भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१२४ भावप्रकाशनिघण्टुः ७२ बाकुची हि०-बाकुची, बकुची, बावची, बावंची, सोमराजी । बं०-लताकस्तूरी, हाकुच । म०-बावची । गु०-बावची, बावची । क०-बाउचिंगे । ते०-भवंचि, कालाजिउजा । ता०-कर्पोकरशि । फा०-बाव- कुचि । अं०-Psoralea seed (सोरैलिया सीड); Malaya tea (मलाया टी) । ले०-Psoralea corylifolia, Linn. ( सोरैलिया कोरिलीफ़ोलिया, लिन. ) । Fam. Leguminosae ( लेग्यु- मिनोसी) । बाकुची-प्रायः सब प्रान्तों के जंगली झाड़ियों में तथा खादर अथवा कंकरीली भूमि में उत्पन्न होती है एवं सिलोन में भी प्राप्त होती है। अमेरिका में भी इसकी कई उपजातियां होती हैं जिनके गुण भी इसी के समान हैं । इसका क्षुप-१-४ फीट तक ऊँचा, वर्षायु एवं स्वावलम्बी होता है । पत्ते-१-३ इञ्च के घेरे में छोटी अरणी के पत्तों के समान गोलाकार होते हैं। ये नालयुक्त, कड़े, चिकने, लहरदार दन्तुर एवं इनके दोनों पृष्ठों पर काले धब्बे होते हैं। इन ग्रन्थियों के चिह्न शाखाओं पर भी होते हैं। १०-२० छोटे, नीले बैगनी रंग के पुष्प-१ से २ इञ्च लम्बे पुष्पद्ण्ड पर आते हैं। फली-छोटी, गोल, काली, चिकनी, एक बीज युक्त, अस्फोटी एवं फलभित्ति बीज से चिपकी होती है। बीज- बाकुची वास्तव में फल ही है जिसकी फलभित्ति बीजावरण से चिपकी रहती है। यह अण्डाकार, आयताकार, कुछ चिपटे, चिकने, अग्र की तरफ नुकीले, काले रंग के एवं महीन गर्तों से युक्त होते हैं तथा तालद्वारा बड़ा करके देखने पर नहाने के स्पञ्ज की तरह दिखलाई देते हैं। इसको चबाने पर एक तीव्र गन्ध आती है तथा इनका स्वाद कडवा, तीता एवं दाहजनक होता है। औषधि कार्य में इनका तथा इनसे निकले तैल का व्यवहार किया जाता है। नोट-कुछ विद्वानों ने सोमराजी नाम से ले० हर्नोनिया अंथेलमिंटिका ( Vernonia anthe- Imintica Willd. ) का ग्रहण किया है लेकिन वह नाम तो अरण्यजीरक का है जिसका वर्णन परिशिष्ट में किया गया है । रासायनिक संगठन-बाकुची के फलों में राल, उड़नशील तैल, तारपीन की तरह तैल, स्थिर तैल, एवं सोरैलेन् (Psoralen) तथा आइसो-सोरैलेन् (Iso-psoralen) नामक दो रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं । बाकुची के कृमिघ्न तथा त्वच्य गुण इन्हीं रवेदार पदार्थों के मिश्रण से हैं । यह तैल में घुलने वाले (फ्यूरोकाउमरिनस्-Furocoumarins ) हैं । प्रथम सोरैलेन अंजीर से प्राप्त होने वाले फिक्युसिन् (Ficusin ) के समान होता है । इसकी फलभित्ति (Pericarp पेरीकार्प) से सोरैलिडिन् ( Psoralidin ) नामक एक अन्य रवेदार पदार्थ भी प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह सौम्य उत्तेजक, वातनाड़ियों के लिए बल्य, कृमिघ्न, त्वग् दोषहर, व्रण शोधक, व्रणरोपक, मृदुविरेचक, मूत्रल, स्वेदल एवं वृष्य है। इसका अन्त: बाह्य प्रयोग श्वित्र, कुष्ठ, पामा, कण्डू, गजचर्म ( सोरियासिस-Psoriasis ) एवं चर्म के अन्य शोथयुक्त विकारों में किया जाता है । (१) श्वित्र में चौथाई भाग हरताल के साथ गोमूत्र में पीस कर इसका लेप लाभदायक होता है । खैर एवं आंवले के क्वाथ के साथ इसके चूर्ण का सेवन भी लाभदायक है । सालभर तक यदि बाकुची एवं काले तिल का सेवन करें तो सभी प्रकार के कुष्ठ अच्छे होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है । इसको जल के साथ पीस कर भी लेप किया जा सकता है । नवीन तथा युवावस्था के श्वेत कुष्ठ रोग में शीघ्र लाभ होता है किन्तु अधिक दिन तक लगाना पड़ता है । इससे दाग लाल हो जाते हैं ।

हरीतक्यादिवर्गः १२५ ( २ ) बाकुची में रहने वाला तैल ही प्रधान कार्यकारी भाग है। यह तैल चर्म के ऊपर रहने वाले मालागोलाणुओं ( Streptococci ) के लिये घातक है। अंतस्त्वचीय धमनिकाओं के ऊपर इसका निश्चित प्रभाव पड़ता है जिससे इनका विस्फार होकर वहां रक्तरस ( Plasma-प्लाज्मा ) का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे चर्म लाल हो जाता है तथा रञ्जक कोषों (मेलैनोब्लास्टस्-Mela- noblasts ) को उत्तेजना मिलकर रञ्जक का निर्माण होता है । यह रञ्जक, सफेद दागों में फैलकर उसका वर्ण परिवर्त्तन कर देता है । अधिकांश लोगों में इससे सफेद दाग लाल हो जाते हैं लेकिन कुछ (५%) लोगों में इससे छाले पड़ जाते हैं इसलिए इसको अन्य चीजों के साथ आवश्यक प्रमाण में मिश्रण कर लेना चाहिये जिससे दागों में केवल लाली आ जाय । श्वित्र के साथ-साथ यदि अन्य आंत्रिक विकार जैसे आमातिसार आदि हों तो उनकी भी चिकित्सा साथ-साथ करनी चाहिये । ( ३ ) फिरंगोत्तर श्वित्र में बाकुची के तैलीय राल सदृश सत्व ( Oleo-resinous extract) का लेप लाभदायक होता है। इस सत्व में सोरैलेन् तथा आइसो-सोरैलेन् दोनो ही रहते हैं। इसको चाँलमोगरा के तेल के साथ मिलाकर लगाया जाता है तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं जिससे श्वित्र, सिध्म तथा सोरियासिस् में लाभ होता है। लगाने के लिये इसके साथ २ भाग चाँलमोगरा का तेल तथा २ भाग लॅनोलिन् मिलाकर मलहम बनाकर दिन में एक, दो बार दागों पर मलना चाहिये । करीब ३ महीने में लाभ होता है । मात्रा-बीज चूर्ण १-३ माशा । अथ चक्रमर्दः (चकवड़) । तस्यै नामानि तत्फलस्य च गुणांश्चाह चक्रमर्दः प्रपुन्नाटो दद्रुघ्नो मेषलोचनः । पद्द्माटः स्यादेड गजश्ची पुन्नाट इत्यपि ॥२१०॥ चक्रमर्दो लघुः स्वादू रूक्षः पित्तानिलापहः । हद्यो हिमः कफश्वासकुष्ठदद्रुकृमीन्हरेत् ॥२११॥ हन्त्युष्णं तत्फलं कुष्ठकण्डूदद्रुविषानिलान् । गुल्मकासकृमिश्र्वासनाशनं कटुकं स्मृतम् ॥२१२॥ चकवड़ के नाम और उसके तथा उसके फल के गुण-चक्रमर्द, प्रपुन्नाट, दद्रुघ्न, मेषलोचन, पद्माट, एडगज, चक्री और पुन्नाट ये सब चकवड़ के नामान्तर हैं। चकवड़-लघु, स्वादिष्ठ, रूक्ष, पित्तवात (वातपित्त) नाशक, हृदय के लिए हितकर, शीतवीर्य, कफ, श्वास, कुष्ठ, दद्रु (दाद) और कृमि को नष्ट करने वाला होता है। चकवड़ का फल-उष्णवीर्य और कटु रस युक्त होता है एवम् कुष्ठ, खुजली, दाद, विष, वायु, गुल्म, कास, कृमि और श्वास इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है ॥ २१०-२१२ ॥ ७३ चकवड़ हि०-चकवड़, पवांड, पवांर । बं०-चकुन्द्रा, पनेवार । म०-तरोटा, टाकला । गु०-कुंवाडीयो । क०-तगचे । ते०-तगिरिस । ता०-उशिदुगरै । पं०-पंवार, चकुन्दा । फा०-संगसतुया । अ०- कुल्ब । अं०-Fetid cassia (फ़ीटिड कॅशिया) । ले०-Cassia tora Linn. (कॅशिया टोरा, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल, झाड़ी, खेत, मैदान, कूड़ा करकट, सड़क के किनारे एवं गन्दे स्थानों में आप ही आप उत्पन्न होता है। इसका २-५ फीट तक ऊँचा एकवर्षायु क्षुप वर्षा ऋतु में बहुतायत से उत्पन्न होता है। पत्र- संयुक्त पक्षकार और पत्रक तीन जोड़े, अभिलट्वाकार, १-२ इञ्च लंबे, चिकने, मचकीले, दुर्गन्ध

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