, पामिटिक एवं स्टियारिक ग्लिसराइड्स (Oleic, Palmitic and Stearic Glycerides) के मिश्रण तथा गोंद, इक्षु शर्करा एवं राख २% आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—अतीस दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ग्राही, वृष्य, बल्य एवं विषमज्वरहर है। इसके सेवन से शरीर की विनिमय क्रिया सुधरती है। इसको ४-८ माशा देने पर भी विषैला परिणाम नहीं होता । इसका प्रयोग आमातिसार, विषमज्वर, कास, वमन, कुपचन, शूल, नवीन शोथयुक्त विकार एवं बालरोगों में किया जाता है।

१२८ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १ ) तिक्तपौष्टिक तथा ग्राही होने के कारण अतिसार एवं संग्रहणी में इससे अच्छा लाभ होता है । बच्चों के वमन, अतिसार, ज्वर एवं खांसी में इससे बहुत लाभ होता है। इससे पाखाना पीला होकर मात्रा कम होती है । बच्चों तथा प्रसूता में यदि अतिसार हो तो इसके साथ शृङ्ग भस्म देना चाहिये । अतीस के साथ भांग एवं षोड़षच मिलाकर अतिसार में दिया जाता है । इसके साथ सुगन्धि, कटुवी पौष्टिक तथा ग्राही अन्य औषधियां मिलाने से ज्यादा लाभ होता है । ( २ ) इसको अधिक मात्रा में देने पर ही इसका ज्वरघ्न गुण स्पष्ट होता है लेकिन उस मात्रा में ज्वर कम होने के साथ-साथ विबन्ध भी हो जाता है जो विषमज्वर के लिये अहितकारक है । इसलिये विषमज्वर में इसकी अपेक्षा कुटकी ज्यादा लाभदायक होती है । ज्वर पश्चात दौर्बल्य दूर करने के लिये दीपनीय एवं तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका उपयोग अधिक अच्छा है । ज्वरातिसार के लिये यह अत्युत्तम औषधि है । इसमें १५ र० अतीस तथा १५ र० रसाञ्जन जल के साथ देते हैं । इसके साथ सुगन्धि पदार्थ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है । बड़ों की अपेक्षा बच्चों के ज्वरातिसार में यह ज्यादा उपयोगी है । ( ३ ) मक्षिकविष में इसको मधु के साथ सुबह चटाया जाता है । ( ४ ) कृमियों को निकालने के लिये इसके साथ विडंग का प्रयोग किया जाता है । मात्रा—चूर्ण ३-२ मा० ज्वरातिसार, अतिसार में । चूर्ण-२-४ र० बल्य, तिक्तपौष्टिक ।

अथ लोध्रः 'शावरलोध्र-पटियालोध्र' इति लोके प्रसिद्धयोर्नामगुणानाह लोध्रस्तिस्त्वतरीटभ्रं शावरो गालवस्तथा । द्वितीयः पट्टिकालोध्रः क्रमुकः स्थूलवल्कलः । जीर्णपत्रो बृहत्पत्रः पट्टी लाक्षाप्रसादनः ॥ लोध्रो ग्राही लघुः शीतश्चक्षुष्यः कफपित्तनुत् । कषायो रक्तपित्तासृग्ज्वरातीसारशोथहृत् ॥ शावरलोध्र और पटियालोध के नाम तथा गुण—लोध्र, तिल्व, तिरीट, शावर, गालव ये नाम लोध्र अर्थात् सावरलोध के हैं और दूसरा जो पटिआलोध (पटानी लोध) है उसके-पट्टिकालोध्र, क्रमुक, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी और लाक्षाप्रसादन ये सब नाम हैं। दोनों प्रकार के लोध्र—ग्राही, लघु, शीतवीर्य, नेत्रों के लिए हितकर, कफपित्तनाशक, कषायरस युक्त, रक्तपित्त, रक्तविकार, ज्वर, अतिसार और शोथनाशक होते हैं ॥ २१५-२१६ ॥ ७५ लोध हि०-लोध । बं०-म०-क०-लोध, लोध्र । गु०-लोधर । ते०-लोद्दुगचेट्टु । अ०-मुगाम । अं०-Lodh (लोध); Symplocos Bark (सिम्प्लोकोस बार्क) । ले०-Symplocos race- mosa, Roxb. (सिम्प्लोकाँस् रेसिमोसा, राक्सू.) । Fam. Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी) । यह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्त नेपाल, कुमाऊँ से आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, बर्मा आदि प्रदेशों के जङ्गल और छोटे पहाड़ों में पाया जाता है । इसका छोटा वृक्ष-२० फुट तक ऊँचा होता है । छाल-खुरदरी और गहरे धूसर (Grey) वर्ण की होती हैं । काट-(Blaze-ब्लेझ)-आधा इञ्च तक मोटा, रेशेदार, हल्का पीला परन्तु हलके नारंगीभूरे रंग की रेखाओं से युक्त होता है । पत्ते-३॥ से ७ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-आयता- का या अण्डाकार-भालाकार; पत्राग्र-तीक्ष्ण, कुण्ठितलम्ब या कुंठित; पत्र तट-आरावत, अस्पष्ट गोलदन्तुर या क्वचित अखण्ड; पत्र पृष्ठ-कोमल पत्तों का ऊपर का पृष्ठ चिकना तथा अधोपृष्ठ मृदु रोमश, तथा अन्य पत्नों के पृष्ठ चिकना या मध्यशिरा पर कुछ रोमों से युक्त, चमकीले तथा

हरीतक्यादिवर्गः १२६ ऊपर का पृष्ठ गहरे हरे रङ्ग का; शिराएं-बगल की शिराएं सूखे हुये पत्तों में स्पष्ट, ५-९ जोड़ी एवं पत्रवृन्त-३ से ३ इञ्च लम्बा होता है। आश्विन से अगहन तक फूल फल आते हैं। फूल-गुच्छों में, पीले और सुगन्धित होते हैं। फल-अष्ठिफल, प्रायः आध इञ्च लम्बे, आयताकार, चिक्कण, बैंगनी काले रङ्ग के एवं उनका बाह्यकोष चिपका रहता है । इसकी छाल का व्यवहार किया जाता है। इसका बाह्यपृष्ठ चिकना धूसरित हरा (यदि कार्क (Cork) के साथ हो तो) तथा आडी धारियों से युक्त, अंदर का पृष्ठ हलका पीला लेकिन रक्ताभ बादामी दिखलाई देता है तथा इसमें लम्बाई में गद्देदार धारियां होती हैं। भग्न-छोटा, बाह्य भाग में दानेदार लेकिन अन्दर का कुछ तन्तु युक्त । बाह्य भाग (Cortical) रक्ताभ बादामी रङ्ग का । गन्ध-हलकी मधुर लेकिन बन्द डिब्बों में रखने पर तेज हो जाती है । स्वाद-मधुर, सुगन्धि तथा कुछ दाइनक । नोट-एक अन्य प्रकार के पठानी लोध्र का वर्णन आगे किया गया है। लोध्र तथा पठानीलोध्र दोनों ही के गुण करीब करीब समान ही हैं तथा दोनों ग्राही एवं अतिसारादि में लाभदायक होते हैं। लोध्र का एक पर्याय तिल्वक आया है। चरक के कल्पस्थान में तिल्वक के मूल की (अन्दर की त्वचा रहित) बाह्य त्वचा का उपयोग विरेचन कराने के लिये किया गया है। इससे भ्रम होता है कि एक ही वस्तु विरेचक तथा ग्राही कैसे हो सकती है। व्यवहार में भी लोध्र की छाल विरेचक नहीं होती। शावर या पठानी लोध दोनों की मूल त्वक् का प्रयोग किया गया किन्तु उससे विरेचन नहीं हुआ। इसके संबन्ध में एक श्लोक मिलता है । तिल्वकोऽपि तदाकारो बृहत्पत्रो विशेषतः । रक्तत्वचो विरेकी च बृहल्लोध्रेति कथ्यते ॥ डल्हण तिल्वक् के सम्बन्ध में लिखते हैं—तिल्वकः रोध्रः, अन्ये तु रोध्राकारो रक्तत्वक्को बृहत्पत्रो वैरेचनिकः । इससे मालूम होता है कि लाल छाल वाला, दीर्घ पत्र वाला एवं विरेचक गुणवाला कोई लोध्र के समान वृक्ष होता है जो तिल्वक है। अभी इसका निर्णय नहीं हो पाया है। कुछ विद्वानों ने तिल्वक् के स्थान पर रेवांचीनी की छाल का उपयोग विरेचन के लिये करने को कहा है। रासायनिक संगठन-लोध की छाल में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा करीब ०.३२% होती है जिसमें से एक रवेदार क्षाराम लोटयूराइन (Loturine) ०.२४%, अन्य चूर्णीरूप में क्षाराम लोटयुरिडाइन (Loturidine) ०.०६% एवं एक और रवेदार क्षाराम कोल्लोटयुराइन (Colloturine) ०.०२% होते हैं । इसकी राख में सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate) रहता है तथा छाल में लाल रंजक पदार्थ बहुत अधिक मात्रा में होते हैं। इसमें टैनिन द्रव्य नहीं होते । इसमें का लोटयूराइन क्षाराम अब्राइन (Abrine) एवं हारमॅन (Harman) के सदृश होता है । इसके सभी क्षाराम विरल अम्ल घोल में अत्यन्त तेज नील-लोललोहितातीत चमक उत्पन्न करते हैं । गुण और प्रयोग-लोध की छाल ग्राही, शीतल, रक्तस्तंभक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक, शोधन, बल्य एवं चक्षुष्य है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव बन्द होता है। इससे श्लेष्मल त्वचा को शक्ति प्राप्त होकर एवं उसका संकोच होकर श्लेष्मा की उत्पत्ति कम होती है । इसका उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, श्वेतप्रदर, सर्वाङ्गशोथ, यकृद्विकार, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है। 9 ६ भाव नि०

१३० भावप्रकाशनिघण्टुः (१) लोध्र अतिसार एवं प्रवाहिका के लिये बहुत अच्छी औषधि है। इसमें इसके प्रवाही सत्त्व को ३ डा० की मात्रा में देने से इपीकाक से जिनको लाभ नहीं हुआ था उन्हें भी लाभ हुआ । इसमें बेल की गुदी, कुचला एवं कुरैया की छाल के साथ इसका प्रयोग करते हैं या इसके साथ मुलेठी, अनार का छिलका एवं कायफल का प्रयोग किया जाता है। (२) रक्तप्रदर में इसके चूर्ण को १०-२० की मात्रा में दिन में ३, ४ बार मिश्री के साथ ३, ४ दिन तक देने से बहुत लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर उसकी शिथिलता दूर होती है जिससे रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर आदि में यह उपयोगी है। गर्भिणी मे ७ वें या ८ वें महीने में यदि गर्भ में अधिक चलन हो तो इसे छोटी पीपल एवं मधु के साथ चटाने से गर्भाशय संकोच होकर चलन कम हो जाता है। (३) आंखों में लाली तथा सूजन होने पर इसको पलकों के चारों तरफ लगाते हैं। इसके साथ मुलेठी, रसौत एवं भुनी फिटकिरी का उपयोग लेप में किया जाता है। (४) श्लीपद (Filaria = फाइलेरिया) के कारण उत्पन्न पायसमेह (Chyluria = काइ- लूरिया) तथा फीलपांव (Elephantiasis = एलिफॅन्टियासिस) में यह लाभदायक सिद्ध हुआ है। (५) कुष्ठ एवं व्रण आदि में इसका अन्तः बाह्य प्रयोग किया जाता है। प्रसूता में योनिक्षत के लिये इसका लेप उपयोगी है। गलशुण्डिका वृद्धि एवं मसूदों से यदि खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराते हैं तथा रसौत, नागरमोथा एवं लोध्र का मधु के साथ मसूदों पर लेप करते हैं। सूजन पर लोध्र के लेप से सूजन कम हो जाती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० र० । ७६ पठानी लोध्र । हि०-पठानी लोध्र । बं०-पटिया लोध्र । गु०-पठाणी लोधर । पं०-पठानी लोद, लान्दर, लोज, लोश । म०-पट्टी लोध्र । ते०-तैल लुट्ठुगु । क०-बिली लोध्र । सिन्ध०-लोदर, पठानी लोध्र । ले०-Symplocos crataegoides Buch. Ham. (सिम्पलोकॉस् क्रेटेगॉइंडिस्) । (Fam. Symplocaceae (सिम्पलोकेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में सिन्ध नदी से आसाम तक, खासिया पहाड़ और मरतवान के पहाड़ों में ३-९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। यह वृक्ष-३० फुट तक ऊँचा होता है। छाल- हल्के सफेद रंग की और कार्क युक्त होती है तथा उस पर खड़ी नालियां रहती हैं। काठ-आधा इञ्च मोटा, हल्का पीला व रेशेदार होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, पतले, अण्डाकार या लट्वाकार, लंबाय और अग्र की ओर तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं तथा सूखने पर पीले रङ्ग के हो जाते हैं। फूल-सफेद, समशिखाकार गुच्छों में तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फूलों की सुगन्धि दूर तक जान पड़ती है। फल-चौथाई इञ्च से तिहाई इञ्च तक लम्बे तथा गोल होते हैं। उनसे मुड़ा हुआ गोल बीज निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आदि सब उपर्युक्त लोध्र के समान ही हैं।

अथ लशुन, तस्य नामान्याह लशुनस्तु रसोनः स्यादुग्रगन्धो महौषधम् । अरिष्टो म्लेच्छकन्दश्च यवनेष्टो रसोन्कः ॥२१०॥ लशुनके नाम-लशुन, रसोन, उग्रगन्ध, महौषध, अरिष्ट, म्लेच्छकन्द, यवनेष्ट और रसोन्क ये नाम लशुन के हैं ॥ २१० ॥

हरीतक्यादिवर्गः १३१ अथ लशुनोत्पत्तिमाह यदाऽमृतं वैनतेयो जहार सुरसत्तमात् । तदा ततोऽपतद् बिन्दुः स रसोनेोऽभवद् भुवि ॥ लशुन की उत्पत्ति-जिस समय गरुडने इन्द्र के पास से अमृत हरण किया था उस समय स अमृत) से जो बिन्दु (अमृत-बिन्दु) पृथ्वी पर गिरा उसी से लहुसन की उत्पत्ति हुई ॥२१८॥ अथ रसोनशब्दस्य निरुक्तिमाह पञ्चभिश्च रसैर्युक्तो रसेनाम्लेन वर्जितः । तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणां गुणवेदिभिः ॥ लहुसन के 'रसोन' नामकी व्युत्पत्ति-लहुसन में ६ प्रकार के रसों में से ५ प्रकार के रस रहते हैं किन्तु केवल एक अम्ल रस नहीं रहता है, अत एव रस अर्थात् केवल अम्ल रस से ऊन अर्थात् शून्य रहने से द्रव्यों के गुणादिक जानने वाले विद्वानों ने इसका 'रसोन' नाम रक्खा है॥ अथ लशुने रसस्थानान्याह कटुकश्चापि मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः । नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः ॥ बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ॥ २२० ॥ लहुसन में कटु आदि पांचो रसों के रहने के स्थान-इसके मूलभाग में कटु रस रहता है, पत्तों में तिक्त रस, नाल में कषाय रस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीज में मधुर रस रहता है, ऐसा लहुसन के गुणों के जानने वाले विद्वानों ने कहा है ॥ २२० ॥ अथ लशुनगुणानाह रसोनों बृंहणो वृष्यः स्निग्धोष्णः पाचनः सरः । रसे पाके च कटुकस्तीक्ष्णो मधुरको मतः ॥ भग्नसन्धानकृत्कण्ठ्यो गुरुः पित्तास्रवृद्धिदः । बलवर्णकरो मेधाहितो नेत्र्यो रसायनः ॥२२१॥ हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुर्नामकूष्ठानलसाद्जन्तु-समीरणश्वासकफांश्च हन्ति ॥ २२३ ॥ लहुसन के गुण-लहुसन बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, पाचक तथा सारक होता है। और वह रस तथा पाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण, भग्न-सन्धान- कारक (टूटी हड्डियों को जोड़ने वाला), कण्ठ को हितकारी, गुरु, पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाला, मेधाशक्ति तथा नेत्रों के लिये हितकर और रसायन होता है। एवं हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, मल तथा वातादिक की विबन्धता, गुल्म, अरुचि, कास, शोथ, बवासीर, कुष्ठ, अग्निमान्य, कृमि, वायु, श्वास और कफ को नष्ट करता है ॥ २२१-२२३ ॥ अथ लशुनेसेविनां हिताहितपदार्थान्मह मद्यं मांसं तथाऽम्लञ्च हितं लशुनसेविनाम । व्यायाममातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ॥ रसोनमश्नन् पुरुषस्त्यजेदेतान् निरन्तरम् ॥ २२५ ॥ लहुसन सेवन करनेवालों के लिये हितकर तथा अहितकर पदार्थ-मद्य, मांस तथा अम्लरस युक्त भक्ष्य पदार्थ ये सब लहुसुन खाने वालों के लिये हितकर हैं। और व्यायाम, आतप (धूप में फिरना), क्रोध करना, अत्यन्त जल पीना, दूध और गुड़ इन सबों को लहुसुन खाने वाले पुरुष सदा छोड़ दें, क्योंकि ये सब अहितकर हैं ॥ २२४-२२५ ॥ ७७ लहुसुन । हि०-लहुसुन, लशुन । बं०-रसुन । म०-लसूण । क०-बेल्लुळ्ळि । ते०-वेल्लुळ्ळि, तेळ्ळिगड्ड्डा । ता०-वळ्ळैपंडु । गु०-लसण । सिंधी-थोम । आसा०-नहरु । भोटि०-गोक्पस । फा०-सीर ।

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१३२ | भावप्रकाशनिघण्टुः अ०-सूम, फूम। यू०-स्कूईून। अ०-Garlic (गार्लिक) । ले०-Allium sativum, Linn. (एलियम् सटाइवम्, लिन०) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में बोया जाता है। विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रदेश, गढ़वाल, कुमाऊँ, पंजाब एवं काश्मीर आदि में अधिक उत्पन्न होता है। इसका बहुवर्षाणु क्षुप-करीब १ फुट तक ऊँचा होता है। पत्र-चिपटे, लम्बे, १ इञ्च से कम चौड़े एवं इनका अग्र लम्बा होता है। पत्रकोश-३-४ इञ्च लम्बा होता है तथा पुष्प व्यूह को घेरे रहता है। पुष्पव्यूह-सबृन्त मूर्धज, छोटे, घने एवं पतले, शुष्क कोणपुष्पों से युक्त होते हैं। इसके कन्द को लहसुन कहा जाता है जिसके अन्दर ८-२० जावा होते हैं। इसमें एक विशेष प्रकार की तीव्र गन्ध तथा इसका स्वाद विशिष्ट प्रकार का कटु होता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक बादामी पीले रंग का उड़नशील तैल ०.१-०.३% पाया जाता है जिसका वि. गु. १.०४६-१.०५७ होता है। इस तैल में प्रधान रूप से ॲलिल डाइसल्फा- इड् (Allyl disulphide, C₆ H₁₀ S₂) तथा ॲलिल-प्रॉपिल डाइसल्फाइड (Allyl-propyl disulphide) एवं अल्प मात्रा में उच्च श्रेणी के पॉलीत्सल्फाइड्स (Polysulphides) पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त लहसुन के मध्यसारिय सत्त्व से एक ॲलीसिन (Allicin, C₆ H₁₀ S₂ O) नामक प्रतिजीवाणीय (Antibacterial) तरल द्रव्य प्राप्त किया गया है। इसके साथ ही साथ ॲलीसेशन् I तथा ॲलीसेशन् II (Allicetion I and Allicetion II) नामक दो अत्यन्त तीव्र प्रतिजैविक (Antibiotics) पदार्थ भी पाये गये हैं जो ईथर (Ether) में घुलनशील लेकिन जल में न घुलने वाले होते हैं। गुण और प्रयोग—लहसुन एक बहुत ही उपयोगी औषधि है। प्राचीन काल से इसका प्रयोग किया जाता रहा है और आधुनिक विद्वानों ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। राजयक्ष्मा (Tuberculosis) एवं अन्य फुप्फुसविकार, वातविकार, शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dys- pepsia) एवं व्रण आदि के लिये यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। काश्यपसंहिता में लशुनकल्प नामक एक स्वतन्त्र अध्याय में इसका वर्णन किया गया है। धार्मिक ग्रन्थों में इसका सेवन निषिद्ध माना है। लहसुन उष्ण, दीपन, पाचन, वातहर, स्वेदजनन, मूत्रल, उत्तेजक, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, रसायन, दुर्गन्धहर एवं उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसमें जो उड़नशील तैल होता है उसका उत्सर्ग त्वचा, फुप्फुस एवं वृक्क द्वारा होता है। फुप्फुस से उत्सर्ग के समय इससे कफ ढीला हो जाता है तथा उसमें के जीवाणुओं का नाश होकर कफ की दुर्गन्ध दूर होती है। वात नाडी संस्थान पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से वमन, विरेचन, एवं शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बच्चों में इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। अधिक मात्रा में सेवन करने पर कभी कभी मृत्यु भी हो सकती है। इसका बाह्य प्रयोग त्वगरागकारक (Rubefacient) एवं प्रतिदूषक औषधि के रूप में किया जाता है। अधिक समय तक त्वचा के साथ सम्पर्क होने से स्फोट उत्पन्न होते हैं। (१) यक्ष्मा दण्डाणु से उत्पन्न सभी विकृतियों जैसे फुप्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोथ, चर्मविकार, अस्थिव्रण एवं नाड़ीव्रण आदि में यह निश्चित लाभदायक सिद्ध हुआ है। लहसुन के रस को इनमें पिलाया जाता है तथा इसका स्थानिक उपयोग भी किया जाता है। स्वरयंत्र शोथ में इसका टिंक्चर ३-१ ड्रा. दिन में २, ३ बार देते हैं। पुराने कफविकार जैसे कास, श्वास, स्वरभङ्ग,


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हरीतक्यादिवर्गः | १३३ श्वसनिका शोथ, श्वसनिकाभित्तीर्णता (Bronchiectasis) एवं श्वासकृच्छ्र आदि में इसका अव- लेह बनाकर उपयोग किया जाता है। लहसुन एवं वायविडङ्ग का सेवन भी लाभदायक है। बच्चों के कुकास में इसको ३,४ घण्टे पर सुंघाया जाता है तथा इसके रस को पिलाते भी हैं जिससे कष्ट कम हो जाता है। फुप्फुसकोथ (Gangrene of lungs) में इसके टिंक्चर (५ में १) का उपयोग बहुत सफल रहा है। प्रारम्भ में इसको कम मात्रा में देना चाहिये तथा बाद में २० बूंद तक दिन में ३ बार देना चाहिये। थोड़े ही समय में ज्वर, कफ की दुर्गन्ध, स्वेदाधिक्य एवं अग्निमान्द्य आदि दूर होकर लाभ होता है। इसी प्रकार खण्डीय फुप्फुसपाक (Lobar pneumonia) में भी इसके टिंक्चर को २० बूंद हर चार घण्टे पर जल के साथ देने से ४८ घण्टे के अन्दर ही लाभ मालूम होने लगता है तथा ५, ६ दिन में ज्वर कम हो जाता है। इन सभी विकारों में आन्तरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको छाती पर लगाते भी हैं। (२) वायविडङ्ग के साथ इसका क्षीरपाक सभी वातविकारः में जैसे गृध्रसी, कटिग्रह, अर्दित, पक्षाघात, एकाङ्गवात, उरुस्तम्भ, अपतन्त्रक एवं अपस्मार आदि में लाभदायक है। आन्तरिक प्रयोग के साथ इससे सिद्ध तैल की मालिश भी की जाती है। अपस्मार में इसका फांट भोजन के पूर्व एवं पश्चात् देने का विधान है। अपतन्त्रक में इसको सुंघाया जाता है। इसी प्रकार ठण्डक लगने से उत्पन्न पीड़ा, जीर्ण आमवात एवं संधिशोथ तथा शिरःशूल आदि में इसको खिलाया जाता है तथा बाह्य लेप भी किया जाता है। बच्चों के वात विकारों में इसकी मालिश विशेष लाभदायक है। (३) शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia), आध्मान, उदरशूल, विसूचिका, वमन, गुल्म, उदावर्त, आंव एवं केंचुवों की बीमारी में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। केंचुआ (Round worms) में १०-३० बूंद रस दूध में मिलाकर पिलाते हैं। वातगुल्म में इसको पीस कर घृत के साथ खिलाने से लाभ होता है। ग्रहणीव्रण (Duodenal ulcer) में भी इसको लाभदायक माना गया है। (४) विषमज्वर में इसको तैल या घृत के साथ सुबह खिलाने से लाभ होता है। आन्त्रिक एवं तन्द्रालु ज्वर (Typhoid and Typhus) के प्रतिबन्धन के लिये इसके टिंक्चर को १/२ ड्रा. हर ४ या ६ घण्टे पर शरबत के साथ देते हैं। यदि रोग के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जावेगा तो ज्वर बढ़ने नहीं पावेगा। इसका उपयोग आन्त्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) औषधि के रूप में किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। बच्चों को ३ ड्रा. की मात्रा में शरबत के साथ पर्याप्त है। (५) हृद्रोग में इसके प्रयोग से आध्मान कम हो कर हृदय के ऊपर का दबाव दूर होता है जिससे हृदय को बल प्राप्त होकर मूत्र अधिक होने लगता है तथा सर्वाङ्गशोथ एवं जलोदर में लाभ होता है। (६) इसके स्वरस को २, ४ भाग जल में मिला कर क्षत तथा दुर्गन्धित व्रण प्रक्षालन के काम में लाया जाता है जिससे वेदना कम हो कर व्रण जल्दी ठीक होता है। कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid) की अपेक्षा इससे धातुओं को कम नुकसान होता है। इसी प्रकार शोथ, विद्रधि, बालतोड़ एवं दाद आदि पर इसका लेप लाभदायक है। इससे सिद्ध सर्षप तैल का उपयोग खुजली (पामा) में किया जाता है। रोहिणी (Diphtheria) नामक अत्यन्त उग्र गले के विकार में इसकी एक, एक कली चूसने को दी जाती है। ३, ४ घण्टे में १ छटांक तक लहसुन दिया जाता है। विकृत कला (Mem- brane) के दूर होने पर दिन भर में १ छटांक तक लहसुन देना चाहिये । शिशुओं के लिये इसके रस को २०-३० बूंद हर चार घण्टे पर शरबत के साथ देना चाहिये। एक रोगी में नाड़ीव्रण

१३४ भावप्रकाश निघण्टुः (Sinus) के लिये इसके ताजे स्वरस को २ बूंद की मात्रा में हर छठे दिन स्थानिक सूचिकाभरण किया गया जिससे ४ इञ्च गहरा नाड़ीव्रण २ महीने के अन्दर ठीक हो गया। उपजिह्वा शोथ में इसका स्थानिक प्रयोग सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) की अपेक्षा अच्छा होता है। (७) कर्णशूल में इसके गुनगुने रस का या इससे सिद्ध तैल का उपयोग लाभदायक है। इससे बाधिर्य में भी लाभ होता है। (८) आर्तवप्रवर्त्तक होने के कारण इसका उपयोग अनात्तंव एवं कष्टार्तव आदि में किया जाता है। गर्भिणी में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (९) मवेशियों में अँन्थ्राक्स (Anthrax) नामक रोग के प्रतिबन्धन के लिये एवं सर्पविषादि में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। हानिनिवारक - कतीरा, धनियां एवं बादाम का तेल। मात्रा - स्वरस १०-३० बूंद; कल्क २-३ माशा। ७८ एकपुतिया लहसुन हि०-लहसुन, एककांदा लहसुन, एककली लहसुन, एकपुती लहसुन, एकपुतिया लहसुन। बं०-गांथुन। अं०-Shallot (शॅलोट), One Clove Garlic (वन क्लोव गार्लिक)। लै०-Allium ascalonicum Linn. ( एलियम् ॲस्कॅलोनिकम् लिन ) Fam. Liliaceae ( लिलिएसी ) । यह अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसकी जड़ दो वर्ष या इससे कुछ अधिक ही जीवित रह सकती है। इसके साथ कई एक अण्डाकार लम्बे जावे रहते हैं। यह १-२॥ इञ्च तक लम्बा और मध्यमा अङ्गुली के समान मोटा होता है। पत्ते-उक्त लहसुन के समान लम्बे, पतले, चिकने और पोले से होते हैं। जड़ से ही अनेक पत्ते निकलते हैं और पत्तों के बीच से दण्ड निकलता है जो एक दो फुट लम्बा, नीचे फूला हुआ किन्तु क्रमशः ऊपर संकुचित और गोल होता है। इसके अन्त में लट्टू के समान फूलों का गुच्छा लगता है। प्रत्येक गुच्छे में लगभग २०० तक नन्हें श्वेत वर्ण के फूल रहते हैं। वे प्याज के फूलों के समान दिखाई पड़ते हैं। इसके कन्द में एक ही जावा रहती है तथा यह कोमल प्याज की तरह दिखलाई देता है। गुण और प्रयोग - इसके गुण लहसुन की तरह ही होते हैं लेकिन विशेष कर यह वृष्य है। वाजीकरण के लिये इसको घी में भून कर मधु के साथ सेवन कराया जाता है। कर्णशूल में इसका टुकड़ा कान के अन्दर रखते हैं। इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। नोट - प्याज की तरह लाल रंग का एक और जंगली लहसुन होता है जो ईरान में अधिक होता है। उसे लै० में-एलियम् लेप्टोफाइलम्, वॉल (Allium leptophyllum, Wall.), ईरान में-सीर-इ-पिआझक् एवं अरव में-थूम-एल-बरी कहा जाता है। गुण और प्रयोग - यह स्वेदल होता है। इसका अचार कुपचन में व्यवहार में लाया जाता है। अथ पलाण्डुः (पियाज ), तस्य नामगुणानाह पलाण्डुर्यवनेष्टश्च दुर्गन्धो मुखदूषकः । पलाण्डुस्तु बुधैर्ज्ञेयो रसोनसदृशो गुणैः ॥ २२६ ॥ स्वादुः पाके रसेऽनुष्णः कफकृन्नातिपित्तलः । हरते केवलं वातं बलवीर्यकरो गुरुः ॥ २२७ ॥ पियाज के नाम तथा गुण - पलाण्डु, यवनेष्ट, दुर्गन्ध और मुखदूषक ये सब पियाज के नाम हैं। पियाज को गुणों में लहसुन के समान समझना चाहिये। पियाज-रस तथा पाक में मधुर रस हरीतक्यादिवर्गः १३५ युक्त, अनुष्ण (ईषत् उष्णवीर्य) एवं कफकारक होता है। और यह अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है। यह केवल वातहर होता है तथा बल और वीर्य को करनेवाला एवं गुरु होता है। ७९ पियाज हि०-पियाज, प्याज । बं०-पेयाज। पं०-गण्डा। म०-कांदा। ते०, क०-नीरुल्लि। गु०- डुङ्गळी, कांदो । मा०-कांदो, कांदा । ता०-वेंगयम। फा०-प्याज। सिन्ध०-लुमु, बसर । मला०- बदंग। अ०-बस्ल। अं०-Onion (ओनियन् ) । लै०-Allium cepa, Linn. (एलियम् सिपा, लिन० )। Fam. Liliaceae ( लिलिएसी ) । प्याज की खेती प्रायः सब प्रान्तों में की जाती है। इसका पौधा-हाथ डेढ़ हाथ ऊँचा होता है। पत्र-दो कतारों में तथा पुष्पदंड से छोटे होते हैं। इनके बीच से दंड निकलता है। इसके ऊपर लट्टू के समान गोल गुम्मजदार गुच्छों में सुहावने हरापन लिये सफेद फूल लगते हैं। इनमें से तिकोने काले बीज निकलते हैं। इसके नीचे जो कन्द बैठता है उसी को प्याज कहते हैं। किंचित् गुलाबी और सफेद रंगों के भेद से प्याज दो जाति का होता है। दोनों के पौधे एक समान होते हैं। औषधि में लाल जाति का प्याज उपयोग में लाना चाहिये । रासायनिक संगठन - इसमें एक उग्रगन्धि एवं कटु तैल तथा गन्धक के सेन्द्रीय योग पाये जाते हैं। इसके बाह्य छिलके में एक केर्सटीन (Quercetin) नामक पीत रंजक पदार्थ होता है तथा कंद में शर्करा भी होती है। गुण और प्रयोग - पियाज का उपयोग प्राचीन काल से आहार द्रव्य के रूप में किया जा रहा है। गरुड़पुराण में पलांडुगुटिका का पाठ है। यह किंचित् उष्ण, कफनिःसारक, उत्तेजक, वृष्य, बल्य, मूत्रजनन, आर्तवजनन, अग्निवर्धक, आनुलोमिक एवं उत्तम वांतहर है। इसके सेवन से कफ ढीला होकर निकलने लगता है एवं दूषित पित्त भी निकल जाता है। ( १ ) बच्चों एवं वृद्धों के कफविकारों में विशेषकर जब ज्वर न हो तब यह लाभदायक है। कच्चे प्याज के रस को मिश्री मिलाकर बच्चों को चटाया जाता है तथा वृद्धों में इसको पकाकर देते हैं। क्षयजकास में इससे कष्ट कम हो जाता है। श्वसनियों के जीर्ण शोथ के लिये लाभदायक औषधियों में यह श्रेष्ठ ओषधि है। ( २ ) वाजीकरण के लिये इसके रस को मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। ( ३ ) अर्श में इसके रस को १-२ तो० मिश्री के साथ पिलाते हैं या प्याज को पकाकर उसमें मिश्री, घी तथा जीरा मिलाकर खिलाते हैं एवं गरम २ मस्सों पर बांधते हैं। ( ४ ) मसूढ़ों की सूजन तथा शूल में इसको नमक के साथ खिलाते हैं। ( ५ ) इसका क्वाथ आन्त्रावरोध, अर्श, कामला एवं गुदभ्रंश आदि में लाभदायक है। ( ६ ) विसूचिका में इसके रस के साथ चूने का पानी मिलाकर पिलाते हैं। अग्नि वृद्धि के लिये सिरके के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। प्लेग आदि मरक के समय कच्चे प्याज या सिरके के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ( ७ ) अपतन्त्रक तथा नासिका से रक्तस्राव होने पर इसका नस्य कराया जाता है। चक्कर आता हो तो इसको सुंघाते हैं। ( ८ ) कर्णपिटिका में इसका पुटपाक करके साधारण गरम रस कान में डालने से शूल कम हो जाता है। इसके बीच के टुकड़े को भी कान में रखने से लाभ होता है।

१३६ भावप्रकाशनिघण्टुः (९) अंधता तथा धुन्ध आदि विकारों में इसका रस मधु में मिलाकर नेत्र में लगाते हैं तथा रात्रंध में नमक के साथ इसका रस डालते हैं। (१०) इसको घी में भूनकर उसका पोल्टिस गांठ, फोड़े, बद एवं व्रण आदि पर लगाया जाता है। आमवातादि संधिविकार एवं अन्य दाह, कण्डू आदि चर्म रोगों में इसके रस को सरसों के तेल में मिलाकर मलते हैं। (११) बिच्छू तथा अन्य कीड़ों के काटने पर इसमें रस को लगाने से दाह एवं वेदना की शांति होती है। (१२) प्याज के बीज बाजीकर होते हैं। इसको पीसकर मधु के साथ खालित्य, व्यंग एवं झांई आदि पर लगाते हैं। दाद में सिरका में पीसकर इसे लगाते हैं एवं मसों पर नमक के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ८० जंगली प्याज उपर्युक्त प्याज के अतिरिक्त इसी वर्ग का एक जंगली प्याज होता है जिसकी दो तीन किस्में भारतवर्ष में पाई जाती हैं। यह डाक्टरी स्क्लिल (Squill) नामक औषधि अर्जिनिया मेरिटिमा (Urginea maritima (Linn.) Baker) की श्वेत उपजाति जो भूमध्यसागरीय तट पर होती है उसका अच्छा प्रतिनिधि है। यह अत्यन्त उपयोगी होने के कारण यहाँ उसका वर्णन दिया जा रहा है। लोग इसे रा० नि० एवं नि० २० का कोलकंद मानते हैं। दोनों निघण्डकार उसे 'वान्तिशमनकृत्' लिखते हैं लेकिन जंगली प्याज 'वान्तिजननः' होता है। (क) ले०-Urginea indica, Kunth. (अर्जिनिया इण्डिका, कुंथ) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) सं०-कोलकन्द, वनपलांडु । हि०, बं०-कांदा, जंगली प्याज । गु०-जंगली कांदो, पाण कंदो । म०-रानकांदा, कोलकांदा, कोचिंदा । ता०-नेरि वंगायम् । ते०-अडवितेलु गड्ड । पं०-कफोर, कचवस्सल अ०-उन्सुलै हिंदी । फा०-पियाज सहराई । अं०-Indian Squill (इण्डियन स्क्लिल) । यह पश्चिमी हिमालय में ७००० फीट तक, गढवाल, कुमाऊं, बिहार एवं कारोमंडल तट तथा कोंकण के रेतीले किनारों एवं पश्चिमी घाट पर पाया जाता है। यह वनस्पति सुदर्शन सदृश होती है। पत्र-मूलीय, ६-१८ इञ्च लम्बे, प्याज से बड़े और चौड़े, चिपटे, रेखाकार एवं नोकदार होते हैं। पत्रों के निकलने से पूर्व बीच से सदण्डिक पुष्पध्वज (Scape-स्केप) निकलता है जिस पर हरित्ताभ श्वेत पुष्प निकलते हैं। फल-सामान्यस्फोटी फल (Capsule-केप्सूल) अण्डाकार, ।।-।।। इञ्च लम्बे, दोनों ओर क्रमशः पतले होते हुये एवं ६-९ बीजों से युक्त होते हैं। बीज-छोटे, दीर्घवृत्ताकार, चिपटे तथा काले होते हैं। इसका कन्द प्याज की तरह २-४ इञ्च लम्बा, लट्वाकार एवं परिच्छदपत्रक (Tunicated Bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप का होता है। इसके कटे हुये टुकड़े मुड़े हुए, चिपटे, विभिन्न आकार के आधे से दो इञ्च लंबे, दोनों छोर की तरफ क्रमशः पतले होते हुए, कभी कभी तीन या चार एक साथ, काण्डक से चिपके हुए, लंबाई में रीठदार ए हल्के पीताभ बादामी या हल्के पीत विभिन्न वर्ण के होते हैं। ये छिलके शुष्क अवस्था में सहज चूर्ण बनाने लायक एवं आई हो जाने पर चिमड़े एवं लचीले हो जाते हैं। इनमें गंध नहीं होती तथा इनका स्वाद तिक्त एवं कड़ होता है। ताजा कन्द खाने से जीभ पर कण्डू मालूम होती है। पहिले वर्ष के नींबू के इतने बड़े कन्द हरीतक्यादिवर्गः १३७ का व्यवहार करना चाहिये । पुष्पित होने पर इसके कोमल कंदों को निकाल कर, उनके ऊपर के पतले छिलकों को हटा कर, उनके टुकड़े करके सुखाकर शुष्क स्थान में रखा जाता है। इसका चूर्ण हवा से जल सोख लेता है इसलिये इसको बिलकुल शुष्क बंद पात्र में रखना चाहिये । (ख) Scilla indica, Baker (सिल्ला इण्डिका, बेकर) । हि०, बं०-सुफेदी खस । बंबई- भुइकांदा । ता०-शिरु-नेरि-वंगयम् । यह दक्षिणी पेनिनसुला में कोंकण एवं नागपुर से दक्षिण की तरफ समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है। इसी से मिलती-जुलती एक जाति सिं० होहेनंकरी (S. hohenack- eri ) पंजाब में मिलती है। इनके कन्द श्वेताभ बादामी, अंशच्छद पत्रक (Scaly bulb) स्वरूप के, जायफल के इतने बड़े, गोल या अंडाकार एवं कभी-कभी बगल से दबे हुए होते हैं। इनके मांसल छिलके (शल्क पत्र) बहुत चिकने होते हैं एवं इनके किनारे परस्पर ढके रहने के कारण इनका एक ही पर्त मालूम होता है। (क) और (ख) दोनों ही के गुण समान हैं तथा बाजार में दोनों के कंद मिले हुवे बिकते हैं तथा इनके शुष्क टुकड़े भी बिकते हैं। ये कंद विदेशी कंदों से कुछ छोटे होते हुए भी उन्हीं की तरह कड़वे एवं हल्लासकारक होते हैं। (क) और (ख) के कंदों में यही अन्तर है कि (क) के कन्द परिच्छद पत्रक (Tunicated bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप के एवं (ख) के कंद अंशच्छ- दपत्रक (Scaly bulb-स्कैली बल्ब) स्वरूप के होते हैं। रासायनिक संगठन - ताजे कंद में सिल्लारेन-ए (Scillaren-A, C_{36}H_{52}O_{13}) नामक एक रवेदार ग्लाइकोसाइड (Glycoside) तथा सिल्लारेन-बी (Scillaren-B) नामक चूर्ण रूप का ग्लाइकोसाइड (Glycoside) पाया जाता है जिनमें से दूसरे में कम से कम दो ग्लाइको साइड मिले रहते हैं। इनमें से सिल्लारेन-ए जल में बहुत कम घुलता है और सिल्लारेन-बी जल और क्लोरोफार्म में घुलने वाला एवं अल्कोहल या ईथर में न घुलने वाला होता है। कंद में जिस अनुपात में ये दोनों ग्लाइकोसाइड रहते हैं उनका सिल्लारेन (Scillaren) नामक मिश्रण जल में सरलता से घुल जाता है तथा वह बहुत दिन तक खराब भी नहीं होता। भारतीय स्क्लिल में उपर्युक्त ग्लाइकोसाइड के अतिरिक्त गोंद, कर्वोज, फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol) एवं कॅल्शियम ऑक्झैलेट् (Calcium oxalate) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, कफनिःसारक, हृदयोत्तेजक, हृद्य, मूत्रविरेचक तथा उत्क्लेश एवं वमनकारक है। इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् (Digitalis) के समान होती है जिससे हृदय की गति कम होती है एवं हृदय का कार्य ठीक होने से हृदय को बल प्राप्त होता है। पचन- संस्थान द्वारा इसका प्रचुषण कम होने के कारण इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में इससे महास्रोत में प्रकोप होकर वमन, अतिसार एवं रक्तातिसार होता है। यह स्थानिक प्रक्षोभक प्रभाव इसमें के रैफाइड्स (Raphides) के कारण होता है। हृदय पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशी की अपेक्षा प्राणदा नाड़ी (Vagus nerve) के द्वारा अधिक होता है। डिजिटॅलिस् की अपेक्षा इसकी क्रिया शीघ्र एवं अस्थायी होने के कारण इससे संचायी दुष्परिणाम नहीं होते। अल्प मात्रा में इसके प्रयोग से आमाशय में साधारण प्रक्षोभ होकर प्रत्यावर्तन क्रिया द्वारा कफ निकलने लगता है।