भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ भावप्रकाशनिघण्टुः
(२) आंवले का रस, हल्दी तथा मधु इसके प्रयोग से सभी प्रकार के प्रमेहों में अच्छा लाभ होता है। प्रदर में इसके साथ गुग्गुलु या रसांजन का प्रयोग करते हैं। (३) खुजली, पामा, दाद, शीतपित्त, उदर्द, फोड़े एवं विचर्चिका आदि रक्तविकार एवं चर्म- रोगों में यह बहुत लाभदायक है। इसके लिए हल्दी का चूर्ण गोमूत्र के साथ खिलाया जाता है एवं मक्खन के साथ स्थानीय लेप भी करते हैं। इसके विशेष योग हरिद्राखंड का १ तो० की मात्रा में नित्य कुछ समय तक लेने से उपर्युक्त विकारों में पर्याप्त लाभ होता है। (४) चूना या सज्जी खार हल्दी के साथ मिलाकर मोच, ऐंठन, चोट, पिच्चित व्रण एवं पुराने घावों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ हल्दी तथा मिश्री को खिलाते भी हैं। बिच्छू एवं सर्प आदि के काटने पर वेदना शान्ति के लिए इसका धूआं देते हैं। हल्दी एवं फिटकिरी (१ में २०) के सूक्ष्म चूर्ण का कर्णस्राव में कान में प्रधमन करते हैं। (५) सभी प्रकार के नेत्राभिष्यन्द के लिए यह बहुत लाभदायक है। एक भाग हल्दी २० भाग जल में उबाल कर छानकर उसे आंख में बार-बार डालते हैं जिससे आंख की वेदना कम होती है तथा कीचड़ आना भी कम होता है। इसके क्वाथ से रंगे हुए कपड़े का व्यवहार नेत्राच्छा- दन के लिए किया जाता है। (६) श्लीपद में इसको गुड़ एवं गोमूत्र के साथ प्रयोग कराया जाता है। (७) शिरःशूल एवं जोंक के काटने पर रक्तप्रवाह को रोकने के लिए इसका लेप लाभदायक है। चक्कर आता हो तो ताजी हल्दी का सिरपर लेप करने से लाभ होता है। घृतकुमारी के गूदे में इसको घिसकर शोथयुक्त अर्श पर लगाते हैं। (८) भूतोन्माद एवं योषापस्मार आदि में इसका धूआं दिया जाता है। (९) हल्दी के ताजे पत्तों का उपयोग मछली भूनने में एवं घृत की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए उपयोग में लाते हैं। ताजी हल्दी का अचार भी बनाया जाता है। मात्रा—चूर्ण २-४ माशा।
अथ कर्पूरहरिद्राया नामानि गुणांश्चाह दार्वीभेदा१ऽऽम्रगन्धा च सुरभीदारुदारु च। कर्पूरा पद्मपत्रा स्यात्सुरभीम२ सुरतारका ॥ आम्रगन्धिर्हरिद्रा या सा शीता वातला मता। पित्तहन्मधुरा तिक्ता सर्वकण्डूविनाशिनी ॥ कपूरहल्दी या आमाहल्दी के नाम तथा गुण—दार्वीभेदा (यह दारुहल्दी के भेद में है अतः दार्वीभेदा भी नाम है), आम्रगन्धा (आम के फल के समान गन्ध होने से आम्रगन्धा भी कहते हैं), सुरभीदारु, दारु, कर्पूरा, पद्मपत्रा सुरीमत और सुरतारका (पाठान्तर में सुरभी और सुरनायिका) ये सब आमाहल्दी के पर्यायवाचक शब्द हैं। जो हल्दी आम के फल के समान गन्ध वाली होती है वह शीतल, वातकारक, पित्त को दूर करने वाली, मधुर तथा तिक्त रसयुक्त एवं सब प्रकार की खुजली का नाश करनेवाली होती है ॥ १९८-१९९ ॥
६८-आमाहल्दी हिं०-अमिया हल्दी, आमाहल (र) द, आमाहलदी। बं०-आम आदा। म०-अम्बे हलद, अम्बा हलद। गु०-आम्बा हलदर। क०-हुली आरसीन। ते०-कारपुपुपु। ता०-पशु मंजल। १. 'दार्वीभेदे'ति पाठान्तरमसङ्गतम् । २. 'सुरभी सुरनायिके'ति पाठः ।
हरीतक्यादिवर्गः ११७ मा०-आंवा हलदी। पं०-अंबिया हलदी। फा०-दारचोबद् । अ०-दारहल्द । अं०-Mango ginger (मँगो जिंजर)। ले०-Curcuma amada Roxb. (कर्क्युमा अमाडा)। Fam. Zingiberaceae (झिंजिबेरेसी)। आमाहल्दी के क्षुप प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं पाये जाते हैं। बंगाल और कोंकण में इसकी खेती की जाती है। इसका डंठल मोटा होता है। कन्द-हल्दी की गाँठों से बड़े बड़े, आर्द्रक के समान, हल्के पीले रंग के एवं आम्र की तरह गन्धयुक्त होते हैं। क्षुप-२-३ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-१-१॥ फुट लम्बे, ५-१ इञ्च चौड़े, आयताकार दीर्घवृत्ताकार और नुकीले होते हैं। फूल-फीके पीले रंग के आते हैं। गाँठों को छोटे छोटे टुकड़े कर सुखा लेते हैं। डा० देसाई लिखते हैं कि बम्बई में आमाहल्दी नाम से जो गाँठें बिकती हैं वे वनहरिद्रा की होती हैं। कुछ विद्वानों ने आमाहल्दी का ले० नाम वनहरिद्रा वाला लिखा है। आमाहल्दी का बंगाल में अधिक प्रयोग होता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक उड़नशील तैल, राल, शर्करा, गोंद, स्टार्च, ॲल्ब्यूमि- नॉइड्स, ऑर्गेनिक अम्ल तथा राख आदि पदार्थ प्राप्त होते हैं। गुण और प्रयोग—यह वातानुलोमक, शीतल, सुगन्धि, दीपन, पाचन एवं ग्राही है। इसके गुण आर्द्रक के समान दीपन एवं वातानुलोमक हैं लेकिन आर्द्रक उष्ण है और यह शीतल है। इसका उपयोग हल्दी के स्थान पर किया जाता है। सुगन्धित होने के कारण इसे चटनी आदि में उपयोग में लाते हैं। मिठाइयों में आम की गन्ध लाने के लिये इसके फांट का व्यवहार करते हैं। चोट एवं खुजली आदि में इसका लेप किया जाता है। लताकरञ्ज के पत्र रस के साथ कृमि रोग में इसका उपयोग किया जाता है। मात्रा—चूर्ण २-४ माशा । =
अथ वनहरिद्राया नामगुणानाह अरण्यहल्दीकन्दः कुष्ठवातास्रनाशनः ॥ २०० ॥ वनहरदी के गुण—वनहलदी का कन्द-कुष्ठ तथा वातरक्त का नाशक होता है ॥ २०० ॥ ६९ वनहलदी हिं०-वनहरदी, वनहलदी, जंगली हल्दी। बं०-वनहलुद, वनहलद। म०-वेडीहलद, रान- हलद। क०-काडरसन। ते०-अडवि पसुपु, कस्तुरि पसुपु,। ता०-कस्तुरि मंजल। गु०-वनह- लदर, कपूरकाचली। पं०, मा०-जंगली हल्दी। मला०-कट्टुमञ्जल। अं०-Wild turmeric (वाइल्ड टर्मेरिक्); Yellow zedoary (यलो झिडोरी); Cochin turmeric (कोचीन टर्मेरिकू)। ले०-Curcuma aromatica Salisb. (कर्क्युमा ॲरोमॅटिका)। Fam. Zingi- beraceae (झिंजिबरेसी)। वनहलदी—इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में कहीं न कहीं पाई जाती है। विशेषकर बंगाल एवं दक्षिण के कोचीन, मैसूर, अल्वार आदि स्थानों में अधिक देखने में आती है। इसका क्षुप वर्षजीवी होता है। गरमी में इसका क्षुप सूख जाता है किन्तु भूमि के भीतर इसकी गाँठें जीवित रहती हैं और वर्षा ऋतु में वे अंकुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। पत्ते जब कोमल अवस्था के होते हैं तब उनके बीच का भाग जामुनी रंग का होता है। जब यह अंकुरित होता है