भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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१२६ भावप्रकाशनिघण्टुः युक्त एवं स्पष्ट शिराजाल से युक्त होते हैं। इसके निचले पत्रकों के बीच में एक ग्रन्थि होती है। पुष्प-छोटे पीले रंग के अक्षकोणीय एवं दो-दो के जोड़े में आते हैं। फलियां-४-८ इञ्च लम्बी, पतली, चौकोनी, कुछ मुड़ी हुई तथा इनका अग्र नुकीला होता है। बीज-बहुत, कड़े एवं मेथी के समान होते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग बनाया जाता है तथा औषधि में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। इसी का एक दूसरा भेद है जिसे कॅशिया ऑब्च्यूसिफोलिया ( Cassia obtusifolia ) कहते हैं। इसका क्षुप भी ऊपर के क्षुप के समान ही होता है लेकिन इसमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा इसके आधारीय पत्रकद्वय के बीच में एक ग्रन्थि होती है। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में इमोडिन (Emodin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है जो क्राइसोफेनिक एसिड ( Chrysophanic acid) की तरह होता है। इसके पत्तों में कॅथार्टिन (Cathartin) नामक एक विरेचक द्रव्य तथा लाल रंग होता है। गुण और प्रयोग—इसके बीज बल्य, दीपन, पाचन एवं त्वक् दोषहर होते हैं तथा पत्र विरेचक, कृमिघ्न एवं पार्यायिक ज्वरहर होते हैं। (१) इसके बीज की क्रिया त्वचा पर होती है। दाद, खुजली, कुष्ठ, सिध्म, पामा एवं छाजन ( एक्झिमा ) आदि में यह बहुत लाभदायक है। जिन रोगों में त्वचा मोटी हो जाती है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। दाद में मूली के पत्ते के साथ या नींबू के रस के साथ या करंज के तेल के साथ पीस कर इसे लगाया जाता है। छाजन में मट्ठे के साथ पीस कर लगाते हैं। सिध्म के लिये कांजी में पीसकर लगाना चाहिये । व्रणवस्तु के स्थान पर उत्पन्न होनेवाली तन्तु युक्त गांठों (कीलॉयड-Cheloid) के लिये इसके बीजों को सेहुंड के दूध में भिगोकर फिर गोमूत्र में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। अर्धावभेदक आदि शिरोरोग में कांजी के साथ इसका लेप उपयोगी है। इसका सेवन कॉफी के रूप में भी किया जाता है। (२) इसके पत्तों का क्वाथ बच्चों के विकारों में विशेषकर दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर मृदु विरेचक के रूपमें दिया जाता है। इसका रस भिलावे से उत्पन्न दाह पर लगाया जाता है। इसका पोल्टिस बनाकर फोड़ों पर बांधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं एवं वातरक्त, गृध्रसी तथा संधिवात में भी इनके बांधने से वेदना कम होती है। इसके पत्तों को एरण्ड तैल में भूनकर दुर्गंध युक्त व्रणों में पुल्टिस के रूप में प्रयोग से लाभ होता है। मात्रा—बीज चूर्ण १-२ माशा। अथातिविषा (अतीस )। तस्या नामगुणानाह विषा त्वतिविषा विश्वा शृङ्गी प्रतिविषाऽरुणा । शुक्लकन्दा चोपविषा भङ्गुरा घुणवल्लभा ॥ विषा सोष्णा कटुस्तिक्ता पाचनी दीपनी हरेत् । कफपित्तातिसारामविषकासवमिक्रिमीन् ॥ अतीस के नाम तथा गुण—विषा, अतिविषा, विश्वा, शृङ्गी, प्रतिविषा, अरुणा, शुक्लकन्दा, उपविषा, भङ्गुरा और घुणवल्लभा ये सब अतीस के नाम हैं। अतीस—उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरस युक्त, पाचक तथा अग्निदीपक होती है एवम् कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, कास, वमन और कृमि इन सब रोगों को दूर करनेवाली होती है ॥ २१३-२१४ ॥


हरीतक्यादिवर्गः १२७ ७४ अतीस हि०-अतीस । बं०-आतइच । म०-अतिविष । पं०-अतीस । ते०-अतिवस । क०-अतिविषा । गु०-अतिवखनी कली । ता०-अतिवदयम । भोटि०-अइस । अं०-Indian Atees (इन्डियन् अतीस ) । ले०-Aconitum heterophyllum, Wall. (एकोनाइइटम् हेटरोफाइलम्, वाल. ); Fam. Ranunculaceae (रॅनन्क्युलेसी) । यह हिमालय पहाड़ में कुमाऊँ से हसोरा तक शिमला और इसके आस पास में तथा चम्बा प्रान्त में ६ से १५ हज़ार फुट ऊँची चोटियों पर पाया जाता है। इसका क्षुप-२ से ४ फीट ऊँचा होता है। काण्ड-गोल, सीधा तथा विभिन्न आकार वाली पत्तियों से घिरा होता है। पत्र-नीचे के पत्तों के फलक प्रायः पाँच विच्छेदों से युक्त एवं गोलाई लिये हुये ताम्बूलाकार या लट्वाकार-ताम्बूलाकार होते हैं। ऊपर के पत्ते छोटे तथा धार पर दन्तुर होते हैं। पुष्प-नील अथवा हरितनील, १ से १॥ इञ्च लम्बे एवं चमकीले होते हैं। आभ्यंतर पुट का एक दल सबसे बड़ा और फणाकार होता है। मूल-मूल में दो कन्द होते हैं जिनमें एक पिछले वर्ष का और दूसरा नये वर्ष का होता है। नवीन कन्द लम्बगोल या शंक्वा- कार, हाथी की सूँड की तरह, १ इञ्च लम्बा तथा ½ से ३/४ इञ्च मोटा होता है। कन्दत्वक्-पतली तथा श्वेताभ, फीके राख के रङ्ग की तरह होती है। कन्द-स्वाद में अत्यंत कडुवा, आसानी से टूट जाने वाला और भीतर से श्वेत तथा पिष्टमय पदार्थ से युक्त रहता है। इसे तोड़ने पर श्वेत मध्य भाग के चारों तरफ ४ काले धब्बे दिखलाई देते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती। इसमें कीड़े बहुत जल्दी लग जातें हैं तथा कीड़े लगने पर यह निःसत्व हो जाता है इसलिये औषधि में बिना कीड़े लगे हुये अच्छे मूलकन्द का ही व्यवहार करना चाहिये । अन्य निघण्टुकारों ने वर्ण भेद से इसके २, ४ भेद लिखे हैं लेकिन आजकल केवल एक ही भेद और मिलता है। जिसका वर्णन नीचे दिया गया है। ( क ) Aconitum palmatum D. Don ( एकोनाइटम् पामैटम् ) हि०-वखमा । सं०- प्रतिविषा । इसके क्षुप पूर्वी हिमालय में सिक्किम, गुर्वाल तथा मिश्री पर्वतों में पाये जाते हैं। इसके मूल अतीस की अपेक्षा अधिक लम्बे, कम मोटे, तोड़ने में सख्त, अधिक काले रङ्ग के तथा वजन में बहुत भारी होते हैं। इन पर गाँठें होती हैं। गुण आदि में यह अतीस के समान ही है। रासायनिक संगठन—वत्सनाभ वर्ग की औषधि होने पर भी यह विषैली नहीं है। इसमें एक अत्यन्त कडवा बिना रवेदार क्षाराम अतीसिन ( Atisine ) होता है जो विषैला नहीं है। इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक एसिड (Aconitic acid), टैनिक एसिड, अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ, वसा तथा ओलिइक, पामिटिक एवं स्टियारिक ग्लिसराइड्स (Oleic, Palmitic and Stearic Glycerides) के मिश्रण तथा गोंद, इक्षु शर्करा एवं राख २% आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—अतीस दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ग्राही, वृष्य, बल्य एवं विषमज्वरहर है। इसके सेवन से शरीर की विनिमय क्रिया सुधरती है। इसको ४-८ माशा देने पर भी विषैला परिणाम नहीं होता । इसका प्रयोग आमातिसार, विषमज्वर, कास, वमन, कुपचन, शूल, नवीन शोथयुक्त विकार एवं बालरोगों में किया जाता है।

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