भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 143 में से

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१३४ भावप्रकाश निघण्टुः (Sinus) के लिये इसके ताजे स्वरस को २ बूंद की मात्रा में हर छठे दिन स्थानिक सूचिकाभरण किया गया जिससे ४ इञ्च गहरा नाड़ीव्रण २ महीने के अन्दर ठीक हो गया। उपजिह्वा शोथ में इसका स्थानिक प्रयोग सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) की अपेक्षा अच्छा होता है। (७) कर्णशूल में इसके गुनगुने रस का या इससे सिद्ध तैल का उपयोग लाभदायक है। इससे बाधिर्य में भी लाभ होता है। (८) आर्तवप्रवर्त्तक होने के कारण इसका उपयोग अनात्तंव एवं कष्टार्तव आदि में किया जाता है। गर्भिणी में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। (९) मवेशियों में अँन्थ्राक्स (Anthrax) नामक रोग के प्रतिबन्धन के लिये एवं सर्पविषादि में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग किया जाता है। हानिनिवारक - कतीरा, धनियां एवं बादाम का तेल। मात्रा - स्वरस १०-३० बूंद; कल्क २-३ माशा। ७८ एकपुतिया लहसुन हि०-लहसुन, एककांदा लहसुन, एककली लहसुन, एकपुती लहसुन, एकपुतिया लहसुन। बं०-गांथुन। अं०-Shallot (शॅलोट), One Clove Garlic (वन क्लोव गार्लिक)। लै०-Allium ascalonicum Linn. ( एलियम् ॲस्कॅलोनिकम् लिन ) Fam. Liliaceae ( लिलिएसी ) । यह अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसकी जड़ दो वर्ष या इससे कुछ अधिक ही जीवित रह सकती है। इसके साथ कई एक अण्डाकार लम्बे जावे रहते हैं। यह १-२॥ इञ्च तक लम्बा और मध्यमा अङ्गुली के समान मोटा होता है। पत्ते-उक्त लहसुन के समान लम्बे, पतले, चिकने और पोले से होते हैं। जड़ से ही अनेक पत्ते निकलते हैं और पत्तों के बीच से दण्ड निकलता है जो एक दो फुट लम्बा, नीचे फूला हुआ किन्तु क्रमशः ऊपर संकुचित और गोल होता है। इसके अन्त में लट्टू के समान फूलों का गुच्छा लगता है। प्रत्येक गुच्छे में लगभग २०० तक नन्हें श्वेत वर्ण के फूल रहते हैं। वे प्याज के फूलों के समान दिखाई पड़ते हैं। इसके कन्द में एक ही जावा रहती है तथा यह कोमल प्याज की तरह दिखलाई देता है। गुण और प्रयोग - इसके गुण लहसुन की तरह ही होते हैं लेकिन विशेष कर यह वृष्य है। वाजीकरण के लिये इसको घी में भून कर मधु के साथ सेवन कराया जाता है। कर्णशूल में इसका टुकड़ा कान के अन्दर रखते हैं। इसके उपयोग से आर्तव शुद्धि होती है। नोट - प्याज की तरह लाल रंग का एक और जंगली लहसुन होता है जो ईरान में अधिक होता है। उसे लै० में-एलियम् लेप्टोफाइलम्, वॉल (Allium leptophyllum, Wall.), ईरान में-सीर-इ-पिआझक् एवं अरव में-थूम-एल-बरी कहा जाता है। गुण और प्रयोग - यह स्वेदल होता है। इसका अचार कुपचन में व्यवहार में लाया जाता है। अथ पलाण्डुः (पियाज ), तस्य नामगुणानाह पलाण्डुर्यवनेष्टश्च दुर्गन्धो मुखदूषकः । पलाण्डुस्तु बुधैर्ज्ञेयो रसोनसदृशो गुणैः ॥ २२६ ॥ स्वादुः पाके रसेऽनुष्णः कफकृन्नातिपित्तलः । हरते केवलं वातं बलवीर्यकरो गुरुः ॥ २२७ ॥ पियाज के नाम तथा गुण - पलाण्डु, यवनेष्ट, दुर्गन्ध और मुखदूषक ये सब पियाज के नाम हैं। पियाज को गुणों में लहसुन के समान समझना चाहिये। पियाज-रस तथा पाक में मधुर रस हरीतक्यादिवर्गः १३५ युक्त, अनुष्ण (ईषत् उष्णवीर्य) एवं कफकारक होता है। और यह अत्यन्त पित्तकारक नहीं होता है। यह केवल वातहर होता है तथा बल और वीर्य को करनेवाला एवं गुरु होता है। ७९ पियाज हि०-पियाज, प्याज । बं०-पेयाज। पं०-गण्डा। म०-कांदा। ते०, क०-नीरुल्लि। गु०- डुङ्गळी, कांदो । मा०-कांदो, कांदा । ता०-वेंगयम। फा०-प्याज। सिन्ध०-लुमु, बसर । मला०- बदंग। अ०-बस्ल। अं०-Onion (ओनियन् ) । लै०-Allium cepa, Linn. (एलियम् सिपा, लिन० )। Fam. Liliaceae ( लिलिएसी ) । प्याज की खेती प्रायः सब प्रान्तों में की जाती है। इसका पौधा-हाथ डेढ़ हाथ ऊँचा होता है। पत्र-दो कतारों में तथा पुष्पदंड से छोटे होते हैं। इनके बीच से दंड निकलता है। इसके ऊपर लट्टू के समान गोल गुम्मजदार गुच्छों में सुहावने हरापन लिये सफेद फूल लगते हैं। इनमें से तिकोने काले बीज निकलते हैं। इसके नीचे जो कन्द बैठता है उसी को प्याज कहते हैं। किंचित् गुलाबी और सफेद रंगों के भेद से प्याज दो जाति का होता है। दोनों के पौधे एक समान होते हैं। औषधि में लाल जाति का प्याज उपयोग में लाना चाहिये । रासायनिक संगठन - इसमें एक उग्रगन्धि एवं कटु तैल तथा गन्धक के सेन्द्रीय योग पाये जाते हैं। इसके बाह्य छिलके में एक केर्सटीन (Quercetin) नामक पीत रंजक पदार्थ होता है तथा कंद में शर्करा भी होती है। गुण और प्रयोग - पियाज का उपयोग प्राचीन काल से आहार द्रव्य के रूप में किया जा रहा है। गरुड़पुराण में पलांडुगुटिका का पाठ है। यह किंचित् उष्ण, कफनिःसारक, उत्तेजक, वृष्य, बल्य, मूत्रजनन, आर्तवजनन, अग्निवर्धक, आनुलोमिक एवं उत्तम वांतहर है। इसके सेवन से कफ ढीला होकर निकलने लगता है एवं दूषित पित्त भी निकल जाता है। ( १ ) बच्चों एवं वृद्धों के कफविकारों में विशेषकर जब ज्वर न हो तब यह लाभदायक है। कच्चे प्याज के रस को मिश्री मिलाकर बच्चों को चटाया जाता है तथा वृद्धों में इसको पकाकर देते हैं। क्षयजकास में इससे कष्ट कम हो जाता है। श्वसनियों के जीर्ण शोथ के लिये लाभदायक औषधियों में यह श्रेष्ठ ओषधि है। ( २ ) वाजीकरण के लिये इसके रस को मधु एवं घृत के साथ दिया जाता है। ( ३ ) अर्श में इसके रस को १-२ तो० मिश्री के साथ पिलाते हैं या प्याज को पकाकर उसमें मिश्री, घी तथा जीरा मिलाकर खिलाते हैं एवं गरम २ मस्सों पर बांधते हैं। ( ४ ) मसूढ़ों की सूजन तथा शूल में इसको नमक के साथ खिलाते हैं। ( ५ ) इसका क्वाथ आन्त्रावरोध, अर्श, कामला एवं गुदभ्रंश आदि में लाभदायक है। ( ६ ) विसूचिका में इसके रस के साथ चूने का पानी मिलाकर पिलाते हैं। अग्नि वृद्धि के लिये सिरके के साथ इसका प्रयोग किया जाता है। प्लेग आदि मरक के समय कच्चे प्याज या सिरके के साथ इसका उपयोग किया जाता है। ( ७ ) अपतन्त्रक तथा नासिका से रक्तस्राव होने पर इसका नस्य कराया जाता है। चक्कर आता हो तो इसको सुंघाते हैं। ( ८ ) कर्णपिटिका में इसका पुटपाक करके साधारण गरम रस कान में डालने से शूल कम हो जाता है। इसके बीच के टुकड़े को भी कान में रखने से लाभ होता है।