भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१२२ भावप्रकाशनिघण्टुः हल्दी (Coscinium fenestratum (Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रैटम्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर ३-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रैन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ॥ रसाञ्जनं ताक्ष्यंशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ॥२०४॥ उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ॥ २०५ ॥ दारूहल्दी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारूहल्दी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डाल कर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्थ्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट काट कर अलग करने वाला ), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है ॥ २०३-२०५ ॥ ७१ रसौत हि०-रसोत, रसौत, रसवत । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०- रसांजन । ते०-रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजह्र । अ०-हुलुज़ोर्हिदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रेक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रेक्टम् बर्बेरिस्) रसोत-कालापन लिये भूरे रङ्ग की, गोंद के समान मुलायम तथा पानी और मदिरा में घुलने वाली दारूहल्दी के क्वाथ और बकरी के दूध से बनी हुई औषधि है। इसका स्वाद कड़वा तथा कसैला होता है। इसको बनाने के लिये वर्षा के आखिर में इसके क्षुप को काट कर उसके पंचांग का क्वाथ बना कर बाद में उसे गाढ़ा बनाते हैं। कुछ लोग क्वाथ में बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाकर फिर गाढ़ा करते हैं। इस बात में मतभेद है कि रसोत केवल ब० लाइसियम् के मूल एवं काष्ठ से बनता है या ब० एशियाटिका से या दोनों से । बाजार में बिकने वाला रसौत प्रायः दोनों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी, मिट्टी आदि पदार्थ मिले रहते हैं। इसलिये इसे १० गुने गरम जल में मिलाकर छान कर सुखाते हैं एवं बचे हुये भाग में मद्यसार मिलाकर छानकर उस मद्यसार को ऊर्ध्वपातन यन्त्र द्वारा अलग कर गाढ़े भाग को उपर्युक्त जल से सुखाये गाढ़े भाग में मिलाकर बन्द शीशी में रखकर काम में लाते हैं । गुण और प्रयोग-यह कड़वा पौष्टिक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, अर्शोन, शोधन, रक्तशोधक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक एवं नेत्रविकारहर है। इसका आन्तरिक उपयोग ज्वर, यकृत् प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श, एवं आमाशय तथा पक्वाशय के व्रण (Gastric & duodenal ulcer-गैस्ट्रिक् अँड डयुओडेनल अल्सर ) में लाभदायक है। इसका बाह्य प्रयोग अर्श, प्राच्यव्रण, कटे हुये भाग, फोड़े फुन्सियां एवं पुराने व्रण आदि में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः /१२३ ( १ ) विषमज्वर के सभी प्रकारों में इसको १५-२० दिन में ३ बार जल के साथ देते हैं। क्वाथ की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा होता है। इससे ज्वर का शमन होकर प्लीहा वृद्धि भी कम होती है। इसके प्रयोग में पहले विरेचन देना चाहिये तथा इसकी पूर्ण मात्रा खाली पेट पर देनी चाहिये। औषधि लेने के पश्चात् रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर सुलाना चाहिये । थोड़ी देर में रोगी को प्यास मालूम पड़ती है तथा जी घबड़ाने लगता है लेकिन उसको जल पीने न दें। एक घण्टे में पसीना निकलने लगता है तथा कमजोरी मालूम होती है। उसके बाद शरीर पोंछ कर लाजमण्ड या चावल का मांड और दूध पीने को दें। इसके बाद रोगी प्रायः सो जाता है तथा उस दिन ज्वर की पारी नहीं आती। इस प्रयोग में एक दोष यह है कि रोगी को कभी पहले रक्तातिसार हुआ हो तो वह फिर उमड़ जाता है। ( २ ) नये एवं पुराने नेत्राभिष्यन्द में इसको पलकों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ इसमें अफीम, सैन्धव एवं फिटकिरी मिलाई जा सकती है । ( ३ ) रक्तार्श में इसको २ से ८ १० मक्खन के साथ खिलाया जाता है एवं इसके घोल ( ३२ में १ ) से अर्श को धोते हैं । ( ४ ) कपूर एवं मक्खन के साथ बना इसका मलहम फोड़े, फुन्सियां, कटे हुये भाग एवं पुराने घावों पर लाभदायक है। मधु के साथ मिलाकर मुख के अन्दर के व्रणों पर एवं अन्य व्रणों पर लगाते हैं। शोथ पर इसके लेप से लाभ होता है। मुखरोग में इसके घोल से गण्डूष कराते हैं । प्राच्यव्रण के लिये भी यह लाभदायक है क्योंकि इसमें क्षाराम की पर्याप्त मात्रा रहती है । मात्रा-३-२ मा०। अथ बाकुची । तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह अवल्गुजॊ बाकुची स्यात्सोमराजी सुवर्णिका । शशिलेखा कृष्णफला सोमा पूतिफलीति च ॥ २०६ ॥ सोमवल्ली कालमेषी कुष्ठघ्नी च प्रकीर्तिता । बाकुची मधुरा तिक्ता कटुपाका रसायनी ॥ विष्टम्भहृद्धिमा रुच्या सरा श्लेष्मास्रपित्तनुत् । रूक्षा हृद्या श्वासकुष्ठमेहज्वरकृमिप्रणुत् ॥ २०८ ॥ तत्फलं पित्तलं कुष्ठकफानिलहरं कटु । केश्यं त्वच्यञ्च १मिश्रासकासशोथामपाण्डुनुत् ॥२०९॥ बाकुची के नाम और उसके तथा उसके फल के गुण - अवल्गुज, बाकुची, सोमराजी, सुवर्णिका, शशिलेखा, कृष्णफला, सोमा, पूतिफली, सोमवल्ली, कालमेषी और कुष्ठघ्नी ये सब बाकुची के नामा- न्तर हैं। बाकुची-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, रसायन, विष्टम्भ को दूर करने वाली, शीतवीर्य, रुचिजनेक, सारक (दस्तावर), कफ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है तथा यह रूक्ष, हृदय के लिए हितकर तथा श्वास, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर और कृमि को नष्ट करने वाली होती है। इसका फल-पित्तकारक, कुष्ठ, कफ और वात को दूर करने वाला, कटुरसयुक्त, केश तथा त्वचा के लिए हितकारी होता है तथा कृमि, श्वास, कास, शोथ आम और पाण्डु इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है ॥ २०६-२०९ ॥ १. पाठ० वमिश्रास ।