भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

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११८ \quad भावप्रकाशनिघण्टुः \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad हरीतक्यादिवर्गः \quad ११६

\quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad ७० दारुहलदी

तभी इसमें फूल आते हैं । जड़ के नीचे काला सा पीले रंग का कन्द होता है । अच्छी खाद आदि होने से ये कन्द काफी बड़े होते हैं । साधारणतः बीच की गांठें अण्डे के समान, २ इञ्च से बड़ी, कालीसी चक्राकार कड़ों से युक्त तथा अनेक मोटी उपमूलों से युक्त होती हैं। उपमूलों के अंतिम भाग में बदाम के बराबर नारंगपीत गांठे होती हैं। बीच की गांठों के बगलवाली गांठें अंगुली सदृश मोटी होती हैं तथा उनसे थोड़े से मांसल मूल निकले रहते हैं। जंगली हरदी का अन्दर का भाग गाढ़े नारंगी रंग का; गन्ध हरदी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हल्लासकारक होता है। हरदी के स्थान में रंगने के काम में यह आती हैं। त्रावण- कोर में इससे तिखुर निकालते हैं।

रासायनिक संगठन- हरिद्रा के समान ।

गुण और प्रयोग- इसके गुण हलदी की ही तरह होते हैं। रक्तविकार एवं चर्मरोगों में अन्य औषधियों के साथ इसका व्यवहार किया जाता है। (१) सर्पविष में जंगली हलदी, कुष्ठ, अजवायन तथा मैनसिल का धूम दिया जाता है। (२) विस्फोटक ज्वरों में दानों को बाहर निकालने के लिये इसे २-४ र० खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं। (३) खुजली, चोट, सूजन एवं मोच आदि में इसका लेप अथवा इससे सिद्ध तैल का व्यवहार किया जाता है। (४) शिरःशूल में लोहबान के साथ इसे घिसकर लेप करते हैं। मात्रा- १-२ मा० ।

नोट- उपर्युक्त हरिद्राओं के अतिरिक्त बंगाल में एक कालीहलदी (नरकचूर, नीलकण्ठ ) होती है जिसे कर्क्यूमा केसिया (Curcuma caesia Roxb.) कहते हैं। इसकी गांठें काली सी धूसरित वर्ण की एवं चक्राकार कड़ों से युक्त होती हैं। अन्दर का भाग धूसर नील वर्ण का, अत्यन्त कड़ा एवं शृङ्ग के समान होता है। इनका स्वाद एवं गन्ध कर्पूर के समान होता है।

गुण और प्रयोग- इसके गुण कचूर की तरह होते हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों (Cosmetics- कॉसमैटिक्स ) में इसका उपयोग किया जाता है। इसका उबटन पसीना लाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल में इसकी ताजी गांठों का उपयोग हलदी की तरह किया जाता है।

अथ दारुहरिद्राया नामानि गुणांश्चाह

दार्वी दारुहरिद्रा च पर्जन्या पर्जनीति च । कटङ्कटेरी पीता च भवेत्सेव पचम्पचा ॥ सैव कालीयकः प्रोक्तस्तथा कालेयकोऽपि च ॥ २०१ ॥ पीतद्रुश्च हरिद्रुश्चपीतदारु' च पीतकम् । दार्वी निशागुणा किन्तु नेत्र कर्णामयरोगनुत् ॥

दारुहरदी के नाम तथा गुण-दार्वी, दारुहरिद्रा, पर्जन्या, पर्जनी, कटङ्कटेरी, पीता, पचम्पचा, कालीयक, कालेयक, पीतद्रु, हरिद्रु, पीतदारु और पीतक ये सब दारुहलदी के पर्यायवाची शब्द हैं। दारुहलदी-के गुण यद्यपि हलदी के समान ही होते हैं तथापि यह विशेषतः नेत्र, कर्ण तथा मुख- सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ २०१-२०२ ॥

________________________________________________________________ १. 'कपीतकमि'ति पाठान् चिन्त्यम् ।


हि०- दारुहलदी, दारुहरदी, दारहल्द । **बं०-**दारुहरिद्रा । **म०-**दारुहल्द, जरकि हलद । **गु०-**दारुहल्डर । **मा०-**दारुहलदी। **क०-**दोहा मरद रिसिन । **तै०-**मनिपसुपु । **ता०-**मर मञ्जल। **कुमा०-**चित्रा, कीलमोरा । **प०-**सुमलु । **ने०-**चित्रा । **फा०-**दार चोबद्द, फिलझरद् । **अ०-**दार हलक । **अं०-**Indian berberry (इण्डियन बरबेरी) । **ले०-**Berberis species (बर्बेरिस् की विभिन्न जातियां)। Fam. Berberidaceae (बर्बेरिडेसी) ।

दारुहलदी की १२-१३ जाति की कंटकित झाड़ियां अधिकतर हिमालय के पहाड़ों पर तथा आसाम में पाई जाती हैं। इनमें से चार जातियां मध्य तथा दक्षिण भारत (निल गिरी पर्वत) में पाई जाती हैं। छोटा नागपुर के पारसनाथ की पहाड़ी पर भी एक भेद पाया जाता है। इनमें से विशेषरूप से ब० अॅरिस्टेटा एवं ३, ४ अन्य पौधों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है जिनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। दारुहलदी के मूल, काष्ठ, कांड, फल (जिसे झारिष्क कहते हैं) एवं सत्व (रसौत) का व्यवहार किया जाता है। रसौत का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। झरिष्क-ये कलाई लिये लाल तथा सूखने पर काले अंगूर की तरह दिखलाई देते हैं। ये काले अंगूर से छोटे तथा अधिकांश में बीजहीन होते हैं। इनका स्वाद खट्टा या रुचिकर खटमिट्ठा होता है।

(क) Berberis aristata, DC. (बर्बेरिस् अॅरिस्टेटा, डीसी०)। **जौन०-**काशमोई । **गढ०-**किङ्गोरा । इसके क्षुप हिमालय पर्वत पर ६००० से १०५०० फीट की ऊँचाई पर एवं निलगिरी के पहाड़ों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप-बड़ा, पतनशील (Deciduous-डेसिड्युअस् ), कंटीला एवं साधारणतः ६ से १२ फीट तक ऊँचा लेकिन कभी कभी १५ फीट तक ऊँचा एवं ८ इञ्च व्यास के कांड से युक्त होता है। शाखाएँ-श्वेताभ या हल्के पीताभ धूसर वर्ण की होती हैं। पत्ते- १५-४ इञ्च लम्बे, ३-१ इञ्च चौड़े, अभिलट्वाकार, चर्मवत्, सूक्ष्म शिराओं से युक्त, सरल धार वाले या दूर दूर पर तीक्ष्ण कांटों से युक्त एवं उनका अधोपृष्ठ हल्के हरे रङ्ग का होता है। फूल-स्वर्ण-पीत पुष्प २-३ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-बीजिमांसल फल (Berry-बेरी), अण्डाकार, नीले बैगनी रङ्ग के चमकीले एवं रजावृत होते हैं। मूल-पीताभ बादामी, नलिकाकार, कुछ गांठदार, कड़े, मजबूत लेकिन लचीले, साधारणतः कटे हुये टुकड़ों के रूप में एवं थोड़े सी शाखाओं से युक्त होते हैं। छाल-अंदर से गहरे बादामी रङ्ग की, मुलायम एवं तोड़ने पर चूर्ण रूप में हो जाती है। काष्ठ-नींबू के समान पीतवर्ण का, स्पष्ट एवं संकरी मज्जक किरणों से युक्त, जिसमें मज्जक प्रायः नहीं होता और यदि हो तो चमकीले पीतवर्ण का होता है। इसके काष्ठ में ताजी अवस्था में हल्की गन्ध एवं इसका स्वाद कड़वा होता है। इसको कितना भी उबालें तो भी यह पीला ही रहता है।

(ख) B. asiatica, Roxb. ex DC. (ब० एशियाटिका, राक्सब. एक्स डीसी.) । **हि०-**किलमोरा, किंगोरा । **ने०-**माटे किस्सी, चित्रा । इसके क्षुप प्रायः २-८ हजार फीट के बीच या कभी कभी नीचे भी हिमालय की घाटियों में भूटान, गढवाल, बिहार, पारसनाथ की पहाड़ी तथा अफगानिस्तान आदि स्थानों पर पाये जाते हैं।