भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३० भावप्रकाशनिघण्टुः (१) लोध्र अतिसार एवं प्रवाहिका के लिये बहुत अच्छी औषधि है। इसमें इसके प्रवाही सत्त्व को ३ डा० की मात्रा में देने से इपीकाक से जिनको लाभ नहीं हुआ था उन्हें भी लाभ हुआ । इसमें बेल की गुदी, कुचला एवं कुरैया की छाल के साथ इसका प्रयोग करते हैं या इसके साथ मुलेठी, अनार का छिलका एवं कायफल का प्रयोग किया जाता है। (२) रक्तप्रदर में इसके चूर्ण को १०-२० की मात्रा में दिन में ३, ४ बार मिश्री के साथ ३, ४ दिन तक देने से बहुत लाभ होता है। इससे गर्भाशय का संकोच होकर उसकी शिथिलता दूर होती है जिससे रक्तप्रदर एवं श्वेतप्रदर आदि में यह उपयोगी है। गर्भिणी मे ७ वें या ८ वें महीने में यदि गर्भ में अधिक चलन हो तो इसे छोटी पीपल एवं मधु के साथ चटाने से गर्भाशय संकोच होकर चलन कम हो जाता है। (३) आंखों में लाली तथा सूजन होने पर इसको पलकों के चारों तरफ लगाते हैं। इसके साथ मुलेठी, रसौत एवं भुनी फिटकिरी का उपयोग लेप में किया जाता है। (४) श्लीपद (Filaria = फाइलेरिया) के कारण उत्पन्न पायसमेह (Chyluria = काइ- लूरिया) तथा फीलपांव (Elephantiasis = एलिफॅन्टियासिस) में यह लाभदायक सिद्ध हुआ है। (५) कुष्ठ एवं व्रण आदि में इसका अन्तः बाह्य प्रयोग किया जाता है। प्रसूता में योनिक्षत के लिये इसका लेप उपयोगी है। गलशुण्डिका वृद्धि एवं मसूदों से यदि खून जाता हो तो इसके क्वाथ से गण्डूष कराते हैं तथा रसौत, नागरमोथा एवं लोध्र का मधु के साथ मसूदों पर लेप करते हैं। सूजन पर लोध्र के लेप से सूजन कम हो जाती है। मात्रा-चूर्ण ५-१० र० । ७६ पठानी लोध्र । हि०-पठानी लोध्र । बं०-पटिया लोध्र । गु०-पठाणी लोधर । पं०-पठानी लोद, लान्दर, लोज, लोश । म०-पट्टी लोध्र । ते०-तैल लुट्ठुगु । क०-बिली लोध्र । सिन्ध०-लोदर, पठानी लोध्र । ले०-Symplocos crataegoides Buch. Ham. (सिम्पलोकॉस् क्रेटेगॉइंडिस्) । (Fam. Symplocaceae (सिम्पलोकेसी)। इसके वृक्ष हिमालय में सिन्ध नदी से आसाम तक, खासिया पहाड़ और मरतवान के पहाड़ों में ३-९ हजार फीट की ऊँचाई पर पाये जाते हैं। यह वृक्ष-३० फुट तक ऊँचा होता है। छाल- हल्के सफेद रंग की और कार्क युक्त होती है तथा उस पर खड़ी नालियां रहती हैं। काठ-आधा इञ्च मोटा, हल्का पीला व रेशेदार होता है। पत्ते-२-४ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, पतले, अण्डाकार या लट्वाकार, लंबाय और अग्र की ओर तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं तथा सूखने पर पीले रङ्ग के हो जाते हैं। फूल-सफेद, समशिखाकार गुच्छों में तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फूलों की सुगन्धि दूर तक जान पड़ती है। फल-चौथाई इञ्च से तिहाई इञ्च तक लम्बे तथा गोल होते हैं। उनसे मुड़ा हुआ गोल बीज निकलता है। इसके गुण और प्रयोग आदि सब उपर्युक्त लोध्र के समान ही हैं।
अथ लशुन, तस्य नामान्याह लशुनस्तु रसोनः स्यादुग्रगन्धो महौषधम् । अरिष्टो म्लेच्छकन्दश्च यवनेष्टो रसोन्कः ॥२१०॥ लशुनके नाम-लशुन, रसोन, उग्रगन्ध, महौषध, अरिष्ट, म्लेच्छकन्द, यवनेष्ट और रसोन्क ये नाम लशुन के हैं ॥ २१० ॥
हरीतक्यादिवर्गः १३१ अथ लशुनोत्पत्तिमाह यदाऽमृतं वैनतेयो जहार सुरसत्तमात् । तदा ततोऽपतद् बिन्दुः स रसोनेोऽभवद् भुवि ॥ लशुन की उत्पत्ति-जिस समय गरुडने इन्द्र के पास से अमृत हरण किया था उस समय स अमृत) से जो बिन्दु (अमृत-बिन्दु) पृथ्वी पर गिरा उसी से लहुसन की उत्पत्ति हुई ॥२१८॥ अथ रसोनशब्दस्य निरुक्तिमाह पञ्चभिश्च रसैर्युक्तो रसेनाम्लेन वर्जितः । तस्माद्रसोन इत्युक्तो द्रव्याणां गुणवेदिभिः ॥ लहुसन के 'रसोन' नामकी व्युत्पत्ति-लहुसन में ६ प्रकार के रसों में से ५ प्रकार के रस रहते हैं किन्तु केवल एक अम्ल रस नहीं रहता है, अत एव रस अर्थात् केवल अम्ल रस से ऊन अर्थात् शून्य रहने से द्रव्यों के गुणादिक जानने वाले विद्वानों ने इसका 'रसोन' नाम रक्खा है॥ अथ लशुने रसस्थानान्याह कटुकश्चापि मूलेषु तिक्तः पत्रेषु संस्थितः । नाले कषाय उद्दिष्टो नालाग्रे लवणः स्मृतः ॥ बीजे तु मधुरः प्रोक्तो रसस्तद्गुणवेदिभिः ॥ २२० ॥ लहुसन में कटु आदि पांचो रसों के रहने के स्थान-इसके मूलभाग में कटु रस रहता है, पत्तों में तिक्त रस, नाल में कषाय रस, नाल के अग्रभाग में लवण रस तथा बीज में मधुर रस रहता है, ऐसा लहुसन के गुणों के जानने वाले विद्वानों ने कहा है ॥ २२० ॥ अथ लशुनगुणानाह रसोनों बृंहणो वृष्यः स्निग्धोष्णः पाचनः सरः । रसे पाके च कटुकस्तीक्ष्णो मधुरको मतः ॥ भग्नसन्धानकृत्कण्ठ्यो गुरुः पित्तास्रवृद्धिदः । बलवर्णकरो मेधाहितो नेत्र्यो रसायनः ॥२२१॥ हृद्रोगजीर्णज्वरकुक्षिशूल-विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुर्नामकूष्ठानलसाद्जन्तु-समीरणश्वासकफांश्च हन्ति ॥ २२३ ॥ लहुसन के गुण-लहुसन बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), स्निग्ध, उष्णवीर्य, पाचक तथा सारक होता है। और वह रस तथा पाक में कटु तथा मधुर रस युक्त, तीक्ष्ण, भग्न-सन्धान- कारक (टूटी हड्डियों को जोड़ने वाला), कण्ठ को हितकारी, गुरु, पित्त एवं रक्तवर्धक, शरीर में बल तथा वर्ण को उत्पन्न करने वाला, मेधाशक्ति तथा नेत्रों के लिये हितकर और रसायन होता है। एवं हृद्रोग, जीर्णज्वर, कुक्षिशूल, मल तथा वातादिक की विबन्धता, गुल्म, अरुचि, कास, शोथ, बवासीर, कुष्ठ, अग्निमान्य, कृमि, वायु, श्वास और कफ को नष्ट करता है ॥ २२१-२२३ ॥ अथ लशुनेसेविनां हिताहितपदार्थान्मह मद्यं मांसं तथाऽम्लञ्च हितं लशुनसेविनाम । व्यायाममातपं रोषमतिनीरं पयो गुडम् ॥ रसोनमश्नन् पुरुषस्त्यजेदेतान् निरन्तरम् ॥ २२५ ॥ लहुसन सेवन करनेवालों के लिये हितकर तथा अहितकर पदार्थ-मद्य, मांस तथा अम्लरस युक्त भक्ष्य पदार्थ ये सब लहुसुन खाने वालों के लिये हितकर हैं। और व्यायाम, आतप (धूप में फिरना), क्रोध करना, अत्यन्त जल पीना, दूध और गुड़ इन सबों को लहुसुन खाने वाले पुरुष सदा छोड़ दें, क्योंकि ये सब अहितकर हैं ॥ २२४-२२५ ॥ ७७ लहुसुन । हि०-लहुसुन, लशुन । बं०-रसुन । म०-लसूण । क०-बेल्लुळ्ळि । ते०-वेल्लुळ्ळि, तेळ्ळिगड्ड्डा । ता०-वळ्ळैपंडु । गु०-लसण । सिंधी-थोम । आसा०-नहरु । भोटि०-गोक्पस । फा०-सीर ।