भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)
Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary
भावमिश्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके रासायनिक संगठन के विषय में कुछ मतभेद हैं और अभी संशोधन की आवश्यकता है। लेकिन इतना निश्चित है कि फलत्वक् के स्वरस में एक दाहजनक तैलीय पदार्थ एवं मज्जा में काजू की तरह पौष्टिक द्रव्य और एक प्रकार का तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—भिलावा उष्ण, रसायन, मेध्य, वाजीकर, वातकफहर, मूत्रजनन, वातनाडी- बल्य, अग्निवर्धक, व्रणोत्पादक एवं कुष्ठघ्न है। इसका प्रत्यूषण बहुत जल्दी होता है लेकिन उत्सर्ग बहुत देर में होता है। आमाशय एवं उत्तरगुद पर इसकी विशेष क्रिया होती हैं। यकृत् पर उत्तेजक क्रिया होने से पित्तस्राव ठीक होता है जिससे भूख बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण और विनिमय क्रिया ठीक होने से अर्श में लाभ होता है। त्वचा से उत्सर्ग के समय स्वेद आता है तथा त्वचा लाल हो जाती है। वृक्क पर उत्तेजक प्रभाव होने के कारण प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन बाद में कम हो जाती है तथा कभी कभी मूत्र में खून भी आ जाता है। इसका वाजीकर प्रभाव वातनाड़ियों की उत्तेजना से एवं प्रत्यक्षतया मूत्रनलिका के प्रक्षोभ से होता है। प्रत्यक्ष मांसपेशियों की अपेक्षा वातनाड़ियों को बलप्राप्त होने से यह अनेक वातरोगों में लाभ- दायक है। इससे नाड़ी की गति बढ़ती है तथा हृदय का कार्य भी ठीक होने लगता है। रस- ग्रन्थियों की उत्तेजना से श्वेतकणों की वृद्धि होती है जिससे शोथ आदि में लाभ होता है। इस प्रकार शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होने से योग्यरूप में सेवन से इसको अमृत के समान लाभ- दायक एवं रसायन मानते हैं। बाह्य त्वचा पर भिलावे का तैल लगने से त्वचा काली होकर जलन होती है एवं फोड़े होकर व्रण उत्पन्न होते हैं। उचित रूप में प्रयोग करने से आन्तरिक प्रयोग में इस प्रकार के लक्षण नहीं होते। इसका उपयोग अर्श, वातविकार, कफविकार, फिरंग, गण्डमाला, कृमि, विसूचिका, गुल्म, आमवात एवं कुष्ठ आदि रोगों में किया जाता है। (१) भिलावे को दीपक पर गरम करने से जो तेल टपकता है वह दूध में टपकाकर हरिद्रा एवं मिश्री मिलाकर फुफ्फुस विकारों में रात के समय दिया जाता है। प्रारम्भ में एक बूंद तथा धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हैं। तमकश्वास पीड़ित रोगियों के लिये शीत ऋतु में इसका नित्य प्रयोग लाभदायक है। उपजिह्वा एवं गलतोण्डिका की शिथिलता से उत्पन्न कास में भी इससे लाभ होता है। फुफ्फुसपाक में मुलैठी के साथ भिलावा दिया जाता है। (२) अग्निमांद्य, कुपचन, आनाह, विबन्ध, ग्रहणी, अर्श, उदर, गुल्म एवं विसूचिका आदि रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे स्निग्ध पदार्थों का पाचन अच्छी तरह से होता है। अर्श में भिलावा, हर्रा एवं तिल समान मात्रा में लेकर दुगुने गुड़ के साथ गोली बना- कर ३-६ माशा खिलाते हैं तथा इसका धुआं भी दिया जाता है। हैजे में एक भिलावे को आधा तो ला इमली के साथ पीसकर २ तोला लहसुन के रस के साथ पिलाते हैं। (३) रसायन के लिये १ भिलावे को काटकर एवं कूटकर १६ गुने जल में उबाल कर आधा रहने पर फिर ८ गुना दूध मिलाकर फिर उबाले तथा आधा शेष रहने पर उस क्षीर को छानकर १-२ तो० की मात्रा में प्रयोग करे। इसके पूर्व थोड़ासा घी मुख में चारों तरफ लगा लेना चाहिये तथा थोड़ासा घी निगलना भी चाहिये। प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु में इसका उपयोग करने से किसी प्रकार के रोग नहीं होने पाते। हरीतक्यादिवर्गः । १४१ (४) वातनाड़ी शोथ, गृध्रसी, अर्दित, अंगघात, उरुस्तम्भ, मस्तिष्कावरण शोथ तथा मान- सिक कार्य अधिक करने के कारण उत्पन्न थकावट में इसको इमली की पत्ती, लहसुन, वायविडङ्ग, नारियल का रस एवं मिश्री के साथ खिलाते हैं। (५) भिलावा १ भाग, काजू ६ भाग एवं शहद १ भाग अच्छी तरह घोटकर २ माशा दिन में ४ बार देने से नूतन तथा तीव्र आमवात में दो तीन दिन में ही लाभ होता है। जीर्ण आमवात में विशेष लाभ नहीं होता है। (६) गण्डमाला के लिये भिलावा २, अजवायन २ एवं पारद १ इसको घोंटकर चने बराबर इसकी गोली दही के साथ खिलाई जाती है। (७) इसके तैल का आंतरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। एक से दो बूंद तैल किसी अन्य तिलादि अक्षोभक तैल में मिलाकर फिरंग, गण्डमाला, कुपचन, अर्श, नाडी दौर्बल्य, चर्मरोग, कृमि, अपस्मार, अंगघात, आमवात एवं श्वास आदि रोगों में दिया जाता है। (८) इसका काथ दुग्ध एवं घृत के साथ नाडी शोथ, वातबलासक, संखिया के विष से उत्पन्न नाड़ीविकार एवं आर्तवविकार में लाभदायक है। (९) इसके तैल का बाह्यप्रयोग प्रतिक्षोभक (Counter irritant) एवं स्फोटोत्पादक (Vesicant) के रूप में किया जाता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसका ज्यादा उपयोग होता है। चर्मकील, दद्रु, किलास सन्निपीड़ा, मोच, चित्र, गजचर्म, कुष्ठज ग्रन्थि एवं प्लीहावृद्धि आदि पर सुई के नोक से कई जगह इसको लगाते हैं या इसको मक्खन के साथ मिलाकर मलहम के रूप में प्रयोग करते हैं। (१०) इसकी मज्जा वाजीकर होती है। गरी एवं चिरौंजी के साथ इसका पाक सेवन कराया जाता है। विषैला प्रभाव—किसी किसी को भिलावा सहन नहीं होता है। इससे मूत्र का रंग गहरा, शरीर में दाह, खुजली, चकत्ते, अतिसार, ज्वर एवं कभी-कभी रक्तमेह, फोड़े फूट कर व्रण एवं उन्माद आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा कम होती है तथा उसका रंग धुंधला होने लगता है। गुदा एवं शिश्नेन्द्रिय के मुख पर कण्डू उत्पन्न होती है। प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न होते ही औषधि को बन्द कर नारियल का दूध या इमली की पत्ती का रस या तिल एवं नारियल खाने को देना चाहिये। शरीर पर नारियल का तेल, घी, राल या नागद्रव (Lead lotion-लैड लोशन) का बाह्य उपयोग करना चाहिये। पथ्य—भिलावे के प्रयोग के समय घी, दूध एवं चावल का सेवन अधिक करना चाहिये। वर्ज्य—धूप में घूमना, स्त्रीसहवास, मांसभक्षण, नमक, व्यायाम एवं तैलाभ्यङ्ग आदि छोड़ देना चाहिये। निषेध—पैत्तिक विकार, रक्तस्रावी प्रवृत्ति, गर्भिणी, बाल, वृद्ध, अतिसार, वृक्करोध एवं उष्ण काल में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। मात्रा—तैल—१-२ बूंद, अवलेह—३-३ तो०, क्षीरपाक—१-२ तो० । अथ भङ्गा (भांग), तस्या नाम गुणानाह भङ्गा गञ्जा मातुलानी मादिनी विजया जया ॥ २३३ ॥ भङ्गा कफ हरी तिक्ता ग्राहिणी पाचनी लघुः । तीक्ष्णोष्णा पित्तला मोहमदवाग्वह्निवर्द्धिनी ॥