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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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११८ \quad भावप्रकाशनिघण्टुः \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad हरीतक्यादिवर्गः \quad ११६

\quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad \quad ७० दारुहलदी

तभी इसमें फूल आते हैं । जड़ के नीचे काला सा पीले रंग का कन्द होता है । अच्छी खाद आदि होने से ये कन्द काफी बड़े होते हैं । साधारणतः बीच की गांठें अण्डे के समान, २ इञ्च से बड़ी, कालीसी चक्राकार कड़ों से युक्त तथा अनेक मोटी उपमूलों से युक्त होती हैं। उपमूलों के अंतिम भाग में बदाम के बराबर नारंगपीत गांठे होती हैं। बीच की गांठों के बगलवाली गांठें अंगुली सदृश मोटी होती हैं तथा उनसे थोड़े से मांसल मूल निकले रहते हैं। जंगली हरदी का अन्दर का भाग गाढ़े नारंगी रंग का; गन्ध हरदी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हल्लासकारक होता है। हरदी के स्थान में रंगने के काम में यह आती हैं। त्रावण- कोर में इससे तिखुर निकालते हैं।

रासायनिक संगठन- हरिद्रा के समान ।

गुण और प्रयोग- इसके गुण हलदी की ही तरह होते हैं। रक्तविकार एवं चर्मरोगों में अन्य औषधियों के साथ इसका व्यवहार किया जाता है। (१) सर्पविष में जंगली हलदी, कुष्ठ, अजवायन तथा मैनसिल का धूम दिया जाता है। (२) विस्फोटक ज्वरों में दानों को बाहर निकालने के लिये इसे २-४ र० खिलाते हैं तथा इसका बाह्यलेप भी करते हैं। (३) खुजली, चोट, सूजन एवं मोच आदि में इसका लेप अथवा इससे सिद्ध तैल का व्यवहार किया जाता है। (४) शिरःशूल में लोहबान के साथ इसे घिसकर लेप करते हैं। मात्रा- १-२ मा० ।

नोट- उपर्युक्त हरिद्राओं के अतिरिक्त बंगाल में एक कालीहलदी (नरकचूर, नीलकण्ठ ) होती है जिसे कर्क्यूमा केसिया (Curcuma caesia Roxb.) कहते हैं। इसकी गांठें काली सी धूसरित वर्ण की एवं चक्राकार कड़ों से युक्त होती हैं। अन्दर का भाग धूसर नील वर्ण का, अत्यन्त कड़ा एवं शृङ्ग के समान होता है। इनका स्वाद एवं गन्ध कर्पूर के समान होता है।

गुण और प्रयोग- इसके गुण कचूर की तरह होते हैं। सौन्दर्य प्रसाधनों (Cosmetics- कॉसमैटिक्स ) में इसका उपयोग किया जाता है। इसका उबटन पसीना लाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है। बंगाल में इसकी ताजी गांठों का उपयोग हलदी की तरह किया जाता है।

अथ दारुहरिद्राया नामानि गुणांश्चाह

दार्वी दारुहरिद्रा च पर्जन्या पर्जनीति च । कटङ्कटेरी पीता च भवेत्सेव पचम्पचा ॥ सैव कालीयकः प्रोक्तस्तथा कालेयकोऽपि च ॥ २०१ ॥ पीतद्रुश्च हरिद्रुश्चपीतदारु' च पीतकम् । दार्वी निशागुणा किन्तु नेत्र कर्णामयरोगनुत् ॥

दारुहरदी के नाम तथा गुण-दार्वी, दारुहरिद्रा, पर्जन्या, पर्जनी, कटङ्कटेरी, पीता, पचम्पचा, कालीयक, कालेयक, पीतद्रु, हरिद्रु, पीतदारु और पीतक ये सब दारुहलदी के पर्यायवाची शब्द हैं। दारुहलदी-के गुण यद्यपि हलदी के समान ही होते हैं तथापि यह विशेषतः नेत्र, कर्ण तथा मुख- सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाली होती है ॥ २०१-२०२ ॥

________________________________________________________________ १. 'कपीतकमि'ति पाठान् चिन्त्यम् ।


हि०- दारुहलदी, दारुहरदी, दारहल्द । **बं०-**दारुहरिद्रा । **म०-**दारुहल्द, जरकि हलद । **गु०-**दारुहल्डर । **मा०-**दारुहलदी। **क०-**दोहा मरद रिसिन । **तै०-**मनिपसुपु । **ता०-**मर मञ्जल। **कुमा०-**चित्रा, कीलमोरा । **प०-**सुमलु । **ने०-**चित्रा । **फा०-**दार चोबद्द, फिलझरद् । **अ०-**दार हलक । **अं०-**Indian berberry (इण्डियन बरबेरी) । **ले०-**Berberis species (बर्बेरिस् की विभिन्न जातियां)। Fam. Berberidaceae (बर्बेरिडेसी) ।

दारुहलदी की १२-१३ जाति की कंटकित झाड़ियां अधिकतर हिमालय के पहाड़ों पर तथा आसाम में पाई जाती हैं। इनमें से चार जातियां मध्य तथा दक्षिण भारत (निल गिरी पर्वत) में पाई जाती हैं। छोटा नागपुर के पारसनाथ की पहाड़ी पर भी एक भेद पाया जाता है। इनमें से विशेषरूप से ब० अॅरिस्टेटा एवं ३, ४ अन्य पौधों का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है जिनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। गुणों की दृष्टि से इनमें विशेष अन्तर न होने से सभी के गुण और प्रयोग एक साथ दिये गये हैं। दारुहलदी के मूल, काष्ठ, कांड, फल (जिसे झारिष्क कहते हैं) एवं सत्व (रसौत) का व्यवहार किया जाता है। रसौत का स्वतन्त्र वर्णन किया गया है। झरिष्क-ये कलाई लिये लाल तथा सूखने पर काले अंगूर की तरह दिखलाई देते हैं। ये काले अंगूर से छोटे तथा अधिकांश में बीजहीन होते हैं। इनका स्वाद खट्टा या रुचिकर खटमिट्ठा होता है।

(क) Berberis aristata, DC. (बर्बेरिस् अॅरिस्टेटा, डीसी०)। **जौन०-**काशमोई । **गढ०-**किङ्गोरा । इसके क्षुप हिमालय पर्वत पर ६००० से १०५०० फीट की ऊँचाई पर एवं निलगिरी के पहाड़ों पर पाये जाते हैं। इसका क्षुप-बड़ा, पतनशील (Deciduous-डेसिड्युअस् ), कंटीला एवं साधारणतः ६ से १२ फीट तक ऊँचा लेकिन कभी कभी १५ फीट तक ऊँचा एवं ८ इञ्च व्यास के कांड से युक्त होता है। शाखाएँ-श्वेताभ या हल्के पीताभ धूसर वर्ण की होती हैं। पत्ते- १५-४ इञ्च लम्बे, ३-१ इञ्च चौड़े, अभिलट्वाकार, चर्मवत्, सूक्ष्म शिराओं से युक्त, सरल धार वाले या दूर दूर पर तीक्ष्ण कांटों से युक्त एवं उनका अधोपृष्ठ हल्के हरे रङ्ग का होता है। फूल-स्वर्ण-पीत पुष्प २-३ इञ्च लम्बी मंजरियों में आते हैं। फल-बीजिमांसल फल (Berry-बेरी), अण्डाकार, नीले बैगनी रङ्ग के चमकीले एवं रजावृत होते हैं। मूल-पीताभ बादामी, नलिकाकार, कुछ गांठदार, कड़े, मजबूत लेकिन लचीले, साधारणतः कटे हुये टुकड़ों के रूप में एवं थोड़े सी शाखाओं से युक्त होते हैं। छाल-अंदर से गहरे बादामी रङ्ग की, मुलायम एवं तोड़ने पर चूर्ण रूप में हो जाती है। काष्ठ-नींबू के समान पीतवर्ण का, स्पष्ट एवं संकरी मज्जक किरणों से युक्त, जिसमें मज्जक प्रायः नहीं होता और यदि हो तो चमकीले पीतवर्ण का होता है। इसके काष्ठ में ताजी अवस्था में हल्की गन्ध एवं इसका स्वाद कड़वा होता है। इसको कितना भी उबालें तो भी यह पीला ही रहता है।

(ख) B. asiatica, Roxb. ex DC. (ब० एशियाटिका, राक्सब. एक्स डीसी.) । **हि०-**किलमोरा, किंगोरा । **ने०-**माटे किस्सी, चित्रा । इसके क्षुप प्रायः २-८ हजार फीट के बीच या कभी कभी नीचे भी हिमालय की घाटियों में भूटान, गढवाल, बिहार, पारसनाथ की पहाड़ी तथा अफगानिस्तान आदि स्थानों पर पाये जाते हैं।

१२० भावप्रकाश निघण्टुः इसका क्षुप करीब ८ फीट ऊँचा होता है। शाखायें धूसर वर्ण की होती हैं। इसकी पत्तियां अण्डाकार या लटवाकार आयताकार, १-२ १/२ इन्च लम्बी एवं चर्मवत् होती हैं। पत्तियों का शिराजाल ऊपरी पृष्ठ पर घना तथा दृढ होता है। पुष्प-मंजरियों में निकलते हैं। इसके फल कृष्ण नील होते हैं। (ग) B. lycium, Royle. (ब० लाइसियम्, रायलि.)। हि०-चतरोई, काशमल, दारुहरिद्रा । इसके क्षुप ३-७ हजार फीट की ऊँचाई पर पश्चिमी हिमालय में गढवाल से हजारा तक एवं चकरौता तथा मसूरी के नीचे विशेषरूप में प्राप्त होते हैं। ये छोटे एवं समूहबद्ध होकर आते हैं। इसके पत्ते प्रायः पतले तथा लम्बे होते हैं एवं शिराजाल घना नहीं होता। इसके फल विशेष मांसल नहीं होते। रासायनिक संगठन - बर्बेरिस की विभिन्न उपजातियों में कम से कम आठ प्रकार के विभिन्न क्षाराम पाये गये हैं जिनके नाम इस प्रकार हैं- बर्बेरिन् ( Berberine), (ऑक्सिअँर्क- न्थाइन् ( Oxyacanthine ), बर्बेमाइन् (Berbamine ), पामैटाइन (Palmatine ), जंट्रोहीझाइन् (Jatrorrhizine ), कोलंबमाइन् (Columbamine ), बर्बेरूबाइन् (Berberru- bine ) एवं हाइड्रैस्टाइन् (Hydrastine) । इनमें से प्रथम तीन विशेष महत्व के हैं तथा शेष विभिन्न अन्य वनस्पतियों के विशिष्ट क्षाराम हैं। बर्बेरिन् ( Berberine, $C_{20} H_{19} NO_5$ ), शीत जल में घुलनशील, मद्यसार में कम घुलनशील, पीतवर्ण का एवं सूइयों के आकार का क्षाराम है। यह काष्ठ एवं छाल की अपेक्षा मूल में अधिक होता है। यह क्षाराम और भी कई वनस्पतियों में पाया जाता है। इसके लवण भी बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त इसमें कषाय द्रव्य, गोंद एवं स्टार्च आदि पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में मॅलिक् ( Malic), टार्ट्रिक् ( Tartric ) एवं साइट्रिक् ( Citric) अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग - दारुहल्दी के मूल एवं काष्ठ बल्य, तिक्त पौष्टिक, दीपन, पाचन, ग्राही, पित्तविरेचक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, श्लेष्मघ्न, रसायन एवं त्वक दोषहर हैं। इसका उपयोग मलेरिया आदि विषम ज्वर, कुपचन, फिरङ्ग, गण्डमाला, अपची, त्वकदोष, भगंदर, प्रदर, अत्यार्त्तव, व्रण, गर्भिणीवमन, यकृत्प्लीहावृद्धि, कामला एवं सर्पदंश आदि में किया जाता है। (१) मलेरिया तथा अन्य विषमज्वरों में इसके क्वाथ का उपयोग किया जाता है। ज्वर के साथ हृल्लास, वमन, विरेचन, शिरःशूल एवं थकावट अधिक होती है तब इसके क्वाथ का उपयोग रसौत की अपेक्षा अच्छा होता है। ज्वर में इसके पूर्व विरेचन देना चाहिये। इससे पसीना होकर ज्वर उतर जाता है। क्विनीन की तरह हृदयावसाद एवं बाधिर्य आदि इससे नहीं होते तथा प्लीहा की वृद्धि कम हो जाती है। ज्वर अच्छा होने के पश्चात् इसके उपयोग से भूख आदि बढ़ती हैं। यद्यपि उपर्युक्त गुणों के लिये इसका उपयोग किया जाता रहा लेकिन नवीन प्रयोगों से देखा गया कि इसके क्षाराम बर्बेरिन् सल्फेट (Berberine Sulphate ) को १५-३५ ग्रे० की मात्रा में दिन में ३ बार ३ दिन तक देने पर भी किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। मलेरिया में इससे एक लाभ अवश्य होता है कि इसके देने से प्लीहा आदि धातुओं में छिपे हुये मलेरिया के कीटाणु रक्त में आ जाते हैं जिससे रक्त परीक्षा में दिखलाई देने से निदान में आसानी होती है। क्विनीन के साथ ज्वर की चिकित्सा में इसका उपयोग लाभदायक है।


हरीतक्यादिवर्गः १२१ (२) बर्बेरिन् (Berberine ) - यह क्षाराम अत्यंत विषैला नहीं है लेकिन अधिक मात्रा में देने से अवश्य विषैला है एवं मृत्यु भी हो सकती है। इसका प्रचूषण आन्त्र एवं सूचिकाभरण द्वारा हो सकता है। बिल्ली एवं कुत्तों को उनके वजन के प्रति किलोग्राम के लिये २ मिलीग्राम की मात्रा में देने से हृदय पर अवसादक प्रभाव पड़ता है तथा रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है। यह क्रिया उन्हीं अंगों के ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव से एवं प्राणदा (Vagus = वागस) नाडी की उत्तेजना से होती है। प्राणियों में मृत्युत्तर परीक्षण द्वारा देखा गया कि इससे फुफ्फुसों में अत्यन्त रक्ताधिक्य एवं हृदय के अलिन्दों (Auricle = ऑरिक्ल) का विस्फार होकर मृत्यु होती है। इससे वृक्कों में शोथ एवं रक्तस्राव होता है तथा इससे केन्द्रीय वातनाडीसंस्थान के कन्दों की कोशाओं को नुकसान पहुँचता है। यह श्वसन के लिये भी अवसादक है लेकिन १-१० मिलीग्राम की मात्रा में यह आन्त्र, गर्भाशय एवं श्वसनिका की अनैच्छिक मांसपेशियों को उत्तेजित करता है जिससे श्वसनका में संकोच उत्पन्न होता है। साधारण मात्रा में हृदय पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है जिससे हृदय की पोषक रक्त- वाहिनियों में रक्तप्रवाह की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में देने पर यह अवसादक है। इससे श्वेतकणों की वृद्धि होती है। मलेरिया में निदान की दृष्टि से प्रोद्दीपक रूप में (Provoca- tive dose-प्रोहोकेटिह डोज) इसका उपयोग लाभदायक है जिससे छिपे हुये कीटाणु रक्त में आजाते हैं तथा रक्तपरीक्षण में दिखलाई देने लगते हैं। यह चर्म के नीचे की धातुओं ए श्लैष्मिक कला के लिये स्थानिक रूप से सौम्य स्पृञ्जनकारक होने के कारण वेदनास्थापन के लिए प्रयुक्त होता है। क्विनीन जो कि कोशाओं के जीवरेस (प्रोटोप्लाज्म - Protoplasm) के लिये विषैला होता है उसकी अपेक्षा ८० गुना कम शक्ति का इसका घोल (८०,००० में १) लीशमॅनिया ट्रॉपिका (Leishmania tropica) नामक प्राच्यव्रण उत्पन्न करने वाले कीटाणु के संवर्धन की वृद्धि रोकने में समर्थ होता है। यह प्राच्यव्रण (Oriental sore-ओरियन्टल् सोर) की चिकित्सा के लिये सफल औषधि है। बर्बेरिन् ॲसिड सल्फेट ५-१% घोल की १-२ सी० सी० मात्रा व्रण के किनारों पर अत्यन्त महीन सूचिका द्वारा ४, ५ जगह दी जाती है। सूचिकाभरण हफ्ते में एक बार किया जाता है। साधारणतः ३ हफ्तों में व्रण अच्छा हो जाता है लेकिन द्वितीयक उपसर्गों की तीव्रता के अनुसार २-१२ हफ्ते भी अच्छा होने में लग सकते हैं। यदि एक से अधिक व्रण हों तो एक दिन में २ व्रणों से अधिक एवं हफ्ते में ४ व्रणों से अधिक, (विशेष कर जब व्रण बड़े हों) में सूचिकाभरण नहीं करना चाहिये। चिकित्साकाल में व्रण का बन्धन उचित रूप में करना चाहिये। इस औषधि का तयार घोल ओरिसॉल (Orisol) नाम से बिकता है। (३) दारुहल्दी पित्त एवं मूत्रमार्ग की विकृति में लाभदायक है। पित्त एवं मूत्राश्मरी, तृष्णा, दाह एवं हृल्लास आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है। बस्तिशोथ एवं प्रमेह आदि में आंवले के रस एवं मधु के साथ इसको देते हैं। गर्भाशय शैथिल्य के कारण उत्पन्न रक्तप्रदर में तथा श्वेतप्रदर में मधु के साथ इसके क्वाथ का सेवन करने से लाभ होता है। कामला में मधु के साथ इसका क्वाथ दिया जाता है। मूलत्वक् का क्वाथ तृणाणुनाशक (Bactericidal-बॅक्टेरिसाइडल्) है तथा जीर्ण व्रणों में व्रण प्रक्षालन के लिये लाभदायक है। (४) दारुहल्दी के फल सौम्य विरेचक, शीतल एवं रोचक होते हैं। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण-उत्तर भारत में इसमें विशेष मिलावट नहीं होती लेकिन बंबई की तरफ इसमें कई प्रकार की वनस्पतियों के काष्ठ को हल्दी में उबाल कर बेचते हैं। झाडकी

को भी इसके स्थान पर देते हैं।

१२२ भावप्रकाशनिघण्टुः हल्दी (Coscinium fenestratum (Gaertn.) Colebr. (कॉसिनिअम् फेनेस्ट्रैटम्) के कांड को भी इसके स्थान पर देते हैं। मात्रा-चूर्ण २-३ माशा, टिंक्चर ३-२ ड्रा०, बर्बेरिन के लवण १-५ ग्रैन । अथ दार्वीक्वाथजातं रसाञ्जनम् । तस्य निर्माणविधि नामानि गुणांश्चाह दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पादं पक्त्वा यदा घनम् । तदा रसाञ्जनाख्यं तन्नेत्रयोः परमं हितम् ॥ रसाञ्जनं ताक्ष्यंशैलं रसगर्भञ्च तार्क्ष्यजम् । रसाञ्जनं कटु श्लेष्मविषनेत्रविकारनुत् ॥२०४॥ उष्णं रसायनं तिक्तं छेदनं व्रणदोषहृत् ॥ २०५ ॥ दारूहल्दी के क्वाथ से तैयार होने वाले रसोत के बनाने की विधि, नाम तथा गुण-दारूहल्दी का काढ़ा बनाकर उसी के बराबर उसमें दूध डाल कर औटावें । बाद को जब चौथाई भाग शेष रह जाय तब उतार लें और उसमें से जो गाढ़ा भाग हो उसे अलग कर लें। उसी को रसोत कहते हैं। वह नेत्रों के लिये परम हितकर होता है । रसाञ्जन, तार्थ्यशैल, रसगर्भ और तार्क्ष्यज ये रसोत के नाम हैं। रसोत-कटु तथा तिक्त रस युक्त, कफ, विष तथा नेत्र सम्बन्धी विकारों को दूर करने वाला, उष्ण वीर्य, रसायन, छेदक (पिण्डी भाव को प्राप्त हुये कफादिकों को काट काट कर अलग करने वाला ), एवम् व्रणसम्बन्धी दोषों को नष्ट करने वाला होता है ॥ २०३-२०५ ॥ ७१ रसौत हि०-रसोत, रसौत, रसवत । बं०-रसांजन । म०-रसवत, रसांजन । गु०-रसवंती । क०- रसांजन । ते०-रसांजनमु । मा०-रसोत । पं०-रसौत । फा०-फिलजह्र । अ०-हुलुज़ोर्हिदी । अं०-Extract of Indian Berberis (एक्स्ट्रेक्ट ऑफ इण्डियन् बर्बेरिस्) । ले०-Extractum Berberis (एक्स्ट्रेक्टम् बर्बेरिस्) रसोत-कालापन लिये भूरे रङ्ग की, गोंद के समान मुलायम तथा पानी और मदिरा में घुलने वाली दारूहल्दी के क्वाथ और बकरी के दूध से बनी हुई औषधि है। इसका स्वाद कड़वा तथा कसैला होता है। इसको बनाने के लिये वर्षा के आखिर में इसके क्षुप को काट कर उसके पंचांग का क्वाथ बना कर बाद में उसे गाढ़ा बनाते हैं। कुछ लोग क्वाथ में बराबर मात्रा में बकरी का दूध मिलाकर फिर गाढ़ा करते हैं। इस बात में मतभेद है कि रसोत केवल ब० लाइसियम् के मूल एवं काष्ठ से बनता है या ब० एशियाटिका से या दोनों से । बाजार में बिकने वाला रसौत प्रायः दोनों के मिश्रण से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी, मिट्टी आदि पदार्थ मिले रहते हैं। इसलिये इसे १० गुने गरम जल में मिलाकर छान कर सुखाते हैं एवं बचे हुये भाग में मद्यसार मिलाकर छानकर उस मद्यसार को ऊर्ध्वपातन यन्त्र द्वारा अलग कर गाढ़े भाग को उपर्युक्त जल से सुखाये गाढ़े भाग में मिलाकर बन्द शीशी में रखकर काम में लाते हैं । गुण और प्रयोग-यह कड़वा पौष्टिक, ज्वरहर, पार्यायिक ज्वरहर, स्वेदल, अर्शोन, शोधन, रक्तशोधक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक एवं नेत्रविकारहर है। इसका आन्तरिक उपयोग ज्वर, यकृत् प्लीहा वृद्धि, कामला, अर्श, एवं आमाशय तथा पक्वाशय के व्रण (Gastric & duodenal ulcer-गैस्ट्रिक् अँड डयुओडेनल अल्सर ) में लाभदायक है। इसका बाह्य प्रयोग अर्श, प्राच्यव्रण, कटे हुये भाग, फोड़े फुन्सियां एवं पुराने व्रण आदि में किया जाता है। हरीतक्यादिवर्गः /१२३ ( १ ) विषमज्वर के सभी प्रकारों में इसको १५-२० दिन में ३ बार जल के साथ देते हैं। क्वाथ की अपेक्षा यह ज्यादा अच्छा होता है। इससे ज्वर का शमन होकर प्लीहा वृद्धि भी कम होती है। इसके प्रयोग में पहले विरेचन देना चाहिये तथा इसकी पूर्ण मात्रा खाली पेट पर देनी चाहिये। औषधि लेने के पश्चात् रोगी को कपड़ा ओढ़ा कर सुलाना चाहिये । थोड़ी देर में रोगी को प्यास मालूम पड़ती है तथा जी घबड़ाने लगता है लेकिन उसको जल पीने न दें। एक घण्टे में पसीना निकलने लगता है तथा कमजोरी मालूम होती है। उसके बाद शरीर पोंछ कर लाजमण्ड या चावल का मांड और दूध पीने को दें। इसके बाद रोगी प्रायः सो जाता है तथा उस दिन ज्वर की पारी नहीं आती। इस प्रयोग में एक दोष यह है कि रोगी को कभी पहले रक्तातिसार हुआ हो तो वह फिर उमड़ जाता है। ( २ ) नये एवं पुराने नेत्राभिष्यन्द में इसको पलकों पर लगाने से बहुत लाभ होता है। इसके साथ इसमें अफीम, सैन्धव एवं फिटकिरी मिलाई जा सकती है । ( ३ ) रक्तार्श में इसको २ से ८ १० मक्खन के साथ खिलाया जाता है एवं इसके घोल ( ३२ में १ ) से अर्श को धोते हैं । ( ४ ) कपूर एवं मक्खन के साथ बना इसका मलहम फोड़े, फुन्सियां, कटे हुये भाग एवं पुराने घावों पर लाभदायक है। मधु के साथ मिलाकर मुख के अन्दर के व्रणों पर एवं अन्य व्रणों पर लगाते हैं। शोथ पर इसके लेप से लाभ होता है। मुखरोग में इसके घोल से गण्डूष कराते हैं । प्राच्यव्रण के लिये भी यह लाभदायक है क्योंकि इसमें क्षाराम की पर्याप्त मात्रा रहती है । मात्रा-३-२ मा०। अथ बाकुची । तस्या नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह अवल्गुजॊ बाकुची स्यात्सोमराजी सुवर्णिका । शशिलेखा कृष्णफला सोमा पूतिफलीति च ॥ २०६ ॥ सोमवल्ली कालमेषी कुष्ठघ्नी च प्रकीर्तिता । बाकुची मधुरा तिक्ता कटुपाका रसायनी ॥ विष्टम्भहृद्धिमा रुच्या सरा श्लेष्मास्रपित्तनुत् । रूक्षा हृद्या श्वासकुष्ठमेहज्वरकृमिप्रणुत् ॥ २०८ ॥ तत्फलं पित्तलं कुष्ठकफानिलहरं कटु । केश्यं त्वच्यञ्च १मिश्रासकासशोथामपाण्डुनुत् ॥२०९॥ बाकुची के नाम और उसके तथा उसके फल के गुण - अवल्गुज, बाकुची, सोमराजी, सुवर्णिका, शशिलेखा, कृष्णफला, सोमा, पूतिफली, सोमवल्ली, कालमेषी और कुष्ठघ्नी ये सब बाकुची के नामा- न्तर हैं। बाकुची-मधुर तथा तिक्तरस युक्त, विपाक में कटुरस युक्त, रसायन, विष्टम्भ को दूर करने वाली, शीतवीर्य, रुचिजनेक, सारक (दस्तावर), कफ तथा रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है तथा यह रूक्ष, हृदय के लिए हितकर तथा श्वास, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर और कृमि को नष्ट करने वाली होती है। इसका फल-पित्तकारक, कुष्ठ, कफ और वात को दूर करने वाला, कटुरसयुक्त, केश तथा त्वचा के लिए हितकारी होता है तथा कृमि, श्वास, कास, शोथ आम और पाण्डु इन सब रोगों को नष्ट करने वाला होता है ॥ २०६-२०९ ॥ १. पाठ० वमिश्रास ।

१२४ भावप्रकाशनिघण्टुः ७२ बाकुची हि०-बाकुची, बकुची, बावची, बावंची, सोमराजी । बं०-लताकस्तूरी, हाकुच । म०-बावची । गु०-बावची, बावची । क०-बाउचिंगे । ते०-भवंचि, कालाजिउजा । ता०-कर्पोकरशि । फा०-बाव- कुचि । अं०-Psoralea seed (सोरैलिया सीड); Malaya tea (मलाया टी) । ले०-Psoralea corylifolia, Linn. ( सोरैलिया कोरिलीफ़ोलिया, लिन. ) । Fam. Leguminosae ( लेग्यु- मिनोसी) । बाकुची-प्रायः सब प्रान्तों के जंगली झाड़ियों में तथा खादर अथवा कंकरीली भूमि में उत्पन्न होती है एवं सिलोन में भी प्राप्त होती है। अमेरिका में भी इसकी कई उपजातियां होती हैं जिनके गुण भी इसी के समान हैं । इसका क्षुप-१-४ फीट तक ऊँचा, वर्षायु एवं स्वावलम्बी होता है । पत्ते-१-३ इञ्च के घेरे में छोटी अरणी के पत्तों के समान गोलाकार होते हैं। ये नालयुक्त, कड़े, चिकने, लहरदार दन्तुर एवं इनके दोनों पृष्ठों पर काले धब्बे होते हैं। इन ग्रन्थियों के चिह्न शाखाओं पर भी होते हैं। १०-२० छोटे, नीले बैगनी रंग के पुष्प-१ से २ इञ्च लम्बे पुष्पद्ण्ड पर आते हैं। फली-छोटी, गोल, काली, चिकनी, एक बीज युक्त, अस्फोटी एवं फलभित्ति बीज से चिपकी होती है। बीज- बाकुची वास्तव में फल ही है जिसकी फलभित्ति बीजावरण से चिपकी रहती है। यह अण्डाकार, आयताकार, कुछ चिपटे, चिकने, अग्र की तरफ नुकीले, काले रंग के एवं महीन गर्तों से युक्त होते हैं तथा तालद्वारा बड़ा करके देखने पर नहाने के स्पञ्ज की तरह दिखलाई देते हैं। इसको चबाने पर एक तीव्र गन्ध आती है तथा इनका स्वाद कडवा, तीता एवं दाहजनक होता है। औषधि कार्य में इनका तथा इनसे निकले तैल का व्यवहार किया जाता है। नोट-कुछ विद्वानों ने सोमराजी नाम से ले० हर्नोनिया अंथेलमिंटिका ( Vernonia anthe- Imintica Willd. ) का ग्रहण किया है लेकिन वह नाम तो अरण्यजीरक का है जिसका वर्णन परिशिष्ट में किया गया है । रासायनिक संगठन-बाकुची के फलों में राल, उड़नशील तैल, तारपीन की तरह तैल, स्थिर तैल, एवं सोरैलेन् (Psoralen) तथा आइसो-सोरैलेन् (Iso-psoralen) नामक दो रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं । बाकुची के कृमिघ्न तथा त्वच्य गुण इन्हीं रवेदार पदार्थों के मिश्रण से हैं । यह तैल में घुलने वाले (फ्यूरोकाउमरिनस्-Furocoumarins ) हैं । प्रथम सोरैलेन अंजीर से प्राप्त होने वाले फिक्युसिन् (Ficusin ) के समान होता है । इसकी फलभित्ति (Pericarp पेरीकार्प) से सोरैलिडिन् ( Psoralidin ) नामक एक अन्य रवेदार पदार्थ भी प्राप्त होता है। गुण और प्रयोग-यह सौम्य उत्तेजक, वातनाड़ियों के लिए बल्य, कृमिघ्न, त्वग् दोषहर, व्रण शोधक, व्रणरोपक, मृदुविरेचक, मूत्रल, स्वेदल एवं वृष्य है। इसका अन्त: बाह्य प्रयोग श्वित्र, कुष्ठ, पामा, कण्डू, गजचर्म ( सोरियासिस-Psoriasis ) एवं चर्म के अन्य शोथयुक्त विकारों में किया जाता है । (१) श्वित्र में चौथाई भाग हरताल के साथ गोमूत्र में पीस कर इसका लेप लाभदायक होता है । खैर एवं आंवले के क्वाथ के साथ इसके चूर्ण का सेवन भी लाभदायक है । सालभर तक यदि बाकुची एवं काले तिल का सेवन करें तो सभी प्रकार के कुष्ठ अच्छे होकर शरीर की कान्ति बढ़ती है । इसको जल के साथ पीस कर भी लेप किया जा सकता है । नवीन तथा युवावस्था के श्वेत कुष्ठ रोग में शीघ्र लाभ होता है किन्तु अधिक दिन तक लगाना पड़ता है । इससे दाग लाल हो जाते हैं ।

हरीतक्यादिवर्गः १२५ ( २ ) बाकुची में रहने वाला तैल ही प्रधान कार्यकारी भाग है। यह तैल चर्म के ऊपर रहने वाले मालागोलाणुओं ( Streptococci ) के लिये घातक है। अंतस्त्वचीय धमनिकाओं के ऊपर इसका निश्चित प्रभाव पड़ता है जिससे इनका विस्फार होकर वहां रक्तरस ( Plasma-प्लाज्मा ) का प्रवाह बढ़ जाता है। इससे चर्म लाल हो जाता है तथा रञ्जक कोषों (मेलैनोब्लास्टस्-Mela- noblasts ) को उत्तेजना मिलकर रञ्जक का निर्माण होता है । यह रञ्जक, सफेद दागों में फैलकर उसका वर्ण परिवर्त्तन कर देता है । अधिकांश लोगों में इससे सफेद दाग लाल हो जाते हैं लेकिन कुछ (५%) लोगों में इससे छाले पड़ जाते हैं इसलिए इसको अन्य चीजों के साथ आवश्यक प्रमाण में मिश्रण कर लेना चाहिये जिससे दागों में केवल लाली आ जाय । श्वित्र के साथ-साथ यदि अन्य आंत्रिक विकार जैसे आमातिसार आदि हों तो उनकी भी चिकित्सा साथ-साथ करनी चाहिये । ( ३ ) फिरंगोत्तर श्वित्र में बाकुची के तैलीय राल सदृश सत्व ( Oleo-resinous extract) का लेप लाभदायक होता है। इस सत्व में सोरैलेन् तथा आइसो-सोरैलेन् दोनो ही रहते हैं। इसको चाँलमोगरा के तेल के साथ मिलाकर लगाया जाता है तथा आन्तरिक प्रयोग भी करते हैं जिससे श्वित्र, सिध्म तथा सोरियासिस् में लाभ होता है। लगाने के लिये इसके साथ २ भाग चाँलमोगरा का तेल तथा २ भाग लॅनोलिन् मिलाकर मलहम बनाकर दिन में एक, दो बार दागों पर मलना चाहिये । करीब ३ महीने में लाभ होता है । मात्रा-बीज चूर्ण १-३ माशा । अथ चक्रमर्दः (चकवड़) । तस्यै नामानि तत्फलस्य च गुणांश्चाह चक्रमर्दः प्रपुन्नाटो दद्रुघ्नो मेषलोचनः । पद्द्माटः स्यादेड गजश्ची पुन्नाट इत्यपि ॥२१०॥ चक्रमर्दो लघुः स्वादू रूक्षः पित्तानिलापहः । हद्यो हिमः कफश्वासकुष्ठदद्रुकृमीन्हरेत् ॥२११॥ हन्त्युष्णं तत्फलं कुष्ठकण्डूदद्रुविषानिलान् । गुल्मकासकृमिश्र्वासनाशनं कटुकं स्मृतम् ॥२१२॥ चकवड़ के नाम और उसके तथा उसके फल के गुण-चक्रमर्द, प्रपुन्नाट, दद्रुघ्न, मेषलोचन, पद्माट, एडगज, चक्री और पुन्नाट ये सब चकवड़ के नामान्तर हैं। चकवड़-लघु, स्वादिष्ठ, रूक्ष, पित्तवात (वातपित्त) नाशक, हृदय के लिए हितकर, शीतवीर्य, कफ, श्वास, कुष्ठ, दद्रु (दाद) और कृमि को नष्ट करने वाला होता है। चकवड़ का फल-उष्णवीर्य और कटु रस युक्त होता है एवम् कुष्ठ, खुजली, दाद, विष, वायु, गुल्म, कास, कृमि और श्वास इन सब रोगों को दूर करने वाला होता है ॥ २१०-२१२ ॥ ७३ चकवड़ हि०-चकवड़, पवांड, पवांर । बं०-चकुन्द्रा, पनेवार । म०-तरोटा, टाकला । गु०-कुंवाडीयो । क०-तगचे । ते०-तगिरिस । ता०-उशिदुगरै । पं०-पंवार, चकुन्दा । फा०-संगसतुया । अ०- कुल्ब । अं०-Fetid cassia (फ़ीटिड कॅशिया) । ले०-Cassia tora Linn. (कॅशिया टोरा, लिन.) । Fam. Leguminosae ( लेग्युमिनोसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों के जङ्गल, झाड़ी, खेत, मैदान, कूड़ा करकट, सड़क के किनारे एवं गन्दे स्थानों में आप ही आप उत्पन्न होता है। इसका २-५ फीट तक ऊँचा एकवर्षायु क्षुप वर्षा ऋतु में बहुतायत से उत्पन्न होता है। पत्र- संयुक्त पक्षकार और पत्रक तीन जोड़े, अभिलट्वाकार, १-२ इञ्च लंबे, चिकने, मचकीले, दुर्गन्ध

१२६ भावप्रकाशनिघण्टुः युक्त एवं स्पष्ट शिराजाल से युक्त होते हैं। इसके निचले पत्रकों के बीच में एक ग्रन्थि होती है। पुष्प-छोटे पीले रंग के अक्षकोणीय एवं दो-दो के जोड़े में आते हैं। फलियां-४-८ इञ्च लम्बी, पतली, चौकोनी, कुछ मुड़ी हुई तथा इनका अग्र नुकीला होता है। बीज-बहुत, कड़े एवं मेथी के समान होते हैं। इसके कोमल पत्तों का साग बनाया जाता है तथा औषधि में पंचांग का व्यवहार किया जाता है। इसी का एक दूसरा भेद है जिसे कॅशिया ऑब्च्यूसिफोलिया ( Cassia obtusifolia ) कहते हैं। इसका क्षुप भी ऊपर के क्षुप के समान ही होता है लेकिन इसमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा इसके आधारीय पत्रकद्वय के बीच में एक ग्रन्थि होती है। रासायनिक संगठन—इसके बीजों में इमोडिन (Emodin) नामक एक ग्लूकोसाइड पाया जाता है जो क्राइसोफेनिक एसिड ( Chrysophanic acid) की तरह होता है। इसके पत्तों में कॅथार्टिन (Cathartin) नामक एक विरेचक द्रव्य तथा लाल रंग होता है। गुण और प्रयोग—इसके बीज बल्य, दीपन, पाचन एवं त्वक् दोषहर होते हैं तथा पत्र विरेचक, कृमिघ्न एवं पार्यायिक ज्वरहर होते हैं। (१) इसके बीज की क्रिया त्वचा पर होती है। दाद, खुजली, कुष्ठ, सिध्म, पामा एवं छाजन ( एक्झिमा ) आदि में यह बहुत लाभदायक है। जिन रोगों में त्वचा मोटी हो जाती है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। दाद में मूली के पत्ते के साथ या नींबू के रस के साथ या करंज के तेल के साथ पीस कर इसे लगाया जाता है। छाजन में मट्ठे के साथ पीस कर लगाते हैं। सिध्म के लिये कांजी में पीसकर लगाना चाहिये । व्रणवस्तु के स्थान पर उत्पन्न होनेवाली तन्तु युक्त गांठों (कीलॉयड-Cheloid) के लिये इसके बीजों को सेहुंड के दूध में भिगोकर फिर गोमूत्र में पीस कर लेप करने से लाभ होता है। अर्धावभेदक आदि शिरोरोग में कांजी के साथ इसका लेप उपयोगी है। इसका सेवन कॉफी के रूप में भी किया जाता है। (२) इसके पत्तों का क्वाथ बच्चों के विकारों में विशेषकर दन्तोद्भेद के समय ज्वर आदि होने पर मृदु विरेचक के रूपमें दिया जाता है। इसका रस भिलावे से उत्पन्न दाह पर लगाया जाता है। इसका पोल्टिस बनाकर फोड़ों पर बांधने से फोड़े जल्दी पक जाते हैं एवं वातरक्त, गृध्रसी तथा संधिवात में भी इनके बांधने से वेदना कम होती है। इसके पत्तों को एरण्ड तैल में भूनकर दुर्गंध युक्त व्रणों में पुल्टिस के रूप में प्रयोग से लाभ होता है। मात्रा—बीज चूर्ण १-२ माशा। अथातिविषा (अतीस )। तस्या नामगुणानाह विषा त्वतिविषा विश्वा शृङ्गी प्रतिविषाऽरुणा । शुक्लकन्दा चोपविषा भङ्गुरा घुणवल्लभा ॥ विषा सोष्णा कटुस्तिक्ता पाचनी दीपनी हरेत् । कफपित्तातिसारामविषकासवमिक्रिमीन् ॥ अतीस के नाम तथा गुण—विषा, अतिविषा, विश्वा, शृङ्गी, प्रतिविषा, अरुणा, शुक्लकन्दा, उपविषा, भङ्गुरा और घुणवल्लभा ये सब अतीस के नाम हैं। अतीस—उष्णवीर्य, कटु तथा तिक्तरस युक्त, पाचक तथा अग्निदीपक होती है एवम् कफ, पित्त, अतिसार, आम, विष, कास, वमन और कृमि इन सब रोगों को दूर करनेवाली होती है ॥ २१३-२१४ ॥


हरीतक्यादिवर्गः १२७ ७४ अतीस हि०-अतीस । बं०-आतइच । म०-अतिविष । पं०-अतीस । ते०-अतिवस । क०-अतिविषा । गु०-अतिवखनी कली । ता०-अतिवदयम । भोटि०-अइस । अं०-Indian Atees (इन्डियन् अतीस ) । ले०-Aconitum heterophyllum, Wall. (एकोनाइइटम् हेटरोफाइलम्, वाल. ); Fam. Ranunculaceae (रॅनन्क्युलेसी) । यह हिमालय पहाड़ में कुमाऊँ से हसोरा तक शिमला और इसके आस पास में तथा चम्बा प्रान्त में ६ से १५ हज़ार फुट ऊँची चोटियों पर पाया जाता है। इसका क्षुप-२ से ४ फीट ऊँचा होता है। काण्ड-गोल, सीधा तथा विभिन्न आकार वाली पत्तियों से घिरा होता है। पत्र-नीचे के पत्तों के फलक प्रायः पाँच विच्छेदों से युक्त एवं गोलाई लिये हुये ताम्बूलाकार या लट्वाकार-ताम्बूलाकार होते हैं। ऊपर के पत्ते छोटे तथा धार पर दन्तुर होते हैं। पुष्प-नील अथवा हरितनील, १ से १॥ इञ्च लम्बे एवं चमकीले होते हैं। आभ्यंतर पुट का एक दल सबसे बड़ा और फणाकार होता है। मूल-मूल में दो कन्द होते हैं जिनमें एक पिछले वर्ष का और दूसरा नये वर्ष का होता है। नवीन कन्द लम्बगोल या शंक्वा- कार, हाथी की सूँड की तरह, १ इञ्च लम्बा तथा ½ से ३/४ इञ्च मोटा होता है। कन्दत्वक्-पतली तथा श्वेताभ, फीके राख के रङ्ग की तरह होती है। कन्द-स्वाद में अत्यंत कडुवा, आसानी से टूट जाने वाला और भीतर से श्वेत तथा पिष्टमय पदार्थ से युक्त रहता है। इसे तोड़ने पर श्वेत मध्य भाग के चारों तरफ ४ काले धब्बे दिखलाई देते हैं। इनमें गन्ध नहीं रहती। इसमें कीड़े बहुत जल्दी लग जातें हैं तथा कीड़े लगने पर यह निःसत्व हो जाता है इसलिये औषधि में बिना कीड़े लगे हुये अच्छे मूलकन्द का ही व्यवहार करना चाहिये । अन्य निघण्टुकारों ने वर्ण भेद से इसके २, ४ भेद लिखे हैं लेकिन आजकल केवल एक ही भेद और मिलता है। जिसका वर्णन नीचे दिया गया है। ( क ) Aconitum palmatum D. Don ( एकोनाइटम् पामैटम् ) हि०-वखमा । सं०- प्रतिविषा । इसके क्षुप पूर्वी हिमालय में सिक्किम, गुर्वाल तथा मिश्री पर्वतों में पाये जाते हैं। इसके मूल अतीस की अपेक्षा अधिक लम्बे, कम मोटे, तोड़ने में सख्त, अधिक काले रङ्ग के तथा वजन में बहुत भारी होते हैं। इन पर गाँठें होती हैं। गुण आदि में यह अतीस के समान ही है। रासायनिक संगठन—वत्सनाभ वर्ग की औषधि होने पर भी यह विषैली नहीं है। इसमें एक अत्यन्त कडवा बिना रवेदार क्षाराम अतीसिन ( Atisine ) होता है जो विषैला नहीं है। इसके अतिरिक्त इसमें एकोनाइटिक एसिड (Aconitic acid), टैनिक एसिड, अधिक मात्रा में पिष्टमय पदार्थ, वसा तथा ओलिइक, पामिटिक एवं स्टियारिक ग्लिसराइड्स (Oleic, Palmitic and Stearic Glycerides) के मिश्रण तथा गोंद, इक्षु शर्करा एवं राख २% आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—अतीस दीपन, पाचन, तिक्तपौष्टिक, ग्राही, वृष्य, बल्य एवं विषमज्वरहर है। इसके सेवन से शरीर की विनिमय क्रिया सुधरती है। इसको ४-८ माशा देने पर भी विषैला परिणाम नहीं होता । इसका प्रयोग आमातिसार, विषमज्वर, कास, वमन, कुपचन, शूल, नवीन शोथयुक्त विकार एवं बालरोगों में किया जाता है।

१२८ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १ ) तिक्तपौष्टिक तथा ग्राही होने के कारण अतिसार एवं संग्रहणी में इससे अच्छा लाभ होता है । बच्चों के वमन, अतिसार, ज्वर एवं खांसी में इससे बहुत लाभ होता है। इससे पाखाना पीला होकर मात्रा कम होती है । बच्चों तथा प्रसूता में यदि अतिसार हो तो इसके साथ शृङ्ग भस्म देना चाहिये । अतीस के साथ भांग एवं षोड़षच मिलाकर अतिसार में दिया जाता है । इसके साथ सुगन्धि, कटुवी पौष्टिक तथा ग्राही अन्य औषधियां मिलाने से ज्यादा लाभ होता है । ( २ ) इसको अधिक मात्रा में देने पर ही इसका ज्वरघ्न गुण स्पष्ट होता है लेकिन उस मात्रा में ज्वर कम होने के साथ-साथ विबन्ध भी हो जाता है जो विषमज्वर के लिये अहितकारक है । इसलिये विषमज्वर में इसकी अपेक्षा कुटकी ज्यादा लाभदायक होती है । ज्वर पश्चात दौर्बल्य दूर करने के लिये दीपनीय एवं तिक्त पौष्टिक के रूप में इसका उपयोग अधिक अच्छा है । ज्वरातिसार के लिये यह अत्युत्तम औषधि है । इसमें १५ र० अतीस तथा १५ र० रसाञ्जन जल के साथ देते हैं । इसके साथ सुगन्धि पदार्थ मिलाने से ज्यादा लाभ होता है । बड़ों की अपेक्षा बच्चों के ज्वरातिसार में यह ज्यादा उपयोगी है । ( ३ ) मक्षिकविष में इसको मधु के साथ सुबह चटाया जाता है । ( ४ ) कृमियों को निकालने के लिये इसके साथ विडंग का प्रयोग किया जाता है । मात्रा—चूर्ण ३-२ मा० ज्वरातिसार, अतिसार में । चूर्ण-२-४ र० बल्य, तिक्तपौष्टिक ।

अथ लोध्रः 'शावरलोध्र-पटियालोध्र' इति लोके प्रसिद्धयोर्नामगुणानाह लोध्रस्तिस्त्वतरीटभ्रं शावरो गालवस्तथा । द्वितीयः पट्टिकालोध्रः क्रमुकः स्थूलवल्कलः । जीर्णपत्रो बृहत्पत्रः पट्टी लाक्षाप्रसादनः ॥ लोध्रो ग्राही लघुः शीतश्चक्षुष्यः कफपित्तनुत् । कषायो रक्तपित्तासृग्ज्वरातीसारशोथहृत् ॥ शावरलोध्र और पटियालोध के नाम तथा गुण—लोध्र, तिल्व, तिरीट, शावर, गालव ये नाम लोध्र अर्थात् सावरलोध के हैं और दूसरा जो पटिआलोध (पटानी लोध) है उसके-पट्टिकालोध्र, क्रमुक, स्थूलवल्कल, जीर्णपत्र, बृहत्पत्र, पट्टी और लाक्षाप्रसादन ये सब नाम हैं। दोनों प्रकार के लोध्र—ग्राही, लघु, शीतवीर्य, नेत्रों के लिए हितकर, कफपित्तनाशक, कषायरस युक्त, रक्तपित्त, रक्तविकार, ज्वर, अतिसार और शोथनाशक होते हैं ॥ २१५-२१६ ॥ ७५ लोध हि०-लोध । बं०-म०-क०-लोध, लोध्र । गु०-लोधर । ते०-लोद्दुगचेट्टु । अ०-मुगाम । अं०-Lodh (लोध); Symplocos Bark (सिम्प्लोकोस बार्क) । ले०-Symplocos race- mosa, Roxb. (सिम्प्लोकाँस् रेसिमोसा, राक्सू.) । Fam. Symplocaceae (सिम्प्लोकेसी) । यह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्त नेपाल, कुमाऊँ से आसाम, बंगाल, छोटा नागपुर, बर्मा आदि प्रदेशों के जङ्गल और छोटे पहाड़ों में पाया जाता है । इसका छोटा वृक्ष-२० फुट तक ऊँचा होता है । छाल-खुरदरी और गहरे धूसर (Grey) वर्ण की होती हैं । काट-(Blaze-ब्लेझ)-आधा इञ्च तक मोटा, रेशेदार, हल्का पीला परन्तु हलके नारंगीभूरे रंग की रेखाओं से युक्त होता है । पत्ते-३॥ से ७ इञ्च लम्बे, अण्डाकार-आयता- का या अण्डाकार-भालाकार; पत्राग्र-तीक्ष्ण, कुण्ठितलम्ब या कुंठित; पत्र तट-आरावत, अस्पष्ट गोलदन्तुर या क्वचित अखण्ड; पत्र पृष्ठ-कोमल पत्तों का ऊपर का पृष्ठ चिकना तथा अधोपृष्ठ मृदु रोमश, तथा अन्य पत्नों के पृष्ठ चिकना या मध्यशिरा पर कुछ रोमों से युक्त, चमकीले तथा

हरीतक्यादिवर्गः १२६ ऊपर का पृष्ठ गहरे हरे रङ्ग का; शिराएं-बगल की शिराएं सूखे हुये पत्तों में स्पष्ट, ५-९ जोड़ी एवं पत्रवृन्त-३ से ३ इञ्च लम्बा होता है। आश्विन से अगहन तक फूल फल आते हैं। फूल-गुच्छों में, पीले और सुगन्धित होते हैं। फल-अष्ठिफल, प्रायः आध इञ्च लम्बे, आयताकार, चिक्कण, बैंगनी काले रङ्ग के एवं उनका बाह्यकोष चिपका रहता है । इसकी छाल का व्यवहार किया जाता है। इसका बाह्यपृष्ठ चिकना धूसरित हरा (यदि कार्क (Cork) के साथ हो तो) तथा आडी धारियों से युक्त, अंदर का पृष्ठ हलका पीला लेकिन रक्ताभ बादामी दिखलाई देता है तथा इसमें लम्बाई में गद्देदार धारियां होती हैं। भग्न-छोटा, बाह्य भाग में दानेदार लेकिन अन्दर का कुछ तन्तु युक्त । बाह्य भाग (Cortical) रक्ताभ बादामी रङ्ग का । गन्ध-हलकी मधुर लेकिन बन्द डिब्बों में रखने पर तेज हो जाती है । स्वाद-मधुर, सुगन्धि तथा कुछ दाइनक । नोट-एक अन्य प्रकार के पठानी लोध्र का वर्णन आगे किया गया है। लोध्र तथा पठानीलोध्र दोनों ही के गुण करीब करीब समान ही हैं तथा दोनों ग्राही एवं अतिसारादि में लाभदायक होते हैं। लोध्र का एक पर्याय तिल्वक आया है। चरक के कल्पस्थान में तिल्वक के मूल की (अन्दर की त्वचा रहित) बाह्य त्वचा का उपयोग विरेचन कराने के लिये किया गया है। इससे भ्रम होता है कि एक ही वस्तु विरेचक तथा ग्राही कैसे हो सकती है। व्यवहार में भी लोध्र की छाल विरेचक नहीं होती। शावर या पठानी लोध दोनों की मूल त्वक् का प्रयोग किया गया किन्तु उससे विरेचन नहीं हुआ। इसके संबन्ध में एक श्लोक मिलता है । तिल्वकोऽपि तदाकारो बृहत्पत्रो विशेषतः । रक्तत्वचो विरेकी च बृहल्लोध्रेति कथ्यते ॥ डल्हण तिल्वक् के सम्बन्ध में लिखते हैं—तिल्वकः रोध्रः, अन्ये तु रोध्राकारो रक्तत्वक्को बृहत्पत्रो वैरेचनिकः । इससे मालूम होता है कि लाल छाल वाला, दीर्घ पत्र वाला एवं विरेचक गुणवाला कोई लोध्र के समान वृक्ष होता है जो तिल्वक है। अभी इसका निर्णय नहीं हो पाया है। कुछ विद्वानों ने तिल्वक् के स्थान पर रेवांचीनी की छाल का उपयोग विरेचन के लिये करने को कहा है। रासायनिक संगठन-लोध की छाल में सम्पूर्ण क्षाराम की मात्रा करीब ०.३२% होती है जिसमें से एक रवेदार क्षाराम लोटयूराइन (Loturine) ०.२४%, अन्य चूर्णीरूप में क्षाराम लोटयुरिडाइन (Loturidine) ०.०६% एवं एक और रवेदार क्षाराम कोल्लोटयुराइन (Colloturine) ०.०२% होते हैं । इसकी राख में सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate) रहता है तथा छाल में लाल रंजक पदार्थ बहुत अधिक मात्रा में होते हैं। इसमें टैनिन द्रव्य नहीं होते । इसमें का लोटयूराइन क्षाराम अब्राइन (Abrine) एवं हारमॅन (Harman) के सदृश होता है । इसके सभी क्षाराम विरल अम्ल घोल में अत्यन्त तेज नील-लोललोहितातीत चमक उत्पन्न करते हैं । गुण और प्रयोग-लोध की छाल ग्राही, शीतल, रक्तस्तंभक, श्लेष्मघ्न, व्रणरोपक, शोधन, बल्य एवं चक्षुष्य है। इससे छोटी रक्तवाहिनियों का संकोच होकर रक्तस्राव बन्द होता है। इससे श्लेष्मल त्वचा को शक्ति प्राप्त होकर एवं उसका संकोच होकर श्लेष्मा की उत्पत्ति कम होती है । इसका उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तप्रदर, अत्यार्तव, श्वेतप्रदर, सर्वाङ्गशोथ, यकृद्विकार, ज्वर एवं नेत्ररोगों में किया जाता है। 9 ६ भाव नि०

१३० भावप्रकाशनिघण्टुः (१) लोध्र अतिसार एवं प्रवाहिका के लिये बहुत अच्छी औषधि है। इसमें इसके प्रवाही सत्त्व को ३ डा० की मात्रा में देने से इपीकाक से जिनको लाभ नहीं हुआ था उन्हें भी लाभ हुआ । इसमें बेल की गुदी, कुचला एवं कुरैया की छाल के साथ इसका प्रयोग करते हैं या इसके साथ मुलेठी, अनार का छिलका एवं कायफल का प्रयोग किया जाता है। (२) रक्तप्रदर में इसके चूर्ण को १०-२० की मात्रा में दिन में ३, ४ बार मिश्री के साथ ३, ४ दिन तक देने से बहुत लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर उसकी शिथिलता दूर होती है जिससे रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर आदि में यह उपयोगी है। गर्भिणी मे ७ वें या ८ वें महीने में यदि गर्भ में अधिक चलन हो तो इसे छोटी पीपल एवं मधु के साथ चटाने से गर्भाशय संकोच होकर चलन कम हो जाता है। (३) आंखों में लाली तथा सूजन होने पर इसको पलकों के चारों तरफ लगाते हैं। इसके साथ मुलेठी, रसौत एवं भुनी फिटकिरी का उपयोग लेप में किया जाता है। (४) श्लीपद (Filaria = फाइलेरिया) के कारण उत्पन्न पायसमेह (Chyluria = काइ- लूरिया) तथा फीलपांव (Elephantiasis = एलिफॅन्टियासिस) में यह लाभदायक सिद्ध हुआ है। (५) कुष्ठ एवं व्रण आदि में इसका अन्तः बाह्य प्रयोग किया जाता है। प्रसूता में योनिक्षत के लिये इसका लेप उपयोगी है। गलशुण्डिका वृद्धि एवं मसूदों से यदि खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराते हैं तथा रसौत, नागरमोथा एवं लोध्र का मधु के साथ मसूदों पर लेप करते हैं। सूजन पर लोध्र के लेप से सूजन कम हो जाती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० र० । ७६ पठानी लोध्र । हि०-पठानी लोध्र । बं०-पटिया लोध्र । गु०-पठाणी लोधर । पं०-पठानी लोद, लान्दर, लोज, लोश । म०-पट्टी लोध्र । ते०-तैल लुट्ठुगु । क०-बिली लोध्र । सिन्ध०-लोदर, पठानी लोध्र । ले०-Symplocos crataegoides Buch. Ham. (सिम्पलोकॉस् क्रेटेगॉइंडिस्) । (Fam. Symplocaceae (सिम्पलोकेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में सिन्ध नदी से आसाम तक, खासिया पहाड़ और मरतवान के पहाड़ों में ३-९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। यह वृक्ष-३० फुट तक ऊँचा होता है। छाल- हल्के सफेद रंग की और कार्क युक्त होती है तथा उस पर खड़ी नालियां रहती हैं। काठ-आधा इञ्च मोटा, हल्का पीला व रेशेदार होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, पतले, अण्डाकार या लट्वाकार, लंबाय और अग्र की ओर तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं तथा सूखने पर पीले रङ्ग के हो जाते हैं। फूल-सफेद, समशिखाकार गुच्छों में तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फूलों की सुगन्धि दूर तक जान पड़ती है। फल-चौथाई इञ्च से तिहाई इञ्च तक लम्बे तथा गोल होते हैं। उनसे मुड़ा हुआ गोल बीज निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आदि सब उपर्युक्त लोध्र के समान ही हैं।

अथ लशुन, तस्य नामान्याह लशुनस्तु रसोनः स्यादुग्रगन्धो महौषधम् । अरिष्टो म्लेच्छकन्दश्च यवनेष्टो रसोन्कः ॥२१०॥ लशुनके नाम-लशुन, रसोन, उग्रगन्ध, महौषध, अरिष्ट, म्लेच्छकन्द, यवनेष्ट और रसोन्क ये नाम लशुन के हैं ॥ २१० ॥

हरीतक्यादिवर्गः १३१ अथ लशुनोत्पत्तिमाह यदाऽमृतं वैनतेयो जहार सुरसत्तमात् । तदा ततोऽपतद् बिन्दुः स रसोनेोऽभवद् भुवि ॥ लशुन की उत्पत्ति-जिस समय गरुडने इन्द्र के पास से अमृत हरण किया था उस समय स अमृत) से जो बिन्दु (अमृत-बिन्दु) पृथ्वी पर गिरा उसी से लहुसन की उत्पत्ति हुई ॥२१८॥ अथ रसोनशब्दस्य निरुक्तिमाह पञ्चभिश्च रसैर्युक्तो रसेनाम्लेन वर्जितः । तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणां गुणवेदिभिः ॥ लहुसन के 'रसोन' नामकी व्युत्पत्ति-लहुसन में ६ प्रकार के रसों में से ५ प्रकार के रस रहते हैं किन्तु केवल एक अम्ल रस नहीं रहता है, अत एव रस अर्थात् केवल अम्ल रस से ऊन अर्थात् शून्य रहने से द्रव्यों के गुणादिक जानने वाले विद्वानों ने इसका 'रसोन' नाम रक्खा है॥ अथ लशुने रसस्थानान्याह कटुकश्चापि मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः । नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः ॥ बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ॥ २२० ॥ लहुसन में कटु आदि पांचो रसों के रहने के स्थान-इसके मूलभाग में कटु रस रहता है, पत्तों में तिक्त रस, नाल में कषाय रस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीज में मधुर रस रहता है, ऐसा लहुसन के गुणों के जानने वाले विद्वानों ने कहा है ॥ २२० ॥ अथ लशुनगुणानाह रसोनों बृंहणो वृष्यः स्निग्धोष्णः पाचनः सरः । रसे पाके च कटुकस्तीक्ष्णो मधुरको मतः ॥ भग्नसन्धानकृत्कण्ठ्यो गुरुः पित्तास्रवृद्धिदः । बलवर्णकरो मेधाहितो नेत्र्यो रसायनः ॥२२१॥ हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुर्नामकूष्ठानलसाद्जन्तु-समीरणश्वासकफांश्च हन्ति ॥ २२३ ॥ लहुसन के गुण-लहुसन बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, पाचक तथा सारक होता है। और वह रस तथा पाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण, भग्न-सन्धान- कारक (टूटी हड्डियों को जोड़ने वाला), कण्ठ को हितकारी, गुरु, पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाला, मेधाशक्ति तथा नेत्रों के लिये हितकर और रसायन होता है। एवं हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, मल तथा वातादिक की विबन्धता, गुल्म, अरुचि, कास, शोथ, बवासीर, कुष्ठ, अग्निमान्य, कृमि, वायु, श्वास और कफ को नष्ट करता है ॥ २२१-२२३ ॥ अथ लशुनेसेविनां हिताहितपदार्थान्मह मद्यं मांसं तथाऽम्लञ्च हितं लशुनसेविनाम । व्यायाममातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ॥ रसोनमश्नन् पुरुषस्त्यजेदेतान् निरन्तरम् ॥ २२५ ॥ लहुसन सेवन करनेवालों के लिये हितकर तथा अहितकर पदार्थ-मद्य, मांस तथा अम्लरस युक्त भक्ष्य पदार्थ ये सब लहुसुन खाने वालों के लिये हितकर हैं। और व्यायाम, आतप (धूप में फिरना), क्रोध करना, अत्यन्त जल पीना, दूध और गुड़ इन सबों को लहुसुन खाने वाले पुरुष सदा छोड़ दें, क्योंकि ये सब अहितकर हैं ॥ २२४-२२५ ॥ ७७ लहुसुन । हि०-लहुसुन, लशुन । बं०-रसुन । म०-लसूण । क०-बेल्लुळ्ळि । ते०-वेल्लुळ्ळि, तेळ्ळिगड्ड्डा । ता०-वळ्ळैपंडु । गु०-लसण । सिंधी-थोम । आसा०-नहरु । भोटि०-गोक्पस । फा०-सीर ।

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१३२ | भावप्रकाशनिघण्टुः अ०-सूम, फूम। यू०-स्कूईून। अ०-Garlic (गार्लिक) । ले०-Allium sativum, Linn. (एलियम् सटाइवम्, लिन०) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में बोया जाता है। विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रदेश, गढ़वाल, कुमाऊँ, पंजाब एवं काश्मीर आदि में अधिक उत्पन्न होता है। इसका बहुवर्षाणु क्षुप-करीब १ फुट तक ऊँचा होता है। पत्र-चिपटे, लम्बे, १ इञ्च से कम चौड़े एवं इनका अग्र लम्बा होता है। पत्रकोश-३-४ इञ्च लम्बा होता है तथा पुष्प व्यूह को घेरे रहता है। पुष्पव्यूह-सबृन्त मूर्धज, छोटे, घने एवं पतले, शुष्क कोणपुष्पों से युक्त होते हैं। इसके कन्द को लहसुन कहा जाता है जिसके अन्दर ८-२० जावा होते हैं। इसमें एक विशेष प्रकार की तीव्र गन्ध तथा इसका स्वाद विशिष्ट प्रकार का कटु होता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक बादामी पीले रंग का उड़नशील तैल ०.१-०.३% पाया जाता है जिसका वि. गु. १.०४६-१.०५७ होता है। इस तैल में प्रधान रूप से ॲलिल डाइसल्फा- इड् (Allyl disulphide, C₆ H₁₀ S₂) तथा ॲलिल-प्रॉपिल डाइसल्फाइड (Allyl-propyl disulphide) एवं अल्प मात्रा में उच्च श्रेणी के पॉलीत्सल्फाइड्स (Polysulphides) पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त लहसुन के मध्यसारिय सत्त्व से एक ॲलीसिन (Allicin, C₆ H₁₀ S₂ O) नामक प्रतिजीवाणीय (Antibacterial) तरल द्रव्य प्राप्त किया गया है। इसके साथ ही साथ ॲलीसेशन् I तथा ॲलीसेशन् II (Allicetion I and Allicetion II) नामक दो अत्यन्त तीव्र प्रतिजैविक (Antibiotics) पदार्थ भी पाये गये हैं जो ईथर (Ether) में घुलनशील लेकिन जल में न घुलने वाले होते हैं। गुण और प्रयोग—लहसुन एक बहुत ही उपयोगी औषधि है। प्राचीन काल से इसका प्रयोग किया जाता रहा है और आधुनिक विद्वानों ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। राजयक्ष्मा (Tuberculosis) एवं अन्य फुप्फुसविकार, वातविकार, शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dys- pepsia) एवं व्रण आदि के लिये यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। काश्यपसंहिता में लशुनकल्प नामक एक स्वतन्त्र अध्याय में इसका वर्णन किया गया है। धार्मिक ग्रन्थों में इसका सेवन निषिद्ध माना है। लहसुन उष्ण, दीपन, पाचन, वातहर, स्वेदजनन, मूत्रल, उत्तेजक, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, रसायन, दुर्गन्धहर एवं उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसमें जो उड़नशील तैल होता है उसका उत्सर्ग त्वचा, फुप्फुस एवं वृक्क द्वारा होता है। फुप्फुस से उत्सर्ग के समय इससे कफ ढीला हो जाता है तथा उसमें के जीवाणुओं का नाश होकर कफ की दुर्गन्ध दूर होती है। वात नाडी संस्थान पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से वमन, विरेचन, एवं शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बच्चों में इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। अधिक मात्रा में सेवन करने पर कभी कभी मृत्यु भी हो सकती है। इसका बाह्य प्रयोग त्वगरागकारक (Rubefacient) एवं प्रतिदूषक औषधि के रूप में किया जाता है। अधिक समय तक त्वचा के साथ सम्पर्क होने से स्फोट उत्पन्न होते हैं। (१) यक्ष्मा दण्डाणु से उत्पन्न सभी विकृतियों जैसे फुप्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोथ, चर्मविकार, अस्थिव्रण एवं नाड़ीव्रण आदि में यह निश्चित लाभदायक सिद्ध हुआ है। लहसुन के रस को इनमें पिलाया जाता है तथा इसका स्थानिक उपयोग भी किया जाता है। स्वरयंत्र शोथ में इसका टिंक्चर ३-१ ड्रा. दिन में २, ३ बार देते हैं। पुराने कफविकार जैसे कास, श्वास, स्वरभङ्ग,


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हरीतक्यादिवर्गः | १३३ श्वसनिका शोथ, श्वसनिकाभित्तीर्णता (Bronchiectasis) एवं श्वासकृच्छ्र आदि में इसका अव- लेह बनाकर उपयोग किया जाता है। लहसुन एवं वायविडङ्ग का सेवन भी लाभदायक है। बच्चों के कुकास में इसको ३,४ घण्टे पर सुंघाया जाता है तथा इसके रस को पिलाते भी हैं जिससे कष्ट कम हो जाता है। फुप्फुसकोथ (Gangrene of lungs) में इसके टिंक्चर (५ में १) का उपयोग बहुत सफल रहा है। प्रारम्भ में इसको कम मात्रा में देना चाहिये तथा बाद में २० बूंद तक दिन में ३ बार देना चाहिये। थोड़े ही समय में ज्वर, कफ की दुर्गन्ध, स्वेदाधिक्य एवं अग्निमान्द्य आदि दूर होकर लाभ होता है। इसी प्रकार खण्डीय फुप्फुसपाक (Lobar pneumonia) में भी इसके टिंक्चर को २० बूंद हर चार घण्टे पर जल के साथ देने से ४८ घण्टे के अन्दर ही लाभ मालूम होने लगता है तथा ५, ६ दिन में ज्वर कम हो जाता है। इन सभी विकारों में आन्तरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको छाती पर लगाते भी हैं। (२) वायविडङ्ग के साथ इसका क्षीरपाक सभी वातविकारः में जैसे गृध्रसी, कटिग्रह, अर्दित, पक्षाघात, एकाङ्गवात, उरुस्तम्भ, अपतन्त्रक एवं अपस्मार आदि में लाभदायक है। आन्तरिक प्रयोग के साथ इससे सिद्ध तैल की मालिश भी की जाती है। अपस्मार में इसका फांट भोजन के पूर्व एवं पश्चात् देने का विधान है। अपतन्त्रक में इसको सुंघाया जाता है। इसी प्रकार ठण्डक लगने से उत्पन्न पीड़ा, जीर्ण आमवात एवं संधिशोथ तथा शिरःशूल आदि में इसको खिलाया जाता है तथा बाह्य लेप भी किया जाता है। बच्चों के वात विकारों में इसकी मालिश विशेष लाभदायक है। (३) शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia), आध्मान, उदरशूल, विसूचिका, वमन, गुल्म, उदावर्त, आंव एवं केंचुवों की बीमारी में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। केंचुआ (Round worms) में १०-३० बूंद रस दूध में मिलाकर पिलाते हैं। वातगुल्म में इसको पीस कर घृत के साथ खिलाने से लाभ होता है। ग्रहणीव्रण (Duodenal ulcer) में भी इसको लाभदायक माना गया है। (४) विषमज्वर में इसको तैल या घृत के साथ सुबह खिलाने से लाभ होता है। आन्त्रिक एवं तन्द्रालु ज्वर (Typhoid and Typhus) के प्रतिबन्धन के लिये इसके टिंक्चर को १/२ ड्रा. हर ४ या ६ घण्टे पर शरबत के साथ देते हैं। यदि रोग के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जावेगा तो ज्वर बढ़ने नहीं पावेगा। इसका उपयोग आन्त्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) औषधि के रूप में किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। बच्चों को ३ ड्रा. की मात्रा में शरबत के साथ पर्याप्त है। (५) हृद्रोग में इसके प्रयोग से आध्मान कम हो कर हृदय के ऊपर का दबाव दूर होता है जिससे हृदय को बल प्राप्त होकर मूत्र अधिक होने लगता है तथा सर्वाङ्गशोथ एवं जलोदर में लाभ होता है। (६) इसके स्वरस को २, ४ भाग जल में मिला कर क्षत तथा दुर्गन्धित व्रण प्रक्षालन के काम में लाया जाता है जिससे वेदना कम हो कर व्रण जल्दी ठीक होता है। कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid) की अपेक्षा इससे धातुओं को कम नुकसान होता है। इसी प्रकार शोथ, विद्रधि, बालतोड़ एवं दाद आदि पर इसका लेप लाभदायक है। इससे सिद्ध सर्षप तैल का उपयोग खुजली (पामा) में किया जाता है। रोहिणी (Diphtheria) नामक अत्यन्त उग्र गले के विकार में इसकी एक, एक कली चूसने को दी जाती है। ३, ४ घण्टे में १ छटांक तक लहसुन दिया जाता है। विकृत कला (Mem- brane) के दूर होने पर दिन भर में १ छटांक तक लहसुन देना चाहिये । शिशुओं के लिये इसके रस को २०-३० बूंद हर चार घण्टे पर शरबत के साथ देना चाहिये। एक रोगी में नाड़ीव्रण

१३४ भावप्रकाश निघण्टुः (Sinus) के लिये इसके ताजे स्वरस को २ बूंद की मात्रा में हर छठे दिन स्थानिक सूचिकाभरण किया गया जिससे ४ इञ्च गहरा नाड़ीव्रण २ महीने के अन्दर ठीक हो गया। उपजिह्वा शोथ में इसका स्थानिक प्रयोग सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) की अपेक्षा अच्छा होता है। (७) कर्णशूल में इसके गुनगुने रस का या इससे सिद्ध तैल का उपयोग लाभदायक है। इससे बाधिर्य में भी लाभ होता है। (८) आर्तवप्रवर्त्तक होने के कारण इसका उपयोग अनात्तंव एवं कष्टार्तव आदि में किया जाता है। गर्भिणी में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (९) मवेशियों में अँन्थ्राक्स (Anthrax) नामक रोग के प्रतिबन्धन के लिये एवं सर्पविषादि में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। हानिनिवारक - कतीरा, धनियां एवं बादाम का तेल। मात्रा - स्वरस १०-३० बूंद; कल्क २-३ माशा। ७८ एकपुतिया लहसुन हि०-लहसुन, एककांदा लहसुन, एककली लहसुन, एकपुती लहसुन, एकपुतिया लहसुन। बं०-गांथुन। अं०-Shallot (शॅलोट), One Clove Garlic (वन क्लोव गार्लिक)। लै०-Allium ascalonicum Linn. ( एलियम् ॲस्कॅलोनिकम् लिन ) Fam. Liliaceae ( लिलिएसी ) । यह अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसकी जड़ दो वर्ष या इससे कुछ अधिक ही जीवित रह सकती है। इसके साथ कई एक अण्डाकार लम्बे जावे रहते हैं। यह १-२॥ इञ्च तक लम्बा और मध्यमा अङ्गुली के समान मोटा होता है। पत्ते-उक्त लहसुन के समान लम्बे, पतले, चिकने और पोले से होते हैं। जड़ से ही अनेक पत्ते निकलते हैं और पत्तों के बीच से दण्ड निकलता है जो एक दो फुट लम्बा, नीचे फूला हुआ किन्तु क्रमशः ऊपर संकुचित और गोल होता है। इसके अन्त में लट्टू के समान फूलों का गुच्छा लगता है। प्रत्येक गुच्छे में लगभग २०० तक नन्हें श्वेत वर्ण के फूल रहते हैं। वे प्याज के फूलों के समान दिखाई पड़ते हैं। इसके कन्द में एक ही जावा रहती है तथा यह कोमल प्याज की तरह दिखलाई देता है। गुण और प्रयोग - इसके गुण लहसुन की तरह ही होते हैं लेकिन विशेष कर यह वृष्य है। वाजीकरण के लिये इसको घी में भून कर मधु के साथ सेवन कराया जाता है। कर्णशूल में इसका टुकड़ा कान के अन्दर रखते हैं। इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। नोट - प्याज की तरह लाल रंग का एक और जंगली लहसुन होता है जो ईरान में अधिक होता है। उसे लै० में-एलियम् लेप्टोफाइलम्, वॉल (Allium leptophyllum, Wall.), ईरान में-सीर-इ-पिआझक् एवं अरव में-थूम-एल-बरी कहा जाता है। गुण और प्रयोग - यह स्वेदल होता है। इसका अचार कुपचन में व्यवहार में लाया जाता है। अथ पलाण्डुः (पियाज ), तस्य नामगुणानाह पलाण्डुर्यवनेष्टश्च दुर्गन्धो मुखदूषकः । पलाण्डुस्तु बुधैर्ज्ञेयो रसोनसदृशो गुणैः ॥ २२६ ॥ स्वादुः पाके रसेऽनुष्णः कफकृन्नातिपित्तलः । हरते केवलं वातं बलवीर्यकरो गुरुः ॥ २२७ ॥ पियाज के नाम तथा गुण - पलाण्डु, यवनेष्ट, दुर्गन्ध और मुखदूषक ये सब पियाज के नाम हैं। पियाज को गुणों में लहसुन के समान समझना चाहिये। पियाज-रस तथा पाक में मधुर रस हरीतक्यादिवर्गः १३५ युक्त, अनुष्ण (ईषत् उष्णवीर्य) एवं कफकारक होता है। और यह अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है। यह केवल वातहर होता है तथा बल और वीर्य को करनेवाला एवं गुरु होता है। ७९ पियाज हि०-पियाज, प्याज । बं०-पेयाज। पं०-गण्डा। म०-कांदा। ते०, क०-नीरुल्लि। गु०- डुङ्गळी, कांदो । मा०-कांदो, कांदा । ता०-वेंगयम। फा०-प्याज। सिन्ध०-लुमु, बसर । मला०- बदंग। अ०-बस्ल। अं०-Onion (ओनियन् ) । लै०-Allium cepa, Linn. (एलियम् सिपा, लिन० )। Fam. Liliaceae ( लिलिएसी ) । प्याज की खेती प्रायः सब प्रान्तों में की जाती है। इसका पौधा-हाथ डेढ़ हाथ ऊँचा होता है। पत्र-दो कतारों में तथा पुष्पदंड से छोटे होते हैं। इनके बीच से दंड निकलता है। इसके ऊपर लट्टू के समान गोल गुम्मजदार गुच्छों में सुहावने हरापन लिये सफेद फूल लगते हैं। इनमें से तिकोने काले बीज निकलते हैं। इसके नीचे जो कन्द बैठता है उसी को प्याज कहते हैं। किंचित् गुलाबी और सफेद रंगों के भेद से प्याज दो जाति का होता है। दोनों के पौधे एक समान होते हैं। औषधि में लाल जाति का प्याज उपयोग में लाना चाहिये । रासायनिक संगठन - इसमें एक उग्रगन्धि एवं कटु तैल तथा गन्धक के सेन्द्रीय योग पाये जाते हैं। इसके बाह्य छिलके में एक केर्सटीन (Quercetin) नामक पीत रंजक पदार्थ होता है तथा कंद में शर्करा भी होती है। गुण और प्रयोग - पियाज का उपयोग प्राचीन काल से आहार द्रव्य के रूप में किया जा रहा है। गरुड़पुराण में पलांडुगुटिका का पाठ है। यह किंचित् उष्ण, कफनिःसारक, उत्तेजक, वृष्य, बल्य, मूत्रजनन, आर्तवजनन, अग्निवर्धक, आनुलोमिक एवं उत्तम वांतहर है। इसके सेवन से कफ ढीला होकर निकलने लगता है एवं दूषित पित्त भी निकल जाता है। ( १ ) बच्चों एवं वृद्धों के कफविकारों में विशेषकर जब ज्वर न हो तब यह लाभदायक है। कच्चे प्याज के रस को मिश्री मिलाकर बच्चों को चटाया जाता है तथा वृद्धों में इसको पकाकर देते हैं। क्षयजकास में इससे कष्ट कम हो जाता है। श्वसनियों के जीर्ण शोथ के लिये लाभदायक औषधियों में यह श्रेष्ठ ओषधि है। ( २ ) वाजीकरण के लिये इसके रस को मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। ( ३ ) अर्श में इसके रस को १-२ तो० मिश्री के साथ पिलाते हैं या प्याज को पकाकर उसमें मिश्री, घी तथा जीरा मिलाकर खिलाते हैं एवं गरम २ मस्सों पर बांधते हैं। ( ४ ) मसूढ़ों की सूजन तथा शूल में इसको नमक के साथ खिलाते हैं। ( ५ ) इसका क्वाथ आन्त्रावरोध, अर्श, कामला एवं गुदभ्रंश आदि में लाभदायक है। ( ६ ) विसूचिका में इसके रस के साथ चूने का पानी मिलाकर पिलाते हैं। अग्नि वृद्धि के लिये सिरके के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। प्लेग आदि मरक के समय कच्चे प्याज या सिरके के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ( ७ ) अपतन्त्रक तथा नासिका से रक्तस्राव होने पर इसका नस्य कराया जाता है। चक्कर आता हो तो इसको सुंघाते हैं। ( ८ ) कर्णपिटिका में इसका पुटपाक करके साधारण गरम रस कान में डालने से शूल कम हो जाता है। इसके बीच के टुकड़े को भी कान में रखने से लाभ होता है।

१३६ भावप्रकाशनिघण्टुः (९) अंधता तथा धुन्ध आदि विकारों में इसका रस मधु में मिलाकर नेत्र में लगाते हैं तथा रात्रंध में नमक के साथ इसका रस डालते हैं। (१०) इसको घी में भूनकर उसका पोल्टिस गांठ, फोड़े, बद एवं व्रण आदि पर लगाया जाता है। आमवातादि संधिविकार एवं अन्य दाह, कण्डू आदि चर्म रोगों में इसके रस को सरसों के तेल में मिलाकर मलते हैं। (११) बिच्छू तथा अन्य कीड़ों के काटने पर इसमें रस को लगाने से दाह एवं वेदना की शांति होती है। (१२) प्याज के बीज बाजीकर होते हैं। इसको पीसकर मधु के साथ खालित्य, व्यंग एवं झांई आदि पर लगाते हैं। दाद में सिरका में पीसकर इसे लगाते हैं एवं मसों पर नमक के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ८० जंगली प्याज उपर्युक्त प्याज के अतिरिक्त इसी वर्ग का एक जंगली प्याज होता है जिसकी दो तीन किस्में भारतवर्ष में पाई जाती हैं। यह डाक्टरी स्क्लिल (Squill) नामक औषधि अर्जिनिया मेरिटिमा (Urginea maritima (Linn.) Baker) की श्वेत उपजाति जो भूमध्यसागरीय तट पर होती है उसका अच्छा प्रतिनिधि है। यह अत्यन्त उपयोगी होने के कारण यहाँ उसका वर्णन दिया जा रहा है। लोग इसे रा० नि० एवं नि० २० का कोलकंद मानते हैं। दोनों निघण्डकार उसे 'वान्तिशमनकृत्' लिखते हैं लेकिन जंगली प्याज 'वान्तिजननः' होता है। (क) ले०-Urginea indica, Kunth. (अर्जिनिया इण्डिका, कुंथ) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) सं०-कोलकन्द, वनपलांडु । हि०, बं०-कांदा, जंगली प्याज । गु०-जंगली कांदो, पाण कंदो । म०-रानकांदा, कोलकांदा, कोचिंदा । ता०-नेरि वंगायम् । ते०-अडवितेलु गड्ड । पं०-कफोर, कचवस्सल अ०-उन्सुलै हिंदी । फा०-पियाज सहराई । अं०-Indian Squill (इण्डियन स्क्लिल) । यह पश्चिमी हिमालय में ७००० फीट तक, गढवाल, कुमाऊं, बिहार एवं कारोमंडल तट तथा कोंकण के रेतीले किनारों एवं पश्चिमी घाट पर पाया जाता है। यह वनस्पति सुदर्शन सदृश होती है। पत्र-मूलीय, ६-१८ इञ्च लम्बे, प्याज से बड़े और चौड़े, चिपटे, रेखाकार एवं नोकदार होते हैं। पत्रों के निकलने से पूर्व बीच से सदण्डिक पुष्पध्वज (Scape-स्केप) निकलता है जिस पर हरित्ताभ श्वेत पुष्प निकलते हैं। फल-सामान्यस्फोटी फल (Capsule-केप्सूल) अण्डाकार, ।।-।।। इञ्च लम्बे, दोनों ओर क्रमशः पतले होते हुये एवं ६-९ बीजों से युक्त होते हैं। बीज-छोटे, दीर्घवृत्ताकार, चिपटे तथा काले होते हैं। इसका कन्द प्याज की तरह २-४ इञ्च लम्बा, लट्वाकार एवं परिच्छदपत्रक (Tunicated Bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप का होता है। इसके कटे हुये टुकड़े मुड़े हुए, चिपटे, विभिन्न आकार के आधे से दो इञ्च लंबे, दोनों छोर की तरफ क्रमशः पतले होते हुए, कभी कभी तीन या चार एक साथ, काण्डक से चिपके हुए, लंबाई में रीठदार ए हल्के पीताभ बादामी या हल्के पीत विभिन्न वर्ण के होते हैं। ये छिलके शुष्क अवस्था में सहज चूर्ण बनाने लायक एवं आई हो जाने पर चिमड़े एवं लचीले हो जाते हैं। इनमें गंध नहीं होती तथा इनका स्वाद तिक्त एवं कड़ होता है। ताजा कन्द खाने से जीभ पर कण्डू मालूम होती है। पहिले वर्ष के नींबू के इतने बड़े कन्द हरीतक्यादिवर्गः १३७ का व्यवहार करना चाहिये । पुष्पित होने पर इसके कोमल कंदों को निकाल कर, उनके ऊपर के पतले छिलकों को हटा कर, उनके टुकड़े करके सुखाकर शुष्क स्थान में रखा जाता है। इसका चूर्ण हवा से जल सोख लेता है इसलिये इसको बिलकुल शुष्क बंद पात्र में रखना चाहिये । (ख) Scilla indica, Baker (सिल्ला इण्डिका, बेकर) । हि०, बं०-सुफेदी खस । बंबई- भुइकांदा । ता०-शिरु-नेरि-वंगयम् । यह दक्षिणी पेनिनसुला में कोंकण एवं नागपुर से दक्षिण की तरफ समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है। इसी से मिलती-जुलती एक जाति सिं० होहेनंकरी (S. hohenack- eri ) पंजाब में मिलती है। इनके कन्द श्वेताभ बादामी, अंशच्छद पत्रक (Scaly bulb) स्वरूप के, जायफल के इतने बड़े, गोल या अंडाकार एवं कभी-कभी बगल से दबे हुए होते हैं। इनके मांसल छिलके (शल्क पत्र) बहुत चिकने होते हैं एवं इनके किनारे परस्पर ढके रहने के कारण इनका एक ही पर्त मालूम होता है। (क) और (ख) दोनों ही के गुण समान हैं तथा बाजार में दोनों के कंद मिले हुवे बिकते हैं तथा इनके शुष्क टुकड़े भी बिकते हैं। ये कंद विदेशी कंदों से कुछ छोटे होते हुए भी उन्हीं की तरह कड़वे एवं हल्लासकारक होते हैं। (क) और (ख) के कंदों में यही अन्तर है कि (क) के कन्द परिच्छद पत्रक (Tunicated bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप के एवं (ख) के कंद अंशच्छ- दपत्रक (Scaly bulb-स्कैली बल्ब) स्वरूप के होते हैं। रासायनिक संगठन - ताजे कंद में सिल्लारेन-ए (Scillaren-A, C_{36}H_{52}O_{13}) नामक एक रवेदार ग्लाइकोसाइड (Glycoside) तथा सिल्लारेन-बी (Scillaren-B) नामक चूर्ण रूप का ग्लाइकोसाइड (Glycoside) पाया जाता है जिनमें से दूसरे में कम से कम दो ग्लाइको साइड मिले रहते हैं। इनमें से सिल्लारेन-ए जल में बहुत कम घुलता है और सिल्लारेन-बी जल और क्लोरोफार्म में घुलने वाला एवं अल्कोहल या ईथर में न घुलने वाला होता है। कंद में जिस अनुपात में ये दोनों ग्लाइकोसाइड रहते हैं उनका सिल्लारेन (Scillaren) नामक मिश्रण जल में सरलता से घुल जाता है तथा वह बहुत दिन तक खराब भी नहीं होता। भारतीय स्क्लिल में उपर्युक्त ग्लाइकोसाइड के अतिरिक्त गोंद, कर्वोज, फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol) एवं कॅल्शियम ऑक्झैलेट् (Calcium oxalate) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, कफनिःसारक, हृदयोत्तेजक, हृद्य, मूत्रविरेचक तथा उत्क्लेश एवं वमनकारक है। इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् (Digitalis) के समान होती है जिससे हृदय की गति कम होती है एवं हृदय का कार्य ठीक होने से हृदय को बल प्राप्त होता है। पचन- संस्थान द्वारा इसका प्रचुषण कम होने के कारण इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में इससे महास्रोत में प्रकोप होकर वमन, अतिसार एवं रक्तातिसार होता है। यह स्थानिक प्रक्षोभक प्रभाव इसमें के रैफाइड्स (Raphides) के कारण होता है। हृदय पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशी की अपेक्षा प्राणदा नाड़ी (Vagus nerve) के द्वारा अधिक होता है। डिजिटॅलिस् की अपेक्षा इसकी क्रिया शीघ्र एवं अस्थायी होने के कारण इससे संचायी दुष्परिणाम नहीं होते। अल्प मात्रा में इसके प्रयोग से आमाशय में साधारण प्रक्षोभ होकर प्रत्यावर्तन क्रिया द्वारा कफ निकलने लगता है।

१३८ भावप्रकाशनिघण्टुः वृक्क द्वारा उत्सर्ग के समय वृक्क कोशों को उत्तेजित करने के कारण डिजिटैलिस की अपेक्षा इससे मूत्रविरेचन अधिक होता है। अधिक मात्रा में रक्तमेह भी हो सकता है। इसका नूतन वृक्क रोगों में प्रयोग नहीं करना चाहिये । ( १ ) हृदयोदर, सर्वांग शोफ एवं जलोदर आदि में इसका उपयोग किया जाता है। जिन व्यक्तियों में डिजिटैलिस के प्रति असहनशीलता होती है उनमें तथा जिनको जीर्ण कफविकार भी साथ २ रहते हैं उन्हें यह ज्यादा उपयोगी है। इससे काफी मात्रा में मूत्रस्राव होता है। इसका मूत्रल प्रभाव प्रत्यक्ष वृक्क कोशों की उत्तेजना से एवं रक्ताभिसरण की क्रिया ठीक होने से है। हृदशोदर में गेजपिल ( Guy's Pill ) नामक पारद एवं डिजिटैलिस के साथ बनी इसकी गोलियों का व्यवहार किया जाता है। ( २ ) बच्चों के जीर्ण श्वसनी विकारों में इसके शर्बत का उपयोग १०-१५ बूंद की मात्रा में किया जाता है। जीर्ण कफ विकारों में इससे तीन तरह से लाभ होता है। जीर्ण कफविकारों में हृदय के दक्षिण विभाग में जो शिथिलता आई रहती है वह दूर होती है, कफढीला होकर निकलने लगता है एवं पाचन सुधरकर शौच भी साफ होने लगता है। जिनमें कफ बहुत एवं चिपचिपा होता है उनमें इससे विशेष लाभ होता है। नूतन कफविकारों में इसका प्रयोग नहीं किया जाता। इपीकैक की अपेक्षा अधिक प्रक्षोभक होने के कारण वमन के लिये भी इसका उपयोग नहीं करते हैं। ( ३ ) पादकंटक ( Corn = कॉर्न ) पर इसके कंद को पकाकर पीसकर गरम गरम बांधते हैं तथा मस्सों ( Warts = वार्ट्स ) पर इसके चूर्ण को मला जाता है। मात्रा-शुष्क चूर्ण ३-१३ र०; सिरप (शर्बत) ३०-६० बूंद; टिंकचर ५-३० बूंद । अथ भल्लातकः ( भिलावा ), तन्नाम तत्पक्वफलमज्जवृन्तानां तस्य च गुणानाह भल्लातकं त्रिषु प्रोक्तमरुष्कोऽग्निरोऽग्निकः । तथैवाग्निमुखी भल्ली वीरवृक्षश्च शोफकृत् ॥ भल्लातकफलं पक्वं स्वादुपाकरसं लघु । कषायं पाचनं स्निग्धं तीक्ष्णोष्णं छेदि भेदनम् ॥ मेध्यं वह्निकरं हन्ति कफवातव्रणोदरम् । कुष्ठार्शो ग्रहणीगुल्मशोफानाहज्वरकृमीन् ॥ तन्मज्जा मधुरा वृष्या बृंहणी वातपित्तहा । वृन्तमाधुस्करं स्वादु पित्तघ्नं केश्यमग्निकृत् ॥ भिलावा के नाम तथा उसके पके फल, मींगी और वृन्त के गुण-भल्लातक (यह शब्द तीनों लिङ्ग में होता है), अरुष्क, अरुष्कर, अग्निक, अग्निमुखी, भल्ली, वीरवृक्ष और शोफकृत् ये सब भिलावा के पर्यायवाची नाम हैं। भिलावे का पका फल-पाक में मधुर रस युक्त, लघु, मधुर एवं कषाय रस युक्त, पाचक, स्निग्ध तीक्ष्ण तथा उष्णवीर्य, छेदी, भेदक, मेध्य (धारण- शक्ति के लिये हितकर) एवं अग्निवर्धक होता है। यह कफ, वायु, व्रण, उदररोग, कुष्ठ, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, शोथ, आनाह, ज्वर तथा कृमि रोग को दूर करता है। भिलावे की मींगी- मधुर रस युक्त, वृष्य, बृंहण एवं वात पित्त को शान्त करने वाली होती है। भिलावे का वृन्त (डेंपी जिसमें फल लगा रहता है) मधुर रस युक्त, पित्तनाशक, बालों के लिये हितकर तथा अग्नि- वर्धक होता है ॥ २२८-२३१ ॥


हरीतक्यादिवर्गः १३६ अथ सामान्यतो भल्लातकगुणानाह भल्लातकः कषायोष्णः शुक्रलो मधुरे लघुः । वातश्लेष्मोदरानाहकुष्ठार्शो ग्रहणीगदान् ॥ हन्ति गुल्मज्वरश्वित्रवह्निमान्द्यकृमिब्रणान् ॥ २३२ ॥ साधारण रूप से भिलावे का गुण-भिलावा-कषाय तथा मधुर रसयुक्त, उष्णवीर्य, वीर्यवर्धक एवं लघु होता है और यह वातकफ, उदररोग, आनाह, कुष्ठ, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, ज्वर, श्वित्रकुष्ठ, अग्निमान्द्य, कृमिरोग तथा व्रण को दूर करता है ॥ २३२ ॥ ८१ भिलावा। हि०, पं०-भिलावा, भेला । बं०-मेला, भेलातुकी। म०-बिब्बा। गु०, मा०-भिलामो । क०-गेरकायि । ते०-जिडिमेट्ट्लु, जीड़ीविट्टुलु । ता०-शेनकोट्टै । मला०-चेर्मरं । फा०-बलादुर, बिलादुर । अ०-हब्बुलकुल्ब, हब्बुलफहूम । अं०-The Marking-nut tree (दि मार्किंग् नट् टी। ले०--Semecarpus anacardium, Linn. (सेमैकार्पस् ॲनाकार्डियम्, लिन.) Fam- Anacardiaceae (ॲनाकार्डिएसी) । भिलावे के वृक्ष इस देश के विशेष कर गरम प्रान्तों में एवं हिमालय के निचले भागों में ३५०० फीट की ऊंचाई तक सतलज से पूर्व की ओर आसाम तक उत्पन्न होते हैं। इसका वृक्ष देखने में सुन्दर २० से ४० फीट तक ऊँचा होता है। छाल-एक इञ्च मोटी धूसर रंग की होती है। छाल पर चोट मारने से उसमें से एक प्रकार का दाहजनक भूरे रंग का गाढ़ा रस निकलता है जो वार्निश बनाने के काम में आता है। लकड़ी-खाकी मिश्रित लाली युक्त सफेदी या भूरे रङ्ग की होती है। छोटी २ शाखाओं के नीचे कुछ तीक्ष्ण रोवें होते हैं। डालियों के अन्त में सघन पत्ते रहते हैं और वे ९ से २४ इञ्च तक लम्बे तथा ५ से १४ इञ्च तक चौड़े, ऊपर से लट्वाकार-आयताकार एवं सरल धारवाले होते हैं। माघ में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और फागुन में नवीन पत्ते निकल आते हैं, माघ फागुन में इसका वृक्ष फूलता है किन्तु इसके सिवाय कई बार वृक्षों पर फूल देखने में आते हैं। नन्हें २ फूलों की मञ्जरियाँ आती हैं। पुष्पदल- हरापन युक्त सफेद या हरापन युक्त पीले होते हैं। फल-एक इञ्च लम्बा तथा पौन इञ्च चौड़ा, चिपटा सा, हृदयाकृति, चमकीले काले रंग का तथा चिकना होता है। कच्चे फलों में दूध जैसा श्वेत वर्ण का रस होता है जो पकने पर कुछ गाढ़ा एवं काले रंग का हो जाता है। इस फल का आधारभाग मांसल तथा नारंगी वर्ण के स्तम्भक से बना होता है जो खाने के काम आता है। फलत्वक् में एक स्फोटकारक विषैला रस होता है जिससे धोबी कपड़ों में निशान लगाने की स्याही बनाते हैं। फल के अन्दर की मज्जा स्वादिष्ट होती है तथा वह भी खाने के काम आती है। कुछ लोगों में पुष्पित भल्लातक वृक्ष के पास सोने से या पुष्पपराग की हवा लगने से शरीर पर सूजन आ जाती है। भल्लातक शोधन-औषधि में प्रयोग के लिये अच्छे सुपक्व तथा जल में डालने पर जो डुब जाँय ऐसे भिलावों को लेकर कतर कर ईंट के टुकड़ों के साथ बोरे के अन्दर रगड़ कर फिर धोकर काम में लाना चाहिये। इससे उसके अन्दर का तैल सदृश रस कम होकर उसकी तीव्रता कम हो जाती है। इसके शोधन के पूर्व मुख, हाथ एवं पैर आदि खुले अंगों पर नारियल का तैल लगा लेना चाहिये। कुछ लोग फलों को केवल उबाल कर ठंडे जल से धोकर काम में लाते हैं।

१४० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके रासायनिक संगठन के विषय में कुछ मतभेद हैं और अभी संशोधन की आवश्यकता है। लेकिन इतना निश्चित है कि फलत्वक् के स्वरस में एक दाहजनक तैलीय पदार्थ एवं मज्जा में काजू की तरह पौष्टिक द्रव्य और एक प्रकार का तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—भिलावा उष्ण, रसायन, मेध्य, वाजीकर, वातकफहर, मूत्रजनन, वातनाडी- बल्य, अग्निवर्धक, व्रणोत्पादक एवं कुष्ठघ्न है। इसका प्रत्यूषण बहुत जल्दी होता है लेकिन उत्सर्ग बहुत देर में होता है। आमाशय एवं उत्तरगुद पर इसकी विशेष क्रिया होती हैं। यकृत् पर उत्तेजक क्रिया होने से पित्तस्राव ठीक होता है जिससे भूख बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण और विनिमय क्रिया ठीक होने से अर्श में लाभ होता है। त्वचा से उत्सर्ग के समय स्वेद आता है तथा त्वचा लाल हो जाती है। वृक्क पर उत्तेजक प्रभाव होने के कारण प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन बाद में कम हो जाती है तथा कभी कभी मूत्र में खून भी आ जाता है। इसका वाजीकर प्रभाव वातनाड़ियों की उत्तेजना से एवं प्रत्यक्षतया मूत्रनलिका के प्रक्षोभ से होता है। प्रत्यक्ष मांसपेशियों की अपेक्षा वातनाड़ियों को बलप्राप्त होने से यह अनेक वातरोगों में लाभ- दायक है। इससे नाड़ी की गति बढ़ती है तथा हृदय का कार्य भी ठीक होने लगता है। रस- ग्रन्थियों की उत्तेजना से श्वेतकणों की वृद्धि होती है जिससे शोथ आदि में लाभ होता है। इस प्रकार शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होने से योग्यरूप में सेवन से इसको अमृत के समान लाभ- दायक एवं रसायन मानते हैं। बाह्य त्वचा पर भिलावे का तैल लगने से त्वचा काली होकर जलन होती है एवं फोड़े होकर व्रण उत्पन्न होते हैं। उचित रूप में प्रयोग करने से आन्तरिक प्रयोग में इस प्रकार के लक्षण नहीं होते। इसका उपयोग अर्श, वातविकार, कफविकार, फिरंग, गण्डमाला, कृमि, विसूचिका, गुल्म, आमवात एवं कुष्ठ आदि रोगों में किया जाता है। (१) भिलावे को दीपक पर गरम करने से जो तेल टपकता है वह दूध में टपकाकर हरिद्रा एवं मिश्री मिलाकर फुफ्फुस विकारों में रात के समय दिया जाता है। प्रारम्भ में एक बूंद तथा धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हैं। तमकश्वास पीड़ित रोगियों के लिये शीत ऋतु में इसका नित्य प्रयोग लाभदायक है। उपजिह्वा एवं गलतोण्डिका की शिथिलता से उत्पन्न कास में भी इससे लाभ होता है। फुफ्फुसपाक में मुलैठी के साथ भिलावा दिया जाता है। (२) अग्निमांद्य, कुपचन, आनाह, विबन्ध, ग्रहणी, अर्श, उदर, गुल्म एवं विसूचिका आदि रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे स्निग्ध पदार्थों का पाचन अच्छी तरह से होता है। अर्श में भिलावा, हर्रा एवं तिल समान मात्रा में लेकर दुगुने गुड़ के साथ गोली बना- कर ३-६ माशा खिलाते हैं तथा इसका धुआं भी दिया जाता है। हैजे में एक भिलावे को आधा तो ला इमली के साथ पीसकर २ तोला लहसुन के रस के साथ पिलाते हैं। (३) रसायन के लिये १ भिलावे को काटकर एवं कूटकर १६ गुने जल में उबाल कर आधा रहने पर फिर ८ गुना दूध मिलाकर फिर उबाले तथा आधा शेष रहने पर उस क्षीर को छानकर १-२ तो० की मात्रा में प्रयोग करे। इसके पूर्व थोड़ासा घी मुख में चारों तरफ लगा लेना चाहिये तथा थोड़ासा घी निगलना भी चाहिये। प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु में इसका उपयोग करने से किसी प्रकार के रोग नहीं होने पाते। हरीतक्यादिवर्गः । १४१ (४) वातनाड़ी शोथ, गृध्रसी, अर्दित, अंगघात, उरुस्तम्भ, मस्तिष्कावरण शोथ तथा मान- सिक कार्य अधिक करने के कारण उत्पन्न थकावट में इसको इमली की पत्ती, लहसुन, वायविडङ्ग, नारियल का रस एवं मिश्री के साथ खिलाते हैं। (५) भिलावा १ भाग, काजू ६ भाग एवं शहद १ भाग अच्छी तरह घोटकर २ माशा दिन में ४ बार देने से नूतन तथा तीव्र आमवात में दो तीन दिन में ही लाभ होता है। जीर्ण आमवात में विशेष लाभ नहीं होता है। (६) गण्डमाला के लिये भिलावा २, अजवायन २ एवं पारद १ इसको घोंटकर चने बराबर इसकी गोली दही के साथ खिलाई जाती है। (७) इसके तैल का आंतरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। एक से दो बूंद तैल किसी अन्य तिलादि अक्षोभक तैल में मिलाकर फिरंग, गण्डमाला, कुपचन, अर्श, नाडी दौर्बल्य, चर्मरोग, कृमि, अपस्मार, अंगघात, आमवात एवं श्वास आदि रोगों में दिया जाता है। (८) इसका काथ दुग्ध एवं घृत के साथ नाडी शोथ, वातबलासक, संखिया के विष से उत्पन्न नाड़ीविकार एवं आर्तवविकार में लाभदायक है। (९) इसके तैल का बाह्यप्रयोग प्रतिक्षोभक (Counter irritant) एवं स्फोटोत्पादक (Vesicant) के रूप में किया जाता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसका ज्यादा उपयोग होता है। चर्मकील, दद्रु, किलास सन्निपीड़ा, मोच, चित्र, गजचर्म, कुष्ठज ग्रन्थि एवं प्लीहावृद्धि आदि पर सुई के नोक से कई जगह इसको लगाते हैं या इसको मक्खन के साथ मिलाकर मलहम के रूप में प्रयोग करते हैं। (१०) इसकी मज्जा वाजीकर होती है। गरी एवं चिरौंजी के साथ इसका पाक सेवन कराया जाता है। विषैला प्रभाव—किसी किसी को भिलावा सहन नहीं होता है। इससे मूत्र का रंग गहरा, शरीर में दाह, खुजली, चकत्ते, अतिसार, ज्वर एवं कभी-कभी रक्तमेह, फोड़े फूट कर व्रण एवं उन्माद आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा कम होती है तथा उसका रंग धुंधला होने लगता है। गुदा एवं शिश्नेन्द्रिय के मुख पर कण्डू उत्पन्न होती है। प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न होते ही औषधि को बन्द कर नारियल का दूध या इमली की पत्ती का रस या तिल एवं नारियल खाने को देना चाहिये। शरीर पर नारियल का तेल, घी, राल या नागद्रव (Lead lotion-लैड लोशन) का बाह्य उपयोग करना चाहिये। पथ्य—भिलावे के प्रयोग के समय घी, दूध एवं चावल का सेवन अधिक करना चाहिये। वर्ज्य—धूप में घूमना, स्त्रीसहवास, मांसभक्षण, नमक, व्यायाम एवं तैलाभ्यङ्ग आदि छोड़ देना चाहिये। निषेध—पैत्तिक विकार, रक्तस्रावी प्रवृत्ति, गर्भिणी, बाल, वृद्ध, अतिसार, वृक्करोध एवं उष्ण काल में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। मात्रा—तैल—१-२ बूंद, अवलेह—३-३ तो०, क्षीरपाक—१-२ तो० । अथ भङ्गा (भांग), तस्या नाम गुणानाह भङ्गा गञ्जा मातुलानी मादिनी विजया जया ॥ २३३ ॥ भङ्गा कफ हरी तिक्ता ग्राहिणी पाचनी लघुः । तीक्ष्णोष्णा पित्तला मोहमदवाग्वह्निवर्द्धिनी ॥

१४२ भावप्रकाशनिघण्टुः भांग के नाम तथा गुण—भङ्गा, गञ्जा, मातुलानी, मादिनी, विजया और जया ये सब भांग के पर्यायवाची नाम हैं। भांग-कफ को दूर करने वाली, तिक्तरस युक्त, ग्राही, पाचक, लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पित्तकारक तथा मोह, मद, वाणी और जठराग्नि को बढ़ाने वाली होती है ॥ ८२. भांग हिं०-भांग, भंग, बूटी । बं०-सिद्धि । म०-पं०-मा०-भांग । गु०-भांग । ते०-गंजापि । ब्रह्मी०-बिन । मा०-बूटी । क०-भंगी । ता०-कञ्जा । फा०-क(कि)नब, बंग । अ०-हशीश, बर्कुल ख्याल । गांजा हिं०-गांजा, गंजा, गांझा । बं०, म०-गांजा । ता०-गांजा, येला । गु०-गांजो । ते०-गाजाइ, बंगि-अकु । फा०-किनब । अ०-कु(कि)न्नब । अं०-Indian hemp (इण्डियन हेम्प), Cannabis (कॅन्नाबिस्) । ले०-Cannabis sativa, Linn. (कॅन्नाबिस सेटाव्हा, लिन.); Cannabis indica Lam. (कॅन्नाबिस इण्डिका लॅम.) । Fam. Cannabinaceae (कॅन्नॅबिनेंसी) । इसका पौधा भारतवर्ष में हिमालय के निचले प्रदेशों में करीब २ अपने स्वाभाविक रूप में उत्पन्न होता है तथा पंजाब से पूर्व की ओर बंगाल एवं बिहार तक तथा दक्षिण की ओर परतो भूमि में बहुतायत से प्राप्त होता है। उत्तरप्रदेश के अल्मोड़ा, गढ़वाल तथा नैनीताल जिलों में इसकी उपज की जाती है। ट्रावनकोर तथा काश्मीर में भी अल्प मात्रा में इसकी उपज की जाती है। भांग का पौधा पश्चिमी तथा मध्य एशिया का नैसर्गिक (Native-नेटिव्ह) माना जाता है। मुंगेर, पंजाब, नागपुर, बहराइच आदि जिलों की भंग अच्छी समझी जाती है। इसका क्षुप-सीधा ३ से ८ फीट एवं कभी-कभी १६ फीट तक ऊंचा होता है। पत्ते-नीचे के समवर्ती और विषमवर्ती दोनों प्रकार के करतलाकार तथा आधार तक कटे हुये होते हैं। ऊपर वाले पत्ते १-५ भागों में विभक्त और नीचे वाले ५ से ११ खण्ड में कटे हुए तथा ३ से ८ इञ्च के घेरे में रेखाकार-भालाकार दिखाई पड़ते हैं। इनके खण्ड तीक्ष्ण दन्तुर, लम्बाग्रयुक्त, आधार की तरफ संकुचित तथा इनका ऊर्ध्व पृष्ठ गहरे हरे रंग का खुरदरा एवं अधोपृष्ठ हल्के रंग का मृदुरोमश होता है। फूल-हल्के पीत-हरित रंग के, अक्षिलिंगी एवं गुच्छेदार होते हैं। फल-बहुत छोटे, कुछ दबे हुये, बीज के समान चर्मल फल (Achene=एचीनी), स्थायी परिपुष्प (Perianth=पेरियैंथ) से आवृत एवं एक २ बीजों से युक्त होते हैं। भांग के क्षुप स्त्री जाति और पुरुष जाति इन भेदों से दो प्रकार के होते हैं। स्त्री जाति का क्षुप कुछ अधिक ऊंचा तथा उसमें पत्र बहुतायत से तथा गहरे वर्ण के होते हैं। इसका क्षुप पुरुष जाति के क्षुप की अपेक्षा ५, ६ सप्ताह अधिक समय में परिपुष्ट होता है। भांग-यह उपज किये हुए या अपने आप उत्पन्न इस क्षुप के स्त्री एवं पुरुष जाति के सूखे हुए पत्तों को कहते हैं। इसमें पुरुष जाति के पुष्प भी होते हैं। पुरुष जाति के पुष्प, पत्तों की अपेक्षा अधिक मादक नहीं होते जैसा कि स्त्री जाति के पुष्प होते हैं। जून एवं जुलाई के महीने में अधिक ऊँचाई पर होने वाले क्षुपों का एवं मई और जून में मैदानी प्रान्तों वाले क्षुपों का संग्रह किया जाता है। उन्हें काटकर ओस तथा धूप में बार २ रख कर सुखाते हैं तथा सूखने पर दबाकर रखा जाता है। गांजा-उपज किये हुए स्त्री जाति के क्षुपकी सूखी हुई रालदार पुष्पमंजरी को गांजा कहते हैं। इसका रंग मटमैला, हरा, स्वाद कुछ कटु एवं गंध विशिष्ट प्रकार की मादक होती है। गांजे की जटा २॥ इञ्च से २॥ इञ्च तक लम्बी तथा चौड़ी होती है। एक २ इञ्च लम्बी लकड़ियों के चारों ओर फूलदार शाखायें हरीतक्यादिवर्गः १४३ लगी रहती हैं। चरस-गांजा के वृक्ष से एक लसदार राल के समान रस निकल कर जम जाता है उसी को चरस कहते हैं। ओस पड़ने के पश्चात् सुबह चमड़े का कपड़ा पहन कर वृक्षों में रगड़ने से समस्त चरस कपड़े पर लग जाता है उसी को चमड़े से पृथक् कर गोले या ढेले बना लेते हैं। या हाथ और पैरों से पुष्पमंजरियों को रगड़ कर हाथ पैरों में चिपके हुए भाग को खुरच कर जमा कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में उत्पन्न हुए वृक्षों से चरस पृथक् नहीं की जाती इसलिए यहां गांजा तैयार हो जाता है। भारतवर्ष में चरस यारकंद से, काश्मीर के लेह के रास्ते आता है। भारत के दक्षिण तथा पश्चिम में अधिकतर गांजा नाम से भांग और गांजा दोनों का प्रयोग होता है। भांग तो पीस कर बनाये हुये पेय को अधिकतर कहा जाता है। पुरी की तरफ गांजे को ही पीसकर बने पेय को भांग कहा जाता है। भांग, गांजा, चरस तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता है तथा मादक पेय एवं धूम्रपान आदि के व्यसन के रूप में लोग इनका बहुत व्यवहार करते हैं। चरक सुश्रुतादि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं हैं लेकिन बाद में ग्रन्थकारों ने इनका भांग नाम से अधिकतर उपयोग किया हैं। शोधन-भांग तथा गांजे को दूध में दोलायंत्र में पकाकर जल से धोकर सुखाकर प्रयोग में लाना चाहिये । रासायनिक संगठन - गांजे में कॅन्नाबिनोन् (Cannabinone) नामक एक मुलायम बादामी रंग की राल होती है। इस राल का प्रधान तत्व एक लाल रंग का गाढ़ा मादक (Narcotic) तैल होता है जो वायु के साथ संपर्क में आने पर गाढ़ा तथा अल्प वीर्य हो जाता है। इस तैल में एक कॅन्नाबिनोल् (Cannabinol; C21 H26 O2) नामक विषैला तत्व रहता है जो इसमें का कार्यकारी तत्व नहीं है। इस राल के अतिरिक्त इसमें गोंद, शर्करा, कॅल्शियम फॉस्फेट (Calcium phosphate), अत्यल्प मात्रा में उड़नशील तैल, सेन्द्रिय अम्ल, कलमी सोरा एवं नौसादर आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अफ्रीकी, अमेरीकी एवं भारतीय किस्मों के गुणों में विशेष अन्तर नहीं है तथा शुष्क अवस्था में अच्छी तरह रखने से बहुत दिन तक इसके गुण भी कम नहीं होते। गांजे में करीब २६%, भांग में १०% एवं चरस में ४०% राल होती है। गुण और प्रयोग - भांग एवं गांजे के गुण करीब २ समान ही हैं लेकिन भांग की क्रिया विशेषतः आमाशय एवं आंत्र पर, अधिक होती है तथा यह गांजे की अपेक्षा अधिक ग्राही होती है। यह उत्तेजक, वेदनाहर, शांतिकारक, क्षुधावर्धक, आह्लादकारक, सौमनस्यजनन, स्वापजनन, आक्षेपनिरोधी (Anticonvulsant), उद्वेष्टननिरोधी (Antispasmodic), गर्भाशयसंकोचक, मूत्रजनन, संग्राही, बल्य, वाजीकर एवं स्थानिक स्वापजनन है। इसकी प्रधान क्रिया मस्तिष्क पर होती है। सेवन के पश्चात् करीब आधे घंटे में इसका प्रभाव मालूम होने लगता है। गांजे के धूम्रपान के पश्चात् तुरत असर होता है। इसकी क्रिया अफीम तथा मद्यसार की तरह होती है लेकिन इसके वीर्य में विभिन्नता होने के कारण इसका प्रभाव अनिश्चित होता है। अल्प मात्रा में इसके सेवन से कुछ उत्तेजना आती है तथा आह्लाद मालूम होने लगता है। किसी भी कार्य में मन एकाग्र होता है। इसके प्रभाव से काल एवं व्यक्तित्व का ज्ञान नहीं रहता तथा ऐसा मालूम होता है कि घण्टों तक आनन्द से बीता जब कि केवल कुछ मिनट ही बीते रहते हैं। अधिक मात्रा में प्रलाप होता है तथा तत्पश्चात् निद्रा आती है। निद्रा के पश्चात् अफीम की तरह इससे थकावट नहीं आती तथा उतना विबन्ध भी नहीं होता । आक्षेप

१४४ भावप्रकाशनिघण्टुः

निरोधी, उद्वेष्टन निरोधी एवं वेदनाहर गुण बहुत स्पष्ट हैं। भांग से बने पेय से मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका गर्भाशय संकोचक प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशियों के संकोच एवं अप्रत्यक्षतया नाड़ी- संस्थान के द्वारा होता है। सांवेदनिक नाड़ियों की संवेदना शक्ति का घात होने से चर्म में शून्यता तथा झुनझुनाहट होती है। नाड़ी की गति उत्तेजना की अवस्था में बढ़ जाती है तथा बेहोशी की अवस्था में कम हो जाती है। उत्तेजना की अवस्था में श्वसन क्रिया शीघ्र होने लगती है।

साधारण मात्रा में इसके व्यसन से शारीरिक वा मानसिक कोई विकृति नहीं होती है। यह धारणा कि इसके व्यसन से पागलपन (Insanity) की प्रवृत्ति बढ़ती है सिद्ध नहीं हुई है। अधिक मात्रा में यदि निरन्तर उपयोग किया जाय तो शरीर एवं मन को हानि पहुँचती है तथा आत्म- सम्मान का दास एवं नैतिक पतन हो जाता है।

(१) संग्रहणी, अतिसार, रक्तातिसार, कुपचन, आमाशय में पीड़ा एवं विसूचिका में अन्य औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इससे भूख बढ़ती है एवं उद्वेष्टन तथा पीड़ा दूर होती है। विरेचक औषधों के साथ प्रयोग से मरोड़ नहीं होती। विसूचिका के प्रारम्भ में ही इसको देने से लाभ होता है। अतिसार के पश्चात् रोग निवृत्तावस्था में इसका पानक शान्तिदायक औषध के रूप में व्यवहार में आता है।

(२) वेदनाहर गुण के कारण पुराने सिर दर्द, सूर्यावर्त्त (Migraine = माइग्रेन), रजोनि- वृत्ति के समय होनेवाले एवं थकावट आदि से उत्पन्न शिरःशूल में इसका उपयोग किया जाता है। वातनाड़ीशोथ में गांजा के साथ पारद देते हैं एवं वातनाड़ीपीड़ा में गांजा, सोमल एवं लोह देते हैं। टेबीज् डॉर्सेलिस् (Tabes dorsalis) नामक फिरंग से उत्पन्न रोग में एक प्रकार की विद्युत् के समान चपल एवं तीव्र पीड़ा (Lightning pains) होती है जिसमें गांजे से लाभ होता है।

(३) वेदनाहर एवं उद्वेष्टनविरोधी गुण के कारण आन्त्रिक, पैत्तिक एवं वृक्क शूल तथा बस्ति उद्वेष्टन एवं सोजाक से उत्पन्न वेदनायुक्त शिश्नोत्थान (Chordee) में इसका उपयोग किया जाता है। अपतन्त्रक, कम्पवात, वातिक वमन एवं बालकों के आक्षेप में इससे लाभ होता है।

धनुर्वात (Tetanus) के लिये यह बहुत लाभदायक है। इसको अधिक मात्रा में एवं अधिक दिन तक प्रयोग करना पड़ता है। जलसंत्रास (Hybrophobia) में आक्षेप कम करने के लिये इसको देते हैं।

(४) स्वापजनन गुण के कारण निद्रानाश विशेष कर वृद्धावस्था के निद्रानाश (Senile insomnia) में इसका उपयोग किया जाता है।

(५) गांजा से गर्भाशय में संकोच होता है एवं वेदना भी कम होती है जिससे पीडितार्तव, अत्यार्त्तव तथा प्रसव के समय आवि वृद्धि के लिये इसको देते हैं। बीजकोश पीड़ा (Ovarian irritation) में इसको देते हैं।

(६) अर्श में इसके आन्तरिक प्रयोग के साथ भंग को दूध में उबाल कर पीस कर उसकी टिकिया बांधते हैं। हरिद्रा, प्याज तथा तिल के साथ पीस कर लेप करने से एवं इसके धूएँ से भी लाभ होता है।

(७) गांजा अत्यन्त वाजीकर है। मस्तिष्क के ऊपर प्रभाव से आह्लाद उत्पन्न होकर कामवासना बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण को उत्तेजना मिलने से शिश्न अधिक कठोर हो जाता है। इसके साथ २ संवेदना शक्ति के ह्रास से अधिक काल तक घर्षण करने से भी शुक्र पात नहीं होता। अफीम, धतूरा एवं अन्य औषधों के साथ बने पाक का प्रयोग नपुंसकता एवं शीघ्रपतन आदि में किया जाता है।


हरीतक्यादिवर्गः १४५

(८) शुष्क कास, कुकास एवं तमक श्वास में इसको खिलाते हैं अथवा इसका धूम्रपान कराते हैं। फुप्फुसावरण शोथ में पीड़ा शमन के लिये अफीम की अपेक्षा यह अधिक अच्छी है।

(९) जीर्ण आमवात में इसको खिलाते हैं तथा इसके बीजों का तेल मालिश किया जाता है।

(१०) स्थानिक वेदनाशामक होने के कारण विसर्प, वातिक पीड़ा, खुजली एवं जलन में इसका लेप उपयोगी है। अरूंषिका (Dandruff) तथा जूं आदि में सर पर इसका लेप करते हैं।

चरस—यह मदकारी, शुक्रस्तम्भन, मूर्च्छा एवं हृदयदौर्बल्य कारक है। इससे हृल्लास, विबन्ध एवं शिरःशूल आदि नहीं होते तथा तम्बाखू के साथ इसका धूम्रपान उन्माद एवं अपतन्त्रक आदि में शामक औषध के रूप में किया जाता है।

विषैला प्रभाव—भांग एवं गांजा आदि अधिक मात्रा में लेने से आंखें लाल हो जाती हैं। चेहरा फूल सा जाता है, पैर लड़खड़ाते हैं तथा बुद्धि एवं स्मृति का नाश, अभिमान्ध, अनिद्रा, दौर्बल्य, प्रलाप एवं शिरःशूल आदि लक्षण होते हैं। क्वचित् हृदयातिपात से मृत्यु होती है।

हानिनिवारक—वमन कराना एवं दूध, दही, घृत तथा नारंगी, अनार, अमरूद आदि फलों के रस पिलाना चाहिये।

मात्रा—भांग १-४ र०; गांजा १/२-१ र०; चरस ३/४-१/२ र०।

अथ खासखसः (पोस्ता)। तस्य नामानि तत्फलोद्भववल्कलगुणानाह

तिलभेदः खसतिलः खासखसापि स स्मृतः। स्यात् खासफलोद्भूतं वल्कलं शीतलं लघु ॥ ग्राहि तिक्तं कषायाम्लं वातकृत् कफकासहृत् १ ॥ २३६ ॥ धातूनां शोषकं रूक्षमदकृद्वाग्विवर्धनम् २। मुहुर्मोहकरं रुच्यं सेवनात्पुंस्त्वनाशनम् ॥२३७॥

**पोस्ता के नाम तथा गुण—**तिलभेद, खसतिल और खासखस ये सब नाम पोस्ता के हैं। पोस्ता के फल का छिलका शीतल, लघु, ग्राही, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, वातकारक, कफ तथा कास को दूर करने वाला, धातुओं को सुखाने वाला, रूक्ष, मदकारक, वाणी को बढ़ाने वाला, बार-बार मोह- कारक, रुचिकारक और नित्य सेवन करने से पुरुषत्व को नाश करने वाला होता है ॥२३५-२३७॥

८३ पोस्ता

**क्षुपनाम—हि०-**पोस्ता। **बं०-**पोस्तार गाछ। **अ०-**नबातुल खशखाश। **फा०-**कोकनार। लै०-Papaver somniferum, Linn. (पॅपॅवर सॉम्निफेरस, लिन.)। Fam. Papavera- ceae (पॅपॅवेरेसी)।

**फलनाम—हि०-**पोस्त, पोस्ता, खसखस का फल, पोस्त के डोडे। **बं०-**पोस्तोडेरी। म०- अफ़ूचे बोंड, खसखशीचे बोंड। **गु०-**अफ़ीणना डोडा। **ते०-**गसुगसालु। **ता०-**गशगशा चेडि। **मला०-**कशकशा चेटि। **फा०-**पोस्ते कोकनार। **अ०-**किश्रुल खशखाश बुस्तानी। **अं०-**Poppy Capsule (पॉपी कैप्स्यूल)। लै०-Papaveris capsulae (पॅपॅवेरिस् कॅप्सूली)।

अफीम के क्षुप को पोस्ता कहा जाता है। यह क्षुप बाहर से भारतवर्ष में आया है लेकिन यहां की जलवायु अनुकूल होने के कारण इसकी यहां खेती की जाने लगी। चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट एवं चक्रदत्त में अफीम का उल्लेख नहीं है। शार्ङ्गधर (१४, १५ वीं शताब्दी) एवं भावप्रकाश


10 १. 'तत् फलाले'ति पा०। २. 'मेदमदवाग्विहविवर्धनमि'ति पा०। १० भा० नि०

१४६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १६ वीं शताब्दी ) में इसका प्रयोग किया गया है। अफीम की जानकारी के पूर्व लोग पोस्ते की डोडी का उपयोग उत्तेजक एवं मादक पेय के रूप में करते थे। अफीम की खोज सम्भवतः सर्व- प्रथम ग्रीस में हुई तथा पहली शताब्दी में 'एशिया माइनर' इसके व्यापार का केन्द्र रहा। अरबों ने इसका प्रचार चीन एवं भारतवर्ष में किया। मुगलों के समय भारत में इसकी व्यापक रूप में खेती की जाती थी जिससे लोग इसकी डोडी का उपयोग 'कुकनार' नामक मादक पेय के रूप में करते थे। यहां से चीन एवं पूर्वीय देशों को काफी मात्रा में अफीम जाती थी। पंजाब में 'पोस्त' नाम से कुकनार की तरह पेय का प्रयोग किया जाना था। अंग्रेजों के समय इसकी खेती पर व्यापक नियन्त्रण के कारण धीरे धीरे इसकी खेती कम होती गई तथा पोस्ते की डोडी का भी उपयोग कम हो गया। अंग्रेजों के समय इसकी उपज के ३ केन्द्र थे। बिहार एवं बंगाल की अफीम 'पटना या बंगाली' अफीम, उत्तर प्रदेश की अफीम 'बनारसी' एवं राजपुताना के ग्वालियर, भोपाल तथा बड़ोदा आदि स्थानों की अफीम 'मालवा' अफीम कहलाती थी। पंजाब के कुछ भागों में धार्मिक आधार पर इसके खेती को छूट है अन्यथा इसकी खेती के लिये अनुमति पत्र लेना पड़ता है तथा पूरी उपज सरकार निश्चित मूल्य पर खरीद लेती है। आजकल इसकी खेती उत्तरप्रदेश, पूर्वी पंजाब, राजपुताना एवं मध्यभारत में की जाती है। एशिया, यूरोप एवं उत्तरी अफ्रीका के साधारण उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। अक्तूबर, नवम्बर महीने में इसके बीजों को बोते हैं। दिसम्बर में सरकारी अफसर खेत की जांच करते हैं। जनवरी से मार्च तक अफीम का संग्रह करके अप्रिल से जून तक बिकने के लिये भेजी जाती है। काले, लाल और सफेद फूलों के भेद से पोस्त तीन प्रकार के होते हैं। इनमें सफेद फूल वाला पोस्त सबते अधिक प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में होता है। संयुक्तप्रान्त, बिहार और बङ्गाल की ओर सफेद ही होता है। इसका एक वर्षाणु क्षुप-२-४ फुट तक ऊंचा होता है। कांड-चिकना चमकीला हरित क्वचित अल्प रोमश एवं अल्प शाखा युक्त होता है। पत्र-आयताकार, विषम दन्तुर, अल्पशः तरंगी या खण्डित एवं उनका हृदयाकृति फलकमूल कांड को घेरे रहता है। फूल- कटोरीनुमे बहुत सुहावने दिखाई पड़ते हैं। फूल खिलने के एक महीने बाद पुष्पदल के बीच डोडी ( फल ) लगती है। डोडी ( Capsule ) -अण्डाकार या करीब-करीब वर्तुलकार, २-३ इञ्च के घेरे में एवं कभी-कभी आधार एवं शीर्ष पर दबी हुई होती है। इसका शीर्ष टोप की तरह कंगूरे- दार, १२-१५ कंगूरों से युक्त एक बड़े कुक्षि (Stigma = रिटग्मा) से बना होता है। इसका आधार संकुचित होकर एक ग्रीवा बनाता है जो पुष्प दण्ड की तरफ फैली हुई रहती है। इसका रंग हल्का पीताभ या भूरा एवं इस पर कुछ काले रंग के धब्बे रहते हैं। इसकी महीन एवं सिदुर फल भित्ति से अन्दर की तरफ १२-१५ महीन अन्तर्भित्तियां निकली रहती हैं जो बीच में आपस में मिलती नहीं। इसमें शीर्ष पर अक्षि के ठीक नीचे चारों तरफ कई छिद्र बन जाते हैं जिनसे बीज बाहर निकल कर बीज स्फुटन ( Dehiscence ) होता है। इसी डोडी से अफीम निकाली जाती है। सफेद फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन (Morphine ) सबसे कम निकलती है। बाजार में मिलने वाली डोडी टूटी-फूटी तथा उन पर लम्बाई में या आडबल में चीरे लगे होते हैं। डोडी के खानों के भीतर छोटे-छोटे करीब-करीब सफेद रंग के वृक्काकृति अनेक बीज होते हैं। इनकी सतह जाली- दार एवं किनारे सीधे होते हैं। ये गन्धहीन एवं इनका स्वाद मधुर एवं कुछ कड़वा होता है। काले या नीले फूल तथा काले डण्ठल वाला पोस्ता राजपुताना एवं मध्यभारत में बहुत पाया जाता है। इसका पौधा बहुत छोटा और डोडे भी बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसमें मॉर्फीन ( Mor- phine ) श्वेत जाति की अपेक्षा तिगुनी निकलती है।

हरीतक्यादिवर्गः १४७ लाल फूल वाला पोस्ता हिमालय पहाड़ में पाया जाता है। काश्मीर और उत्तरीय भारत के मैदानों में २-३ प्रकार का लाल फूल का पोस्ता स्वयं उत्पन्न होता है। उसके फूलों को 'गुललाला' कहते हैं। इसके डोडे से गहरे रंग के पोस्तदाने निकलते हैं। लाल फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन मध्यम मात्रा में निकलती है। रासायनिक संगठन-पोस्ते की डोडी में ०.१-०.३% मॉर्फीन ( Morphine ) एवं अत्यल्प मात्रा में कोडीन ( Codeine ), पॅपेहेराइन ( Papaverine ) एवं नार्कोटीन ( Narcotine ) आदि क्षाराम एवं मेकोनिक एसिड ( Meconic acid ) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-पोस्ते की डोडी में अल्प मात्रा में अफीम के क्षाराम होने के कारण यह निद्राकर, मादक, वेदनाहर, ग्राही एवं रक्तस्तम्भक होती है। ( १ ) वेदनाहर एवं निद्राजनक होने के कारण इसके फांट या क्वाथ को शिरःशूल, अर्धावभेदक, पार्श्वशूल, कटिशूल, गृध्रसी, उन्माद एवं अनिद्रा आदि में पिलाते हैं तथा इसका स्थानीय लेप किया जाता है। गले के दर्द में इससे गण्डूष कराते हैं। ( २ ) ग्राह्य औषधियों के साथ अतिसार एवं संग्रहणी में इसका चूर्ण बहुत लाभदायक है। रक्तातिसार में देने से रक्त गिरना भी बन्द हो जाता है। बच्चों के दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार में इसका प्रयोग किया जाता है। ( ३ ) मोच, सूजन एवं चमड़े के छिल जाने आदि में इसके फांट या क्वाथ से सेंका जाता है। ( ४ ) शुष्क कास में अन्य औषधों के साथ इसके चूर्ण का उपयोग लाभदायक है। ( ५ ) पीडायुक्त नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप नैत्र के चारों तरफ लगाते हैं। ( ६ ) कर्णपीडा में इसके क्वाथ से सेंका जाता है। ( ७ ) कोकनार नामक मादक पेय के रूप में इसका बहुत प्रयोग किया जाता था एवं अफीम की जानकारी के पूर्व भी मादक एवं उत्तेजक पेय तथा शामक औषध के रूप में इसका व्यवहार किया जाता था। मात्रा-१-२ माशा। अथाहिफेनकम् ( अफीम ) । तस्य नामगुणानाह उक्तं खसफलक्षीरमाफूकमहिफेनकम् । आफूकं शोषणं ग्राहि श्लेष्मघ्नं वातपित्तलम् । तथा खसफलोद्भूतवल्कवत्प्रायमित्यपि ॥ २३८ ॥ अफीम की उत्पत्ति, नाम तथा गुण-पोस्ता के फल के दूध से अफीम बनती है। अतः इसे खस- फलक्षीर भी कहते हैं। खसफलक्षीर, आफूक और अहिफेनक ये नाम अफीम के हैं। अफीम- रक्तादि धातुओं की शोषक, ग्राही, कफनाशक एवं वातरक्तकारक होती है तथा पोस्ता के फल के छिल्के के जितने गुण हैं वे भी इसमें रहते हैं ॥ २३८ ॥ ८४ अफीम । हि०-अफीम, अफयून । बं०-आफिम । म०-अफ़ू । मला०-आलन । मा०-अफीम, अमल । गु०-अफीण । ते०-अभिनि । क०-अफिनि । ता०-अविनी । अ०-अफ्यून, लबुनूल् खशखाश । अं०-Opium ( ओपियम् ) ।

१४८ भावप्रकाशनिघण्टुः उक्त पोस्त के डोडे से अफीम निकाली जाती है। माघ के महीने में इस पर फूल आने के दो सप्ताह बाद डोडे अफीम निकालने लायक जब बड़े हो जाते हैं तब कच्चे (Unripe) डोडों के चौतरफ़ा प्रायः शाम को चीरा कर देते हैं और प्रातःकाल लोहे के चमचा से चीरा द्वारा निकला हुआ दूधिया गोंद उठा लेते हैं। इसी प्रकार ३-४ दिन अन्तर देकर चीरा करते हैं और गोंद इकट्ठा करते हैं। जमीन पर गिरे हुए फूलों को इकट्ठा कर अफीम बाँधने का काम उनसे लिया जाता है। इस प्रकार दूधिया गोंद को इकट्ठा कर कांसे की थाली में रख देते हैं और उसमें से जो जल निकलता है उसको फेक देते हैं। प्रायः एक मास में गाढ़ा होने पर मिट्टी के पात्र में रख देते हैं। यही अफीम है। अफीम सरकार का व्यवसाय होने से सरकारी गुदाम में जमा की जाती है। सरकारी अफीम तीन प्रकार की होती है। पटना अफीम, बनारसी अफीम और मालवा अफीम । मालवा की अफीम सबसे अच्छी समझी जाती है। भारतीय अफीम घनाकार (Cubical) करीब १ सेर के टुकड़ों में पतले नेपाली कागज में लपेटी रहती है। यह कठोर एवं भङ्गुर (Brittle) या कुछ लचीली होती है। इसका आन्तरिक भाग गहरे बादामी (Dark brown.) रंग का, चमकीला, चिकना एवं समांग (Homogeneous) होता है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार की तीव्र अप्रिय गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कडवा होता है। भारतीय अफीम आवकारी एवं औषधीय ऐसे दो प्रकार की होती है। पहले अफीम की खपत चीन देश में बहुत होती थी परन्तु वहां वालों के अफीम खाने के व्यसन को बहुत कमकर देने से तथा सरकारी नियंत्रण के कारण हमारे देश की अफीम की खेती बहुत कम हो गई है और कई एक सरकारी गोदाम भी तोड़ दिये गये हैं। सन् १९०७ में स्थापित गाजीपुर की अफीम फैक्टरी, जो आज भी विश्व में सबसे बड़ी फैक्टरी है, उसका उत्पादन पहले से बहुत घट गया है। आजकल वहां प्रति वर्ष १२ हजार मन से अधिक अफीम तैयार नहीं होती जहां पहले १। लाख मन तक प्रतिवर्ष तैयार होती थी। स्वदेश में १५०० मन वार्षिक की खपत है जिसमें से उड़ीसा सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बाद पेप्सू, पंजाब तथा उत्तरप्रदेश का क्रम है। कारखाने से करीब ३००० रूपये प्रतिमन के भाव से अफीम निकलती है। अफीम बहुधा मिलावटी होती है। इसका वज़न बढ़ाने के लिये धूर्त लोग पोस्तदाने के पत्ते तथा अनेक वस्तुएं मिला देते हैं जिससे औषधि के काम में यह अनुपयोगी हो जाती है। इसलिये वैद्यों को परीक्षा करके व्यवहार करनी चाहिये । परीक्षा-(१) करीब ०.१ ग्रा. अफीम को ५ सी. सी. जल में गरम कर, फिल्टर कागज से छान करके (Filtration) उस द्रव में फेरिक् क्लोराइड् (Ferric chloride) के घोल के कुछ बूँद डालने से एक गहरा बैंगनी लाल (Deep purplish-red) रंग उत्पन्न होता है। यह रंग उस घोल में मंद नमक के तेजाब (Dilute hydrochloric acid) के कुछ बूँद डालने से या उसी प्रकार मर्क्युरिक् क्लोराइड् (Mercuric chloride) के घोल के मिलाने से मिटता नहीं। (२) ०.२ ग्रा. अफीम के चूर्ण को ५ सी. सी. क्लोरोफॉर्म एवं अमोनिया (Ammonia) के मंद घोल के कुछ बूँदों के साथ १० मिनट हिलावें। फिर एक शीशे की तश्तरी में रख दें जिससे क्लोरोफॉर्म उड़ जाय, जिसके उड़ जाने के बाद बाहर की तरफ एक धूसर श्वेत रवेदार पदार्थ का वलय रह जाता है। इसमें यदि फॉर्मेल्लिडहाइड् (Formaldehyde) के घोल का १ बूँद और गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) के पांच बूँद का मिश्रण मिलाया जाय तो गाढ़ा किरमिजी (Crimson) रंग उत्पन्न होता है।

हरीतक्यादिवर्गः १४६ प्रमाप (Standard) - अफीम में ९.५% से कम मॉर्फीन (Morphine) नहीं होनी चाहिये । अच्छी अफीम धूप में रखने से जल्दी पिघलने लगती है, अग्नि पर डालने से जलने लगती है पर कोयला नहीं बनती, जलते समय उसकी ज्वाला स्वच्छ निकलती है, मल या धूआं विशेष नहीं होता और बुझाने से अत्यन्त तीव्र और मादक गन्ध निकलती है। स्वच्छ अफीम को १०-५ मिनट सूँघने से नींद आती है। शोधन-बाजारू अफीम को जल में घोलकर, छानकर मंद आंच पर गाढ़ा कर लें। फिर इसको आर्द्रक स्वरस की २१ भावना देकर औषध के काम में लाना चाहिये । भारतीय अफीम के अतिरिक्त तुर्की, यूरोपीय एवं पर्शियन अफीम होती है जिनके क्षारों की मात्रा में कुछ अन्तर होता है तथा उनके स्वरूप में भी कुछ अन्तर होता है। अफीम की उत्तमता उसमें की मॉर्फीन की मात्रा पर निर्भर रहती है। भारतीय अफीम इस दृष्टि से काफी अच्छी होती है। रासायनिक संगठन-भारतीय औषधि अफीम में अनेक क्षाराम पाये जाते हैं जिनकी मात्रा में भी समय समय पर फरक रहता है। इसमें मॉर्फीन (Morphine) ७-१२%, नार्कोटीन (Narcotine) १५-२२.५%, कोडीन (Codeine) ०.३-४.०% तथा थीवेन (Thebaine), पॅपैव्हेराइन (Papaverine) एवं लॉर्डेनाइन (Laudanine) आदि प्रमुख हैं। इन क्षारार्भो के अतिरिक्त इसमें ॲसैटिक् (Acetic), लैक्टिक् (Lactic), सल्फ्यूरिक् (Sulphuric) एवं मेकोनिकू (Meconic), इतने प्रकार के अम्ल (Acids), गोंद एवं पेक्टीन (Pectin) की तरह पदार्थ, अैल्ब्युमिन्, मोम, स्नेह, कॉउट्चौक् (Caoutchouc), राल, उड़नशील तैल, गन्धयुक्त द्रव्य, मेकोनिन् (Meconin) तथा अमोनियम्, कॅल्शियम् एवं मॅग्नेशियम् के लवण आदि पदार्थ पाये जाते हैं। व्यापारी अफीम में (शुष्क अवस्था में) मॉर्फीन की मात्रा कम ज्यादा (५-२१%) रहती है। कुछ अन्य देशों से प्राप्त अफीम में की मॉर्फीन की मात्रा-तुर्की ५- १४%, पर्शियन ६-१४%, चाइनीज १.५-११%, बोहेमिया ११-१२%, तुर्कस्तान ५-१८%, आस्ट्रेलिया ४-११% । पहले यह समझा जाता था कि भारतीय अफीम में मार्फीन की मात्रा कम होने के कारण वह औषध के उपयोग की नहीं होती । लेकिन सन् १९१४ के बाद औषधो- पयोगी अफीम के उत्पादन के लिये विशेष प्रयत्न किया गया जिससे इसमें की मॉर्फीन की मात्रा बढ़ती गई और अब यह अच्छी से अच्छी तुर्की अफीम से औषधीय गुण में समता रखती है। भारतीय अफीम में एक और विशेषता यह है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहां की अफीम में कोडीन (Codeine) नामक क्षाराम अधिक होता है। नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराम पटना की अफीम में मार्फीन की अपेक्षा दुगना, मालवा की अफीम में मॉर्फीन से कुछ अधिक लेकिन स्मर्ना (Smyrna-तुर्की का एक स्थान) की अफीम में मार्फीन की अपेक्षा बहुत कम होता है। अफीम एवं मॉर्फीन के गुण एवं कार्य- यह उष्ण, तिक्त, रूक्ष, वेदनाहर, निद्राजनक, शामक, मादक, कफघ्न, कासघ्न, स्वेदजनन, शोधन, ग्राही, रक्तस्तम्भन, प्रसेकावरोधक एवं अल्प मात्रा में उत्तेजक, आह्लादकारक तथा वाजीकर है। इसकी प्रधान क्रिया केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर होती है। अल्प मात्रा में इससे कुछ उत्तेजना होती है। मन को आनन्द मालूम होता है। विचारशक्ति बढ़ती है। उत्साह बढ़ता है। कामवासना बढ़ती है। किसी काम में मन एकाग्र होता है। वेदना, खांसी, थकावट, क्षुधा तथा

१५० भावप्रकाशनिघण्टुः अन्य प्रकार की अप्रिय संवेदनाओं का ज्ञान कम होता है। मन शान्त होकर निद्रा आती है। अधिक मात्रा में अवसाद होकर स्पर्शज्ञान तथा सुख एवं दुःख के समझने की शक्ति कम होती है तथा कुछ बेहोशी सी मालूम होकर नींद आती है। नींद के बाद सर में दर्द तथा हृल्लास मालूम होता है। वातनाडियों पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। हृदय के ऊपर इसका कोई विशेष परिणाम नहीं होता केवल प्राणदा (Vagus) नाडी केन्द्र की उत्तेजना से इसकी गति कम होकर उसे बल प्राप्त होता है। अधिक मात्रा में श्वसनकेन्द्र के अवसाद के कारण अन्य दुष्परिणाम दिखलाई देते हैं। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया मंद लेकिन गम्भीर होती है। अधिक मात्रा में लेने से श्वसनकेन्द्र का अवसाद होकर श्वसन बहुत कम होते हुवे बाद में अनियमित हो जाता है। श्वसनकेन्द्र के घात एवं श्वासावरोध से मृत्यु होती है। कासकेन्द्र बहुत ही अल्प मात्रा से अवसादित होता है। औषधीय मात्रा से श्वसनियों का अल्प विस्फार होता है लेकिन अधिक मात्रा में संकोच हो जाता है। इससे सभी प्रकार के स्राव कम होते हैं किन्तु पसीना एवं दुग्ध कम नहीं होता है। पाचक स्राव कम होता है जिससे भूख कम हो जाती है। अफीम में अन्य क्षाराम होने के कारण आन्त्र की पुरस्सरण क्रिया अधिक कम होती है। इससे विबन्ध होता है तथा वेदनाहर होने के कारण शूल दूर होता है। स्राव कम होने से मुख, जीभ तथा गला सूखने लगता है। चर्मगत रक्तवाहिनियों के विस्फार एवं स्वेद पिण्डों की उत्तेजना से पसीना अधिक होता है जिससे शरीर का ताप कम होता है। गला एवं चेहरे की रक्तवाहिनियों के विस्फार से कान गरम हो जाते हैं। इससे मूत्र की मात्रा पर कोई परिणाम नहीं होता, लेकिन कभी कभी बस्तिद्वार के संकोच से कुछ रुकावट हो जाती है। कुछ विद्वानों के मत से मधुमेहियों के मूत्र में शर्करा की मात्रा तथा यूरिया (Urea) की मात्रा कम हो जाती है। वृक्क की विकृति में इसका उत्सर्ग शीघ्र न होने के कारण सावधानी के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये। केन्द्रीय प्रभाव से, प्रारम्भ में वमन केन्द्र की उत्तेजना से वमन होता है, लेकिन अधिक मात्रा सेवन करने पर केन्द्रावसाद होजाने के कारण वामक द्रव्यों के प्रयोग से भी वमन नहीं होता । केन्द्रीय प्रभाव से आंखों की पुतलियों का संकोच होता है। इसमें स्थानिक वेदनाहरण का गुण नहीं है। इसका प्रधूषण श्लैष्मिक कला तथा छिले हुये चर्म से होता है। वेदनाहर प्रभाव केन्द्रीय प्रभाव के कारण होता है। बच्चों एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में सावधानी के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये। यदि रोगी को यह न बताया जाय की उसे अफीम दी जा रही है तो लगातार कई दिन तक देते रहने पर भी अफीम की आदत नहीं पड़ती। अफीम के अन्य क्षाराम - अफीम का मादक प्रभाव मुख्यतया मॉर्फीन के कारण है तथा अन्य परिणाम इतर क्षारामों के कारण होते हैं। मॉर्फीन, पँपेहेराइन, कोडीन, नार्कोटीन तथा थीबेन में मादक प्रभाव क्रमशः कम कम होता जाता है। प्रधूषण देर में होने के कारण मॉर्फीन की अपेक्षा अफीम का परिणाम देर में होता है लेकिन वह अधिक समय तक स्थायी रहता है। नार्कोटीन तथा पँपेहराइन आन्त्रिक मांसपेशियों को शिथिल करते हैं जब कि मॉर्फीन एवं कोडीन उनके तनाव को बढ़ाते हैं जिससे अफीम अधिक विबन्ध करने वाली होती है। नार्कोटीन एवं पँपेहेराइन श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करते हैं। मॉर्फीन एवं कोडीन की विषाक्तता नार्कोटीन बढ़ाता है। इसी प्रकार नार्कोटीन एवं पँपेहेराइन,


हरीतक्यादिवर्गः १५१ मॉर्फीन के कार्य को बढ़ाते हैं। कोडीन एवं नार्कोटीन का सम्मिलित प्रभाव मॉर्फीन की तरह होता है जब कि दोनों अलग अलग बहुत ही अल्प प्रभावशाली हैं। ३ मि. ग्रा. नार्कोटीन तथा ३ मि. ग्रा. मॉर्फीन का सम्मिलित प्रभाव ६० मि. ग्रा. मॉर्फीन के बराबर होता है। कोडीन कास के केन्द्र को बहुत अल्प मात्रा में अवसादित करता है तथा मधुमेही में शर्करा की मात्रा कम करता है। थीबेन नामक क्षाराम कुपीलुसत्व के सदृश सुषुम्ना को उत्तेजित करता है। अफीम तथा मॉर्फीन के प्रयोग (१) अल्प मात्रा में अफीम का उपयोग उत्तेजक औषध के रूप में बहुत अच्छा होता है। डर लगना, उदासीनता, चिन्तायुक्त वृत्ति, खेदवृत्ति, थोड़े से क्रोध से हाथ पैर कांपने लगना, थकावट एवं वृद्धावस्था में जीवन से निराश होना ऐसी परिस्थितियों में इससे बहुत लाभ होता है। निरोगी अवस्था में प्रयोग से कामवासना बढ़ती है। (२) बहुत विचार करना, बहुत अभ्यास करना, चिन्ता तथा जिन जिन व्याधियों में पीडा की वजह से नींद न आती हो उनमें इसको निद्रा के ३ घण्टे पूर्व उपयोग किया जाता है। (३) शूल, पीड़ा एवं प्रक्षोभ आदि के लिये यह बहुत ही उपयोगी है। इसका उपयोग गृध्रसी, वातनाडी शोथ, कटिशूल, सन्त्रिशूल, पार्श्वशूल, कष्ठातंव, चोट, शरीर का जलना, अस्थिभग्न, सन्धिभंग शल्यक्रिया के पूर्व एवं पश्चात, आन्त्रिकशूल, पैत्तिकशूल, वृक्कशूल, अश्मरी, आमाशयिक शूल, आमाशय प्रक्षोभ, आमाशयिक व्रण, आन्त्रिक व्रण एवं कर्कटार्बुद आदि में किया जाता है। वृक्कजन्य आक्षेप में मूत्रल औषधों के साथ इसे देते हैं। (४) अतिसार एवं संग्रहणी आदि में जब मल पक हो जाता है लेकिन ग्रहणी दौर्बल्य से दस्त बन्द नहीं होते तब अन्य ग्राही औषधियों के साथ इसकी गोली का प्रयोग किया जाता है। ऐसी अवस्थाओं में जातीफलादि रस (भै० २०) या दुग्धवटी (भै० २०) का अच्छा उपयोग होता है। विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था में अहिफेनासव के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है लेकिन शीताङ्ग अवस्था में इसका प्रयोग न करें। टायफॉइड (आन्त्रिक ज्वर) में अतिसार हो तो इससे दस्त कम होने के साथ साथ वातिक लक्षणों में भी लाभ होता है। डर, घबड़ाहट तथा अन्य मानसिक कमजोरी के कारण होने वाले अतिसार में भी इससे लाभ होता है। (५) प्रतिश्याय के प्रारम्भ में स्वेदल औषध के रूप में इसको देते हैं। (६) रक्तष्ठीवन में इसका उपयोग किया जाता है। इससे रक्त का दबाव कम होता है, हृदयं की गति मन्द होती है, खांसी कम होती है, मानसिक चिन्ता दूर होती है एवं नींद आती है। रक्तातिसार तथा आमाशयव्रण में आंत्रिक गति कम होकर लाभ होता है। (७) शुष्क कास, दमा, कुकास, फुफ्फुसावरण शोथ एवं क्षयज ग्रन्थियों की वृद्धि से प्रक्षोभ होकर सूखी खांसी आती हो तो इसको मधु के साथ चटाने से लाभ होता है। जिसमें कफ बहुत जमा हो और जिसमें खांसी कफ निकल जाने के लिये आरही हो उसमें अफीम का प्रयोग नहीं करना चाहिये। श्वासकृच्छ्र, नीलीमा एवं श्वसनमार्ग में अवरोध हो तो इसका प्रयोग न करें। दमें में इसके प्रयोग से आदत पड़ने की सम्भावना रहती है इसलिये जहां तक हो प्रयोग न करें। (८) हृदय एवं रक्तवाहिनियों के कारण यदि श्वासकृच्छ्र हो तो इससे बहुत लाभ होता है लेकिन यदि जलोदर आदि के दबाव से हृदय का कार्य ठीक न होता हो तो इसका प्रयोग न करें। (९) प्रचुर लालास्राव, श्वेतप्रदर एवं मधुमेह में इससे लाभ होता है। मधुमेह में अफीम का प्रयोग बहुत किया जाता है लेकिन कर्नल चोपरा के मत से इसमें बिलकुल लाभ नहीं होता।

१५२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१०) मलेरिया आदि विषमज्वरों में इससे लाभ होता है ऐसी धारणा थी । जिन जिन स्थानों में अफीम का सेवन किया जाता है वहां मलेरिया कम होता है ऐसी धारणा थी । कुछ विद्वानों ने इसके नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराभ को ३-१३ २० की मात्रा में मलेरिया में सफलता- पूर्वक प्रयोग किया लेकिन कर्नल चोपरा के प्रयोगों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि इससे मलेरिया के कोटाणुओं पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता । यह बात अवश्य है कि अफीम या नार्कोटीन मस्तिष्क के उन स्थानों का जहां सूक्ष्मतर वेदनाओं का ज्ञान होता है (Algesic areas of brain), अवसाद उत्पन्न करती है जिससे ज्वर में होने वाले शिरःशूल, बेचैनी एवं शरीर में पीड़ा आदि लक्षण कम होकर तथा पसीना आकर ज्वर कम होने से लाभ प्रतीत होता है । मस्तिष्क या उसके आवरण में शोथ होने से यदि ज्वर हो तो इसका प्रयोग न करें । (११) गर्भपात में शामक औषध के रूप में अफीम या मॉर्फीन का पूर्ण मात्रा में उपयोग किया जाता है । अत्यार्तव एवं रक्तप्रदर आदि में नार्कोटीन से व्युत्पन्न अन्य स्टिप्टिसौन (Stypticin) या स्टिप्टोल (Styptol) आदि का उपयोग आन्तरिक एवं स्थानिक पिचु आदि के रूप में व्यवहार किया जाता है । (१२) फुफ्फुसावरण शोथ, आमवात एवं कटिशूल आदि में इसका पोल्टिस लगाया जाता है या १ छ० गरी या तिल के तेल में ३ मा० अफीम मिला कर मालिश की जाती है । मलाशय, श्रोणिगुहा की पीड़ा एवं परिकर्तिका आदि में अफीम की गुदवर्ती या बस्ति का उपयोग किया जाता है । शोथयुक्त अर्श पर माजूफल के साथ अफीम का मरहम लगाया जाता है । कर्णशूल में गिलसरीन के साथ इसके टिंक्चर को कान में डालने से लाभ होता है । अफीम के विष लक्षण-अफीम अधिक मात्रा में लेने से या आत्महत्या के लिये प्रयोग से घातक होती है । प्रथम तन्द्रा मालूम होती है । रोगी को उस समय जगाया जा सकता है लेकिन धीरे २ तन्द्रा बढ़ कर सन्यास का रूप धारण कर लेती है तब रोगी को जगाया नहीं जा सकता । आंखों की पुतलियां बिल्कुल संकुचित हो जाती हैं लेकिन मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व पुतलियां विकसित हो जाती हैं । शरीर ठण्डा और पसीने से तर हो जाता है । चेहरा, ओठ एवं अङ्गुलियां नीली पड़ने लगती हैं। नाड़ी अत्यन्त क्षीण तथा मन्द होती है। श्वास मन्द, अनियमित तथा अन्तिम अवस्था में घरघराहट युक्त हो जाता है । प्रत्याक्षिप्त क्रियाएं लुप्त हो जाती हैं। अन्त में श्वासावरोध से मृत्यु हो जाती है । अवसादावस्था प्रायः ४ से ६ घण्टे रहती है और ६ से १२ घण्टे में मृत्यु हो जाती है । विष चिकित्सा- (१) सर्वप्रथम रोगी को रीठे का जल या सरसों या राई जल के साथ या तूतिया १० २० जल के साथ पिलाकर वमन कराना चाहिये । लेकिन प्रायः वमन केन्द्र के अवसादित होने के कारण वमन नहीं होता इसलिये सबसे अच्छा यह है कि स्टमक् पम्प या साइफन् के द्वारा आमाशय प्रक्षालन कराया जाय । सर्वप्रथम रोगी को २-४ २० पोटैशियम् पर- मैग्नेट २ से ६ छ० जल के साथ पिला दें। फिर उसी के हल्के घोल से आमाशय प्रक्षालन तब तक करें जब तक घोल का रंग उसी तरह नहीं रहता । (२) श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करने के लिये बार २ गरम कॉफी का काथ पिलाना तथा ॲट्रोपीन, स्ट्रिक्नीन् ग्रेन, कोरामीन एवं लेप्टॅझॉल् आदि का सूचिकाभरण करना, कृत्रिम श्वसन कराना या श्वसन यन्त्रों का उपयोग करना, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ ऑक्साइड को सुंघाना आदि उपचार करना चाहिये । अफीम आदि के अवसादक तथा मादक विषैले प्रभाव को दूर करने के लिये उसके ठीक विरोधी कार्य करने वाली एक नई औषध नैलॉर्फीन हाइड्रोक्लोराइड हरीतक्यादिवर्गः १५३ (Nalorphine Hydrochloride) ५-१० मि. ग्रा. की मात्रा में शिरा द्वारा दी जाती है । लेथिड्रोन (Lethidrone, Burr. & Well.) एवं नेलाइन हाइड्रोक्लोराइड (Nalline hydro- chloride, Merck) नाम से यह डाक्टरी दुकानों में मिलती है। बच्चों में ०२५ मि. ग्रा. हर दो मिनट पर कई बार दी जाती है । अन्य औषधों में चन्द्रोदय, कस्तूरी, जुन्दवेदस्तर, हींग, जद्दार या जहरमोहरा पिष्टी आदि को शहद के साथ बार-बार चटाना चाहिये । (३) रोगी को सोने न दें। बार-बार उस पर ठंडा एवं गरम जल छिड़कते रहें । रोगी को पकड़कर चलावें । तीक्ष्ण नस्य, सरसों का लेप, बार-बार हिलाना आदि क्रियाओं से रोगी को जगावें । अफीम के व्यसन के दुष्परिणाम - कुछ दिन लगातार अफीम खाने से उसकी आदत पड़ जाती है तथा उससे लाभ होने के लिये प्रत्येक समय मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। अफीमची २३-१० २० तक बिना किसी तीव्र दुष्परिणाम के अफीम का सेवन कर सकता है। इसके व्यसन से नैतिकपतन, कृशता, पाण्डु, मांसपेशियों की दुर्बलता, मांसपेशियों के कार्य में असमन्वयता, थकावट, नाडी की दुर्बलता, कंप, अग्निमांद्य, पाचन की खराबी, विबंध, निद्रानाश, तन्द्रा, नपुंसकता, अनार्तव एवं आंखों की पुतलियों का संकुचित होना आदि लक्षण होते हैं। लेकिन यदि अफीमची की अफीम बंद कर दी जाय तो भी मानसिक उत्तेजना, बेचैनी, आमाशय में पीड़ा, जलन एवं कभी-कभी वमन, विरेचन, स्वेदाधिक्य, पुरुषों में वीर्यपात और स्त्रियों में प्रहर्ष आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। एकाएक बंद करने से दुर्बल या वृद्ध लोगों में कभी-कभी अत्यन्त दौर्बल्य, अवसाद एवं निपात होकर मृत्यु भी हो सकती है । अफीम छुड़ाने के उपाय - बच्चों में या जो दिन भर में २३ रत्ती से कम अफीम सेवन करते हैं या जो दुर्बल एवं वृद्ध नहीं है तथा किसी तीव्र शारीरिक रोग से पीड़ित नहीं है उनमें एकाएक अफीम बंद की जा सकती है । ३ दिन तक तकलीफ़ रहती है लेकिन बाद में ठीक हो जाती है। यदि हृल्लास, अतिसार एवं मानसिक प्रक्षोभ आदि लक्षण हों तो क्षारीय मिश्रण तथा शामक औषधों का प्रयोग करना चाहिये । निपात आदि के लिये ॲड्रिनॅलीन का सूचिकाभरण तथा चाय, कोको एवं अमोनिया आदि का प्रयोग करें । सबसे सरल उपाय यह है कि धीरे-धीरे अफीम की मात्रा कम की जाय । कुचला, चिरायता एवं मिरिच आदि के साथ अफीम की गोलियां बनाकर उसका उपयोग करें। गोलियों में धीरे-धीरे अफीम कम करें । आहार में लेसिथिन नामक प्रभोजन का उपयोग भी लाभदायक है। यह अंडे तथा सोयाबीन आदि में होता है। अल्प मात्रा में मद्य एवं कुछ शामक औषधों का उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा - अफीम ३-१ २०; टिंक्चर ओपिआइ ५-३० बूंद, एक साल से कम उम्र के बच्चों को ३-१ बूंद से अधिक नहीं । अथ खासखसतिलाः । तेषां नाम गुणाँश्चाह उच्यन्ते खसबीजानि ते खासखसतिला अपि ॥ २३१ ॥ खसबीजानि बल्यानि वृष्याणि सुगुरूणि च । जनयन्ति कफं तानि शमयन्ति समीरणम्॥ खसखस के दाने के नाम तथा गुण - पोस्ता के दाने के ही खसबीज तथा खासखसतिल ये दोनों नाम संस्कृत में होते हैं । खसखस के दाने-बलकारक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और अत्यन्त गुरुपाकी होते हैं तथा ये कफ के उत्पन्न करने वाले एवं वायु को शमन करने वाले होते हैं ॥

१५४ भावप्रकाशनिघण्टुः ८५ पोस्तदाना हि०-पोस्तदाना, दाना, खसखस, खसखस के दाने, खसब्रीज । बं०-पोस्तदाना, पोस्तबीज । म०-गु०-खसखस । ता०-गशगश । मला०-कशकश । फा०-तुख्मे कोकनार । अ०-बजरुल खशखाश । अं०-Poppy Seeds (पॉपी सीड्स) । उक्त पोस्तवृक्ष के डोडे से निकले हुये बीज को पोस्तदाना कहते हैं। इसके स्वरूपादि का वर्णन पोस्ते की डोंडी के साथ किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक प्रकार का अप्रक्षोभक तैल पाया जाता है। इसमें कोई क्षाराम नहीं पाया जाता। गुण और प्रयोग-अफीम की जानकारी के पूर्व इन बीजों का व्यवहार आहार द्रव्य के रूप में किया जाता था। यह स्नेहन, निद्राजनक, पोषक तथा साधारण ग्राही होते हैं। मिठाइयों के ऊपर इसको छिड़का जाता है। इसका हलवा बनाकर खाया जाता है। निद्रानाश, दौर्बल्य, शुष्क कास एवं बर्रित विकार आदि में इसको पीसकर शर्करा या मधु के साथ खिलाया जाता है। इसका बाह्यलेप वेदनाहर माना जाता है। इसके तैल का ऑलिव ऑयल की तरह १/२-१ तो० की मात्रा में प्रयोग करते हैं। यह निद्राजनक है एवं शिरःशूल में इसको सिर पर लगाते हैं तथा कर्णशूल में इसे कान में डालते हैं। अथ सैन्धवः । तस्य नामगुणानाह सैन्धवोऽस्त्री शीतशिवं मणिमन्थञ्च सिन्धुजम् । सैन्धवं लवणं स्वादु दीपनं पाचनं लघु । स्निग्धं रुच्यं हिमं वृष्यं सूक्ष्मं नेत्र्यं त्रिदोषहृत् ॥ २४१ ॥ सेंधानमक के नाम तथा गुण-सैन्धव (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिंग में होता है), शीतशिव, मणिमन्थ और सिन्धुज ये संस्कृत नाम सेंधा नमक के हैं। सेंधानमक-स्वादिष्ट, अग्निदीपक, पाचक, लघु, स्निग्ध, रुचिकारक, शीतवीर्य, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतों में भी प्रवेश करके प्रभाव दिखाने वाला), नेत्रों के लिये हितकारी तथा तीनों दोषों को दूर करने वाला होता है ॥ २४१ ॥ ८६ सेंधानमक हि०-सेंधानमक, सेंधानोन, लाहौरी नमक । बं०-सैंधवलवण । म०-सैंधवमीठ । गु०-सिंधालुण क०-सैंधव, सैंधवलवण । मा०-सींथोलवण । ते०-सैंधवलवणं, सिंधु उपु । पं०-सेंधानमक । ता०-इन्दु उप्यु । फा०-नमकेंसंग । अ०-मिलहे तबजर्द । अं०-Chloride of Sodium (क्लोरा- इड ऑफ सोडियम् ); Rock-salt (रॉकसाल्ट); Bay salt (बे साल्ट) । ले०-Sodii chlo- ridum (सोडिआइ क्लोराइडम) । सेंधानमक एक सुप्रसिद्ध नमक सिन्ध देश की खानों से निकलता है। पत्थर के ढोंके के समान इसके बड़े-बड़े टुकड़े आते हैं। यह सब प्रकार के नमकों में शुद्ध नमक समझा जाता है। सिन्धु नदी के पूर्व में होने वाला नमक कुछ लाल रंग का होता है। इसमें पोटैशियम् तथा मॅग्नेशियम् के कुछ लवण मिले रहते हैं। इन खानों में ऊपर का स्तर कुछ मटमैला होता है लेकिन नीचे का स्तर शुद्ध होता है। इस नमक को 'लाहोरी' नमक कहते हैं। सिन्धु नदी के हरीतक्यादिवर्गः १५५ पश्चिम की खानों में नमक के स्तर के ऊपर गोदन्ती का एक स्तर रहता है। इसमें पोटेशियम् तथा मॅग्नेशियम् के लवण नहीं होते। इस नमक को 'कोहटी' या 'निमक सज्ज़' कहते हैं। खानों से प्राप्त होने वाला एक और स्फटिक के समान पारदर्शक नमक होता है जिसे 'निमक शीश' ( रसार्णव-मणिमंथ ) और ( अं ) सलजेम् ( Salgem ) कहते हैं। उत्पत्ति-स्थानभेद से नमक की कई जातियां होती हैं लेकिन सबों में खाने का नमक रहता है। अन्य अशुद्धियों के कारण उनमें स्वाद, स्वरूप तथा गुणों में अंतर रहता है। सभी नमकों का मूल स्रोत समुद्र ही है। जहां आज पहाड़ हैं वहां भी किसी जमाने में समुद्र था और वहां का हिस्सा समुद्र से अलग होने से वहां का जल सूखकर नमक जम गया। कालान्तर से उस पर मिट्टी आदि जमती गई तथा यह पृथ्वी के अंदर नमक की खानों के रूप में रह गया। भारत मे खाने का नमक ३ प्रकार से प्राप्त होता है। ( १ ) समुद्र के जल को सूर्य की उष्णता से या उबालकर जो नमक तैयार किया जाता है उसे 'सामुद्र' कहते हैं। ( २ ) खारे तालाब, खारे झरने तथा खारे कूपों का जल या खारी मिट्टी पानी में घोलकर उस घोल को उबाल कर या धूप में सुखाकर तैयार करते हैं। ( ३ ) पृथ्वी के अन्दर रहने वाली नमक की खानों से प्राप्त जिसे सैंधव कहते हैं। बंबई तथा मद्रास का समुद्र किनारा, पंजाब का पहाड़ी नमक, राजपूताना की झीलें तथा विभिन्न स्थानों की रेह इनसे बहुत नमक प्राप्त होता है लेकिन सबसे अच्छा नमक सैंधव होता है। यद्यपि भारतवर्ष में नमक बहुत पाया जाता है तथा और अधिक बनाया भी जा सकता है तो भी ब्रिटिशकाल में सरकारी नियंत्रण के कारण विदेशों से भी नमक का आयात होता था। गुण और प्रयोग-नमक शरीर का एक अत्यन्त आवश्यक पदार्थ है तथा रक्त रस (Serum) का प्रधान खनिज द्रव्य है। यह रक्त में निश्चित अनुपात में रहता है तथा शरीर के जलीयांश एवं लवणों के नियन्त्रण में सहायक होता है। कुछ मात्रा में यह धातुओं में संचित भी रहता है लेकिन जितना भी अधिक होता है यह मूत्र एवं पसीना आदि द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। नमक की क्रिया ऑस्मोटिक् दबाव के परिवर्तन से होती है। यह पूर्णतः एक भौतिक क्रिया होती है। यदि एक पात्र के बीच एक अर्ध प्रवेश्य परदा (Semi permeable membrane) लगाकर दोनों तरफ नमक के घोल भर दें जिसमें एक में नमक ज्यादा रहे और दूसरे में कम रहे तो कुछ देर बाद यह दिखलाई देगा कि जिसमें नमक अधिक रहा उस तरफ कम नमक वाले भाग से जल आकर्षित होकर धीरे-धीरे दोनों भाग के घोल एक ही समान हो जायेंगे। इस भौतिक परिवर्तन को 'ऑसमोटिक्' ( Osmotic ) क्रिया कहते हैं। रक्त के बराबर ऑसमोटिक् बल के लवण घोल को समबल लवणजल (Isotonic saline) कहते हैं। यह ०.९% नमक का घोल होता है। रक्त से अधिक बलवाले घोल को अतिबल लवणजल (Hypertonic saline) एवं रक्त से कम बलवाले घोल को हीनबल लवणजल (Hypoto- nic saline) कहते हैं। यदि अतिबल लवणजल का सिरा द्वारा सूचिकाभरण किया जाय तो रक्त का ऑसमोटिक् दबाव अधिक होगा जिससे समीपस्थ लसिका से जलापहरण होकर रक्त की मात्रा बढ़ेगी। रक्त के लाल कणों से भी द्रवापकर्षण होने से वे भी सिकुड़ जावेंगे। इसी प्रकार हीनबल लवणजल से रक्त के लाल कण जल खींच कर फूल जावेंगे। शरीर में जब भी विभिन्न बल वाले घोल समीप आते हैं, इसी प्रकार की क्रिया होती है।

१५६ | भावप्रकाशनिघण्टुः सैंधव रुचिकारक, अग्निदीपक, पाचक, वातानुलोमक, नेत्र्य, व्रण रोपक एवं व्रण शोधक है। अल्प मात्रा से इससे पाचक स्रावों की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में आमाशयिक प्रक्षोभ होकर वमन एवं जलापकर्षण द्वारा कभी-कभी विरेचन होता है। अल्पबल लवणजल का प्रचूषण आसानी से हो जाता है लेकिन अन्यों का कम होता है। अतिबल लवणजल के सूचिकाभरण से ऑसमोटिक् क्रिया द्वारा रक्त की मात्रा बढ़ती है जिससे मूत्र एवं पसीना आदि की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ लोगों के मत से नमक का अधिक सेवन बहुत ही लाभदायक एवं आयु को बढ़ाने वाला होता है लेकिन आयुर्वेदानुसार नमक का अधिक उपयोग हानिकर है। (१) कुपचन, आध्मान एवं शूल आदि में अन्य औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। विसूचिका में जब शरीर से वमन एवं विरेचन के कारण बहुत सा द्रव तथा लवण निकल जाते हैं और शरीर ठण्डा होकर रोगी मरणासन्न हो जाता है ऐसी अवस्था में अतिबल लवणजल का सिरा द्वारा सूचिकाभरण बहुत ही आश्चर्यजनक लाभदायक होता है। इससे फिर से रक्त प्रवाह शुरू होकर रोगी बच जाता है। इसके लिये जिस घोल का उपयोग किया जाता है। उसके १ पाईंट परिस्रुत जल में शुद्ध नमक १२० ग्रे०, पोटैशियम् क्लोराइड् (Potassium chloride) ६ ग्रे. एवं कैल्शियम् क्लोराइड् (Calcium chloride) ४ ग्रे. रहता है। यदि शरीर में अम्लता अधिक हो तथा पोषण की भी आवश्यकता हो तो इसीमें सोडाबाईकार्ब (Soda bi carb) ४० ग्रे. एवं ग्लूकोज (Glucose) १४ ग्रे. मिलाया जाता है। अतिसार, रक्तातिसार एवं अत्यधिक रक्त स्राव आदि में जलापहरण के कारण निपात (Co- llapse) एवं स्तब्धता (Shock) आदि होने पर समबल लवणजल के सिरा द्वारा सूचिकां- भरण से बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्र विषममयता (Uraemia), गर्भिणी विषममयता (Eclampsia) एवं कार्बन मॉनऑक्साइड् (Carbon monoxide) नामक कोयले के धूएँ के विषैले प्रभाव आदि अवस्थाओं में इसी प्रकार के समबल लवणजल (०.९%) का उपयोग विष की तीव्रता कम करने के लिये किया जाता है। शरीर अत्यधिक दुर्बल हो गया हो तथा पोषण की त्वरित आवश्यकता हो तो ५% ग्लूकोज के साथ समबल लवणजल का उपयोग लाभदायक होता है। इन उपर्युक्त अवस्थाओं में सिरा के अतिरिक्त चर्म के नीचे, मुख द्वारा एवं गुदा द्वारा लवणजल का उपयोग किया जा सकता है। गुदा द्वारा, २ माशे नमक करीब ५ छटांक जल में घोलकर रोगी को उत्तान लिटा कर तथा चूतड़ों को कुछ ऊँचा करके रबर की नली द्वारा हर चार घण्टे पर दिया जाता है। घोल की उष्णता शरीर की उष्णता के बराबर या कुछ अधिक होनी चाहिये। (२) डा. ब्रूक मलेरिया के लिये एक प्रयोग लिखते हैं। एक मुट्ठीभर नमक को कढ़ाई में डालकर मन्द आंच पर कुछ बादामी रंग होने तक भूनते हैं। इसमें से १ तो. नमक जल के साथ सुबह खाली पेट रोगी को दिया जाता है। इसके पश्चात प्यास बहुत लगे तो थोड़ा-थोड़ा जल पीने को दें। २, ३ घण्टे तक खाने को कुछ भी न दें। बाद में बहुत भूख लगने पर हल्का पौष्टिक आहार दें। रोगी को ठण्डक से बच कर रहना चाहिये। डा० ब्रूक का कहना है कि इसके एक ही बार के प्रयोग से मलेरिया दूर हो जाता है या कभी २ दो बार प्रयोग करना पड़ सकता है। (३) व्रण, नाड़ीव्रण एवं दूषित क्षत आदि के प्रक्षालन के लिये परमबल लवणजल का प्रयोग किया जाता है तथा विरल कपड़े (गॉज) की पट्टी इस घोल में भिगो कर व्रण पर रखी जाती है। इससे व्रणित भाग में लसिकास्राव एवं श्वेतकणों की वृद्धि होकर व्रण शुद्ध होकर जल्दी


हरीतक्यादिवर्गः | १५७ अच्छा होता है। इस चिकित्सा में अन्य प्रतिदूषकों (Antiseptics) की तरह शरीर की कोषाओं को कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचता। (४) श्वसनक ज्वर (न्युमोनिया) में नमक की पोटली बना कर उससे छाती को सेंका जाता है जिससे कफ ढीला हो कर निकलता है तथा वेदना शांत होती है। इसका आंतरिक प्रयोग ४ र. की मात्रा में जल के साथ किया जा सकता है। संधिवात, आमवात, गंडमाला एवं आमाशयिक पीड़ा आदि में भी पोटली से सेंकने से लाभ होता है। (५) इन्फ्लूएंझा, प्रतिश्याय एवं शिरःशूल तथा स्वास्थ वृद्धि के लिये १ तोला नमक १ सेर जल में डाल कर उसका नस्य बहुत लाभदायक है। (६) गले की खराबी में कदुष्ण जल में नमक डाल कर उससे गरारा करना चाहिये। गला एवं तालु की शिथिलता होने पर ठंडे पानी में नमक डाल कर कुल्ला कराने से लाभ होता है। (७) यदि गलती से जोंक गले के अन्दर चली जाय तो लवण जल पिलाते हैं। इसी प्रकार सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) नामक चांदी के दाहक क्षार के विष क दूर करने के लिये इसको पिलाते हैं। (८) जीर्ण आमवात, गृध्रसी तथा अन्य पीड़ायुक्त संधि विकारों में एवं बिच्छू के काटने पर २०% उष्ण लवण जल में अवगाह किया जाता है तथा लवण जल पिलाते भी हैं। (९) सूत्रकृमि (Thread worm) में इसकी बस्ति दी जाती है। (१०) वमन कराने के लिये यह अत्युत्तम औषध है। अल्प मात्रा (२%) में देने से यदि वमन होता हो तो रुक जाता है। (११) मांसपेशियों की दुर्बलता में नमकयुक्त ठण्डे जल की धारा से बहुत लाभ होता है विशेषकर वर्धमान लड़कियों की पीठ की दुर्बलता में इसका अच्छा उपयोग होता है। करीब १५ सेर जल में ३ सेर नमक डाल कर स्नान करने से रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा स्फूर्ति मालूम होती है। मांसपेशियों की पीड़ा, चर्म रोग, मोच एवं मरोड़ आदि में भी स्नान से लाभ होता है। निषेध— किसी भी प्रकार के शोफ, जलोदर तथा अन्य रोग जिनमें शरीर के अन्दर द्रव पदार्थों का संचय होता है उनमें नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिये। रक्तभाराधिक्य, चर्मरोग एवं अत्यधिक प्यास आदि में भी इसका निषेध है। अधिक मात्रा में सिरा द्वारा लवणजल के प्रयोग से कभी-कभी इक्षुमेह (Glycosuria), साधारण ज्वर एवं कचित् मूत्र में अलब्यूमिन का निकलना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। फुफ्फुस शोफ (Oedema of lungs) तथा हृदय अधिक भार सहन करने में असमर्थ हो तब सिरा द्वारा लवणजल का प्रयोग न करें नहीं तो मृत्यु की सम्भावना रहती है।

अथ शाकम्भरीयम् । तस्य नामगुणानाह

शाकम्भरीयं कथितं गडाख्यं रोमकं तथा ॥ २४२ ॥ गडाख्यं लघु वातघ्नमत्युष्णं भेदिपित्तलम् । तीक्ष्णोष्णं चापि सूक्ष्मञ्चाभिष्यन्दिकटुपाकि च ॥ २४३ ॥ सांभर नमक के नाम तथा गुण—शाकम्भरीय के ही, गडाख्य (गडलवण) तथा रोमक पर्यायवाची शब्द हैं। सांभर नमक-लघु, वायुनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, भेदी (मलादिक का भेदन १. 'तीक्ष्णं व्यवायी'ति पाठान्तरम् ।