भारतकोश
भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

१६० भावप्रकाशनिघण्टुः बिरिया संचर नमक - अग्निदीपक, लघु ( शीघ्र पच जाने वाला ) तीक्ष्ण तथा उष्ण- वीर्य, रूक्ष, रुचिकारक, व्यवायि ( परिपक्व होने के पहले ही शरीर में प्रभाव दिखाने वाला ), विबन्ध, आनाह, विष्टम्भ, हृद्रोग, शरीर की गुरुता तथा शूल को नष्ट करने वाला भी होता है ॥ ८९ बिरिया संचर नमक । हि०-बिरिया ( आ ) नमक, बिरिया संचर नमक, बिरिया सोंचर नमक, कटीला नमक, कालानमक । वं०-विट्नुन । म०-पादेळोण, विडलोण । गु०-विड लवण । विडलवण क्या है इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। श्रीयुत द० अ० कुलकर्णी जी ने अपनी रसरत्नसमुच्चय की टीका में इसका स्पष्टीकरण किया है। जो क्षार, अम्ल, गंधक तथा नमक आदि पदार्थ पारद में दिये हुये ग्रास को जीर्ण करने के लिये प्रयुक्त होते थे उन्हें बिड कहा जाता था । बाद में इस शब्द का प्रयोग अन्य धातुओं को पारद में जीर्ण कराने के लिये एवं भिन्न-भिन्न धातुओं के शोधन अथवा द्रावण के लिये प्रयुक्त द्रव्यों के लिये किया जाने लगा । इसके पश्चात् रसशास्त्र की अवनति के काल में उपर्युक्त दोनों अर्थ भूल गये और बिड का प्रयोग नमक के साथ करके बिडनमक के रूप में कालानमक के लिये आजकल किया जा रहा है। यह कालानमक मनुष्य के खाये हुये ग्रास अथवा गुरु भोजन को जीर्ण अथवा हजम कराने में समर्थ होने के कारण बिडनमक या कालानमक यह अर्थ ही अब व्यवहार में विशेष रूढ़ हो गया है। सुश्रुत की टीका में डल्हण लिखते हैं कि 'कृत्रिमं स्वनाम्ना ख्यातं, तच्च प्रसारिणी कल्कमक्त- लवणसंयोगादग्निदाहेन निवृत्तम्' अर्थात् प्रसारिणी का कल्क, भात तथा नमक आदि को जलाकर बनाया हुआ नमक । गुजरात की ओर उपर्युक्त चीजों को गढ़े में डालकर जलाते हैं तथा १०, १५ दिन बाद उसमें से नमक के ढेले निकाल कर व्यवहार करते हैं । कुछ लोगों ने सौवर्चल लवण को कालानमक लिखा है। आजकल बिडलवण नाम से जिस काले नमक का व्यवहार किया जाता है उसके बनाने की निम्न विधि है। यह हिसार जिले में भिवानी नामक ग्राम में अधिक बनाया जाता है । १ मन सेंधानमक तथा हर्री, आंवला तथा सज्जीखार ( व्यापार का सोडियम् कार्बोनेट ) प्रत्येक आधा सेर लेकर सब चीजों को कूट कर एवं मिलाकर मिट्टी की हांडियों में पकाते हैं। जब सब चीजें गलकर एक हो जाती हैं तब आंच को बन्द करके ठंडा होने पर नमक के ढोकों को निकाल लिया जाता है। एक अन्य विधि यह है कि २८ सेर सांभर नमक तथा ५० तो० आंवला चूर्ण को मिला कर उसका चतुर्थांश एक संकरे मुंह की हांडी में रखकर गरम करें तथा लाल होने पर बाकी चूर्ण में से थोड़ा थोड़ा उस हांडी में डालते जांय । करीब ६ घण्टे पश्चात् २४ सेर के लगभग काला नमक तैयार हो जावेगा । यह काला नमक गहरे लाल काले से चमकीले रंग का, नमकीन एवं विशिष्ट गंधयुक्त होता है। रासायनिक संगठन-इसमें प्रधानतया ( ९५% ) खाने का नमक तथा अत्यल्प मात्रा में खारी नौन ( Sodium Sulphate-सोडियम् सल्फेट ), ऐल्यूमिना, मॅगनेशिया, फेरिक् ऑक्सा- इड् एवं आयर्न सल्फाइड आदि पदार्थ पाये जाते हैं । इसकी गन्ध इसके आयर्न सल्फाइड के कारण रहती है लेकिन इसमें यह बहुत अल्प ( १०० में १ से कम ) मात्रा में रहता है। गुण और प्रयोग-यह अग्निदीपक, वातानुलोमक, विरेचक एवं बल्य है । इसका प्रयोग प्लीहावृद्धि, यकृत् विकार, आध्मान, शूल, अपचन एवं अन्य आन्त्रिक विकारों में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती ।


हरीतक्यादिवर्गः १६१ अथ सौवर्चलं लवणम् । तस्य नामगुणानाह सौवर्चलं स्याद् रुचकं मन्थपाकञ्च तन्मतम्¹। रुचकं रोचनं भेदि दीपनं पाचनं परम् ॥ सस्नेहं वातनुच्चातिपित्तलं विशदं लघु । उद्गारशुद्धिकृद्रुच्यं विबन्धानाहशूलजित् ॥२४९॥ काला नमक के नाम तथा गुण - सौवर्चल, रुचक और मन्थपाक ये सब काला नमक के संस्कृत नाम हैं । कालानमक - रोचक, भेदक, अग्निदीपक, अत्यन्त पाचक, स्नेहयुक्त, वातनाशक एवम् अत्यन्त पित्तजनक नहीं होता है । तथा यह विशद गुण युक्त, हलका, उद्गार ( डकार ) को शुद्ध करने वाला, सूक्ष्म ( सूक्ष्म स्रोतोगामी ), विबन्ध, आनाह तथा शूल का नाश करने वाला है ॥ २४८-२४९ ॥ ९० सोंचर नमक । हि०-कालानमक, सोंचर नमक, चौहार कोड़ा, चौहार कोरानोन, चौहार कारा, चौहार काला । बं०-संचल लवण । म०-सोनचक मीठ । गु०-संचल । क०-चौवर्चल । ते०-नालु उपु । फा०-नमक सिया, नमक स्याह । यू०-नमक काला । अ०-माला अस्वद, मलह अस्वद । अं०- Black Salt ( ब्लैक साल्ट ), Sochal Salt ( सोचल साल्ट ) । ले०-Unaqua Sodium Chloride ( अनुकुआ सोडियम् क्लोराइड ) । जिस प्रकार बिडलवण के सम्बन्ध में मतभेद है उसी तरह सौवर्चल लवण के सम्बन्ध में भी मतभेद है। कुछ लोगों ने इसे काललवण लिखा है। कुछ लोगों ने यह लिखा है कि जो सौवर्चल निर्गन्ध होता है वह काललवण है तथा वह दक्षिण समुद्र के समीप बनता है। डा० देसाई लिखते हैं 'रसग्रन्थों में सौवर्चल नाम शोरे को दिया गया है। सु = सुष्ठु, वर्चः = दिप्तिं, अल् = प्राप्ति, सर्वथा अलति अनेन इति सौवर्चलं = जिसके कारण भली प्रकार प्रकाश पड़ता है अर्थात् 'बहुद्युत्तेजक' । श्रीयुत द. अ. कुलकर्णीजी लिखते हैं 'जिस मिट्टी से शोरा प्राप्त किया जाता है उसे लूनिया मिट्टी कहते हैं तथा उस मिट्टी में कुछ खाने का नमक भी रहता है जिसे अलग कर लिया जाता है। ऐसे नमक में कुछ शोरे का अंश रहता है। शोरे के साथ-साथ पैदा होने के कारण तथा शोरे की कुछ मात्रा इसमें रहने के कारण इसको सोंचर अथवा सौवर्चल कहते हैं। सोंचर नमक बनाने की निम्न विधि प्रचलित है । सज्जी माटी को जल में घोल दिया जाता है फिर उसमें थोड़ा थोड़ा खाने का नमक डालते जाते हैं और जितना घुलता है उतना घुलने देते हैं । फिर इस घोल को छानकर अग्नि से सुखाते हैं । यह कुछ गहरे रङ्ग का होता है । रासायनिक संगठन-इसमें खाने का नमक, खारी नौन ( सोडा सल्फ ) एवं सज्जीखार ( कॉस्टिक सोडा ) रहता है लेकिन सोडियम् कार्बोनेट नहीं रहता । गुण और प्रयोग-इसका उपयोग विड लवण के स्थान पर भी किया जाता है । यह अग्नि- दीपक, पाचक एवं विरेचक होता है। इसका उपयोग शूल, गुल्म, आन्त्रकृमि एवं संग्रहणी आदि में किया जाता है। मात्रा-२-८ रत्ती । अथ खानिजं लवणम् । तस्य नामगुणानाह औद्भिदं पांशुलवणं यज्जातं भूमितः स्वयम् । क्षारं गुरु कटु स्निग्धं शीतलं वातनाशनम् ॥ खानिज लवण अर्थात् रेहगदा नोन के नाम, उत्पत्ति तथा गुण- औद्भिद तथा पांशुलवण १. 'अक्षपाकं च धातुमत्' इति पाठ० । ११ भा० नि०