भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१२० भावप्रकाश निघण्टुः इसका क्षुप करीब ८ फीट ऊँचा होता है। शाखायें धूसर वर्ण की होती हैं। इसकी पत्तियां अण्डाकार या लटवाकार आयताकार, १-२ १/२ इन्च लम्बी एवं चर्मवत् होती हैं। पत्तियों का शिराजाल ऊपरी पृष्ठ पर घना तथा दृढ होता है। पुष्प-मंजरियों में निकलते हैं। इसके फल कृष्ण नील होते हैं। (ग) B. lycium, Royle. (ब० लाइसियम्, रायलि.)। हि०-चतरोई, काशमल, दारुहरिद्रा । इसके क्षुप ३-७ हजार फीट की ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय में गढवाल से हजारा तक एवं चकरौता तथा मसूरी के नीचे विशेषरूप में प्राप्त होते हैं। ये छोटे एवं समूहबद्ध होकर आते हैं। इसके पत्ते प्रायः पतले तथा लम्बे होते हैं एवं शिराजाल घना नहीं होता। इसके फल विशेष मांसल नहीं होते। रासायनिक संगठन - बर्बेरिस की विभिन्न उपजातियों में कम से कम आठ प्रकार के विभिन्न क्षाराम पाये गये हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- बर्बेरिन् ( Berberine), (ऑक्सिअँर्क- न्थाइन् ( Oxyacanthine ), बर्बेमाइन् (Berbamine ), पामैटाइन (Palmatine ), जंट्रोहीझाइन् (Jatrorrhizine ), कोलंबमाइन् (Columbamine ), बर्बेरूबाइन् (Berberru- bine ) एवं हाइड्रैस्टाइन् (Hydrastine) । इनमें से प्रथम तीन विशेष महत्व के हैं तथा शेष विभिन्न अन्य वनस्पतियों के विशिष्ट क्षाराम हैं। बर्बेरिन् ( Berberine, $C_{20} H_{19} NO_5$ ), शीत जल में घुलनशील, मद्यसार में कम घुलनशील, पीतवर्ण का एवं सूइयों के आकार का क्षाराम है। यह काष्ठ एवं छाल की अपेक्षा मूल में अधिक होता है। यह क्षाराम और भी कई वनस्पतियों में पाया जाता है। इसके लवण भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कषाय द्रव्य, गोंद एवं स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में मॅलिक् ( Malic), टार्ट्रिक् ( Tartric ) एवं साइट्रिक् ( Citric) अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग - दारुहल्दी के मूल एवं काष्ठ बल्य, तिक्त पौष्टिक, दीपन, पाचन, ग्राही, पित्तविरेचक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, श्लेष्मघ्न, रसायन एवं त्वक दोषहर हैं। इसका उपयोग मलेरिया आदि विषम ज्वर, कुपचन, फिरङ्ग, गण्डमाला, अपची, त्वकदोष, भगंदर, प्रदर, अत्यार्त्तव, व्रण, गर्भिणीवमन, यकृत्प्लीहावृद्धि, कामला एवं सर्पदंश आदि में किया जाता है। (१) मलेरिया तथा अन्य विषमज्वरों में इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। ज्वर के साथ हृल्लास, वमन, विरेचन, शिरःशूल एवं थकावट अधिक होती है तब इसके क्वाथ का उपयोग रसौत की अपेक्षा अच्छा होता है। ज्वर में इसके पूर्व विरेचन देना चाहिये। इससे पसीना होकर ज्वर उतर जाता है। क्विनीन की तरह हृदयावसाद एवं बाधिर्य आदि इससे नहीं होते तथा प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। ज्वर अच्छा होने के पश्चात् इसके उपयोग से भूख आदि बढ़ती हैं। यद्यपि उपर्युक्त गुणों के लिये इसका उपयोग किया जाता रहा लेकिन नवीन प्रयोगों से देखा गया कि इसके क्षाराम बर्बेरिन् सल्फेट (Berberine Sulphate ) को १५-३५ ग्रे० की मात्रा में दिन में ३ बार ३ दिन तक देने पर भी किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। मलेरिया में इससे एक लाभ अवश्य होता है कि इसके देने से प्लीहा आदि धातुओं में छिपे हुये मलेरिया के कीटाणु रक्त में आ जाते हैं जिससे रक्त परीक्षा में दिखलाई देने से निदान में आसानी होती है। क्विनीन के साथ ज्वर की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक है।


हरीतक्यादिवर्गः १२१ (२) बर्बेरिन् (Berberine ) - यह क्षाराम अत्यंत विषैला नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में देने से अवश्य विषैला है एवं मृत्यु भी हो सकती है। इसका प्रचूषण आन्त्र एवं सूचिकाभरण द्वारा हो सकता है। बिल्ली एवं कुत्तों को उनके वजन के प्रति किलोग्राम के लिये २ मिलीग्राम की मात्रा में देने से हृदय पर अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। यह क्रिया उन्हीं अंगों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव से एवं प्राणदा (Vagus = वागस) नाडी की उत्तेजना से होती है। प्राणियों में मृत्युत्तर परीक्षण द्वारा देखा गया कि इससे फुफ्फुसों में अत्यन्त रक्ताधिक्य एवं हृदय के अलिन्दों (Auricle = ऑरिक्ल) का विस्फार होकर मृत्यु होती है। इससे वृक्कों में शोथ एवं रक्तस्राव होता है तथा इससे केन्द्रीय वातनाडीसंस्थान के कन्दों की कोशाओं को नुकसान पहुँचता है। यह श्वसन के लिये भी अवसादक है लेकिन १-१० मिलीग्राम की मात्रा में यह आन्त्र, गर्भाशय एवं श्वसनिका की अनैच्छिक मांसपेशियों को उत्तेजित करता है जिससे श्वसनका में संकोच उत्पन्न होता है। साधारण मात्रा में हृदय पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे हृदय की पोषक रक्त- वाहिनियों में रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में देने पर यह अवसादक है। इससे श्वेतकणों की वृद्धि होती है। मलेरिया में निदान की दृष्टि से प्रोद्दीपक रूप में (Provoca- tive dose-प्रोहोकेटिह डोज) इसका उपयोग लाभदायक है जिससे छिपे हुये कीटाणु रक्त में आजाते हैं तथा रक्तपरीक्षण में दिखलाई देने लगते हैं। यह चर्म के नीचे की धातुओं ए श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्पृञ्जनकारक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है। क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरेस (प्रोटोप्लाज्म - Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लीशमॅनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संवर्धन की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियन्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है। बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट ५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है। साधारणतः ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्गों की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं। यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक, (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये। चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये। इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है। (३) दारुहल्दी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हृल्लास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है। बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आंवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं। गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है। कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal-बॅक्टेरिसाइडल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है। (४) दारुहल्दी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबाल कर बेचते हैं। झाडकी

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