भारतकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

१४० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—इसके रासायनिक संगठन के विषय में कुछ मतभेद हैं और अभी संशोधन की आवश्यकता है। लेकिन इतना निश्चित है कि फलत्वक् के स्वरस में एक दाहजनक तैलीय पदार्थ एवं मज्जा में काजू की तरह पौष्टिक द्रव्य और एक प्रकार का तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग—भिलावा उष्ण, रसायन, मेध्य, वाजीकर, वातकफहर, मूत्रजनन, वातनाडी- बल्य, अग्निवर्धक, व्रणोत्पादक एवं कुष्ठघ्न है। इसका प्रत्यूषण बहुत जल्दी होता है लेकिन उत्सर्ग बहुत देर में होता है। आमाशय एवं उत्तरगुद पर इसकी विशेष क्रिया होती हैं। यकृत् पर उत्तेजक क्रिया होने से पित्तस्राव ठीक होता है जिससे भूख बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण और विनिमय क्रिया ठीक होने से अर्श में लाभ होता है। त्वचा से उत्सर्ग के समय स्वेद आता है तथा त्वचा लाल हो जाती है। वृक्क पर उत्तेजक प्रभाव होने के कारण प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा बढ़ती है लेकिन बाद में कम हो जाती है तथा कभी कभी मूत्र में खून भी आ जाता है। इसका वाजीकर प्रभाव वातनाड़ियों की उत्तेजना से एवं प्रत्यक्षतया मूत्रनलिका के प्रक्षोभ से होता है। प्रत्यक्ष मांसपेशियों की अपेक्षा वातनाड़ियों को बलप्राप्त होने से यह अनेक वातरोगों में लाभ- दायक है। इससे नाड़ी की गति बढ़ती है तथा हृदय का कार्य भी ठीक होने लगता है। रस- ग्रन्थियों की उत्तेजना से श्वेतकणों की वृद्धि होती है जिससे शोथ आदि में लाभ होता है। इस प्रकार शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होने से योग्यरूप में सेवन से इसको अमृत के समान लाभ- दायक एवं रसायन मानते हैं। बाह्य त्वचा पर भिलावे का तैल लगने से त्वचा काली होकर जलन होती है एवं फोड़े होकर व्रण उत्पन्न होते हैं। उचित रूप में प्रयोग करने से आन्तरिक प्रयोग में इस प्रकार के लक्षण नहीं होते। इसका उपयोग अर्श, वातविकार, कफविकार, फिरंग, गण्डमाला, कृमि, विसूचिका, गुल्म, आमवात एवं कुष्ठ आदि रोगों में किया जाता है। (१) भिलावे को दीपक पर गरम करने से जो तेल टपकता है वह दूध में टपकाकर हरिद्रा एवं मिश्री मिलाकर फुफ्फुस विकारों में रात के समय दिया जाता है। प्रारम्भ में एक बूंद तथा धीरे-धीरे इसे बढ़ाते हैं। तमकश्वास पीड़ित रोगियों के लिये शीत ऋतु में इसका नित्य प्रयोग लाभदायक है। उपजिह्वा एवं गलतोण्डिका की शिथिलता से उत्पन्न कास में भी इससे लाभ होता है। फुफ्फुसपाक में मुलैठी के साथ भिलावा दिया जाता है। (२) अग्निमांद्य, कुपचन, आनाह, विबन्ध, ग्रहणी, अर्श, उदर, गुल्म एवं विसूचिका आदि रोगों में इसका बहुत प्रयोग किया जाता है। इससे स्निग्ध पदार्थों का पाचन अच्छी तरह से होता है। अर्श में भिलावा, हर्रा एवं तिल समान मात्रा में लेकर दुगुने गुड़ के साथ गोली बना- कर ३-६ माशा खिलाते हैं तथा इसका धुआं भी दिया जाता है। हैजे में एक भिलावे को आधा तो ला इमली के साथ पीसकर २ तोला लहसुन के रस के साथ पिलाते हैं। (३) रसायन के लिये १ भिलावे को काटकर एवं कूटकर १६ गुने जल में उबाल कर आधा रहने पर फिर ८ गुना दूध मिलाकर फिर उबाले तथा आधा शेष रहने पर उस क्षीर को छानकर १-२ तो० की मात्रा में प्रयोग करे। इसके पूर्व थोड़ासा घी मुख में चारों तरफ लगा लेना चाहिये तथा थोड़ासा घी निगलना भी चाहिये। प्रत्येक वर्ष शीत ऋतु में इसका उपयोग करने से किसी प्रकार के रोग नहीं होने पाते। हरीतक्यादिवर्गः । १४१ (४) वातनाड़ी शोथ, गृध्रसी, अर्दित, अंगघात, उरुस्तम्भ, मस्तिष्कावरण शोथ तथा मान- सिक कार्य अधिक करने के कारण उत्पन्न थकावट में इसको इमली की पत्ती, लहसुन, वायविडङ्ग, नारियल का रस एवं मिश्री के साथ खिलाते हैं। (५) भिलावा १ भाग, काजू ६ भाग एवं शहद १ भाग अच्छी तरह घोटकर २ माशा दिन में ४ बार देने से नूतन तथा तीव्र आमवात में दो तीन दिन में ही लाभ होता है। जीर्ण आमवात में विशेष लाभ नहीं होता है। (६) गण्डमाला के लिये भिलावा २, अजवायन २ एवं पारद १ इसको घोंटकर चने बराबर इसकी गोली दही के साथ खिलाई जाती है। (७) इसके तैल का आंतरिक एवं बाह्य प्रयोग किया जाता है। एक से दो बूंद तैल किसी अन्य तिलादि अक्षोभक तैल में मिलाकर फिरंग, गण्डमाला, कुपचन, अर्श, नाडी दौर्बल्य, चर्मरोग, कृमि, अपस्मार, अंगघात, आमवात एवं श्वास आदि रोगों में दिया जाता है। (८) इसका काथ दुग्ध एवं घृत के साथ नाडी शोथ, वातबलासक, संखिया के विष से उत्पन्न नाड़ीविकार एवं आर्तवविकार में लाभदायक है। (९) इसके तैल का बाह्यप्रयोग प्रतिक्षोभक (Counter irritant) एवं स्फोटोत्पादक (Vesicant) के रूप में किया जाता है। जीर्ण त्वचा के रोगों में इसका ज्यादा उपयोग होता है। चर्मकील, दद्रु, किलास सन्निपीड़ा, मोच, चित्र, गजचर्म, कुष्ठज ग्रन्थि एवं प्लीहावृद्धि आदि पर सुई के नोक से कई जगह इसको लगाते हैं या इसको मक्खन के साथ मिलाकर मलहम के रूप में प्रयोग करते हैं। (१०) इसकी मज्जा वाजीकर होती है। गरी एवं चिरौंजी के साथ इसका पाक सेवन कराया जाता है। विषैला प्रभाव—किसी किसी को भिलावा सहन नहीं होता है। इससे मूत्र का रंग गहरा, शरीर में दाह, खुजली, चकत्ते, अतिसार, ज्वर एवं कभी-कभी रक्तमेह, फोड़े फूट कर व्रण एवं उन्माद आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। प्रारम्भ में मूत्र की मात्रा कम होती है तथा उसका रंग धुंधला होने लगता है। गुदा एवं शिश्नेन्द्रिय के मुख पर कण्डू उत्पन्न होती है। प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न होते ही औषधि को बन्द कर नारियल का दूध या इमली की पत्ती का रस या तिल एवं नारियल खाने को देना चाहिये। शरीर पर नारियल का तेल, घी, राल या नागद्रव (Lead lotion-लैड लोशन) का बाह्य उपयोग करना चाहिये। पथ्य—भिलावे के प्रयोग के समय घी, दूध एवं चावल का सेवन अधिक करना चाहिये। वर्ज्य—धूप में घूमना, स्त्रीसहवास, मांसभक्षण, नमक, व्यायाम एवं तैलाभ्यङ्ग आदि छोड़ देना चाहिये। निषेध—पैत्तिक विकार, रक्तस्रावी प्रवृत्ति, गर्भिणी, बाल, वृद्ध, अतिसार, वृक्करोध एवं उष्ण काल में इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। मात्रा—तैल—१-२ बूंद, अवलेह—३-३ तो०, क्षीरपाक—१-२ तो० । अथ भङ्गा (भांग), तस्या नाम गुणानाह भङ्गा गञ्जा मातुलानी मादिनी विजया जया ॥ २३३ ॥ भङ्गा कफ हरी तिक्ता ग्राहिणी पाचनी लघुः । तीक्ष्णोष्णा पित्तला मोहमदवाग्वह्निवर्द्धिनी ॥

१४२ भावप्रकाशनिघण्टुः भांग के नाम तथा गुण—भङ्गा, गञ्जा, मातुलानी, मादिनी, विजया और जया ये सब भांग के पर्यायवाची नाम हैं। भांग-कफ को दूर करने वाली, तिक्तरस युक्त, ग्राही, पाचक, लघु, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, पित्तकारक तथा मोह, मद, वाणी और जठराग्नि को बढ़ाने वाली होती है ॥ ८२. भांग हिं०-भांग, भंग, बूटी । बं०-सिद्धि । म०-पं०-मा०-भांग । गु०-भांग । ते०-गंजापि । ब्रह्मी०-बिन । मा०-बूटी । क०-भंगी । ता०-कञ्जा । फा०-क(कि)नब, बंग । अ०-हशीश, बर्कुल ख्याल । गांजा हिं०-गांजा, गंजा, गांझा । बं०, म०-गांजा । ता०-गांजा, येला । गु०-गांजो । ते०-गाजाइ, बंगि-अकु । फा०-किनब । अ०-कु(कि)न्नब । अं०-Indian hemp (इण्डियन हेम्प), Cannabis (कॅन्नाबिस्) । ले०-Cannabis sativa, Linn. (कॅन्नाबिस सेटाव्हा, लिन.); Cannabis indica Lam. (कॅन्नाबिस इण्डिका लॅम.) । Fam. Cannabinaceae (कॅन्नॅबिनेंसी) । इसका पौधा भारतवर्ष में हिमालय के निचले प्रदेशों में करीब २ अपने स्वाभाविक रूप में उत्पन्न होता है तथा पंजाब से पूर्व की ओर बंगाल एवं बिहार तक तथा दक्षिण की ओर परतो भूमि में बहुतायत से प्राप्त होता है। उत्तरप्रदेश के अल्मोड़ा, गढ़वाल तथा नैनीताल जिलों में इसकी उपज की जाती है। ट्रावनकोर तथा काश्मीर में भी अल्प मात्रा में इसकी उपज की जाती है। भांग का पौधा पश्चिमी तथा मध्य एशिया का नैसर्गिक (Native-नेटिव्ह) माना जाता है। मुंगेर, पंजाब, नागपुर, बहराइच आदि जिलों की भंग अच्छी समझी जाती है। इसका क्षुप-सीधा ३ से ८ फीट एवं कभी-कभी १६ फीट तक ऊंचा होता है। पत्ते-नीचे के समवर्ती और विषमवर्ती दोनों प्रकार के करतलाकार तथा आधार तक कटे हुये होते हैं। ऊपर वाले पत्ते १-५ भागों में विभक्त और नीचे वाले ५ से ११ खण्ड में कटे हुए तथा ३ से ८ इञ्च के घेरे में रेखाकार-भालाकार दिखाई पड़ते हैं। इनके खण्ड तीक्ष्ण दन्तुर, लम्बाग्रयुक्त, आधार की तरफ संकुचित तथा इनका ऊर्ध्व पृष्ठ गहरे हरे रंग का खुरदरा एवं अधोपृष्ठ हल्के रंग का मृदुरोमश होता है। फूल-हल्के पीत-हरित रंग के, अक्षिलिंगी एवं गुच्छेदार होते हैं। फल-बहुत छोटे, कुछ दबे हुये, बीज के समान चर्मल फल (Achene=एचीनी), स्थायी परिपुष्प (Perianth=पेरियैंथ) से आवृत एवं एक २ बीजों से युक्त होते हैं। भांग के क्षुप स्त्री जाति और पुरुष जाति इन भेदों से दो प्रकार के होते हैं। स्त्री जाति का क्षुप कुछ अधिक ऊंचा तथा उसमें पत्र बहुतायत से तथा गहरे वर्ण के होते हैं। इसका क्षुप पुरुष जाति के क्षुप की अपेक्षा ५, ६ सप्ताह अधिक समय में परिपुष्ट होता है। भांग-यह उपज किये हुए या अपने आप उत्पन्न इस क्षुप के स्त्री एवं पुरुष जाति के सूखे हुए पत्तों को कहते हैं। इसमें पुरुष जाति के पुष्प भी होते हैं। पुरुष जाति के पुष्प, पत्तों की अपेक्षा अधिक मादक नहीं होते जैसा कि स्त्री जाति के पुष्प होते हैं। जून एवं जुलाई के महीने में अधिक ऊँचाई पर होने वाले क्षुपों का एवं मई और जून में मैदानी प्रान्तों वाले क्षुपों का संग्रह किया जाता है। उन्हें काटकर ओस तथा धूप में बार २ रख कर सुखाते हैं तथा सूखने पर दबाकर रखा जाता है। गांजा-उपज किये हुए स्त्री जाति के क्षुपकी सूखी हुई रालदार पुष्पमंजरी को गांजा कहते हैं। इसका रंग मटमैला, हरा, स्वाद कुछ कटु एवं गंध विशिष्ट प्रकार की मादक होती है। गांजे की जटा २॥ इञ्च से २॥ इञ्च तक लम्बी तथा चौड़ी होती है। एक २ इञ्च लम्बी लकड़ियों के चारों ओर फूलदार शाखायें हरीतक्यादिवर्गः १४३ लगी रहती हैं। चरस-गांजा के वृक्ष से एक लसदार राल के समान रस निकल कर जम जाता है उसी को चरस कहते हैं। ओस पड़ने के पश्चात् सुबह चमड़े का कपड़ा पहन कर वृक्षों में रगड़ने से समस्त चरस कपड़े पर लग जाता है उसी को चमड़े से पृथक् कर गोले या ढेले बना लेते हैं। या हाथ और पैरों से पुष्पमंजरियों को रगड़ कर हाथ पैरों में चिपके हुए भाग को खुरच कर जमा कर लेते हैं। हिन्दुस्तान में उत्पन्न हुए वृक्षों से चरस पृथक् नहीं की जाती इसलिए यहां गांजा तैयार हो जाता है। भारतवर्ष में चरस यारकंद से, काश्मीर के लेह के रास्ते आता है। भारत के दक्षिण तथा पश्चिम में अधिकतर गांजा नाम से भांग और गांजा दोनों का प्रयोग होता है। भांग तो पीस कर बनाये हुये पेय को अधिकतर कहा जाता है। पुरी की तरफ गांजे को ही पीसकर बने पेय को भांग कहा जाता है। भांग, गांजा, चरस तथा बीजों का औषध में व्यवहार किया जाता है तथा मादक पेय एवं धूम्रपान आदि के व्यसन के रूप में लोग इनका बहुत व्यवहार करते हैं। चरक सुश्रुतादि प्राचीन ग्रन्थों में इसका उल्लेख नहीं हैं लेकिन बाद में ग्रन्थकारों ने इनका भांग नाम से अधिकतर उपयोग किया हैं। शोधन-भांग तथा गांजे को दूध में दोलायंत्र में पकाकर जल से धोकर सुखाकर प्रयोग में लाना चाहिये । रासायनिक संगठन - गांजे में कॅन्नाबिनोन् (Cannabinone) नामक एक मुलायम बादामी रंग की राल होती है। इस राल का प्रधान तत्व एक लाल रंग का गाढ़ा मादक (Narcotic) तैल होता है जो वायु के साथ संपर्क में आने पर गाढ़ा तथा अल्प वीर्य हो जाता है। इस तैल में एक कॅन्नाबिनोल् (Cannabinol; C21 H26 O2) नामक विषैला तत्व रहता है जो इसमें का कार्यकारी तत्व नहीं है। इस राल के अतिरिक्त इसमें गोंद, शर्करा, कॅल्शियम फॉस्फेट (Calcium phosphate), अत्यल्प मात्रा में उड़नशील तैल, सेन्द्रिय अम्ल, कलमी सोरा एवं नौसादर आदि पदार्थ पाये जाते हैं। अफ्रीकी, अमेरीकी एवं भारतीय किस्मों के गुणों में विशेष अन्तर नहीं है तथा शुष्क अवस्था में अच्छी तरह रखने से बहुत दिन तक इसके गुण भी कम नहीं होते। गांजे में करीब २६%, भांग में १०% एवं चरस में ४०% राल होती है। गुण और प्रयोग - भांग एवं गांजे के गुण करीब २ समान ही हैं लेकिन भांग की क्रिया विशेषतः आमाशय एवं आंत्र पर, अधिक होती है तथा यह गांजे की अपेक्षा अधिक ग्राही होती है। यह उत्तेजक, वेदनाहर, शांतिकारक, क्षुधावर्धक, आह्लादकारक, सौमनस्यजनन, स्वापजनन, आक्षेपनिरोधी (Anticonvulsant), उद्वेष्टननिरोधी (Antispasmodic), गर्भाशयसंकोचक, मूत्रजनन, संग्राही, बल्य, वाजीकर एवं स्थानिक स्वापजनन है। इसकी प्रधान क्रिया मस्तिष्क पर होती है। सेवन के पश्चात् करीब आधे घंटे में इसका प्रभाव मालूम होने लगता है। गांजे के धूम्रपान के पश्चात् तुरत असर होता है। इसकी क्रिया अफीम तथा मद्यसार की तरह होती है लेकिन इसके वीर्य में विभिन्नता होने के कारण इसका प्रभाव अनिश्चित होता है। अल्प मात्रा में इसके सेवन से कुछ उत्तेजना आती है तथा आह्लाद मालूम होने लगता है। किसी भी कार्य में मन एकाग्र होता है। इसके प्रभाव से काल एवं व्यक्तित्व का ज्ञान नहीं रहता तथा ऐसा मालूम होता है कि घण्टों तक आनन्द से बीता जब कि केवल कुछ मिनट ही बीते रहते हैं। अधिक मात्रा में प्रलाप होता है तथा तत्पश्चात् निद्रा आती है। निद्रा के पश्चात् अफीम की तरह इससे थकावट नहीं आती तथा उतना विबन्ध भी नहीं होता । आक्षेप

१४४ भावप्रकाशनिघण्टुः

निरोधी, उद्वेष्टन निरोधी एवं वेदनाहर गुण बहुत स्पष्ट हैं। भांग से बने पेय से मूत्र की मात्रा बढ़ती है। इसका गर्भाशय संकोचक प्रभाव प्रत्यक्ष मांसपेशियों के संकोच एवं अप्रत्यक्षतया नाड़ी- संस्थान के द्वारा होता है। सांवेदनिक नाड़ियों की संवेदना शक्ति का घात होने से चर्म में शून्यता तथा झुनझुनाहट होती है। नाड़ी की गति उत्तेजना की अवस्था में बढ़ जाती है तथा बेहोशी की अवस्था में कम हो जाती है। उत्तेजना की अवस्था में श्वसन क्रिया शीघ्र होने लगती है।

साधारण मात्रा में इसके व्यसन से शारीरिक वा मानसिक कोई विकृति नहीं होती है। यह धारणा कि इसके व्यसन से पागलपन (Insanity) की प्रवृत्ति बढ़ती है सिद्ध नहीं हुई है। अधिक मात्रा में यदि निरन्तर उपयोग किया जाय तो शरीर एवं मन को हानि पहुँचती है तथा आत्म- सम्मान का दास एवं नैतिक पतन हो जाता है।

(१) संग्रहणी, अतिसार, रक्तातिसार, कुपचन, आमाशय में पीड़ा एवं विसूचिका में अन्य औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इससे भूख बढ़ती है एवं उद्वेष्टन तथा पीड़ा दूर होती है। विरेचक औषधों के साथ प्रयोग से मरोड़ नहीं होती। विसूचिका के प्रारम्भ में ही इसको देने से लाभ होता है। अतिसार के पश्चात् रोग निवृत्तावस्था में इसका पानक शान्तिदायक औषध के रूप में व्यवहार में आता है।

(२) वेदनाहर गुण के कारण पुराने सिर दर्द, सूर्यावर्त्त (Migraine = माइग्रेन), रजोनि- वृत्ति के समय होनेवाले एवं थकावट आदि से उत्पन्न शिरःशूल में इसका उपयोग किया जाता है। वातनाड़ीशोथ में गांजा के साथ पारद देते हैं एवं वातनाड़ीपीड़ा में गांजा, सोमल एवं लोह देते हैं। टेबीज् डॉर्सेलिस् (Tabes dorsalis) नामक फिरंग से उत्पन्न रोग में एक प्रकार की विद्युत् के समान चपल एवं तीव्र पीड़ा (Lightning pains) होती है जिसमें गांजे से लाभ होता है।

(३) वेदनाहर एवं उद्वेष्टनविरोधी गुण के कारण आन्त्रिक, पैत्तिक एवं वृक्क शूल तथा बस्ति उद्वेष्टन एवं सोजाक से उत्पन्न वेदनायुक्त शिश्नोत्थान (Chordee) में इसका उपयोग किया जाता है। अपतन्त्रक, कम्पवात, वातिक वमन एवं बालकों के आक्षेप में इससे लाभ होता है।

धनुर्वात (Tetanus) के लिये यह बहुत लाभदायक है। इसको अधिक मात्रा में एवं अधिक दिन तक प्रयोग करना पड़ता है। जलसंत्रास (Hybrophobia) में आक्षेप कम करने के लिये इसको देते हैं।

(४) स्वापजनन गुण के कारण निद्रानाश विशेष कर वृद्धावस्था के निद्रानाश (Senile insomnia) में इसका उपयोग किया जाता है।

(५) गांजा से गर्भाशय में संकोच होता है एवं वेदना भी कम होती है जिससे पीडितार्तव, अत्यार्त्तव तथा प्रसव के समय आवि वृद्धि के लिये इसको देते हैं। बीजकोश पीड़ा (Ovarian irritation) में इसको देते हैं।

(६) अर्श में इसके आन्तरिक प्रयोग के साथ भंग को दूध में उबाल कर पीस कर उसकी टिकिया बांधते हैं। हरिद्रा, प्याज तथा तिल के साथ पीस कर लेप करने से एवं इसके धूएँ से भी लाभ होता है।

(७) गांजा अत्यन्त वाजीकर है। मस्तिष्क के ऊपर प्रभाव से आह्लाद उत्पन्न होकर कामवासना बढ़ती है एवं रक्ताभिसरण को उत्तेजना मिलने से शिश्न अधिक कठोर हो जाता है। इसके साथ २ संवेदना शक्ति के ह्रास से अधिक काल तक घर्षण करने से भी शुक्र पात नहीं होता। अफीम, धतूरा एवं अन्य औषधों के साथ बने पाक का प्रयोग नपुंसकता एवं शीघ्रपतन आदि में किया जाता है।


हरीतक्यादिवर्गः १४५

(८) शुष्क कास, कुकास एवं तमक श्वास में इसको खिलाते हैं अथवा इसका धूम्रपान कराते हैं। फुप्फुसावरण शोथ में पीड़ा शमन के लिये अफीम की अपेक्षा यह अधिक अच्छी है।

(९) जीर्ण आमवात में इसको खिलाते हैं तथा इसके बीजों का तेल मालिश किया जाता है।

(१०) स्थानिक वेदनाशामक होने के कारण विसर्प, वातिक पीड़ा, खुजली एवं जलन में इसका लेप उपयोगी है। अरूंषिका (Dandruff) तथा जूं आदि में सर पर इसका लेप करते हैं।

चरस—यह मदकारी, शुक्रस्तम्भन, मूर्च्छा एवं हृदयदौर्बल्य कारक है। इससे हृल्लास, विबन्ध एवं शिरःशूल आदि नहीं होते तथा तम्बाखू के साथ इसका धूम्रपान उन्माद एवं अपतन्त्रक आदि में शामक औषध के रूप में किया जाता है।

विषैला प्रभाव—भांग एवं गांजा आदि अधिक मात्रा में लेने से आंखें लाल हो जाती हैं। चेहरा फूल सा जाता है, पैर लड़खड़ाते हैं तथा बुद्धि एवं स्मृति का नाश, अभिमान्ध, अनिद्रा, दौर्बल्य, प्रलाप एवं शिरःशूल आदि लक्षण होते हैं। क्वचित् हृदयातिपात से मृत्यु होती है।

हानिनिवारक—वमन कराना एवं दूध, दही, घृत तथा नारंगी, अनार, अमरूद आदि फलों के रस पिलाना चाहिये।

मात्रा—भांग १-४ र०; गांजा १/२-१ र०; चरस ३/४-१/२ र०।

अथ खासखसः (पोस्ता)। तस्य नामानि तत्फलोद्भववल्कलगुणानाह

तिलभेदः खसतिलः खासखसापि स स्मृतः। स्यात् खासफलोद्भूतं वल्कलं शीतलं लघु ॥ ग्राहि तिक्तं कषायाम्लं वातकृत् कफकासहृत् १ ॥ २३६ ॥ धातूनां शोषकं रूक्षमदकृद्वाग्विवर्धनम् २। मुहुर्मोहकरं रुच्यं सेवनात्पुंस्त्वनाशनम् ॥२३७॥

**पोस्ता के नाम तथा गुण—**तिलभेद, खसतिल और खासखस ये सब नाम पोस्ता के हैं। पोस्ता के फल का छिलका शीतल, लघु, ग्राही, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, वातकारक, कफ तथा कास को दूर करने वाला, धातुओं को सुखाने वाला, रूक्ष, मदकारक, वाणी को बढ़ाने वाला, बार-बार मोह- कारक, रुचिकारक और नित्य सेवन करने से पुरुषत्व को नाश करने वाला होता है ॥२३५-२३७॥

८३ पोस्ता

**क्षुपनाम—हि०-**पोस्ता। **बं०-**पोस्तार गाछ। **अ०-**नबातुल खशखाश। **फा०-**कोकनार। लै०-Papaver somniferum, Linn. (पॅपॅवर सॉम्निफेरस, लिन.)। Fam. Papavera- ceae (पॅपॅवेरेसी)।

**फलनाम—हि०-**पोस्त, पोस्ता, खसखस का फल, पोस्त के डोडे। **बं०-**पोस्तोडेरी। म०- अफ़ूचे बोंड, खसखशीचे बोंड। **गु०-**अफ़ीणना डोडा। **ते०-**गसुगसालु। **ता०-**गशगशा चेडि। **मला०-**कशकशा चेटि। **फा०-**पोस्ते कोकनार। **अ०-**किश्रुल खशखाश बुस्तानी। **अं०-**Poppy Capsule (पॉपी कैप्स्यूल)। लै०-Papaveris capsulae (पॅपॅवेरिस् कॅप्सूली)।

अफीम के क्षुप को पोस्ता कहा जाता है। यह क्षुप बाहर से भारतवर्ष में आया है लेकिन यहां की जलवायु अनुकूल होने के कारण इसकी यहां खेती की जाने लगी। चरक, सुश्रुत, वाग्भट्ट एवं चक्रदत्त में अफीम का उल्लेख नहीं है। शार्ङ्गधर (१४, १५ वीं शताब्दी) एवं भावप्रकाश


10 १. 'तत् फलाले'ति पा०। २. 'मेदमदवाग्विहविवर्धनमि'ति पा०। १० भा० नि०

१४६ भावप्रकाशनिघण्टुः ( १६ वीं शताब्दी ) में इसका प्रयोग किया गया है। अफीम की जानकारी के पूर्व लोग पोस्ते की डोडी का उपयोग उत्तेजक एवं मादक पेय के रूप में करते थे। अफीम की खोज सम्भवतः सर्व- प्रथम ग्रीस में हुई तथा पहली शताब्दी में 'एशिया माइनर' इसके व्यापार का केन्द्र रहा। अरबों ने इसका प्रचार चीन एवं भारतवर्ष में किया। मुगलों के समय भारत में इसकी व्यापक रूप में खेती की जाती थी जिससे लोग इसकी डोडी का उपयोग 'कुकनार' नामक मादक पेय के रूप में करते थे। यहां से चीन एवं पूर्वीय देशों को काफी मात्रा में अफीम जाती थी। पंजाब में 'पोस्त' नाम से कुकनार की तरह पेय का प्रयोग किया जाना था। अंग्रेजों के समय इसकी खेती पर व्यापक नियन्त्रण के कारण धीरे धीरे इसकी खेती कम होती गई तथा पोस्ते की डोडी का भी उपयोग कम हो गया। अंग्रेजों के समय इसकी उपज के ३ केन्द्र थे। बिहार एवं बंगाल की अफीम 'पटना या बंगाली' अफीम, उत्तर प्रदेश की अफीम 'बनारसी' एवं राजपुताना के ग्वालियर, भोपाल तथा बड़ोदा आदि स्थानों की अफीम 'मालवा' अफीम कहलाती थी। पंजाब के कुछ भागों में धार्मिक आधार पर इसके खेती को छूट है अन्यथा इसकी खेती के लिये अनुमति पत्र लेना पड़ता है तथा पूरी उपज सरकार निश्चित मूल्य पर खरीद लेती है। आजकल इसकी खेती उत्तरप्रदेश, पूर्वी पंजाब, राजपुताना एवं मध्यभारत में की जाती है। एशिया, यूरोप एवं उत्तरी अफ्रीका के साधारण उष्ण प्रदेशों में भी इसकी खेती की जाती है। अक्तूबर, नवम्बर महीने में इसके बीजों को बोते हैं। दिसम्बर में सरकारी अफसर खेत की जांच करते हैं। जनवरी से मार्च तक अफीम का संग्रह करके अप्रिल से जून तक बिकने के लिये भेजी जाती है। काले, लाल और सफेद फूलों के भेद से पोस्त तीन प्रकार के होते हैं। इनमें सफेद फूल वाला पोस्त सबते अधिक प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में होता है। संयुक्तप्रान्त, बिहार और बङ्गाल की ओर सफेद ही होता है। इसका एक वर्षाणु क्षुप-२-४ फुट तक ऊंचा होता है। कांड-चिकना चमकीला हरित क्वचित अल्प रोमश एवं अल्प शाखा युक्त होता है। पत्र-आयताकार, विषम दन्तुर, अल्पशः तरंगी या खण्डित एवं उनका हृदयाकृति फलकमूल कांड को घेरे रहता है। फूल- कटोरीनुमे बहुत सुहावने दिखाई पड़ते हैं। फूल खिलने के एक महीने बाद पुष्पदल के बीच डोडी ( फल ) लगती है। डोडी ( Capsule ) -अण्डाकार या करीब-करीब वर्तुलकार, २-३ इञ्च के घेरे में एवं कभी-कभी आधार एवं शीर्ष पर दबी हुई होती है। इसका शीर्ष टोप की तरह कंगूरे- दार, १२-१५ कंगूरों से युक्त एक बड़े कुक्षि (Stigma = रिटग्मा) से बना होता है। इसका आधार संकुचित होकर एक ग्रीवा बनाता है जो पुष्प दण्ड की तरफ फैली हुई रहती है। इसका रंग हल्का पीताभ या भूरा एवं इस पर कुछ काले रंग के धब्बे रहते हैं। इसकी महीन एवं सिदुर फल भित्ति से अन्दर की तरफ १२-१५ महीन अन्तर्भित्तियां निकली रहती हैं जो बीच में आपस में मिलती नहीं। इसमें शीर्ष पर अक्षि के ठीक नीचे चारों तरफ कई छिद्र बन जाते हैं जिनसे बीज बाहर निकल कर बीज स्फुटन ( Dehiscence ) होता है। इसी डोडी से अफीम निकाली जाती है। सफेद फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन (Morphine ) सबसे कम निकलती है। बाजार में मिलने वाली डोडी टूटी-फूटी तथा उन पर लम्बाई में या आडबल में चीरे लगे होते हैं। डोडी के खानों के भीतर छोटे-छोटे करीब-करीब सफेद रंग के वृक्काकृति अनेक बीज होते हैं। इनकी सतह जाली- दार एवं किनारे सीधे होते हैं। ये गन्धहीन एवं इनका स्वाद मधुर एवं कुछ कड़वा होता है। काले या नीले फूल तथा काले डण्ठल वाला पोस्ता राजपुताना एवं मध्यभारत में बहुत पाया जाता है। इसका पौधा बहुत छोटा और डोडे भी बहुत छोटे-छोटे होते हैं। इसमें मॉर्फीन ( Mor- phine ) श्वेत जाति की अपेक्षा तिगुनी निकलती है।

हरीतक्यादिवर्गः १४७ लाल फूल वाला पोस्ता हिमालय पहाड़ में पाया जाता है। काश्मीर और उत्तरीय भारत के मैदानों में २-३ प्रकार का लाल फूल का पोस्ता स्वयं उत्पन्न होता है। उसके फूलों को 'गुललाला' कहते हैं। इसके डोडे से गहरे रंग के पोस्तदाने निकलते हैं। लाल फूल वाले पोस्ते से मॉर्फीन मध्यम मात्रा में निकलती है। रासायनिक संगठन-पोस्ते की डोडी में ०.१-०.३% मॉर्फीन ( Morphine ) एवं अत्यल्प मात्रा में कोडीन ( Codeine ), पॅपेहेराइन ( Papaverine ) एवं नार्कोटीन ( Narcotine ) आदि क्षाराम एवं मेकोनिक एसिड ( Meconic acid ) आदि पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-पोस्ते की डोडी में अल्प मात्रा में अफीम के क्षाराम होने के कारण यह निद्राकर, मादक, वेदनाहर, ग्राही एवं रक्तस्तम्भक होती है। ( १ ) वेदनाहर एवं निद्राजनक होने के कारण इसके फांट या क्वाथ को शिरःशूल, अर्धावभेदक, पार्श्वशूल, कटिशूल, गृध्रसी, उन्माद एवं अनिद्रा आदि में पिलाते हैं तथा इसका स्थानीय लेप किया जाता है। गले के दर्द में इससे गण्डूष कराते हैं। ( २ ) ग्राह्य औषधियों के साथ अतिसार एवं संग्रहणी में इसका चूर्ण बहुत लाभदायक है। रक्तातिसार में देने से रक्त गिरना भी बन्द हो जाता है। बच्चों के दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार में इसका प्रयोग किया जाता है। ( ३ ) मोच, सूजन एवं चमड़े के छिल जाने आदि में इसके फांट या क्वाथ से सेंका जाता है। ( ४ ) शुष्क कास में अन्य औषधों के साथ इसके चूर्ण का उपयोग लाभदायक है। ( ५ ) पीडायुक्त नेत्राभिष्यन्द में इसका लेप नैत्र के चारों तरफ लगाते हैं। ( ६ ) कर्णपीडा में इसके क्वाथ से सेंका जाता है। ( ७ ) कोकनार नामक मादक पेय के रूप में इसका बहुत प्रयोग किया जाता था एवं अफीम की जानकारी के पूर्व भी मादक एवं उत्तेजक पेय तथा शामक औषध के रूप में इसका व्यवहार किया जाता था। मात्रा-१-२ माशा। अथाहिफेनकम् ( अफीम ) । तस्य नामगुणानाह उक्तं खसफलक्षीरमाफूकमहिफेनकम् । आफूकं शोषणं ग्राहि श्लेष्मघ्नं वातपित्तलम् । तथा खसफलोद्भूतवल्कवत्प्रायमित्यपि ॥ २३८ ॥ अफीम की उत्पत्ति, नाम तथा गुण-पोस्ता के फल के दूध से अफीम बनती है। अतः इसे खस- फलक्षीर भी कहते हैं। खसफलक्षीर, आफूक और अहिफेनक ये नाम अफीम के हैं। अफीम- रक्तादि धातुओं की शोषक, ग्राही, कफनाशक एवं वातरक्तकारक होती है तथा पोस्ता के फल के छिल्के के जितने गुण हैं वे भी इसमें रहते हैं ॥ २३८ ॥ ८४ अफीम । हि०-अफीम, अफयून । बं०-आफिम । म०-अफ़ू । मला०-आलन । मा०-अफीम, अमल । गु०-अफीण । ते०-अभिनि । क०-अफिनि । ता०-अविनी । अ०-अफ्यून, लबुनूल् खशखाश । अं०-Opium ( ओपियम् ) ।

१४८ भावप्रकाशनिघण्टुः उक्त पोस्त के डोडे से अफीम निकाली जाती है। माघ के महीने में इस पर फूल आने के दो सप्ताह बाद डोडे अफीम निकालने लायक जब बड़े हो जाते हैं तब कच्चे (Unripe) डोडों के चौतरफ़ा प्रायः शाम को चीरा कर देते हैं और प्रातःकाल लोहे के चमचा से चीरा द्वारा निकला हुआ दूधिया गोंद उठा लेते हैं। इसी प्रकार ३-४ दिन अन्तर देकर चीरा करते हैं और गोंद इकट्ठा करते हैं। जमीन पर गिरे हुए फूलों को इकट्ठा कर अफीम बाँधने का काम उनसे लिया जाता है। इस प्रकार दूधिया गोंद को इकट्ठा कर कांसे की थाली में रख देते हैं और उसमें से जो जल निकलता है उसको फेक देते हैं। प्रायः एक मास में गाढ़ा होने पर मिट्टी के पात्र में रख देते हैं। यही अफीम है। अफीम सरकार का व्यवसाय होने से सरकारी गुदाम में जमा की जाती है। सरकारी अफीम तीन प्रकार की होती है। पटना अफीम, बनारसी अफीम और मालवा अफीम । मालवा की अफीम सबसे अच्छी समझी जाती है। भारतीय अफीम घनाकार (Cubical) करीब १ सेर के टुकड़ों में पतले नेपाली कागज में लपेटी रहती है। यह कठोर एवं भङ्गुर (Brittle) या कुछ लचीली होती है। इसका आन्तरिक भाग गहरे बादामी (Dark brown.) रंग का, चमकीला, चिकना एवं समांग (Homogeneous) होता है। इसमें एक विशिष्ट प्रकार की तीव्र अप्रिय गन्ध होती है तथा इसका स्वाद कडवा होता है। भारतीय अफीम आवकारी एवं औषधीय ऐसे दो प्रकार की होती है। पहले अफीम की खपत चीन देश में बहुत होती थी परन्तु वहां वालों के अफीम खाने के व्यसन को बहुत कमकर देने से तथा सरकारी नियंत्रण के कारण हमारे देश की अफीम की खेती बहुत कम हो गई है और कई एक सरकारी गोदाम भी तोड़ दिये गये हैं। सन् १९०७ में स्थापित गाजीपुर की अफीम फैक्टरी, जो आज भी विश्व में सबसे बड़ी फैक्टरी है, उसका उत्पादन पहले से बहुत घट गया है। आजकल वहां प्रति वर्ष १२ हजार मन से अधिक अफीम तैयार नहीं होती जहां पहले १। लाख मन तक प्रतिवर्ष तैयार होती थी। स्वदेश में १५०० मन वार्षिक की खपत है जिसमें से उड़ीसा सबसे बड़ा खरीदार है। इसके बाद पेप्सू, पंजाब तथा उत्तरप्रदेश का क्रम है। कारखाने से करीब ३००० रूपये प्रतिमन के भाव से अफीम निकलती है। अफीम बहुधा मिलावटी होती है। इसका वज़न बढ़ाने के लिये धूर्त लोग पोस्तदाने के पत्ते तथा अनेक वस्तुएं मिला देते हैं जिससे औषधि के काम में यह अनुपयोगी हो जाती है। इसलिये वैद्यों को परीक्षा करके व्यवहार करनी चाहिये । परीक्षा-(१) करीब ०.१ ग्रा. अफीम को ५ सी. सी. जल में गरम कर, फिल्टर कागज से छान करके (Filtration) उस द्रव में फेरिक् क्लोराइड् (Ferric chloride) के घोल के कुछ बूँद डालने से एक गहरा बैंगनी लाल (Deep purplish-red) रंग उत्पन्न होता है। यह रंग उस घोल में मंद नमक के तेजाब (Dilute hydrochloric acid) के कुछ बूँद डालने से या उसी प्रकार मर्क्युरिक् क्लोराइड् (Mercuric chloride) के घोल के मिलाने से मिटता नहीं। (२) ०.२ ग्रा. अफीम के चूर्ण को ५ सी. सी. क्लोरोफॉर्म एवं अमोनिया (Ammonia) के मंद घोल के कुछ बूँदों के साथ १० मिनट हिलावें। फिर एक शीशे की तश्तरी में रख दें जिससे क्लोरोफॉर्म उड़ जाय, जिसके उड़ जाने के बाद बाहर की तरफ एक धूसर श्वेत रवेदार पदार्थ का वलय रह जाता है। इसमें यदि फॉर्मेल्लिडहाइड् (Formaldehyde) के घोल का १ बूँद और गन्धक के तेजाब (Sulphuric acid) के पांच बूँद का मिश्रण मिलाया जाय तो गाढ़ा किरमिजी (Crimson) रंग उत्पन्न होता है।

हरीतक्यादिवर्गः १४६ प्रमाप (Standard) - अफीम में ९.५% से कम मॉर्फीन (Morphine) नहीं होनी चाहिये । अच्छी अफीम धूप में रखने से जल्दी पिघलने लगती है, अग्नि पर डालने से जलने लगती है पर कोयला नहीं बनती, जलते समय उसकी ज्वाला स्वच्छ निकलती है, मल या धूआं विशेष नहीं होता और बुझाने से अत्यन्त तीव्र और मादक गन्ध निकलती है। स्वच्छ अफीम को १०-५ मिनट सूँघने से नींद आती है। शोधन-बाजारू अफीम को जल में घोलकर, छानकर मंद आंच पर गाढ़ा कर लें। फिर इसको आर्द्रक स्वरस की २१ भावना देकर औषध के काम में लाना चाहिये । भारतीय अफीम के अतिरिक्त तुर्की, यूरोपीय एवं पर्शियन अफीम होती है जिनके क्षारों की मात्रा में कुछ अन्तर होता है तथा उनके स्वरूप में भी कुछ अन्तर होता है। अफीम की उत्तमता उसमें की मॉर्फीन की मात्रा पर निर्भर रहती है। भारतीय अफीम इस दृष्टि से काफी अच्छी होती है। रासायनिक संगठन-भारतीय औषधि अफीम में अनेक क्षाराम पाये जाते हैं जिनकी मात्रा में भी समय समय पर फरक रहता है। इसमें मॉर्फीन (Morphine) ७-१२%, नार्कोटीन (Narcotine) १५-२२.५%, कोडीन (Codeine) ०.३-४.०% तथा थीवेन (Thebaine), पॅपैव्हेराइन (Papaverine) एवं लॉर्डेनाइन (Laudanine) आदि प्रमुख हैं। इन क्षारार्भो के अतिरिक्त इसमें ॲसैटिक् (Acetic), लैक्टिक् (Lactic), सल्फ्यूरिक् (Sulphuric) एवं मेकोनिकू (Meconic), इतने प्रकार के अम्ल (Acids), गोंद एवं पेक्टीन (Pectin) की तरह पदार्थ, अैल्ब्युमिन्, मोम, स्नेह, कॉउट्चौक् (Caoutchouc), राल, उड़नशील तैल, गन्धयुक्त द्रव्य, मेकोनिन् (Meconin) तथा अमोनियम्, कॅल्शियम् एवं मॅग्नेशियम् के लवण आदि पदार्थ पाये जाते हैं। व्यापारी अफीम में (शुष्क अवस्था में) मॉर्फीन की मात्रा कम ज्यादा (५-२१%) रहती है। कुछ अन्य देशों से प्राप्त अफीम में की मॉर्फीन की मात्रा-तुर्की ५- १४%, पर्शियन ६-१४%, चाइनीज १.५-११%, बोहेमिया ११-१२%, तुर्कस्तान ५-१८%, आस्ट्रेलिया ४-११% । पहले यह समझा जाता था कि भारतीय अफीम में मार्फीन की मात्रा कम होने के कारण वह औषध के उपयोग की नहीं होती । लेकिन सन् १९१४ के बाद औषधो- पयोगी अफीम के उत्पादन के लिये विशेष प्रयत्न किया गया जिससे इसमें की मॉर्फीन की मात्रा बढ़ती गई और अब यह अच्छी से अच्छी तुर्की अफीम से औषधीय गुण में समता रखती है। भारतीय अफीम में एक और विशेषता यह है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहां की अफीम में कोडीन (Codeine) नामक क्षाराम अधिक होता है। नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराम पटना की अफीम में मार्फीन की अपेक्षा दुगना, मालवा की अफीम में मॉर्फीन से कुछ अधिक लेकिन स्मर्ना (Smyrna-तुर्की का एक स्थान) की अफीम में मार्फीन की अपेक्षा बहुत कम होता है। अफीम एवं मॉर्फीन के गुण एवं कार्य- यह उष्ण, तिक्त, रूक्ष, वेदनाहर, निद्राजनक, शामक, मादक, कफघ्न, कासघ्न, स्वेदजनन, शोधन, ग्राही, रक्तस्तम्भन, प्रसेकावरोधक एवं अल्प मात्रा में उत्तेजक, आह्लादकारक तथा वाजीकर है। इसकी प्रधान क्रिया केन्द्रीय वातनाडी संस्थान पर होती है। अल्प मात्रा में इससे कुछ उत्तेजना होती है। मन को आनन्द मालूम होता है। विचारशक्ति बढ़ती है। उत्साह बढ़ता है। कामवासना बढ़ती है। किसी काम में मन एकाग्र होता है। वेदना, खांसी, थकावट, क्षुधा तथा

१५० भावप्रकाशनिघण्टुः अन्य प्रकार की अप्रिय संवेदनाओं का ज्ञान कम होता है। मन शान्त होकर निद्रा आती है। अधिक मात्रा में अवसाद होकर स्पर्शज्ञान तथा सुख एवं दुःख के समझने की शक्ति कम होती है तथा कुछ बेहोशी सी मालूम होकर नींद आती है। नींद के बाद सर में दर्द तथा हृल्लास मालूम होता है। वातनाडियों पर इसका विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। हृदय के ऊपर इसका कोई विशेष परिणाम नहीं होता केवल प्राणदा (Vagus) नाडी केन्द्र की उत्तेजना से इसकी गति कम होकर उसे बल प्राप्त होता है। अधिक मात्रा में श्वसनकेन्द्र के अवसाद के कारण अन्य दुष्परिणाम दिखलाई देते हैं। इसकी अल्प मात्रा से श्वसन क्रिया मंद लेकिन गम्भीर होती है। अधिक मात्रा में लेने से श्वसनकेन्द्र का अवसाद होकर श्वसन बहुत कम होते हुवे बाद में अनियमित हो जाता है। श्वसनकेन्द्र के घात एवं श्वासावरोध से मृत्यु होती है। कासकेन्द्र बहुत ही अल्प मात्रा से अवसादित होता है। औषधीय मात्रा से श्वसनियों का अल्प विस्फार होता है लेकिन अधिक मात्रा में संकोच हो जाता है। इससे सभी प्रकार के स्राव कम होते हैं किन्तु पसीना एवं दुग्ध कम नहीं होता है। पाचक स्राव कम होता है जिससे भूख कम हो जाती है। अफीम में अन्य क्षाराम होने के कारण आन्त्र की पुरस्सरण क्रिया अधिक कम होती है। इससे विबन्ध होता है तथा वेदनाहर होने के कारण शूल दूर होता है। स्राव कम होने से मुख, जीभ तथा गला सूखने लगता है। चर्मगत रक्तवाहिनियों के विस्फार एवं स्वेद पिण्डों की उत्तेजना से पसीना अधिक होता है जिससे शरीर का ताप कम होता है। गला एवं चेहरे की रक्तवाहिनियों के विस्फार से कान गरम हो जाते हैं। इससे मूत्र की मात्रा पर कोई परिणाम नहीं होता, लेकिन कभी कभी बस्तिद्वार के संकोच से कुछ रुकावट हो जाती है। कुछ विद्वानों के मत से मधुमेहियों के मूत्र में शर्करा की मात्रा तथा यूरिया (Urea) की मात्रा कम हो जाती है। वृक्क की विकृति में इसका उत्सर्ग शीघ्र न होने के कारण सावधानी के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये। केन्द्रीय प्रभाव से, प्रारम्भ में वमन केन्द्र की उत्तेजना से वमन होता है, लेकिन अधिक मात्रा सेवन करने पर केन्द्रावसाद होजाने के कारण वामक द्रव्यों के प्रयोग से भी वमन नहीं होता । केन्द्रीय प्रभाव से आंखों की पुतलियों का संकोच होता है। इसमें स्थानिक वेदनाहरण का गुण नहीं है। इसका प्रधूषण श्लैष्मिक कला तथा छिले हुये चर्म से होता है। वेदनाहर प्रभाव केन्द्रीय प्रभाव के कारण होता है। बच्चों एवं स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में सावधानी के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये। यदि रोगी को यह न बताया जाय की उसे अफीम दी जा रही है तो लगातार कई दिन तक देते रहने पर भी अफीम की आदत नहीं पड़ती। अफीम के अन्य क्षाराम - अफीम का मादक प्रभाव मुख्यतया मॉर्फीन के कारण है तथा अन्य परिणाम इतर क्षारामों के कारण होते हैं। मॉर्फीन, पँपेहेराइन, कोडीन, नार्कोटीन तथा थीबेन में मादक प्रभाव क्रमशः कम कम होता जाता है। प्रधूषण देर में होने के कारण मॉर्फीन की अपेक्षा अफीम का परिणाम देर में होता है लेकिन वह अधिक समय तक स्थायी रहता है। नार्कोटीन तथा पँपेहराइन आन्त्रिक मांसपेशियों को शिथिल करते हैं जब कि मॉर्फीन एवं कोडीन उनके तनाव को बढ़ाते हैं जिससे अफीम अधिक विबन्ध करने वाली होती है। नार्कोटीन एवं पँपेहेराइन श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करते हैं। मॉर्फीन एवं कोडीन की विषाक्तता नार्कोटीन बढ़ाता है। इसी प्रकार नार्कोटीन एवं पँपेहेराइन,


हरीतक्यादिवर्गः १५१ मॉर्फीन के कार्य को बढ़ाते हैं। कोडीन एवं नार्कोटीन का सम्मिलित प्रभाव मॉर्फीन की तरह होता है जब कि दोनों अलग अलग बहुत ही अल्प प्रभावशाली हैं। ३ मि. ग्रा. नार्कोटीन तथा ३ मि. ग्रा. मॉर्फीन का सम्मिलित प्रभाव ६० मि. ग्रा. मॉर्फीन के बराबर होता है। कोडीन कास के केन्द्र को बहुत अल्प मात्रा में अवसादित करता है तथा मधुमेही में शर्करा की मात्रा कम करता है। थीबेन नामक क्षाराम कुपीलुसत्व के सदृश सुषुम्ना को उत्तेजित करता है। अफीम तथा मॉर्फीन के प्रयोग (१) अल्प मात्रा में अफीम का उपयोग उत्तेजक औषध के रूप में बहुत अच्छा होता है। डर लगना, उदासीनता, चिन्तायुक्त वृत्ति, खेदवृत्ति, थोड़े से क्रोध से हाथ पैर कांपने लगना, थकावट एवं वृद्धावस्था में जीवन से निराश होना ऐसी परिस्थितियों में इससे बहुत लाभ होता है। निरोगी अवस्था में प्रयोग से कामवासना बढ़ती है। (२) बहुत विचार करना, बहुत अभ्यास करना, चिन्ता तथा जिन जिन व्याधियों में पीडा की वजह से नींद न आती हो उनमें इसको निद्रा के ३ घण्टे पूर्व उपयोग किया जाता है। (३) शूल, पीड़ा एवं प्रक्षोभ आदि के लिये यह बहुत ही उपयोगी है। इसका उपयोग गृध्रसी, वातनाडी शोथ, कटिशूल, सन्त्रिशूल, पार्श्वशूल, कष्ठातंव, चोट, शरीर का जलना, अस्थिभग्न, सन्धिभंग शल्यक्रिया के पूर्व एवं पश्चात, आन्त्रिकशूल, पैत्तिकशूल, वृक्कशूल, अश्मरी, आमाशयिक शूल, आमाशय प्रक्षोभ, आमाशयिक व्रण, आन्त्रिक व्रण एवं कर्कटार्बुद आदि में किया जाता है। वृक्कजन्य आक्षेप में मूत्रल औषधों के साथ इसे देते हैं। (४) अतिसार एवं संग्रहणी आदि में जब मल पक हो जाता है लेकिन ग्रहणी दौर्बल्य से दस्त बन्द नहीं होते तब अन्य ग्राही औषधियों के साथ इसकी गोली का प्रयोग किया जाता है। ऐसी अवस्थाओं में जातीफलादि रस (भै० २०) या दुग्धवटी (भै० २०) का अच्छा उपयोग होता है। विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था में अहिफेनासव के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है लेकिन शीताङ्ग अवस्था में इसका प्रयोग न करें। टायफॉइड (आन्त्रिक ज्वर) में अतिसार हो तो इससे दस्त कम होने के साथ साथ वातिक लक्षणों में भी लाभ होता है। डर, घबड़ाहट तथा अन्य मानसिक कमजोरी के कारण होने वाले अतिसार में भी इससे लाभ होता है। (५) प्रतिश्याय के प्रारम्भ में स्वेदल औषध के रूप में इसको देते हैं। (६) रक्तष्ठीवन में इसका उपयोग किया जाता है। इससे रक्त का दबाव कम होता है, हृदयं की गति मन्द होती है, खांसी कम होती है, मानसिक चिन्ता दूर होती है एवं नींद आती है। रक्तातिसार तथा आमाशयव्रण में आंत्रिक गति कम होकर लाभ होता है। (७) शुष्क कास, दमा, कुकास, फुफ्फुसावरण शोथ एवं क्षयज ग्रन्थियों की वृद्धि से प्रक्षोभ होकर सूखी खांसी आती हो तो इसको मधु के साथ चटाने से लाभ होता है। जिसमें कफ बहुत जमा हो और जिसमें खांसी कफ निकल जाने के लिये आरही हो उसमें अफीम का प्रयोग नहीं करना चाहिये। श्वासकृच्छ्र, नीलीमा एवं श्वसनमार्ग में अवरोध हो तो इसका प्रयोग न करें। दमें में इसके प्रयोग से आदत पड़ने की सम्भावना रहती है इसलिये जहां तक हो प्रयोग न करें। (८) हृदय एवं रक्तवाहिनियों के कारण यदि श्वासकृच्छ्र हो तो इससे बहुत लाभ होता है लेकिन यदि जलोदर आदि के दबाव से हृदय का कार्य ठीक न होता हो तो इसका प्रयोग न करें। (९) प्रचुर लालास्राव, श्वेतप्रदर एवं मधुमेह में इससे लाभ होता है। मधुमेह में अफीम का प्रयोग बहुत किया जाता है लेकिन कर्नल चोपरा के मत से इसमें बिलकुल लाभ नहीं होता।

१५२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१०) मलेरिया आदि विषमज्वरों में इससे लाभ होता है ऐसी धारणा थी । जिन जिन स्थानों में अफीम का सेवन किया जाता है वहां मलेरिया कम होता है ऐसी धारणा थी । कुछ विद्वानों ने इसके नार्कोटीन (Narcotine) नामक क्षाराभ को ३-१३ २० की मात्रा में मलेरिया में सफलता- पूर्वक प्रयोग किया लेकिन कर्नल चोपरा के प्रयोगों के द्वारा यह ज्ञात होता है कि इससे मलेरिया के कोटाणुओं पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता । यह बात अवश्य है कि अफीम या नार्कोटीन मस्तिष्क के उन स्थानों का जहां सूक्ष्मतर वेदनाओं का ज्ञान होता है (Algesic areas of brain), अवसाद उत्पन्न करती है जिससे ज्वर में होने वाले शिरःशूल, बेचैनी एवं शरीर में पीड़ा आदि लक्षण कम होकर तथा पसीना आकर ज्वर कम होने से लाभ प्रतीत होता है । मस्तिष्क या उसके आवरण में शोथ होने से यदि ज्वर हो तो इसका प्रयोग न करें । (११) गर्भपात में शामक औषध के रूप में अफीम या मॉर्फीन का पूर्ण मात्रा में उपयोग किया जाता है । अत्यार्तव एवं रक्तप्रदर आदि में नार्कोटीन से व्युत्पन्न अन्य स्टिप्टिसौन (Stypticin) या स्टिप्टोल (Styptol) आदि का उपयोग आन्तरिक एवं स्थानिक पिचु आदि के रूप में व्यवहार किया जाता है । (१२) फुफ्फुसावरण शोथ, आमवात एवं कटिशूल आदि में इसका पोल्टिस लगाया जाता है या १ छ० गरी या तिल के तेल में ३ मा० अफीम मिला कर मालिश की जाती है । मलाशय, श्रोणिगुहा की पीड़ा एवं परिकर्तिका आदि में अफीम की गुदवर्ती या बस्ति का उपयोग किया जाता है । शोथयुक्त अर्श पर माजूफल के साथ अफीम का मरहम लगाया जाता है । कर्णशूल में गिलसरीन के साथ इसके टिंक्चर को कान में डालने से लाभ होता है । अफीम के विष लक्षण-अफीम अधिक मात्रा में लेने से या आत्महत्या के लिये प्रयोग से घातक होती है । प्रथम तन्द्रा मालूम होती है । रोगी को उस समय जगाया जा सकता है लेकिन धीरे २ तन्द्रा बढ़ कर सन्यास का रूप धारण कर लेती है तब रोगी को जगाया नहीं जा सकता । आंखों की पुतलियां बिल्कुल संकुचित हो जाती हैं लेकिन मृत्यु के कुछ मिनट पूर्व पुतलियां विकसित हो जाती हैं । शरीर ठण्डा और पसीने से तर हो जाता है । चेहरा, ओठ एवं अङ्गुलियां नीली पड़ने लगती हैं। नाड़ी अत्यन्त क्षीण तथा मन्द होती है। श्वास मन्द, अनियमित तथा अन्तिम अवस्था में घरघराहट युक्त हो जाता है । प्रत्याक्षिप्त क्रियाएं लुप्त हो जाती हैं। अन्त में श्वासावरोध से मृत्यु हो जाती है । अवसादावस्था प्रायः ४ से ६ घण्टे रहती है और ६ से १२ घण्टे में मृत्यु हो जाती है । विष चिकित्सा- (१) सर्वप्रथम रोगी को रीठे का जल या सरसों या राई जल के साथ या तूतिया १० २० जल के साथ पिलाकर वमन कराना चाहिये । लेकिन प्रायः वमन केन्द्र के अवसादित होने के कारण वमन नहीं होता इसलिये सबसे अच्छा यह है कि स्टमक् पम्प या साइफन् के द्वारा आमाशय प्रक्षालन कराया जाय । सर्वप्रथम रोगी को २-४ २० पोटैशियम् पर- मैग्नेट २ से ६ छ० जल के साथ पिला दें। फिर उसी के हल्के घोल से आमाशय प्रक्षालन तब तक करें जब तक घोल का रंग उसी तरह नहीं रहता । (२) श्वसन केन्द्र को उत्तेजित करने के लिये बार २ गरम कॉफी का काथ पिलाना तथा ॲट्रोपीन, स्ट्रिक्नीन् ग्रेन, कोरामीन एवं लेप्टॅझॉल् आदि का सूचिकाभरण करना, कृत्रिम श्वसन कराना या श्वसन यन्त्रों का उपयोग करना, ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइ ऑक्साइड को सुंघाना आदि उपचार करना चाहिये । अफीम आदि के अवसादक तथा मादक विषैले प्रभाव को दूर करने के लिये उसके ठीक विरोधी कार्य करने वाली एक नई औषध नैलॉर्फीन हाइड्रोक्लोराइड हरीतक्यादिवर्गः १५३ (Nalorphine Hydrochloride) ५-१० मि. ग्रा. की मात्रा में शिरा द्वारा दी जाती है । लेथिड्रोन (Lethidrone, Burr. & Well.) एवं नेलाइन हाइड्रोक्लोराइड (Nalline hydro- chloride, Merck) नाम से यह डाक्टरी दुकानों में मिलती है। बच्चों में ०२५ मि. ग्रा. हर दो मिनट पर कई बार दी जाती है । अन्य औषधों में चन्द्रोदय, कस्तूरी, जुन्दवेदस्तर, हींग, जद्दार या जहरमोहरा पिष्टी आदि को शहद के साथ बार-बार चटाना चाहिये । (३) रोगी को सोने न दें। बार-बार उस पर ठंडा एवं गरम जल छिड़कते रहें । रोगी को पकड़कर चलावें । तीक्ष्ण नस्य, सरसों का लेप, बार-बार हिलाना आदि क्रियाओं से रोगी को जगावें । अफीम के व्यसन के दुष्परिणाम - कुछ दिन लगातार अफीम खाने से उसकी आदत पड़ जाती है तथा उससे लाभ होने के लिये प्रत्येक समय मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। अफीमची २३-१० २० तक बिना किसी तीव्र दुष्परिणाम के अफीम का सेवन कर सकता है। इसके व्यसन से नैतिकपतन, कृशता, पाण्डु, मांसपेशियों की दुर्बलता, मांसपेशियों के कार्य में असमन्वयता, थकावट, नाडी की दुर्बलता, कंप, अग्निमांद्य, पाचन की खराबी, विबंध, निद्रानाश, तन्द्रा, नपुंसकता, अनार्तव एवं आंखों की पुतलियों का संकुचित होना आदि लक्षण होते हैं। लेकिन यदि अफीमची की अफीम बंद कर दी जाय तो भी मानसिक उत्तेजना, बेचैनी, आमाशय में पीड़ा, जलन एवं कभी-कभी वमन, विरेचन, स्वेदाधिक्य, पुरुषों में वीर्यपात और स्त्रियों में प्रहर्ष आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। एकाएक बंद करने से दुर्बल या वृद्ध लोगों में कभी-कभी अत्यन्त दौर्बल्य, अवसाद एवं निपात होकर मृत्यु भी हो सकती है । अफीम छुड़ाने के उपाय - बच्चों में या जो दिन भर में २३ रत्ती से कम अफीम सेवन करते हैं या जो दुर्बल एवं वृद्ध नहीं है तथा किसी तीव्र शारीरिक रोग से पीड़ित नहीं है उनमें एकाएक अफीम बंद की जा सकती है । ३ दिन तक तकलीफ़ रहती है लेकिन बाद में ठीक हो जाती है। यदि हृल्लास, अतिसार एवं मानसिक प्रक्षोभ आदि लक्षण हों तो क्षारीय मिश्रण तथा शामक औषधों का प्रयोग करना चाहिये । निपात आदि के लिये ॲड्रिनॅलीन का सूचिकाभरण तथा चाय, कोको एवं अमोनिया आदि का प्रयोग करें । सबसे सरल उपाय यह है कि धीरे-धीरे अफीम की मात्रा कम की जाय । कुचला, चिरायता एवं मिरिच आदि के साथ अफीम की गोलियां बनाकर उसका उपयोग करें। गोलियों में धीरे-धीरे अफीम कम करें । आहार में लेसिथिन नामक प्रभोजन का उपयोग भी लाभदायक है। यह अंडे तथा सोयाबीन आदि में होता है। अल्प मात्रा में मद्य एवं कुछ शामक औषधों का उपयोग भी किया जा सकता है। मात्रा - अफीम ३-१ २०; टिंक्चर ओपिआइ ५-३० बूंद, एक साल से कम उम्र के बच्चों को ३-१ बूंद से अधिक नहीं । अथ खासखसतिलाः । तेषां नाम गुणाँश्चाह उच्यन्ते खसबीजानि ते खासखसतिला अपि ॥ २३१ ॥ खसबीजानि बल्यानि वृष्याणि सुगुरूणि च । जनयन्ति कफं तानि शमयन्ति समीरणम्॥ खसखस के दाने के नाम तथा गुण - पोस्ता के दाने के ही खसबीज तथा खासखसतिल ये दोनों नाम संस्कृत में होते हैं । खसखस के दाने-बलकारक, वृष्य (वीर्यवर्धक) और अत्यन्त गुरुपाकी होते हैं तथा ये कफ के उत्पन्न करने वाले एवं वायु को शमन करने वाले होते हैं ॥

१५४ भावप्रकाशनिघण्टुः ८५ पोस्तदाना हि०-पोस्तदाना, दाना, खसखस, खसखस के दाने, खसब्रीज । बं०-पोस्तदाना, पोस्तबीज । म०-गु०-खसखस । ता०-गशगश । मला०-कशकश । फा०-तुख्मे कोकनार । अ०-बजरुल खशखाश । अं०-Poppy Seeds (पॉपी सीड्स) । उक्त पोस्तवृक्ष के डोडे से निकले हुये बीज को पोस्तदाना कहते हैं। इसके स्वरूपादि का वर्णन पोस्ते की डोंडी के साथ किया गया है। रासायनिक संगठन-इसमें एक प्रकार का अप्रक्षोभक तैल पाया जाता है। इसमें कोई क्षाराम नहीं पाया जाता। गुण और प्रयोग-अफीम की जानकारी के पूर्व इन बीजों का व्यवहार आहार द्रव्य के रूप में किया जाता था। यह स्नेहन, निद्राजनक, पोषक तथा साधारण ग्राही होते हैं। मिठाइयों के ऊपर इसको छिड़का जाता है। इसका हलवा बनाकर खाया जाता है। निद्रानाश, दौर्बल्य, शुष्क कास एवं बर्रित विकार आदि में इसको पीसकर शर्करा या मधु के साथ खिलाया जाता है। इसका बाह्यलेप वेदनाहर माना जाता है। इसके तैल का ऑलिव ऑयल की तरह १/२-१ तो० की मात्रा में प्रयोग करते हैं। यह निद्राजनक है एवं शिरःशूल में इसको सिर पर लगाते हैं तथा कर्णशूल में इसे कान में डालते हैं। अथ सैन्धवः । तस्य नामगुणानाह सैन्धवोऽस्त्री शीतशिवं मणिमन्थञ्च सिन्धुजम् । सैन्धवं लवणं स्वादु दीपनं पाचनं लघु । स्निग्धं रुच्यं हिमं वृष्यं सूक्ष्मं नेत्र्यं त्रिदोषहृत् ॥ २४१ ॥ सेंधानमक के नाम तथा गुण-सैन्धव (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिंग में होता है), शीतशिव, मणिमन्थ और सिन्धुज ये संस्कृत नाम सेंधा नमक के हैं। सेंधानमक-स्वादिष्ट, अग्निदीपक, पाचक, लघु, स्निग्ध, रुचिकारक, शीतवीर्य, वृष्य, सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतों में भी प्रवेश करके प्रभाव दिखाने वाला), नेत्रों के लिये हितकारी तथा तीनों दोषों को दूर करने वाला होता है ॥ २४१ ॥ ८६ सेंधानमक हि०-सेंधानमक, सेंधानोन, लाहौरी नमक । बं०-सैंधवलवण । म०-सैंधवमीठ । गु०-सिंधालुण क०-सैंधव, सैंधवलवण । मा०-सींथोलवण । ते०-सैंधवलवणं, सिंधु उपु । पं०-सेंधानमक । ता०-इन्दु उप्यु । फा०-नमकेंसंग । अ०-मिलहे तबजर्द । अं०-Chloride of Sodium (क्लोरा- इड ऑफ सोडियम् ); Rock-salt (रॉकसाल्ट); Bay salt (बे साल्ट) । ले०-Sodii chlo- ridum (सोडिआइ क्लोराइडम) । सेंधानमक एक सुप्रसिद्ध नमक सिन्ध देश की खानों से निकलता है। पत्थर के ढोंके के समान इसके बड़े-बड़े टुकड़े आते हैं। यह सब प्रकार के नमकों में शुद्ध नमक समझा जाता है। सिन्धु नदी के पूर्व में होने वाला नमक कुछ लाल रंग का होता है। इसमें पोटैशियम् तथा मॅग्नेशियम् के कुछ लवण मिले रहते हैं। इन खानों में ऊपर का स्तर कुछ मटमैला होता है लेकिन नीचे का स्तर शुद्ध होता है। इस नमक को 'लाहोरी' नमक कहते हैं। सिन्धु नदी के हरीतक्यादिवर्गः १५५ पश्चिम की खानों में नमक के स्तर के ऊपर गोदन्ती का एक स्तर रहता है। इसमें पोटेशियम् तथा मॅग्नेशियम् के लवण नहीं होते। इस नमक को 'कोहटी' या 'निमक सज्ज़' कहते हैं। खानों से प्राप्त होने वाला एक और स्फटिक के समान पारदर्शक नमक होता है जिसे 'निमक शीश' ( रसार्णव-मणिमंथ ) और ( अं ) सलजेम् ( Salgem ) कहते हैं। उत्पत्ति-स्थानभेद से नमक की कई जातियां होती हैं लेकिन सबों में खाने का नमक रहता है। अन्य अशुद्धियों के कारण उनमें स्वाद, स्वरूप तथा गुणों में अंतर रहता है। सभी नमकों का मूल स्रोत समुद्र ही है। जहां आज पहाड़ हैं वहां भी किसी जमाने में समुद्र था और वहां का हिस्सा समुद्र से अलग होने से वहां का जल सूखकर नमक जम गया। कालान्तर से उस पर मिट्टी आदि जमती गई तथा यह पृथ्वी के अंदर नमक की खानों के रूप में रह गया। भारत मे खाने का नमक ३ प्रकार से प्राप्त होता है। ( १ ) समुद्र के जल को सूर्य की उष्णता से या उबालकर जो नमक तैयार किया जाता है उसे 'सामुद्र' कहते हैं। ( २ ) खारे तालाब, खारे झरने तथा खारे कूपों का जल या खारी मिट्टी पानी में घोलकर उस घोल को उबाल कर या धूप में सुखाकर तैयार करते हैं। ( ३ ) पृथ्वी के अन्दर रहने वाली नमक की खानों से प्राप्त जिसे सैंधव कहते हैं। बंबई तथा मद्रास का समुद्र किनारा, पंजाब का पहाड़ी नमक, राजपूताना की झीलें तथा विभिन्न स्थानों की रेह इनसे बहुत नमक प्राप्त होता है लेकिन सबसे अच्छा नमक सैंधव होता है। यद्यपि भारतवर्ष में नमक बहुत पाया जाता है तथा और अधिक बनाया भी जा सकता है तो भी ब्रिटिशकाल में सरकारी नियंत्रण के कारण विदेशों से भी नमक का आयात होता था। गुण और प्रयोग-नमक शरीर का एक अत्यन्त आवश्यक पदार्थ है तथा रक्त रस (Serum) का प्रधान खनिज द्रव्य है। यह रक्त में निश्चित अनुपात में रहता है तथा शरीर के जलीयांश एवं लवणों के नियन्त्रण में सहायक होता है। कुछ मात्रा में यह धातुओं में संचित भी रहता है लेकिन जितना भी अधिक होता है यह मूत्र एवं पसीना आदि द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। नमक की क्रिया ऑस्मोटिक् दबाव के परिवर्तन से होती है। यह पूर्णतः एक भौतिक क्रिया होती है। यदि एक पात्र के बीच एक अर्ध प्रवेश्य परदा (Semi permeable membrane) लगाकर दोनों तरफ नमक के घोल भर दें जिसमें एक में नमक ज्यादा रहे और दूसरे में कम रहे तो कुछ देर बाद यह दिखलाई देगा कि जिसमें नमक अधिक रहा उस तरफ कम नमक वाले भाग से जल आकर्षित होकर धीरे-धीरे दोनों भाग के घोल एक ही समान हो जायेंगे। इस भौतिक परिवर्तन को 'ऑसमोटिक्' ( Osmotic ) क्रिया कहते हैं। रक्त के बराबर ऑसमोटिक् बल के लवण घोल को समबल लवणजल (Isotonic saline) कहते हैं। यह ०.९% नमक का घोल होता है। रक्त से अधिक बलवाले घोल को अतिबल लवणजल (Hypertonic saline) एवं रक्त से कम बलवाले घोल को हीनबल लवणजल (Hypoto- nic saline) कहते हैं। यदि अतिबल लवणजल का सिरा द्वारा सूचिकाभरण किया जाय तो रक्त का ऑसमोटिक् दबाव अधिक होगा जिससे समीपस्थ लसिका से जलापहरण होकर रक्त की मात्रा बढ़ेगी। रक्त के लाल कणों से भी द्रवापकर्षण होने से वे भी सिकुड़ जावेंगे। इसी प्रकार हीनबल लवणजल से रक्त के लाल कण जल खींच कर फूल जावेंगे। शरीर में जब भी विभिन्न बल वाले घोल समीप आते हैं, इसी प्रकार की क्रिया होती है।

१५६ | भावप्रकाशनिघण्टुः सैंधव रुचिकारक, अग्निदीपक, पाचक, वातानुलोमक, नेत्र्य, व्रण रोपक एवं व्रण शोधक है। अल्प मात्रा से इससे पाचक स्रावों की वृद्धि होती है लेकिन अधिक मात्रा में आमाशयिक प्रक्षोभ होकर वमन एवं जलापकर्षण द्वारा कभी-कभी विरेचन होता है। अल्पबल लवणजल का प्रचूषण आसानी से हो जाता है लेकिन अन्यों का कम होता है। अतिबल लवणजल के सूचिकाभरण से ऑसमोटिक् क्रिया द्वारा रक्त की मात्रा बढ़ती है जिससे मूत्र एवं पसीना आदि की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ लोगों के मत से नमक का अधिक सेवन बहुत ही लाभदायक एवं आयु को बढ़ाने वाला होता है लेकिन आयुर्वेदानुसार नमक का अधिक उपयोग हानिकर है। (१) कुपचन, आध्मान एवं शूल आदि में अन्य औषधों के साथ इसका उपयोग किया जाता है। विसूचिका में जब शरीर से वमन एवं विरेचन के कारण बहुत सा द्रव तथा लवण निकल जाते हैं और शरीर ठण्डा होकर रोगी मरणासन्न हो जाता है ऐसी अवस्था में अतिबल लवणजल का सिरा द्वारा सूचिकाभरण बहुत ही आश्चर्यजनक लाभदायक होता है। इससे फिर से रक्त प्रवाह शुरू होकर रोगी बच जाता है। इसके लिये जिस घोल का उपयोग किया जाता है। उसके १ पाईंट परिस्रुत जल में शुद्ध नमक १२० ग्रे०, पोटैशियम् क्लोराइड् (Potassium chloride) ६ ग्रे. एवं कैल्शियम् क्लोराइड् (Calcium chloride) ४ ग्रे. रहता है। यदि शरीर में अम्लता अधिक हो तथा पोषण की भी आवश्यकता हो तो इसीमें सोडाबाईकार्ब (Soda bi carb) ४० ग्रे. एवं ग्लूकोज (Glucose) १४ ग्रे. मिलाया जाता है। अतिसार, रक्तातिसार एवं अत्यधिक रक्त स्राव आदि में जलापहरण के कारण निपात (Co- llapse) एवं स्तब्धता (Shock) आदि होने पर समबल लवणजल के सिरा द्वारा सूचिकां- भरण से बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार मूत्र विषममयता (Uraemia), गर्भिणी विषममयता (Eclampsia) एवं कार्बन मॉनऑक्साइड् (Carbon monoxide) नामक कोयले के धूएँ के विषैले प्रभाव आदि अवस्थाओं में इसी प्रकार के समबल लवणजल (०.९%) का उपयोग विष की तीव्रता कम करने के लिये किया जाता है। शरीर अत्यधिक दुर्बल हो गया हो तथा पोषण की त्वरित आवश्यकता हो तो ५% ग्लूकोज के साथ समबल लवणजल का उपयोग लाभदायक होता है। इन उपर्युक्त अवस्थाओं में सिरा के अतिरिक्त चर्म के नीचे, मुख द्वारा एवं गुदा द्वारा लवणजल का उपयोग किया जा सकता है। गुदा द्वारा, २ माशे नमक करीब ५ छटांक जल में घोलकर रोगी को उत्तान लिटा कर तथा चूतड़ों को कुछ ऊँचा करके रबर की नली द्वारा हर चार घण्टे पर दिया जाता है। घोल की उष्णता शरीर की उष्णता के बराबर या कुछ अधिक होनी चाहिये। (२) डा. ब्रूक मलेरिया के लिये एक प्रयोग लिखते हैं। एक मुट्ठीभर नमक को कढ़ाई में डालकर मन्द आंच पर कुछ बादामी रंग होने तक भूनते हैं। इसमें से १ तो. नमक जल के साथ सुबह खाली पेट रोगी को दिया जाता है। इसके पश्चात प्यास बहुत लगे तो थोड़ा-थोड़ा जल पीने को दें। २, ३ घण्टे तक खाने को कुछ भी न दें। बाद में बहुत भूख लगने पर हल्का पौष्टिक आहार दें। रोगी को ठण्डक से बच कर रहना चाहिये। डा० ब्रूक का कहना है कि इसके एक ही बार के प्रयोग से मलेरिया दूर हो जाता है या कभी २ दो बार प्रयोग करना पड़ सकता है। (३) व्रण, नाड़ीव्रण एवं दूषित क्षत आदि के प्रक्षालन के लिये परमबल लवणजल का प्रयोग किया जाता है तथा विरल कपड़े (गॉज) की पट्टी इस घोल में भिगो कर व्रण पर रखी जाती है। इससे व्रणित भाग में लसिकास्राव एवं श्वेतकणों की वृद्धि होकर व्रण शुद्ध होकर जल्दी


हरीतक्यादिवर्गः | १५७ अच्छा होता है। इस चिकित्सा में अन्य प्रतिदूषकों (Antiseptics) की तरह शरीर की कोषाओं को कुछ भी नुकसान नहीं पहुँचता। (४) श्वसनक ज्वर (न्युमोनिया) में नमक की पोटली बना कर उससे छाती को सेंका जाता है जिससे कफ ढीला हो कर निकलता है तथा वेदना शांत होती है। इसका आंतरिक प्रयोग ४ र. की मात्रा में जल के साथ किया जा सकता है। संधिवात, आमवात, गंडमाला एवं आमाशयिक पीड़ा आदि में भी पोटली से सेंकने से लाभ होता है। (५) इन्फ्लूएंझा, प्रतिश्याय एवं शिरःशूल तथा स्वास्थ वृद्धि के लिये १ तोला नमक १ सेर जल में डाल कर उसका नस्य बहुत लाभदायक है। (६) गले की खराबी में कदुष्ण जल में नमक डाल कर उससे गरारा करना चाहिये। गला एवं तालु की शिथिलता होने पर ठंडे पानी में नमक डाल कर कुल्ला कराने से लाभ होता है। (७) यदि गलती से जोंक गले के अन्दर चली जाय तो लवण जल पिलाते हैं। इसी प्रकार सिल्वर नाइट्रेट् (Silver nitrate) नामक चांदी के दाहक क्षार के विष क दूर करने के लिये इसको पिलाते हैं। (८) जीर्ण आमवात, गृध्रसी तथा अन्य पीड़ायुक्त संधि विकारों में एवं बिच्छू के काटने पर २०% उष्ण लवण जल में अवगाह किया जाता है तथा लवण जल पिलाते भी हैं। (९) सूत्रकृमि (Thread worm) में इसकी बस्ति दी जाती है। (१०) वमन कराने के लिये यह अत्युत्तम औषध है। अल्प मात्रा (२%) में देने से यदि वमन होता हो तो रुक जाता है। (११) मांसपेशियों की दुर्बलता में नमकयुक्त ठण्डे जल की धारा से बहुत लाभ होता है विशेषकर वर्धमान लड़कियों की पीठ की दुर्बलता में इसका अच्छा उपयोग होता है। करीब १५ सेर जल में ३ सेर नमक डाल कर स्नान करने से रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा स्फूर्ति मालूम होती है। मांसपेशियों की पीड़ा, चर्म रोग, मोच एवं मरोड़ आदि में भी स्नान से लाभ होता है। निषेध— किसी भी प्रकार के शोफ, जलोदर तथा अन्य रोग जिनमें शरीर के अन्दर द्रव पदार्थों का संचय होता है उनमें नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिये। रक्तभाराधिक्य, चर्मरोग एवं अत्यधिक प्यास आदि में भी इसका निषेध है। अधिक मात्रा में सिरा द्वारा लवणजल के प्रयोग से कभी-कभी इक्षुमेह (Glycosuria), साधारण ज्वर एवं कचित् मूत्र में अलब्यूमिन का निकलना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। फुफ्फुस शोफ (Oedema of lungs) तथा हृदय अधिक भार सहन करने में असमर्थ हो तब सिरा द्वारा लवणजल का प्रयोग न करें नहीं तो मृत्यु की सम्भावना रहती है।

अथ शाकम्भरीयम् । तस्य नामगुणानाह

शाकम्भरीयं कथितं गडाख्यं रोमकं तथा ॥ २४२ ॥ गडाख्यं लघु वातघ्नमत्युष्णं भेदिपित्तलम् । तीक्ष्णोष्णं चापि सूक्ष्मञ्चाभिष्यन्दिकटुपाकि च ॥ २४३ ॥ सांभर नमक के नाम तथा गुण—शाकम्भरीय के ही, गडाख्य (गडलवण) तथा रोमक पर्यायवाची शब्द हैं। सांभर नमक-लघु, वायुनाशक, अत्यन्त उष्णवीर्य, भेदी (मलादिक का भेदन १. 'तीक्ष्णं व्यवायी'ति पाठान्तरम् ।

१५८ भावप्रकाशनिघण्टुः करनेवाला ), पित्तजनक, तीक्ष्णोष्णवीर्य, सूक्ष्म, अभिष्यन्दी तथा विपाक में कटुरस युक्त होता है ॥ ४२-४३ ॥ ८७ साम्भरनमक । हि०-साम्बर नमक, साम्भरनोन, सांभर निमक। बं०-साम्बरलुण, शाम्भारि लवण । म०- सांभर मीठ, सांभर लोण। गु०-बड़ागरूं मीठ, साम्भरमीठ, सामरलून । क०-गाड़लबड, गाढ़ लवण । फा०-मिलहे अवकीर, नमक साम्भर । अ०-मलह उल अवकर । राजपूताना की झीलों के जल को सुखा कर जो नमक प्राप्त किया जाता है वह सांभर नमक कहलाता है। राजपूताना में सांभर नामक एक २० मील लम्बी तथा ५ मील चौड़ी झील है। इसमें ४ नदियां बहती हैं। बरसात में उसमें पानी जमा होता है। गर्मी में जल सूख जाता है। इसके २० भाग नमक में १५ भाग खाने का नमक, १ भाग सर्जिका (सोडियम् कार्बोनेट) तथा ३ भाग खारोनोन (सोडियम् सल्फेट) तथा अल्प मात्रा में आयोडीन एवं सोरे के लवण रहते हैं। यहां के जल को क्यारियों में जमा करते हैं जिसके सूर्य की गरमी से सूखने से उसमें का नमक अलग हो जाता है। जलमे अन्य अशुद्धियां रह जाती हैं जिसे फिर से झाल में डाल देते हैं। नमकीन जलको सुखा कर बनाये हुए नमकों में यह सबसे अच्छा होता है। इसका स्वाद कुछ कड होता है। गुण और प्रयोग-इसके गुण भी सेंधव की तरह होते हैं लेकिन वह उससे न्यून गुण वाला है। अथ सामुद्रं लवणं ( पाङ्गा ) तस्य नामगुणानाह सामुद्रं यत्तु लवणमक्षीवं वशिरञ्च तत् । समुद्रजं सागरजं लवणोदधिसम्भवम् ॥ २४४ ॥ सामुद्रं मधुरं पाके सत्तिक्तं मधुरं गुरु । नात्युष्णं दीपनं भेदि सक्षारमविदाहि च ॥ श्लेष्मलं वातनुत्तीक्ष्णं मारुचे नातिशीतलम् ॥ २४५ ॥ समुद्रनोन (पांगा) के नाम तथा गुण-समुद्रलवण के ही अक्षीव, वशिर, समुद्रज, सागरज और लवणोदधिसम्भव ये संस्कृत नाम हैं। समुद्र नमक-पाक में मधुररस युक्त, स्वाद में तिक्तरस मिश्रित मधुररस युक्त और गुरु होता है। यह अत्यन्त उष्णवीर्य नहीं होता है। यह दीपद, भेदी, क्षारगुण युक्त, अविदाही (दाह नहीं पैदा करने वाला), कफकारक, वातनाशक एवं तीक्ष्ण होता है। यह रूखा तथा अत्यन्त शीतल भी नहीं होता है ॥ २४४-२४५ ॥ ८८ समुद्रनमक हि०-पांगानिमक, पंगानोन, समुद्रनिमक, समुद्री नोन । बं०-पांगा । म०-मीठ । गु०-मीठुं, दरियाइ लूण। ते०, ता०-उप्पु । फा०-नमक, नमक दरिया । अ०-मिलह शोरी, मलहे उल् मुहीत । अं०-Salt (साल्ट ) । ले०-Sodii muras (सीडिआइ मुरास् )। समुद्र के खारे पानी से बनाये हुए नमक को समुद्र नमक कहते हैं। भारत में आवश्यक नमक का ३७% भाग बंबई के समुद्री तट से निर्मित होता है। नमक निकालने के लिये विभिन्न देशों में हवा की उष्णता के अनुसार विभिन्न पद्धतियां काम में लाई जाती हैं। समुद्र के किनारे पर छोटे-छोटे गढ़े बनाते हैं जिसमें समुद्र का जल धीरे-धीरे भरता है। सूर्य की गरमी से उसमें

( १ ) तिक्तेति पाठान्तरम् ।

हरीतक्यादिवर्गः १५६ का जलीय अंश सूखने लगता है। १०० भाग जल में ३७ भाग नमक घुलता है। नमक को घुलने के लिये जितने जल की आवश्यकता होती है उससे कम जल जब सूख कर रह जाता है तब उसमें का नमक अलग होकर नीचे जमने लगता है। जैसे-जैसे नमक जमता है वैसे-वैसे उसे निकल कर जमा करते जाते हैं। उस नमक की राशि में से मॅग्नेशियम् क्लोरायड (Magnesium chlo- ride) निस्यंदित होकर निकल जाता है। समुद्री जल में खाने के नमक के साथ पोटेशियम् क्लोराइड (Potassium chloride), मॅग्नेशियम् क्लोराइड् (Magnesium chloride), मॅग्नेशियम् सल्फेट् (Magnesium sulphate ) एवं कॅल्शियम सल्फेट् (Calcium sulphate) आदि द्रव्य रहते हैं जो खाने के नमक निकालने के बाद उस जल में रह जाते हैं। इस कड़वे जल में से इन पदार्थों को विभिन्न पद्धतियों से अलग कर लेते हैं। बाजारू समुद्री नमक कुछ आर्द्र रहता है उसका कारण यह है कि उसमें मॅग्नेशियम् एवं कॅल्शियम क्लोराइड्स के कुछ अंश रह जाते हैं। शुद्ध नमक आर्द्र नहीं होता तथा इसका १ भाग २ ३/८ भाग जल में घुल जाता है। गुण और प्रयोग-सामुद्र लवण के गुण सैंधव के समान होते हुये भी इसमें जो अन्य पदार्थ रहते हैं उनके कारण कुछ अंतर पड़ता है। ( १ ) समुद्र में स्नान करने से जो नुमचुमाहट होती है उसके कारण शरीर का रक्त प्रवाह बढ़ जाता है तथा उससे शरीर में स्फूर्ति मालूम पड़ती है। ( २ ) समुद्री जल का मांसपेश्यन्तर्गत सूचिकाभरण अजीर्ण, शोथ, जीर्ण चर्मविकार तथा बच्चों के पाचनसंस्थान के विकारों में लाभदायक माना जाता है। ( ३ ) समुद्री नमक में आयोडीन (Iodine) रहने के कारण गलगण्ड (Goitre) के प्रति- बंधन की दृष्टि से इसका उपयोग लाभदायक माना जाता है। ( ४ ) पाण्डु, आमाशयिक व्रण, प्रतिश्याय, वातनाड़ीशोथ, नाड्यवसन्नता एवं पाचनसंस्थान की दुर्बलता में समुद्री जल का उपयोग रोगनाशकरूप में किया जाता है। फ्रांस में बच्चों की जीवनी शक्ति (Vitality) बढ़ाने के लिये इसका प्रयोग करते हैं। अथ बिडलवणम् (बिरियासंचल) तस्य नामगुणानाह बिडं पाक्यञ्च कृतकं तथा द्राविडमासुरम् । बिडं सक्षारमूर्ध्वाधःकफवातानुलोमनम् ॥ २४६ ॥ बिरिया संचर नमक के नाम तथा गुण-बिड, पाक्य, कृतक, द्राविड़ तथा आसुर ये सब बिरिया संचर नमक के संस्कृत नाम हैं। बिरिया संचर नमक-क्षार गुण युक्त (विकृत त्वचा मांसादिकों को गला कर दूर करने वाला) होता है, तथा ऊपर (मुखादि) के मार्ग से कफ एवम् नीचे (गुदादि) के मार्ग से वायु का अनुलोमन करने वाला अर्थात् कफ को मुखादि से निकालने वाला और अपान वायु को अधोगामी करने वाला होता है ॥ २४६ ॥ ॐ ऊर्ध्वं कफमधो वातं सञ्चारयेदित्यर्थः ॥ २४६ ॥ यहां पर 'ऊर्ध्वाधःकफवातानुलोमनम्' का-'ऊपर मुखादि की ओर कफ को एवं नीचे गुदादि को ओर अपान वायु को संचारित करने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ २४६ ॥ दीपनं लघु तीक्ष्णोष्णं रुच्यं रूक्ष्यं व्यवायि च । विबन्धानाहविष्टम्भहृद्रुग्गौरवशूलनुत् ॥ २४७ ॥

१६० भावप्रकाशनिघण्टुः बिरिया संचर नमक - अग्निदीपक, लघु ( शीघ्र पच जाने वाला ) तीक्ष्ण तथा उष्ण- वीर्य, रूक्ष, रुचिकारक, व्यवायि ( परिपक्व होने के पहले ही शरीर में प्रभाव दिखाने वाला ), विबन्ध, आनाह, विष्टम्भ, हृद्रोग, शरीर की गुरुता तथा शूल को नष्ट करने वाला भी होता है ॥ ८९ बिरिया संचर नमक । हि०-बिरिया ( आ ) नमक, बिरिया संचर नमक, बिरिया सोंचर नमक, कटीला नमक, कालानमक । वं०-विट्नुन । म०-पादेळोण, विडलोण । गु०-विड लवण । विडलवण क्या है इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। श्रीयुत द० अ० कुलकर्णी जी ने अपनी रसरत्नसमुच्चय की टीका में इसका स्पष्टीकरण किया है। जो क्षार, अम्ल, गंधक तथा नमक आदि पदार्थ पारद में दिये हुये ग्रास को जीर्ण करने के लिये प्रयुक्त होते थे उन्हें बिड कहा जाता था । बाद में इस शब्द का प्रयोग अन्य धातुओं को पारद में जीर्ण कराने के लिये एवं भिन्न-भिन्न धातुओं के शोधन अथवा द्रावण के लिये प्रयुक्त द्रव्यों के लिये किया जाने लगा । इसके पश्चात् रसशास्त्र की अवनति के काल में उपर्युक्त दोनों अर्थ भूल गये और बिड का प्रयोग नमक के साथ करके बिडनमक के रूप में कालानमक के लिये आजकल किया जा रहा है। यह कालानमक मनुष्य के खाये हुये ग्रास अथवा गुरु भोजन को जीर्ण अथवा हजम कराने में समर्थ होने के कारण बिडनमक या कालानमक यह अर्थ ही अब व्यवहार में विशेष रूढ़ हो गया है। सुश्रुत की टीका में डल्हण लिखते हैं कि 'कृत्रिमं स्वनाम्ना ख्यातं, तच्च प्रसारिणी कल्कमक्त- लवणसंयोगादग्निदाहेन निवृत्तम्' अर्थात् प्रसारिणी का कल्क, भात तथा नमक आदि को जलाकर बनाया हुआ नमक । गुजरात की ओर उपर्युक्त चीजों को गढ़े में डालकर जलाते हैं तथा १०, १५ दिन बाद उसमें से नमक के ढेले निकाल कर व्यवहार करते हैं । कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण को कालानमक लिखा है। आजकल बिडलवण नाम से जिस काले नमक का व्यवहार किया जाता है उसके बनाने की निम्न विधि है। यह हिसार जिले में भिवानी नामक ग्राम में अधिक बनाया जाता है । १ मन सेंधानमक तथा हर्री, आंवला तथा सज्जीखार ( व्यापार का सोडियम् कार्बोनेट ) प्रत्येक आधा सेर लेकर सब चीजों को कूट कर एवं मिलाकर मिट्टी की हांडियों में पकाते हैं। जब सब चीजें गलकर एक हो जाती हैं तब आंच को बन्द करके ठंडा होने पर नमक के ढोकों को निकाल लिया जाता है। एक अन्य विधि यह है कि २८ सेर सांभर नमक तथा ५० तो० आंवला चूर्ण को मिला कर उसका चतुर्थांश एक संकरे मुंह की हांडी में रखकर गरम करें तथा लाल होने पर बाकी चूर्ण में से थोड़ा थोड़ा उस हांडी में डालते जांय । करीब ६ घण्टे पश्चात् २४ सेर के लगभग काला नमक तैयार हो जावेगा । यह काला नमक गहरे लाल काले से चमकीले रंग का, नमकीन एवं विशिष्ट गंधयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया ( ९५% ) खाने का नमक तथा अत्यल्प मात्रा में खारी नौन ( Sodium Sulphate-सोडियम् सल्फेट ), ऐल्यूमिना, मॅगनेशिया, फेरिक् ऑक्सा- इड् एवं आयर्न सल्फाइड आदि पदार्थ पाये जाते हैं । इसकी गन्ध इसके आयर्न सल्फाइड के कारण रहती है लेकिन इसमें यह बहुत अल्प ( १०० में १ से कम ) मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-यह अग्निदीपक, वातानुलोमक, विरेचक एवं बल्य है । इसका प्रयोग प्लीहावृद्धि, यकृत् विकार, आध्मान, शूल, अपचन एवं अन्य आन्त्रिक विकारों में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती ।


हरीतक्यादिवर्गः १६१ अथ सौवर्चलं लवणम् । तस्य नामगुणानाह सौवर्चलं स्याद् रुचकं मन्थपाकञ्च तन्मतम्¹। रुचकं रोचनं भेदि दीपनं पाचनं परम् ॥ सस्नेहं वातनुच्चातिपित्तलं विशदं लघु । उद्गारशुद्धिकृद्रुच्यं विबन्धानाहशूलजित् ॥२४९॥ काला नमक के नाम तथा गुण - सौवर्चल, रुचक और मन्थपाक ये सब काला नमक के संस्कृत नाम हैं । कालानमक - रोचक, भेदक, अग्निदीपक, अत्यन्त पाचक, स्नेहयुक्त, वातनाशक एवम् अत्यन्त पित्तजनक नहीं होता है । तथा यह विशद गुण युक्त, हलका, उद्गार ( डकार ) को शुद्ध करने वाला, सूक्ष्म ( सूक्ष्म स्रोतोगामी ), विबन्ध, आनाह तथा शूल का नाश करने वाला है ॥ २४८-२४९ ॥ ९० सोंचर नमक । हि०-कालानमक, सोंचर नमक, चौहार कोड़ा, चौहार कोरानोन, चौहार कारा, चौहार काला । बं०-संचल लवण । म०-सोनचक मीठ । गु०-संचल । क०-चौवर्चल । ते०-नालु उपु । फा०-नमक सिया, नमक स्याह । यू०-नमक काला । अ०-माला अस्वद, मलह अस्वद । अं०- Black Salt ( ब्लैक साल्ट ), Sochal Salt ( सोचल साल्ट ) । ले०-Unaqua Sodium Chloride ( अनुकुआ सोडियम् क्लोराइड ) । जिस प्रकार बिडलवण के सम्बन्ध में मतभेद है उसी तरह सौवर्चल लवण के सम्बन्ध में भी मतभेद है। कुछ लोगों ने इसे काललवण लिखा है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि जो सौवर्चल निर्गन्ध होता है वह काललवण है तथा वह दक्षिण समुद्र के समीप बनता है। डा० देसाई लिखते हैं 'रसग्रन्थों में सौवर्चल नाम शोरे को दिया गया है। सु = सुष्ठु, वर्चः = दिप्तिं, अल् = प्राप्ति, सर्वथा अलति अनेन इति सौवर्चलं = जिसके कारण भली प्रकार प्रकाश पड़ता है अर्थात् 'बहुद्युत्तेजक' । श्रीयुत द. अ. कुलकर्णीजी लिखते हैं 'जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त किया जाता है उसे लूनिया मिट्टी कहते हैं तथा उस मिट्टी में कुछ खाने का नमक भी रहता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक में कुछ शोरे का अंश रहता है। शोरे के साथ-साथ पैदा होने के कारण तथा शोरे की कुछ मात्रा इसमें रहने के कारण इसको सोंचर अथवा सौवर्चल कहते हैं। सोंचर नमक बनाने की निम्न विधि प्रचलित है । सज्जी माटी को जल में घोल दिया जाता है फिर उसमें थोड़ा थोड़ा खाने का नमक डालते जाते हैं और जितना घुलता है उतना घुलने देते हैं । फिर इस घोल को छानकर अग्नि से सुखाते हैं । यह कुछ गहरे रङ्ग का होता है । रासायनिक संगठन-इसमें खाने का नमक, खारी नौन ( सोडा सल्फ ) एवं सज्जीखार ( कॉस्टिक सोडा ) रहता है लेकिन सोडियम् कार्बोनेट नहीं रहता । गुण और प्रयोग-इसका उपयोग विड लवण के स्थान पर भी किया जाता है । यह अग्नि- दीपक, पाचक एवं विरेचक होता है। इसका उपयोग शूल, गुल्म, आन्त्रकृमि एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती । अथ खानिजं लवणम् । तस्य नामगुणानाह औद्भिदं पांशुलवणं यज्जातं भूमितः स्वयम् । क्षारं गुरु कटु स्निग्धं शीतलं वातनाशनम् ॥ खानिज लवण अर्थात् रेहगदा नोन के नाम, उत्पत्ति तथा गुण- औद्भिद तथा पांशुलवण १. 'अक्षपाकं च धातुमत्' इति पाठ० । ११ भा० नि०

१६२ भावप्रकाशनिघण्टुः ये दो नाम संस्कृत में उस नमक का है जो कि जमीन से स्वयम् उत्पन्न होता है। रेहगवा नोन- क्षार गुणयुक्त, गुरु, कड़वरसयुक्त, स्निग्ध, शीतल और वातनाशक होता है ॥ २०५ ॥ ९१ रेह का नमक हि०-रेहगवा नोन, रेह का नमक, मटिया नोन, शोरा नोन। बं०-फूला लवण । जांगल देश की खारी भूमि में रेह उत्पन्न होती है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार एवं बंगाल आदि प्रान्तों की ऊसर जमीन में भी रेह होती है। उसी रेह से बना हुआ नमक रेहगवा नोन कहलाता है। जिस प्रकार की मिट्टी होगी उसी प्रकार का नमक प्राप्त होता है। जिस मिट्टी से शोरा अलग किया जाता है उससे प्राप्त नमक में शोरे का अंश रहता है। ऐसे नमक को कुछ लोग सौवर्चल लवण मानते हैं। तथा सज्जी मिट्टी से प्राप्त नमक में सज्जीखार की कुछ मात्रा रहती है। इसे वे औद्भिद लवण या रेहगवा नोन मानते हैं। कुछ भी हो जो ऊसर मिट्टी से नमक निकाला जाता है उसे रेहगवा नोन कहा जाता है। यह नमक कुछ तीता, कडवा एवं क्षारीय होता है। रासायनिक संगठन-इस नमक में काफी मात्रा में खारी नोन (सोडा सल्फ) तथा अल्प मात्रा में सोडियम कार्बोनेट एवं मॅग्नेशियम् सल्फेट रहते हैं। गुण और प्रयोग-रोचक, दीपन एवं पाचन गुण के कारण सभी पाचन योगों में इसका व्यवहार किया जाता है। सामान्य मात्रा में मूत्रल भी होता है। योगों के अतिरिक्त स्वत- न्त्ररूप में लवणों का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। वमन कराने के लिए प्रायः सैन्धव ही प्रयुक्त होता है। मात्रा-४ रत्ती से १ माशा। नोट-उपर्युक्त लवणों के अतिरिक्त चरक (वि. अ. ८) के लवण स्कन्ध में एवं सुश्रुत (सू. अ. ४६) में इतर विशिष्ट लवणों का उल्लेख किया गया है। अथ चणकाम्लम् । तस्य गुणानाह चणकाम्लुकमत्युष्णं दीपनं दन्तहर्षणम् । लवणानुरसं हृद्यं शुलाजीर्णविबन्धनुत् ॥ २५१ ॥ चनाखार के नाम तथा गुण-चनाखार को संस्कृत में चणकाम्ल कहते हैं। चणकाम्ल- अत्यन्त उष्णवीर्य, अग्निदीपक, दन्तहर्षण (दन्तहर्ष अर्थात् दांतों में खट्टापन लग जाने से चबाने में असमर्थ कर देने वाला ), कुछ लवण रस युक्त, रुचिकारक, शूल, अजीर्ण तथा विबन्ध को दूर करने वाला होता है ॥ २५१ ॥ ९२ चनाखार हि०-चने का खारा, चनाखार, चनक लोणी, चने का सिरका । म०-हरभरयाची आंब। गु०-चणा नो खार । मार्गशीर्ष के महीने में जब चने के क्षुप लवण युक्त हो जाते हैं तब मलमल का सफेद कपड़ा लेकर प्रतिदिन प्रातःकाल उक्त क्षुपों पर फेर, उन पर पड़े हुए ओस की बूँदों से उसको तर कर सुखा दें। इस प्रकार एक मास करके इस कपड़े को पानी में खूब मलकर उसका अम्ल पदार्थ निकाल ले। फिर उस पानी को ५-७ घण्टे स्थिर छोड़ कर उसका पानी नितार ले। नीचे जमे हरीतक्यादिवर्गः १६३ हुए पदार्थ को सुखा ले और पानी को अग्नि पर औटा कर उसको भी सुखा ले। फिर दोनों को एक में मिला कर सुरक्षित रख दें। उपर्युक्त विधि के अतिरिक्त केवल रात में या सुबह मलमल का कपड़ा चने के क्षुपों पर डाल कर सुबह उसको निचोड़ लेते हैं। जो द्रव प्राप्त होता है उसे उसी द्रव रूप में या सुखा कर काम में लाया जाता है। कुछ लोग क्षार-निर्माण विधि की तरह चने का क्षुप जलाकर उससे क्षार निकालते हैं वह गलत है क्योंकि उसमें तो केवल क्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) ही रहता है। यहां जो गुण दिये गये हैं वे अम्ल के हैं। इसलिये ऊपर दी हुई विधि से ही इसे बनाना चाहिये न कि क्षाररूप में। रासायनिक संगठन-यद्यपि इसे चनाखार लिखा गया है लेकिन इसमें अम्ल द्रव्य होते हैं। इसमें ॲक्झॅलिक (Oxalic), मॅलिक् (Malic) एवं अॅसेटिक् (Acetic) आदि अम्ल पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-चणकाम्ल का उपयोग उदरशूल, अजीर्ण, बच्चों के आमातिसार, अग्नि- मांद्य, विबन्ध तथा कष्टार्तव में किया जाता है। इसको जल में मिला कर लू लगने पर तथा ज्वर में देने से तृषा, दाह एवं सन्ताप कम होता है। अजीर्ण में इसको सिरका के साथ मिला कर पिलाते हैं। लौंग तथा मिश्री के साथ इसको जल में मिलाकर हैजे में देने से लाभ होता है। मधुमेह एवं पथरी में इसका प्रयोग हानिकारक है। मात्रा-१-२ रत्ती या ५-१० बूंद। अथ यवक्षारः स्वर्जिका सुवर्चिका च। तन्नामगुणानाह पाक्यं क्षारो यवक्षारो यावशूको यवाग्रजः। स्वर्जिकाऽपि स्मृतः क्षारः कपोतः सुखवर्चकः ॥ कथितः स्वर्जिकाभेदो विशेषज्ञैः सुवर्चिका । यवक्षारो लघुः स्निग्धः सुसूक्ष्मो वह्निदीपनः ॥ निहन्ति शूलवातामश्लेष्मश्वासगलामयान् । पाण्ड्र्वर्धोग्रहणीगुल्मानाहलीहहृदामयान् ॥ स्वर्जिकाऽल्पगुणा तस्माद्विशेषा गुल्मशूलहृत् । सुवर्चिका स्वजिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनैः ॥ २५५ ॥ जवाखार, सज्जी तथा सोरा के नाम और गुण-पाक्य, क्षार, यवक्षार, यावशूक और यवाग्रज ये सब जवाखार के संस्कृत नाम हैं। स्वर्जिका, क्षार, कपोत और सुखवर्चक ये सब सज्जी के संस्कृत नाम हैं। जवाखार की भाँति इसका भी संस्कृत में क्षार नाम है। द्रव्यों की विशेषताओं के ज्ञाता वैद्य जन सोरा को सज्जी का ही भेद बतलाते हैं। इसे संस्कृत में सुवर्चिका कहते हैं। जवाखार - लघु, स्निग्ध, अत्यन्त सूक्ष्म (सूक्ष्म स्रोतोगामी) तथा अग्निदीपक होता हैं एवम् यह शूल, वायु, आम, कफ, श्वास, गलरोग, पाण्डुरोग, बवासीर, संग्रहणी, गुल्म, आनाह, प्लीहा और हृद्रोग का नाश करता है। सज्जी-इसे जवाखार की अपेक्षा न्यून गुणवाली तथा विशेष करके गुल्म तथा शूल को दूर करने वाली समझना चाहिये । सुवर्चिका (सोरा) ?-इसे लोग गुणों में सज्जी के समान ही समझें, ऐसा वैद्यों का मत हैं ॥ २५२-२५५ ॥ ९३ जवाखार। हि०-जवाखार, जवखार । बं०-यवक्षार । म०-झाडाचे मीठ, जवाखार । गु०-जवाखार, खारो । ता०-मरवप्पु । ते०-मानुवप्पु । मळ०-कारम् । क०-मरदउप्पु । अं०-Impure carbo- nate of potash (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ् पोटॅश्) । ले०-Potasii carbonas (पोटॅसाइ कार्बोनस्) ।

१६४ भावप्रकाशनिघण्टुः

जब यव क्षुपों पर बाल निकलने वाले हों तब पञ्चांग को संग्रह कर सुखा दें। और सुखाने पर आग लगा कर राख बना उसको २४ घंटे आठगुने पानी में भिगो दें । यदि पञ्चांग जलाने के बाद उसकी राख काली रहे तो जल में डालने के पूर्व उसे कढ़ाई में डाल कर राख सफेद होने तक पकाना चाहिए । फिर ऊपर का स्वच्छ जल निथार लें अथवा फिल्टर से पानी को छान लें । उस स्वच्छ जल को किसी कलईदार कड़ाही में अग्नि पर पकावें । पानी सूखने पर कड़ाही में जमे हुए क्षार को खुरच कर सुरक्षित रखें । इसी को जवाखार कहते हैं। यवक्षार नाम से औषध में उपर्युक्त विधि से तैयार किये हुए क्षार का व्यवहार करना चाहिये । इस क्षार में अधिकांश मात्रा पोटैशियम् कार्बोनेट (Potassium carbonate) की रहती है तथा कुछ अन्य पदार्थ भी रहते हैं। इसी प्रकार अधिकांश वृक्षों की राख में भी पोटैशियम् कार्बोनेट रहता है। तथा उनके अन्दर रहने वाले अन्य विभिन्न पदार्थों के कारण विभिन्न क्षारों के गुणों में अन्तर पाया जाता है। काष्ठमय झाड़ियों की अपेक्षा रसयुक्त वर्षांयु क्षुपों में यह अधिक पाया जाता है। व्यापार की दृष्टिसे पोटैशियम् कार्बोनेट, आर्टिमिसिआ या वार्मवुड (Artemisia; Worm- wood) नामक वृक्षों से, बीटरूट (Beet-root) से, भेड़ के बालों को धो कर उस घोल से, सोराखार से एवं पोटैशियम् सल्फेट (Potassium sulphate) आदि से प्राप्त किया जाता है । भूमि में पोटैशियम् के लवण रहते हैं। वृक्ष भूमि से इनका शोषण कर लेते हैं। इनके बिना वृक्षों की वृद्धि नहीं होती। उपर्युक्त क्षार मृदुक्षार कहलाता है। तीक्ष्ण क्षार बनाने के लिये क्षारोदक (वृक्ष को जला कर बनाई राख के जलीय भाग) में चूना मिलाना चाहिये तथा बाद में उस घोल को सुखाना चाहिये । यह अत्यन्त दाहक होता है तथा इसमें पोटैशियम् हाइड्रोक्साइड रहता है । यवक्षार का स्वाद राखी के समान किन्तु कुछ नमकीन होता है। गुण और प्रयोग—यवक्षार अग्निदीपक, मृदुविरेचक, अम्लतानाशक, रक्तशोधक, सौम्य मूत्रल, कफनिःसारक एवं कुछ स्वेदजनक है । इसका उपयोग शूल, अजीर्ण, अम्लपित्त, अम्लोत्कर्ष, मूत्रकृच्छ्र, यकृत् प्लीहा एवं अन्य ग्रन्थियों की वृद्धि, ज्वर, अर्श, कामला एवं गुल्म में किया जाता है। (१) जीर्ण आमाशयशोथ तथा आमाशय में श्लेष्मा की अधिकता होने पर भोजन के २० मिनट पूर्व यवक्षार का उपयोग अन्य सुगन्धि एवं तिक्त औषधों के साथ किया जाता है जिससे श्लेष्मा कम हो कर पाचक स्रावों की उत्पत्ति होती है तथा पाचन ठीक होता है। परिणाम शूल एवं अम्लपित्त आदि विकारों में भोजन के २ घंटे पश्चात् इसके उपयोग से अम्लता की अधिकता से होने वाला शूल नहीं होता। नींबू के रस के साथ फेनायमान मिश्रण के रूप में लेने से आमाशय पर शामक प्रभाव होकर वमन में लाभ होता है। (२) यकृत्, प्लीहावृद्धि एवं गुल्म आदि में बड़ाहर्रा, रोहितक की छाल एवं छोटी पीपल के क्वाथ के साथ इसका उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग से आन्त्रिक श्लेष्मा कम होकर पित्त मार्ग का अवरोध दूर होने से कामला में लाभ होता है । (३) इसके उपयोग से कफ पतला होकर निकलने लगता है। शुष्क कास तथा श्वसनिका- शोथ आदि में ४ रत्ती यवक्षार, १० बूंद अडूसा का रस तथा २ रत्ती लौंग का चूर्ण देने से लाभ होता है। (४) ज्वर तथा अन्य अम्लोत्कर्ष की अवस्थाओं में इसका उपयोग किया जाता है । ज्वर में स्वेदल रूप में पसीना लाने के लिये नीम के रस या क्वाथ के साथ इसका उपयोग लाभदायक है ।


हरीतक्यादिवर्गः १६५ (५) इससे वृक्कों को उत्तेजना मिलने से मूत्रोत्सर्ग अधिक होता है। मूत्रकृच्छ्रता में इससे प्रक्षोभ का शमन होकर पेशाब की जलन दूर होती है। मूत्र की प्रतिक्रिया क्षारीय होने से यूरिक् एसिड (Uric acid) का उत्सर्ग अधिक हो कर आमवात, वातरक्त तथा यूरिक् एसिड से बनने वाली पथरी में लाभ होता है। (६) इसके घोलका बाह्य प्रयोग शीतपित्त, उददं, खुजली, श्वित्र, विचर्चिका एवं कीटदंश पर किया जाता है। इससे त्वचा के ऊपर का तैलीय अंश घुल कर निकल जाता है जिससे सादे जल की अपेक्षा इसके घोल से त्वचा अधिक साफ हो जाती है । अधिक मात्रा में इसके प्रयोग से अतिसार, शोथ, फॉस्फेट्स से बनने वाली पथरी आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा वृक्क भी विकार ग्रस्त हो जाते हैं । मात्रा—१-२ रत्ती । ९४ सज्जी ! हि०-सज्जो, सज्जीखार, सज्जीमिट्टी । बं०-साजिखार, साजीमाटी, साजी खार । म०-सज्जी- खार, साजी । मा०-साजीखार । गु०-साजीखार । क०-साजीखारं, साजी खार, सज्जीखार । ता०-सज्जीकारं । पं०-सज्जी, लोटा सज्जी, खगनखार । फा०-संजारे कखिया, अशखार । अ०- कलिमास्कर, कलिवशम्बूअ असफर । अं०-Barilla (बर्रिला-खारे वृक्ष की राख); Impure Car- bonate of Soda (इम्प्योअर कार्बोनेट ऑफ सोडा ) । सज्जी—सफेदी लिए भूरे रंग का एक प्रसिद्ध खार है। औषध के अतिरिक्त कांच, साबुन एवं कागज आदि अनेक पदार्थों के निर्माण में इसका उपयोग किया जाता है। सज्जी कई प्रकार से बनाई जाती है जिनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। (१) समुद्र के किनारे तथा क्षारीय भूमि में उत्पन्न होने वाले कुछ वृक्ष होते हैं, उनकी राख में सज्जी होती है। समुद्र के सेवार में भी सज्जी होती है जिसकी राख को केल्प (Kelp) कहा जाता है। ये स्पंज के समान कड़े गट्ठे होते हैं तथा इसमें ३-८% सज्जी होती है। खारे वृक्षों की राख को खार सज्जी (Barilla-बॅरिला) कहा जाता है जिनमें २५-४०% सज्जी होती है। भारतवर्ष में निम्न तीन वर्ग के खारे वृक्ष पाये जाते हैं—चिनोपोडिएसी (Chenopodia- ceae), सैलिकोर्निएसी (Salicorniceae) एवं संल्सोलेसी (Salsolaceae) । पंजाब में अक्तूबर से जनवरी तक सज्जी बनाने के कारखाने काम करते हैं । खारे वृक्षों को सुखाकर ६ फीट गोल एवं ३ फीट गहरे गढ़े में डालकर धीरे-धीरे जलाते हैं । गढ़े में हांडियों को नीचे छेद कर उल्टे मुंह रखते हैं । कुछ समय बाद राख में से पतला द्रव निकल कर हांडियों में जमता है । ४ दिन वैसे ही अपने आप ठंडा होने देते हैं । हांडियों में जो सज्जी जमा होती है उसे वहां लोटासज्जी कहा जाता है । हांडियों के बाहर जो सज्जी जमती है वह अशुद्ध होती है । लोटासज्जी कॅरोक्साइलॉन् ग्रिफिथिआइ (Caroxylon Griffithii) नामक वृक्ष से बनाई जाती है। यह सबसे शुद्ध होती है तथा औषध में इसका व्यवहार किया जाता है। मांटगोमरी प्रांत में इसे खगनखार कहा जाता है। दूसरे वृक्षों से प्राप्त संज्जी जो हलके दर्जे की होती है उसे भूसीसज्जी कहते हैं। लोटासज्जी को औषध में व्यवहार में लाने के पूर्व शोधन कर लेना चाहिये । इसके लिये इसे दुगुने जल में बंद पात्र में २ घंटे उबालते हैं तथा बार-बार हिलाते जाते हैं । फिर ऊपर के गरम तरल भाग को छान कर तामचिनी की कड़ाइयों में मन्द आंच पर सुखाते हैं । बचे हुवे नीचे के भाग में फिर जल डालकर उबाल कर ऊपर का द्रव छान कर सुखाते हैं । इस

१६६ भावप्रकाशनिघण्टुः प्रकार प्राप्त हुई सज्जी को फिर उष्ण जल में घोल कर सुखाते हैं जिससे इसकेरवे बनते हैं । इन्हें बंद बोतलों में रखना चाहिये । (२) भारतवर्ष के अनेक प्रान्तों में ऊसर अथवा रेहाल भूमि होती है। ऐसी भूमि में सज्जी, खारीनोन (सोडियम् सल्फेट ), नमक एवं सोरा आदि मिले रहते हैं। भिन्न-भिन्न स्थानों की रेह में इनकी मात्रा कम ज्यादा हुआ करती है तथा और भी कुछ पदार्थ उसमें रहते हैं। जिस रेह में सज्जी की अधिकता होती है उसे सज्जी माटी या धोबी की मट्टी कहा जाता है। उत्तरप्रदेश में गंगा और जमुना नदी के बीच के प्रदेश में रेह बहुत होती है। इसमें ८८% सज्जी होती है। जिस स्थान में रेह अधिक होती है वहां इसका जमीन पर बरफ की तरह सफेद स्तर स्पष्ट दिखलाई देता है। हिमालय से जो नदियां बहती आती हैं वे अपने साथ विभिन्न क्षार तथा लवणों को बहा ले आती हैं। ये आसपास की जमीन में जमा होते हैं। गरमी के दिनों में उष्णता से जब नीचे का जल ऊपर आता है तब उसके साथ ये क्षार ऊपर आकर जम जाते हैं। जिस रेह में सज्जी अधिक होती है उसे जल में घोल कर एवं नितार-छानकर सुखा लेते हैं। (३) मध्यप्रांत में लोणार तालाब से भी सज्जी बनाई जाती है। यह रेह से प्राप्त सज्जी से शुद्ध होती है। इस तालाब में सज्जी के बड़े-बड़े टुकड़े भी मिलते हैं तथा उसके जल को सुखाकर भी सज्जी प्राप्त करते हैं। इस तालाब से सोडियम् बाइकार्बोनेट (Sodium bicarbonate, Na H CO_3), सं०-द्रोणलवण भी प्राप्त होता है। इसको दोने में लेकर जमाते हैं। इसलिये इसे द्रोण लवण कहा जाता है। (४) उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त खाने के नमक एवं खारीनोन आदि से भी सज्जी बनाई जाती है। शुद्ध सज्जी को सुरतीखार कहा जाता है तथा बाजारी अशुद्ध सज्जी को बांगडखार कहते हैं। सर्वप्रथम लिखे हुए प्रकार की शुद्ध सज्जी का औषध में व्यवहार करना चाहिये। यह शुभ्र, गंधहीन, अस्वादु, कुछ नमकीन एवं ताजी अवस्था में रवेदार होती है। खुली हवा में रखने पर इस पर बुरादा जम जाता है। यह जल में विलेय लेकिन मद्यसार में अविलेय होती है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया सोडियम् कार्बोनेट (Sodium carbonate, Na_2 Co_3 10H_2O) रहता है। गुण और प्रयोग- सज्जी के गुण यवक्षार के गुणों के समान ही हैं किन्तु उससे यह कुछ हीनगुण युक्त है। यह दीपन, पाचन, मूत्रल, कफनिःसारक, अम्लतानाशक एवं आध्मानहर है। इसका उपयोग कास, श्वास, अजीर्ण, अम्लपित्त, शूल, आध्मान, मूत्रकृच्छ्र, आमवात एवं गुल्म आदि रोगों में किया जाता है। (१) अग्निमांद्य, अजीर्ण एवं परिणामशूल में सज्जीखार, यवक्षार एवं पञ्चलवण सब समान मात्रा में लेकर नींबू के रस की भावना देकर १० रत्ती की मात्रा में दिया जाता है। (२) सज्जीखार ५ भाग, यवक्षार ५ भा०, सोंठ ४ भा०, सौंचल नमक ४ भा० एवं छोटी पीपल ३ भा० इनका चूर्ण अजीर्ण एवं शूल आदि में गरम जल के साथ दिया जाता है। (३) अनेक चर्म रोगों में इसके हल्के घोल में अवगाहन कराया जाता है एवं जले हुए भाग पर १०% घोल की पट्टी रखने से पीड़ा शांत होती है। सज्जीखार एवं यवक्षार दोनों को जल में मिलाकर फोड़े पर लगाने से फोड़ा जल्दी फूटकर बैठ जाता है। मात्रा-१-२ र०


हरीतक्यादिवर्गः १६७ नोट-पाश्चात्य चिकित्सा में यवक्षार (पोटैशियम् कार्बोनेट) एवं सज्जीखार (सोडियम् कार्बोनेट) की अपेक्षा आंतरिक प्रयोग के लिये पोटैशियम् बाइकार्बोनेट एवं सोडियम् बाइकार्बोनेट का अधिक प्रयोग किया जाता है क्योंकि ये अधिक सौम्य होते हैं। इनमें भी पोटैशियम् के लवण शरीर में एक निश्चित अनुपात में रहते हैं। जब तक इन्हें अत्यधिक मात्रा में या सिरा द्वारा प्रयोग नहीं करते तब तक इनके प्रभाव में विशेष अंतर दिखलाई नहीं देता। भारतवर्ष के लोणार तालाब की सज्जी में सोडियम् बाइ कार्बोनेट रहता है। ९५ सोरा (सुवर्चिका) सं०-सोरक्षार, सूर्यक्षार, सौवर्चल, वह्नयुत्तेजक, सुवर्चिका, कर्पूर शिलाजतु । हि०-सोरा, कलमी सोरा, सोराखार । बं०-सोरा । गु०-सुरोखार । पं०-कलमीसोर । ता०-पोटिलुप्पु । अ०-अव्कर । फा०-शोरा । अं०-Saltpetre (साल्टपीटर = पहाड़ी नमक); Potassium Nitrate (पोटै- शियम् नाइट्रेट) । ले०-Potassii Nitras (पोटसिआइ नाइट्रास्)। भारतवर्ष में सोरे की जानकारी बहुत दिनों से है। शुक्रनीति एवं रसार्णव में इसे सौवर्चल लिखा है। माधवविरचित आयुर्वेद-प्रकाश में सोरे को 'कर्पूराभं शिलाजतु सोरकाख्यं तु पाण्डुरम्' ऐसा लिखकर अग्निवाण में इसका उपयोग होता है, ऐसा लिखा है। रसपद्धति में 'श्वेतं शिलाजतु वह्न्युत्तेजकं' लिखा है तथा उचित रोगोपयोग भी दिया है। रसरत्नसमुच्चय में भी 'कर्पूर शिला- जतु' नाम से इसका उल्लेख है तथा गुण भी सोरे से मिलते हैं। इसका मारण अथवा सत्त्वपातन नहीं किया जाता' यह निर्देश ध्यान देने योग्य है। और भी अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है। मूल में यह आया है कि 'सुवर्चिकां स्वर्जिकावद् बोद्धव्या गुणतो जनै.' यह बात भ्रमात्मक मालूम होती है। या तो सज्जी का ही कोई भेद होगा जिसके लिए सुवर्चिका शब्द का प्रयोग भावप्रकाशकार ने किया हो या डा० देसाई के कथनानुसार भावप्रकाशकार का कथन गलत हो। इसी प्रकार 'सौवर्चल' शब्द के विषय में भी मतभेद है जिसके संबन्ध में सौवर्चल लवण के अन्तर्गत विवेचन किया गया है। यहां सोरे का वर्णन दिया जा रहा है। प्राचीनकाल में भारतवर्ष से सोरे के निर्यात का व्यापार बहुत थ' लेकिन अंग्रेजों के नियन्त्रण के कारण इसका व्यापार बहुत कम हो गया। यहां उत्तर हिन्दुस्तान, पंजाब, सिंध एवं गङ्गा नदी के बीच के प्रदेश तथा बिहार में यह बहुत उत्पन्न होता है। बिहार में तो यह सबसे अधिक उत्पन्न होता है। वहां पर जमीन पर ओस की तरह जमा हुआ सोरे का पतला स्तर दिखलाई देता है। लकड़ी, गोबर आदि की राख, जानवरों की विष्ठा, मूत्र, कुछ बरसात एवं उष्णता तथा एक प्रकार के कृमि इन सबकी सहायता से सोरा बनता है इसलिए इसे पृथ्वीलवण और कृमिज क्षार ये नाम दिये गये हैं। बरसात के पूर्व गांव के आस पास की भूमि से धूल तक खोदकर उसे जल में मिलाते हैं फिर ऊपर के जल को उबाल कर या सूर्यताप से सुखाकर सोरा निकालते हैं। फिर से अशुद्ध सोरे को साफ किया जाता है। कलमीशोरा काफी शुद्ध रहता है। इसमें ९०% शुद्ध सोरा रहता है। बिहार में सोरा निकालने वाले लोगों को नुनिया कहा जाता है। सोरे के साथ ही साथ उस मिट्टी में खारीनोन एवं खाने का नमक भी होता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक को पंजाब में 'कल्रीनून' या 'निमकशोर' एवं बिहार में 'पकवानिमक' कहा जाता है जिसे कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण माना है। सोरा, सोडियम् नाइट्रेट (Sodium Nitrate) तथा पोटैशियम् क्लोराइड् (Potassium Chloride) के परस्पर संयोग के द्वारा कृत्रिम रूप से भी बनाया जाता है।

१६८ भावप्रकाशनिघण्टुः शोधन-बाजारू सोरे में ४०-६४% शुद्ध सोरा होता है और बाकी नमक रहता है। कलमी- शोरा काफी शुद्ध होता है। शोरे को साफ करने के लिये एक तांबे के पात्र में शोरे के बराबर उबलते जल में उसे घोलते हैं तथा मोटे कपड़े से लकड़ी की थालियों में छानते हैं। जब घोल ठंडा होने लगता है तब उसे लकड़ी से हिलाते जाते हैं जिससे इसका दानेदार चूर्ण प्राप्त होता है। औषध-प्रयोग में लाने से पूर्व इलायची के क्वाथ से इसमें ३ बार भावना देनी चाहिये। अशुद्ध सोरे के प्रयोग से दाह, मूर्च्छा, रक्तपित्त, श्रम, अग्निमान्द्य एवं विड्ग्रह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अशुद्ध के सेवन से उत्पन्न विकारों की शान्ति के लिए ३ माशा कालीमरिच का चूर्ण घृत के साथ ७ दिन तक प्रातःकाल में सेवन करना चाहिये। शुद्ध सोरा रंगहीन दानेदार चूर्ण रूप में या षट्फलक स्फटिक रूप में होता है। इसका स्वाद शीतल एवं कुछ नमकीन होता है। अंगारे पर डालने से एकदम जलने लगता है। इसमें का आक्सीजन अलग होने में समर्थ होने के कारण किसी गंधक आदि ज्वलनशील पदार्थ के साथ इसे मिलाकर गरम करने से एकाएक बहुत तीव्र उष्णता उत्पन्न होती है जिसमें चांदी का सिक्का तक गल जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें पोटैशियम् नाइट्रेट (Potassium nitrate, KNO₃) रहता है। अल्प मात्रा में सोरे में कुछ नाइट्राइट्स (Nitrites) भी पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-यह कटु, तीक्ष्ण, मूत्रविरेचनीय, स्वेदजनन, श्लेष्महर एवं शोथहर है। इसका गाढ़ा घोल आमाशय एवं आंत्र में तीव्र प्रक्षोभ उत्पन्न करता है जिससे रक्तवमन, रक्तातिसार तथा हृदयातिपात होकर मृत्यु भी हो सकती है। हृदय के लिए यह अवसादक होने के कारण हृदय की गति कम होती है तथा उसका बल भी कम हो जाता है। यह रक्त कणों के आक्सीजन ग्रहण करने की शक्ति को घटाता है एवं इससे रक्त जमने की क्रिया भी घट जाती है। इसका मूत्रल प्रभाव वृक्क द्वारा अधिक मूत्र के छनने (Filtration) से होता है तथा अधिकांश मात्रा में यह मूत्र द्वारा उत्सर्गित हो जाता है। इसका उपयोग मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, ज्वर, शोथ, प्लीहावृद्धि, पाण्डु, कामला, प्रमेह एवं अग्नि मांद्य आदि में किया जाता है। (१) मूत्रकृच्छ्र एवं अश्मरी में इसको गोखरू के काढ़े के साथ पिलाते हैं तथा बड़ के पत्तों को पीस कर तथा उसमें सोरा मिला कर पेडू पर लेप करते हैं। (२) पुराने सोजाक में सोरा ५, दालचीनी ४, हर्र ३, पाषाणभेद ३, इलायची ५ एवं चीनी २० भाग, इसका अवलेह ४ माशा की मात्रा में उपयोगी हैं। सोरा ५ रत्ती को मात्रा में भिंडी के क्वाथ के साथ देने से भी सोजाक में लाभ होता है। (३) श्वेत प्रदर (ल्यूकोरिया) में ५ र० सोरा तथा तथा २॥ र० फिटकिरी का चूर्ण दिन में ३ बार दिया जाता है। (४) तमक श्वास के आवेग को रोकने के लिये इसके २०% घोल में सुखाए हुए सोख्ते के कागज को जलाकर उसका धुआँ नाक से सूंघने से आवेग रुक जाता है। (५) ज्वर में मद्य, शर्करा एवं उष्ण जल के साथ १० र० सोरा देने से पसीना हो कर ज्वर कम हो जाता है। (६) वातरक्त (गाउट) एवं मदात्ययजन्य शिरःशूल के निवारण के लिये सोरा १० र० एवं पोटैशियम् बाइकार्बोनेट १५ र० एक बोतल सोडावाटर के साथ पिलाने से आवेग रुक जाता है। आमवात में अर्कमूल के चूर्ण के साथ या मांड के साथ इसको दिया जाता है।

हरीतक्यादिवर्गः १६६ (७) उरस्तोय (प्लूरिसी), सद्रव हृदयावरणशोथ (पेरीकार्डीइटिस) एवं जलोदर आदि में पुनर्नवा, काली कुटकी, सोंठ आदि के क्वाथ के साथ इसका प्रयोग करते हैं। (८) ५ साल से बड़े बच्चों की खांसी में सोरा ५, हीराक्सीस ४, नौसादर ४ एवं गन्धक ४ भाग इनका चूर्ण ३ र० की मात्रा में देते हैं। (९) शिरःशूल, शोथ, आमवातज सन्धिपीडा, मोच एवं चोट आदि पर नवसादर एवं सोरा जल में घोल कर उसमें कपड़ा भिगो कर उसकी पट्टी रखी जाती है। (१०) औषध के अतिरिक्त सोरे का उपयोग बन्दूक की बारूद, तेजाब, रंगने का काम, मांस-मछली-संरक्षण, खाद, कांच के निर्माण में द्रावण के रूप में एवं आतिशबाजी आदि में किया जाता है। अधिक मात्रा से-हृदय को दुर्बलता, आमाशय एवं आंत्र में प्रक्षोभ, वृक्कशोथ एवं वस्ति- शोथ होता है। इन व्याधियों से पीड़ित व्यक्तियों में इसका उपयोग भी नहीं करना चाहिये। हानिनिवारक-कतीरा एवं मधु। मात्रा-२-१० र०

अथ टङ्कणक्षारः (सुहागाखार) तस्य नामगुणानाह सौभाग्यो टङ्कणं क्षारं धातुद्रावकमुच्यते। टङ्कणं वह्निकृद्रूक्षं कफहृद्वातपित्तकृत् ॥ २५६ ॥ सुहागा के नाम तथा गुण-सौभाग्य, टङ्कण, क्षार तथा धातुद्रावक ये नाम संस्कृत में सुहागा के हैं। सुहागा-अग्निकारक, रूक्ष, कफनाक्षक एवं वातपित्तकारक होता है ॥ २५६ ॥ ९६ सुहागा हि०-सुहागा, सोहागा, टिंकाल । बं०-सोहागा । तिब्बत-चूतरले (साधारण ), तरूलेमेटांग (अच्छा), चूसल । म०-टांकणखार । मा०-सोगो । काश्मी०-बवूत । गु०-खडियाखार,टंकणखार । क०-बिलिगार । पं०-सुहागा । ता०-वेंगा(का)रं । ते०-एलिंगारम्, वेल्लिगारं । फा०-त(ति)न्कार । अ०-बोरक । अं०-Borax (बोरेक्स ); Sodium Borate ( सोडियम् बोरेट ); Biborate of Soda (बाइबोरेट ऑफ सोडा) । ले०-Sodii Biboras ( सोडिआई बाइबोरास )। सुहागा एक प्रसिद्ध खनिज द्रव्य है। भारतवर्ष में इसकी जानकारी बहुत प्राचीन काल से रही है कि लेकिन युरोप वालों को १७ वीं शताब्दी के अन्त तक इसकी अधिक जानकारी नहीं थी। सर्वप्रथम दक्षिण भारत से युरोप में इसका प्रचार हुआ । यह स्वाभाविक एवं कृत्रिम ( रासायनिक विधि द्वारा बनाया ) दो प्रकार का होता है। चूना, गोदन्ती एवं नमक आदि पदार्थों के साथ तथा स्वतन्त्र रूप में यह प्राप्त होता है। हिमालय की पर्वतश्रेणियां, काश्मीर, लद्दाख एवं विशेष रूप से तिब्बत इसके उत्पत्ति-स्थान हैं । तिब्बत से आने वाले चौकोर स्फटिक होते हैं। इन्हें चौकिया सोहागा कहा जाता है जिसका औषधि के लिये व्यवहार करते हैं। इसी को संभवतः आयुर्वेद- प्रकाश में 'नीलकण्ठ' कहा गया है जिसमें नीली आभा रहती है। इन पर मिट्टी लगी रहती है। अंगुली से रगड़कर मिट्टी हटाने पर तेलिया स्पर्श मालूम होता है। खुली हवा में टंकण का जलीयांश निकल जाता है जिससे उसके ऊपर सफेद बुरादा जम जाता है। इसलिये इस पर घी या चर्बी लगा देते हैं। शुद्ध टङ्कण स्फटिक सदृश, वर्णरहित, पारभासक, चमकीला, गन्धहीन, स्वाद में कुछ नमकीन एवं कसैला तथा अल्पक्षारीय होता है। इससे गरम करने पर इसका जलीयांश निकल जाता है

यहाँ दोनों पृष्ठों का सम्पूर्ण पाठ दिया गया है:


[पृष्ठ १७८]

१७८ भावप्रकाशनिघण्टुः और यह फूलकर छिद्रयुक्त ढेला सा हो जाता है। यही इसकी शोधन की विधि भी है क्योंकि इस पर जो चर्बी आदि लगी रहती है वह गरम करने से जल जाती है। अशुद्ध सुहागे के सेवन से चर्बी आदि के कारण वांति और भ्रम आदि उत्पन्न होते हैं। औषध के अतिरिक्त मिट्टी के बर्तनों पर चमक लाने में, मीना बनाने में, बनावटी रत्नों के निर्माण, वार्निश रंग के काम, धातुओं के शोधन एवं द्रावण आदि के लिये इसका उपयोग किया जाता है। **रासायनिक संगठन—**यह सोडियम तथा बोरिक् एसिड के संयोग से बनता है। इसका रासायनिक सूत्र $Na_2 B_4 O_7, 10 H_2 O$ है। **गुण और प्रयोग—**टङ्कण, उष्ण, रूक्ष, कफहर, दीपन, हृद्य, आध्मानहर, विषदोषहर, आर्तव- प्रवर्तक एवं व्रणरोपक है। इसका उपयोग अम्लपित्त, आध्मान, कफज्वर, प्लीहावृद्धि, रक्तप्रदर, अनार्तव, कष्टार्तव, प्रसव के समय आविवृद्धि के लिये तथा इसके सौम्य प्रतिदूषक होने के कारण बाह्य प्रयोग के लिये किया जाता है। (१) बच्चों के कफयुक्त ज्वर, कास विशेषकर गले की खराबी से उत्पन्न होने पर, दुर्गन्धयुक्त अतिसार, अपस्मार तथा आक्षेप आदि में इसका प्रयोग किया जाता है। परिश्रुत जल में बनाया हुआ इसका १० प्रतिशत का घोल सिरा द्वारा सूचीवेध से देने पर अपस्मार में बहुत लाभकर होता है। (२) इसका मूत्र के द्वारा शीघ्र उत्सर्ग होने के कारण जल तथा यूरिया का अधिक उत्सर्ग होता है। यह मूत्र को क्षारीय करता है तथा इसी प्रतिक्रिया में मूत्र जननेन्द्रिय संस्थान के लिये अच्छा प्रतिदूषक है। इसके प्रयोग से दूषित मूत्र साफ हो जाता है। (३) सौम्य प्रतिदूषक (Antiseptic) होने के कारण इसका बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। प्रक्षोभकारक न होने के कारण कोमल श्लेष्मलकला के उपसर्गों में लाभदायक है। क्षत, व्रण, खुजली, विचर्चिका, दाद, जले हुये व्रण आदि के लिये व्रणप्रक्षालन एवं मलहम के रूप में इसका उपयोग किया जाता है। श्वेतप्रदर, सोजाक, दुर्गन्धयुक्त नासास्राव एवं कर्णस्राव आदि में इसके २३% घोल को पिचकारी के द्वारा प्रयोग करते हैं। नेत्राभिष्यन्द में फिटकिरी के साथ इसके घोल से अक्षिप्रक्षालन किया जाता है। दाह एवं शोथयुक्त मुखपाक में मधु के साथ इसकी लेप किया जाता है तथा पारदविषजन्य लालास्राव तथा अन्य मुखविकारों में इसके घोल का उपयोग कुल्ला करने के लिये किया जाता है। स्वरभङ्ग में इसकी टिकिया मुख में रखकर चूसने से लाभ होता है। बोल के साथ इसका उपयोग मसूढ़ों के व्रणों पर लाभदायक है। २ छ० जल में ४ माशा सुहागा डालकर उससे प्रक्षालन से योनि एवं गुदकंडू दूर होती है। उष्ण जल में इसके घोल में मोजे तर कर उसका उपयोग करने से पैरों के पसीने की दुर्गन्ध दूर होती है। अम्भौरी आदि में इससे युक्त पाउडर का उपयोग किया जाता है। **मात्रा—**२-८ र०। **नोट—**टङ्कण एवं गन्धक के तेजाब के संयोग से बोरिक् एसिड (Boric acid) बनता है जिसके गुण-धर्म एवं प्रयोग सब टङ्कण के समान ही हैं किन्तु यह कुछ अम्ल है। अन्नसंरक्षण (Food preservation) में पहले इसका बहुत प्रयोग किया जाता था लेकिन इसके विषैले परिणाम दृष्टिगोचर होने के कारण इस कार्य में अब इसका प्रयोग नहीं किया जाता। अधिक मात्रा में इनके प्रयोग से अग्निमान्द्य, वमन, विरेचन, मांसपेशी-दुर्बलता, मूत्र में ॲल्ब्यूमिन् एवं अत्यन्त थकावट आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। अधिक दिन तक बाह्य या आभ्यन्तर


[पृष्ठ १७९]

हरीतक्यादिवर्गः १७९ प्रयोग से बालों का झड़ना, विचर्चिका, गजचर्म, त्वक्शोफ, त्वक्शोथ, मुख में प्रक्षोभ, मसूढ़ों पर एक धूसर रेखा तथा अन्य चर्मविकार आदि होते हैं। वृक्क रोगियों में विषैले परिणाम की अधिक सम्भावना रहती है।

अथ क्षारद्वयं क्षारत्रयं क्षाराष्टकं च तेषां लक्षणानि गुणांश्चाह

स्वर्जिका यावशूकश्च क्षारद्वयमुदाहृतम् । टङ्कणेन युतं तच्च क्षारत्रयमुदीरितम् ॥ २५७ ॥ मिलितं तूक्तगुणकृद्विशेषाद्गुल्महृत्परम् । पलाशवज्रिशिखरिचिञ्चाऽर्कतिलनालजाः ॥ २५८ ॥ यवजः स्वर्जिका चेति क्षाराष्टकमुदाहृतम् । क्षारा एतेऽग्निना तुल्या गुल्मशूलहरा भृशम् ॥ २५९ ॥

क्षारद्वय, क्षारत्रय, तथा क्षाराष्टक का वर्णन और गुण— **क्षारद्वय—**सज्जी तथा जवाखार को क्षारद्वय कहते हैं। **क्षारत्रय—**क्षारद्वय (सज्जी तथा जवाखार) में यदि सुहागा मिला दिया जाय तो उसे क्षारत्रय कहते हैं। इन तीनों प्रकार के क्षारों के जो गुण ऊपर पृथक् पृथक् कह आये हैं वे ही सब एकत्र मिल जाने पर भी उपर्युक्त गुणवाले होते हैं किन्तु विशेषरूप से गुल्म दूर करने में उत्तम होते हैं। पलाशक्षार, सेहुँडक्षार, चिचिड़ाक्षार, इमलीक्षार, मदारक्षार, तिलनालका क्षार, जवाखार तथा सज्जी इन सब क्षारों के योग को क्षाराष्टक कहते हैं। ये सब क्षार अग्नि के तुल्य हैं तथा गुल्म एवं शूल के नाश करने में उत्तम होते हैं ॥ २५७-२५९ ॥

९७ क्षारद्वय-क्षारत्रय-क्षाराष्टक

**क्षार बनाने की क्रिया:—**क्षार बनाने के लिये बड़े वृक्ष की छाल और गुल्म तथा क्षुप जाति की वनस्पति का पञ्चांग लेना चाहिये। इष्ट पदार्थ को जला कर उसकी सफेद भस्म (राख) संग्रहकर किसी मिट्टी के पात्र में रख उसमें चौगुना जल छोड़ भली प्रकार घोलकर एक सुरक्षित स्थान में रख दें। कुछ लोग राख को जल में डालकर कुछ देर उबालते हैं जिससे उसमें के क्षार आसानी से जल में घुल जाते हैं। दो-एक दिन के बाद ऊपर का जल नितार लें अथवा फिल्टर से छान लें। नीचे जमे हुए पदार्थ में फिर से चौगुना जल डालकर, उबालकर फिर ऊपर का जल नितार लें। फिर दोनों नितारे हुए जल को कड़ाही में छोड़ अग्नि पर चढ़ाकर जल औटावें। सूख जाने पर पात्र के पेंदे में जमा हुआ पदार्थ खुरचकर निकाल सुरक्षित रखें। उपर्युक्त विधि से जो क्षार तैयार होता है वह मृदुक्षार कहलाता है। इसमें प्रायः कुछ पदार्थों के साथ साथ सोडियम् एवं पोटैशियम् तत्वों के कार्बोनेट लवण हुआ करते हैं। यदि क्षारयुक्त जल को औटाते समय पूरी तरह न औटाकर आधा औटाने के बाद उस द्रव में चूना और शंखनाभि आदि पदार्थों की कुछ भस्म मूल राखी की चौथाई मात्रा में डालकर और थोड़ा उबालकर तथा छानकर प्राप्त द्रव को पूरी तरह औटावें तो तीक्ष्णक्षार प्राप्त होता है। इसमें थोड़ी बहुत मात्रा में प्रायः सोडियम् और पोटैशियम् तत्वों के हाइड्रोक्साइड्स रहते हैं जो अत्यन्त दाहक होते हैं। दाहजनक होने के कारण ही उन्हें तीक्ष्णक्षार (Caustic alkalies) कहा जाता है।

द्वितीयो हरीतक्यादिवर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

१७२ भावप्रकाशनिघण्टुः अथ चुक्रम् ( चूक )। तन्नामगुणानाह चुक सहस्रवेधि स्वादम्लं शुक्तमित्यपि। चुक्रमत्यम्लमुष्णञ्च दीपनं पाचनं परम् ॥ २६० ॥ शूलगुल्मविबन्धामवातरलेष्महरं सरम्। वमितृष्णाऽऽस्यवैरस्यहृत्पीडावह्रिमान्द्यहृत् ॥ २६१॥ इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे मिश्रप्रकरणे द्वितीयो हरीतक्यादिवर्गः समाप्तः ॥ २ ॥

चूक के नाम तथा गुण-चुक, सहस्रवेधि, रसाम्ल तथा शुक्त ये सब चूक के संस्कृत नाम हैं। चूक-अत्यन्त खट्टा, उष्णवीर्य, अग्निदीपक तथा अत्यन्त पाचक होता है और यह शूल, गुल्म, विबन्ध, आमवात तथा कफ का नाशक और दस्तावर होता है तथा वमन, प्यास, मुख की विरसता, हृदय की पीड़ा एवम् अग्नि की मन्दता को दूर करता है ॥ २६०-२६१ ॥

९८ चूक हि०-चूक, चूका। मा०-चूका। गु०-चुका। चूक-काले रङ्ग का एक तरल पदार्थ अत्यन्त खट्टा होता है। खट्टा अनार, नीबू, इमली, आमला इत्यादि कितने ही खट्टे पदार्थों के रस से चूक बनाया जाता है। इन में अनार का बना हुआ चूक अच्छा समझा जाता है। चुक नाम से श्वेत, पारदर्शक स्फटिक भी मिलते हैं। जो खट्टे होते हैं। यूनानी वाले कहते हैं कि चूक एक पहाड़ी फल का स्वरस है जिसको पहाड़ी मनुष्य लाते हैं। आगे शाकवर्ग में भी एक चुक्रिक नामक शाक का वर्णन आया है।

अथ कर्पूरादिवर्गः अथ कर्पूरम् । तस्य नामानि गुणांश्चाह पुंसि क्लीबे च कर्पूरः सिताभ्रो हिमवालुकः। घनसारश्चन्द्रसंज्ञो हिमनामाऽपि स स्मृतः॥ कर्पूरः शीतलो वृष्यश्चक्षुष्यो लेखनो लघुः । सुरभिर्मधुरस्तिक्तः कफपित्तविषापहः ॥ २ ॥ दाहतृष्णाऽऽस्यवैरस्यमेदोदौर्गन्ध्यनाशनः । कर्पूरो द्विविधः प्रोक्तः पक्वापक्वप्रभेदतः। पक्वात्कर्पूरतः प्राहुरपक्वं गुणवत्तरम् ॥ ३ ॥

अब कर्पूरादिवर्ग आरम्भ होता है, उसमें प्रथम कर्पूर के नाम तथा गुण-कर्पूर (यह पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसकलिंग में होता है), सिताभ्र, हिमवालुक, घनसार, चन्द्रसंज्ञ (चन्द्रमा के जितने नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) और हिमनामा (जितने हिम के नाम हैं वे सभी इसके पर्यायवाची शब्द हैं) ये सब कपूर के संस्कृत नाम हैं। कपूर-शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक), नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, लघु, सुगन्धयुक्त, मधुर तथा तिक्त रस युक्त एवम्-कफ, पित्त, विष, दाह, प्यास, मुख की विरसता, मेदरोग तथा दुर्गन्ध को नष्ट करने वाला होता है। पक्व तथा अपक्व इन भेदों से कपूर दो प्रकार का होता है। पक्व की अपेक्षा अपक्व कपूर अधिक गुणकारी होता है ऐसा वैद्य लोग कहते हैं ॥ १-३ ॥

१ कपूर हि०-कपूर, भीमसेनी कपूर, बरास कपूर। बं०-कर्पूर। मा०-कापूर। म०-कापूर। गु०- कपूर। ते०, ता०-कर्पूरम्। फा०-कापूर। अ०-काफूर। यू०-रियाही काफूर। अं०-Camphor (कॅम्फर); Borneo Camphor (बोर्निओ कॅम्फर)। ले०-Camphora (कॅम्फोरा)। कपूर-यह एक उड़नशील जमा हुआ श्वेत तैलीय पदार्थ है। यह ४ प्रकार का होता है। (१) भीमसेनी या बरास कपूर, (२) चीनी या जापानी कपूर, (३) पत्री या नागी कपूर, ब्ल्यूमिया कॅम्फर (Blumea Camphor), (४) रासायनिक विधि द्वारा निर्मित कृत्रिम (Synthetic-सिंथेटिक्) कपूर ।

(१) भीमसेनी कपूर-इसके बहुत बड़े वृक्ष बोर्निओ तथा सुमात्रा में होते हैं। इसे ले०- Dryobalanops camphora Colebr.; Fam. Dipterocarpaceae (ड्रायोबॅलेनॉप्स कॅम्फोरा कोले- डिप्टेरोकार्पेसी) कहते हैं जो भारतीय साल से मिलता-जुलता है। इसके वृक्ष भारतवर्ष में नहीं पाये जाते। इधर कुछ वृक्षों को लगाने का प्रयत्न किया गया है। औषध में बहुत प्राचीन काल से कपूर नाम से इसका व्यवहार किया जाता है। प्राचीनों ने कर्पूर का अपक्व भेद जो कहा है वह सम्भवतः यही है क्योंकि यह, वृक्ष में जहां पोल हो अथवा चीरे पड़े हों, वहां जमा हुआ ही प्राप्त होता है। इसको चीनी कपूर की तरह पकाकर बनाना नहीं पड़ता। इस वृक्ष से एक तरल द्रव्य भी प्राप्त होता है जिसे कर्पूर तैल (Camphor oil of Borneo) कहा जाता है। यह कपूर चीनी कपूर की अपेक्षा भारी होने के कारण जल में डूब जाता है। यह हवा की उष्णता से उड़ता नहीं। इसे बोतलों में रखने पर इसके कण बोतल पर जमा नहीं होते। यह

१७४ भावप्रकाशनिघण्टुः चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक उष्णता से जलता है। इसमें कपूर के अतिरिक्त कुछ अम्बर आदि की मिश्रित गन्ध आती है। इसके छोटे, बड़े, गोल स्फटिक होते हैं जो सफेद, चमकीले, चिकने, कुछ कड़े, चूर्ण करने में चीनी कपूर की अपेक्षा देर में चूर्ण होने वाले एवं वायु से आर्द्रता को न सोखने वाले होते हैं। यह कपूर बहुत महंगा होता है। इसका रासायनिक संगठन C10H18O1 है। इसके गुण एवं प्रयोग आदि सब चीनी कपूर के समान ही हैं लेकिन यह त्वचा की रक्तवाहिनियों का अधिक विस्तार करता है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा बाह्य प्रयोग में कम दाहजनक है। यह मस्तिष्क के लिये अधिक अवसादक है तथा चीनी कपूर की अपेक्षा अधिक मात्रा में दिया जा सकता है। इसके गुणधर्मों का वर्णन आगे चीनी कपूर के साथ ही दिया गया है। भीमसेनी कपूर के अभाव में निम्न विधि से बनाये हुये कपूर का व्यवहार किया जाता है। दूब, शीतल मिरच इलायची और जो हरड़ इनको समान मात्रा में पीसकर एक बटलोई में बिछा दें और उस पर कपूर के छोटे छोटे टुकड़े पानी में भिगो कर रख दें तथा कुछ घी भी डाल दें। उस बटलोई पर केले का पत्ता ढांक कर उस पर एक दूसरा पीतल का कटोरा रख दें। इस कटोरे में थोड़ा जल डाल दें। फिर बटलोई को जलयुक्त पात्र में रखकर मन्द आंच पर गरम करें। ऊपर के कटोरे का पानी गरम होने पर उसे निकाल कर ठण्डा पानी डालते रहें। जब सब कपूर उड़कर ऊपर जम जाय तब उसे निकालकर व्यवहार करें। (२) चीनी या जापानी कपूर—यह तमाल जाति के वृक्षों से बनाया जाता है। इसका विशेष वर्णन आगे किया गया है। (३) पत्री या नाणी कपूर—वस्तुतः भारतीय कपूर यही है। यद्यपि इसके क्षुप भारतवर्ष में बहुत होते हैं जिनसे बहुत कपूर निकाला जा सकता है तथापि अपने यहां इससे कपूर नहीं निकाला जाता। भारत में जितना भी कपूर आवश्यक होता है वह विदेशों से ही आता है। पत्री कपूर कुकरौंधा जाति के क्षुपों से प्राप्त होता है। इस क्षुप के कई भेद हैं जिनमें ये प्रधान हैं— Blumea balsamifera, DC., B. lacera, DC., B. densiflora, B. DC., malcolmii Hook. f. (ब्ल्यूमिया बालसमीफेरा, ब्यू. लैसेरा, ब्यू. डेन्सिफ्लोरा, ब्यू. मालकोल्माइ । यह Compositae (काम्पोजिटी) वर्ग के क्षुप हैं। यह हिमालय में नेपाल से सिक्किम तक तथा दक्षिणी पठार के पश्चिमी भाग में १७००-२५०० फीट तक पाये जाते हैं। ब्यू. डेन्सिफ्लोरा का छोटा क्षुप आसाम, खासिया पहाड़, चटगांव एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। ब्यू. बाल- समीफेरा के क्षुप बर्मा में इतने अधिक उत्पन्न होते हैं कि वह आधे संसार की कपूर की पूर्ति कर सकता है। ब्ल्यूमिया के अतिरिक्त तुलसी की जाति में ऑसिमम् किलिमॅण्डसुचेरिकम् (Oci- mum kilimandscharicum) तथा 'कर्पूर' (बं.) (Limnophila gratioloides R. Br. लिम्नोफाइला ग्रैटियोलाइड्रीस्) आदि अन्य अनेक वनस्पतियों में कपूर की गन्ध आती है जिनसे कपूर प्राप्त किया जा सकता है। पत्री कपूर का रासायनिक संगठन भीमसेनी कपूर से मिलता- जुलता है। (४) कृत्रिम कपूर—भारतवर्ष में यद्यपि ब्ल्यूमिया से काफी कपूर निकाला जा सकता है तथापि अब रासायनिक विधि द्वारा कृत्रिम कपूर बनाया जाने लगा है जो वृक्षों से प्राप्त कपूर से सस्ता होता है। औषध की अपेक्षा कपूर का अन्य सेल्यूलाइड आदि बनाने में बहुत उपयोग होता है। नोट - राजनिघण्डु में रस, गुण, वीर्य के अनुसार कपूर के पोतास, भीमसेन, शीतकर, शंकरावास, प्रांशु, पिंज, अब्दसार हिमधुता, बालुका, जूटिका, तुषार, हिम, शीतल एवं पक्विका (पिचका) ये १४ भेद लिखे हुये हैं। फिर शिर, मध्य और तल, इन भेदों से तीन प्रकार का कर्पूरादिवर्गः १७५ माना है। स्तम्भ के अग्रभाग में होने वाला कपूर शिरसंज्ञक, मध्य में—मध्यम और पत्तों के तले होने वाला तलसंज्ञक है। प्रकाशवान्, स्वच्छ और फूला हुआ शिर; सामान्य फूला हुआ और स्वच्छ मध्यम और तल में होने वाला चूर्णवत् कुछ पीला सा होता है। अन्य प्रकार से— स्तम्भ के गर्भ में स्थित कपूर उत्तम; स्तम्भ के बाहर होने वाला मध्यम जो निर्मल, कुछ पीलापन युक्त एवं चमकीला होता है; तथा कड़ा, सफेद, रूखा और फूला हुआ बाह्य कपूर कहलाता है। आगे खाने योग्य कपूर के ये लक्षण दिये हैं—साफ, भंगरह्या के पत्तों के समान छोटे २ टुकड़ों वाला, बहुत हलका, बिल्कुल सफेद, स्वाद में तिक्त रस वाला, शीतल, हृदय को प्रिय, घन, आह्लादकारक सुगन्ध युक्त, स्नेहहीन, कड़े परतों से युक्त तथा चमकीला कपूर राजयोग्य होता है और अन्य प्रकार के कपूर के खाने से व्रण एवं स्फोट आदि उत्पन्न होते हैं। इन्होंने 'चीनक' नाम से एक अन्य कृत्रिम भेद भी माना है। धन्वन्तरि निघण्डु में कपूर के भेद नहीं लिखे हुए हैं। कपूर का चरक में देशेमानि में उल्लेख नहीं है लेकिन सू. अ. ५ में 'घ्राणोध्यास्तेष्वेव वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता।'•••••'तथा कर्पूर- निर्यास'•••••••••' ऐसा उल्लेख है। सुश्रुत सू. अ. ४५ में तिक्त, सुगन्धि, शीतल, लघु, लेखन आदि इसके गुण लिखे हैं एवं तृष्णा, मुखशोष तथा अरुचि आदि में उपयोगी लिखा है। अष्टांगसंग्रह (वृद्धवाग्भट) में लिखा है—'रुचिवैशद्यसौगन्ध्यमिच्छन् वस्त्रेण धारयेत् । जातीलवंग कर्पूर—'। चक्रदत्त, वृन्द आदि ने कास, श्वास, प्रमेह एवं ग्रहणी की चिकित्सा में कपूर का उपयोग नहीं लिखा है लेकिन रसचिकित्सा वालों ने इसका प्रयोग उपर्युक्त रोगों में किया है। अथ चीनाककर्पूरः [ चिनिया ] । तस्य नामानि गुणांश्चाह चीनाकसंज्ञः कर्पूरः कफघ्नस्करः स्मृतः । कुष्ठकण्डूवमिहरस्तथा तिक्तरसश्च सः ॥ ४ ॥ चीनिया कपूर के गुण—चीनिया कपूर को संस्कृत में चीनक कपूर कहते हैं। यह—कफ को नष्ट करने वाला तथा कुष्ठ, खुजली और वमन को भी दूर करने वाला एवम् तिक्त रस से युक्त होता है ॥ ४ ॥ २ चीनिया कपूर हि०-चीनिया कपूर, चीनी कपूर, जापानी कपूर, फारमोसा कपूर । बं०-चीनेर कर्पूर । म०-चीनी कापूर । गु०-चिनाई कपूर । यू०-कैसूरी कपूर । ले०-Cinnamomum camphora Nees & Eberm. (सिर्नमोमम् कॅम्फोरा नीज, एब. ) । Fam. Lauraceae (लॉरेंसी) । इसके वृक्ष कोचीन चाइना से लेकर शंघाई तक तथा हैनाम से दक्षिणी जापान तक पाये जाते हैं। भारत में देहरादून, कुल्लुकंगड़ा, मैसूर एवं नीलगिरी पर्वत आदि स्थानों में इसके वृक्षों को लगाया गया है। दक्षिण की जलवायु इसके लिये अधिक उपयुक्त है लेकिन भारत में लगाये वृक्षों में कपूर कम निकलता है। इसका वृक्ष देखने में सुन्दर, ऊँचा तथा सदाहरित होता है। पत्ते-अण्डाकार, चिकने, चमकीले, नोक की ओर संकुचित, २ से ४ इञ्च लम्बे, एकान्तर एवं पीताभ हरित होते हैं। छाल- यह बाहर से खुरदरी और अन्दर से चिकनी होती है। फूल-छोटे-छोटे पीताभ श्वेत या रक्ताभ-

१७६ भावप्रकाशनिघण्टुः

श्वेत बौर के समान आते हैं। फल-गहरे हरे रंग के मटर के समान तथा गुच्छों में आते हैं। बीज-छोटे तथा कपूर की गन्धयुक्त होते हैं। इस वृक्ष के सभी भागों में विशेष कोशायें होती हैं जिनमें कपूर बनता है। कपूर निकालने के लिये इसकी लकड़ी को टुकड़े-टुकड़े करके भपके के द्वारा गरम करते हैं जिससे लकड़ी में का कपूर उड़कर ऊपर जम जाता है। उस कपूर को फिर से ऊर्ध्वपातन विधि द्वारा शुद्ध कर लिया जाता है। प्राचीनों ने कपूर का जो पक्व भेद कहा है वह यही है क्योंकि इसे लकड़ी को पकाकर निकालते हैं। इसके पत्तों से भी कुछ कपूर प्राप्त होता है।

यह कपूर रंगहीन, सफेद या पारदर्शक, स्फटिकों में, बेडौल डलियों में, चौकोर टिकियों में तथा चूर्णरूप में होता है। यह जल पर तैरता है तथा इसका विशिष्ट गुरुत्व ०.९९५ है। इसकी गन्ध तीक्ष्ण एवं विशिष्ट प्रकार की होती है तथा स्वाद कडुवा एवं तीता होता है। एवं बाद में ठंडक मालूम होती है। यह जलाने से तुरत जलता है तथा हवा की उष्णता से धीरे-धीरे उड़ जाता है। इसका १ भाग ७०० भाग जल में, १ भाग मद्यसार (९०%) में, ४ भाग तैल में, १/३ भाग क्लोरोफॉर्म में घुलता है तथा ईथर में यह बहुत घुलता है। अजवाइन का सत्त्व या पेपरमिंट के साथ इसको मिलाने से पतला द्रव बनता है। भीमसेनी कपूर से इसका भेद पीछे लिखा गया है।

रासायनिक संगठन—यह एक प्रकार का घन उड़नशील तैल (स्टियरॉप्टेनस-Stearoptenes) है। इसका रासायनिक सूत्र $C_{10}H_{16}O$ है। ऊर्ध्वपातन द्वारा कपूर के अतिरिक्त एक तैल भी पाया जाता है।

गुण और प्रयोग—कपूर वातहर, दीपन, कफघ्न, कासहर, ज्वरघ्न, स्वेदजनन, कामोत्तेजक (अल्पमात्रा में), कामवासना कम करने वाला (अधिक मात्रा में), स्तन्यनाशन तथा मस्तिष्क, हृदय एवं श्वसन के लिये उत्तेजक, उद्वेष्टन-निरोधी, सौम्य-प्रतिदूषक, स्थानिक त्वग्‌रागकारक (प्रारंभ में), स्वापजनन (बाद में), शोथहर तथा वेदनाहर है। अधिक मात्रा में यह दाहजनक एवं मादक विष है।

(१) यह आमाशय में पहुँच कर वहां रक्ताभिसरण क्रिया की वृद्धि करता है जिससे पाचक रसों की वृद्धि होती है तथा वायु का अनुलोमन होता है। इसके कारण अतिसार, उष्णकालीन अतिसार, वमन, विसूचिका की प्रारंभिक अवस्था, आध्मान, शूल एवं भूतोन्माद के कारण उत्पन्न वमन आदि में इससे बहुत लाभ होता है। विसूचिका के प्रारम्भ में कर्पूरासव (भै० र०) बताशे के साथ बार बार देने से लाभ होता है। कपूर, अजवाइन का सत्त्व तथा पेपरमिंट तीनों समान मात्रा में मिलाकर उस द्रव को १-२ बूंद बताशे में रख कर देने से भी उपर्युक्त विकारों में लाभ होता है। कर्पूररस (भै० र०) अतिसार, प्रवाहिका एवं संग्रहणी में दस्त कम करने के लिये दिया जाता है। बच्चों के आध्मान एवं शूल में कर्पूराम्बु का उपयोग एवं बड़ों में कर्पूरासव का उपयोग लाभदायक है।

(२) इसके सेवन से त्वचा की रक्तवाहिनियों का विस्फार होता है तथा पसीना अधिक होता है जिससे ज्वर में यह ताप को कम करता है। मसूरिका, रोमान्तिका, आन्त्रिकज्वर एवं ग्रन्थिज्वर आदि में कर्पूराम्बु का उपयोग १-२ औंस की मात्रा में किया जाता है जिससे हृदय को बल मिलता है एवं ताप भी कम हो जाता है। कर्पूराम्बु बनाने के लिये कपूर को महीन कपड़े में बांधकर जल में डुबोते हैं तथा बाद में उस जल का प्रयोग करते हैं।

(३) श्वसन, हृदय तथा रक्ताभिसरण के लिये कपूर उत्तेजक माना जाता है। स्वस्थ हृदय की अपेक्षा दुर्बल, अवसादित तथा अनियमित गति युक्त हृदय पर इसका प्रभाव अधिक होता है।


कर्पूरादिवर्गः १७७

इसका प्रभाव प्रत्यक्षतया हृदय के ऊपर तथा श्वसन के उत्तेजित होने से अप्रत्यक्षतया होता है। ज्वर, फुफ्फुसपाक एवं सन्निपात आदि में यदि हृदय की दुर्बलता से नाड़ी दुर्बल हो जाय, हृदयातिपात के लक्षण हों तो कर्पूरहिङ्गुवटिका ४-४ घंटे पर या १ भाग कपूर आठ भाग दूध में घोंट कर ३ चम्मच ४-४ घंटे पर देने से लाभ होता है। कर्पूरहिङ्गुवटिका बनाने के लिये १ भाग कपूर, १ भाग हींग तथा थोड़ा सा मधु एक साथ घोंटकर २ र० की गोली बनावें तथा आर्द्रक रस के साथ खिलावें। रोगी गोली निगलने में असमर्थ होने पर आर्द्रक रस में घोंट कर आवश्यक होने पर ३ र० कस्तूरी मिलाकर चटावें। कर्पूर का तैलीय सूचिकाभरण हृदय एवं श्वसन को उत्तेजित करने के लिये प्रयोग किया जाता है।

(४) अवसादक तथा नशीली औषधियों के दुष्परिणाम से जब श्वसन क्रिया अवसादित होती है तब कपूर के प्रयोग से उत्तेजना आकर श्वास की गति तथा उसकी गहराई बढ़ती है। कुकास, तमकश्वास एवं जीर्ण श्वसनिकाशोथ आदि कफविकारों में इसके प्रयोग से श्लेष्मलकला का रक्तप्रवाह बढ़कर कफ पतला होकर निकलने लगता है। तमकश्वास में कर्पूरहिङ्गुवटिका ४-४ घंटे पर जब तक दमे का जोर रहता है, देते हैं। प्रतिश्याय में कर्पूरासव या समान मात्रा में कपूर एवं मद्यसार को मिलाकर ५ बूंद की मात्रा में दिया जाता है एवं कपूर को सुंघाया भी जाता है।

(५) यह मस्तिष्क को उत्तेजित करता है जिससे प्रारंभ में संपूर्ण शरीर में उत्तेजना, चक्कर, विचारों में असंगति, गति में असहयोग तथा विषैली मात्रा में आक्षेप एवं बेहोशी आदि लक्षण होते हैं। किसी-किसी में हँसने-नाचने की प्रवृत्ति होती है तो किसी में तन्द्रा आती है। वातिक हृदय की धड़कन, कम्पवात, अपस्मार, योषापस्मार एवं उन्माद आदि में कपूर को थोड़े से मद्यसार के साथ घोंट कर गोली बनाकर १-२ र० की मात्रा में ३-४ वार देते हैं।

(६) अत्यधिक कामोत्तेजना, सुजाक से उत्पन्न पीडायुक्त शिश्नोत्थान एवं वीर्यपात आदि में कपूर का अधिक मात्रा में उपयोग किया जाता है। वीर्यपात में सोते समय २ र० कपूर की गोली खुरासानी अजवाइन के साथ खिलाते हैं। स्त्रियों में अत्यधिक कामवासना, जननेन्द्रिय-कण्डू, गर्भाशय पीडा एवं कष्टार्त्तव में १ से २ र० कपूर दिन में २ बार खिलाते हैं। स्त्रियों में दुग्ध कम करने के लिये इसको खिलाते हैं तथा स्तनों पर इसका लेप करते हैं।

(७) कपूर का स्थानिक एवं बाह्य प्रयोग बहुत किया जाता है। इससे स्थानिक रक्तवाहिनियों की उत्तेजना से उष्णता एवं रक्तिमा उत्पन्न होती है। प्रारम्भ में इससे सांवेदनिक वातनाडियां उत्तेजित होती हैं लेकिन बाद में अवसादित होने के कारण शीतलता का अनुभव होता है तथा पीडा दूर होती है। इसका प्रतिदूषक गुण बहुत अच्छा है। यह त्वग्‌रागकारक एवं प्रतिशोभक होने के कारण ४ गुने तेल में मिला कर जीर्ण आमवात, मोच, मरोड़, चोट, मांसपेशियों में ऐंठन होने से उत्पन्न पीडा, कटिशूल, पार्श्वशूल एवं जीर्ण कास, बच्चों की खांसी, फुफ्फुसपाक एवं फुफ्फुसावरणशोथ आदि में इसकी मालिश की जाती है। जननेन्द्रिय कण्डू एवं विचर्चिका में जसद् भस्म एवं कपूर तैल में मिलाकर लगाते हैं। दांत में गढ़ा होने के कारण दर्द होता हो तो कपूर का मद्यसार में घोल बनाकर उसका फाहा गढ़े में रखते हैं। मुखदौर्गन्धि में स्वल्प खदिरवटिका (भै० र०) अथवा कपूर, कवावचीनी एवं टंकणक्षार की गोली मुख में रखने से लाभ होता है। दन्तमंजनों में कपूर का उपयोग किया जाता है। जीर्ण व्रणों में तथा कण्डू में इसका अवचूर्णन किया जाता है।

विषैला प्रभाव—अत्यधिक मात्रा में कपूर के सेवन से आमाशयोर्ध्व भाग में पीडा, हलास, कभी-कभी वमन, चक्कर, दृष्टिमन्ध्य, प्रलाप, उन्माद, अपस्मार के समान आक्षेप, श्यावता, अंगघात, शीतलप्रस्वेद, मूत्रकृच्छ्र, संन्यास एवं मृत्यु होती है।

१२ भा० नि०

१७८ भावप्रकाशनिघण्टुः विष चिकित्सा—वामक द्रव्यों का प्रयोग एवं शीत तथा उष्ण निरूहण बस्ति का क्रम से बारंबार प्रयोग तथा प्रतिक्षोभक, विरेचक एवं उत्तेजक औषधियों का प्रयोग करना चाहिये । कुपीलु सत्व का सूचिकाभरण आवश्यकतानुसार किया जाता है। मद्यसार एवं तैलीय पदार्थों का प्रयोग नहीं करना चाहिये क्योंकि कपूर उनमें घुल जाता है। जीर्ण विषैला प्रभाव—कुछ युवा स्त्रियों में सौन्दर्य वृद्धि के लिये कपूर खाने की आदत पड़ जाती है जिसको छुड़ाना कठिन होता है। इसके कारण साधारण मानसिक उत्तेजना, तन्द्रा, अत्यधिक दौर्बल्य एवं पाण्डुता आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं । नोट—कपूर का चूर्ण बनाने के लिये खरल में घोटते समय रेक्टिफाइड स्पिरिट से कपूर आर्द्र कर लेने से आसानी से चूर्ण बन जाता है तथा खरल में चिपकता नहीं । मात्रा—१-२ र०; आसव—५-२० बूंद; कर्पूराण्डु—१-२ औं० । अथ कस्तूरी । तस्या नामभेदगुणानाह मृगनाभिर्मृगमदः कथितस्तु सहस्रभित् । कस्तूरिका च कस्तूरी वेधमुख्या च सा स्मृता ॥ कामरूपोद्भवा कृष्णा नैपाली नीलवर्णयुक् । काश्मीरी कपिलच्छाया कस्तूरी त्रिविधा स्मृता ॥ कामरूपोद्भवा श्रेष्ठा नैपाली मध्यमा भवेत् । काश्मीरदेशसम्भूता कस्तूरी ह्यधमा मता ॥ कस्तूरिका कटुस्तिक्ता क्षारोष्णा शुक्रला गुरुः। कफवातविषच्छर्दिशीतदौर्गन्ध्यशोफहृत् ॥ कस्तूरी के नाम, भेद तथा गुण—मृगनाभि, मृगमद, सहस्रभित्, कस्तूरिका, कस्तूरी, और वेधमुख्या ये सब कस्तूरी के संस्कृत नाम हैं। वर्णभेद से कस्तूरी तीन प्रकार की होती है जैसे— १ कामरूप (कामरूदेश) में उत्पन्न होने वाली कस्तूरी कृष्णवर्ण की (काली) होती है। २ नेपाल देश में उत्पन्न होनेवाली नीले रङ्ग की होती है। ३ कश्मीर देश में उत्पन्न होने वाली कपिल वर्ण की होती है। इनमें से कामरूप देश की कस्तूरी उत्तम, नेपाल देश की मध्यम एवम् कश्मीर देश की अधम गुण वाली होती है। कस्तूरी-कटु तथा तिक्त रस युक्त, क्षार गुण विशिष्ट, उष्णवीर्य, वीर्यजनक और गुरु होती है। यह कफ, वायु, विष, वमन, शीत, दुर्गन्ध और शोथ को दूर करने वाली होती है ॥ ५-८ ॥ ३ कस्तूरी । हि०—कस्तूरी, मृगनाभि, मृगनाफा। बं०—मृगनाभि । ते०—कास्तूरी । म०—गु०—क०—ता०— कस्तूरी । फा०—मुष्क । अ०—मिस्क । अं०—Musk (मस्क) । ले०—Moschus (मोस्कस्) । हिरन की कई जातियाँ होती हैं किन्तु सब जाति के हिरनों से कस्तूरी नहीं निकलती। जिस हिरन से कस्तूरी निकलती है उसको संस्कृत में 'कस्तूरीमृग', यूनानी में 'हिरनमुस्की' और लेटिन में मोस्कस् मोस्कीफेरस (Moschus moschiferus; Fam. Cervidae) कहते हैं । यह मृग उत्तरी भारत, नेपाल, आसाम, कश्मीर, मध्य एशिया, तिब्बत, भूतान, चीन एवं रूस आदि स्थानों में ७०००-८००० फीट ऊंची पहाड़ी चोटियों पर सघन जंगलों में पाया जाता है। यह विशेष कर तिब्बत में अधिक होते हैं। यह हिरन की जाति का बहुत सुहावना और सुन्दर मृग होता है किन्तु न इसके सींग होते हैं न दुम । यह मृग करीब २० इंच ऊँचा, लौह के समान गहरे धूसर वर्ण का, अत्यन्त सर्शक स्वभाव का प्राणी होता है। इसके ऊपरी जबड़े में दो लंबे दंष्ट कर्पूरादिवर्गः १७६ होते हैं जो बाहर नीचे की ओर हुक की तरह निकले रहते हैं। इसका मुंह लंबा, पैर पतले तथा सीधे एवं बाल रूखे और लम्बे होते हैं। इसके लिंगेन्द्रिय के मणि को ढांकने वाले चमड़े के प्रवर्धन से बनी हुई एक थैली होती है जिसके सूखे हुये स्राव को 'कस्तूरी' कहते हैं। नर हिरन में ही यह पायी जाती है। यह थैली नाभि के पास, नाभि एवं शिश्नावरण के बीच में स्थित रहती है। यह अंडाकार, १३-३ इश्व लम्बी एवं १-२ इश्व चौड़ी होती है। इसके अग्रभाग में केशयुक्त एक छोटासा छिद्र होता है तथा पिछले भाग में एक सिकुड़न सी होती है जो शिश्नाग्रचर्म के मुख से मिल जाती है। इसके अन्दर के चिकने आवरण की अनियमित तहों के कारण यह कई अपूर्ण विभागों में बंटी होती है। कस्तूरी, युवावस्था के मृगों में उनके मदकाल (Rutting season) में अधिक मात्रा में होती है तथा उसी समय उसकी शक्ति एवं गन्ध अधिक रहती है। यह काल करीब १ महीने का होता है। रा० नि० में भी लिखा है कि—'बाले जरति च हरिणे क्षीणे रोगिणि च मन्दगन्धयुता । कामातुरे च तरुणे कस्तूरी बहलपरिमला भवति ॥' बालक, वृद्ध, क्षीण और रोगी हिरन की कस्तूरी मन्द गन्ध वाली होती है तथा कामातुर और तरुण हिरन की कस्तूरी अत्यन्त सुगन्धित होती है। जब उक्त हिरन की नाभि में कस्तूरी बन जाती है तब उसमें से कस्तूरी की गन्ध आती है और वह मृग किसी दूसरे पदार्थ की गन्ध समझ कर इधर-उधर घूम-घूम कर वृक्षों को सूंघा करता है जिससे बहेलिये आसानी से पहचान कर उसको मार डालते हैं और नाभि को काट लेते हैं। स्वस्थ वयस्क प्राणी में करीब २३ तो० कस्तूरी पाई जाती है। १ साल के बच्चे में कस्तूरी नहीं होती तथा २ साल के बच्चे में करीब ६-७ माशे होती है जो दुधिया रहती है। वृद्ध प्राणि में भी ७ माशे से अधिक नहीं होती। इसमें सुगन्ध ही एक मनोहर गुण है जो बहुत तीव्र स्वतन्त्र प्रकार की और शीघ्र फैलने वाली होती है। इसका स्वाद सुगन्ध युक्त कडुवा होता है। कस्तूरी के प्रकार'-मृग के शिकार के बाद इन नाभी को निकाल कर धूप एवं हवा में सुखाते हैं। फिर इन नाभी को मृग के बालों में लपेट कर चमड़े की थैलियों में बन्द किया जाता है तथा बाद में सीलबन्द डब्बों में या अन्दर से टीन का अस्तर लगे हुये लकड़ी के बक्सों में बन्द कर बाहर भेजा जाता है। व्यापार की कस्तूरी ३ प्रकार की होती है। (१) रूस की कस्तूरी—इसमें गन्ध बहुत कम होती है (२) आसाम की कस्तूरी—यह बहुत अच्छी तथा तीव्र गन्ध युक्त होती है तथा इसका रंग काला होता है। सम्भवतः प्राचीनों ने कामरूप कस्तूरी इसी को कहा है। (३) चीन की कस्तूरी-यह सबसे मंहगी होती हैं क्योंकि अन्य हीन श्रेणी की कस्तूरी में जो कभी कभी अमो- मिया आदि की अप्रिय गन्ध होती है वह इसमें बिलकुल नहीं होती। यह कस्तूरी तिब्बत से ही चीन को जाती है। एक अन्य तीक्ष्ण अप्रिय गन्ध वाली कस्तूरी कंबर्डाइन् नामक होती है जो मंगोलिया एवं मंचूरिया के उत्तरी भाग तथा पूर्वी साइबेरिया से आती है। उत्तम कस्तूरी—रक्ताभश्याम वर्ण की, गोल बड़े दानेवाली, तीक्ष्ण गन्ध वाली, स्वाद में तिक्त, हल्की एवं मुलायम कस्तूरी उत्तम होती है। इसकी गन्ध बहुत स्थायी रहती है तथा ३००० १. कपिला पिङ्गला कृष्णा कस्तूरी त्रिविधा क्रमात् । नेपालेऽपि च काश्मीरे कामरूपे च जायते ॥ साऽन्येका खरिका ततश्च तिलका ज्ञेया कुलित्थाऽपरा, पिण्डाऽन्यापि च नायिकेति च परा या पञ्चभेदाभिधा । सा शुद्धा मृगनाभितः क्रमवशद्देशा क्षितीशोचिता पञ्चख्यादिदिनत्रयेषु जनिता कस्तूरिका स्तूयते ॥ चूर्णाकृतिस्तु खरिका तिलका तिलाभा, कौलत्थबीजसदृशी च कुलित्थिका च । स्थूला ततः कियदिदं किल पिण्डिकारूया तस्याश्च किंचिदधिका यदि नायिका सा ॥ रा. नि. ।