भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
पृष्ठ 77, कुल 143 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ भावप्रकाशनिघण्टुः (९) अंधता तथा धुन्ध आदि विकारों में इसका रस मधु में मिलाकर नेत्र में लगाते हैं तथा रात्रंध में नमक के साथ इसका रस डालते हैं। (१०) इसको घी में भूनकर उसका पोल्टिस गांठ, फोड़े, बद एवं व्रण आदि पर लगाया जाता है। आमवातादि संधिविकार एवं अन्य दाह, कण्डू आदि चर्म रोगों में इसके रस को सरसों के तेल में मिलाकर मलते हैं। (११) बिच्छू तथा अन्य कीड़ों के काटने पर इसमें रस को लगाने से दाह एवं वेदना की शांति होती है। (१२) प्याज के बीज बाजीकर होते हैं। इसको पीसकर मधु के साथ खालित्य, व्यंग एवं झांई आदि पर लगाते हैं। दाद में सिरका में पीसकर इसे लगाते हैं एवं मसों पर नमक के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ८० जंगली प्याज उपर्युक्त प्याज के अतिरिक्त इसी वर्ग का एक जंगली प्याज होता है जिसकी दो तीन किस्में भारतवर्ष में पाई जाती हैं। यह डाक्टरी स्क्लिल (Squill) नामक औषधि अर्जिनिया मेरिटिमा (Urginea maritima (Linn.) Baker) की श्वेत उपजाति जो भूमध्यसागरीय तट पर होती है उसका अच्छा प्रतिनिधि है। यह अत्यन्त उपयोगी होने के कारण यहाँ उसका वर्णन दिया जा रहा है। लोग इसे रा० नि० एवं नि० २० का कोलकंद मानते हैं। दोनों निघण्डकार उसे 'वान्तिशमनकृत्' लिखते हैं लेकिन जंगली प्याज 'वान्तिजननः' होता है। (क) ले०-Urginea indica, Kunth. (अर्जिनिया इण्डिका, कुंथ) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) सं०-कोलकन्द, वनपलांडु । हि०, बं०-कांदा, जंगली प्याज । गु०-जंगली कांदो, पाण कंदो । म०-रानकांदा, कोलकांदा, कोचिंदा । ता०-नेरि वंगायम् । ते०-अडवितेलु गड्ड । पं०-कफोर, कचवस्सल अ०-उन्सुलै हिंदी । फा०-पियाज सहराई । अं०-Indian Squill (इण्डियन स्क्लिल) । यह पश्चिमी हिमालय में ७००० फीट तक, गढवाल, कुमाऊं, बिहार एवं कारोमंडल तट तथा कोंकण के रेतीले किनारों एवं पश्चिमी घाट पर पाया जाता है। यह वनस्पति सुदर्शन सदृश होती है। पत्र-मूलीय, ६-१८ इञ्च लम्बे, प्याज से बड़े और चौड़े, चिपटे, रेखाकार एवं नोकदार होते हैं। पत्रों के निकलने से पूर्व बीच से सदण्डिक पुष्पध्वज (Scape-स्केप) निकलता है जिस पर हरित्ताभ श्वेत पुष्प निकलते हैं। फल-सामान्यस्फोटी फल (Capsule-केप्सूल) अण्डाकार, ।।-।।। इञ्च लम्बे, दोनों ओर क्रमशः पतले होते हुये एवं ६-९ बीजों से युक्त होते हैं। बीज-छोटे, दीर्घवृत्ताकार, चिपटे तथा काले होते हैं। इसका कन्द प्याज की तरह २-४ इञ्च लम्बा, लट्वाकार एवं परिच्छदपत्रक (Tunicated Bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप का होता है। इसके कटे हुये टुकड़े मुड़े हुए, चिपटे, विभिन्न आकार के आधे से दो इञ्च लंबे, दोनों छोर की तरफ क्रमशः पतले होते हुए, कभी कभी तीन या चार एक साथ, काण्डक से चिपके हुए, लंबाई में रीठदार ए हल्के पीताभ बादामी या हल्के पीत विभिन्न वर्ण के होते हैं। ये छिलके शुष्क अवस्था में सहज चूर्ण बनाने लायक एवं आई हो जाने पर चिमड़े एवं लचीले हो जाते हैं। इनमें गंध नहीं होती तथा इनका स्वाद तिक्त एवं कड़ होता है। ताजा कन्द खाने से जीभ पर कण्डू मालूम होती है। पहिले वर्ष के नींबू के इतने बड़े कन्द हरीतक्यादिवर्गः १३७ का व्यवहार करना चाहिये । पुष्पित होने पर इसके कोमल कंदों को निकाल कर, उनके ऊपर के पतले छिलकों को हटा कर, उनके टुकड़े करके सुखाकर शुष्क स्थान में रखा जाता है। इसका चूर्ण हवा से जल सोख लेता है इसलिये इसको बिलकुल शुष्क बंद पात्र में रखना चाहिये । (ख) Scilla indica, Baker (सिल्ला इण्डिका, बेकर) । हि०, बं०-सुफेदी खस । बंबई- भुइकांदा । ता०-शिरु-नेरि-वंगयम् । यह दक्षिणी पेनिनसुला में कोंकण एवं नागपुर से दक्षिण की तरफ समुद्र के किनारे रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है। इसी से मिलती-जुलती एक जाति सिं० होहेनंकरी (S. hohenack- eri ) पंजाब में मिलती है। इनके कन्द श्वेताभ बादामी, अंशच्छद पत्रक (Scaly bulb) स्वरूप के, जायफल के इतने बड़े, गोल या अंडाकार एवं कभी-कभी बगल से दबे हुए होते हैं। इनके मांसल छिलके (शल्क पत्र) बहुत चिकने होते हैं एवं इनके किनारे परस्पर ढके रहने के कारण इनका एक ही पर्त मालूम होता है। (क) और (ख) दोनों ही के गुण समान हैं तथा बाजार में दोनों के कंद मिले हुवे बिकते हैं तथा इनके शुष्क टुकड़े भी बिकते हैं। ये कंद विदेशी कंदों से कुछ छोटे होते हुए भी उन्हीं की तरह कड़वे एवं हल्लासकारक होते हैं। (क) और (ख) के कंदों में यही अन्तर है कि (क) के कन्द परिच्छद पत्रक (Tunicated bulb-ट्यूनिकेटेड बल्ब) स्वरूप के एवं (ख) के कंद अंशच्छ- दपत्रक (Scaly bulb-स्कैली बल्ब) स्वरूप के होते हैं। रासायनिक संगठन - ताजे कंद में सिल्लारेन-ए (Scillaren-A, C_{36}H_{52}O_{13}) नामक एक रवेदार ग्लाइकोसाइड (Glycoside) तथा सिल्लारेन-बी (Scillaren-B) नामक चूर्ण रूप का ग्लाइकोसाइड (Glycoside) पाया जाता है जिनमें से दूसरे में कम से कम दो ग्लाइको साइड मिले रहते हैं। इनमें से सिल्लारेन-ए जल में बहुत कम घुलता है और सिल्लारेन-बी जल और क्लोरोफार्म में घुलने वाला एवं अल्कोहल या ईथर में न घुलने वाला होता है। कंद में जिस अनुपात में ये दोनों ग्लाइकोसाइड रहते हैं उनका सिल्लारेन (Scillaren) नामक मिश्रण जल में सरलता से घुल जाता है तथा वह बहुत दिन तक खराब भी नहीं होता। भारतीय स्क्लिल में उपर्युक्त ग्लाइकोसाइड के अतिरिक्त गोंद, कर्वोज, फाइटोस्टेरॉल् (Phytosterol) एवं कॅल्शियम ऑक्झैलेट् (Calcium oxalate) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह उष्ण, तिक्त, कफनिःसारक, हृदयोत्तेजक, हृद्य, मूत्रविरेचक तथा उत्क्लेश एवं वमनकारक है। इसकी क्रिया डिजिटॅलिस् (Digitalis) के समान होती है जिससे हृदय की गति कम होती है एवं हृदय का कार्य ठीक होने से हृदय को बल प्राप्त होता है। पचन- संस्थान द्वारा इसका प्रचुषण कम होने के कारण इसको अधिक मात्रा में देना पड़ता है लेकिन अधिक मात्रा में इससे महास्रोत में प्रकोप होकर वमन, अतिसार एवं रक्तातिसार होता है। यह स्थानिक प्रक्षोभक प्रभाव इसमें के रैफाइड्स (Raphides) के कारण होता है। हृदय पर इसका प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशी की अपेक्षा प्राणदा नाड़ी (Vagus nerve) के द्वारा अधिक होता है। डिजिटॅलिस् की अपेक्षा इसकी क्रिया शीघ्र एवं अस्थायी होने के कारण इससे संचायी दुष्परिणाम नहीं होते। अल्प मात्रा में इसके प्रयोग से आमाशय में साधारण प्रक्षोभ होकर प्रत्यावर्तन क्रिया द्वारा कफ निकलने लगता है।