भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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१३२ | भावप्रकाशनिघण्टुः अ०-सूम, फूम। यू०-स्कूईून। अ०-Garlic (गार्लिक) । ले०-Allium sativum, Linn. (एलियम् सटाइवम्, लिन०) । Fam. Liliaceae (लिलिएसी) । यह प्रायः सब प्रान्तों में बोया जाता है। विशेषकर पश्चिमोत्तर प्रदेश, गढ़वाल, कुमाऊँ, पंजाब एवं काश्मीर आदि में अधिक उत्पन्न होता है। इसका बहुवर्षाणु क्षुप-करीब १ फुट तक ऊँचा होता है। पत्र-चिपटे, लम्बे, १ इञ्च से कम चौड़े एवं इनका अग्र लम्बा होता है। पत्रकोश-३-४ इञ्च लम्बा होता है तथा पुष्प व्यूह को घेरे रहता है। पुष्पव्यूह-सबृन्त मूर्धज, छोटे, घने एवं पतले, शुष्क कोणपुष्पों से युक्त होते हैं। इसके कन्द को लहसुन कहा जाता है जिसके अन्दर ८-२० जावा होते हैं। इसमें एक विशेष प्रकार की तीव्र गन्ध तथा इसका स्वाद विशिष्ट प्रकार का कटु होता है। रासायनिक संगठन—इसमें एक बादामी पीले रंग का उड़नशील तैल ०.१-०.३% पाया जाता है जिसका वि. गु. १.०४६-१.०५७ होता है। इस तैल में प्रधान रूप से ॲलिल डाइसल्फा- इड् (Allyl disulphide, C₆ H₁₀ S₂) तथा ॲलिल-प्रॉपिल डाइसल्फाइड (Allyl-propyl disulphide) एवं अल्प मात्रा में उच्च श्रेणी के पॉलीत्सल्फाइड्स (Polysulphides) पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त लहसुन के मध्यसारिय सत्त्व से एक ॲलीसिन (Allicin, C₆ H₁₀ S₂ O) नामक प्रतिजीवाणीय (Antibacterial) तरल द्रव्य प्राप्त किया गया है। इसके साथ ही साथ ॲलीसेशन् I तथा ॲलीसेशन् II (Allicetion I and Allicetion II) नामक दो अत्यन्त तीव्र प्रतिजैविक (Antibiotics) पदार्थ भी पाये गये हैं जो ईथर (Ether) में घुलनशील लेकिन जल में न घुलने वाले होते हैं। गुण और प्रयोग—लहसुन एक बहुत ही उपयोगी औषधि है। प्राचीन काल से इसका प्रयोग किया जाता रहा है और आधुनिक विद्वानों ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। राजयक्ष्मा (Tuberculosis) एवं अन्य फुप्फुसविकार, वातविकार, शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dys- pepsia) एवं व्रण आदि के लिये यह बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। काश्यपसंहिता में लशुनकल्प नामक एक स्वतन्त्र अध्याय में इसका वर्णन किया गया है। धार्मिक ग्रन्थों में इसका सेवन निषिद्ध माना है। लहसुन उष्ण, दीपन, पाचन, वातहर, स्वेदजनन, मूत्रल, उत्तेजक, कफनिःसारक, बल्य, वृष्य, रसायन, दुर्गन्धहर एवं उत्तम प्रतिदूषक (Antiseptic) है। इसमें जो उड़नशील तैल होता है उसका उत्सर्ग त्वचा, फुप्फुस एवं वृक्क द्वारा होता है। फुप्फुस से उत्सर्ग के समय इससे कफ ढीला हो जाता है तथा उसमें के जीवाणुओं का नाश होकर कफ की दुर्गन्ध दूर होती है। वात नाडी संस्थान पर इसका उत्तेजक प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से वमन, विरेचन, एवं शिरःशूल आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। बच्चों में इसका सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये। अधिक मात्रा में सेवन करने पर कभी कभी मृत्यु भी हो सकती है। इसका बाह्य प्रयोग त्वगरागकारक (Rubefacient) एवं प्रतिदूषक औषधि के रूप में किया जाता है। अधिक समय तक त्वचा के साथ सम्पर्क होने से स्फोट उत्पन्न होते हैं। (१) यक्ष्मा दण्डाणु से उत्पन्न सभी विकृतियों जैसे फुप्फुसविकार, स्वरयन्त्रशोथ, चर्मविकार, अस्थिव्रण एवं नाड़ीव्रण आदि में यह निश्चित लाभदायक सिद्ध हुआ है। लहसुन के रस को इनमें पिलाया जाता है तथा इसका स्थानिक उपयोग भी किया जाता है। स्वरयंत्र शोथ में इसका टिंक्चर ३-१ ड्रा. दिन में २, ३ बार देते हैं। पुराने कफविकार जैसे कास, श्वास, स्वरभङ्ग,
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हरीतक्यादिवर्गः | १३३ श्वसनिका शोथ, श्वसनिकाभित्तीर्णता (Bronchiectasis) एवं श्वासकृच्छ्र आदि में इसका अव- लेह बनाकर उपयोग किया जाता है। लहसुन एवं वायविडङ्ग का सेवन भी लाभदायक है। बच्चों के कुकास में इसको ३,४ घण्टे पर सुंघाया जाता है तथा इसके रस को पिलाते भी हैं जिससे कष्ट कम हो जाता है। फुप्फुसकोथ (Gangrene of lungs) में इसके टिंक्चर (५ में १) का उपयोग बहुत सफल रहा है। प्रारम्भ में इसको कम मात्रा में देना चाहिये तथा बाद में २० बूंद तक दिन में ३ बार देना चाहिये। थोड़े ही समय में ज्वर, कफ की दुर्गन्ध, स्वेदाधिक्य एवं अग्निमान्द्य आदि दूर होकर लाभ होता है। इसी प्रकार खण्डीय फुप्फुसपाक (Lobar pneumonia) में भी इसके टिंक्चर को २० बूंद हर चार घण्टे पर जल के साथ देने से ४८ घण्टे के अन्दर ही लाभ मालूम होने लगता है तथा ५, ६ दिन में ज्वर कम हो जाता है। इन सभी विकारों में आन्तरिक प्रयोग के साथ-साथ इसको छाती पर लगाते भी हैं। (२) वायविडङ्ग के साथ इसका क्षीरपाक सभी वातविकारः में जैसे गृध्रसी, कटिग्रह, अर्दित, पक्षाघात, एकाङ्गवात, उरुस्तम्भ, अपतन्त्रक एवं अपस्मार आदि में लाभदायक है। आन्तरिक प्रयोग के साथ इससे सिद्ध तैल की मालिश भी की जाती है। अपस्मार में इसका फांट भोजन के पूर्व एवं पश्चात् देने का विधान है। अपतन्त्रक में इसको सुंघाया जाता है। इसी प्रकार ठण्डक लगने से उत्पन्न पीड़ा, जीर्ण आमवात एवं संधिशोथ तथा शिरःशूल आदि में इसको खिलाया जाता है तथा बाह्य लेप भी किया जाता है। बच्चों के वात विकारों में इसकी मालिश विशेष लाभदायक है। (३) शैथिल्यप्रधान कुपचन (Atonic dyspepsia), आध्मान, उदरशूल, विसूचिका, वमन, गुल्म, उदावर्त, आंव एवं केंचुवों की बीमारी में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। केंचुआ (Round worms) में १०-३० बूंद रस दूध में मिलाकर पिलाते हैं। वातगुल्म में इसको पीस कर घृत के साथ खिलाने से लाभ होता है। ग्रहणीव्रण (Duodenal ulcer) में भी इसको लाभदायक माना गया है। (४) विषमज्वर में इसको तैल या घृत के साथ सुबह खिलाने से लाभ होता है। आन्त्रिक एवं तन्द्रालु ज्वर (Typhoid and Typhus) के प्रतिबन्धन के लिये इसके टिंक्चर को १/२ ड्रा. हर ४ या ६ घण्टे पर शरबत के साथ देते हैं। यदि रोग के प्रारम्भ में ही इसका प्रयोग किया जावेगा तो ज्वर बढ़ने नहीं पावेगा। इसका उपयोग आन्त्रिक प्रतिदूषक (Intestinal antiseptic) औषधि के रूप में किसी भी अवस्था में किया जा सकता है। बच्चों को ३ ड्रा. की मात्रा में शरबत के साथ पर्याप्त है। (५) हृद्रोग में इसके प्रयोग से आध्मान कम हो कर हृदय के ऊपर का दबाव दूर होता है जिससे हृदय को बल प्राप्त होकर मूत्र अधिक होने लगता है तथा सर्वाङ्गशोथ एवं जलोदर में लाभ होता है। (६) इसके स्वरस को २, ४ भाग जल में मिला कर क्षत तथा दुर्गन्धित व्रण प्रक्षालन के काम में लाया जाता है जिससे वेदना कम हो कर व्रण जल्दी ठीक होता है। कार्बोलिक एसिड (Carbolic acid) की अपेक्षा इससे धातुओं को कम नुकसान होता है। इसी प्रकार शोथ, विद्रधि, बालतोड़ एवं दाद आदि पर इसका लेप लाभदायक है। इससे सिद्ध सर्षप तैल का उपयोग खुजली (पामा) में किया जाता है। रोहिणी (Diphtheria) नामक अत्यन्त उग्र गले के विकार में इसकी एक, एक कली चूसने को दी जाती है। ३, ४ घण्टे में १ छटांक तक लहसुन दिया जाता है। विकृत कला (Mem- brane) के दूर होने पर दिन भर में १ छटांक तक लहसुन देना चाहिये । शिशुओं के लिये इसके रस को २०-३० बूंद हर चार घण्टे पर शरबत के साथ देना चाहिये। एक रोगी में नाड़ीव्रण